मंगलवार, 28 जून 2011

प्रभात के नाम पर काम कर रहे सरकारी मुलाजिम


प्रभात के नाम पर काम कर रहे सरकारी मुलाजिम

मध्य प्रदेश सरकार का कार्यालय बना संगठन का दफ्तर

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली। यूं तो देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मध्य प्रदेश सरकार के अनेकों कार्यालय कार्यरत हैं, किन्तु इनमें से एक प्रमख कार्यालय राज्य शासन के काम के अलावा मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रभात झा का अघोषित कार्यालय भी बना हुआ है, जहां से सांसद विधायक की सेवा टहल के साथ ही साथ मीडिया मैनेजमेंट का काम भी संपादित किया जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मीडिया के बीच मध्य प्रदेश सरकार की छवि को निखारने के लिए पाबंद इस कार्यालय को अघोषित तौर पर मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा के कार्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। मध्य प्रदेश से आने वाले भाजपा सांसद विधायक एवं अन्य पदाधिकारियों के लिए इस कार्यालय से बाकायदा सरकारी वाहन भी मुहैया करवाया जाता है। यह अलहदा बात है कि बाद में वाहन की लाग बुक सरकारी तौर तरीकों से भर दी जाती है। मीडिया के लोगों को मिलने वाली सुविधाओं आदि के बारे में यह कार्यालय पूरी तरह खामोशी अख्तियार किए हुए है।

बताया जाता है कि उक्त कार्यालय में पदस्थ एक कर्मचारी द्वारा प्रभात झा के लाईजनिंग आफीसर के बतौर काम किया जा रहा है। कार्यालय से फोन पर अनेक मर्तबा लोगों ने उनके श्रीमुख से यह भी सुना कि वे प्रभात झा के कार्यालय से बोल रहे हैं। दिल्ली में अब इस बात पर शोध चल रहा है कि क्या आखिर प्रभात झा ने दिल्ली में अपना कार्यालय मंहगे और पॉश व्यवसायिक इलाके में बनाया हुआ है।

क्या उमा का फरमान मानेगी भाजश?


क्या उमा का फरमान मानेगी भाजश?

संशय में हैं भाजश के पांचों विधायक

उमा के निर्णयों से नाराज हैं कार्यकर्ता

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में जनाधार के साथ भारतीय जनता पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने वाली भारतीय जनशक्ति पार्टी के 29 जून को दिल्ली में भाजपा में विलय की तैयारियां तो आरंभ हो गई हैं किन्तु उमा की यह कोशिश परवान चढ़ पाएगी इसमें संशय ही लग रहा है। भाजश के पांचों विधायक किस शर्त पर भाजपा में शामिल होंगे इस बारे में अभी खुलासा नहीं हो सका है। विधायकों को यह चिंता भी सताए जा रही है कि कहीं अगली बार उनका टिकिट ही न काट दिया जाए!

गौरतलब है कि भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाने के बाद उमा भारती ने हाशिए में जाने से बचने की गरज से भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। उस समय भाजपा से नाता तोड़ने वाले मदन लाल खुराना, प्रहलाद सिंह पटेल, संघ प्रिय गौतम ने भाजश को थामा और मध्य प्रदेश में इसका जनाधार बढ़ाया। भाजपा में वापसी के लिए लालायित उमा भारती ने लोकसभा चुनावों के दौरान भाजश को अचानक ही अखाड़े से बाहर कर सभी को चौंका दिया था। इसके बाद वे टीकमगढ़ से खुद भी विधानसभा चुनावों में चारांे खाने चित्त गिर गईं थीं। बाद में युवा तुर्क प्रहलाद पटेल की भाजपा में सम्मानजनक वापसी हो गई और उन्हें असंगठित मजदूर संगठन का नेशनल प्रेजीडेंट बना दिया गया।

भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी ने अध्यक्ष बनते ही पार्टी छोड़कर गए नेताओं की घर वापसी की मुहिम आरंभ की। इसी के तहत जसवंत सिंह, प्रहलाद पटेल और खुराना के भाजपा में वापसी के मार्ग प्रशस्त हुए। इसके बाद उमा भारती के लिए गड़करी को एड़ी चोटी एक करनी पड़ी। मध्य प्रदेश के भाजपा नेता अब केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं कि उमा की भाजश को एमपी में नेस्तनाबूत कर दिया जाए। भाजपा के चतुर सुजान नेता जानते हैं कि भाजश को छोड़कर जाने वाली उमा भारती के लिए भाजश के नेताओं को भाजपा में वापसी के लिए मनाना टेड़ी खीर ही साबित होने वाला है।

भाजश के विधायकों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार बिना किसी से मशविरा किए उमा भारती ने भाजश के भाजपा में विलय की बात सोच कैसे ली, जबकि वे खुद आध्यात्मिक चिंतन के लिए काफी पहले ही भाजश को छोड़कर जा चुकी हैं। चर्चाओं के अनुसार इन पांच में से किसी एक विधायक को शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रीमण्डल में स्थान दिया जा सकता है, इसके अलावा निगम मण्डलों के माध्यम से भी विधायकों को लाल बत्ती से नवाजा जा सकता है। भाजश नेताओं के साथ सबसे बड़ी समस्या यह आ रही है कि अगर भाजश का भाजपा में विलय हो गया तो फिर वे भविष्य में भाजश का गठन नहीं कर पाएंगे, साथ ही अगले विधानसभा चुनावांे में अगर उनका टिकिट ही काट दिया गया तो उनकी राजनैतिक हत्या हो जाएगी।

अण्णा बाबा अगर मोहरा नहीं तो फिर . . .!


ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

अण्णा बाबा अगर मोहरा नहीं तो फिर . . .!
सियासी दल विशेषकर कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव और अण्णा हजारे के आंदोलन के पीछे संघ, भाजपा और कुछ अन्य ताकतें हैं। सवाल यह है कि पर्दे के पीछे चाहे जो हो, पर मुद्दा सही है या गलत! अगर सही है तो फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि पर्दे के पीछे कौन है। वहीं दूसरी ओर अगर इन दोनों ही के आंदोलनों को करंट संघ या भाजपा की बेटरी से मिल रहा हो तो फिर भाजपा शासित सूबों में सूबाई लोकपाल बना देना चाहिए जो राज्य संवर्ग के अधिकारियों कर्मचारियों पर अपना डंडा चलाए। जिस तरह सूचना का अधिकार कानून भारत की संसद द्वारा 15 जून 2005 को पारित किया था, किन्तु इसी भारत गणराज्य की गोवा और तमिलनाडू सरकार द्वारा इसे इससे आठ वर्ष पूर्व अर्था 1997 में ही अपने सूबों में लागू कर दिया था। कांग्रेस इसका विरोध करती है तो करती रहे, जिन सूबों में कांग्रेस से इतर सरकारें हैं, वहां तो राज्य स्तरीय लोकपाल बन जाएं, ताकि देश के नागरिकों को कांग्रेस रहित राजनैतिक दलों में पारदर्शिता का अनुभव हो सके।

फिर मिलेगा कुंवारा प्रधानमंत्री देश को!
कांग्रेस के चतुर सुजान महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के वक्तव्यों से कांग्रेस की भविष्य की रणनीति के बारे में अंदाजा लगाने में आसानी हो जाती है राजनैतिक भविष्यवक्ताओं को। राजा के हाल ही के वक्तव्यों से साफ हो गया है कि राहुल पीएम भी बनेंगे और घर भी बसाएंगे। कांग्रेस के अंदर अब यह बहस छिड़ गई कि राहुल घर पहले बसाएंगे या फिर अटल बिहारी बाजपेयी के बाद दूसरे कुंवारे ही प्रधानमंत्री बनेंगे। गांधी सरनेम वाले दो अन्य लोगों में से राहुल के चचेरे भाई वरूण ने तो सात फेरे ले लिए और दूसरे कांग्रेस के पूर्वोत्तर का काम संभालने वाले अनीष गांधी जिनका राहुल से खून का रिश्ता तो नहीं है पर सरनेम समान है ने भी मायावती के तारणहार सतीश मिश्रा की रिश्तेदार से। अब बच गए हैं राहुल। राहुल की कोलंबियाई मित्र के चर्चे तो हर कांग्रेसी की जुबान पर हैं। कांग्रेसी कहते हैं कि जब उनके पिता राजीव ने इटली की बहू लाई गई तो राहुल भला क्यों पीछे रहें। राहुल के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल दबे पांव कोलंबिया जाते आते रहते हैं और इसकी भनक उनकी मां सोनिया तक को नहीं लग पाती है।

कमल नाथ को कोसा गौर ने!
कल तक केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के साथ गलबहियां डालकर घूमने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान नगरीय प्रशासन मंत्री बाबू लाल गौर अब कमल नाथ को आंखें दिखाने लगे हैं, जिसकी चर्चा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में होने लगी है। एआईसीसी में गौर के हालिया बयान का हवाला देकर तरह तरह की चर्चाएं आकार लेने लगी हैं। गौर ने हाल ही में कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा भोपाल, रायपुर, चंडीगढ़ को तो विशेष पैकेज दे रही है, पर जब संस्कारधानी जबलपुर की बारी आती है तो कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा सौतेला व्यवहार आरंभ कर दिया जाता है। गौरतलब है कि वर्तमान में केंद्र में शहरी विकास मंत्रालय का प्रभार कमल नाथ के पास है एवं उनका संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा भी जबलपुर संभाग में ही आता है। महाकौशल में कमल नाथ को सर्वमान्य नेता की हैसियत से पहचाना जाता है, इन परिस्थितियांे में वे अपने संभाग के साथ ही सौतेला व्यवहार कर रहे हैं। अब कांग्रेस और भाजपा में बाबू लाल गौर की इस बयान बाजी के मायने खोजे जा रहे हैं।

ठीक नहीं हैं दीदी और राजमाता के रिश्ते
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और त्रणमूल की सुप्रीमो सुश्री ममता बनर्जी के बीच सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। संप्रग सरकार के दो साल पूरे होने पर आयोजित भोज का त्रणमूल ने अघोषित तौर पर बायकाट कर दिया। टीएमसी के सभी मत्री उस दिन राजधानी दिल्ली में थे, पर सुदीप बंदोपाध्याय को छोड़कर सभी ने इस भोज में जाना उचित नहीं समझा। माना जा रहा है कि जिस तरह सोनिया गांधी द्वारा ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण का बहिष्कार किया था उसी तर्ज पर ममता ने कांग्रेस के गाल पर करारा तमाचा मारा है। यद्यपि मीडिया में इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं आया पर कांग्रेस के प्रबंधक इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं। ममता का खौफ पार्टी पर भी इस कदर है कि रेल मंत्री का प्रभार पाने वाले मुकुल राय ने जब पदभार ग्रहण किया तब उन्हें ममता का कमरा ही मिला और ममता की कुर्सी पर जब बैठने की बारी आई तो उनके मंुह से बरबस ही निकल पड़ा -‘‘न बाबा न, आमी जोतो खुद दीदी आमा के बोलबे न आउरा आमी कैबिनेट पाबो न और उपेरे बोसबो न‘‘ अर्थात जब तक दीदी नहीं कहेंगी और कैबनेट मंत्री नहीं बनूंगा उस पर बैठूंगा नहीं।

कांग्रेस की बोलती बंद की अण्णा ने
काले धन, भ्रष्टाचार और लोकपाल को लेकर देश में तूफान मचा हुआ है। बाबा रामदेव ने एक सिरे पर मोर्चा संभाला था, तो दूसरे सिरे पर अण्णा हजारे बेटिंग को उतरे थे। कांग्रेस ने सधे कदमों से बाबा रामदेव को तो मीडिया की सुर्खियों से बाहर ही कर दिया। अब बाबा रामदेव खबरों से बाहर होकर बस अपने सहयोगी नेपाली मूल के आचार्य बाल किसन के स्वामित्व वाले आस्था चेनल पर ही दिख रहे हैं। रही बात अण्णा हजारे की तो अण्णा का पड़ला बेहद भारी दिख रहा है। हाल ही में एक समाचार चेनल ने अपने स्टूडियो में अण्णा और केजरीवाल को बुलाया, साथ ही लाईव रखा कांग्रेस के नेताओें को। अण्णा ने अपनी सादगी के साथ कांग्रेस के नेताओं को धोकर रख दिया। समूचे देश ने देखा कि कांग्रेस के नेता किस कदर झूठ बोलने पर आमदा हो रहे थे। भाई दीपक चौरसिया ने बड़ी ही सफाई के साथ पूरा प्रोग्राम संचालित किया। अंत में हर किसी की जुबान पर आ गया था कि अण्णा ने आखिर बंद ही कर दी भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबी सवा सौ साल पुरानी और देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस की बोलती।

च्यूईंग गम से मचा जबर्दस्त बवाल!
वित्त मंत्री के कार्यालय में डेढ़ दर्जन स्थानों पर गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ अर्थात च्यूईंग गम का मिलना देश के ताकतवर और महफूज वित्त मंत्रालय की सुरक्षा में सेंध के सवालिया निशान छोड़ गया है। सूत्रों की मानें तो उप प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना मन में पालने वाले वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले साल सात सितम्बर को वजीरे आजम को पत्र लिखकर इसकी गोपनीय जांच करवाने का आग्रह किया था। इंटेलीजेंस ब्यूरो को जांच में कुछ नहीं मिला। जांच में ये च्यूईंग गम काफी पुराने पाए गए। इससे साफ है कि सरकारी कार्यालयों में साफ सफाई सतही तौर पर ही की जाती है। दूसरी बात यह कि आजकल तम्बाखू खाने और पीने (बिड़ी सिगरेट आदि) का विकल्प निकोटिन युक्त च्यूईंग गम आ गया है। लोग धूम्रपान करने के बजाए जेब में इन नशीली च्यूईंग गम को रखते हैं। सामान्य च्यूईंग गम की तरह कुछ देर में ही ये बेस्वाद हो जाती हैं तब इन्हें थूककर दूसरी चबाने का दिल करता है। कहा जा रहा है कि आला अफसरान ही इस तरह की च्यूईंग गम के बेस्वाद होने पर उसे टेबिल के नीचे चिपका दिया करते होंगे और फिर मच गया बवाल। वैसे कुछ मंत्रियों के मुंह सदा ही चलते दिखते हैं इस तरह की नशीली च्यूईंग गम के कारण!

मोम की तासीर परख रहीं हैं कोनिमोझी
द्रमुक सांसद कोनिमोझी तिहाड़ जेल में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में बंद हैं। जेल की सलाखों के पीछे वे अब तक का अपना समय साहित्य पढ़ने में बिता रहीं थीं। उनकी सुरक्षा के मद्देनजर उनसे मिलने आने वाले लोगों में से कुछ ही लोगों को तिहाड़ जेल प्रशासन द्वारा मिलने की अनुमति दी जा रही है। जेल की चारदीवारी अच्छे अच्छों के कस बल ढीले कर देती है यह बात हर कोई जानता है। इन दिनों कोनिमोझी जेल के अंदर खाली समय में अन्य महिला कैदियों की तरह मोमबत्ती बनाना सीख रहीं हैं। जेल के अंदर कैदियों को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि रिहाई के बाद वे इस फन का उपयोग कर सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें। कोनिमोझी के पास आकूत दौलत होने की खबरें हैं, इस लिहाज से वे मोमबत्ती बनाने में तो कतई दिलचस्पी नहीं ले रही होंगी। यह हो सकता है कि वे मोम की तासीर को परख रही हों।

आदिवासी विरोधी कांग्रेस!
भले ही कांग्रेस द्वारा आदिवासियों के हितों को साधने के लाख दावे किए जाएं किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। मध्य प्रदेश के महाकौशल और सतपुड़ा क्षेत्र का नब्बे प्रतिशत हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है। इस हिस्से में मण्डला को छिंदवाड़ा और जबलपुर को बालाघाट से रेल मार्ग से जोड़ने के लिए अमान परिवर्तन के काम को केंद्रीय रेल मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी है। महाकौशल का नेतृत्व कांग्रेस के मंत्री कमल नाथ के सशक्त हाथों में है। 2000 से आरंभ हुई बालाघाट जबलपुर आमन परिवर्तन की योजना में फच्चर फंसा दिया गया है। मार्ग में बाघ आ गए हैं। यही स्थिति मण्डला से छिंदवाड़ा रेल परियोजना में होने वाला है। इसके पहले उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे में धमाल मचा चुके हैं बाघ। मजे की बात तो यह है कि यह बाघ इतना होशियार है कि यह कमल नाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा जिले को छूता भी नहीं है। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार आदिवासियों को न तो सड़क से और न ही रेल मार्ग से जोड़ने की इच्छुक दिख रही है। मामले को अब राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के हवाले कर दिया गया है।

अब गैस घोटाले में फंसी कांग्रेस
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की कांग्रेसनीत सरकार की दूसरी पारी किसी अशुभ महूर्त में ही आरंभ हुई है, यही कारण है कि एक के बाद एक सरकार के घपले और घोटाले उजागर होते जा रहे हैं। टूजी, कामन वेल्थ जैसे बड़े घोटालों के सदमे से अभी कांग्रेस उबरी नहीं कि उस पर अब गैस घोटाले के छींटे पड़ गए हैं। कैग ने अपने प्रतिवेदन में तेल और गैस अनुबंधों में निजी कंपनियों को अनुचित फायदा पहुंचाकर राजकोष में सेंध लगाने का आरोप लगाया है। यह घोटाला अब तक के घोटालों में सबसे बड़ा बताया जा रहा है। मीडिया को संबोधित करने वाले मंत्री समूह ने भी इस मामले में चुप्पी साध ली है। चारों तरफ से घपलों घोटालों और भ्रष्टाचार से घिरे प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह बुरी तरह उलझकर रह गए हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी ने इस मामले में अपना मुंह सिल कर रखा हुआ है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथवाला जुमला अब कांग्रेस का हाथ आम आदमी की गर्दन परके मानिंद चरितार्थ होता दिख रहा है।

शिव ने ली राहत की सांस
भाजपा में वापसी के बाद पहली मर्तबा मध्य प्रदेश आईं उमा भारती के ढीले पड़े तेवरों को देखकर सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने राहत की सांस ली हैै। मध्य प्रदेश आईं उमा भारती को लेकर भाजपा पूरी तरह चाक चौबंद रही। दिल्ली में बैठे उमा विरोधी भी उनके एक एक कदम और वक्तव्यों पर नजरंे गड़ाए थे। उमा ने बहुत ही नपे तुले शब्दों का प्रयोग कर यह जरूर कह दिया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी थी, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के साथ उनके तल्ख रिश्ते जगजाहिर हैं। दिग्गी राजा को आड़े हाथों लेते हुए उमा ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को वाहन तो दिग्गी को उनकी स्टेपनी करार दे दिया। कांग्रेस और भाजपाईयों द्वारा उमा के इस वक्तव्य के निहितार्थ ढूंढे जा रहे हैं कि उमा की नजरों में राहुल गांधी की औकात किस गाड़ी की तरह है?

बुढ्ढा होगा तेरा बाप, मैं तो बेटे का दादा बनूंगा!
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ जो भी घटता है वह खबर बन जाता है। चाहे मंुबई के आतंकी हमले के बाद उन्हें नींद का न आना हो या कुली फिल्म में पुनीत इस्सर के हाथों घायल होना। इन दिनों सोशल नेटवर्किंग वेब साईट पर उनका ट्वीट कि एशवर्या मां बनने वाली हैं, के चलते वे चर्चाओं में हैं। हाल ही में बुढ्ढा होगा तेरा बाप के प्रोमो में वे इसी बात को दोहराते दिखते हैं, फिर अचानक ही अभिषेक के पिता बनने की खबर। बिग बी के प्रशंसकों के पांव तो जमीन पर ही नहीं पड़ रहे हैं। चेनल्स पर बिग बी भी इस बात की पुष्टि करते दिखते हैं। किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि बिग बी चाहते हैं कि उनका वंश आगे बढ़े सो वे कहते दिखते हैं कि हमने एश्वर्य से कहा कि बेटा पैदा करो। हजारों लाखों लोगों के चहेते और पयोनियर अमिताभ बच्चन खुद ही जब बेटा और बेटी में फर्क जतलाकर बेटा पैदा करने की अपील सार्वजनिक तौर पर करेंगे तो भला फिर सरकार के बेटी बचाओ अभियान पर पलीता तो लगना ही है।

अण्णा और रामदेव मामले में गांधी परिवार की चुप्पी आश्चर्यजनक!
पिछले दो माहों से हाट टापिक है अण्णा हजारे और बाबा रामदेव का आंदोलन। पुलिस ने बर्बरता के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों को खदेड़ा। कमोबेश हर समाचार चेनल ने इसे लाईव दिखाया। सुबह होते ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के सुर बदल गए थे। रात की कहानी के बाद बाबा रामदेव का स्त्रीवेश धारण कर भागना ही प्रमुखता पा रहा था। इस मामले में भाजपा ने भी रामदेव के सुर में सुर मिलाया पर कंधे से कंधा नहीं मिला सकी भाजपा। इसलिए भाजपानीत उत्तराखण्ड सरकार के राज में बाबा रामदेव का अनशन तुड़वाकर उन्हें हाशिए पर ढकेल दिया गया। समूचे मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी की चुप्पी संदिग्ध ही लग रही है। अगर राहुल को कल देश की बागडोर संभालना है (जैसा कांग्रेस को लग रहा है) तो निश्चित तौर पर इतने संगीन मामले में उन्हें संज्ञान अवश्य ही लेना था, पर क्या किया जा सकता है, दोनों ही के बारे में जगजाहिर है -‘‘जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना . . . ।‘‘

प्राचार्य मांग रहे भीख!
झारखण्ड मंे एंग्लो इंडियन बाहुल्य गांव है मैक्लुस्कीगंज। इस गांव में ब्रितानी और आस्टेªलियन लोगों की खासी तादाद है जो आजादी के बाद वापस अपने देश जाने के बजाए हिन्दुस्तान की संस्कृति में ही रच बस गए। रांची जिले के इस गांव में आस्टेªलिया मूल के एक व्यक्ति डी.आर.कैमरून ने अपनी संपत्ति में शामिल गेस्ट हाउस और बंग्ला एक पूंजीपति जगदीश पांडेय को इस शर्त पर बेचा था कि पाण्डेय द्वारा कैमरून को एक कमरा आजीवन निशुल्क रहने के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। बाद में संपत्ति के लालच में जगदीश पाण्डेय ने एक बाथरूम में उनका आशियाना बना दिया। बाद में वे वहां से बेदखल कर दिए गए। भटकते भटकते कैमरून कोलकता जा पहुंचे। लोगों के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब लोगों ने उन्हें सैंट थामस स्कूल के सामने भीख मांगते देखा। दरअसल किसी जमाने में कैमरून इस स्कूल के प्राचार्य हुआ करते थे। वक्त का फेर और मुकद्दर किसे कब कहां किस हाल में पहुंचा दे कहा नहीं जा सकता है।

पुच्छल तारा
कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सदा ही सुर्खियों में बने रहते हैं अपनी बयानबाजी के लिए। कांग्रेस के इन महासचिव के बारे में मजाक से युक्त एक पर्चा डाक से प्राप्त हुआ है। फेकिंग न्यूज डॉट काम से साभार बताने वाला यह पर्चा लिखता है कि वोडा फोन कंपनी ने दिग्विजय सिंह के परफारमेंस से प्रभावित होकर उन्हे अपना ब्रांड एक्बेसेडरऔर कस्टमर केयर हेडबनाने का निर्णय लिया है। कंपनी के सीईओ ने एक पत्रकार वार्ता में इसके तीन कारण गिनाए हैं। पहला तो यह दिग्विजय सिंह अपनी क्षमताओंसे हमारे शिकायती ग्राहकों और प्रतिद्वंदी कंपनी को ठगघोषित कर देंगे। दूसरा दिग्विजय सिंह की हरकतें हमारे वर्तमान और पूर्व आईकान की हरकतों से काफी मेल खाती हैं। कंपनी का पबमालिक के पीछे पीछे चलता है, उसी तरह दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी के पीछे पीछे हर जगह चले जाते हैं। जिस तरह नया ब्राण्ड आईकान अण्डाकार चेहरे वाले जूजूकी तरह दिग्विजय क्या बोलते हैं किसी को समझ में नहीं आता है। तीसरा फोन से दिग्विजय सिंह का पवित्र रिश्ता है। दिग्विजय सिंह को लगातार ही फोन आते रहते हैं, कभी हेमन्त करकरे का तो कभी किसी और का. . .। सीईओ ने दावा किया है कि एसे में राजा दिग्विजय सिंह वोडाफोन कंपनी को नई उचाईयों तक अवश्य ले जाएंगे।

सोमवार, 27 जून 2011

10 जनपथ और 7 रेसकोर्स में खिचीं तलवारें



10 जनपथ और 7 रेसकोर्स में खिचीं तलवारें

सोनिया से नहीं मिल रहा पीएम का मन

मंत्रीमण्डल फेरबदल में सामने आ सकती है खटास

मंत्रीमण्डल में चंद ही बचे सोनिया के नामलेवा

अधिकतर ने पाला बदलकर थामा मनमोहन का दामन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस सत्ता के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) और 7, रेसकोर्स रोड़ (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) के बीच वर्चस्व की निर्णायक जंग खेली जाने वाली है। मंत्रीमण्डल में शामिल नेताओं ने अपनी लक्ष्मण रेखा निर्धारित कर ली है। वर्तमान समीकरणों में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह खासे मजबूत नजर आ रहे हैं, वहीं सोनिया गांधी के नामलेवा चंद मंत्री ही बचे हैं मंत्रीमण्डल में।

10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सोनिया मण्डली इन दिनों बेहद परेशान है क्योंकि उम्मीद से हटकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने धीरे धीरे कर अपना खेमा बना लिया है। प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति न बनाने से दुखी प्रणव ने भी अब मनमोहन सिंह के साथ जुगलबंदी आरंभ कर दी है। प्रणव मनमोहन की जुगलबंदी के चलते मंत्री भी अब सोनिया गांधी को ज्यादा वजन नहीं दे रहे हैं।

कहा जा रहा है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के द्वारा राहुल को पीएम बनाए जाने के एजेंडे के चलते मनमोहन की मुहिम तेज हो गई है। मनमोहन सिंह के साथ अब कपिल सिब्बल, गुलाम नवी आजाद, कमल नाथ, एस.एम.कृष्णा, पवन कुमार बंसल, मुकुल वासनिक आदि खड़े दिखाई दे रहे हैं। उधर सोनिया के वफादारों मंे जयराम रमेश, अंबिका सोनी और ए.के.अंटोनी ही बचे हैं।

उधर पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि सोनिया को तजकर प्रधानमंत्री में आस्था जताने वालों में अंबिका सोनी, वीर भद्र सिंह और वी.नारायणसामी का नाम जुड़ गया है। सामी वर्तमान में अहमद पटेल के पिछलग्गू समझे जाते थे। साथ ही साथ भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी ने भी अपना पाला बदल लिया है। अब वे भी मनमोहनी वीणा ही बजा रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि उन्होंने भूतल परिवहन मंत्री रहे टी.आर.बालू और कमल नाथ के कामकाज का गए गोपनीय प्रतिवेदन भी प्रधानमंत्री को सौंपा है।

मनमोहन मण्डली ने अब सधे कदमों से राहुल और सोनिया की राजनैतिक समझ बूझ पर प्रश्न चिन्ह लगाने आरंभ कर दिए हैं। सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि अगर वरूण और राहुल गांधी में शास्त्रार्थ कराया जाए तो वरूण बीस ही बैठेगें। यही बात कांग्रेस के सोनिया गुट के प्रबंधकों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है।
एक समय था जब मनमोहन सिंह को ताकतवर बनाने के लिए सोनिया गांधी द्वारा नैनिताल में मुख्यमंत्रियों की बैठक में मंच से उप प्रधानमंत्री को अर्ताकिक घोषित कर दिया था। उस वक्त प्रणव मण्डली उनके लिए उप प्रधानमंत्री बनाने के मार्ग प्रशस्त कर रही थी। अब प्रधानमंत्री खुद ही प्रणव मुखर्जी को उप प्रधानमंत्री का पद आफर कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि जल्द होने वाला फेरबदल अनेक तरह से राजनैतिक दिशा और दशा तय करने वाला होगा।

नहीं रूक रहा विद्यार्थियों का फिजिकल पनिशमेंट


नहीं रूक रहा विद्यार्थियों का फिजिकल पनिशमेंट

शारीरिक दण्ड के डर से बच्चों मंे शाला जाने से पैदा हो रही अरूचि

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। शालाओं मंे बच्चों को शारीरिक दण्ड देने पर रोक होने के बाद भी इसका सिलसिला नहीं रूक पा रहा है। देश भर में रोजाना अनेक अंचलों में इसकी खबरें आती हैं। शालाओं में फिजिकल पनिशमेंट के प्रकरण बढ़ने पर नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाईल्ड राईट्स (एनसीपीसीआर) ने शालाओं में शारीरिक दण्ड रोकने के लिए दिशा निर्देश तैयार करना आरंभ कर दिया है।

एनसीपीसीआर के अधिकारियों का मानना है कि शालाओं में शारीरिक दण्ड देना एक गंभीर मसला है। इसके साथ ही साथ बच्चों की यूनीफार्म खराब होने, कंघी ठीक न होने, जूते गंदे होने आदि पर दिया जाने वाला अर्थ दण्ड भी पालकों की जेब से ही जाता है जो अनुचित है। इस तरह के मामलों के कारण बच्चा स्कूल जाने से कतराने लगता है, साथ ही उसके मन में शाला और अध्यापक के प्रति डर बैठ जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों से इस तरह के मामले सामने आने से एनसीपीसीआर हरकत में आ गया है।

यद्यपि राईट टू एजूकेशन की धारा 17 में इस पर पाबंदी आहूत की गई है, पर शाला प्रबंधन, शिक्षक आदि इसका खुलेआम माखौल उड़ा रहे हैं। पूर्व में कमीशन द्वारा इस तरह के प्रकरणों की गंभीरता को देखते हुए एक वर्किंग गु्रप का गठन भी किया था, जिसे एसे दिशा निर्देश तैयार करने थे, जिससे शालाओं में शारीरिक दण्ड पर रोक लगाई जा सके। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस वर्किंग गु्रप ने निर्धारित समयावधि में कोई ठोस काम नहीं कर दिखाया। उम्मीद की जा रही है कि एनसीपीसीआर द्वारा जल्द ही इस दिशा में काम किया जाकर कठोर दिशा निर्देश जारी किए जा सकेंगे।

राहुल और प्रियंका की बैसाखी पर कांग्रेस


राहुल और प्रियंका की बैसाखी पर कांग्रेस

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य पर पचास सालों से ज्यादा राज किया है सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की पीढ़ी ने। इसमें से पन्चानवे फीसदी से अधिक समय तक नेहरू गांधी परिवार के हाथ में ही रहा है सत्ता का केंद्र। आज भी कांग्रेस की धुरी नेहरू गांधी परिवार के इर्द गिर्द ही घूम रही है। नब्बे के दशक में जब कांग्रेस के पास करिश्माई नेतृत्व का टोटा था जब इतालवी गूंगी गुडिया के नाम से विख्यात सोनिया के हाथों में सत्ता की चाबी थमा दी गई। विदेशी मूल के होने का आरोप उन पर था सो वे प्रत्यक्षतः सत्ता से दूर रहीं किन्तु अब उनकी नई पौध सत्ता पर काबिज होने तैयार है। राहुल गांधी का महिमा मण्डन गजब तरीके से किया गया है। कांग्रेस के मठाधीश इस परिवार के नाम पर अपनी दुकानदारी निर्बाध तरीके से चलाना चाहते हैं यही कारण है कि वे नहीं चाहते नई पौध आगे आए। घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार की गूंज के बाद भी कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के त्रिफला राहुल, सोनिया और प्रियंका का मौन आश्चर्यजनक ही है।

आत्म केंद्रित नेताओं ने सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस इन दिनों बैसाखियों पर चलने को मजबूर कर दिया है। पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों से साफ होने लगा है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी भ्रमित करने वाले नेताओं की कोटरी से पूरी तरह घिर चुकीं हैं। संप्रग के पिछले सात साल के कार्यकाल में सरकार की जिस तरह से छीछालेदर हुई है, वैसी परिस्थितियों से कांग्रेस पहले कभी भी नहीं गुजरी है। जितने घपले घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले सामने आए उतने इतिहास में कभी नहीं आ सके।

गौरतलब है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए देश के सबसे बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भी केंद्र सरकार कोई ठोस कदम उठाने की स्थिति में नज़र नहीं आ रही थी। जैसे ही प्रियंका वढ़ेरा ने अपनी दादी को केंद्रित करते हुए बयान दिया वैसे ही कांग्रेस हरकत में आई और आनन फानन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को चलता कर दिया गया।

उस वक्त प्रियंका ने कहा था कि अगर उनकी दादी अर्थात प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी जिन्दा होतीं तो वे आतंकवादियों को माकूल जवाब देतीं और फिर कोई इस तरह की हरकत करने की हिमाकत न कर पाता। इसी क्रम में कभी भाजपा की फायर ब्रांड लीडर रहीं साध्वी उमाश्री भारती ने भी मुंबई हमले के उपरांत इंदिरा गांधी की याद कर उनके ज़ज़्बे और हौसले को सराहा गया। उमाश्री ने कहा है कि आज देश को इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं की महती जरूरत महसूस हो रही है।

अगर देखा जाए तो उस वक्त प्रियंका वढ़ेरा की इन तल्ख टिप्पणियों ने ही कांग्रेस को कठोर कदम उठाने पर मज़बूर किया है। अगर प्रियंका ने सोनिया की तंद्रा न तोड़ी होती तो आज निश्चित रूप से देश के गृहमंत्री की कुर्सी पर बिना रीढ़ वाले शिवराज पाटिल ही आसीन होते।

इस घटनाक्रम के बाद एक और घटना का जिकर लाजिमी होगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख का। विलासराव पर भी त्यागपत्र का दवाब बढ़ाया गया। देश की सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के विशेष कृपा पात्र विलासराव ने इस दबाव की परवाह न करते हुए भी अपने अभिनेता पुत्र रितिक और एक्शन फिल्मों के निर्माता राम गोपाल वर्मा के साथ ताज का जायजा लेना माकूल समझा। विलास राव ने वीटी स्टेशन की ओर रूख नहीं किया।

बताते हैं कि जब इन बातों से कांग्रेस सांसद और महासचिव राहुल गांधी को आवगत कराया गया, वे बेहद संजीदा हो उठे। कांग्रेस के अनेक कद्दावर नेताओं के विलासराव देशमुख के बचाव में उतरने के बावजूद भी राहुल गांधी ने कार्यसमिति की बैठक में अपनी बात वजनदारी से रखकर मनवा ही ली। राहुल के तीखे तेवरों के चलते विलासराव देशमुख की छुट्टी संभव हो सकी।

राहुल और प्रियंका दोनों ही के कदम देश और कांग्रेस के हित में कहे जा सकते हैं। ये दोनों ही घटनाएं साफ करने के लिए काफी हैं कि दस साल से कांग्रेस प्रमुख की कुर्सी संभालने वाली श्रीमति सोनिया गांधी किस तरह के सलाहकारों के बीच घिर चुकीं हैं। इन नेताओं का पहला उद्देश्य हर मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को भ्रमित रखकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि कांग्रेस सुप्रीमो की कोटरी में बिना रीढ़ वाले उन नेताओं का शुमार है, निहित स्वार्थों की राजनीति करना जिनका प्रिय शगल है।

अगर प्रियंका और राहुल ने कमान न संभाली होती तो निश्चित रूप से आज कांग्रेस का ढर्रा वही होता जो चला आ रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वर्तमान में कांग्रेस राहुल और प्रियंका की बैसाखी पर ही चल रही है। ये दोनों ही युवा पीढ़ी के पायोनियर बनते जा रहे हैं, और इनकी दखल से ही कांग्रेस कोई ठोस और नेताआंे को अप्रिय लगने वाला कदम उठाने की स्थिति में आ पाई है।

इन नेताओें ने सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस सुप्रीमो और आम कार्यकता के बीच पर्याप्त दूरी बनवा दी है। इसके परिणामस्वरूप अब श्रीमति सोनिया गांधी के आंख नाक और कान कांग्रेस के ही चुनिंदा लोग बनकर रह गए हैं, जो कांग्रेस सुप्रीमो को ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर रखे हुए हैं। यही कारण है कि एक समय में समूचे देश पर एकछत्र राज्य करने वाली कांग्रेस अब सिमटकर उंगलियों में गिने जाने वाले प्रदेशों में ही बची है, जहां आधे से अधिक जगहों पर तो साझा सरकार बनाना कांग्रेस की मजबूरी हो गई है।

यह सही है कि युवाओं में आज राहुल और प्रियंका का जबर्दस्त क्रेज है। वहीं गांधी परिवार के छोटे नवाब यानी संजय गांधी के पुत्र वरूण की लोकप्रियता उतनी नहीं है। इसका कारण है कांग्रेस के रणनीतिकारों का मीडिया मैनेजमेंट। निहित स्वार्थ आगे रखकर चलने वाले मीडिया पर्सन्स जो कांग्रेसी नेताओं के आगे दुम हिलाते नजर आते हैं के माध्यम से राहुल की इमेज बिल्डिंग का काम बड़े ही करीने से किया गया है। आज राहुल गांधी को देखने सुनने हजारों की भीड़ जुटना आम बात है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक के बाद एक घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार के जिन्न सामने आते गए। इन पर लोग राहुल, प्रियंका या सोनिया की टिप्पणी को तरस गए। कामन वेल्थ, आदर्श सोसायटी, टूजी जैसे बड़े बड़े घोटाले सामने आए पर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति की इस त्रिमूर्ति ने अपनी जुबान नही खोली।
काले धन के मामले पर स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव और उनके हजारों समर्थकों को रामलीला मैदान पर पुलिस ने घसीट घसीट कर बर्बरता के साथ पीटा, फिर भी यह त्रिमूर्ति मौन ही साधे रही। अण्णा हजारे लोकपाल पर अड़िग हैं उनके साथ भी लाखों हाथ हैं, पर फिर भी यह त्रिमूर्ति शांत ही है। डर है कि अगर मुंह खोला तो दांव उलटा न पड़ जाए, क्योंकि सब कुछ तो कांग्रेस के ही खाते में जा रहा है।
यक्ष प्रश्न आज फिर वही खड़ा हुआ है कि आखिर इसी दिन को देखने के लिए कांग्रेस की स्थापना की गई थी? क्या यही सब कुछ दिखाने और भारत की यह तस्वीर दिखाने के लिए ही आजादी के परवानों ने अपने जान की परवाह न करते हुए कांग्रेस के कांधों से कांधा मिलाकर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ दिया था? क्या नेहरू और गांधी ने एसे ही भारत गणराज्य की कल्पना की थी? क्या सोनिया गांधी के पति और राहुल के पित राजीव गांधी ने इसी इक्कीसवीं सदी के भारत की कल्पना की थी? क्या लौह महिला प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के जज्बों को यही उनकी बहू और पोते की श्रृद्धांजली है? इस तरह के अनेक प्रश्नों के जवाब आज भी अनुत्तरित ही हैं, जिनके जवाब नैतिकता के आधार पर राहुल और सोनिया को देना चाहिए, किन्तु वे ताकतवर हैं, धनवान हैं सो पुरानी कहावत इनके लिए ही बनी है शायद कि ‘‘समरथ को नहंी दोस गोसाईं।‘‘

रविवार, 26 जून 2011

राजग ने तय किए पीएम और प्रेजीटेंड पद के प्रत्याशी!

राजग ने तय किए पीएम और प्रेजीटेंड पद के प्रत्याशी!

जोशी को राष्ट्रपति तो नितीश को पीएम इन वेटिंग बनाएगा राजग

आड़वाणी होंगे सलाहकार की भूमिका में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी अब सलाहकार की भूमिका में नजर आएंगे। उनके स्थान पर बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को पदोन्नति देकर पीएम इन वेटिंग के खिताब से नवाजा जाएगा। साथ ही संसद की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी को राजग अपना राष्ट्रपति पद का दावेदार बना सकती है। लोकपाल मुद्दे पर जोशी का नरम रूख इस ओर इशारा कर रहा है कि वे सांसदों का समर्थन हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।

भाजपा के वरिष्ठ नेता जोशी के करीबी सूत्रों का कहना है कि आड़वाणी की प्रधानमंत्री बनने की उत्कंठ इच्छा का हश्र देखते हुए जोशी ने अपने आप को पीएम की दौड़ से बाहर कर लिया है। अब वे 2012 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उतरने का मानस बना रहे हैं। मूलतः उत्तराखण्ड निवासी जोशी वैैसे भी भगवा बिग्रेड के लिए स्वीकार्य ही माने जा रहे हैं। जोशी के सामने समस्या यह है कि उनका झुकाव आरएसएस की ओर होने से सहयोगी पार्टियां उनसे सुरक्षित दूरी बना सकती हैं।

जोशी मण्डली ने इसका तोड़ निकाल लिया है। जोशी मण्डली का मानना है कि अगर आड़वाणी को पर्श्व मंे ढकेलकर उन्हें सलाकार की भूमिका में लाकर नितिश कुमार को अगले चुनावों मंे बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट किया जाता है तो सहयोगी दलों का समर्थन हासिल किया जा सकता है। जोशी मण्डली इन दिनों इसके लिए संघ के आला नेताओं को विश्वास मंे लेने के काम की रणनीति पर काम कर रही है। कहा जा रहा है कि संघ और भाजपा के आला नेताओं में जोशी और नितिश कुमार के नामों पर सैद्धांतिक सहमति बन गई है। बस समस्या अब आड़वाणी को समझाने की रह गई है।

उधर इसी लाईन को आगे बढ़ाते हुए संसदीय लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान सम्मत प्रावधान की अनदेखी कर लोकपाल कानून बनाने के लिए समाज सेवी अण्णा हजारे को अमरण अनशन न करने की नसीहत दे डाली है। जोशी के इस मशविरे से भाजपा के आला नेता हैरान हैं कि आखिर अण्णा का परोक्ष तौर पर विरोध कर जोशी अण्णा के आंदोलन की हवा निकालने पर क्यों तुले हुए हैं। वैसे भी रामदेव के दांव के असफल होने के बाद भाजपा अण्णा के माध्यम से बमुश्किल कांग्रेस को घेरने की स्थिति में दिखाई पड़ रही थी।

शनिवार, 25 जून 2011

रिलायंस की बैटरी से चमक रहा जोशी का लट्टू!



रिलायंस की बैटरी से चमक रहा जोशी का लट्टू!

राहुल नहीं मुकेश की जननी के आगे नतमस्तक हैं जोशी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी मंत्रीमण्डल में हैं तो युवराज राहुल गांधी की बदौलत। राहुल की पसंद ही उन्हें अब तक टिकाए रखे हुए है, वरना उनका विकेट तो कभी का उड़ चुका होता। अब कांग्रेस की सियासी फिजां में यह सवाल तैर गया है कि क्या जोशी वाकई में राहुल गांधी के आदमी हैं?

कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री सी.पी.जोशी मंत्रीमण्डल में अगर स्थान पा सके हैं तो इसके पीछे राहुल गांधी नहीं वरन् मुकेश अंबानी की माता कोकिला बेन हैं। उन्होंने कहा कि जोशी मूलतः नाथ द्वार से हैं। राजस्थान में नाथद्वार मंदिरों के लिए मशहूर है जहां विशेष तौर पर वैष्णव संप्रदाय का एक मंदिर है जिसकी पूजा अर्चना हेतु कोकिला बेन विशेष तौर पर जाया करती हैं।

उक्त नेता ने कहा कि जोशी सालों से अंबानी परिवार के पे रोलपर हैं। यह अलग बात है कि जब वे नाथ द्वार से विधानसभा चुनाव लड़े थे, तब उन्हें पराजय ही हाथ लगी थी। बाद में भीलवाड़ा संसदीय क्षेत्र से वे चुने गए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा जब भी अंबानीज के व्यवसायिक हितों पर कुठाराघात किया गया तब जोशी ही उनकी ढाल बनकर सामने आए।

कहा जा रहा है कि बेहतरीन परफारर्मेंस दिखाने के बाद भी भूतल परिवहन जैसा मलाईदार विभाग भी कोकिला बेन के इशारे पर ही कमल नाथ के हाथों से लेकर जोशी को दिया गया है। जोशी के करीबी सूत्रों का दावा है कि लोगों को यह भ्रम जोशी मण्डली ने ही फैला रखा है कि जोशी वाकई राहुल गांधी के विशेष कृपा पात्र हैं जबकि असलियत कुछ ओर है।