रविवार, 21 मार्च 2010

अरूण शोरी पर नज़रें तरेरीं आडवाणी ने

अरूण शोरी पर नज़रें तरेरीं आडवाणी ने
अपने यस मेन्स को टीम गडकरी में फिट करने के बाद अब निशाने पर शौरी
कांग्रेस से पींगे बढाने में लगे हैं शौरी
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली 21 मार्च। संघ की मंशा पर भले ही अपेक्षाकृत युवा नितिन गडकरी को भाजपा की कमान मिल गई हो, और आडवाणी को नेता प्रतिपक्ष से हटाकर पाश्र्व में ढकेलने का प्रयास चल रहा हो, पर आडवाणी तो आडवाणी हैं, उन्होंने टीम गडकरी में अपने चहेतों को स्थान दिलवा ही दिया, भले ही वे रीढ विहीन क्यों न हों। इस आपरेशन से फारिग होने के बाद अब आडवाणी के निशाने पर संपादक से राजनेता बने अरूण शोरी पूरी तरह आ चुके हैं। आडवाणी और उनके समर्थको ने अब शौरी को राज्य सभा के रास्ते संसद में प्रवेश के रास्ते बन्द करने की कवायद आरम्भ कर दी है।
टीम गडकरी के नए नवेले प्रवक्ता बने पांचजन्य के संपादक तरूण विजय और राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी के बीच अन्तरंगता किसी से छिपी नहीं है। एक ओर तरूण विजय ने खुलकर आडवाणी को बेक किया था, तो आडवाणी ने भी तरूण विजय के संक्रमण काल में उनका पूरा साथ दिया। जब पांचजन्य के संपादक के तौर पर काम करते हुए तरूण विजय पर घोटालों के आरोप लगे थे, तब तत्कालीन संघ प्रमुख सुदर्शन ने उन्हें वहां से चलता कर दिया था। आडवाणी ने उस वक्त अपना याराना निभाते हुए तरूण विजय को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ट्रस्ट का निदेशक बनवा दिया।
आडवाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे चाहते थे कि संजय जोशी टीम गडकरी का हिस्सा न बन पाएं सो उन्होंने वह कर भी दिखाया। संजय जोशी के नाम के आते ही उनकी एक कथित सीडी की बात जोर शोर से पार्टी के अन्दर उछाल दी गई। इसी तरह शौरी से नाराज आडवाणी अब चाहते हैं कि शौरी के स्थान पर तरूण विजय को राज्य सभा के रास्ते भेजा जाए। आडवाणी भले ही तरूण विजय को उपकृत करना चाह रहे हों पर संघ और भाजपा के आला नेताओं के पास तरूण विजय के घपले घोटालों का कच्चे चिट्ठे का पुलिन्दा पहुंचाया जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जब आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की तारीफ में मल्हार गाया था, तब भारतीय जनता पार्टी में संजय जोशी और अरूण शोरी ही थे, जिन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया था। बताते हैं तभी से आडवाणी ने ठान लिया था कि माकूल वक्त आने पर राजनैतिक परिदृश्य से दोनों ही नेताओं को मिटा दिया जाएगा। लगता है अब आडवाणी की हसरत पूरी होने का समय आ गया है, यही कारण है कि टीम गडकरी में संजय जोशी और अरूण शौरी दोनों ही को स्थान नहीं मिल सका है।
उधर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रहीं हैं, उनके अनुसार अरूण शौरी इन दिनों कांग्रेस से नजदीकी बढाने के मार्ग खोजने में लगे हुए हैं। बताते हैं चूंकि शौरी को आभास हो चुका है कि उन्हें अब भाजपा द्वारा राज्य सभा में नहीं भेजा जा सकता इसीलिए वे नई संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के मैनेजर शौरी के मामले में दो धडों में बट गए हैं, एक शोरी को कांग्रेस में लाने का हिमायती है, ताकि भाजपा पर वार आसानी से किया जा सके, वहीं दूसरे का मानना है कि कल तक कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसने वाले शोरी को आखिर किस आधार पर कांग्रेस में लाया जाए। इसी बीच कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी को यह समझाने का प्रयास भी जोर शोर से जारी है कि ये वही अरूण शोरी हैं, जिन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफोर्स के मुद्दे को जबर्दस्त हवा दी थी और राजीव गांधी को मुंह की खानी पडी थी।

शनिवार, 20 मार्च 2010

अधोसंरचना विकास में भी भांजी मारी झाबुआ पावर ने

0 घंसोर को झुलसाने की तैयारी पूरी - - - (5)
 
अधोसंरचना विकास में भी भांजी मारी झाबुआ पावर ने 
चार साल में एक फीसदी से भी कम राशि का किया प्रावधान
 
आदिवासियों के हितों पर हो रहा कुठाराघात
 
प्रदेश सरकार को कितनी मिलेगी रायल्टी!
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली 20 मार्च। भगवान शिव का जिला माने जाने वाले मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में थापर ग्रुप ऑफ कम्पनी के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर के बरेला ग्राम में प्रस्तावित 600 मेगावाट के पावर प्लांट के प्रस्ताव में क्षेत्र के अधोसंरचना विकास में भी घालमेल किया जा रहा है। कम्पनी द्वारा आदिवासियों के हितों पर सीधा डाका डालकर स्कूल, उद्यान, अस्पताल आदि की मद में भी कम व्यय किया जाना दर्शाया गया है।
गौरतलब होगा कि इस पावर प्रोजेक्ट में प्रतिदिन दस हजार टन कोयला जलाकर उससे बिजली का उत्पादन किया जाना प्रस्तावित है। झाबुआ पावर लिमिटेड की प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए 300 लोगों को रोजगार दिया जाना प्रस्तावित है। इन तीन सौ लोगों में कितने लोग स्थानीय और कितने स्किल्ड और अनस्किल्ड होंगे इस मामले में कंपनी ने पूरी तरह मौन ही साध रखा है।
केन्द्रीय उर्जा मन्त्रालय के सूत्रों का कहना है कि थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के इस 1200 मेगावाट के पावर प्लांट के प्रथम चरण में 600 मेगावाट का पावर प्लांट लगाया जाना प्रस्तावित है। इस पावर प्लांट में निकलने वाली उर्जा के दुष्प्रभावों को किस प्रकार कम किया जाएगा इस बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई है। इतना ही नहीं इस काम में इतना जबर्दस्त ध्वनि प्रदूषण होगा कि यहां काम करने वाले लोगों को इयर फोन आदि का प्रयोग करना ही होगा। इसके साथ ही साथ आसपास रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोग इसके ताप को सहन कर पाएंगे कि नहीं इस बारे में कहा नहीं जा सकता है।
इस परियोजना के पूरा होने तक चार सालों में अधोसंरचना विकास हेतु महज एक करोड रूपए की राशि प्रस्तावित की गई है, जिसे बहुत ही कम आंका जा रहा है। वैसे यहां पावर प्लांट लगाने वाली कंपनी द्वारा अस्पताल, स्कूल, बाग बगीचे आदि के लिए बहुत कम राशि का प्रावधान किया गया है। जानकारों का कहना है कि इस मद में एक से पांच प्रतिशत तक की राशि का प्रावधान किया जाना चाहिए था, ताकि इस परियोजना से होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने के मार्ग प्रशस्त किए जाकर आदिवासियों को कुछ मुआवजा ही मिल पाता।
मजे की बात तो यह है कि इस पावर प्रोजेक्ट की स्थापना हेतु मध्य प्रदेश सरकार को कितनी रायल्टी मिलने वाली है, इस बात का भी खुलासा नहीं किया गया है। गौरतलब होगा कि हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा उस राज्य में स्थापित होने वाले पावर प्रोजेक्ट पर जितनी रायल्टी वर्तमान में प्रस्तावित है, उससे इतर बिजली उत्पादन होने की दशा में प्रोजेक्ट से एक फीसदी की दर से अतिरिक्त रायल्टी लेने का प्रावधान किया गया है, इस राशि से पावर प्रोजेक्ट की जद में आने वाली ग्राम पंचायतों को गुलजार किया जाना प्रस्तावित है। विडम्बना यह है कि आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर के ग्राम बरेला में लगने वाले इस पावर प्लांट की कुल लागत कितनी है, कंपनी को स्थानीय क्षेत्र या जद में आने वाले गावों के विकास के लिए कितने फीसदी राशि का प्रावधान किया जाना है, राज्य सरकार को कितनी रायल्टी मिलेगी या फिर बिजली उत्पादन होने पर अतिरिक्त रायल्टी कितनी मिलेगी और कब तक मिलती रहेगी, इस बारे में कोई ठोस जानकारी न तो सरकार के पास से ही मुहैया हो पा रही है, और न ही कंपनी द्वारा पारदर्शिता अपनाते हुए बताया जा रहा है।

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

वैक्सीन से मौत!

वैक्सीन से मौत! 
पोलियो की वैक्सीन को लेकर निर्मूल नहीं थीं आशंकाएं
(लिमटी खरे)
मध्य प्रदेश के दमोह जिले में खसरे की वैक्सीन से चार बच्चों की मौत की खबर दर्दनाक और अफसोसजनक ही है। इस मामले को स्थानीय स्तर के बजाए व्यापक और राष्ट्रीय स्तर पर ही देखा जाना चाहिए। एक तरफ सरकार द्वारा पोलियो मुक्त समाज का दावा किया जा रहा है, वहीं जीवन रक्षक वैक्सीन ही अगर जानलेवा बन जाए तो इसे क्या कहा जाएगा। वैसे भी पल्स पोलियो अभियान बहुत ज्यादा सफल नहीं कहा जा सकता है। अफवाहें तो यहां तक भी हैं कि पोलियो की दवा पीने वाले बच्चे योनावस्था में सन्तान उतपन्न करने में अक्षम होते हैं। सरकार के दावों और प्रयासों तथा चिकित्सकों के परामर्श के बाद भी समाज का बडा वर्ग इसके प्रति उत्साहित नज़र नहीं आता है। इन परिस्थितियों में अगर वैक्सीन पीने से बच्चों की मौत की खबर फिजां में तैरेगी तो इसका प्रतिकूल असर पडना स्वाभाविक ही है।
आज देश में पोलियो का घातक रोग रूकने का नाम नहीं ले रहा है। वैसे पिछले कुछ सालों के आंकडे ठीक ठाक कहे जा सकते हैं, पर इन्हें सन्तोषजनक नहीं माना जा सकता है। सत्तर से अस्सी के दशक में तो हर साल दो से चार लाख बच्चे अर्थात देश में रोजाना पांच सौ से एक हजार बच्चे इस दानव का ग्रास बन जाते थे। आज यह संख्या प्रतिवर्ष चार सौ से कम ही कही जा सकती है। चिकित्सकों की राय मेें पोलियो के 1,2 और 3 विषाणु इसके संक्रमण के लिए जवाबदार माना गया है। इस विषाणु से संक्रमित बच्चों में महज एक फीसदी बच्चे ही लकवाग्रस्त होते हैं। सवाल यह नहीं है कि लकवाग्रस्त होने वाले बच्चों का प्रतिशत क्या है, सवाल तो यह है कि यह घातक विषाणु नष्ट हो रहा है, अथवा नहीं।
1988 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के आव्हान पर दुनिया भर के 192 देशों ने पोलियो उन्नमूलन का जिम्मा उठाया था। आज 22 साल बाद भी इस अभियान के जारी रहने का तात्पर्य यही है कि 22 सालों में भी इस विषाणु को समाप्त नहीं किया जा सका है। जाहिर है इसके लिए प्रभावी वैक्सीन की आज भी दरकार ही है। वैक्सीन से बच्चे के अन्दर पोलियो के विषाणु पनपने की क्षमता समाप्त हो जाती है, किन्तु अगर एक भी बच्चा छूटा तो वैक्सीन धारित बच्चे के अन्दर भी विषाणु पनपने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।
भारत सहित पाकिस्तान, नाईजीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों को छोडकर अन्य सदस्य देशों ने 2005 में अपना निर्धारित लक्ष्य पूरा कर लिया था, किन्तु भारत जैसे देश में लाल फीताशाही के चलते यह अभियान परवान नहीं चढ सका। भारत टाईप 2 के विषाणु का सफाया कर चुका था, किन्तु उत्तर प्रदेश और बिहार से एक बार फिर पोलियो के विषाणुओं के अन्य सूबों में फैलने के मार्ग प्रशस्त हो गए। यहां तक कि बंगलादेश, सोमालिया, इण्डोनेशिया, नेपाल, अंगोला आदि समीपवर्ती देशों में पोलियो का जो वायरस पाया गया वह उत्तर प्रदेश के रास्ते इन देशों में पहुंचा बताया गया है।
पिछले साल देश में पोलियो के 610 मामले प्रकाश में आए थे। इनमें सबसे अधिक 501 उत्तर प्रदेश, 50 बिहार, 16 हरियाणा, 13 उत्तरांचल, 7 पंजाब, 6, दिल्ली, 5 महाराष्ट्र के अलावा तीन तीन गुजरात और मध्य प्रदेश, असम में दो तथा चण्डीगढ, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखण्ड में एक एक मामला प्रकाश में आया था। देश की स्वास्थ्य एजेंसियां दावा करती आ रहीं थीं कि 2010 के आते ही देश पोलियो से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। 2010 आ भी गया और पोलियो का साथ चोली दामन सा दिख रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की एक नोडल एजेंसी के प्रतिवेदन के अनुसार त्रिपुरा के एक जिले में तो 95 फीसदी तो देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में चालीस फीसदी बच्चे खुराक पीने का चक्र ही पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
पोलियो के दानव के इस घातक रूप के बावजूद भी न तो केन्द्र और न ही राज्यों की सरकरों की नीन्द टूटी है। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में खसरे की वैक्सीन से चार बच्चों की मौत के बाद अब लोगों का वैक्सीन पर से भरोसा उठना स्वाभाविक ही है। दरअसल दमोह जिले में पिछले साल खसरे से अनेक बच्चों की मौत हुई थी, इसीलिए इस साल सावधानीवश बच्चों को खसरे की वैक्सीन देने का काम व्यापक स्तर पर किया गया। सभी अपने आंखों के तारों को खसरे से बचाने के लिए वैक्सीन पिलवाने गए। इनमें से कुछ बच्चों की तबियत बिगडी और उनमें डायरिया के लक्षण दिखने लगे। बताते हैं कि यह सब एक ही केन्द्र पर हुआ। इसके बाद बच्चों को अस्पताल में दाखिल कराया गया। इनमें से तीन की उसी रात तो एक की अगली सुबह मृत्यु हो गई।
इसके बाद जिम्मेदारी हस्तान्तरण और थोपने का अनवरत सिलसिला जारी है। मध्य प्रदेश सरकार का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह इस मामले की गहराई से छानबीन कर जिम्मेदारी किसकी थी, इसका पता करे। अब तक का इतिहास साक्षी है कि जब भी कोई जांच की या करवाई जाती है, तो उसमें लीपा पोती कर दी जाती है। यह मामला आम आदमी से जुडा हुआ है। इसमें गांव के निरक्षर ग्रामीण का विश्वास डिग सकता है। केन्द्र और राज्य सरकारें कहने को तो आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही ज्यादा संजीदा होने का स्वांग रचती हैं, पर इस मामले में उन्हें पूरी ईमानदारी से संजीदगी दिखानी ही होगी, वरना गांव के आम आदमी का आने वाले दिनों में महात्वाकांक्षी सरकारी स्वास्थ्य योजनओं पर से विश्वास उठ जाएगा और वह सरकारी अस्पताल या चिकित्सक के पास जाने के बजाए एक बार फिर नीम हकीमों के हत्थे ही चढ जाएगा।

झाबुआ पावर की जनसुनवाई पर भी लगे प्रश्नचिन्ह

0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी - - - (4)
झाबुआ पावर की जनसुनवाई पर भी लगे प्रश्नचिन्ह 

क्षेत्रवासियों को पता ही नहीं और हो गई जनसुनवाई
पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर 5 दिन पहले डली थी रिपोर्ट
कम्पनी और सरकारी मुलाजिमों की भूमिका सन्दिग्ध
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली 19 मार्च। देश की मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के करीब डाले जाने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट की शुरूआती सरकारी कार्यवाही में हुई गफलत एक के बाद एक उभरकर सामने आती जा रहीं हैं। पिछले साल पावर प्लांट के लिए आदिवासी बाहुल्य घंसौर में हुई जनसुनवाई के दौरान ही अनेक अनियमितताएं प्रकाश में आई थीं, किन्तु रसूखदार कम्पनी की उंची पहुंच और लक्ष्मी माता की कृपा से जनसुनवाई तो निर्विध्न हो गई किन्तु ग्रामीणों में रोष और असन्तोष बना हुआ है।
पर्यावरण मन्त्रालय के सूत्रों का दावा है कि इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया में क्षेत्रीय पर्यावरण के प्रभावों का अवलोकन कर इसका प्रतिवेदन एक माह तक परियोजना स्थल के अध्ययन क्षेत्र और दस किलोमीटर त्रिज्या वाले क्षेत्र की समस्त ग्राम पंचायतों के पास अवलोकन हेतु होना चाहिए। जब यह प्रतिवेदन ग्राम पंचायत को उपलब्ध हो जाए उसके उपरान्त गांव गांव में डोण्डी पिटवाकर आम जनता को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही साथ पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर इसे डाला जाना चाहिए।
मजे की बात यह है कि पर्यावरण विभाग की मिली भगत के चलते 22 अगस्त को होने वाली जनसुनवाई का प्रतिवेदन 5 दिन पूर्व अर्थात 17 अगस्त 2009 को पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर मुहैया करवाया गया। बताया जाता है कि जब जागरूक नागरिकों ने हस्ता़क्षेप किया तब कहीं जाकर इसे वेव साईट पर डाला गया था। महज पांच दिनों में इस प्रतिवेदन के बारे में व्यापक प्रचार प्रसार नहीं हो सका, जिससे इसमें व्याप्त विसंगतियों के बारे में कोई भी गहराई से अध्ययन नहीं कर सका।
इस पूरे खेल में सरकारी महकमे के साथ मिलकर मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर के ग्राम बरेला में डलने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट हेतु ताना बाना बुना गया है। इस खेल में आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है, और सिवनी जिले के आदिवासियों के हितों के कथित पोषक बनने का दावा करने वाले जनसेवक हाथ पर हाथ रखे तमाशा देख रहे हैं। जनसुनवाई के उपरान्त न जाने कितने विधानसभा सत्र आहूत हो चुके हैं और न जाने कितने संसद सत्र ही, अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रश्न पर प्रश्न दागने वाले जनसेवकों की इस मामले में अरूचि समझ से परे ही है।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

पहला ही दावं फुस्स निकला गडकरी का

पहला ही दावं फुस्स निकला गडकरी का 
असन्तोष का लावा फटने लगा है गडकरी के खिलाफ
नागपुर से बैठकर दिल्ली को कब्जे में करना चाह रहे हैं भाजपा के नए निजाम
बिना रीढ के लोगों को तवज्जो मिली है टीम गडकरी में
(लिमटी खरे)
महाराष्ट्र सूबे के एक साधारण कार्यकर्ता से उठकर भारतीय जनता पार्टी के सिंहासन पर आरूढ होने वाले नितिन गडकरी का नाम जैसे ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चला, सभी चौंक गए थे। संघ के वरदहस्त के चलते उनकी ताजपोशी भी हो गई। जब लोगों ने गडकरी की उमर और पहनावा देखा तो लोगों को लगा कि आने वाले समय में भाजपा अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदलने जा रही है। गडकरी अपेक्षाकृत युवा अध्यक्ष और कुर्ता पायजामा या धोती कुर्ता से इतर आज के परिवेश के हिसाब से पतलून कमीज पहनने के आदी हैं। शायद ही कोई हो जिसने गडकरी को नेतागिरी की परंपरागत पोषाक में देखा हो।
देखा जाए तो नितिन गडकरी स्वयं भी जनाधार वाले नेता नहीं कहे जा सकते हैं। कल तक विदर्भ की राजनीति करने वाले एक शख्स को अनायास ही उठाकर राष्ट्रीय परिदृश्य में बिठा दिया जाए वह भी मुखिया बनाकर तो उसे अपने आप को इसके अनुरूप ढालने में समय लगना लाजिमी है। चाहे जो भी हो पर एक बात तो उभरकर सामने आ ही गई है कि गडकरी को भले ही दिल्ली में धसके किले की कमान सौंपी गई हो पर वे नागपुर का अपना मोह नहीं छोड पा रहे हैं। अध्यक्ष बनने की अनाधिकारिक घोषणा के उपरान्त उनका ज्यादा से ज्यादा समय नागपुर में ही बीता है। नागपुर में संघ का मुख्यालय भी है, मगर यह इतर बात है। देखा जाए तो गडकरी को अपना समय दिल्ली सहित अन्य सूबों में ही बिताना चाहिए था, वस्तुत: जो गडकरी ने किया नहीं।
इसके अलावा भले ही गडकरी मिशन 2014 लेकर चल रहे हों, पर उनके अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा की धार वैसी ही बोथरी नज़र आ रही है, जैसी कि पहले थी। केन्द्र सरकार नित नए मामले दे रही है, विपक्ष को जिनको मुद्दा बनाकर भाजपा चाहे तो सडकों पर उतर सकती है। मंहगाई ही एक एसा मुद्दा है, जिस पर कांग्रेस को घेरा जा सकता है। भाजपा के साथ विडम्बना यह है कि अब भाजपा में रीढ विहीन लोगों को कमान सौंपी गई है, जिससे आम जनता के साथ जुडने की बात उनके जेहन में आ ही नहीं रही है। भाजपा के पिछले चन्द सालों के आचरण को देखकर यह कहा जा सकता है कि भाजपा द्वारा अब भी एसा ही माना जा रहा है कि वह सत्ता में है, और चारों ओर रामराज्य है।
बहरहाल टीम गडकरी को देखकर साफ लगने लगा है कि भाजपा अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तैयार किए गए रोडमेप पर सवारी गाठने को तैयार है। पार्टी के संसदीय बोर्ड में मुसलमानों की जिस कदर उपेक्षा और हिन्दुत्व के लिए आग उगलने वाले वरूण गांधी को जिस तरह का वजन दिया गया है, उससे साफ हो गया है कि भाजपा अब हिन्दुत्व के मुद्दे को जोरदारी से उठाने की तैयारी में है। लोग यह अवश्य ही कह रहे हों कि भाजपा अपने गांधी (वरूण) को कांग्रेस के गांधी (राहुल) की काट के लिए तैयार कर ही है, पर राहुल के सामने वरूण का कद और सोच काफी बौनी ही नज़र आती है।
महिलाओं के मामले में टीम गडकरी ने बाजी मार ली है। 13 महिलाओं को आसनी प्रदान कर गडकरी ने महिलाओं मेें एक अच्छा सन्देश देने का प्रयास किया है, किन्तु दूसरी ओर राजस्थान की पूर्व निजाम वसुंधरा राजे को महासचिव जैसी महती जवाबदारी देकर नितिन गडकरी खुद की बखिया उधडवाने से नहीं बच पाएंगे। वसुंधरा राजे वे ही हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के न केवल संगीन आरोप लगे थे, वरन उन्होंने पार्टी के संसदीय बोर्ड के आदेशों को धता बताते हुए विधायक दल के नेता का पद नहीं छोडा था। ये वे ही वसुंधरा हैं, जिन्होंने भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को नाकों चने चबवा दिए थे। इसी तरह विनय कटियार जो कल तक भाजपा के खिलाफ जहर उगल रहे थे, उन्हें महत्वपूर्ण आसन दिया गया है। वहीं भाजपा के थिंक टेंक रहे पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद सिंह पटेल की भी गडकरी ने उपेक्षा की है। माना जा रहा था कि प्रहलाद पटेल की सकारात्मक सोच का लाभ पार्टी को मिल सके इसलिए उन्हें संसदीय बोर्ड में स्थान दिया जाना चाहिए था।
वैसे टीम गडकरी पहले की तुलना में काफी जवान दिख रही है। इसमें अनेक क्षत्रों को पूरी तरह उपेक्षित रखा जाना समझ से परे ही है। बिहार जहां इस साल चुनाव होने हैं, वहां से पर्याप्त नेतृत्व नहीं दिख रहा है। दक्षिण और पूर्वोत्तर भी कमजोर ही प्रतीत हो रहा है। दक्षिण से अनन्त कुमार के अलावा किसी और को नहीं लिए जाने के प्रतिकूल परिणाम पार्टी को भुगतना पड सकता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश से अलबत्ता दो महसचिव बना दिए गए हैं, माना जा रहा है कि मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को काबू में करने इस तरह का काम किया गया हो। वैसे भी शिवराज सिंह चौहान का कद एकाएक राष्ट्रीय परिदृश्य में बढता प्रतीत हो रहा है। उधर मुक्त कंठ से नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करने के बाद भी उन्हें संसदीय बोर्ड में स्थान न देने का कारण समझ से ही परे है।
देखा जाए तो टीम गडकरी में वरूण गांधी, नवजोत सिंह सिद्धू, सरोज पाण्डे, वाणी त्रिपाठी, मुरली धर राव, धर्मेन्द्र प्रधान जैसे युवा तो विजय गोयल, अनन्त कुमार, थांवर चन्द गहलोत, अर्जुन मुण्डा, नरेन्द्र तोमर, जगत प्रसाद जैसे अनुभवी लोगों का शुमार है। पर एक बात अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर नितिन गडकरी को ग्लेमर की मदद लेने की क्या जरूरत पड गई। भीड जुटाने वाली ड्रीम गर्ल हेमा मलिनी को उपाध्यक्ष तो छोटे पर्दे की अदाकारा स्मृति ईरानी को सचिव बनाया गया है। इसके अलावा किरण खेर और शायना एनसी को कार्यकारिणी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। रूपहले पर्दे के इन अदाकारों के साथ भीड तो जुटाई जा सकती है, किन्तु भीड को वोट में तब्दील करने की जादुगरी के लिए गडकरी को मंझे हुए चाणक्य ही चाहिए होंगे, जिनकी कमी साफ तौर पर परिलक्षित हो रही है।
गडकरी ने किसके कहने पर इस तरह की टीम का गठन किया है, इस बात को वे ही बेहतर जानते होंगे किन्तु टीम गडकरी की घोषणा के साथ ही अब इसके खिलाफ असन्तोष का लावा खदबदाने लगा है। लोग दबी जुबान से यह भी कह रहे हैं कि जिन लोगों को टीम गडकरी में उपकृत किया गया है, वे जनाधार विहीन लोग ही हैं, और इनके सहारे 10 फीसदी वोट बैंक बढाने की बात सोचना भी बेमानी ही होगा। महासचिव और उपाध्यक्ष की फेहरिस्त में ही आधा दर्जन राज्य सभा सदस्य हैं। थांवर चन्द गहलोत और विजय गोयल लोकसभा तो धर्मेन्द प्रधान विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। योग्य और सक्षम लोगों के बजाए जिन लोगों को टीम गडकरी में स्थान मिला है, उससे असन्तोष पनपना स्वाभाविक ही है, अब देखना यह है कि इस सबसे संघ के मानस पुत्र नितिन गडकरी कैसे निपट पाते हैं।

क्या इससे पर्यावरण नहीं होगा प्रदूषित!

क्या इससे पर्यावरण नहीं होगा प्रदूषित!
घंसौर के पावर प्लांट से पानी होगा प्रदूषित
बरगी बांध में जम जाएगी जबर्दस्त सिल्ट
कहां हैं पर्यावरण के ठेकेदार!
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 मार्च। देश की नामी गिरामी कंपनियों में शुमार थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से महज 100 किलोमीटर दूर आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर में स्थापित किए जाने वाले पावर प्लांट से नर्मदा नदी पर बने रानी अवन्ती बाई सागर परियोजना (बरगी बांध) पर पानी के जबर्दस्त प्रदूषण का खतरा मण्डराने लगा है। अगर यह संयन्त्र यहां स्थापित कर दिया जाता है तो इस प्लांट से उडने वाली राख से बरगी बांध की तलहटी में कुछ माहों के अन्दर ही ढेर सारी सिल्ट जमा हो जाएगी और पानी प्रदूिZषत होने की संभावना बलवती हो जाएगी। इससे आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर के निवासियों को स्वांस की समस्याओं से दो चार भी होना पड सकता है।
केन्द्रीय उर्जा मन्त्रालय के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि इस मध्य प्रदेश सरकार और झाबुआ पावर लिमिटेड के बीच हुए 1200 मेगावाट के पावर प्लांट के करार के प्रथम चरण में कंपनी द्वारा अभी सिवनी जिले के ग्राम बरेला में 600 मेगावाट का पावर प्लांट प्रस्तावित है। इस पावर प्लांट के लिए आवश्यक जलापूर्ति बरगी बांध के सिवनी जिले के जल भराव क्षेत्र गडघाट और पायली से की जाएगी।
सूत्रों ने आगे कहा कि प्रस्तावित संयन्त्र द्वारा प्रतिदिन 853 टन राख उत्सर्जित की जाएगी, जिसे बायलर के पास से ही एकत्र किया जा सकेगा। समस्या लगभग 1000 फिट उंची चिमनी से उडने वाली राख (फ्लाई एश) की है। इससे रोजना 3416 टन राख उडकर आसपास के इलाकों में फैल जाएगी। 1000 फिट की उंचाई से उडने वाली राख कितने डाईमीटर में फैलेगी इस बात का अन्दाजा लगाने मात्र से सिहरन हो उठती है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी ने अपने प्रतिवेदन में हवा का रूख जिस ओर दर्शाया है, संयन्त्र से उस ओर बरगी बांध है।
जानकारों का कहना है कि 3416 टन राख प्रतिदिन उडेगी जो साल भर में 12 लाख 46 हजार 840 टन हो जाएगी। अब इतनी मात्रा में अगर राख बरगी बांध के जल भराव क्षेत्र में जाएगी तो चन्द सालों में ही बरगी बांध का जल भराव क्षेत्र मुटठी भर ही बचेगा। यह उडने वाली राख आसपास के खेत और जलाशयों पर क्या कहर बरपाएगी इसका अन्दाजा लगाना बहुत ही दुष्कर है। इस बारे में पावर प्लांट की निर्माता कंपनी ने मौन साध रखा है।
इतना ही नहीं प्रतिदिन बायलर के पास एकत्र होने वाली 853 टन राख जो प्रतिमाह में बढकर 26 हजार 443 और साल भर में 3 लाख 11 हजार टन हो जाएगी उसे कंपनी कहां रखेगी, या उसका परिवहन करेगी तो किस साधन से, इस बारे में भी झाबुआ पावर लिमिटेड ने चुप्पी ही साध रखी है।
इतनी सारी विसंगतियों के बावजूद भी 22 अगस्त को घंसौर में हुई जनसुनवाई में किसी भी बात को रेखांकित नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि कंपनी ने सरकारी नुमाईन्दो और जनसेवकों को `कीप मम` (शान्त रहने) के एवज में अपेक्षा से अधिक उपकृत किया है, यही कारण है कि पर्यावरण के नुकसान और मानव स्वभाव पर पडने वाले प्रतिकूल प्रभावों को जानबूझर इनके द्वारा उपेक्षित ही किया जा रहा है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

थापर ग्रुप के लिए बन रही हैं, चमचमाती सडकें

थापर ग्रुप के लिए बन रही हैं, चमचमाती सडकें

झाबुआ पावर प्लांट में होगा इन सडकों से कोयला सप्लाई

सिवनी जिले की सडकों के उड जाएंगे धुरेZ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की जानी मानी थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज को लाभ दिलाने के लिए देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात को चमचमाता फोरलेन में तब्दील करने का इन्तजाम किया जा रहा है। वैसे भी मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से महज सौ किलोमीटर दूर बनने झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्लांट की प्रोजेक्ट रिपोर्ट में ही अनेक विसंगतियां होने के बाद भी न तो मध्य प्रदेश सरकार ने ही उसकी ओर ध्यान दिया और न ही केन्द्र सरकार के आला अधिकारियों की नज़रें ही इस पर इनायत हो रही हैं।

केन्द्रीय कोयला मन्त्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि यद्यपि अभी तक झाबुआ पावर लिमिटेड के लिए कोल लिंकेज का अलाटमेंट नहीं किया गया है, फिर भी झाबुआ पावर लिमिटेड ने अपना कोल परिवहन अनूपपुर स्थित कोयला खदान से किया जाना दर्शाया है। इस मामले में सबसे रोचक तथ्य यह है कि कंपनी ने अपना कोल परिवहन रेल मार्ग से किया जाना प्रस्तावित किया गया है। सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील के बरेला ग्राम में प्रस्तावित इस पावर प्लांट के लिए कोयला ब्राड गेज से अनूपपुर से जबलपुर लाया जाएगा, इसके उपरान्त इसे अनलोड कर नेरो गेज में पुन: लोड कर घंसोर लाया जाएगा।

कंपनी की इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट में अनेक तकनीकि पेंच हैं, जिन्हें पूरी तरह से नज़र अन्दाज ही किया गया है। अव्वल तो यह कि अगर ब्राड गेज से कोयला अनूपपुर से ढुलकर जबलपुर आ भी गया तो जबलपुर के ब्राड गेज के यार्ड से उसे नेरो गेज के यार्ड तक कैसे लाया जाएगा। या तो उन्हें ब्राड गेज के यार्ड से नैरो गेज के यार्ड तक लाईन बिछानी पडेगी या फिर ट्रक के माध्यम स ेनैरो गेज तक ढोना पडेगा। इतना ही नहीं आने वाले समय में जब बालाघाट से जबलपुर अमान परिवर्तन का काम आरम्भ हो जाएगा तब नैरो गेज की पटरियां उखाड दी जाएंगी, एसी परिस्थिति में फिर कोयला परिवहन का वैकल्पिक साधन बच जाएगा सडक मार्ग। वैसे भी लोडिंग अनलोडिंग की प्रक्रिया झाबुआ पावर लिमिटेड के लिए काफी खर्चीली और समय की बरबादी वाली ही होगी।

झाबुआ पावर लिमिटेड के भरोसेमन्द सूत्रों का कहना है कि कंपनी द्वारा अन्त में सडक मार्ग से ही कोयले की सप्लाई की कार्ययोजना बनाई जा रही है। इसके लिए बडे ट्रांसपोर्टर्स को भी तलाशा जा रहा है। आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील के बरेला के इस प्रस्तावित पार प्लांट के लिए 32 लाख टन कोयला का परिवहन प्रतिवर्ष अनूपपुर से घंसौर तक होना प्रस्तावित है। हाल ही में रीवा से लखनादौन तक के राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात के हिस्से को भी फोल लेन में तब्दील किए जाने का प्रस्ताव आया है। कहा जा रहा है कि थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के दवाब में आकर केन्द्र सरकार द्वारा इस मार्ग की मरम्मत और इसे चौडा करने की कार्ययोजना बनाई है।

सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) सदा ही एक बात का रोना रोती रहती है कि देश की सडकें उसके द्वारा निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार नहीं बन पाती हैं, और जितना भार उन पर चलना चाहिए उससे कहीं ज्यादा भार परिवहन और पुलिस महकमे की कृपा से चलता है, इन परिस्थितियों में सडकों की दुर्दशा होना स्वाभाविक ही है। डर तो इस बात का है कि जब वर्तमान में लखनादौन से घंसोर मार्ग जर्जर हाल में है तब थापर ग्रुप ऑफ कंपनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के बरेला में प्रस्तावित संयन्त्र में लाखों टन कोयला परिवहन किया जाएगा तब तो अधमरी सडकों के धुर्रे उडने में समय नहीं लगेगा।

आईपीएल के मैच फ्लड लाईट के बजाए दिन में क्यों नहीं

घर फूंक, मोहल्ला रोशन करना क्या समझदारी है!

आईपीएल के मैच फ्लड लाईट के बजाए दिन में क्यों नहीं

आज भी अंधेरे की जद में हैं चालीस फीसदी घर

(लिमटी खरे)

भारत देश को आजाद हुए बासठ साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इन बासठ सालों में देश का आम आदमी ब्रितानी बर्बरता तो नहीं भोग रहा है, पर स्वदेशी जनसेवकों की अदूरदशीZ नीतियों के चलते नारकीय जीवन जीने पर अवश्य मजबूर हो चुका है। एक आम भारतीय को (जनसेवकों और अमीर लोगों को छोडकर) आज भी बिजली, पानी साफ सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल सकी हैं। सरकारी दस्तावेजों में अवश्य इन सारी चीजों को आम आदमी की पहुंच में बताया जा रहा हो पर जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। कमोबेश पचास फीसदी से अधिक की ग्रामीण आबादी आज भी गन्दा, कन्दला पानी पीने, अंधेरे में रात बसर करने, आधे पेट भोजन करने एवं शौच के लिए दिशा मैदान (खुली जगह का प्रयोग) का उपयोग करने पर मजबूर ही है।

इन परिस्थितियों में भारत में आईपीएल 20 - 20 क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। फटाफट क्रिकेट के इस आयोजन में कुछ मैच दिन में रखे गए हैं, किन्तु अधिकांश मैच रात गहराने के साथ ही आरम्भ होंगे। जाहिर है, इन मैच के लिए सैकडों फ्लड लाईट का इस्तेमाल किया जाएगा। कहने का तातपर्य यह कि रात गहराने के साथ ही जब लोगों के दिल दिमाग पर हाला (शराब) का सुरूर हावी होता जाएगा, वैसे वैसे नामी गिरामी क्रिकेट के सितारे अपना जौहर दिखाएंगे। दर्शक भी अधखुली आंखों से इस फटाफट क्रिकेट का आनन्द उठाते नज़र आएंगे।

जनवरी से लेकर अप्रेल तक का समय अमूमन हर विद्यार्थी के लिए परीक्षा की तैयारी करने और देने के लिए सुरक्षित रखा जाता है। सवाल यह उठता है कि जब देश के भविष्य बनने वाले छात्र छात्राएं परीक्षाओं की तैयारियों में व्यस्त होंगे तब इस तरह के आयोजनों के ओचित्य पर किसी ने प्रश्न चिन्ह क्यों नहीं लगाया। क्या देश के नीति निर्धारक जनसेवकों की नैतिकता इस कदर गिर चुकी है, कि वे देश के भविष्य के साथ ही समझौता करने को आमदा हो गए हैं।

एक अनुमान के अनुसार देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी महज चार से छ: घंटे ही बिजली मिल पाती है, तब फिर आईपीएल में खर्च होने वाली बिजली को बचाकर उसे देश के ग्रामीण अंचलों के बच्चों की पढाई और कृषि पैदावार के लिए क्यों नहीं दिया जाता है। बात बात पर न्यायालयों में जाकर जनहित याचिका लगाने वाली गैर सरकारी संस्थाओं की नज़रों में क्या यह बात नहीं आई। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आई भी होगी तो उन्हें इस मामले में अपने निहित स्वार्थ गौड ही नज़र आ रहे होंगे तभी उन्होंने भी खामोशी अिख्तायार कर रखी है।

यह बात सत्य है कि अगर मैच रात में खेले जाते हैं तो उसमें दिन की अपेक्षा दर्शकों के आने की उम्मीद ज्यादा ही होती है। इससे आयोजकों और प्रायोजकों को खासा लाभ होता है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु अगर विपक्ष में बैठे जनसेवक या भारत सरकार चाहती तो क्या आयोजकों पर बिजली बचाने का दबाव नहीं बनाया जा सकता था। इसका उत्तर 100 में से 100 लोग ही सकारात्मक अर्थात हां में देंगे। ये मेच दिन में भी आयोजित किए जा सकते थे।

इस आयोजन से हो सकता है सरकारी खजाने में करोडों रूपयों की अकस्मात वृद्धि दर्ज की जाए, सरकार और जनसेवकों के साथ ही साथ आयोजकों और प्रायोजकों की माली हालत इससे सुधरे, किन्तु नफा नुकसान देखना सरकार का काम हो सकता है, पर अगर रियाया को कष्ट में रखकर नफा नुकसान का खेल खेला जाए तो उसे कहां तक उचित ठहराया जा सकता है। इस तरह के आयोजन से तो वही कहावत चरितार्थ होती है कि मोहल्ले को रोशन करने के लिए अपना ही घर फूंक दिया जाए।

वैसे भी ग्रीन पीस के स्टिल वेटिंग प्रतिवेदन में साफ कहा गया है कि िग्रड आधारित भारत की वर्तमान विद्युत वितरण प्रणाली में असमानता का खामियाजा देशवासी ही भुगत रहे हैं। आज भी देश के चालीस फीसदी गांवों में बिजली का करंट नहीं पहुंच सका है। गांव में आज भी गौ धूली की बेला (शाम को गाय जब वदीZ से वापस लौटतीं हैं, तो उनके पैरों से उडने वाली धूल) के साथ ही लालटेन के कांच की सफाई राख से की जाना आरम्भ कर दिया जाता है।

कहते हैं कि भारत देश गांव में बसता है, पर गांव की असलियत क्या है, इस बात से जनसेवकों को कोई इत्तेफाक नहीं है। आजाद भारत के गांवों में आज भी देश के भविष्य लालटेन के मद्धिम प्रकाश में ही पढकर अपनी आंखे फुडवाने पर मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर जनसवकों के आलीशान निजी और सरकारी आवास में एयर कण्डीशनर जब हवा फैंकते हैं तो इन सारी समस्याओं के कारण उनकी पेशानी पर आने वाला पसीना शीतल हवा में तुरन्त ही सूख जाता है। ये हालात तब हैं जबकि पिछले दो दशकों में बिजली के उत्पादन में 162 फीसदी की वृद्धि हुई है। इतनी बढोत्तरी के बाद भी अगर समस्या जस की तस है, तो निश्चित तौर पर इसके लिए विद्युत वितरण प्रणाली को ही दोषपूर्ण माना जाएगा।

बहरहाल, केन्द्र सरकार और विपक्ष में बैठे जनसेवकों के साथ ही साथ सूबों की सरकार को भी चाहिए कि वे अपने राजस्व की चिन्ता के साथ ही साथ अपनी रियाया की चिन्ता भी अवश्य करें। राजस्व के बढने से जनता को मिलने वाली सुविधाओं में इजाफे की बात तो अब इतिहास की बातें हो गईं हैं, क्योंकि जैसे ही सरकारी कोष में वृद्धि होती है, वैसे ही जनसेवक अपने को मिलने वाली सुविधाओं में जबर्दस्त इजाफा करवा लेते हैं। इसका एक उदहारण यह भी है कि अनेक सरकारी नौकरियों में अब भर्ती के साथ ही यह प्रावधान कर दिया गया है कि शासकीय सेवक साठ साल की उम्र को पाने के साथ ही सेवानिवृत्ति के उपरान्त पैंशन का हकदार नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर चाहे सांसद हो या विधायक महज पांच साल के कार्यकाल के बाद उसकी पैंशन न केवल बरकरार है, वरन हर साल उसमें वृद्धि होती है। जब भी इस तरह का प्रस्ताव संसद या विधानसभा में आता है, सभी सदस्य आपसी भेदभाव छोडकर मेज थपथपाकर उसका स्वागत कर अपने सुनहरे भविष्य के मार्ग प्रशस्त करने से नहीं चूकते हैं।

मंगलवार, 16 मार्च 2010

घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी

घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी
थापर ग्रुप के पावर प्लांट डलने के मार्ग प्रशस्त
जनसेवकों का मौन सन्दिग्ध
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली 16 मार्च। देश की ख्यातिलब्ध थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के एक प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा मध्य प्रदेश के सिवनी जिले की आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील को झुलसाने की तैयारी पूरी कर ली है। पिछले साल 22 अगसत को बिना किसी मुनादी के गुपचुप तरीके से घंसौर में सम्पन्न हुई जनसुनवाई के बाद अब इसकी औपचारिकताएं लगभग पूरी कर ली गईं हैं। इसे जल्द ही केन्द्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय के पास भेजा जाने वाला है। गौरतलब है कि झाबुआ पावर प्लांट कंपनी द्वारा मध्य प्रदेश सरकार के साथ मिलकर सिवनी जिले की घंसौर तहसील के बरेला ग्राम में 1200 मेगावाट का एक पावर प्लांट लगाया जा रहा है। इसके प्रथम चरण में यहां 600 मेगावाट की इकाई प्रस्तावित है। कोयला मन्त्रालय के सूत्रों का कहना है कि इस कंपनी को अभी कोल लिंकेज प्रदान नहीं किया गया है।
केन्द्रीय उर्जा मन्त्रालय के भरोसेमन्द सूत्रों ने बताया कि इस परियोजना के लिए 3.20 एमटीपीए से अधिक के ईंधन की आवश्यक्ता होगी एवं इस संयन्त्र में पानी की आपूर्ति रानी अवन्ति बाई सागर परियोजना जबलपुर, (बरगी बांध) के सिवनी जिले के भराव वाले इलाके गडघाट और पायली के समीप से किया जाना प्रस्तावित है। यह परियोजना प्रतिघंटा 3262 मीट्रिक टन पानी पी जाएगी। सूत्रों का कहना है कि इस संयन्त्र का बायलर पूरी तरह कोयले पर ही आधारित होगा। इसके लिए कोयले की आपूर्ति साउथ ईस्टर्न कोलफील्उ लिमिटेड के अनूपपुर, शहडोल स्थित खदान से की जाएगी।
कंपनी के सूत्रों का कहना है कि थापर ग्रुप की इस महात्वाकांक्षी परियोजना के लिए 360 एकड गैर कृषि एवं मात्र 20 एकड कृषि भूमि का क्रय किया गया है। सरकार से 220 एकड भूमि भी लिया जाना बताया जाता है। कहते हैं कि जिन ग्रामीणों की भूमि खरीदी गई है उन्हें भी मुंह देखकर ही पैसे दिए गए हैं। कहीं कंपनी को जमीन अमोल मिल गई है तो कहीं अनमोल कीमत देकर। कंपनी के सूत्रों ने आगे बताया कि कंपनी ने जिन परिवारों की भूमि अधिग्रहित की है, उन परिवारों के एक एक सदस्य को नौकरी दिए जाने का प्रावधान भी किया गया है। वहीं चर्चा यह है कि स्थानीय लोगों को या जमीन अधिग्रहित परिवार वालों को अनस्किल्ड लेबर के तौर पर नौकरी दे दी जाएगी, और शेष बचे स्थानों पर बाहरी लोगों को लाकर संयत्र को आरम्भ कर दिया जाएगा।
इस समूचे मामले में सिवनी जिले के जनसेवकों की चुप्पी आश्चर्यजनक है। इस संयन्त्र की चिमनी लगभग एक हजार फिट उंची होगी, जिसके अन्दर कोयला जलेगा। यहां उल्लेखनीय होगा कि संयन्त्र से निकलने वाली उर्जा और कोयले की तपन को सह पाना आसपास के ग्रामीणों और जंगल में लगे पेड पौधों के बस की बात नहीं होगी। इसके लिए न तो मध्य प्रदेश सरकार को ही ठीक ठाक मुआवजा मिलने की खबर है, और न ही आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील के निवासियों के हाथ ही कुछ राहत लग पा रही है। कहा जा रहा है कि झाबुआ पावर लिमिटेड कंपनी द्वारा जनसेवकों को शान्त रहने के लिए उनके मंह पर भारी भरकम बोझ रख दिया है, ताकि घंसौर को झुलसाने के उनके मार्ग प्रशस्त हो सकें।

अब मैया को कैसे प्रसन्न करें प्रणव दा!

अब मैया को कैसे प्रसन्न करें प्रणव दा!
आसमान छूती मंहगई में कैसे हो व्रत और मां की पूजा अर्चना
बंगाल में माता पूजन का रहता है सबसे ज्यादा जोर
(लिमटी खरे)
 
नवरात्र का आज पहला दिन है। चहुं ओर माता के जयकारे गूंज रहे हैं। पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता में माता की पूजा अर्चना का जबर्दस्त जोर रहता है। देश आज मंहगाई की आग में झुलस रहा है। आम आदमी की थाली से दाल और अन्य भोजन सामग्री तेजी से गायब होती जा रही है। देश के वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी पश्चिम बंगाल से हैं, तो वे माता की पूजा अर्चना के महत्व को बेहतर ही जानते होंगे, किन्तु आम आदमी की दुश्वारियों से शायद वे परिचित दिखाई नहीं पड रहे हैं। देश में नवरात्र के पहले दिन ही आम आदमी की कमर टूट चुकी है। माता रानी को खुश करने के लिए वृत रखने वाले लोग आज मंहगे फलाहार से सहमे हुए हैं तो दूसरी ओर मैया दाई के श्रृंगार के लिए पूजा की थाली भी रीती ही नज़र आ रही है।
पिछले एक पखवाडे में ही पूजन सामग्री और फलाहार की कीमतों में जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया है। नवरात्र आते ही फलों की बढी मांग से इनकी कीमतों में भी तेजी आई है। उपवास करने वाले लोगों की पहली पसन्द सेब, अंगूर, केला, पपीता आदि की कीमतों में 15 से 25 रूपए की बढोत्तरी को साधारण कतई नहीं माना जा सकता है। थोक फल मण्डी में भी इन फलों में पांच सौ रूपए प्रति िक्वंटल से अधिक की वृद्धि प्रकाश में आई है।
आज चिल्हर बाजार में ठेलों पर घरों घर जाकर बिकने वाले फलों में पपीता 20 से 25 रूपए किलो, सेब 70 से 100 रूपए किलो, अंगूर 50 से 60 रूपए तो काले अंगूर 70 से 90 रूपए प्रति किलो बिक रहे हैं। इतना ही नहीं सन्तरा 25 रूपए किलो और छोटा सन्तरा 25 रूपए दर्जन, केला 25 से 30 रूपए दर्जन, चीकू भी 25 रूपए किलो की दर से बिक रहा है।
हिन्दु धर्म में उपवास में अन्न का सेवन वर्जित माना गया है, इसलिए इसके स्थान पर कुछ अन्य जिंसों का सेवन किया जाता है। इन फलाहारी वस्तुओं के दामों में रिकार्ड तेजी आई है। एक किलो की दर अगर देखी जाए तो मूंगफली दाना 60 रूपए, सिंघाडे का आटा 100 रूपए, साबूदाना 80 रूपए, मखाना 350 रूपए, आलू के चिप्स 150 रूपए की दर से बाजार में बिक रहे हैं। रही बात दूध से बने उत्पादों की तो उनकी कीमतों का क्या कहना। दूध ही आज 30 रूपए लीटर, दही 55 रूपए किलो, पनीर 175 रूपए, खोवा 175 रूपए की दर से बाजार में उपलब्ध है। पूजा के लिए प्रयुक्त होने वाले कपूर, धूप, अगरबत्ती, तेल आदि ने आसमान की ओर रूख किया हुआ है।
पिछले साल सितम्बर में शारदेय नवरात्र से अगर तुलना की जाए तो सिंधाडे का आटा 60 रूपए, साबूदाना 50 रूपए, आलू के चिप्स 75 रूपए, मखाना 255 रूपए, पनीर 110 रूपए, और सेंधा नमक या जिसे फरारी नमक भी कहते हैं, वह 14 रूपए बिक रहा था, जो अब चेत्र की नवरात्र में 15 रूपए की दर से उपलब्ध है।
अगर देखा जाए तो आम आदमी की औसत आय भारत में पचास रूपए से भी कम है। इस मान से आम आदमी माता के उपवास कर माता रानी को कैसे प्रसन्न कर पाएगा यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। सरकार में बैठे जनसेवकोें की अनाप शनाप बढी पगार और मिलने वाली अन्य सुख सुविधाओं के चलते उन्हें आम आदमी की दुश्वारियों का एहसास नहीं हो पाता है, पर सच्चाई यही है कि आम आदमी किस तरह जीवन यापन कर रहा है, यह प्रश्न विचारणीय ही है।
आदि अनादि काल से ही माता दुगाZ को शक्ति का रूप माना गया है। चाहे वह आम आदमी हो या डाकू सभी माता के उपासक हैं। कहा जाता है कि माता की सवारी शेर है, जो सबसे अधिक ताकतवर होता है। शेर को काबू में कर उसकी सवारी करने वाली माता की उपासना इस बार आम आदमी के लिए काफी कठिन साबित हो रही है, इसका कारण केन्द्र में बैठी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जनविरोधी नीतियां ही कही जाएंगी। जमाखोरों, सूदखोरों को प्रश्रय देने और अपने निहित स्वार्थों को साधने के चक्कर में संप्रग सरकार के मन्त्री और विपक्ष में बैठे जनसेवक आम जनता की सुध लेना ही भूल गए।
अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, जबकि पेट्रोल या डीजल की कीमतें जरा सी बढने पर भारतीय जनता पार्टी, के साथ ही साथ वाम दलों की भवें तन जाती थीं, और विरोध में विपक्षी दल सडकों पर उतर आते थे। आज आलम यह है कि केन्द्र सरकार मनमानी तरीके से कीमतें बढाती जा रही है, और विपक्ष में बैठे जनसेवक चुपचाप उन्हें जनता के साथ किए जाने वाले इस अन्याय को मूक समर्थन दे रहे हैं।
लोगों को उम्मीद थी कि अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री डॉ. मन मोहन सिंह इस मामले में कुछ पहल करेंगे किन्तु वे भी मौन साधे ही बैठे हैं। रही बात वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी की तो माना जा रहा था कि वे बंगाल से सियासत में उतरे हैं अत: माता रानी की उपासना के महत्व को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे, क्योंकि बंगाल में माता की उपासना का अलग महत्व है, पर विडम्बना है कि वे भी अपनी ``राजनैतिक मजबूरियों`` में इस कदर उलझे कि उन्हें भी माता रानी की उपासना से मंहगाई के कारण वंचित होने वाले भक्तों की भी कोई परवाह नहीं रही। अगर आलम यही रहा तो आने वाले दिनों में लोग अपनी उपासना को सांकेतिक तौर पर मनाने पर मजबूर हो जाएंगे।

सोमवार, 15 मार्च 2010

कांग्रेस के चाणक्य का राजनैतिक सूर्य अस्ताचल की ओर!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
कांग्रेस के चाणक्य का राजनैतिक सूर्य अस्ताचल की ओर!
बीसवीं सदी में देश प्रदेश की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरे कांग्रेस के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह की स्थिति उनके ही चेलों ने बहुत जर्जर करके रख दी है। कल तक जिस राजनैतिक बियावन में अर्जुन सिंह ने गुरू द्रोणाचार्य की भूमिका में आकर अपने अर्जुन रूपी शिष्यों को तलवार चलाना सिखाया उन्ही अर्जुनों ने कुंवर साहेब के आसक्त होते ही तलवारें उनके सीने पर तान दी। कुंवर अर्जुन सिंह के लिए सबसे बडा झटका तब लगा जब इस बार उन्हें केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल में शामिल नहीं किया गया। अब कुंवर साहेब के सरकारी आवास के छिनने की भी बारी आने वाली है। इस साल मई में उनका राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने वाला है। कुंवर साहेब को दुबारा राज्य सभा में नहीं भेजा जाएगा इस तरह के साफ संकेत कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र सोनिया गांधी के आवास दस जनपथ ने दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि अर्जुन सिंह के शिष्य दिग्विजय सिंह को अर्जुन सिंह के स्थानापन्न कराने की योजना बनाई जा रही है। यद्यपि दिग्गी राजा ने दस साल तक कोई चुनाव न लेने का कौल लिया है, पर अगर आलाकमान का दबाव होगा तो वे राजी हो सकते हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश में कांग्रेसाध्यक्ष सुरेश पचौरी को पांचवीं मर्तबा पिछले दरवाजे अर्थात राज्य सभा से भेजा जा सकता है, इतना ही नहीं सूबे की नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी का नाम भी राज्यसभा के लिए लिया जा रहा है। वैसे केन्द्र में बैठे प्रतिरक्षा मन्त्री ए.के.अंटोनी,, उद्योग मन्त्री आनन्द शर्मा, खेल मन्त्री एम.एस.गिल, वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश और सबसे खराब परफार्मेंस वालीं अंबिका सोनी भी इस साल राज्यसभा से रिटायर हो रहीं हैं, अत: उनके पुनर्वास के लिए अर्जुन सिंह के स्थान पर इनमें से किसी एक को पुन: राज्यसभा में भेजा जा सकता है।
अंधेरे की जद में है चालीस फीसदी शाईनिंग इण्डिया
भारत में सियासी दल कभी शाईनिंग इण्डिया तो कभी भारत निर्माण का नाम लेते हैं, पर जमीनी हालातों के बारे में जानकारी के लिए किसी भी जनसेवक ने कभी पहल नहीं की है। असली भारत गांव में बसता है, यह बात उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात। बावजूद इसके गंाव की ओर रूख करने में न जाने जनसेवकों को पसीना क्यों आ जाता है। ग्रीन पीस की स्टिल वेटिंग रिपोर्ट जाहिर करती है कि िग्रड आधारित वर्तमान विद्युत प्रणाली में सरकारी असमानता के चलते आजादी के 62 सालों के बाद भी आज देश के चालीस फीसदी गांवों में बिजली किसे कहते हैं, इस बात से ग्रामीण अनिभिज्ञ ही हैं। बिजली उत्पदान में लगातार बढोत्तरी और कार्बन उत्सर्जन के बावजूद भी ग्रामीण इलाकों के चालीस फीसदी घरों में लोग अब भी अंधेरे में रहने को मजबूर हैं। यह आलम तब है जबकि पिछले दो दशकों में बिजली का उत्पादन 162 फीसदी बढा है। जनसेवकों के घर अगर गांव में भी हैं तो उन्होंने अपनी सुविधा के हिसाब से ट्रसफार्मर, इन्वर्टर या जनरेटर की व्यवस्था की हुई है, सच ही है उन्हें जनादेश देने वाली जनता की सुध उन्हें पांच साल बाद ही आएगी न।
कहां है एनआईए का कार्यालय
देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के बाद केन्द्र सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन कर केद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल बनाने का प्रयास किया जा रहा हो, पर कोई नहीं जानता है कि इसका प्रधान कार्यालय (हेड आफिस) कहां है। बताते हैं कि केन्द्र सरकार द्वारा अब तक एनआईए को कार्यालय खोलने के लिए जगह तक मुहैया नहीं कराई गई है। नार्थ ब्लाक स्थित गृह मन्त्रालय से अपना कामकाज आरम्भ करने वाला एनआईए पिछले दिनों तक एनआईए दिल्ली के इन्दिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास सेन्तूर होटल के 13 कमरों को किराए पर लेकर काम कर रहा था, जिसे आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा रिक्त किया गया था। बताते हैं कि इसके लिए सीबीआई के वर्तमान कार्यालय को आवंटित करने का प्रस्ताव है। गौरतलब है कि नकली नोट और पूर्वोत्तर के आतंकवाद के आरम्भिक हमलो की जांच में एनआईए ने जबर्दस्त सफलता हासिल भी की थी।
शायद ही लौटें साईबेरियन बगुले
साईबेरियन क्रेन अर्थात साईबेरियन बगुलों को अब हिन्दुस्तान की आबोहवा रास नहीं आ रही है। पिछले लगभग एक दशक से इन बगुलों ने हिन्दुस्तान की ओर रूख नहीं किया है, जो पर्यटकों के लिए बुरी खबर हो सकती है। गौरतलब है कि साईबेरियन बगुले राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव पक्षी अभ्यरण में आया करते थे। इसके अलावा समूचे भारत में इन बगुलों को 2001 के उपरान्त नहीं देखा गया है। भारत में इन बगुलों को संरक्षित पक्षी का दर्जा भी प्राप्त है। एक युवा साईबेरियन बगुले की उंचाई 91 इंच और वजन लगभग 10 किलो तक हो सकता है। भारत का रास्ता भूलने के दो कारण ही समझ में आ रहे हैं, अव्वल तो शिकारी की गिद्ध नज़र इन पर सदा ही रहा करतीं हैं, दूसरे 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी और बमबारी ने इन बगुलों को रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया था, यही कारण है कि 2001 के बाद इन बगुलों ने भारत की ओर रूख नहीं किया है।
यह है महामहिम आवास का हाल सखे
देश के पहले नागरिक का आवास कहलाता है रायसीना हिल्प पर सीना ताने खडा महामहिम राष्ट्रपति का सरकारी आवास। इस आवास की सुरक्षा चोबीसों घंटे संगीनों के साए में होती है, बावजूद इसके अगर यहां चोरी हो जाए तो क्या कहा जाएगा, देश के आखिरी आदमी की सुरक्षा के बारे में कैसे चिन्ता की जा सकेगी। महामहिम के आवास में पिछले साल तीन सितम्बर को चोरी की वारदात हुई थी। हेल्थ सेंटर से तीन डंबल, कंप्यूटर सहित कुछ सामान चोरी हुआ था। इसकी एफआईआर बाकायदा चाणक्यपुरी के थाने में दर्ज है। देश के पहले नागरिक के सराकरी आवास जहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता वहां से कोई सामान चोरी हो जाए तो इसे आंख से काजल चुराना ही कहेंगे, और आप ही फैसला करें कि छ: महीने बीतने के बाद भी कोई सुराग न लगे तो फिर ``आपकी सुरक्षा में सदा आपके साथ``` का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस को क्या कहा जाए। सच ही है जब पूरे कुंए में ही भांग घुली हुई है तो फिर अंजाम . . . .।
पेपर की बचत का नायाब आईडिया
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन देश की एक जानी मानी सेलुलर कंपनी ``आईडिया`` के विज्ञापनों में जब तब नज़र आ ही जाते हैं। कभी आदमी को नाम के बजाए नंबर से पहचानने में तो कभी कुछ और। हाल ही में अभिषेक आईडिया के पेपर बचाओ अभियान में नज़र आ रहे हैं। एक बरगद के झाड बने अभिषेक कागज बचाने का सन्देश देते नज़र आते हैं विज्ञापनों में। पहले आरपीजी फिर टाटा, बिरला, एटीएण्डटी जिसे लोग बटाटा भी कहते थे हुआ करती थी आईडिया कंपनी। मजे की बात तो यह है कि कागज बचाने के लिए पेड न काटने का सन्देश देने वाली बटाटा यानी आईडिया कंपनी के जितने भी रिचार्ज बाउचर आते हैं वे सब पेपर पर ही आते हैं। है न मजे की बात कि एक तरफ पेपर बचाने की दुहाई और दूसरी तरफ पेपर की जबर्दस्त बरबादी। रिचार्ज कराने के उपरान्त वह कागज किस काम का रहता है। इसके अलावा आईडिया सहित सभी सेलुलर कंपनियों के विज्ञापनों में कागज और फ्लेक्स का जिस कदर इस्तेमाल किया जाता है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। इन सबे उपयोग के बाद क्या रह जाती है इनकी अहमियत। जाहिर है उसे कचरे में ही फेंक दिया जाता है। फिर काहे की पेड या कागज बचाने की मुहिम।
मोदी फिर हुए ताकतवर
भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी के दरबार में हाजिरी न लगाने के लिए चर्चित रहे गुजरात के निजाम नरेन्द्र मोदी का कद कम नहीं हुआ है। आज भी वे उतने ही ताकतवर हैं, जितने कि पहले हुआ करते थे, या यह कहा जाए कि मोदी का कद बढा है, अतिश्योक्ति नहीं होगा। गडकरी द्वारा आश्चर्य जनक रूप से अडवाणी की जगह अब मोदी को प्रधानमन्त्री पद का असली दावेदार बताकर सभी को चौंका दिया है। एक निजी चेनल को दिए साक्षात्कार में गडकरी ने यह कहकर थमे पानी में कंकर मार दिया है कि भले ही प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार का फैसला संसदीय बोर्ड करेगा पर उनकी नज़र में मोदी ही सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। जानकारों का कहना है कि मोदी की प्रशंसा कर गडकरी ने एक तीर से अनेक शिकार कर डाले हैं। सबसे पहले तो वे उमर दराज आडवाणी को किनारे करना चाह रहे हैं, फिर राहुल गांधी की काट युवा को आगे लाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि उनके कार्यकाल में कम से कम एक बार तो केन्द्र में भाजपा सत्तारूढ हो जाए। कुछ लोगों का कहना है कि मोदी ने गडकरी को अन्दर ही अन्दर इतना पस्त कर दिया है कि अब गडकरी बिना मोदी एक कदम भी चलने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। भले ही सुषमा स्वराज मोदी को पीछे कर शिवराज सिंह चौहान को आगे बढाना चाह रहीं हों पर मोदी इस सब पर भारी पडते ही दिख रहे हैं।
गोमाता की जय हो, पर क्या हुआ शीला जी . . .!
गाय हमारी माता है, इसकी सेवा करना चाहिए, यह बात सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने अनेक बार कही है। यही नहीं कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी एक समय में गाय और बछडा हुआ करता था। इस बात को अभी तीस साल से ज्यादा समय नहीं बीता है, किन्तु कांग्रेस की ही दिल्ली सरकार की निजाम शीला दीक्षित इस सबको शायद भूल चुकी हैं। कामन वेल्थ गेम्स के दौरान विदेशी महमानों को खुश करने और उनकी क्षुदा शान्त करने के लिए दिल्ली सरकार ने निर्णय लिया है कि विदेशी मेहमानों के खाने के मेन्यू में पांच सितारा होटलों में गौ मांस को परोसा जाएगा। यह बात तब सामने आई जब राष्ट्रवादी सेना ने इसके विरोध में आन्दोलन छेडने का निर्णय लिया। सेना के पार्टी प्रमुख जयभगवान गोयल का कहना है कि कामन वेल्थ गेम्स के दौरान विदेशी मेहमानों की आवभगत में गोमांस परोसने के दिल्ली सरकार के निर्णय ने हिन्दु धर्मावलंबियों की भावनाओं को आहत किया है, अत: इसके खिलाफ आन्दोलन छेडा जाएगा। वाह री कांग्रेस, आखिर क्यों न करे वो एसा सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की बागडोर इतालवी मूल की सोनिया गांधी के हाथ जो है, जिनकी गोमाता के प्रति संवेदना समझी जा सकती है।
 और मन्त्री ने खुद ही मांग ली चौथ!
नेता, मन्त्री, विधायक, सांसद या कोई भी जनसेवक हो, आम जनता भली भान्ति जानती है कि वो कितना पाक साफ होता है, और जबरिया वूसली में कितना उस्ताद होता है। दिल्ली के तुगलक रोड थोन में एक मामला दर्ज कराया गया है, जिसमें केन्द्रीय मन्त्री के नाम से जबरिया वसूली की शिकायत दर्ज की गई है। केन्द्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण मन्त्री सुबोध कान्त सहाय के नाम से किसी ने जमकर चौथ वसूली है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि सहाय की आवाज में उक्त ठग ने लोगों को जमकर चूना लगाया है। ठगी का शिकार हुए एक व्यक्ति ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि वह आवाज जिसके माध्यम से पैसा मांगा गया था, वह सुबोध कान्त सहाय की ही थी, इसमें कोई शक नहीं है। कहते हैं कि उक्त ठग द्वार दस से साठ हजार रूपए तक की राशि अपने आईसीआईसीआई के बैंक एकाउंट मे जमा करवाई जाती थी। अब ठगी के शिकार अनेक लोग पोल खुलने के डर से किसी से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं।
स्वागत योग्य है शिवराज का सुझाव
मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने मांग की है कि एक हजार और पांच सौ के नोट का प्रचलन बन्द होना चहिए। चौहान का कहना है कि इससे देश में नकली नोटों का प्रचलन कम हो सकेगा। वैसे चौहान के सुझाव में दम है, क्योंकि सौ, पचास, या दस बीस के नोट को छापने में किसी को कोई ज्यादा लाभ नहीं होगा, इसलिए नकली नोटों का चलन वैसे भी कम ही हो जाएगा। इसके साथ ही साथ भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगने की उम्मीद है। अगर देखा जाए तो देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार रूपए से क्या वास्ता। एक आम भारतीय सौ दो सौ रूपए दिन में ही खर्च कर पाता है, फिर हजार और पांच सौ के नोट का चलन अखिर है किस के लिए। जाहिर है कि बडे हवाला या एकाउंट को स्थानान्तरित करने के लिए भ्रष्टाचारियों और सेठ साहूकारों को सुविधा देने के लिए इन नोटों को प्रचलन में लाया गया है।
बेपरवाह टोल टेक्स के ठेकेदार!
देश भर में प्रधानमन्त्री ग्रामीण सडक योजना और एनएचएआई की मद में सडकों का जाल बिछाया जा रहा है। इन सडकों को बनाओ, कमाओ और सरकार के हवाले करो अर्थात बीओटी आधार पर बनाया जा रहा है। इन सडकों पर कर वसूली के लिए टोल नाके बनाए गए हैं। इन नाकों पर सरकारी वाहनों, सांसद, विधायक आदि को कर से छूट प्रदान की गई है। इतना ही नहीं अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी इससे मुक्त रखा गया है। मध्य प्रदेश में भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र से लगे होशंगाबाद में टोल टेक्स वसूली के ठेकेदार द्वारा सारे नियम कायदों को ताक पर रखा जा रहा है। एक अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार द्वारा बताया गया कि वे अपने वाहन से पंचमढी जा रहे थे, तभी रास्ते में होशंगाबाद के करीब टोल नाके पर अपना सरकारी अधिमान्यता परिचय पत्र दिखाने के बाद भी ठेकेदार के गुर्गों द्वारा रसीद नंबर 203441 के माध्यम से 72 किलोमीटर के लिए 29 रूपए की राशि वसूल ली गई। इतना ही नहीं आगे पहुंचने पर पिपरिया से पंमढी के लिए फिर ठेकेदार के गुर्गों द्वारा सरीस नंबर 189269 के माध्यम से 22 रूपए का टोपा पहना दिया गया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि विधायक सांसदों को जेब में रखने वाले इस तरह के ठेकेदारों द्वारा जमकर मलाई काटी जा रही है।
पुच्छल तारा
हैदराबाद से रोहित सक्सेना मेल भेजते हैं कि जब दिल्ली में आंखों की जांच कराने गए तीन आतंकवादी फरार हो गए, तब जबर्दस्त हंगामा मचा। उनका कहीं पता नहीं चला। जब पुलिस आयुक्त ने जवाबदार कर्मचारियों को बुलाकर वास्तविकता जाननी चाही तो उनमें से एक ने धीरे से मंह छिपाते हुए कहा -``जनाब, आप कतई चिन्ता न करें, उनकी आंखों की जांच की रपट अपने पास है, आप परवाह न करें, वे अपनी जांच रिपोर्ट लेने आखिर आएंगे तो हमारे पास ही. . . !

शनिवार, 13 मार्च 2010

शलभ भदौरिया मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के पुन: अध्यक्ष बने

शलभ भदौरिया मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के पुन: अध्यक्ष  बने

मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के दो दिवसीय 18वें महाधिवेशन में त्रैवाषिZक चुनाव (वर्ष 2010-2013) सम्पé हुये, जिसमें सवाZनुमति से शलभ भदौरिया को पुन: अध्यक्ष निवाZचित घोषित किया गया। उनके नाम की घोषणा मुख्य निवाZचन अधिकारी ठाकुर विक्रम सिंह और सहायक निवाZचन अधिकारी अंबादत्त भारती ने की।
ठाकुर विक्रम सिंह द्वारा अध्यक्ष घोषित किये जाने के बाद श्री भदौरिया को उनकी नई कार्यकारणी बनाने का अधिकार दिया गया। जिस पर साधारण सभा में श्री भदौरिया ने नई कार्यसमिति सर्वसम्मति से घोषित की।
नई कार्यसमिति में सर्वश्री शरद जोशी उपाध्यक्ष एवं कार्यकारी अध्यक्ष रतलाम, वेदान्ती ित्रपाठी उपाध्यक्ष एवं कार्यकारी अध्यक्ष सतना, राजकुमार दुबे मुरैना, के.के. अगिन्होत्री भोपाल, कैलाश देवलिया सागर सभी उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष शिशुपाल सिंह तोमर भोपाल, महासचिव नलिनकान्त बाजपेयी जबलपुर, विष्णु वमाZ ´विद्रोही` प्रहलाद चौकसे इन्दौर, सुरेश शमाZ ग्वालियर, डॉ. सुखदेव मिश्रा सागर, सचिव रिजवान अहमद सिद्दीकी कटनी, संयुक्त सचिव- सुशील जैन नरसिंहपुर, रोमा अग्रवाल झाबुआ, मो. अली शहडोल, मेहमूद अली चिश्ती हरदा, प्रहलाद भदौरिया भिण्ड, श्रीकुमार कपूर सतना, सुनील गौतम दमोह, सन्दीप शमाZ मुरैना, आकाश दीक्षित मण्डला, डी.के. जैन ग्वालियर, संगठन सचिव- वीरेन्द्र वशिष्ठ शिवपुरी सर्वसम्मति से निवाZचित घोषित किये गये।
कार्यसमिति में सर्वश्री रमेश गुप्ता ´मोर` दतिया, उपेन्द्र गौतम, मुरैना, एन.पी. अग्रवाल, अरशद अली खान भोपाल, परमानन्द पाटिल खण्डवा, विजय सिंह सीधी, राजेश रागी छतरपुर, नरेन्द्र बजाज दमोह, ए.पी. गोस्वामी सिंगरौली, विमल मूथा झाबुआ, पुष्पेन्द्र पाण्डे गंधवानी धार, रमेश झारखरिया ग्वालियर, श्री गोपाल गुप्ता मुरैना, जोगेन्द्र सेन, रघुनाथ सिंह पवार इन्दौर, राजू जमनानी, होशंगाबाद, सुनील वमाZ शाजापुर, प्रदीप गर्ग ग्वालियर, प्रदीप माण्डले ग्वालियर, रमेन्द्र पाण्डे रीवा, रफीक खान जबलपुर, विवेक निगम रायसेन, सन्दीप मिश्रा डिण्डोरी, राजीव श्रीवास्तव गुना, ओ.पी. शमाZ अशोक नगर तथा विशेष आमंित्रत सदस्य जहीर उल्ला खान पठान, मधुसूदनगढ (गुना) उमेश बागरेचा, बालाघाट, अनिल श्रीवास्तव, भोपाल निवाZचित घोषित कये गये। युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष के रूप में टी.वी. 24 के साथी हषाZन्त इंगले एवं अनुशासन समिति का अध्यक्ष नवनीत काबरा गाडरवारा को घोषित किया गया।

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

क्यों पाला जा रहा है कसाब को!!

क्यों पाला जा रहा है कसाब को!!
आतंकियों में क्या सन्देश देना चाह रही है भारत सरकार
जनता आतंकवाद से आहत, आतंकवादियों को सरकार दे रही मलाई पुडी
कसाब पर खर्च हो चुके हैं करोडों रूपए
(लिमटी खरे)

देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के इकलौते जिन्दा आतंकी अजमल कसाब को भारत सरकार सर माथे पर क्यों बिठाए हुए है, यह बात आज तक समझ में नहीं आई है। लगभग पांच सौ दिन बीतने के बाद भी उससे भारत सरकार कुछ भी नहीं उगला पाई है, और न ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ही इसके जवाबदार पाकिस्तान के खिलाफ ही कोई ठोस कार्ययोजना बना सकी है। मुम्बई की अण्डा जेल में कसाब आज देश का सबसे अधिक सुरक्षित व्यक्ति कहा जा सकता है। सच है कि अगर जनता के पैसे से भारत गणराज्य की सरकार द्वारा मुम्बई हमले के ज़िन्दा आरोपी कसाब को पाला जा रहा है तो यह देश के लिए सबसे बडे दुर्भाग्य की बात मानी जा सकती है।
गौरतलब होगा कि पूर्व में दुनिया के चौधरी कहे जाने वाले अमेरिका के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति जार्ज बुश ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले (9/11) के आतंकियों को ``वॉटरबोर्डिंग`` जैसी अमानवीय यातना दी थी। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस तरह की यातना समूची दुनिया में प्रतिबंधित है। वॉटर बोर्डिंग जैसी थर्ड डिग्री से भी बुरी यातना में आरोपी को निर्वस्त्र कर उसका चेहरा कपडों से ढक दिया जाता है, और फिर उसके मुंह पर पानी की धार इतनी तेज मारी जाती है कि उसे डूबने का अहसास होने लगता है। इससे अभियुक्ति की जान भी जा सकती है। आरोपी जैसे ही अपने आप को मौत के करीब पाता है, वह टूट जाता है, और सच्चाई का बखान आरम्भ कर देता है।
अमेरिका ने 9/11 के बाद अपने देश में सुरक्षा तन्त्र की समीक्षा की और विदेशियों के आने के मसले में वीजा नियमों को बहुत ही कठोर कर दिया। आज किसी भी देश का नागरिक जब अमेरिका की सैर पर जाता है तो उसे कडे नियम कायदों के अनेक दौर से होकर गुजरना पडता है। अमेरिका को इस बात की चिन्ता नहीं है कि उसकी सरजमीं पर इन कडे नियमों के कारण कौन आता है और कौन आने से कतराता है। अमेरिका के लिए उसके नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इससे उलट हिन्दुस्तान में ``अतिथि देवो भव`` की परंपरा के निर्वहन में नियम कायदों में छूट दिए जाने के अनेक मामले प्रकाश में आए हैं। यहां तक कि सार्वजनिक स्थानों, परिवहन के साधनों आदि में धूम्रपान प्रतिबंधित है, पर कोई भी गोरी या काली चमडी वाले को भारत गणराज्य में यह छूट है कि वह जहां चाहे वहां अपनी बीडी सिगरेट सुलगा सकता है। भारत सरकार द्वारा अपने ही नागरिकों के साथ इस तरह का सौतेला व्यवहार समझ से ही परे कहा जा सकता है।
हो सकता है भारत सरकार को यह भय हो कि नियमों के कडे करने से पर्यटकों की संख्या में कमी हो जाएगी। सीधी सी बात है जिसे भारत के इतिहास, यहां की पुरातात्तविक वस्तुओं, परंपराओं में जिज्ञासा होगी वह इन कडे नियमों को पार करके भी भारत आने का जतन करेगा। भारत के नागरिकों की सुरक्षा की कीमत पर पर्यटक अगर आते हैं तो यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। मुम्बई हमले के उपरान्त कुछ दिन आतंकी शान्त रहे फिर उनके हौसले बुलन्दी की ओर दिखाई दे रहे हैं। भारत के लचर कानून के चलते आतंकियों के लिए हिन्दुस्तान मुफीद जगह होती जा रही है, जहां वे अपने नापाक इरादों को आसानी से परवान चढा सकते हैं।
जहां तक अब तक हुई आतंकी घटनाओं का सवाल है, तो इतिहास गवाह है कि भारत सरकार द्वारा अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सदा ही पडोसी देशों को कोसकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की है। अब तक आतंकियों ने देश के न जाने कितने सपूतों को असमय ही काल के गाल में समाया है, पर भारत सरकार हाथ पर हाथ रखे ही बैठी रही। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश में अब तक की नपुंसक सरकारों द्वारा भारत गणराज्य के नागरिकों को सुरक्षा मुहैया कराने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। अपने आप को उदार कहकर भारत सरकार अपनी पींठ खुद अवश्य ही थपथपा सकती है, पर इस तथ्य को वह भी जानती है कि कायर और और नपुंसक भारत सरकार उदारता का चोला पहनने का स्वांग कर रही है।
विडम्बना देखिए कि अनेक लोगों को मौत के घाट उतारने और भारत सरकार एवं निजी क्षेत्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले आतंकियों में से ज़िन्दा पकडे कसाब को पाला जा रहा है। उसकी सुरक्षा में सरकार कोई कोताही नहीं बरत रही है। यह सब कुछ जनता के पैसे से ही हो रहा है। मंहगाई और कर्ज से लदी फदी भारत की जनता भी चुपचाप हाथ बांधे इस तमाशे को देखने पर मजबूर है। हम महज इतना ही कहना चाहते हैं कि देश के बेटों को शहीद करने वाले इस कसाब को भारत सरकार को पालना है तो खूब पाले पर उसकी सुरक्षा और खान पान में खर्च होने वाले पैसे की वसूली जनसेवकों के मोटे वेतन से ही वसूले जाएं। देश की जनता अखिर इस भोगमान को क्यों भोगे। जिस भी सूबे में इस तरह की घटना हो तब पीडितों को या उनके परिजनों को दी जाने वाली सहायता राशि भी उसी राज्य के सांसद, विधायक, मन्त्री और मुख्यमन्त्री से वसूलना होगा, तभी जनसेवकों को समझ में आएगी और वे सरकारी सिस्टम पर दवाब बना पाएंगे।
यक्ष प्रश्न तो यह है कि कसाब को लगभग पांच सौ दिन तक इस तरह ज़िन्दा रखकर भारत गणराज्य द्वारा आतंकियों को क्या सन्देश दिया जा रहा है, यही न कि अगर वे मौके पर मारे नहीं गए तो उनकी सुरक्षा में भारत सरकार कोई कोर कसर नहीं रख छोडेगी। भारत सरकार द्वारा अगर कसाब को ज़िन्दा रखकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई तीर मारा होता तो बात समझ में आती। सारे सबूतों के बाद भी पाकिस्तान द्वारा भारत के तर्कों को बहुत हल्के में लिया जा रहा है। भारत की लचर कानून व्यवस्था में पेशी पर पेशी मिलती जा रही है, और कसाब मस्त हलुआ पुरी खाकर मुटा रहा है। किसी अन्य देश में अगर यह हुआ होता तो अब तक कसाब को कब का चौराहे पर लटका दिया गया होता, जिससे आतंकियों के हौसलोें में काफी हद तक कमी आती,, पर क्या करें हम नपुंसक, कायर, नाकारा हैं जो उदारता का मौखटा लगाकर अपने ही आप को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

कहां की ``धनवषाZ`` से चमकते हैं मन्त्री आवास!

कहां की ``धनवषाZ`` से चमकते हैं मन्त्री आवास!
सीपीडब्लूडी का बजट है मन्त्रियों के लिए कम
जनता के पैसे का तबियत से दुरूपयोग करते हैं जनसेवक
(लिमटी खरे)
 
आजाद भारत में जनता को दो महत्वपूर्ण अधिकार दिया गया है, एक है वोट देने का, और दूसरा है कर देने का। वोट देकर वह अपना जनसेवक चुनता है और कर देकर उस जनसेवक के भोग विलास के मार्ग प्रशस्त करती है। आज आम आदमी को एक समय खाना खाने के पूरे पैसे न हों पर देश के नीति निर्धारक जनसेवकों के ठाठ देखते ही बनते हैं। लक झक चमचमाती मंहगी कारें, आलीशान अट्टालिकाएं, परिजनों के लिए विलासिता की चीजें और न जाने क्या क्या। इतना ही नहीं अपने सरकारी आवासों को भी ये आलीशान फाईव स्टार के कमरों जैसा बनाने से नहीं चूकते हैं। सवाल यह उठता है कि जब केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्लूडी) के पास इतना बजट है ही नहीं तो आखिर ये अपने अरमानों को परवान कैसे चढा पाते हैं।
देखा जाए तो केन्द्रीय मन्त्रियों के आवासों की देखरेख और संवारने की महती जवाबदारी अपने जर्जर कंधों पर उठाए सीपीडब्लूडी का बजट इतना है कि वह मन्त्रियों की फरमाईशों के सामने उंट के मुंह में जीरे की कहावत को चरितार्थ करता है। सीपीडब्लूडी के पास मन्त्रियों के आवास को चमकाने के लिए महज 75 हजार से ढाई लाख रूपए तक का बजट होता है। मकानों को निखारने, संवारने के लिए सीपीडब्लूडी के पास 75 हजार, टाईप 5 से टाईप 7 तक की कोठियों के लिए डेढ लाख तो टाईप आठ के लिए ढाई लाख रूपए का बजट प्रावधान है। अगर कोई सूचना के अधिकार में मन्त्रियों के आवासों पर हुए व्यय की जानकारी ले ले तो भारत के महालेखा परीक्षक भी दान्तों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाएंगे।
दरअसल जनसेवक जो मन्त्री बन जाते हैं उनके विभाग के अन्तर्गत आने वाले सार्वजनिक उपक्रम (पीयूसी) और विभाग में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा मन्त्रियों के सरकारी आवास को चमकाने का काम किया जाता है। विडम्बना तो देखिए कि मन्त्री के आवास पर हुए व्यय के बारे में कोई पूछ परख ही नहीं करता। अगर एक ईंट भी जोडी गई है, और वह सरकारी पैसे से नहीं जुडी है तो क्या उसके बारे में सम्बंधित मन्त्री ने अपनी आयकर विवरणी में इसका उल्लेख किया है। जाहिर है नहीं ही किया है। यह बात भी उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात कि मन्त्रियों के आवासों को चमकाने के लिए पीयूसी द्वारा लाखों व्यय किए जाते हैं, यही कारण है कि मन्त्रीपद से हटने के बाद भी जनसेवक अपने उस सरकारी आवास का मोह नहीं छोड पाते हैं, और महीनों वहां जमे ही रहते हैं।
जैसे ही आम चुनाव होते हैं और नए मन्त्री चुनकर आते हैं, तब उनकी पित्नयों के हिसाब से मन्त्री आवास का इंटीरियर डेकोरेशन किया जाता है। कमरों में वास्तु के हिसाब से दरवाजे, शयन कक्ष में फेरबदल कुल मिलाकर नए कमरे बनाना, पुराने को ठीक करना, रंग रोगन, प्लास्टर ऑफ पेरिस का काम, मंहगे रंग रोगन, फर्नीचर आदि को बाजारू कीमत पर देखा जाए तो एक आवास में 75 हजार से ढाई लाख रूपए का बजट बहुत ही कम है।
एकडों में फैले मन्त्रियों के आवासों में उनके बंग्ला कार्यालय में भी मनचाहा परिवर्तन करवाया जाता है। उनके बंग्ला कार्यालय में पर्सनल स्टाफ के बैठने के स्थान को देखकर आम सरकारी बाबू रश्क ही कर सकता है। साथ ही ``शौकीन जनसेवकों`` द्वारा तो अपने आवासों में मंहगी विदेशी लान ग्रास के साथ ही साथ लेण्ड स्केपिंग भी करवाई जाती है। इतना हीं नहीं मन्त्रालयों में मन्त्री कक्षों को सजाने संवारने में भी लाखों करोडों रूपए फूंक दिए जाते हैं। जनसेवकों का मानना होगा कि जब भी उनके निर्वाचन क्षेत्र से कोई मिलने आए तो वह वहां की साज सज्जा देख दान्तों तले उंगली ही दबा ले। यही कारण है कि मन्त्रियों के कार्यालयों में विजिटर्स रूम भी मन्त्रीकक्ष से कम नहीं होते हैं।
बहुत ही साधारण सी बात है कि जब मन्त्री द्वारा अपने आवास में लाखों खर्च कर उसे अपने अनुरूप बनाया जाता है तो फिर वे उसे मन्त्रीपद से हटने के बाद जल्दी कैसे छोड दें। यही वजह उनके आवास में प्रवेश के दौरान आती है। जब मन्त्री को आवास आवंटित होता है तब पुराना मन्त्री उसे छोडता नहीं। बाद में साल छ: माह बीतने पर जब आवास खाली होता है, तब नए मन्त्री के हिसाब से उसकी साज सज्जा में साल छ: महीना और लग जाता है, इस तरह इतने समय मन्त्री कहां रहता है। जाहिर है फाईव स्टार होटल में। उस होटल का भोगमान कौन भुगतता है। पैसा पेडों पर तो नहीं लगता है, पैसा वही मतदाता करों के माध्यम से ही चुकाता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ``सादा जीवन उच्च विचार`` का नारा लगाकर देश के ``जनसेवक`` किस तरह ``विलासिता पूर्ण जीवन और निम्न विचारों`` को अंगीकार किए हुए हैं।
आज इस बात पर चिन्तन करने की महती जरूरत है कि देश के नीति निर्धारक जनसेवक आखिर अपनी रियाया के साथ किस तरह का न्याय कर उसे क्या दे रहे हैं। इतिहास में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि मुगल शासकों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे सम्राट अकबर ने भी अनेकों बार भेष बदलकर अपनी रियाया के हाल चाल जाने और उनके दुखदर्द दूर किए। आजाद भारत में जनता किस कदर कराह रही है, और जनता की सेवा के लिए तत्पर जनसेवकों द्वारा अपने स्वार्थों को कितनी संजीदगी, तन्मयता और मुस्तैदी के साथ पूरा किया जा रहा है यह बात देखते ही बनती है। कहने को तो राजनैतिक दलों द्वारा ``रामराज`` और ``सुराज`` लाने का दावा किया जाता है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट कुछ और बयां करती नज़र आती है।

बुधवार, 10 मार्च 2010

कहां गई गौरैया की चहचहाट

कहां गई गौरैया की चहचहाट

कांक्रीट जंगलों और वनों की अधांधुंध कटाई से पर्यावरण सन्तुलन को खतरा

गुम हो चुकी है, पक्षियों की चहचहाट

इतिहास की बात हो गई है, पक्षियों का कलरव

(लिमटी खरे)

याद है, जब छोटे थे, तब स्कूल जाने के लिए अलह सुब्बह उठाया जाता था, यह कहकर देखो चिडिया आई, देखो कौआ आया, वो देखो मोर आया। घर की मुण्डेर पर छोटी सी चिडिया चहकती रहती, और उठकर स्कूल के लिए तैयार होने लगते। गरमी में कोयल की कूक मन को अलग ही सुकून देती थी। आज आधुनिकता के इस दौर में जब बच्चों को उठाया जाता है तो उन्हें चिडिया, कौआ के स्थान पर टीवी पर ``डोरीमाल`` ``नोमिता`` जैसे काटूZन केरेक्टर्स को दिखाकर उठाया जाता है। यह सच है, परिवर्तन बहुत ही तेजी से हुआ है, हमारी पीढी इस दुत गति से होने वाले परिवर्तन की साक्षात गवाह है। यह परिवर्तन सतत प्रक्रिया है, पर अस्सी के दशक के उपरान्त परिवर्तन की गति को पंख लग चुके हैं। कल तक मुण्डेर पर बैठे कौए और अन्य पक्षियों के कलरव पर गाने भी बना करते थे, शकुन अपशकुन के मामले में भी अनेकानेक धारणाएं हुआ करती थीं।

विडम्बना यही है कि हमने भाग दौड में आधुनिक दुनिया की कल्पना तो कर ली पर प्रकृति के साथ जो हमने छेडछाड या सीधे शब्दों में कहें बलात्कार किया है, वह अक्ष्म्य ही है। इसका भोगमान कोई ओर नहीं वरन हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना है। ईश्वर ने इस कायनात की रचना की है। इस सृष्टि में जितने भी जीव जन्तु प्रभु ने बनाए हैं, सबकी अपनी अलग अलग भूमिका और महत्व है। स्वच्छन्द विचरित होने वाले पक्षियों पर अघोषित तौर पर मानव का हस्ताक्षेप भारी पडा है। अपने सुख सुविधा और स्वाद के चक्कर में पक्षियों को प्रश्रय देने के स्थान पर मौत के घाट उतारा गया, जिससे इनकी संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई, रही सही कसर पर्यावरण प्रदूषण ने पूरी कर दी।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज पक्षियों की सैकडों प्रजातियां विलुप्तप्राय हैं। गिद्ध, सारस, कोयल, गोरैया, कौवा आदि अब बमुश्किल ही दिख पाते हैं। गुजरे जमाने में राजा महराजाओं से लेकर नवाबों की थाली की शान होने वाली शीली, बटेर, दिघोची, तीतर, लालशर जैसी चिडिया अब देखने को नहीं मिलती। अनेक निरामिष भोजनालयों में अब भुने हुए तीतर या बटेर के स्थान पर गोरैया को ही परोसा जा रहा है। गाय, भैंस का दूध बढाने की गरज से दी जाने वाली दवाओं का प्रतिकूल असर भी देखने को मिला है। इनके मृत शरीर का भक्षण कर पर्यावरण का एक सशक्त पहेरूआ ``गिद्ध`` अब देखे से नहीं दिखता है। पक्षियों की संख्या में कमी से पर्यावरण विशेषज्ञों की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई पडने लगी हैं।

पर्यावरण विदों की मानें तो पक्षियों का होना मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक है। ये मानव जीवों के लिए खतरनाक कीट पतंगों को अपना निवाला बनाकर मनुष्यों की रक्षा करते हैं। ये पक्षी ही हैं जो कीट पतंगों के अलावा मृत जानवरों के अवशिष्ट को भी धरती से समाप्त करते हैं। विलुप्त होते पक्षियों को लेकर सरकारी और गैर सरकारी संगठन चिन्ता जाहिर कर रस्म अदायगी से बाज नहीं आते हैं। ``मन राखन लाल`` की भूमिका निभाने वाले इन संगठनों ने कभी भी पक्षियों को बचाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है। यहां तक कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय द्वारा भी ग्रामीणों को जागरूक बनाने की दिशा में डाक्यूमेंटरी या विज्ञापनों का निर्माण तक नहीं करवाया है। परिणाम यह है कि दीगर पक्षियों के अलावा हर घर में चहकने वाली गोरैया भी अब दुर्लभ पक्षी की श्रेणी में आ चुकी है।

कुछ माह पूर्व दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि अब गोरैया भी दुर्लभ हो गई है। यह सच है कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कबूतरों के अलावा और दूसरे पक्षी दिखाई ही नहीं पडते हैं। कबूतर भी इसलिए कि यहां के लोगों को कबूतर पालने का शौक है। वैसे जंगली कबूतरों की भी दिल्ली में भरमार ही है। नासिक के एक व्यक्ति ने गोरैया के घोसले बनाकर बेचना भी आरम्भ किया है।

एक समय था जब घरों में महिलाओं द्वारा गेंहूं या चावल बीनते समय कुछ दाने इन चिडियों के लिए जानबूझकर गिरा दिए जाते थे। इन दानों के चक्कर में घरों के आसपास चिडिया चहकती रहती थीं। अब माल और डिब्बा बन्द प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थाें के बढे प्रचलन ने इन पक्षियों के मुंह से निवाला छीन लिया है। इसके अलावा शहरों में सीना ताने खडे मोबाईल टावर की चुम्बकीय तरंगों, वाहनों के द्वारा छोडे जाने वाले धुंए ने भी पक्षियों के लिए प्रतिकूल माहौल तैयार किया है।

एक अनुमान के अनुसार पक्षियों के कम होने के पीछे कामोत्तेजक दवाओं का तेजी से प्रचलन में आना है। असंयमित खानपान और रहन सहन के चलते कामोत्तेजक दवाओं का बाजार तेजी से गर्माया है। गोरैया के अण्डों का इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाओं में किया जाता है। चीन के माफिया सरगनाओं ने गैण्डे के सींग से सेक्स बढाने की दवाएं इजाद की। कल तक गैण्डों से आच्छादित भारत के जंगलों में अब इनकी तादाद महज 200 ही रह गई है।

अब समय आ चुका है कि पक्षियों को बचाने की दिशा में हम जागरूक हो जाएं। हमें हर हाल में पक्षियों के जीने के लिए अनुकूल माहौल प्रशस्त करना ही होगा। पक्षियों की तादाद अगर दिनों दिन कम होती गई तो पर्यावरण का जो असन्तुलन पैदा होगा उसका भोगमान किसी और को नहीं हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना होगा, जिसके उज्जवल भविष्य के लिए आज हम धन दौलत एकत्र कर छोडे जाने वाले हैं। हम अपने वंशजों को धन दौलत, संपन्नता, सुविधाएं तो देकर इस दुनिया से रूखसत हो जाएंगे, किन्तु जब पर्यावरण असन्तुलन होगा तब हमारी आने वाली पीढी जिस कठिनाई में जीवन व्यतीत करेगी उसका अन्दाजा आज लगाना असम्भव ही है। सरकार को चाहिए कि वह गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर पक्षियों को बचाने की दिशा में तत्काल ही कोई मुहिम की ठोस कार्ययोजना बनाए ताकि पक्षियों के कलरव को आने वाली पीढी सुन सके और महसूस कर सके।

सोमवार, 8 मार्च 2010

बहादुर ने दिखाई मन्त्री का रिपोर्ट कार्ड दिखाने की बहादुरी

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

बहादुर ने दिखाई मन्त्री का रिपोर्ट कार्ड दिखाने की बहादुरी

देश के नीति निर्धारक कितने योग्य हैं, इस बात पर अघोषित तौर पर तो चौक चौराहों पर बहस होती रही है, पर बनारस के रामचरण बहादुर ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल की शैक्षणिक योग्यता जांचने का साहस दिखाकर अनुकरणीय पहल की है। दरअसल कपिल सिब्बल द्वारा आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा की पात्रता के लिए स्कूल सार्टिफिकेट की महत्ता पर बल दिया था। सिब्बल का मशिविरा था कि स्कूली प्रमाण पत्र में 80 फीसदी से अधिक नंबर लाने वालों अर्थात टापर 20 फीसदी छात्रों को ही प्रवेश का अवसर मिले तो बहुत अच्छा होगा। इसी से क्षुब्ध बहादुर ने सूचना के अधिकार में कपिल सिब्बल के स्कूल प्रमाण पत्रों की प्रति की मांग की है, ताकि वह जान सके कि आईआईटी के छात्रों का भविष्य निर्धारण करने वाले सिब्बल ने स्कूल के जमाने में क्या गुल खिलाए थे। सिब्बल ने सेंट स्टीफन्स कालेज और हार्वड लॉ स्कूल में पढाई की है। बहादुर ने आईआईटी संस्थानों के निदेशक और प्राध्यापकों के स्कूली प्रमाण पत्र भी मांगे हैं। कहा जा रहा है कि हो सकता है बहादुर की यह मंशा पूरी न हो सके क्योंकि सूचना के अधिकार में उन प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक नही होता है जिनका ठोस आधार, कारण या तर्क नहीं होता है।

नक्सली कार्यक्षेत्र विस्तार के रोड मेप में सतना रीवा!
लाल कारीडोर के विस्तार में लगे हुए हैं नक्सलवादी, जी हां यह सच है, नक्सलवादियों द्वारा सरकार की ढीली पोली नीतियों और राज्य तथा केन्द्र के बीच समन्वय का फायदा उठाकर अपना कार्यक्षेत्र विस्तार करने की योजना बनाई जा रही है। वैसे भी नक्सलियों के लिए सामाजिक और आर्थिक विषमता वाले क्षेत्र बहुत ही मुफीद होते हैं। कल तक ददुआ और ठोकिया जैसे दुर्दान्त डाकुओं के कब्जे वाले विन्ध्य क्षेत्र अब नक्सलियों की पहली पसन्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों द्वारा केन्द्र सरकार के गृह मन्त्रालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं। गृह मन्त्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पिछले साल अक्टूबर माह में सरगुजा जिले में हुए नक्सली हमले के उपरान्त खुफिया एजेंसियों द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के मुताबिक अब लाल डोरे के विस्तार के लिए नक्सलियों द्वारा विन्ध्य के सतना, रीवा और त्रिवेणी संगम वाले इलहाबाद को चुना है। सतना, रीवा पुलिस भले ही इस बात से इंकार करे कि नक्सलवादी पदचाप उन्हें सुनाई दिए हैं, पर खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

भारतीय डाक्टर्स पचा नहीं पाते हैं बातें!
भारत के चिकित्सकों ने समूची दुनिया में अपने फन का लोहा मनवाया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु यह खबर भारतीय मूल के चिकित्सकों को परेशान करने वाली हो सकती है कि सालों साल भारत पर राज करने वाले ब्रिटेन की महिलाएं भारतीय मूल के चिकित्सकों पर एतबार नहीं करती हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रितानी महिलाएं अपनी यौन समस्याओं, गर्भावस्था और गर्भ निरोध या उन्मुक्त यौन सम्बंधों के बारे में भारतीय मूल के चिकित्सकों पर भरोसा नहीं कर पाती हैं। सर्वे के अनुसार ब्रितानी महिलाओं को सदा यह भय सताता रहता है कि कहीं उनके नैतिक अनैतिक यौन सम्बंधों के बारे में राज की बातें उनके परिजनों तक न पहुंच जाए। सर्वेक्षण में कहा गया है कि ब्रितानी महिलाएं भारतीय मूल के चिकित्सकों की बातों को हजम करने की क्षमता पर सशंकित ही रहती हैं। इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर भारतीय मूल के चिकित्सकों से वे बात करने में कतराती ही हैं।

कांग्रेस, भाजपा की मिली जुली सरकार!
मध्य प्रदेश में इन दिनों कांग्रेस और भाजपा की मिली जुली सरकार चल रही है, जी हां यह सच है। मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान दिल्ली और भोपाल में उद्योगपतियों को आकषिZत करने के लिए बिजली की समस्या नही होने देने का आश्वासन दे रहे हैं, इतना ही नहीं मुख्यमन्त्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर अन्य राज्यों को बिजली बेचने की बात भी कही जा रही है, पर कांग्रेस चुप है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि विधानसभा चुनावों के दौरान ही कांग्रेस द्वारा शिवराज सिंह के इस तरह बिजली बेचने के मामले को आडे हाथों लिया गया था। प्रदेश के जमीनी हालात किसी से छिपे नहीं है। ग्रामीण अंचलों में आधे दिन से अधिक तो जिला मुख्यालयों में आठ घंटे तक की बिजली कटौती धडल्ले से जारी है। इस पर अगर मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा अन्य राज्यों को बिजली बेचने की बात कही जाए और कांग्रेस खामोशी अिख्तयार कर ले तो कहा ही जाएगा न कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस भाजपा की मिली जुली सरकार चल रही है।

वेस्ट यूपी में साक्षर जनसेवकों की बाढ
एक समय था जबकि ग्राम प्रधान, सरपंच आदि के द्वारा धनादेश (बैंक के चेक) पर हस्ताक्षर के नाम से अंगूठा आगे कर दिया जाता था, आज हालात बदल चुके हैं। अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ही आधार बनाकर देखा जाए तो इस बार यहां 23 जनपदों के 322 में से 227 ग्राम प्रधान पूरी तरह साक्षर हो चुके हैं। अब ये सारे प्रधान लोग धनादेश पर अंगूठा आगे नहीं बढाते हैं, इतना ही नहीं इनके द्वारा अब अपने सचिवों से कार्यवाही पंजी को पढकर हिसाब किताब भी मांगा जाता है। सुखद आश्चर्य की बात तो यह है कि इनमें से 13 फीसदी प्रधानों ने कम्पयूटर, इंटरनेट के साथ ही साथ बीएड या एमए की परीक्षा भी उत्तीर्ण की हुई है। ये सारे आंकडे केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्राम स्वराज योजना लागू करने हेतु कराए गए सर्वे में सामने आईं हैं। लोगों की सेवा में छोटी से छोटी सार्वजनिक इकाई अगर साक्षर लोगों के हाथों में होगी तो आम आदमी को सरकारी योजनाओं का लाभ ज्यादा से ज्यादा मिल सकेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
. . . तो भारतीय सेना आतंकी गिनने बैठी है
देश की सेना के प्रमुख जनरल दीपक कपूर का कहना है कि कश्मीर घाटी में अस्थिरता फैलाने की गरज से पाकिस्तान द्वारा लगातार आतंकी भेजे जा रहे हैं। जनरल कपूर ने पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में यह भी कहा कि आतंकी भेजने के इस तरह के प्रयास पीर पंजाल के दक्षिणी क्षेत्र से हो रहे हैं, क्योंकि बर्फबारी के चलते अधिकांश दरेZ अभी भी बन्द हैं। जनरल कपूर की बातें भारतीय सेना के उत्साह में कमी लाने में काफी कही जा सकतीं हैं, क्योंकि देश की सेवा का जज्बा रखने वाले भारतीय सेना के जवानों जिन पर हर भारतीय को नाज है, उस क्षेत्र की रक्षा ही नहीं कर पा रहा है, जहां से आतंकी भारत में प्रवेश कर रहे हैं। अगर देश में अस्थिरता फैलाने वाले पीर पंजाल के दक्षिणी क्षेत्र से आ रहे हैं तो क्या भारतीय फौज उनकी आगवानी के लिए या उनकी संख्या गिनने के लिए बैठी है। होना यह चाहिए कि जिस रास्ते से भी आतंकी या नापाक इरादों वाले हिन्दुस्तान की सरजमीं पर आएं उन्हें वहीं ढेर कर दिया जाना चाहिए।

जीएम फुड : कंपनी के पैरोकार बने मन्त्री
जेनेटिकल माडीफाईड फुड (जीएम फुड) के बारे में तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री अम्बूमणि रामदास ने चिन्ता जताते हुए प्रधानमन्त्री को एक पत्र लिखा था, इसका जवाब विज्ञान और तकनीकि मन्त्रालय के खाते में गया। जवाब पृथ्वीराज चौहाण को देना था। चौहाण ने जो जवाब दिया उसका अधिकांश मेटर उन्होंने वीटी बैगन की हिमायती रही ``मोनोसाटो`` और ``महिको`` जैसी कंपनियों द्वारा जारी लेखों से ही चुरा लिया। जुलाई 2009 में लिखे चार पेज के पत्र मेें चोहान ने आठ अन्य पेज में इससे जुडी जानकारियां भी दी थीं। इन आठ पन्नों में भी जो जवाब पहुंचा है, वह इंटरनेशलन सर्विस फॉर द एक्वीजिशन ऑफ एग्री बॉयोटेक एप्लीकेशन के लेख में अधिकांश पेराग्राफ को जस का तस इस्तेमाल कर लिखा गया है जो अमेरिकन एजेंसी है। इतना ही नहीं चौहाण के मन्त्रालय द्वारा प्रस्तावित बॉयोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इण्डिया बिल में एक कण्डिका यह भी डाली है कि जीएम प्रोडक्टस की बुराई करने पर किसी भी भारतीय को 6 महीने की जेल हो सकती है। यह बिल अगर पास हो गया तो फिर चौहाण की बुराई करने के पहले किसी को भी दस बार सोचना ही पडेगा।

प्यूमा के विरोध में उतरे अल्पसंख्यक
चीन की जूता कंपनी ``प्यूमा`` द्वारा अपने उत्पाद में अल्पसंख्यकों की भावनाएं भडकाने वाली चीजों के समावेश के चलते मुसलमानों ने उक्त जूता कंपनी को जमकर कोसा। देश में जगह जगह इस बात का विरोध किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के टीकमगढ जिले में मुसलमानों ने इसे समूचे समुदाय का अपमान बताते हुए यूएसए के महासचिव वानकी मून, महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, वजीरे आजम मन मोहन सिंह, महामहिम राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर आदि को संबांधित ज्ञापन कलेक्टर को सौंपा। ज्ञापन में इण्डियन मुस्लिम त्योहार कमेटी और अंजुमन इस्लामिया कमेटी ने कहा है कि प्यूमा के इस काम से देश के 38 करोड मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने मांग की है कि इस कंपनी के मालिक एवं अन्य जिम्मेदार कर्मचारियों पर धार्मिक भावनाएं भडकाने का प्रकरण दर्ज कर उन्हें प्रत्यापर्ण संधि के तहत भारत लाकर प्रकरण चलाया जाना चाहिए। इसके अलावा नार्वे में भी एक अखबार द्वारा प्रकाशित काटूZन पर मण्डला जिले के अल्पसंख्यकों ने अपना विरोध दर्ज कराया है। अंजूमन रहमानिया वक्फ कमेटी द्वारा नार्वे के उक्त अखबार और नार्वे सरकार के खिलाव भारत सरकार को विरोध दर्ज कराने को कहा है।

पूर्व पति के नाम के प्रयोग पर पाबन्दी
मुम्बई उच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद ठाकरे परिवार की बहू िस्मता ठाकरे सहित अनेक महिलाओं को अपने नाम के साथ पूर्व पतियों के नाम का इस्तेमाल बन्द करना पड सकता है। मुम्बई के पुलिस महकमे से जुडे एक निरीक्षक के मामले में उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था देते हुए तलाकशुदा महिलाओं को उनके पूर्व पतियों के नाम के उपयोग पर रोक लगा दी है। अभी अनेक तलाकशुदा महिलाओं द्वारा उनके रसूखवाले पूर्व पतियों के नामों का उपयोग अपने नाम के साथ किया जाता है, जिसे अनुचित ठहरा दिया है उच्च न्यायालय द्वारा। इस मामले में बान्द्रा परिवार न्यायालय के बाद उच्च न्यायलय ने भी इस तलाक को मंजूरी दे दी। बाद में निरीक्षक की पित्न ने इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित होने की बात कहकर उस आदेश पर रोक लगाने की बात कही थी, जिसमें कहा गया था कि परिवार न्यायालय द्वारा महिला के तलाक शुदा होने की बात कहकर उसे अपने पूर्व पति के नाम और उपनाम के उपयोग पर रोक लगाने को कहा था। उच्च न्यायलय ने परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए सख्त रवैया अपनाते हुए पूर्व पति के नाम या उपनाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने को कहा है।

रेल ई टिकिट में गफलत
भले ही भारतीय रेल या रेल्वे बोर्ड द्वारा यात्रियों की सुविधाओं के मद्देनज़र नित नई सुविधाए लाई जा रहीं हों पर अमानत में खयानत करने वाले उसमें भी डाका डालने के रास्ते खोज ही लेते हैं। रेल ई टिकिट के माध्यम से लोग घर बैठे ही यात्रा टिकिट अवश्य निकाल रहे हों पर चतुर सुजान खिलाडी इसके माध्यम से भी रेल्वे को चूना लगाने से नहीं चूक रहे हैं। रेल्वे के सामने अनेक एसे मामले आए हैं जब सांसद के कार्ड नंबर पर फर्जी व्यक्ति सफर करते मिलें या फिर सीनियर सिटीजन के नाम पर जवान यात्रा करते नज़र आएं। रिफण्ड के मामलों में भी खिलाडियों के फन को माना जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार यात्रियों के रिफण्ड की तादाद में खासा इजाफा हुआ है। होता यह है कि फाईनल चार्ट बनने के बाद यात्रियों द्वारा टिकिट निरस्त करवा दी जाती है, इससे एक ओर चार्ट में उनका नाम भी रह जाता है, और दूसरी ओर उनकी टिकिट के ओने पौने पैसे भी वापस मिल जाते हैं। कुछ रेल्वे जोन ने भारतीय रेल को पत्र लिखकर इस तरह की गफलत करने वाले रेल एजेंट के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुशंसा भी की है।

. . . तो कहां रूकें सुरक्षा बल!
अमूमन देखा गया है कि राज्य सरकारों द्वारा कानून और व्यवस्था की स्थिति को बरकरार रखने के लिए बुलाई या भेजी जाने वाली सुरक्षा बलों की टुकडियों को शैक्षणिक संस्थाओं में ही रूकवा दिया जाता है। आने वाले दिनों में सुरक्षा बलों को शिक्षण संस्थाओं के परिसर में नहीं रूकवाया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायलय द्वारा एक मामले में व्यवस्था देते हुए कहा है कि शिक्षण संस्थाओं में सुरक्षा बलों या पेरा मिलट्री फोर्स के जवानों को अगर रोका जाता है, तो उसका गलत सन्देश जाता है। आंध्र प्रदेश के उस्मानिया विश्वविद्यालय परिसर में ठहराए जवानों को लेकर राज्य सरकार को आडे हाथों लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायधीश के.जी.बालाकृष्णन, जस्टिस एस.एच.कापडिया और जस्टिस आफताब की बैंच ने यह व्यवस्था दी है। इस व्यवस्था के बाद अब राज्य सरकारों को सुरक्षा बलों के जवानों को लाईन आर्डर की स्थिति में भेजने या बुलवाने पर उनके रहने खाने आदि की व्यवस्था अब शैक्षणिक संस्थाओं से इतर ही करनी होगी।

विदेशी कर्जे वाली साढे छ: सौ योजनाएं अधर में
किसी भी सूबे में सिचाई योजना ही उसकी उन्नति के मार्ग प्रशस्त करती है। आजादी के उपरान्त बनाए गए विशाल बांधों और सिचाई परियोजनाओं से ही हरित क्रान्ति का आगाज हुआ था। समय के साथ इन योजनाओं में अफसरशाही हावी होती गई और किसानों की कमर टूटती ही चली गई। विडम्बना ही कही जाएगी कि देश के हृदय प्रदेश में करोडों रूपए के विदेशी कर्ज से पोषित सिचाई परियोजनाओं का काम 70 फीसदी से भी ज्यादा अटका हुआ है। एमपी गर्वमेंट द्वारा पाईकू नामक परियोजना तैयार की थी, जिसमें 1919 करोड रूपए का विदेशी कर्जा प्रस्तावित था। सरकार द्वारा अब तक 1830 करोड रूपए का विदेशी कर्ज लिया जा चुका है, बावजूद इसके अभी महज तीस फीसदी काम ही हो सका है। इसके तहत इन्दौर, नीमच, मन्दसौर, कटनी, रायसेन, सागर, देवास, धार, रतलाम, उज्जैन, राजगढ, भिण्ड, गुना, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, श्योपुर, मुरैना, दमोह, पन्ना, रीवा, छतरपुर, टीकमगढ, अशोक नगर, विदिशा, भोपाल, सीहोर, साीधी सतना आदि जिलों में मिट्टी के बांधों की मरम्मत, छोटी नहरों का निर्माण, तकनीकी तौर पर बेकार बांधों, तलाबों, नहरों का रखरखाव आदि का काम किया जाना था।

पुच्छल तारा
भोपाल से श्वेता तिवारी के भेजे गए ईमेल के अनुसार कांग्रेस की नज़रों में भविष्य के प्रधानमन्त्री राहुल गांधी सदा ही युवा शक्ति की बात कहकर युवाओं को आगे लाने के हिमायती दिखते हैं। पिछले चुनावों में जब वे फिरोजाबाद में एक उमरदराज केण्डीडेट के लिए चुनाव प्रचार को गए उस वक्त अगर मीडिया उनसे युवाओं की पैरोकारी और वृद्ध के चुनाव प्रचार पर टिप्पणी मांग लेती तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी कुछ इस अन्दाज में जवाब देते -``बिल्कुल गलत बात है, उनकी उमर ही क्या है। महज बीस साल और यही कोई 400 महीने!!!!``