यौन शिक्षा पर सेमीनार
(शरद खरे)
स्तरीय शिक्षा के लिए मशहूर मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला का अपना एक इतिहास
रहा है। जब तक जे.के.सिंह यहां प्राचार्य रहे तब तक शाला का स्तर देखने लायक था।
उसके उपरांत एम.के.सिंह ने भी उसी परंपरा को बरकरार रखा। आजादी के उपरांत मिशनरी
शालाओं में शिक्षा का स्तर और अनुशासन दोनों ही काबिले तारीफ हुआ करते थे। कालांतर
में मिशनरी शालाओं का स्तर एकाएक गिरना आरंभ हो गया। इक्कीसवीं सदी के आगाज़ के साथ
ही सिवनी के लोगों के सामने यह समस्या आ खड़ी हुई के वे अपने बच्चों को हायर
सेकन्डरी तक की शिक्षा दिलवाएं तो दिलवाएं कहां।
इसी बीच मिशनरी की एक नई संस्था का अभ्युदय हुआ। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी
स्कूल ने सिवनी में अपनी आमद दी। आरंभ में इस शाला से अभिभावक ज्यादा तादाद में
नहीं जुड़े,
पर देखते ही देखते इस शाला ने अपनी धाक
शिक्षा के क्षेत्र में जबर्दस्त बना ली। इस शाला में अनुशासन का डंडा चला और
बच्चों के अंदर शिक्षा को लेकर एक आकर्षण के साथ ही साथ स्तरीय शिक्षा और अनुशासित
रहने का पाठ पढ़ने को मिला। पूर्व प्राचार्य सेबी सिस्टर द्वारा इस अनुशासन को
कठोरतम स्तर तक ले जाया गया। पीठ पीछे आज भी अभिभावक उनके अनुशासन की तारीफ करते
नहीं अघाते।
वर्तमान प्राचार्य सिस्टर रश्मि ने कुछ लचीला किन्तु सख्त रवैया अपनाया
हुआ है। सिस्टर रश्मि का यह रवैय्या शाला के अंदर बच्चों के बहुमुखी विकास में
बेहतर भूमिका निभा रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। संस्था के
प्रबंधक फादर जयप्रकाश ने दोनों ही प्राचार्य के साथ काम किया है। उनके कुशल
मार्गदर्शन में आज सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल ने प्रौढ़ हो रही पीढ़ी के दिलो
दिमाग में मिशन शाला के प्राचार्य जे.के.सिंह, और एम.के.सिंह के अनुशासन और स्तर की यादें तरोताजा कर दी
हैं। फादर जय प्रकाश प्रयोगवादी हैं। उन्होंने बच्चों के बहुमुखी विकास को लेकर
अनेक प्रयोग किए जो सफल भी रहे।
आज सिवनी में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में अध्ययन् करना उसी तरह का
स्टेटस सिंबल बन चुका है जिस तरह अस्सी के दशक तक मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला में
पढ़़ना होता था। इस शाला ने जिला मुख्यालय की बाकी शालाओं को काफी पीछे छोड़ दिया
है। आज इस शाला के पास आउट या पढ़ने वाले बच्चे आत्मविश्वास से लवरेज नजर आते हैं।
जिला मुख्यालय में कहने को तो केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त अनेक
शालाएं हैं किन्तु सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की बात अपने आप में अलग ही मानी
जा सकती है।
बीते 31 अगस्त को इस शाला में बालिकाओं के लिए यौन शिक्षा पर एक सेमीनार
का आयोजन किया गया। इस आयोजन के लिए शाला प्रबंधन विशेष रूप से शाला के प्रबंधक
फादर जय प्रकाश और प्राचार्य सिस्टर रश्मि बधाई की पात्र हैं। दरअसल, बारह साल की आयु के उपरांत बालिकाओं में यौन परिवर्तन आरंभ
होते हैं। ये परिवर्तन वाकई इस आयु के बच्चों के लिए जिज्ञासा का विषय होते हैं।
जिन शालाओं मेें कोएड एजूकेशन (छात्र छात्राएं साथ अध्ययन करते हैं) है वहां इन
परिवर्तनों में विपरीत लिंग का आकर्षण बहुत मायने रखता है।
यह आयू कच्ची मिट्टी के मानिंद मानी जाती है। इस आयु में बच्चे को जिस तरफ
ले जाया जाए वह बहुत ही आसानी से उस दिशा में मुड़ जाती है। बड़े शहरों में बारह से
अट्ठारह साल की आयु के बच्चों के अश्लील एमएमएस से इंटरनेट पटा पड़ा है। पहले लोग
विदेशी लोगों के एमएमएस देखा करते थे पर अब तो खालिस देशी विद्यार्थियों के एमएमएस
डले हैं इंटरनेट और युवाओं के मोबाईल पर। सिवनी भी इससे अछूता नहीं है। पुलिस ने
शालेय स्तर के कई युगलों को निर्जन स्थल पर रासलीला करते पकड़ा है। गत दिवस एक कार
में भी पुलिस ने एक जोड़े को आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा और पालकों के पास ले जाकर
समझाईश देकर छोड़ दिया। देखा जाए तो उन पुलिस वालों को सेल्यूट् करना चाहिए
जिन्होंने ऐसा किया, वरना पुलिस चाहती
तो उनसे मनमाने पैसे वसूल सकती थी।
शहर और उपनगरीय क्षेत्र विशेषकर पॉलीटेक्टिनक मैदान, बाबूजी नगर के पीछे के खेत, बरघाट रोड बंजारी माई, पुराना और नया
बाईपास, बबरिया तालाब, शंकराचार्य पार्क, ड्रीम लैंड, साई मंदिर नगझर, स्टेडियम के इर्द गिर्द आदि निर्जन स्थलों पर प्रेमी युगल आपस
में आपत्तिजनक हालत में शालेय गणवेश में ही उलझे रहते हैं। इससे विद्यार्थियों के
साथ ही साथ शाला की भी बदनामी होती है। अक्सर देखा गया है कि कम उम्र में ही पढ़ाई
लिखाई को तिलांजली देकर छोटा मोटा व्यवसाय आरंभ करने वाले युवा ही इन कोमलांगी
बालाओं को अपना शिकार बनाते हैं, फिर भावनाओं में
बहाकर उनके साथ अवैध संबंध तक स्थापित कर लेते हैं।
बहरहाल, सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल ने यौन शिक्षा पर
बालिकाओं को रूबरू कराकर एक अभिनव कदम उठाया है, शाला प्रबंधन बधाई का पात्र है इस पुनीत काम के लिए।
जिले के संवेदनशील जिला कलेक्टर से भी अपेक्षा है कि जिले में हाई और हायर सेकेंडरी
स्तर तक की हर शाला को निर्देशित किया जाए कि वे भी इस तरह के सेमीनार आयोजित कर
बच्चियों को जागरूक करने की दिशा में पहल करें। इस तरह के सेमीनार में उस शाला के
पुरूष शिक्षकों का छात्राओं के प्रति रवैया विशेष तौर पर गौर किया जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षक भी पथ भ्रष्ट होकर अपनी इच्छाओं की
पूर्ति के लिए इन बालाओं को गलत रास्ते पर धकेल सकते हैं। पालकों को भी बच्चों के
साथ दोस्ताना व्यवहार रखते हुए समय समय पर अपने बच्चों से शिक्षकों की हरकतंों के
बारे में जानकारी हासिल करते रहना चाहिए।


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