बुधवार, 7 सितंबर 2011

महज 20 महीने और भ्रष्टाचार के 50 महाघोटाले!


महज 20 महीने और भ्रष्टाचार के 50 महाघोटाले!

(लिमटी खरे)
  
‘‘कांग्रेस का इतिहास अति गौरवशाली कहा जा सकता है। भारत गणराज्य की स्थापना में कांग्रेस के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। इसमें महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की भूमिका को भी कतई नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। आजादी के उपरांत कांग्रेस के लिए नेहरू गांधी परिवार का तात्पर्य माईनस महात्मा गांधी हो गया है। अर्थात जवाहर लाल नेहरू और फिरोज गांधी (कांग्रेस जिन्हें पूरी तरह भुला चुकी है) के वंशज ही हैं। युवा स्वप्नदृष्टा राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी के भारत की कल्पना की थी। इक्कीसवीं सदी के भारत में कांग्रेस की बागड़ोर उनकी इटालियन पत्नि सोनिया गांधी के हाथ में है। सरकार की कामन भी 2004 के उपरांत अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हीं के पास है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में कांग्रेस को अपने ही लोगों के कारण जो लानत मलानत झेलनी पड़ी उससे वर्तमान कांग्रेसी तो शर्मसार नहीं दिखते पर कांग्रेस का उजला अतीत जरूर कांतिहीन होता जा रहा है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की दूसरी पारी में महज बीस महीनों में ही भ्रष्टाचार के आधा सैकड़ा मामले सामने आए हैं जिसमें दस लाख करोड़ रूपयों से ज्यादा का खेल खेला गया है। सरकार के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की होली खेली जाती है और सरकार खामोश है। देश लुटता रहा, मंत्री सरकारी खजाने का धन लुटाते रहे। लेकिन वजीरे आजम, कांग्रेस की राजमाता और युवराज के अंदर इतना माद्दा नहीं था कि वे किसी से प्रश्न कर सकें, इन परिस्थितियों में कैसे कह दिया जाए कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ईमानदार हैं।‘‘

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक भारत गणराज्य के लिए बुरे सपने समान कहा जा सकता है। इस दशक में जितने घपले घोटाले सामने आए हैं उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। एक के बाद एक भ्रष्टाचार, घपले, घोटाले में घिरी कांग्र्रेस के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं दिखा। इसी बीच इक्कीसवीं सदी में योग साधना के आकाश में धूमकेतू बनकर उभरे स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भ्र्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए अभियान छेड़ दिया। कांग्रेस के शातिर प्रबंधकों ने बाबा रामदेव को घेर दिया। बेचारा योगी किसी तरह से जान बचाकर दिल्ली के रामलीला मैदान से भाग खड़ा हुआ। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले गांधीवादी अण्णा हजारे की आवाज सिहनाद बनकर उभरी और फिर क्या था। समूचा देश कांग्रेस और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जुट होकर खड़ा हो गया। देश में गली गली में ‘‘मैं अण्णा हूं‘‘ की आवाज ने कांग्रेस को घुटनो पर बैठने मजबूर कर दिया।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में महज एक साल में ही दस लाख करोड़ रूपयों की भ्रष्टाचार के हवन कुण्ड में आहुती देने से हाहाकार मच गया। नेशनल कैंपेन अगेंस्ट करप्शन ने मई 2009 से जनवरी 2011 तक के बीच हुए प्रमुख भ्रष्टाचार के महाकांडों की फेहरिस्त तैयार की है। इसमें पहली पायदान पर संचार मंत्रालय द्वारा टूजी स्पेक्ट्रम लाईसेंस में केंद्रीय महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक ने पौने दो सौ लाख रूपए की हानि का प्रकरण है। इस प्रकरण में सीबीआई ने पूर्व संचार मंत्री आदिमत्थू राजा सहित अनेेक अफसरान को शिकंजे में कस दिया है।

जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि टूजी में ही कांग्रेस और द्रविड़ मुनैत्र कषगम के नेताओं ने साठ हजार करोड़ की रिश्वत ली है। इसके बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की विपणन कंपनी और एक निजी क्षेत्र की कंपनी देवास मल्टी मीडिया के बीच दो उपग्रहों के दस ट्रांसपोंडर को बारह वर्ष के लिए लीज पर देने के मामले में सीएजी ने प्राथमिक परीक्षण में दो लाख करोड़ रूपए का नुकसान आंका है।

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का अनाज नेपाल, बंग्लादेश और अफ्रीका जैसे देशों में बेचने का मामला प्रकाश में आया जिसमें दो लाख करोड़ का घोटाला सामने आया है। इसके बाद नंबर आता है राष्ट्रीयकृत बैंक का भवन आवासीय ऋण घोटाला जिसे छत्तीस हजार करोड़ रूपयों का आंका गया है। सिटी बैंक में अरबों रूपयों के केंद्रीय सरकार के मैटल स्क्रेप ट्रेडिंग कार्पोरेशन के छः सौ करोड़ रूपए के सोने का महाघोटाला भी इसी फेहरिस्त में शामिल है।

महाराष्ट्र प्रदेश के पूना के एक अस्तबल के मालिक हसन अली खान के स्विस बैंक, यूबीएस ज्यूरिक में सवा आठ अरब डालर अर्थात लगभग छत्तीस हजार करोड़ रूपए के खाते के रहस्य से भी पर्दा उठा। 2009 - 2010 के बजट में यह रहस्य भी सामने आया कि हसन अली के उपर लगभग साढ़े पचास हजार करोड़ रूपयों का आयकर बाकी है। सिविल सोसायटी के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने सरकार की मुखालफत की तो सरकार ने उन पर तत्काल शिकंजा कस दिया किन्तु एक जरायमपेशा व्यक्तित्व पर पचास हजार करोड़ का आयकर कैसे बाकी रह गया यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

एक चाटर्ड एकाउंटेंट का कथन था कि हसन के विदेशी खातों में छत्तीस हजार करोड़ के बजाए डेढ़ लाख करोड़ रूपए होना अनुमानित है। आयकर चोर एक मामलू घोडों के अस्तबल का मालिक हसन अली कितना रसूखदार है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक अजीज डोवाल, प्रोफेसर आर.वैद्यनाथन, एस.गुरूमूर्ति, महेश जेठमलानी के अलावा कांग्रेस के आलाकमान से भी संबंधों का खुलासा हुआ है।

पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त जे.एम.लिंगदोह, पूर्व राजस्व सचिव जावेद चौधरी, सहित अनेक अफसरों ने केरल के पामोलिन कांड में आरोपी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पी.जे.थामस को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाए जाने को चुनौती दी। बाद में सरकार को इस मामले में अपने कदम वापस लेने पड़े और भ्रष्ट अधिकारी थामस को सीवीसी के पद से हटाना ही पड़ा। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल तब खुली जब पचपन हजार करोड़ रूपयों की लड़ाकू हवाई जहाज की खरीद से संबंधित गोपनीय नस्ती सड़क पर लावारिस हालत में मिली।

तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने निजी एयरलाईंस की मदद करते हुए एयर इंडिया के डैनों की हवा निकाल दी। आज आलम यह है कि एयर इंडिया भारी कर्जे में है और उसके पास तेल के बाकी पैसे चुकाने तक को पैसे नहीं है। आज एयर इंडिया के कर्मचारियों को तनख्वाह देने के बांदे हैं। खाद्य मंत्री शरद पंवार पर आरोप है कि उन्होने अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए कम दाम वाली चीनी और प्याज के निर्यात की अनुमति दे दी जिससे देश में इनका संकट तो पैदा हुआ ही साथ ही साथ इनकी दरें तेजी से उपर आईं। फिर पंवार ने इनका आयात आरंभ किया।

कार्पोरेट घरानों की तगड़ी पैरोकार नीरा राड़िया के टेप ने तो मानो भारत के सियासी तालाब में मीटरांे उंची लहरें उछाल दीं। नीरा राडिया के टेप कांड में जब यह बात सामने आई कि द्रमुक के सांसद आदिमुत्थु राजा को मंत्री बनाए जाने लाबिंग की गई तब लोगों के हाथों के तोते उड़ गए। इसमें अनेक मंत्रियों पर सरेआम पंद्रह फीसदी कमीशन लेकर देश सेवा तक करने की बात भी कही गई। विडम्बना यह कि साफ साफ आरोपों के बाद भी न तो मनमोहन कुछ करने की स्थिति में हैं और न ही इस मामले में सोनिया गांधी ही कुछ कर पा रही हैं।

मामला अभी शांत नहीं हुआ है। सीएजी ने कामन वेल्थ गेम्स में हजारों करोड़ रूपयों की होली खेलने की बात कही गई। कांग्रेस के चतुर सुजान मंत्री कपिल सिब्बल कभी कलमाड़ी के बचाव में सामने आए तो कभी तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा के। अंततः दोनों ही को जेल की रोटी खानी पड़ रही है। केंद्रीय महालेखा नियंत्रक और परीक्षक ने कामन वेल्थ गेम्स में सत्तर हजार करोड़ रूपयों की अनियमितता पकड़ी है।

बिहार सरकार ने वहां के पूर्व राज्यपाल बूटा सिंह द्वारा अरबों रूपयों के नदी तटबंधों के ठेकों की जांच के आदेश भी जारी किए हैं। सीबीआई ने उनके पुत्र को एक करोड़ रूपए रिश्वत लेते रंगें हाथों धरा है। इतना ही नहीं सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भ्रष्टाचार के आरोपी प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी.एस.लाली को निलंबित कर उनके एवं मध्य प्रदेश काडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अरूणा शर्मा के खिलाफ जांच की सुस्तुति की है। रूस से विमानवाहक जंगी जहाज खरीदने के सिलसिले में रक्षा मंत्रालय द्वारा वरिष्ठ नौसेना अधिकारी की बर्खास्तगी की गई। सम्प्रग सरकार के लिए स्विस बैंक सहित अन्य बैंकों में जमा अस्सी लाख करोड़ रूपए से ज्यादा की देश वापसी आज भी पहेली बनी हुई है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने विदेशी बैंक के खाताधारकों के नाम सार्वजनिक करने को कहा गया है।

मैडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ.केतन देसाई को केंद्रीय जांच ब्यूरो के छापे के बाद पद से हटाया गया। अनेक गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना में अड़तीस हजार करोड़ रूपयों से ज्यादा के गोलमाल के आरोप लगाए हैं। नाफेड में चार हजार करोड़ रूपयों के नियमों को बलात ताक रख किए गए निवेश की जांच जारी है। केंद्र सरकार ने दिल्ली विकास अभिकरण में मकान आवंटन में घपलों की जांच आरंभ की है।

यह है देश में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी का हाल सखे! इतना सब कुछ होता रहा। समाचार पत्रों के साथ ही साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया और वेब मीडिया का गला चीखते चीखते रूंध गया किन्तु न तो मनमोहन के कानों में जूं रेंगी और न ही सरकार टस से मस हुई। मीडिया की आवाज सोनिया के दरबार में भी नक्कारखाने में तूती की ही आवाज साबित हुई। युवा भारत का कथित तौर पर स्वप्न देखने का दावा (मीडिया में प्रायोजित कर) करने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी भ्रष्टाचार के मामले में मौन साध लेते हैं।

भ्रष्टाचार पर जब हाय तौबा हदें लांघ जाती है तब मनमोहन सिंह देश के मीडिया घरानों के चुनिंदा संपादकों की टोली को बुलाकर उनके सामने खुद को बेबस और असहाय बताकर अपने कर्तव्यों की इती श्री कर लेते हैं। सवाल यह है कि अगर मनमोहन सिंह ईमानदार हैं उनमें नैतिकता है तो वे अपने आप को कमजोर बताने के बजाए प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र क्योें नही दे देते? आखिर क्या वजह है कि वे मजबूर होते हुए दूसरों की लानत मलानत झेलकर अपनी ईमानदार छवि को खराब कर रहे हैं? जाहिर है सत्ता की मलाई उन्हें यह सब करने पर मजबूर कर रही है।

वहीं दूसरी ओर राजनीति का ककहरा सीख रहे नेहरू गांधी परिवार (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नहीं) की पांचवीं पीढ़ी के प्रतिनिध कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी द्वारा भ्रष्टाचार के मामले को गठबंधन की मजबूरीबताई जाती है। राहुल गांधी शायद भूल जाते हैं कि किसी भी कीमत पर किन्हीं भी हालातों में गठबंधन धर्मकभी भी राष्ट्र धर्मसे बड़ा कतई नहीं हो सकता है। सरकार के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की होली खेली जाती है और सरकार खामोश है। देश लुटता रहा, मंत्री सरकारी खजाने का धन लुटाते रहे। लेकिन वजीरे आजम, कांग्रेस की राजमाता और युवराज के अंदर इतना माद्दा नहीं था कि वे किसी से प्रश्न कर सकें, इन परिस्थितियों में कैसे कह दिया जाए कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ईमानदार हैं।

नाकारा हैं युवराज!


नाकारा हैं युवराज!

विकीलीक्स का खुलासा

केबल खुलासे से कांग्रेस में हड़कम्प

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। एक के बाद एक सनसनीखेज खुलासा कर विश्व को चौंका देने वाले विकीलीक्स केबल के एक अहम खुलासे के बाद कांग्रेस मुख्यालय में सन्नाटा पसर गया है। इस खुलासे में कहा गया है कि राहुल गांधी पूरी तरह अनफिट और अनुपयोगी हैं। दुनिया भर पर नजर रखने वाले दुनिया के चौधरी अमेरिका के तत्कालीन राजदूत डेविड मलफोर्ड द्वारा भेजे गए इस केबल से कांग्रेस में सनसनी फैल गई है।

केबल में मलफोर्ड के हवाले से कहा गया है कि कांग्रेस के आला नेता ही अपने कार्यकर्ताओं की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को अनुपयोगी मानते हैं। आला नेता ही अपने युवराज राहुल गांधी को कम आंकते हैं। यद्यपि यह केबल 23 अक्टूबर 2007 को भेजा गया था फिर भी इसे भविष्य की राजनीतिक बिसात को देखकर अहम माना जा रहा है। कांग्रेस को भय है कि आने वाले दिनों में विपक्षी पार्टियों द्वारा इसका इस्तेमाल चुनावों में बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

इस केबल का लब्बो लुआब यह है कि राहुल गांधी अभी भारतीय राजनीति के हिसाब से अनफिट हैं। राहुल गांधी को अब उन कामों को अंजाम देना होगा जिन्हें वे उचित नहीं मानते या जिनकी समझ उन्हें नहीं है। भारतीय राजनीत में साम दाम दण्ड और भेदका बोल बाला है। भारत में जिस नीति से राज हासिल हो उसे ‘‘राजनीति‘‘ कहा जाता है।और राहुल को इसे अपनाना होगा।

केबल में अस्पष्ट तौर पर यह भी कहा गया है कि नेहरू गांधी परिवार (फादर ऑफ नेशन महात्मा गांधी नहीं) के वंशज होने के चलते उन्हें देश में और कांग्रेस में शीर्ष पद तो मिल सकता है किन्तु सफल राजनैतिक भविष्य के लिए ये अहर्ताएं उन्हें बुलंदियों तक नहीं ले जा सकती हैं। केबल में यह भी कहा गया है कि राहुल गांधी को अपने आप को साबित करना होगा। केबल के चार सालों बाद भी राहुल गांधी आज वहीं खड़े दिख रहे हैं जहां वे उस वक्त थे।

मनमोहन ने मांगा शिव से हिसाब


मनमोहन ने मांगा शिव से हिसाब

गैस पीड़ितों को दिए 272 करोड़ कहां खर्चे दो जवाब!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सड़कों और अन्य मामलों में केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली देश की हृदय प्रदेश की शिवराज सरकार पर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद हत्याकांड़़ में भाजपा सांसद तरूण विजय का नाम आने फिर इसकी सीबीआई जांच के बाद अब केंद्र सरकार ने शिवराज से गैस पीड़ितों को दिए पौने तीन सौ करोड़ रूपयों का लेखा जोखा मांगा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय रसायन मंत्रालय ने मध्य प्रदेश सरकार से कहा है कि वह 1984 के गैस पीड़ितों के पुर्नवास की मद में जारी 272 करोड़ रूपयों का लेखा जोखा केंद्र को भेजे। गौरतलब है कि यह रकम केंद्र सरकार द्वारा गैस प्रभावित इलाकों की बस्तियों में पीड़ितों के आर्थिक और सामाजिक पुर्नवास तथा मूलभूत बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए इस मद में यह राशि प्रदान की है।

सूत्रों ने कहा कि इस भारी भरकम रकम में गोलमाल की शिकायतें मिलने के बाद उर्वरक एवं रसायन मंत्रालय ने यह कदम उठाया है। इस रकम से हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में किए गए कार्यों की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार ने कड़ा रूख अख्तियार करते हुए शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से खर्च का ब्योरा मांगा है।

आम चुनाव के पहले रेल यात्रियों की कमर तोड़ने की तैयारी


आम चुनाव के पहले रेल यात्रियों की कमर तोड़ने की तैयारी

रेल यात्रा किराए में हो सकती है दस से पंद्रह फीसदी बढ़ोत्तरी

माल ढुलाई भी होगी अब मंहगी

घटिया खाने के देने होंगे अब ज्यादा पैसे

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय रेल का भट्टा बिठाने वाले स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव के बाद पश्चिम बंगाल पर नजर गड़ाने वाली ममता बनर्जी के कार्यकाल में पटरी से उतरी रेल को पुनः रास्ते पर लाने के लिए अब वर्तमान रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी कुछ संजीदा दिख रहे हैं। उनकी इस कवायद का सीधा असर अब रेल यात्रा पर पड़ने वाला है। आने वाले दिनों में न केवल रेल माल भाड़ा बढ़ने की उम्मीद है वरन् रेल यात्री किराए और खानपान की दरें भी बढ़ाई जाने के संकेत मिले हैं।

हाल ही में रेल्वे बोर्ड की दूसरी बैठक के उपरांत जो बातें सामने आ रही हैं उनके अनुसार सात साल बाद रेल महकमे के निजामों ने इस बात की सुध लेना आरंभ किया है कि आखिर चूक कहां हो रही है। भारतीय रेल में साफ सफाई और केटरिंग व्यवस्था में कुड़ली मारे बैठे ठेकेदारों ने हर तरह से नए निजामों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। बदबू मारते रेल के शौचालय, सालों साल न साफ होने वाली रेल के कंपार्टमेंट की पानी की टंकी में पनपते जीवाणू आदि के बारे में किसी का ध्यान अब भी नहीं जा पाया है। रेल गाड़ी में यात्रियों के साथ बिना टिकिट यात्रा करने वाले चूहों और काकरोच की समस्या भी जस की तस ही बनी हुई है।

गौरतलब है कि रेल्वे मंत्रियों के तुगलकी फरमान का भोगमान सीधे सीधे यात्रियों को ही भोगना पड़ता है। जबलपुर से नई दिल्ली जाने वाली संपर्क क्रांति एक्सप्रेस सहित अनेक रेलगाड़ियों में रसोईयान (पेंट्री कार) को समाप्त कर दिया गया है। अनेक रेलगाड़ियों में अनाधिकृत वेंडर्स द्वारा मनमानी कीमत पर खाद्य सामग्री बेची जाती है। कई बार इसके चलते यात्रियों और इन सेवादारों के बीच मारपीट तक की नौबत आ जाती है। इसके साथ ही साथ रेल्वे में सबसे बड़ी समस्या भिखारियों की है। चलित टीसी और ड्यूटी पर तैनात जीआरपी के जवानों द्वारा भी इनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाती है।

बोर्ड के सूत्रों ने कहा कि 1999 में तय किए गए मूल्यों पर अब केटरर्स द्वारा खान पान सामग्री प्रदाय किया जाना संभव नहीं है। गौरतलब है कि रेल में ब्रेड आमलेट 22 रूपए का मिलता है जो सामान्य तौर पर दस से बारह रूपए में बाहर मिल जाता है। इसी तरह रेल गाड़ी में भोजन की थाली साठ से सौ रूपए जैसा भाव टूट जाए में मिल जाती है। यात्रियों का आरोप रहा है कि उन्हें बेहतर गुणवत्ता युक्त जायकेदार भोजन नहीं मिल पाता है। यहां तक कि रेल में मिलने वाली चाय को लोग गरम पानी की संज्ञा भी देते हैं।

सूत्रों ने आगे कहा कि रेल को फिर से पटरी पर लाने के लिए रेल यात्री किराया बढ़ाना अवश्यंभावी हो गया है किन्तु 2014 के आम चुनावों को देखकर रेल मंत्री इसे बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस बार रेल माल भाड़े और खान पान की दरों में वृद्धि कर इसे कुछ हद तक पटरी पर लाया जा सकता है। गौरतलब है कि रेल्वे द्वारा प्रत्येक रेलगाड़ी को आरंभ से गंतव्य तक बीच बीच के स्टेशनों पर साफ सफाई के लिए अरबों रूपयों के ठेके दिए गए हैं। रेल में व्याप्त गंदगी को देखकर इन ठेकों को ही व्यवस्थित कर दिया जाए तो भारतीय रेल काफी हद तक पटरी पर लाई जा सकती है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

घातक है दवा कंपनियों और चिकित्सकों का गठजोड़


घातक है दवा कंपनियों और चिकित्सकों का गठजोड़

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं में तेजी से इजाफा दर्ज किया गया है। विडम्बना यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं परमहामहिम राष्ट्रपति तो चिंतित नजर आ रही हैं पर सरकारें पूरी तरह से मौन ही हैं। अपने कार्यकाल में इस संदर्भ में तीसरी बार अपील की है महामहिम राष्ट्रपति ने। आजाद भारत में चिकित्सकों पर जोर नहीं रह गया है सरकार का। कितने आश्चर्य की बात है कि आजादी के छः दशकों बाद भी नीम हकीमों के भरोसे बैठा है आम हिन्दुस्तानी। यक्ष प्रश्न आज भी यही खड़ा हुआ है कि आखिर कैसे लगे धनवंतरी के वंशजों पर अंकुश। चिकित्सा की पढ़ाई के वक्त लिए गए अपने अपने कौल को भूल चुके हैं चिकित्सक। यह सब कुछ धन पिपासा के चलते ही हुआ है। महामहिम राष्ट्रपति ने दवा कंपनियों ने अपील की है कि वे गरीबों तक स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने में महती भूमिका निभाएं। एक दवा जो जैनरिक नाम से महज पांच रूपए की बिकती है वही दवा एक मशहूर कंपनी के रेपर में अस्सी रूपए की बिक रही है। इस लिहाज से दवा कंपनियों पर नकेल कसना जरूरी हो गया है।

हैदराबाद में इंटरनेशनल कन्वेन्शन सैंटर में शिक्षक दिवस के अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति ने 71वें एफआईपी वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ फार्मेसी एण्ड फार्मास्युटिकल साईंस का उद्यघाटन करते हुए कहा कि आज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति सराहनीय है। उन्होंन दवा उद्योग का आव्हान किया है कि वह देश के गरीबों तक स्वास्थ्य सेवा का लाभ पहुंचाने आगे आए। उन्होंने कहा कि आईपीआई क मौजूदा बारह अरब डालर के कारोबार को देखकर कहा जा सकता है कि 2015 तक यह बीस अरब डालर तक पहुंच सकता है।

एक तरफ यह है देश के पहले नागरिक का आव्हान वहीं दूसरी ओर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार महामहिम राष्ट्रपति के सपनों पर पानी फेरती ही नजर आ रही है। योजना आयोग, वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय प्रत्यक्ष विदेश निवेश अर्थात एफडीआई का हिमायती बन स्वास्थ्य सुविधाओं पर कुठाराघात करने से नहीं चूक रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय इसे उचित नहीं मानता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देसी दवा कंपनियों के अधिग्रहण से आम जनता के लिए मौजूद सस्ती जैनरिक दवाओं की उपलब्धता पर खतरा मंडराना आरंभ हो गया है।

1600 में भारत आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने बाद में देश पर शासन किया। यह कंपनी व्यापार के उद्देश्य से भारत आई थी। आज प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए शासकों की छिपी महात्वाकांक्षाएं और निहित स्वार्थ अवश्य ही पूरे हों किन्तु इससे हमारे घरेलू उद्योगों पर प्रतिकूल असर पड़े बिना नहीं रहेगा। गौरतलब है कि 2006 से 2010 के बीच बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दवाओं के क्षेत्र में निवेश के नाम पर महज देशी कंपनियों का ही अधिग्रहण किया है। चिंता का विषय यह है कि किसी भी विदेशी कंपनी ने पिछले एक दशक में नई दवा फैक्टरी लगाने के नाम पर एक रूपए का भी निवेश नहीं किया है। पता नहीं यह बात सरकार को समझ में क्यों नहीं आ रही है।

आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो अगस्त 2006 में मैट्रिक्स लैब को दुनिया के चौधरी अमेरिका की कंपनी मेलान ने 736 मिलियन डालर में खरीद लिया था। अप्रेल 2008 में सिंगापुर की कंपनी फ्रेसेनियल काबी ने डाबर फार्मा के स्वामित्व को 219 मिलियन डालर में खरीदा था। इसी साल जून में जपान मूल की दाइची सांक्यू नामक कंपनी ने सुप्रसिद्ध रैनबेक्सी लैब को चार हजार छः सौ मिलियन डालर से ज्यादा में खरीदा था।

खरीदने बेचने का यह सिलसिला अनवरत जारी रहा। वाणिज्य, वित्त मंत्रालय के साथ ही साथ योजना आयोग भी इसके दुष्प्रभावों से अनजान या जानकार अनजान बने रहते हुए मौन साधे रहा। जुलाई 2008 में ही फ्रांस की एक कंपनी सानोफी अवेन्टीस ने सांता बायोटेक को 783 मिलियन डालर में खरीद लिया। दिसंबर 2009 में अमेरिका की एक कंपनी होसपीरा ने ऑर्चिड केमीकल्स को चार सौ मिलियन डालर में अपना बना लिया। इसी तरह मई 2010 में अमेरिका की ही अबोट ने पीरामल हेल्थ केयर को तीन हजार सात सौ बीस मिलियन डालर में खरीद लिया।

एक तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत सरकार की आंखों में धूल झोंकती रही वहीं दूसरी ओर जनसेवकों की मिली भगत से देश में ही काले अंग्रेज (भारतियों के दुश्मन बने खुद भारतीय) भी लोगों का खून चूसने का काम करने लगे। सरकार से मंहगी जमीने रियायती मूल्यों पर लेकर पांच सितारा अस्पताल बनाने वाले इन अस्पताल संचालकों ने जमीन लेते वक्त भरे बांड को भूलकर सिर्फ अमीरों का ही इलाज आरंभ किया। आदि काल में राजवैद्यका काम सिर्फ राजा का इलाज करना होता था। उसी तर्ज पर इन अस्पतालों ने अमीरों के इलाज में ही दिलचस्पी दिखाई जबकि नियमानुसार इन्हें अपने पच्चीस फीसदी बिस्तर गरीब गुरबों के लिए आरक्षित रखने थे।

हाल ही में दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के अस्पतालों को आड़े हाथों लिया है। जस्टिस आर.वी.रविंद्रन औश्र जस्टिस ए.के.पटनायक की युगल बैंच ने कहा है कि इस तरह के अस्पताल अपनी क्षमता का पच्चीस फीसदी ओपीडी में तो दस फीसदी बिस्तारों में गरीबों के इलाज के लिए सुरक्षित रखें। जब इनकी पैरवी करने वाले अधिवक्ता ने इसे अव्यवहारिक बताया तो कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि अस्पतालों ने जमीन सरकार से क्यों ली? अगर अस्पताल एसा नहीं कर सकते तो वे जमीन सरकार को वापस कर दें और फिर बाजार से जमीन खरीदकर अस्पताल बनवाएं। रियायती जमीन लेते वक्त अनुबंध पर किए हस्ताक्षर से अस्पताल प्रबंधन अनुबंध की शर्तों से नहीं बच सकते।

बहरहाल, देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की बारंबार की जाने वाली यह चिंता बेमानी नहीं है कि देश में चिकित्सकों की भारी कमी है। मार्च 2009 में पश्चिमी दिल्ली में भारतीय चिकित्सा परिषद की प्लैटिनम जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उनकी यह पीड़ा सामने उभरकर सामने आई। इससे पहले अक्टूबर 2008 में भी महामहिम ने असम के तेजपुर में आर्युविज्ञान संस्थान की आधारशिला रखते हुए इसी मसले पर अपनी चिंता जाहिर की थी।

अपने अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), उप स्वास्थ्य केंद्र या सिटी डिस्पेंसरी तो स्वीकृत करा लेते हैं किन्तु इन अस्पतालों में कितना अमला वास्तव में कार्यरत है, इस बारे में देखने सुनने की फरसत किसी को भी नहीं है। सत्ता के मद में चूर ये जनप्रतिनिधि चुनावो की घोषणा के साथ ही एक बार फिर सक्रिय हो मतदाताओं को लुभावने वादों से पाट देते हैं।

नेशनल रूलर हेल्थ मिशन के प्रतिवेदन पर अगर नज़र डाली जाए तो देश की साठ फीसदी से अधिक पीएचसी में सर्जन नहीं हैं, इतना ही नहीं पचास फीसदी जगह महिला चिकित्सक गायब हैं, तो 55 फीसदी जगह बाल रोग विशेषज्ञ। क्या ये भयावह आंकड़े सरकार की तंत्रा तोड़ने के लिए नाकाफी नहीं हैं।

दिया तले अंधेरा की कहावत देश की सबसे बड़ी पंचायत में साफ हो जाती है। यूं तो सभी दल आरक्षण का झुनझुना बजाकर वोट बैंक तगड़ा करने की फिराक में रहते हैं किन्तु सांसदों के इलाज के लिए तैनात चिकित्सा कर्मियों में महज 22 फीसदी चिकित्सक ही कोटे के हैं। हाल ही में सूचना के अधिकार में निकाली गई जानकारी से यह कड़वा सच सामने आया है। सांसदों के लिए तैनात 49 चिकित्सकों मेंसे नौ अनुसूचित जाति, एक एक अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं।

कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के लिए क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं है कि महज पांच माहों में देश की महामहिम चिकित्सकों को गांव की ओर रूख करने और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार की बात कह रहीं हैं। कांग्रेस की इस अनदेखी को उसकी निर्लज्जता से अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता है। देश के महामहिम की अपील को ही संप्रग सरकार ने एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया हो, तो फिर देश के आखिरी छोर के आदमी का तो भगवान ही मालिक है।

बहरहाल प्रश्न यह उठता है कि आखिर चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे के माध्यम से जनसेवा को उतारू युवा गांव की ओर रूख क्यों नहीं करना चाहते? संभवतः विलासिता के आदी हो चुके युवाआंे को गांव की धूल मिट्टी और अभाव का जीवन रास नहीं आता होगा इसी के चलते वे गांव नहीं जाना चाहते। इसके साथ ही साथ शहरों में सरकारी चिकित्सकों के आवासों पर लगने वाली मरीजों की भीड़ भी उन्हें आकर्षित करती होगी। हर जिला मुख्यालय का नामी सरकारी डॉक्टर किसी न किसी अध्यनरत चिकित्सक का पायोनियरभी होता होगा।

वैसे इस मामले में सरकार को दोष देना इसलिए उचित होगा क्योंकि सरकार द्वारा चिकित्सकों को गांव भेजने के लिए उपजाउ माहौल भी तैयार नहीं किया गया है। अस्सी के दशक में सुनील दत्त अभिनीत ‘‘दर्द का रिश्ता‘‘ चलचित्र का जिकर यहां लाजिमी होगा। उस चलचित्र में विदेश में अपनी सेवाएं दे रहे चिकित्सक का किरदार निभा रहे सुनील दत्त ने अपनी ही बेटी के इलाज के दौरान हुई तकलीफों से प्रेरणा लेकर हिन्दुस्तान में गांवों में जाकर सेवा करने का संकल्प लिया था।

वह निश्चित रूप से चलचित्र था, पर उससे प्रेरणा लेकर न जाने कितने नौजवानों ने गांवों की ओर रूख किया था। कहने का तात्पर्य महज इतना है कि सरकार को चाहिए कि फूहड़ और समाज को बरबादी के रास्ते पर ले जाने वाले चलचित्रों के स्थान र प्रेरणास्पद चलचित्रों के निर्माण को प्रोत्साहन देने की आज महती जरूरत है। कहने को तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक न जाने कितने नेताओं ने कहा है कि भारत का दिल गांव में बसता है। पर गांव की सुध लेने वाला आखिर है कौन? इस सबके आभाव में अप्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी आज भारत के दिल के स्वास्थ्य के साथ सरेआम खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

पीडित मानवता की सेवा का संकल्प लेने वाले हिन्दुस्तान के चिकित्सकों की मानवता कभी की मर चुकी है। आज के युग में चिकित्सा का पेशा नोट कमाने का साधन बन चुका है। आज के समय को देखकर कहा जा सकता है कि मरीज की कालर एक डाक्टर द्वारा बिस्तर पर ही पकडी जाती है। दवा कंपनियों की मिलीभगत के चलते मरीजों की जेब पर सीधे सीधे डाका डाला जा रहा है। चिकित्सकों और दवा कंपनियों ने मिलकर तंदरूस्ती हजार नियामत की पुरानी कहावत पर पानी फेरते हुए अपना नया फंडा इजाद किया है कि स्वास्थ्य के नाम पर जितना लूट सको लूट लो। इसी तारतम्य में स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने बिना मेडीकल रिपर्जेंटेटिव ही स्वास्थ्य की उपजाउ भूमि पर न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया है, वरन् अब तो वे देश पर राज करने का सपना भी देखने लगे हैं। संस्कृत की एक पुरानी कहावत है, ‘‘न दिवा स्वप्नं कुर्यात‘‘ अर्थात दिन में सपने नहीं देखना चाहिए, किन्तु बाबा रामदेव को लगता है कि योग के बल पर उन्होंने जो आकूत दौलत और शोहरत एकत्र की है, उसे वे भुना सकते हैं।

इस परिदृश्य में एक प्रश्न दिमाग में कौंधता है, वह है कि हमें सरकार से ही यह प्रश्न करना चाहिए कि हम उम्मीद तो करते हैं कि चिकित्सक को सेवा भावी होना चाहिए, किन्तु यह तो बताया जाए कि चिकित्सकों को प्रशिक्षण सेवा के लिए दिया जा रहा है या व्यवसाय के लिए? आज आर्युविज्ञान, आर्युवेदिक, यूनानी या होम्योपैथिक हर चिकित्सा को पैसा कमाने का साधन बना लिया गया है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? जाहिर है सरकारें। जब हम देखते हैं कि चिकित्सकों के दरवाजे पर दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की लाईन लगी हुई है। कभी पता लगता है कि चिकित्सक के घर का आटा दाल राशन यहां तक कि अंडर गार्मेंटस मकान दुकान सभी का यानी पिन टू प्लेन का खर्च दवा कंपनियां उठा रही हैं तो हर किसी का चिकित्सा जैसे दुधारू पेशे की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही है।

सरकारी चिकित्सकों में गजब का स्टेमना होता है। वे आठ से एक बजे तक और शाम चार से छः बजे तक सात आठ घंटे की कठोर ड्यूटी करने के बाद भी अपने निजी क्लीनिक में जाकर सैकड़ों मरीजों को देखने का माद्दा रखते हैं। चिकित्सकों की इस एनर्जी पर शोध अवश्य ही होना चाहिए। अमूमन आठ घंटे का थका मांदा सरकारी कर्मचारी जब घर लौटता है तब उसे अपने परिवार के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है, पर इन चिकित्सकों को अपनी मरीजों से एक अलग किस्म का लगावहोता है, जिसके चलते ये अस्पताल के बाद भी चिकित्सा की निजी दुकानों पर जाकर मरीजों को देखने की जहमत उठाते हैं। हां अस्पताल से अगर समय बेसमय काल आ जाए जो एसा लगता है मानों इनके मुंह में किसी ने कुनैन की गोली फोड़ दी हो।

बहरहाल मेडीकल काउंसलि ऑफ इंडिया द्वारा अक्टूबर 2008 में एक कोड लाने की तैयारी की जा रही थी, जिसके तहत दवा कंपनियों से तोहफा लेने वाले चिकित्सकों का लाईसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान किया गया था। एमसीआई द्वारा स्वास्थ्य के देवता भगवान धनवंतरी के वर्तमान वंशजों अर्थात चिकित्सकों पर लगाम कसने की कवायद की जा रही थी। एमसीआई कोड के अनुसार चिकित्सक और उसके परिजन अब दवा कंपनियों के खर्चे पर सेमीनार, वर्कशाप, कांफ्रेंस आदि में नहीं जा सकेंगे। कल तक अगर चिकित्सक एसा करते थे, तब भी वे उजागर तौर पर तो किसी को यह बात नहीं ही बताते थे। इसके अलावा दवा कंपनियों के द्वारा चिकित्सकों को छुट्टियां बिताने देश विदेश की सैर कराना प्रतिबंधित हो जाएगा। चिकित्सक किसी भी फार्मा कंपनी के सलाहकार नहीं बन पाएंगे तथा मान्य संस्थाओं की मंजूरी के उपरांत ही शोध अथवा अध्ययन के लिए अनुदान या पैसे ले सकेंगे। आज तीन साल बीतने के बाद भी वह कोड़ लापता है। जाहिर है दवा कंपनियों की भारी भरकम थैलियों ने सरकार का मुंह बंद कर दिया होगा।

वै एमसीआई कोड भले ही ले आए पर चिकित्सकों के मुंह में दवा कंपनियों ने जो खून लगाया है, उसके चलते चिकित्सक इस सबके लिए रास्ते अवश्य ही खोज लेंगे। देखा जाए तो दुनिया का चौधरी अमेरिका इस मामले में बहुत ही ज्यादा सख्त है। अमेरिका में अनेक एसे उदहारण हैं, जिनको देखकर वहां के चिकित्सक और दवा कंपनी वालों की हिम्मत मरीजों की जेब तक हाथ पहुंचाने की नहीं हो पाती है। अमेरिका की एली लिली कंपनी ने तीन हजार चार सौ चिकित्सकों और पेशेवरों के लिए 2.20 करोड डालर (एक अरब रूपए से अधिक) दिए, बाद में गडबडियों के लिए उस कंपनी को 1.40 अरब डालर (64.40 अरब रूपए से अधिक) की पेनाल्टी भरनी पडी।

इसी तरह फायजर कंपनी ने चिकित्सकों और पेशेवरों के माध्यम से गफलत करने पर 2.30 अरब डॉलर (एक सौ पांच अरब रूपए से अधिक) का दण्ड भुगता। ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन ने 30909 डालर (14 लाख रूपए से अधिक) के औसत से 3700 डॉक्टर्स को 1.46 करोड डालर (6.71 अरब रूपए से अधिक) दिए तो मर्क ने 1078 पेशेवरों को 37 लाख डालर (सत्रह करोड रूपए से अधिक) का भुगतान किया।

अमेरिका में फिजिशियन पेमेंट सानशाइन एक्ट लाया जा रहा है, जिसके तहत दवा कंपनियों को हर साल 100 डालर से अधिक के भुगतान की जानकारी देनी होगी। जानकारी देने में नाकाम या आनाकानी करने वाली कंपनी को हर भुगतान पर कम से कम 1000 डालर और जानबूझकर जानकारी छिपाने के आरोप में कम से कम दस हजार डालर का भोगमान भुगतना पडेगा।

दरअसल पेंच चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं में है। निहित स्वार्थ और लाभ के लिए चिकित्सकों द्वारा कंपनी विशेष की दवाओं को प्रोत्साहन दिया जाता है। दवा कंपनी द्वारा अनेक लीडिंग प्रेक्टीशनर्स को पिन टू प्लेन सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। चिकित्सकों के बच्चों की पढाई लिखाई से लेकर घर तक खरीदकर देती हैं, दवा कंपनियां। इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों के साथ मिलकर किस कदर मोनोपली मचाई जाती है, और मरीजों की जेब किस तरह हल्की की जाती है।

चिकित्सकों द्वारा सस्ती दवाएं नहीं लिखी जातीं हैं, क्योंकि जितनी मंहगी दवा उतना अधिक कमीशन उसे मिलता है। वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो चिकित्सकों पर होने वाले खर्चे के कारण ही दवाओं की कीमतें आसमान छू रहीं हैं। बीते साल में ही दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक इजाफा हुआ है। हृदय रोग के काम आने वाली दवाएं तो 70 फीसदी तक उछाल मार चुकीं हैं। कहा जाता है कि लगभग पचास फीसदी दवाएं तो अनुपयुक्त ही हैं। मर्क कंपनी की अथर्राइटिस की दवा वायोक्स के साईड इफेक्ट के मामले में कंपनी ने मौन साध लिया था। इसके सेवन से हार्ट अटैक की संभावनाएं बहुत ज्यादा हो जाती थीं। अनेक मौतों के बाद इस दवा को वापस लिया गया था।

महानगरों सहित लगभग समूचे हिन्दुस्तान के बडे शहरों में चिकित्सा की दुकानें फल फूल रही है, आम जनता कराह रही है, सरकारी अस्पताल उजडे पडे हैं, पर सरकारें सो रहीं हैं। नर्सिंग होम में चिकित्सकों के परमानेंट पेथालाजी लेब, एक्सरे आदि में ही टेस्ट करवाने पर चिकित्सक उसे मान्य करते हैं, अन्यथा सब बेकार ही होता है। कितने आश्चर्य की बात है कि सरकारी अस्पतालों में होने वाले टेस्ट को इन्हीं चिकित्सकों द्वारा सिरे से खारिज कर दिया जाता है। अगर वाकई सरकारी अस्पताल के टेस्ट मानक आधार पर सही नहीं होते हैं तो बेहतर होगा कि सरकारी अस्पतालों से इन विभागों को बंद ही कर देना चाहिए। यहां तक कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कर्मभूमि विदिशा में जिला चिकित्सालय में पदस्थ सिविल सर्जन श्रीमति जैन के पास इतना समय है कि वे अस्पताल के ठीक गेट के सामने अपनी निजी चिकित्सा की दुकान चलाती हैं, और जनसेवक चुपचाप देख सुन रहे हैं।

चिकित्सकों पर अंकुश लगाने के लिए एमसीआई द्वारा नियमावली बनाई जा रही है, कहा जा रहा है कि मार्च माह में उसे लागू भी कर दिया जाएगा। इसके लिए विशेषज्ञों से सुझाव भी आमंत्रित करवाए जा रहे हैं। इस पाबंदी से डायरी, पेन, पेपवेट, कलेंडर जैसी चीजों को मुक्त रखा गया है। वैसे दवा कंपनियों से डी कंट्रोल श्रेणी की दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार छीनकर कुछ हद तक भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।

जब तक सरकार द्वारा चिकित्सकों के साथ ही साथ दवा कंपनियों पर अंकुश नहीं लगाया जाता तब तक मरीजों की जेब में डाका डालने का सिलिसिला शायद ही थम पाए। सरकार को अमेरिका जैसा कानून ‘‘सख्ती‘‘ से लागू कराना होगा। दवा कंपनियों से यह कहना होगा कि वे किसी चिकित्सक विशेष के बजाए मेडीकल एसोसिएशन या चिकित्सकों की टीम के लिए स्पांसरशिप कर नई दवाओं की जानकारी दे। इसके अलावा एमसीआई को चिकित्सकों और जांच केंद्रों के बीच की सांठगांठ के खिलाफ कठोर पहल करनी होगी। मार्च माह में लागू किए जाने वाले कोड और आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम ही उठाने आवश्यक होंगे। वहीं दूसरी ओर देश में गिरती स्वास्थ्य सुविधाआंे के बारे में महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की बार बार की जा रही चिंता स्वागतयोग्य है। हो सकता है महामहिम की इस चिंता से कंेद्र और राज्य सरकारें चेतें, और युवा चिकित्सकों के मानस पटल पर गांव के प्रति प्रेम जागृत कर सकें, अन्यथा गांव और छोटे शहरों में जीने वालों के स्वास्थ्य के साथ झोला छाप चिकित्सकों का खिलवाड़ बदस्तूर जारी रहेगा।

सांसद को नहीं सड़क बहने की जानकारी!


सांसद को नहीं सड़क बहने की जानकारी!

सीपी जोशी से मिले थे के.डी.देशमुख

लोकसभा में मामला नहीं उठाया पर व्यक्तिगत तौर पर एनएचएआई से मिले हैं सांसद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। उत्तर दक्षिण की जीवन रेखा कहलाने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज मार्ग के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच सिवनी जिले में कुरई घाट में लगभग सवा मीटर सड़क का हिस्सा बारिश के मौसम में बह गया है, जिसके चलते आवागमन बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। गत दिवस बहे इस मुख्य मार्ग के हिस्से की जानकारी सिवनी बालाघाट संसदीय क्षेत्र के जागरूक संसद सदस्य के.डी.देशमुख को नहीं है।

इस संवाददाता से दूरभाष पर चर्चा के दौरान जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि वे उनके संसदीय क्षेत्र सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले इस फोरलेन के लिए बेहद चिंतित हैं और इसके लिए जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने पिछले दिनों भूतल परिवहन मंत्री (अपने साथी से पूछा -‘‘क्या नाम है उसका, फिर बोले -सी.पी.जोशी) से मिले थे। जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि इस सड़क का मामला सर्वोच्च न्यायालय से वापस आ गया है। अब नया प्रस्ताव बनाकर इसे पुनः भेजा जाएगा।

सिवनी बालाघाट लोकसभा क्षेत्र के जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान यह भी कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने नेशनल हाईवे को प्रदेश को सौंपने की बात कही गई है जब प्रदेश को ये हाईवे हेण्डोवर हो जाएंगे तब इनका रखरखाव प्रदेश सरकार द्वारा किया जाएगा। जब उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया गया कि लखनादौन खवासा हाईवे को वापस नहीं मांगा गया है तब जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की।
जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि वे इस मामले की चर्चा के लिए (अपने साथी से पूछा कि हम कहां जा रहें हैं फिर बोले परिवहन भवन) परिवहन भवन जा रहे हैं, ताकि एनएचएआई के अफसरों से चर्चा हो सके। सिवनी के इस विवादस्पद और प्राचीन महत्व के राजमार्ग के बारे में जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि इस मामले में उन्होंने संसद में कभी आवाज नहीं उठाई पर इसके लिए वे एनएचएआई के अफसरों के सतत संपर्क में रहे हैं। इस संवाददाता से चर्चा के दौरान जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने यह भी कहा कि संवाददाता के ध्यानाकर्षण के उपरांत वे इस मामले को संसद में उठाने का प्रयास अवश्य ही करेंगे।

सिवनी जिले के विवादस्पद कुरई घाट के हिस्से में लगभग सवा मीटर बही सड़क के बारे में पूछे जाने पर जागरूक सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। वे पिछले तीन चार दिनों से दिल्ली में ही अनेक कार्यक्रमों में पूरी तरह व्यस्त रहे इसलिए हो सकता है यह बात उनकी जानकारी में न लाई गई हो। बताया जाता है कि कुरई घाट में सड़क का एक हिस्सा बह गया है। इस बहे हिस्से में पुलिस द्वारा बेरीकेटिंग कर दी गई है, जिससे वाहन अब एक ही तरफ से आ जा पा रहे हैं, जिसके चलते जाम की स्थिति भी निर्मित हो रही है।

गौरतलब है कि उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा जो कि सिवनी जिले से होकर गुजर रहा था में मोहगांव से लेकर खवासा तक का लगभग 22 किलोमीटर का काम तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 के आदेश के उपरांत रोक दिया गया था। इसके बाद लगभग तीन सालों से न तो इस सड़क का रखरखाव लोक कर्म विभाग के राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग द्वारा ही किया गया और न ही एनएचएआई द्वारा ही इसकी सुध ली गई। परिणाम स्वरूप यह मार्ग पूरी तरह जर्जर हो चुका है।

वैसे देखा जाए तो लखनादौन से खवासा तक का यह फोरलेन गलियारा मण्डला और सिवनी के सांसदों बसोरी सिंह मसराम, के.डी.देशमुख के अलावा जिले के चारों विधायकों भाजपा के कमल मस्कोले, नीता पटेरिया, शाशि ठाकुर एवं कांग्रेस के हरवंश सिंह ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र से होकर गुजरता है। बावजूद इसके किसी भी जनसेवक ने इस मार्ग को दुरूस्त करवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले दिनों सिवनी जिले में ही जर्जर फोरलेन गलियारे में कटनी से तमिलनाड़ू जाने वाला एक ट्रक गड्ढ़े बचाने के चक्कर में पलट गया था जिससे चालक की मौत हो गई थी। इस मामले में समस्त संगठनों की चुप्पी आश्चर्यजनक है। ना ही केंद्र मंे बैठी भाजपा ने ही इस मामले को मुद्दा बनाने का प्रयास किया। पिछले साल कांग्रेस के विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर ने सिवनी जिले में फोरलेन में पड़ने वाले आबादी वाले शहरों में गोपालगंज को छोड़कर शेष जगह पर सड़कों के सुधार कार्य का भूमिपूजन भी किया था। विडम्बना ही कही जाएगी कि आज तक यह कार्य आरंभ नहीं हो सका है। इस मामले में साल भर बीतने के बाद भी भाजपा की चुप्पी आश्चर्यजनक ही मानी जा रही है।

अनेक व्हाईट कालर नप सकते हैं शहला मामले में


अनेक व्हाईट कालर नप सकते हैं शहला मामले में

रसूखदारों के शामिल होने से जांच हो सकती है प्रभावित

तरूण विजय ने दिया था शहला को फिल्म बनाने का जिम्मा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सामाजिक कार्यकर्ता शहला मसूद की मौत के बाद सीबीआई जांच आरंभ हो चुकी है। इसी के साथ अब शहला की हत्या या आत्महत्या का मामला भी सुलझने का इंतजार सबको है। दिल्ली के सियासी गलियारों में शहला मामले को लेकर सभी चोकन्ने ही दिखाई पड़ रहे हैं। इसकी वजह इस मामले में सांसद तरूण विजय का नाम आना है।

कहा जा रहा है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी न्यास के प्रमुख रहते हुए सांसद तरूण विजय ने शहला मसूद को स्वर्गीय मुखर्जी पर एक चलचित्र बनाने का काम सौंपा था। इसके बाद भी दोनों के बीच नजदीकियां भी बढ़ गईं थी। शहला इसके बाद मध्य प्रदेश के अनेक नेताओं के संपर्क में भी रही। प्रोजेक्ट टाईगरके सिलसिले में शहला की बैठकें और मुलाकातें तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश तथा तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से भी हुईं।

सियासी गलियारों में चल रही बयार के अनुसार अगर जांच में कोई बाधा नहीं आई तो इसमें मनमोहन सरकार के दो मंत्रियों, जामिया के एक पूर्व उपकुलपति, राहुल गांधी के करीबी एक महासचिव, मध्य प्रदेश सरकार के एक मंत्री, सीएम के एक रिश्तेदार, एक बलशाली विधायक, एक निगम अध्यक्ष, भारतीय प्रशासनिक सेवा के तीन आला अफसर और भारतीय पुलिस सेवा के दो अफसर भी इसकी जद में आ सकते हैं। चर्चा है कि दो बड़े अखबार घरानोंके मालिकों तक भी इसकी आंच जा सकती है।