बुधवार, 27 जुलाई 2011

कब तक छलेंगे कोरे वादों से जनसेवक रियाया को!

कब तक छलेंगे कोरे वादों से जनसेवक रियाया को!

(लिमटी खरे)

तालियों की गड़गड़ाहट वह भी अपने कहे वाक्य पर! भई वाह क्या कहने। कौन नहीं चाहता प्रशंसा सुनना, परनिंदा से भी ज्यादा सुख मिलता है आत्म प्रशंसा में। चुनावों के दरम्यान राजनेताओं द्वारा वायदों की बौछार कर दी जाती है, मतदाता बुरी तरह से भ्रमित हो जाता है चुनावों के दौरान। जैसे ही चुनाव बीते वैसे ही जनसेवक अपने वादों को दरकिनार कर अपने अपने निहित स्वार्थों मंे जुट जाते हैं। यह हकीकत है, इस बारे में मीडिया में जब तब कोई न कोई खबर प्रमुख स्थान पा ही जाती है। हाल ही में दिल्ली के लोकायुक्त वजीरे आजम की नामराशि जस्टिस मनमोहन सरीने ने पिछले चुनावों में दिल्ली की कुर्सी पर तीसरी मर्तबा काबिज शीला दीक्षित को उनके वायदों के लिए न केवल कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सिफारिश भी की है कि महामहिम शीला दीक्षित को आगाह अवश्य करें कि भविष्य में इस तरह की बयानबाजी करने से बाज आएं
 
मंच से बोलते समय तालियों की गड़गड़हाट सुनने को बेचेन राजनेता अक्सर अपना संयम तोड़ देते हैं। कभी कभी तो सुर्खियों में बने रहने भी नेताओं द्वारा आम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है। जब बात जनादेश पाने की हो तब तो नेताओं के मुंह में जो आता है वह वायदा कर दिया जाता है। यह भी नहीं सोचा जाता कि इसे पूरा कैसे किया जाएगा। मामला चाहे शीला दीक्षित द्वारा साठ हजार तैयार मकानों को गरीब गुरबों को सौंपने का हो या फिर हृदय प्रदेश में केंद्रीय छटवा वेतनमान जस का तस लागू करने का हो, हर बार अंत में मतदाता अपने आप को ठगा सा ही पाते हैं। उधर मामला चाहे उत्तर भारतीयों को लेकर मनसे प्रमुख राज ठाकरे का हो या फिर शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे का। दोनों ही नेताओं ने जात पात और क्षेत्रवाद की बात कहकर लोगों के मन मस्तिष्क में जहर बो दिया है।

इस मामले में दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित भी पीछे नहीं हैं। कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर टिप्पणी करने के बाद उन्हें लाख सफाई देनी पड़ी थी। पिछले साल राजधानी दिल्ली से सटे बदरपुर विधानसभा क्षेत्र में भी एक कार्यक्रम के दौरान शीला दीक्षित ने एक विवादस्पद बयान दे डाला। बदरपुर विधानसभा क्षेत्र के अलीपुर ग्राम में चुनाव पूर्व वे ढेर सारी सौगातें लेकर गईं थीं। स्थानीय निवासियों ने वहां शासकीय योजनाओं, अस्पताल, राशन, सड़क बिजली पानी की समस्याएं गिनाते ही उनके मुंह का जायका खराब हो गया। झांसी की रानी की मानिंद शीला दीक्षित चिंघाड़ीं थीं।

उन्होंने उस वक्त कहा था कि सरकार ने सब कुछ दिया है, दिल्ली वासियों के लिए। और अगर बिचौलियों दलालों के चलते गफलत हो रही हो तो लोग खासतौर पर महिलाएं मोर्चा संभालें। अगर तब भी बात न बने तो पिटाई भी की जाए, और अगर आवश्यक्ता पड़े तो दिल्ली में मुख्यमंत्री कार्यालय में आकर इस बात की इत्तला भी दी जाए। 2013 में फिर विधानसभा चुनाव हैं इसलिए शीला दीक्षित की जुबान फिर फिसलना स्वाभाविक ही है।

दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की वीर रस भरी सलाह सुनकर रणबांकुरों की बाहों में मछलियां अवश्य फड़कने लगी होंगी। लोगों ने अपने दिल दिमाग में राशन वाले बनिया की पिटाई की काल्पिनिक कहानी भी गढ़नी आरंभ कर दी होगी। इंसाफ दिलाने का यह काफी पुराना किन्तु घिनौना तरीका है। इस कबीलाई संस्कृति की मिसालें यदा कदा देश में सुनने को मिल जाती हैं।

अगर व्यवस्था असफल हुई है तो निश्चित रूप से सूबे का निज़ाम इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार कहा जा सकता है। सूबे का निज़ाम ही जब इस तरह की वीर रस भरी सलाह देने लगे तो बस चल चुका लोकतंत्र। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अलीगांव के लोगों को जिस रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी है, वे खुद नहीं जानती कि वह सड़क कहां जाकर समाप्त होती है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और सदी के खलनायक प्राण अभिनीत फिल्म ‘‘कालिया‘‘ का एक डायलाग यहां प्रसंगिक होगा जिसमें जेलर की भूमिका में प्राण अपने केदी अमिताभ से कहता है -‘‘जुर्म के जिस रास्ते पर तुम चल चुके हो, कालिया, तुम नहीं जानते यह रास्ता जेल की कालकोठरी में ही जाता है।‘‘

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में वहीं की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की चिंघाड़ से साफ हो गया था कि यह अराजकता के आव्हान के अलावा और कुछ नहीं है। शीला दीक्षित ने परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है कि हम सूबे को चलाने में असफल हुए हैं, अब आप ही सत्ता संभालें या जो आपको करना हो करें, हम आंख बंद कर सब कुछ देखेंगे चाहे वह जायज हो या नाजायज। पूर्व में नाजायज को भी उन्होंने आंख बंद कर स्वीकार किया है, तभी तो इस तरह की विस्फोटक स्थिति निर्मित हुई है।

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध तक देश में सीमेंट भी परमिट पर मिला करती थी। उस वक्त दलालों ने खूब मलाई काटी। आज भी कमोबेश वही हालत बने हुए हैं। सरकारी क्षेत्र में आज आधी से ज्यादा सेवाएं निजी क्षेत्रों को सौंप दी गई हैं। ठेका लेने वाला अपनी मर्जी के हिसाब से जनता को लूट रहा है। देश में केंद्र और राज्य सरकारें क्या करने जा रही हैं। मसलन, सड़क है तो वह भी बनाओ, कमाओ, फिर सरकार को सौंपो (बीओटी), बिजली भी निजी हाथों में अर्थात जितना लूट सकते हो लूट लो।

केंद्र में सौदेबाजी की राजनीति के माहिर खिलाड़ी कहे जाने वाले शरद पवार किसी से कम नहीं हैं। मराठा क्षत्रप और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पंवार ने तो साफ तौर पर अपील की थी कि किसानों को साहूकार का ब्याज नहीं चुकाना चाहिए। शायद शरद पंवार ज़मीनी हकीकत से रूबरू नहीं हैं। वे नहीं जानते हैं कि किसान ने जो कुछ भी रहन (गिरवी) रखा होगा वह डूब जाएगा। इन परिस्थितियों में आत्म हत्या करने वाले किसानों के घरों से न जाने कितने ‘‘ज्वाला, जीवा या शंकर डाकू‘‘ पैदा हो जाएंगे।

राजनेता के पीछे दौड़ने वाली जनता में से कुछ चाटुकारों को छोड़कर शेष चालीस फीसदी तो उन्हें अपना आदर्श ही मानते हैं, और अगर राजनेता ही मरने मारने, भगने भगाने जैसे बयान देना आरंभ कर देंगे तो आने वाले समय में कत्ले आम मच जाएगा। राजनेता इस तरह का बयान और कदम सिर्फ खबरों में बने रहने, तालियां सुनने के लिए उठाते हैं या फिर उनका असली मकसद कुछ और होता है।

दिल्ली के लोकायुक्त के इस सराहनीय कदम की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित द्वारा वर्ष 2008 में दिल्ली विधानसभा चुनावों के एन पहले जो घोषणा की थी उस बारे में प्रतिभा देवी पाटिल का ध्यान आकर्षित कराया है। दिल्ली के लोकायुक्त न्यायमुर्ति मनमोहन सरीन ने कहा है झूठे छलावे भरे वायदे कर वोट बटोरने के शीला दीक्षित के प्रयासों की खुलकर निंदा की है। न्यायमूर्ति सरीन ने बड़बोले नेताओं की ‘कथनी‘ और ‘करनी‘ के बीच के फासले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े एसे नेताओं को बेनकाब किया जाना आवश्यक है।

दरअसल लोकायुक्त के समक्ष एक अजीबोगरीब मामला लाया गया था, जिसमें वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों के पहले श्रीमति शीला दीक्षित द्वारा जनसभाओं में गरीब और मलिन बस्तियों के लिए ‘राजीव रत्न आवास योजना‘ के तहत तैयार 60 हजार मकानों को इनमें बांटने की घोषणा की गई थी। मुख्यमंत्री के इस वायदे जिसमें मकानों के तैयार होने की बात कहकर चुनाव के बाद वितरित करने की बात कही गई थी को अधिवक्ता सुनीता भारद्वाज द्वारा एक याचिका के द्वारा लोकायुक्त के संज्ञान में लाया गया था।

सुनीता का आरोप है कि गरीबों के लिए साठ हजार मकान बनकर तैयार होने की बात तो दूर उसके लिए न कार्ययोजना बनी और ना ही जमीन का अधिग्रहण ही किया गया। मामला दूध और पानी के मानिंद एकदम साफ है। शीला दीक्षित ने तीसरी बार सत्ता हथियाने के लिए जो जोड़तोड़ किया वह किसी से छिपा नहीं है। यह जरूरी इसलिए भी हो गया था, क्योंकि दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेलों का आयोजन किया जाना था, इसके लिए दिल्ली सरकार को खासा बजट भी मिलना था। गरीब मजलूमों को गुमराह कर राजनैतिक दलों द्वारा उनसे जनादेश तो प्राप्त कर लिया जाता है, किन्तु जब बारी वायदों पर खरा उतरने की आती है तो राजनेता पटली मारने से भी गुरेज नहीं करते।

दिग्गी ने भरा भाजपा का रीता तरकश

दिग्गी ने भरा भाजपा का रीता तरकश

यूपी में चुनावी वैतरणी होगी दिग्गी के कसैले मुख बाणों से

भाजपा का खाली हो चुका तुणीर लग रहा है हरा भरा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए हालिया हमलों के बाद कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के बयानों से भाजपा काफी उत्साहित नजर आ रही है। अब भाजपा के उत्तर प्रदेश चुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण के मार्ग काफी प्रशस्त होते दिख रहे हैं। अनचाहे में ही कांग्रेस महासचिव ने भाजपा के खाली तुणीर को जहर बुझे तीरों से भर दिया है। राजा ने भले ही संघ पर आक्रमण की गरज से कहा हो कि मुंबई हमले में आरएसएस का हाथ होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु इस मामले को भाजपा ने हिन्दु वोटों को संगठित करने का जरिया मान लिया है।
एआईसीसी मुख्यालय 24 अकबर रोड़ के अंदरखाते से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो चतुर सुजान कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के बयान पर अंदर ही अंदर तलख प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस के अंदर हिन्दुत्व के आलंबरदार कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के बयान को दूसरी तरह से ले रहे हैं। उनका मानना है कि सवर्ण हिन्दु वोट बैंक जो भाजपा से टूटकर एक बार कांग्रेस की झोली मंे आने वाला था, वह अब राजा के इस बयान से फिर कांग्रेस से पर्याप्त दूरी बना सकता है।

कांग्रेस के कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह का यह बयान उत्तर प्रदेश के चुनावों में मतदाताओं को एक बार फिर साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित कर देगा। वैसे भी सोनिया और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की ज्यादा दखलंदाजी से अनेक कांग्रेसी नाराज दिख रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बेनी वर्मा को कबीना मंत्री बनाए जाने पर भी अनेक नेता असहज ही महसूस कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यूपी में ओबीसी वोट बैंक को लुभाने के दिग्गी राजा के तौर तरीकों पर भी खुलकर मतभेद सामने आते जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि 44 सालों मंे अर्थात 1967 के बाद ओबीसी ने यूपी में कभी भी कांग्रेस का साथ नहीं दिया है। इन परिस्थितियों में बेनी वर्मा को प्रमोट करने का ओचित्य समझ से परे ही है।

उत्तर प्रदेश मंे ओबीसी को लुभाने बेनी वर्मा की पदोन्नति के बाद मुंबई हमलों में आरएसएस का हाथ होने की संभावनाओं वाले दिग्विजय सिंह के बयानों ने कांग्रेस में हलचल मचा दी है। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया के सरकारी आवास) एवं 12 तुलगल लेन (राहुल के सरकारी आवास) के सबसे विश्वस्त होने के कारण कांग्रेसी खुलकर तो कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं, किन्तु कांग्रेस के अंदरखाने में दिग्गी विरोधी स्वर मुखर होते जा रहे हैं।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

फिर सुलगने लगा है लाल गलियारा!

फिर सुलगने लगा है लाल गलियारा!

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक के बाद भारत जिसे हिन्दुस्तान, इंडिया आदि के नाम से भी जाना जाता है को किसी की नजर लग गई है। यही कारण है कि इसके बाद देश में अलगाववाद, आतंकवाद, माओवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद और न जाने कितने वाद हैं सभी के केंसर ने इसे घेर लिया है। देश के रहवासी अपने आप को असुरक्षित महसूस करतेे हैं, पर दूसरी ओर देश के नीति निर्धारक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में खुद को महफूज रखते हैं। अपनी मनमानी करने के लिए मशहूर जनसेवक और लोकसेवकों ने मीडिया जगत में कार्पोरेट की दखल का फायदा उठाकर इसे अपनी पांव की जूती बना रखा है। इन धनपतियों की डेयोढी पर नाक रगडते मीडिया के वही सुर बाहर आते हैं जो इनकी मंशा के अनुरूप होते हैं। मामला चाहे बाबा रामदेव का हो या अन्ना हजारे का। कोई भी मीडिया हाउस इसमें न तो आंदोलन कारी को ही नंगा कर पाया न सरकार को। अंत में पिसना करदाता जनता को ही है। इसी का फायदा उठाकर अंत में ‘‘वादी‘‘ लगाने वाले देश में आतंक बरपा रहे हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अध्यक्ष की के काफिले पर हुए नक्सली हमले ने साफ कर दिया है कि हमारा सुरक्षा तंत्र इनके आगे बौना ही है।

पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी से निकलकर समूचे भारत मंे साम्राज्य फैलाने वाले नक्सलवादियों ने लाल गलियारे का दायरा एक के बाद एक कर कमोबेश हर प्रदेश में बढ़ा लिया है। बीते दिनांे मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में नक्सलियों के काडर बेस्ड समर कैंप की खबरों ने केंद्र सहित राज्यों को हलाकान कर दिया था। पूर्व में रांची के पास एक रेलगाड़ी का अपहरण कर नक्सलवादियों ने जता दिया था कि भारत सरकार या प्रदेश सरकारें उनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

बीस जुलाई को छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एवं संयुक्त मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रहे नंद कुमार पटेल के काफिले पर हुआ नक्सली हमला यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि आज भी नक्सली देश के के सुरक्षा तंत्र से ज्यादा मजबूत तंत्र स्थापित कर चुके हैं। पटेल के काफिले में चल रहे पांच में से दो वाहन बुरी तरह क्षति ग्रस्त हुए हैं। पटेल के साथ पूर्व अध्यक्ष धनेंद्र साहू, सत्य नारायण शर्मा आदि मौजूद थे। 

वैसे बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में नक्सलवादियांे की बढ़ती गतिविधियों से आम आदमी का चिंतित होना स्वाभाविक ही है। भले ही सरकारें इस पर संजीदा न हों पर आम आदमी अपने जान माल की सुरक्षा के लिए इस गलियारे से फिकरमंद दिख रहा है। देश के आधे से अधिक राज्यों में नक्सलवादी आतंक के बल पर दशकों से अपनी समानान्तर सरकारें चला रहे हैं। विडम्बना ही कही जाएगी कि नक्सली आतंक वाले क्षेत्रों में प्रदेशों अथवा देश का शासन नहीं वरन् उनका अपना कानून चल रहा है। यह एक एसी कड़वी हकीकत भी है, जिसे सरकारों को स्वीकार करना ही होगा।

वस्तुतः नक्सलवादी विचारधारा को खाद किसी कट्टरवादी आधार से नहीं मिल रही है। सामाजिक शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद कर नक्सली स्थानीय लोगों को अपना बना लेते हैं। फिर शुरू होता है व्यवस्था सुधारने के नाम पर आतंक का नंगा नाच। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में ही प्रदेश सरकार के तत्कालीन कबीना मंत्री लिखी राम कांवरे की उनके घर पर ही नक्सलियों ने गला रेतकर हत्या कर दी थी, हमारी प्रदेश और केंद्र सरकार तब भी हाथ पर हाथ रखे बैठी रही।

आमूमन नक्सलियों के निशाने पर पुलिस, राजस्व और वन विभाग के कर्मचारी होते हैं। दरअसल जनता से इन्हीं विभाग के लोगों का सीधा सामना होता है। इन महकमों के सरकारी नुमाईंदो को डरा धमका कर ग्रामीणों को इंसाफ दिलवा, ये नक्सली अपना प्रभाव क्षेत्र तेजी से बढ़ाने में सफल हो गए हैं। हमारी दम तोड़ती सरकारी व्यवस्था में आज भी इसका विकल्प नहीं खोजा गया है। दरअसल भ्रष्टाचार के सड़ांध मारते सरकारी सिस्टम को सुधारने के लिए उपर से ही सफाई आवश्यक है, जो असंभव है। सरकार यह नहीं सोचती कि इन नक्सलियांे को जहां से खाद पानी मिल रहा है, उसी व्यवस्था को अगर सुधार दिया जाए तो आने वाले समय में इनके भूखे मरने की नौबत आ जाएगी।

छत्तीसगढ़ में नक्सली पदचाप ने एक बार फिर केंद्र सरकार की नींद में खलल डाल दिया है। खुफिया तंत्र को मिली सूचना के मुताबिक नक्सलियों ने छग मंे अपनी ग्यारहवीं कंपनी तैयार कर ली है। पुलिस महानिरीक्षक की तैनाती के बावजूद भी नक्सली अपने कैडर के प्रशिक्षण के लिए मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट को मुफीद समझ रहे हैं।
खुफिया तंत्र के सूत्रों का कहना है कि नक्सलवादी अपनी सोची समझी रणनीति के तहत अब बियावान जंगलों से निकलकर शहरों में अपना नेटवर्क मजबूत करने की कवायद में जुट गए हैं। छत्तीसगढ़ में हाल ही में चार वारदातों को अंजाम देकर नक्सलियों ने अपने इरादे जग जाहिर कर दिए हैं।

सूत्रों के मुताबिक छत्त्ीसगढ़ के राजनांदगांव और महाराष्ट्र सीमा के गढ़ चिरोली जिलों में एक के बाद एक धमाकों में दोनों ही राज्यों में सक्रिय नक्सलवादियों का आपस में सामंजस्य स्थापित होने की खबरें हैं। वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित जिलों में स्थानीय पुलिस बल और अर्ध सैनिक बलों के बीच तालमेल का अभाव भौगोलिक परिस्थितियों का न समझ पाना भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। इसी बीच नक्सलियों की 11वीं कंपनी की स्थापना की खबर ने खुफिया तंत्र की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। सूत्रों का कहना है कि यद्यपि इसमें नक्सलियों की तादाद काफी कम है फिर भी नक्सलियों की सक्रियता के चलते इसमें भारी मात्रा में स्थानीय युवा सदस्यों के जुड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से 80 से अधिक नक्सलियों की लांजी और बैहर में आमद के संकेत मिले हैं। गौरतलब है कि बालाघाट में टांडा और मलाजखण्ड दलम पहले से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो नक्सलवादियों ने बालाघाट में अपना ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया है, जिसमें प्रशिक्षण लेने बड़ी तादाद में नए जुड़े नक्सली आ रहे हैं।

गौरतलब होगा कि संयुक्त मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ के प्रथक होने से पूर्व) में बालाघाट और मण्डला में नक्सली गतिविधियों के मद्देनजर पुलिस महानिरीक्षक का पद सृजित किया गया था, जिसका मुख्यालय बालाघाट से लगभग ढाई सौ तो मण्डला से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर जबलपुर में रखा गया था, बाद में इसे बालाघाट स्थानांतरित कर दिया गया है। आईजी नक्सल जोन की तैनाती के बावजूद भी बालाघाट में नक्सली प्रशिक्षण केम्प के संचालन की खबरें आश्चर्यजनक ही कही जाएंगी। इसके पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की नक्सलियों ने उनके निवास पर ही नृशंस तरीके से गला रेतकर हत्या कर दी थी।
इससे पहले भी नक्सलियों ने अपनी ताकत का अहसास केंद्र और राज्य सरकारों को करवाया है। कितने अश्चर्य की बात है लोकतंत्र के महाकुंभ के दौरान ही नक्सलवादियों ने रांची से महज सवा सौ किलोमीटर दूर एक रेलगाड़ी का अपहरण कर लिया। वह भी तब जबकि देश पर आतंकवादी खतरा मण्डरा रहा था, और आम चुनाव चल रहे हों। इस घटना से साफ हो जाता है कि हमारे देश में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति क्या है? लातेहार में घटी इस घटना से नक्सलवादियों ने साफ संकेत दे दिया था कि वे अपने प्रभाव वाले इलाकों में अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं। नक्सलियों ने झारखण्ड में रेलगाड़ी पर कब्जा जमाकर सात सौ से ज्यादा यात्रियों को बंधक बनाया, बिहार में बीडीओ के आफिस में बम विस्फोट किया, बीडीओ कार्यालय और चेंबर को बम से उड़ा दिया। इतना ही नहीं बिहार में ही जीटी रोड़ पर आठ ट्रकों को जला कर एक चालक को गोली से उड़ा दिया। पश्चिम बंगाल में तीन सीपीएम कार्यकर्ताओं की हत्या और चार धमाके बारूदी सुरंग से किए। पलामू के उतारी रोड़ रेल्वे स्टेशन पर भी विस्फोट किया।

सरकारी तंत्र की सुरक्षा को भेदकर नक्सलियों ने इस तरह की ध्रष्टता का परिचय दिया है। चुनाव के दौरान भी व्यापक हिंसा कर नक्सलवादियों ने अपने इरादे साफ कर दिए थे, कि वे साहूकारी, जमींदारी के साथ ही साथ सरकारी व्यवस्था के अर्थात लोकतंत्र के भी खिलाफ हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश की सरकारें नक्सलवाद को कानून और व्यवस्था की ही समस्या मानकार उसका निदान करने का प्रयास करती आईं हैं। वस्तुतः इसकी वजह कुछ लोगों के मुख्यधारा से भटककर अव्यवस्थाओं को अस्त्र बनाने से उभरी है।

दशकों से दलित, आदिवासी और सर्वहारा वर्ग जो सामंतशाही के कुचक्र की चक्की में पिसता आया है, को अपनी ताकत बनाकर नक्सली अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं। कंेद्र और राज्यों की सरकारों के खुफिया तंत्र में यह बात उभरकर सामने आ चुकी है कि धनपतियों, राजनेताओं और इन फिरका परस्त ताकतों की जुगलबंदी के चलते ही देश आंतरिक तौर पर अस्थिर हुआ है। इन नक्सलवादियों को कहीं न कहीं राजनेताओं का बेकअप मिला हुआ है। सरकारों को चाहिए कि पुलिस को वर्दी के साथ ही साथ व्यवहारिक होने का पाठ भी पढ़ाएं ताकि मुख्य धारा से भटके इन भारतवंशियों को वापस मुख्यधारा में लाया जा सके।

दिग्गी के मिशन यूपी की सफलता संदिग्ध

दिग्गी के मिशन यूपी की सफलता संदिग्ध

बहुगुणा और मुलायम की राह पर हैं दिग्विजय ंिसंह

सूबों पर आधारित होता है दिग्गी का एजेंडा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय ंिसंह द्वारा मिशन यूपी के लिए कमर कसी जा चुकी है। अपने बयानों से सदा ही चर्चाओं और विवादों रहने वाले कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह एक तरफ हिन्दु वोट बैंक को साधने की जुगत लगा रहे हैं, वहीं दूसरी और उनकी नजर कांग्रेस के हाथ से फिसलते मुस्लिम वोट बैंक पर भी है। हेमवती नंदन बहुगुणा और मुलायम सिंह यादव की तर्ज पर राजा दिग्विजय ंिसंह मिशन यूपी को परवान चढ़ाने में लग गए हैं।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अल्पसंख्यकों को साधने की गरज से इन हमलों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हाथ होने का अप्रत्यक्ष आरोप मढ़ दिया था। दिग्गी का यह तीर उल्टा ही लगा। कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के इस बयान से मुस्लिम तो ज्यादा प्रसन्न नहीं हो सके, उल्टे हिन्दु वोट बैंक जरूर कांग्रेस से दूरी बनाने लग गया।

इस बयान के बाद हिन्दुओं को लुभाने के लिए राजा दिग्विजय ंिसंह ने महाकाल की नगरी उज्जैन जाकर अपना अलग रूप दिखाया। ललाट पर तिलक और कर्मकाण्डी अंदाज में राजा ने खूब वाहवाही बटोरी। ठाकुर राजघराने के सदस्य राजा दिग्विजय सिंह ने दस साल तक मध्य प्रदेश पर राज किया है। उनके बाद सत्ता पर उमा भारती, बाबू लाल गौर और अब शिवराज सिंह काबिज हैं, पर सरकारी मशीनरी आज भी उनके ही इशारों पर मुजरा कर रही है। उज्जैन में जो हुआ वह उन्हें पहले से ही जतला दिया गया था। अफसरान की चेतावनी के बाद भी राजा वहां गए। भाजपा और कांग्रेस में जूतम पैजार हुई, निचले कार्यकर्ता पिटे कुटे। राजा का अपना हिडन एजेंडा सफल रहा।

हिन्दु और मुस्लिम वोट बैंक को साधने में लगे दिग्विजय ंिसंह के कदम ताल देखकर हेमवती नंदन बहुगुणा की याद ताजा हो जाती है, जिन्होंने सवर्ण और मुस्लिम वोट बैंक को एक साथ साधा। फिर उसका अनुसरण किया मुलायम सिंह ने। मुलायम ने मुस्लिमों के साथ यादव वोट बैंक को साध रखा था। अब दिग्विजय ंिसंह द्वारा बेनी वर्मा को कैबनेट मंत्री बनवाकर ओबीसी तो अजीत सिंह से पींगे बढ़ाकर जाट वोट बैंक को कांग्रेस के खाते में गिराने का प्रयास किया जा रहा है। रही बात यूपी के ठाकुरों की तो उसके लिए तो वे खुद ही काफी माने जा रहे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह का खेल निराला है, वे राज्यों के हिसाब से अपनी रीति नीति और एजेंडे का निर्धारण करते हैं।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

युवराज के लिए अब इटैलियन बहू!


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

युवराज के लिए अब इटैलियन बहू!
कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी की उम्र ढलती जा रही है। ज्योतिषियों का कहना है कि वे अभी सात साल और विवाह नहीं कर पाएंगे। राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की पेशानी पर पसीने की लकीरें साफ दिखाई दे रही हैं। पहले राहुल के लिए उत्तर प्रदेश के एक सांसद की बहन का प्रस्ताव रखा गया था, जो परवान नहीं चढ़ सका। विक्कीलीक्स ने एक खुलासा करते हुए कहा है कि राहुल के लिए अब सोनिया अपने पीहर ‘इटली‘ से ही बहू लाने की तैयारी कर रही हैं। नताशा नाम की बाला इटली के एक बड़े व्यवसाई की पुत्री हैं, नताशा के दादा हिन्दुस्तान में रहा करते थे। खुलासे में यह भी कहा गया है कि अमेरिका के एक राजनयिक ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि सोनिया ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी है। राहुल की नताश से मुलाकात 1994 में कैम्ब्रिज की ‘ट्रिनीटी यूनिवर्सिटी‘ में एम.फिल. की पढ़ाई के दौरान हुई थी। खुलासे में आगे कहा गया है कि सोनिया को मशविरा दिया गया है कि राहुल का विवाह इटली में किया जाकर 2014 के चुनावों के बाद आधिकारिक घोषणा की जाए।

कुछ काम न आया अरूण के
कांग्र्रेस के वरिष्ठ और मध्य प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री नेता सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। पिछली बार सुभाष यादव का हटाकर सुरेश पचौरी को मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था, तब सुभाष यादव ने खासा तांडव किया था एआईसीसी में। ऑफ द रिकार्ड न जाने क्या क्या कह डाला था। कहते हैं कि इसी के बाद बारगेनिंग के चलते अरूण यादव को मंत्री बनाया गया। अरूण ने अपने बंग्ले पर जब तब भोज का आयोजन कर लोगों से मेलजोल बढ़ाया गया, उधर हाशिए पर गए सुभाष यादव की पकड़ एआईसीसी में कमजोर पड़ती गई। गौरतलब है कि सुभाष यादव ने एक बार मालवा में रैली कर दिग्गी राजा को भी आईना दिखाया था। अब बारी दिग्गी राजा और सुरेश पचौरी की थी। नतीजा सामने है अरूण यादव एआईसीसी में तो हैं पर बैगर लाल बत्ती के।

अब दुरूस्त हैं एमपी के राजमार्ग!
मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले नेशनल हाईवे की दशा कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्री पद से हटते ही ठीक हो गई। नए निजाम सी.पी.जोशी ने अचानक एसा क्या कर दिया कि रातों रात दशा ही सुधर गई। अरे जनाब! हालत तो पहले से बदतर हैं, बस मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का रोना इस मामले में शांत हो गया है। कमल नाथ ने ढेरों सौगातें दीं मध्य प्रदेश को पर शिवराज सदा ही सौतेले व्यवहार का रोना रोते रहे। अब जोशी ने कमल नाथ द्वारा दी गई सौगातों को एक के बाद एक निरस्त करना आरंभ कर दिया, फंड में कटौती कर दी, पर शिवराज सिंह चौहान इससे खुश ही प्रतीत हो रहे हैं। कमल नाथ के हटते ही एमपी की सड़कें ‘हेमा मालिनी के गाल‘ के मानिंद बन गईं हैं। अगर एसा नहीं है तो भला फिर शिवराज सिंह चौहान अब केंद्र का सड़कों का रोना क्यों नहीं रो रहे हैं?

लालू का 22 लाख का हाथी!
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव के लटके झटके, तौर तरीके अपने आप में अनोखे रहे हैं। उनके मंत्री रहते हुए उनकी इच्छा पर रेल विभाग ने लालू यादव के लिए 22 लाख रूपए खर्च कर एक बुलेट प्रूफ एंबेसेडर कार खरीदी थी। लालू यादव की रूखसती के बाद उनसे जुड़ी हर चीज को अपशकुनी माना जा रहा है। यही कारण है कि उनके बाद ममता बनर्जी ने तो उस कार की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा। अब नए मंत्री को भी उस कार से परहेज ही नजर आ रहा है, लिहाजा 27 माह बाद भी रेल विभाग के पास लालू यादव के उपयोग में आने वाला 27 लाख का हाथी बंधा हुआ है। दरअसल इसका उपयोग ‘जेड प्लस‘ श्रेणी का व्यक्ति ही कर सकता है। रेल विभाग ने गृह विभाग से मिन्नत की है कि इस हाथी को उठाए और इसके बदले चार साधारण एम्बेसेडर कार रेल विभाग को दे दे।

दिग्गी सक्रिय, कांग्रेस सक्रिय!
2003 में कांग्रेस सत्ता से क्या उतरी उसके बाद सुस्सुप्तावस्था में ही चली गई। इसके बाद कांग्रेस का नामलेवा भी मध्य प्रदेश में नहीं बचा। तत्कालीन मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह ने 2003 मंे कौल लिया था कि अगर वे दुबारा कांग्रेस को सत्ता में न ला पाए तो वे दस साल का राजनैतिक वनवास भोगेंगे। राजा के दस साल 2013 में पूरे होने वाले हैं। 2011 के मध्य में राजा ने अपना रंग दिखाना आरंभ किया है। उनकी पसंद के कांग्रेस अध्यक्ष कांति लाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष पद पर अजय सिंह काबिज हैं। एकाएक कांग्रेस के अंदर सुगबुगाहट नजर आने लगी है। कांग्रेसी अब सक्रिय होते दिख रहे हैं। कांग्रेस के मध्य प्रदेश कोटे के क्षत्रप कमल नाथ, सुरेश पचौरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी कांग्रेस को जिला नहीं इसके इतने सालांे में। राजा ने अपनी तय रणनीति के अनुसार अंत के सालों में खुद को सक्रिय किया और नतीजा सबके सामने हैं कांग्रेस सुस्सुप्तावस्था से बाहर निकलकर सक्रिय होती दिख रही है।

यूपी, बिहार को मात देता हृदय प्रदेश
कहा जाता है कि भ्रष्टाचार अगर देखना है तो उत्तर प्रदेश और बिहार चले जाईए। इन दोनों ही सूबों में भ्रष्टाचार की आकंठ गंगा बह रही है। यहां के अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों ने जनता के पैसों को लूटने के तरह तरह के हथकंडे इजाद कर रखे हैं। नए सर्वे में मध्य प्रदेश ने यूपी बिहार को पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल में जमकर मची है लूट। कहा जा रहा है कि कलेक्टरी की ही बोली लगने लगी है। आईएएस में सूबे के मुख्य सचिव रहे आदित्य विजय सिंह, चमड़ा निगम के एमडी एम.एस.मूर्ति, एकेवीएन के एमडी सुधीर रंजन मोहंती, कलेक्टर पन्ना एम.के.सिंह, आईडीए के सीईओ आर.के. गुप्ता, पीएस आवास पर्यावरण उमा कांत सामल, नगर ग्राम निवेश के आयुक्त डी.पी.तिवारी, बंदोबस्त आयुक्त मुक्तेष वार्ष्णेय, कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि के अलावा आईपीएस राजेंद्र चतुर्वेदी और आईएफएस ए.एस.तिवारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जाचं सालों से लंबित हैं।

इस तरह हटे भारद्वाज रास्ते से
पिछले एक साल में दो राज्यों के हवाई जहाज बहुत जल्दी जल्दी दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं एक है एमपी का तो दूसरा कर्नाटक का। दोनों ही इसलिए क्योंकि इसमें सवार महामहिम राज्यपाल अपनी अपनी गोटियां बिठाने में लगे हुए हैं। एमपी के रामेश्वर ठाकुर अपनी सेवावृद्धि तो कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल हंसराज भारद्वाज मुख्यधारा में वापस आना चाह रहे थे। भारद्वाज की नजर कानून मंत्रालय पर थी, प्रधानमंत्री का समर्थन उन्हें था। वीरप्पा मोईली खासे परेशान थे क्योंकि उनकी कुर्सी के पाए हिलने वाले थे। भारद्वाज को कानून मंत्री बनने दस जनपथ ने भी हरी झंडी दे दी थी। इसी बीच भारद्वाज विरोधियों ने सोनिया गांधी के कान भर दिए कि बोफोर्स कांड की क्लोजर रिपोर्ट भारद्वाज ने ही लीक की, क्योंकि यह उनके कानून मंत्री रहते ही तैयार की गई थी। फिर क्या था हो गईं 10, जनपथ की नजरें तिरछीं सलमान खुर्शीद बन गए ला मिनिस्टर और भारद्वाज बन गए ‘लॉ मिनिस्टर इन वेटिंग‘।

15 हजार रूपए प्लेट है पोहा!
मध्य भारत विशेषकर मालवा में ‘पोहा‘ नामक व्यंजन बड़े ही चाव के साथ खाया जाता है। पोहा बनाना इतना आसान है कि हर घर में चुटकियों में ही पोहा बनाकर परोस दिया जाता है। मध्य प्रदेश में पोहे की बात ही कुछ ओर है। इंदौर और भोपाल के बीच सोनकच्छ के ढाबे पर मिलने वाला पोहा एक समय बेहद प्रसिद्ध था। दिल्ली में भी इंदौर के एक युवक ने यमुना पार लक्ष्मी नगर में पोहे की दुकान खोली है, जो खासी चल पड़ी है। अमूमन एक प्लेट पोहा पांच से आठ रूपए के बीच ही मिल जाता है, पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इंदौर में एक प्लेट पोहे की कीमत पंद्रह हजार रूपए चुकानी पड़ी। जी हां! सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान इंदौर में कालानीनगर में पोहे वाले अरविंद यादव के ठेले पर गए और एक प्लेट पोहा खाया। बाद में शिवराज ने अपने स्वेच्छानुदान मद से अरविंद को पंद्रह हजार रूपए की इमदाद मुहैया करवाई। अरविंद अंदर से शिवराज सिंह को दुआ अवश्य ही दे रहा होगा।

शीला की मश्कें कसीं मनमोहन ने
दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित हवा में उड़ रहीं हैं, क्या यह सच है? जी हां! उनकी लगाम कस रहे हैं मनमोहन, जी हां मनमोहन पर ये वजीरे आजम नहीं दिल्ली के लोकायुक्त मनमोहन सरीन हैं। एक फरियाद की सुनवाई के दौरान लोकायुक्त ने शीला पर तल्ख टिप्पणियां करते हुए महामहिम राष्ट्रपति से सिफारिश की है कि वे शीला दीक्षित को आगाह करें कि भविष्य में शीला दीक्षित चुनावों में वोट बटोरने के लिए लुभावने और झूटे वायदों का प्रयोग न करें। दरअसल 2008 के विधानसभा चुनावों में शीला दीक्षित द्वारा दिल्ली के गरीब गुरबों को लुभाने के लिए कहा था कि दिल्ली सरकार के पास साठ हजार मकान ‘राजीव रत्न आवास योजना‘ के तहत बनकर तैयार हैं, जो चुनावों के बाद आवंटित कर दिए जाएंगे। चुनाव हुए दो साल आठ माह का समय बीत चुका है फिर भी आवास बांटे नहीं गए। लोकायुक्त के समक्ष याचिका कर्ता ने आरोप लगया है कि मकान बनना तो दूर अभी इसके लिए जमीन अधिग्रहण का काम भी आरंभ नहीं हो सका है।

अहमद भी शामिल हैं ‘नोट फॉर वोट‘ में
नोट के बदले वोट का मामला अब जोर पकड़ने लगा है। कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस हरकत में आई और उसने पकड़ा धकड़ी तेज कर दी है। इस मामले में पुलिस पूछताछ को ले जाए जा रहे सुहैल हिन्दुस्तानी ने जो तथ्य उजागर किए हैं, वे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाने के लिए पर्याप्त माने जा रहे हैं। सुहैल ने इस मामले में कांग्रेस की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी के राजनैतिक सिपाहसलार अहमद पटेल, अमर सिंह और सांसद रेवती रमण सिंह का नाम लिया है। अमर सिंह का तो शनि भारी चल रहा है, पर साफ सुथरी कालर वाले अहमद पटेल की मुश्किल बढ़ सकती हैं। वे गुजरात से राज्य सभा चुनाव लड़ने वाले हैं। सोनिया के करीबी अहमद का पत्ता अब महासचिव दिग्विजय सिंह के हाथ नजर आ रहा है। दिग्गी राजा चाहेंगे तो इसी दांव मंे अहमद पटेल चारों खाने चित्त हो जाएंगे। वैसे देखना यह भी है कि क्या दिल्ली पुलिस अमर सिंह की कालर तक अपना हाथ पहुंचाने की हिमाकत कर पाएगी?

तीस फीसदी दागी हैं शिवराज!
देश के हृदय प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान भी तीस फीसदी दागी हैं! सुनने में भले ही अचरज लगे किन्तु भाजपा के  केंद्रीय मुख्यालय में इस तरह की चर्चाएं चल पड़ीं हैं। दरअसल किसी अखबार में छपी खबर पर कुछ नेता चर्चा कर रहे थे जिसमें विधानसभा में शिवराज के कबूलनामे का जिकर था कि एमपी में राज्य प्रशासनिक सेवा के 667 अफसरों में से 198 अर्थात तीस फीसदी के खिलाफ लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अन्वेषण या विभागीय जांच आहूत है। नेताओं का कहना है कि राज्य में जिलों को कलेक्टर के बाद राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही चलता है। एसी परिस्थिति में जब कि सूबे में तीस फीसदी अफसरान ही दागी हैं तब शिवराज सिंह को तीस फीसदी दागी मान ही लेना चाहिए। देखा जाए तो यह शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक विफलता ही मानी जाएगी कि उनकी प्रशासनिक पकड़ इतनी ढीली है कि अफसर ही जनता को लूटने में लगे हैं।

प्रणव के आदेश पर धूल डालते जनसेवक!
केंद्र में सबसे ताकतवर मंत्री प्रणव मुखर्जी के आदेशों का उनके ही मातहत सरे राह माखौल उड़ाते नजर आ रहे हैं। अभी जनलोकपाल का जिन्न बोतल के अंदर ही नजर आ रहा है, इसलिए सभी चुप्पी साधे बैठे हैं। अगस्त के माह में जैसे ही यह जिन्न बाहर आएगा वैसे ही जनसेवकों के साथ ही साथ लोकसेवक भी इसकी सुध लेंगे। गौरतलब है कि प्रणव मुखर्जी ने कहाथा कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) लोगों से इस मामले में राय ले, उसका विश्लेषण करे, परीक्षण करे, जैसा कि वह संसद की स्थायी समिति के हर विधेयक के लिए करती है। विडम्बना यह है कि डीओपीटी ने इस बारे में मौन ही साध रखा है। अब जबकि अण्णा हजारे ने 16 अगस्त से अनशन की बात कह ही दी है, तब अगस्त के पहले सप्ताह में इस मामले में गर्मा गर्मी दिख सकती है। संप्रग सरकार के तारण हार प्रणव मुखर्जी को ही डीओपीटी विभाग के आला अधिकारियों ने हल्के में लेना आरंभ कर दिया है तो बाकी की कौन कहे!

पुच्छल तारा
देश में लूट मची है। लूटने वाले बाहर से आए आक्रांता नहीं हैं। हमारे अपने ही लोग हैं। इसी बात को समझाने के लिए मध्य प्रदेश से राकेश बैस ‘कक्कू‘ ने एक बेहतरीन एसएमएस भेजा है। कक्कू लिखते हैं -‘‘नई फिल्म ‘लूट ले इंडिया‘। निर्माता - मनमोहन सिंह। निर्देशक - सोनिया गांधी। हीरो - राहुल गांधी। विलेन - अदिमत्थू राजा। स्क्रिप्ट राईटर - करूणानिधि। कामेडी - लालू यादव, शरद पवार। गेस्ट एपीयरेंसे - बाबा रामदेव, अण्णा हजारे। सपोर्टिंग एक्टर - सुरेश कलमाड़ी, शीला दीक्षित, दयानिधि मारन। संगीत - नीरा राडिया। कोरस - भारतीय जनता पार्टी नीत राजग। पीआरओ - राजा दिग्विजय सिंह। वितरक - बड़े मीडिया घराने। दर्शक - 121 करोड़ भारतवासी।

रविवार, 24 जुलाई 2011

फेरबदल के बाद अब लाट साहेबों की बारी


फेरबदल के बाद अब लाट साहेबों की बारी

पाटिल या भारद्वाज हो सकते हैं एमपी के राज्यपाल!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कंेद्रीय मंत्रीमण्डल विस्तार के बाद अब सूबों के लाट साहेबों को बदलने की कवायद आरंभ हो गई है। मध्य प्रदेश के महामहिम राज्य पाल रामेश्वर ठाकुर, कर्नाटक के हंसराज भारद्वाज, तमिलनाडू के बरनाला, बिहार के देवानंद कुंवर के बारे में केंद्रीय नेतृत्व गंभीरता से विचार कर रहा है। इसमें सबसे ज्यादा असमंजस रामेश्वर ठाकुर को लेकर है। केंद्रीय मंत्रीमण्डल विस्तार के बाद अब भारद्वाज का मुख्य धारा में लौटना असंभव ही प्रतीत हो रहा है।

गौरतलब है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामेश्वर ठाकुर को नवम्बर 2004 में उड़ीसा का राज्यपाल बनाया गया था। 21 जुलाई 2007 को ठाकुर को स्थानांतरित कर उड़ीसा से कर्नाटक भेज दिया गया। जून 2009 में मप्र के राज्यपाल बलराम जाखड़ का कार्यकाल पूरा होने पर ठाकुर को मप्र का राज्यपाल बनाया गया। मध्य प्रदेश के लाट साहेब की कुर्सी संभालते वक्त ठाकुर के पास राज्यपाल के रुप में केवल पांच महिने का समय शेष था। वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा के अनुसार भारतीय संविधान में राज्यपाल के कार्यकाल को लेकर स्पष्ट व्याख्या की गई है कि राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष रहेगा किन्तु वह अपने पद पर तब तक काबिज रह सकता है जब तक नए महामहिम की पदस्थापना न की जाए। इस कानूनी बारीकी का लाभ रामेश्वर ठाकुर को मिला।

उधर हंसराज भारद्वाज की पुनः कानून मंत्री बनने की इच्छा मन में ही दबकर रह गई है। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि भारद्वाज को मध्य प्रदेश का लाट साहब बनाया जा सकता है, इसका कारण यह है कि वे मध्य प्रदेश से राज्य सभा सदस्य भी रहे हैं और वे एमपी की तासीर को पहचानते भी हैं। दस जनपथ के विश्वस्त समझे जाने वाले शिवराज पाटिल को सोनिया गांधी राज्य सभा के रास्ते वापस मुख्य धारा में लाना चाहतीं है, पर वे इसके लिए इच्छुक नहीं बताए जा रहे हैं। पाटिल चाहते हैं कि उन्हें महाराष्ट्र के आसपास राजभवन में पदस्थ कर दिया जाए। मध्य प्रदेश पाटिल के लिए भी मुफीद ही बताया जा रहा है।

. . . मतलब विरोध केवल कमल नाथ का ही था


. . . मतलब विरोध केवल कमल नाथ का ही था

वर्तमान भूतल परिवहन मंत्री से शिवराज को नहीं कोई शिकायत

कमल नाथ द्वारा स्वीकृत सड़कें निरस्त करने पर भी मौन हैं शिवराज!

सी.पी.जोशी से कोई शिकायत नहीं शिवराज को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। बतौर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने मध्य प्रदेश की झोली में अनेकों सौगातें डाली थीं, बावजूद इसके सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा मध्य प्रदेश और दिल्ली यात्रा के दौरान अक्सर ही केंद्र द्वारा सड़कों के मामले में सौतेला व्यवहार करने के आरोप मढ़े जाते रहे हैं। अब जबकि भूतल परिवहन मंत्रालय के वर्तमान निजाम सी.पी.जोशी द्वारा कमल नाथ के द्वारा मध्य प्रदेश को दी गई सौगातें छीन ली गईं हैं तब मध्य प्रदेश सरकार खामोश है, जिससे लगने लगा है कि शिवराज सिंह चौहान को सूबे की सड़कों से ज्यादा कमल नाथ का विरोध करना आवश्यक था।

भूतल परिवहन मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र के सांसद कमल नाथ द्वारा प्रदेश की अनेक सड़कों को नेशनल हाईवे में तब्दील करवाया साथ ही साथ अनेक सड़कों के चौड़ीकरण, सिंगल लेन से टू लेन और फोर लेन की स्वीकृतियां प्रदान की थीं। भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर उन्होंने मध्य प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाने की कार्ययोजना सुनिश्चित की थी। इनमें से कुछ मार्गों पर काम आरंभ कर दिया गया था।

सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि बजट की कमी का हवाला देते हुए विभाग के नए निजाम सी.पी.जोशी ने कमल नाथ के कार्यकाल में स्वीकृत सड़क परियोजनाओं को रोक दिया है। अपने कार्यकाल मेें कमल नाथ ने वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 में अंतर्राज्यीय सड़कों को जोड़ने की मद (आईएससी) में मध्य प्रदेश के लिए 11 राजमार्गों के लिए 137 करोड़ रूपयों की मंजूरी दी थी। इनमें से अनेक मार्ग अधिसूचित हो चुके हैं जिनके निर्माण के लिए प्रशासकीय और तकनीकि स्वीकृति (एएस और टीएस) भी जारी कर टेंडर प्रक्रिया पूरी की जाने के बाद निविदा को धनाभाव के चलते निरस्त करना पड़ा है।

मध्य प्रदेश का इस तरह स्वीकृत हक मारे जाने पर विपक्ष में बैठे भाजपा के सांसद तो मौन साधे हुए हैं किन्तु कांग्रेस के देवास के संसद सदस्य सज्जन सिंह वर्मा मानसून सत्र में अपने संसदीय क्षेत्र में केंद्रीय सड़क निधि (सीआरएफ) के तहत स्वीकृत सड़कों की दो मर्तबा निविदा स्वीकृति के बाद निर्माण कार्य आरंभ न किए जाने का मामला उठाने की तैयारियां कर रहे हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी सदा ही केंद्र के द्वारा सौतेला व्यवहार करने का गाना गाने वाले शिवराज सिंह चौहान का मौन इस ओर इशारा कर रहा है कि पूर्व में जब कमल नाथ भूतल परिवहन मंत्री थे तब उनका विरोध कर वे कमल नाथ पर दबाव बनाना चाहते थे।

सोलहवें सावन में बन जाएगा लाईसेंस


सोलहवें सावन में बन जाएगा लाईसेंस

सोलह साल पूरे होते ही अधिकृत तौर पर दुपहिया से फर्राटे भरेंगे युवा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। युवाओं के बीच दुपहिया वाहनों के बढ़ते क्रेज को देखकर केंद्र सरकार भी व्यवहारिक होती नजर आ रही है। कंेद्र सरकार द्वारा गियर वाले दो पहिया को चलाने के लिए अब आयु सीमा 18 से घटाकर 16 साल करने की तैयारी की जा रही है। इस आशय के प्रस्ताव केंद्र सरकार ने तैयार कर राज्यों को भेजकर उनके मशविरे मांगे हैं। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो नए साल की पहली किरण के आगाज के साथ ही सोलह साल पूरे करने वालों को वाहन चलाने का लाईसेंस मिल जाएगा।

केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि विभाग के पास कुछ गैर सरकारी संगठनों के सुझाव आए थे जिसमें युवाओं में दो पहिया वाहनों के प्रति बढ़ते रूझान को देखकर आयु सीमा कम करने की बात कही गई थी। भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी ने तत्काल इस पर संज्ञान लेते हुए प्रस्ताव तैयार करवाया और फिर राज्यों को भेजकर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया है।

वर्तमान कानून के अनुसार बिना गियर वाले दो पहिया वाहनों के लिए आयु सीमा सोलह साल और गियर वाले वाहनों के लिए अठ्ठारह साल निर्धारित है। इस प्रस्ताव में बिना गियर के लिए पंद्रह तो गियर वाली के लिए सोलह साल आयु करने की बात कही गई है। अमूमन अस्सी फीसदी युवा बिना अनुज्ञा (लाईसेंस) के ही वाहनों को सड़कों पर दौड़ाकर कानून तोड़ते नजर आते हैं। केंद्र सरकार की मंशा है कि युवाओं के इस गैर कानूनी कदम को आयु सीमा घटाकर कानूनी किया जाए। जोशी के करीबियों का कहना है कि युवाओं को मिलने वाली इस सुविधा के चलते अगले आम चुनावों मंे युवाओं का बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ हो सकता है।

नीता को परवाह नहीं घर के सामने की सड़क की!


नीता को परवाह नहीं घर के सामने की सड़क की!

सिवनी छोड़ आधा दर्जन शहरों की बदहाल सड़कें गूंजी विधानसभा में

प्रेम गिनेंगे सड़क के गड्ढे, नीता को नहीं फिकर अपनी विधानसभा की

कमल मस्कोले उठा चुके हैं प्रश्नकाल में मामला: कहा नीता ने

(नंद किशोर जाधव)

भोपाल। विधानसभा में गुरूवार को स्थानीय निकायों की बदहाल सड़कों का मामला जमकर गूंजा। विधानसभाध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान थीं सभापति एवं सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, और जबलपुर, इंदौर, सागर, पन्ना, राघोगढ़ रायसेन आदि जिलों की बदहाल सड़कों पर शोर शराबा होता रहा। इसमें सिवनी शहर जो नीता पटेरिया के विधानसभा क्षेत्र का अहम हिस्सा है की सुध लेने की फिकर उन्हंे खुद नहीं थी।

श्रीमति पटेरिया ने इस संवाददाता से चर्चा के दौरान कहा कि सिवनी शहर की सड़कों के गड्ढ़े बरघाट के विधायक कमल मस्कोले पहले गिन चुके हैं। उन्होंने कहा कि कमल मस्कोले द्वारा प्रश्न काल में सिवनी शहर की सड़कों का मामला उठाया जा चुका है। गौरतलब है कि विधानसभा क्षेत्र सिवनी जो अपने आप में जिला मुख्यालय सिवनी को समाहित किए हुए है, इस लिहाज से सिवनी शहर की जनता के सुख दुख, सुविधाओं आदि की नैतिक जिम्मेवारी मूलतः श्रीमति नीता पटेरिया पर ही आहूत होती है।

श्रीमति पटेरिया ने कहा कि उनके निवास के सामने वाली सड़क (कलेक्टर बंग्ले से एसपी बंग्ले तक) इतनी जर्जर है जिस पर चलना मुश्किल है। श्रीमति पटेरिया ने स्वीकार किया कि यह सड़क निर्माण के साथ ही जर्जर हो गई थी। उल्लेखनीय होगा कि यह सड़क दिल्ली के ‘‘राजपथ‘‘, सोनिया के निवास ‘‘जनपथ‘‘, कांग्रेस कार्यालय ‘‘अकबर रोड़‘‘ या भाजपा के कार्यालय ‘‘अशोक रोड़‘‘ से कम नहीं है।

इस मार्ग के महज एक सौ मीटर के दायरे में ही जिलाधिकारी, जिला पुलिस अधीक्षक, जिला पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला एवं सत्र न्यायधीश, कलेक्टर एसपी कार्यालय, जिला न्यायालय, पुलिस लाईन, वर्तमान विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, कमल मस्कोले, शशि ठाकुर, ठाकुर हरवंश सिंह, पूर्व विधायक डॉ.ढाल सिंह बिसेन, नरेश दिवाकर, टक्कन सिंह मरकाम, विधानसभा में कांग्रेस के उम्मीदवार रहे आशुतोष वर्मा, राज कुमार खुराना, प्रसन्न चंद मालू, जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी, जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन के साथ ही साथ भाजपा का वर्तमान और भविष्य का जिला कार्यालय भी अवस्थित है।

श्रीमति पटेरिया ने कहा कि इस सड़क से संबंधित मामला माननीय न्यायालय में विचाराधीन है। वैसे अगर देखा जाए तो सरकारी स्तर पर इस सड़क का निर्माण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग उनसे विधायक निधि से इस सड़क के निर्माण की बात करते हैं, जो वास्तविक तौर पर संभव नहीं है।

नगर भाजपाध्यक्ष प्रेम तिवारी के 23 जुलाई को शहर के अंदर से होकर गुजरने वाले नेशनल हाईवे पर गड्ढ़े गिनने के अभियान पर श्रीमति पटेरिया ने कहा कि उन्होंने चार माह पहले एनएचएआई के अधिकारियों से इस बावत बात की थी, किन्तु उस समय अधिकारियों द्वारा इस मार्ग के चौड़ीकरण का प्राक्कलन प्राप्त होने की बात कही थी, जिसमें मार्ग के चौड़ीकरण में टूटने वाले भवनों के मुआवजे की कोई व्यवस्था न होने पर पुनरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृति हेतु भेजा गया है। अब एनएचएआई नई कहानी गढ़ रहा है।

पिछले साल सितम्बर माह में विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह द्वारा दलसागर के मुहाने पर बंडोल, छपारा और सिवनी के अंदर से होकर गुजरने वाली सड़क के जीर्णोद्धार के भूमिपूजन जिसमें श्री सिंह ने दो माह पूर्व अर्थात जुलाई 2010 में इसकी प्रशासकीय और तकनीकि स्वीकृति मिलने तथा राशि आवंटित होने की बात कही थी के एक साल बाद भी काम आरंभ न किए जाने के प्रश्न पर श्रीमति पटेरिया द्वारा कोई टिप्पणी नहीं की गई।

व्याप्त चर्चाओं के अनुसार एक तरफ तो नगर भाजपा के युवा और उर्जावान अध्यक्ष प्रेम तिवारी द्वारा शहर के लोगों की सुविधाओं की ओर ध्यान केंद्रित कर सड़कों के गड्ढ़े गिनकर सरकार को चेताने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विधायक श्रीमति नीता पटेरिया द्वारा अपनी ही विधानसभा तो छोड़िए घर के सामने की सड़क को सुधारने का मामला सदन में नहीं उठाया जा रहा है। वस्तुतः सिवनी विधानसभा में आने वाले सिवनी शहर की सड़कों का मामला बरघाट विधायक कमल मस्कोले के बजाए श्रीमति नीता पटेरिया को सदन में उठाना था, जो उन्होंने नहीं किया।

बहरहाल विधानसभा में प्रश्न काल के दौरान जबलपुर के विधायक लखन घनघोरिया द्वारा शहर की सड़कों का मामला उठाया तो विधानसभाध्यक्ष द्वारा स्थानीय शासन मंत्री बाबू लाल गौर से ‘‘गौर‘‘ फरमाने का आग्रह किया। साथ ही साथ जबलपुर में निर्मित सड़कों की गुणवत्ता भी जांचने के लिए मुख्य अभियंता को भेजने की बात गौर ने स्वीकारी। इंदौर में सड़कों से दुखी अश्विन जोशी, पन्ना के लिए राकेश सिंह, दिग्गी राजा के गृह क्षेत्र राघवगढ़ के लिए पुरूषोत्तम दांगी, भगवान सिंह ने रायसेन की सड़कों का मामल उठाया। सागर में तो मंत्री गोपाल भार्गव को ही पहल कर सड़कों का दुखड़ा रोना पड़ा।