शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

सहिष्णुता की आड़ में कायरता हो रही हावी


सहिष्णुता की आड़ में कायरता हो रही हावी

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में रहने वाला हर नागरिक सहिष्णु रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। जीयो और जीने दो के सिद्धांत को प्रतिपादित कर इस पर अमल करने में हिन्दुस्तान का कोई सानी नहीं है। भारत की न्याय प्रणाली कहती है कि भले ही सो मुजरिम छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। जिस पर आरोप सिद्ध हो चुके हों उसे दया माफी या अन्य रास्तों से बचने के मार्ग प्रशस्त कहीं होते हैं तो यह भारत गणराज्य ही है। अजमल कसाब, अफजल गुरू, अजहर मसूद जैसे अनेक उदहारण हमारे सामने हैं जिनमें भारत गणराज्य की सरकारें बेबस ही नजर आती हैं। जम्मू काश्मीर लिब्ररेशन फ्रंट के पांच आतंकियों को इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उस वक्त एक मंत्री की बेटी अगुआ कर ली गई थी। एक गरीब को जब किसी डकैत द्वारा पकड़ा जाता है तो उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता है, पर दूसरी ओर जब किसी नेता के वंशज को पकड़ा जाता है तब सरकार सारे नियम कायदों को ताक पर रखने से नहीं चूकती। जब धमाके होते हैं तो मरने वालों और घायलों को सरकार मुआवजा देती है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या नेहरू गांधी परिवार के वंशजों ने स्व.इंदिरा गांधी और स्व.राजीव गांधी की नृशंस हत्या के बाद मुआवजा कबूल किया था?

कहते हैं कि शत्रु वहीं सबसे अधिक आक्रमण करते हैं जहां एकता नहीं होती। जहां लोगों के बीच एकता का अभाव होगा वहां शत्रुओं को सर छिपाने और छिपकर वार करने मे सहूलियत होती है। अनेकता में एकता, भारत की विशेषतायह नारा आजादी के बाद तेजी से बुलंद हुआ था। अस्सी के दशक के उपरांत एकाएक भ्रष्टाचार ने सर उठाना आरंभ किया। इसके उपरांत देश पर शासक करने वालों ने ही देश को लूटना आरंभ किया। अपने संचित धन को कथित तौर पर इन नेताओं ने स्विस सहित विदेशी बैंकों में जमा करना आरंभ कर दिया। कहा जाता है कि इसके साथ ही साथ हिन्दुस्तान में भी स्विस बैंक की तर्ज पर एक कंपनी का उदय हुआ। इस कंपनी ने रातों रात तरक्की की। इस कंपनी में भी नेताओं, अफसरों और व्यवसाईयों का बेनामी पैसा लगा हुआ है। यही कारण है कि केंद्र और सूबाई सरकारें भी चाहकर इसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं।

बहरहाल, देश की नपुंसक सरकार को एक के बाद एक धमाकों ने जमकर दहलाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय बम विस्फोट की पहली जवाबदारी हूजी ने ली। हूजी का कहना है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा अगर माफ नहीं हुई तो इस तरह के धमाके और भी होते रहेंगे। इसके बाद इंडियन मुजाहिद्दीन ने इसकी जवाबदारी ले ली है। इसने यह धमाका क्यों किया है इसे साफ नहीं किया है। इंडियन मुजाहिद्दीन क्या कहता है यह और हूजी की धमकी का क्या असर होगा इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी ही होगी।

पिछले दो दशकों में एक बात तो उभरकर सामने आई है कि भारत गणराज्य की सरकार को फैसला न लेने या टालने की आदत हो गई है। नब्बे के दशक में इसकी शुरूआत कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंम्हाराव के शासनकाल से हुई। उनके प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने फैसले जमकर टाले। फिर क्या था नरसिम्हाराव के उपरांत सरकारों का प्यारा शगल बनकर रह गया है फैसलों को टालना। मसला चाहे आम आदमी की रोजी रोटी से जुड़ा हो या फिर आम आदमी की सुरक्षा से, हर मामले में सरकार मूक दर्शक ही बनी बैठी दिखती है।

आज बम धमाकों के पीछे यह कारण उभरकर सामने आया है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा को माफ किया जाए। कल अगर यही बात किसी और कारण से अजहर मसूद और अजमल कसाब के लिए सामने आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वोट बैंक की घ्रणित राजनीति के चलते राजनेता कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। स्व.राजीव गांधी की पुत्री प्रियंका वढ़ेरा खुद चलकर अपने पिता की हत्यारिन नलिनी से मिलने जेल गईं और मीडिया की सुर्खियां बटोरी। सालों बीतने पर भी प्रियंका ने यह नहीं बताया कि आखिर क्या वजह थी, कि वे अपने पिता के कातिल से मिलने जेल गईं थीं। आखिर कौन से प्रश्न प्रियंका के मानस पटल पर घुमड़ रहे थे जिनका जवाब लेने वे नलिनी से मिलने गई थीं।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडू विधानसभा द्वारा जो किया है उसकी गूंज अनुगूंज समूचे भारत वर्ष को पार करती हुई जम्मू और काश्मीर तक सुनाई पड़ी है। जम्मू काश्मीर के निजाम उमर अब्दुल्ला ने गरम तवे पर रोटी सेंकते हुए एक प्रश्न जड़ ही दिया कि अगर यही मामला जम्मू काश्मीर विधानसभा द्वारा अफजल गुरू के संबंध में किया होता तो क्या देश में इसी तरह की शांति रहती? उमर के प्रश्न में दम है? क्या मानव मानव में भेद उचित है। यह जात पात, धर्म, मजहब, क्षेत्रवाद का मानवता में कोई स्थान है? जाहिर है नहीं, फिर एसा क्यों? उत्तर साफ है राजनेता ही हमें आपस में भेद करना सिखाते हैं। मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हमवतन हैं हिन्दोस्तां हमारा।

अल्प संख्यक समुदाय को प्रमुख राजनैतिक दलों ने अपना वोट बैंक माना है। यही कारण है कि आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों द्वारा अल्प संख्यकों की भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जाता है। राजीव के हत्यारों के मामले में खुद उनकी अर्धांग्नी और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी एवं राजीव पुत्र तथा कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी ने भी खामोशी ही अख्तियार कर रखी है। जब उनके परिजन ही मौन हैं तब कांग्रेसियों की फौज के साथ ही साथ बाकी देश का मौन रहना स्वाभाविक ही है।

वहीं दूसरी ओर चूंकि जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अफजल गुरू के बारे में एक साधारण सा प्रश्न किया तो देश भर के सियासी लोगों की भवें तन गईं। देखा जाए तो अफजल गुरू का अपराध कमोबेश राजीव के हत्यारों के समकक्ष ही माना जा सकता है। फिर अपराधियों के मामले में दोहरे मापदण्ड आखिर क्यों? आज समूचे देश में अफजल गुरू का मामला फिर जीवंत हो गया है। चौक चौराहों पर एक बार फिर लोग अफजल के मामले की जुगाली करते दिखने लगे हैं।

दिल्ली में हुए हालिया विस्फोट से इसे जोड़ा जा रहा है। बताया जाता है कि दिल्ली विस्फोट मामले में संकेत जुलाई में ही मिल चुके थे। संभावना यह भी है कि इस मामले में अफजल गुरू का नाम लाने से मामला हॉट बनाया जा सकता है। अगर अफजल को पहले ही फांसी दे दी गई होती तो आज यह मामला उठता ही नहीं कि उसकी फांसी की सजा को माफ नहीं किया तो और धमाके होंगे। आने वाले समय में अगर कोई अनहोनी हो और उनमें अजहर मसूद और अजमल कसाब को जोड़ा जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दिल्ली के इस विस्फोट में मारे गए और घायलों को सरकार ने मुआवजे के तौर पर चंद लाख रूपए देने की पेशकश की है। हर बार एसा ही होता है। एक प्रश्न आज भी दिमाग में जस का तस ही बना हुआ है कि जब इस तरह के हादसे, उदहारण के तौर पर राजीव गांधी की बम धमाके में हुई हत्या के उपरांत सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को क्या उनकी पत्नि श्रीमति सोनिया गांधी, उनकी पुत्री प्रियंका और पुत्र राहुल ने स्वीकार किया था? क्या इंदिरा जी की हत्या के बाद सरकार ने उनके परिजनों को मुआवजा दिया था? क्या मध्य प्रदेश में नक्सलियों द्वारा नृशंस तरीके से गला रेतकर जब तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की हत्या की थी तब उनके परिजनों को सरकार ने मुआवजा दिया था? क्या ये सभी गरीब जनसेवक नहीं थे? अगर थे तो क्या इनके परिजनों को मुआवजे की दरकार नहीं?

दरअसल भारत गणराज्य की नपुंसक सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति के चलते ही यह सब हो पा रहा है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही जनता द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर न चुना गया हो, जिसे जनता ने दो बार नकार दिया हो, जो पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा के रास्ते संसद पहुंचा हो, जिसे खुद लोकसभा में मत देने का अधिकार ही न हो, जिस पर सरेआम आरोप लगें कि वह सोनिया गांधी के चाबी वाले खिलौने की तरह चल रहा हो, जो देश के सामने अपने आप को मजबूर बताए, जिसके लिए राष्ट्र धर्मसे बड़ा गठबंधन धर्महो उसके नेतृत्व वाली बिना रीढ़ की सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।

शिवराज की लिस्ट को आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार

शिवराज की लिस्ट को आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार


अक्टूबर में होगा शिवराज सरकार का अंतिम फेरबदल


चार मंत्रियों की रवानगी तय


लाल बत्ती पाने उठापटक तेज


लखनादौन से शशि ठाकुर की लग सकती है लाटरी


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। 2013 में होने वाले मध्य प्र्रदेश के विधानसभा चुनावों के पूर्व अंतिम बार मंत्रीमण्डल फेरदबल अक्टूबर माह में होने के संकेत मिले हैं। हृदय प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रीमण्डल में फेरबदल की सूची भाजपा हाईकमान को अनुमोदन के लिए भेज दी है। अब इंतजार नितिन गड़करी की हरी झंडी का है। इस फेरबदल में चार मंत्रियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है। उधर लाल बत्ती के जुगाड़ के लिए विधायकों ने अपने अपने आकाओं को सिद्ध करना आरंभ कर दिया है।


भारतीय जनता पार्टी के नेशनल हेडक्वार्टर के सूत्रों ने बताया कि शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पिछली दिल्ली की यात्रा के दौरान ही झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय केशव कुंजऔर नितिन गड़करी से मंत्रीमण्डल फेरदबल के संबंध में चर्चा की है। उन्होंने अपनी प्रस्तावित सूची भी आला नेताओं को सौंप दी है। अगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर संघ और भाजपा के आला नेताओं से शिवराज सिंह चौहान का काफी मंथन हो चुका है।


पिछले दिनों शिवराज सिंह चौहान द्वारा वन टू वन अपने मंत्रियों से की गई चर्चा इसी मंथन का परिणाम मानी जा रही है। इस फेरबदल में जिन मंत्रियों की कुर्सी जाने की उम्मीद है उनमें बयानों के जरिए विवादों में रहने वाले गौरी शंकर बिसेन, नारायण सिंह कुशवाह, पारस जैन एवं वित्त मंत्री राघवजी भाई के नाम प्रमुख तौर पर सामने आए हैं। वहीं दूसरी ओर लाल बत्ती की कतार में खड़े नेताओं में जिन्हें उपकृत किया जा सकता है उनमें आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले की लखनादौन सीट से भाजपा का परचम लहराने वाली शशि ठाकुर, पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा, प्रेम नारायण ठाकुर, शरद जैन, गिरीश गौतम, ओम प्रकाश सकलेचा, मीना सिंह के नाम प्रमुख तौर पर सामने रहे हैं।

नरेंद्र मोदी हो सकते हैं राजग के पीएम इन वेटिंग

नरेंद्र मोदी हो सकते हैं राजग के पीएम इन वेटिंग


आड़वाणी की किस्मत में नहीं लाल किले की प्राचीर से संबोधन


रथ यात्राओं ने अब नहीं बदलने वाली आड़वाणी की किस्मत


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक बार फिर हिन्दुत्व के एजेंडे को वापस लाने के मूड में दिखाई दे रहा है। समूचे भारत में भारतीय जनता पार्टी की मट्टी पलीत से संघ के आला नेता नाखुश ही दिख रहे हैं। संघ के नेताओं का मानना है कि राजग के पीएम इन वेटिंग की गलत नीतियों का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। संघ के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर 2014 में भी भाजपा सत्ता से दूर रही तो आने वाले दिनों में भाजपा के साथ संघ का भी सांस लेना मुश्किल हो जाएगा। मिशन 2014 के लिए भाजपा की ओर से अपेक्षाकृत युवा चेहरे नरेंद्र मोदी पर दांव लगाया जा सकता है।


गुजरात में सत्ता का परचम लहराने वाले नरेंद्र मोदी की छवि खाटी हिन्दुवादी नेता के तौर पर स्थापित हो चुकी है। भाजपा के समस्त मुख्यमंत्रियों में नरेंद्र मोदी को एक कुशल राजनेता और प्रशासक के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि नरेंद्र मोदी का प्रबंधन कमाल का है। गुजरात सरकार को छः लोग मिलकर ही चला रहे हैं। पर्दे के पीछे रहने वाले इन लोगों की नीतियों से नरेंद्र मोदी खुद को स्थापित कर पाए हैं। गुजरात में पिछले दिनों हुए निवेश ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए हैं।


गौरतलब है कि पिछले दिनों विकीलीक्स केबल में भी इस बात के संकेत मिले थे कि गुजरात के निजाम नरेंद्र मोदी केंद्र में बड़ी भूमिका की तलाश में हैं। यद्यपि यह केबल 2005 के आधार पर था किन्तु 2009 के आम चुनावों में पुनः इस बात के संकेत मिले थे कि मोदी ही भाजपा के सबसे पसंदीदा चेहरा बनकर उभरे हैं। भाजपा के शिवराज सिंह चौहान की इमेज साधारण ग्रामीण की है किन्तु उनके दामन पर लगे भ्रष्टाचार के दागों के चलते वे पीएम मटेरियल नहीं बन पा रहे हैं। यह अलहदा बात है कि शिवराज की पीआर देख रहे लोग दिल्ली में उन्हें पीएम मटेरियल बनाने से नहीं चूक रहे हैं। इसके पीछे एमपी में तख्ता पलट की बात भी कही जा रही है। रही बात रमन सिंह की तो रमन सिंह ने अपने आप को छत्तीसगढ़ के औरे में ही कैद कर रखा है।


भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का यह भी कहना है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अगर वे 2014 तक भाजपाध्यक्ष की कुर्सी पर रहे तो निश्चित तौर पर वे भी नरेंद्र मोदी को ही आगे करेंगे। वैसे भाजपा और संघ में चल रही बयार के अनुसार राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी को अब विश्राम देने के मूड में हैं अधिकांश नेता। इस लिहाज से देखा जाए तो बतौर प्रधानमंत्री आड़वाणी की किस्मत में लाल किले पर ध्वाजारोहण करना शायद नहीं लिखा है।


भाजपा में अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो आने वाले दिनों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पीएम इन वेटिंग घोषित कर दिया जाएगा। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनते ही अधिकांश पार्टियां जो धर्म निरपेक्ष होने का स्वांग रचती हैं वे एक झंडे तले आ सकती हैं। वैसे आज की स्थिति में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ कुंलांचे मारते हुए उपर बढ़ते ही जा रहा है।

बच्चों के प्रति संजीदा नहीं सरकारें

बच्चों के प्रति संजीदा नहीं सरकारें


बुनियादी सुविधाओं का अभाव है आंगनवाड़ियों में


पैसा कमाने का जरिया बनीं आंगनवाड़ियां


राज्यों को भी नहीं परवाह बच्चों की


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। ‘‘सुविधाओं को तरसते देश के अधिकांश बच्चे आज भी कुपोषण से ग्रसित हैं। जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से संचित कर सरकारों द्वारा खर्च किए गए अरबों रूपए पानी में ही बह गए हैं।‘‘ उक्ताशय के निश्कर्ष संसदीय समिति ने अपने प्रतिवेदन में निकाले हैं। सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इस समिति ने माहिला एवं बाल विकास मंत्री को जमकर घेरा है। समिति ने पाया कि आधे से अधिक आंगनवाड़ियों में बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं।


महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की महिलाओं को सुदृण और आत्मनिर्भर बनाने संबंधी संसदीय समिति ने अपना आठवां प्रतिवेदन संसद में पेश किया है। इस प्रतिवेदन में बच्चों के विकास के प्रति कोताही बरतने पर सरकार की कड़ी आलोचना की गई है। समिति ने देश में 1975 में आरंभ की गई योजना में कुछ अमूल चूल परिवर्तन करते हुए आंगनवाड़ी और शिशु गृह में पैदा होने के बाद से तीन साल तक के बच्चों को भी शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। समिति का मानना है कि इससे एक ओर बच्चों में कुपोषण की समस्या से निजात मिल सकेगी वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को भी शिशु गृह की सुविधा मिल सकेगी।


इस प्रतिवेदन में समिति ने पाया कि देश में संचालित आंगनवाड़ियों में आधी से अधिक जगहों पर पेयजल की सुविधा ही नहीं है। बच्चे प्यासे कंठ ही यहां रोते पाए गए। इतना ही नहीं इतनी ही संख्या में आंगनवाड़ियों में शौचालय ही नहीं थे। समिति ने महज पच्चीस फीसदी आंगनवाड़ियों में ही रसोईघर पाए। समिति ने यह भी पाया कि आंगनवाड़ी चलाने वालों के घरों पर ही एक कमरे में ही आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं।


समिति को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि आंगनवाड़ी कार्यकताओं के लगभग नब्बे हजार और समेकित बाल विकास सेवा में निरीक्षकों के लगभग पंद्रह हजार पद रिक्त होने के बाद भी राज्यों द्वारा इस बारे में केंद्र को अंधेरे में ही रखा जा रहा है। समिति ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया है कि चार दशकों के बाद भी इसके लिए पात्र लगभग सोलह करोड़ में से महज साढ़े सात करोड़ बच्चों को ही शामिल किया गया है।

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

नपुंसक सरकार को दहलाते बम ब्लास्ट

नपुंसक सरकार को दहलाते बम ब्लास्ट


(लिमटी खरे)




9/11 के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका पर आज तक कोई आतंकी हमला नहीं हुआ है। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने यह साबित कर दिया है कि उसकी सरहद पूरी तरह सुरक्षित है। इतना ही नहीं मुस्लिम देशों पर आक्रमण कर वहां के तानाशाहों की सल्तनत को नेस्तनाबूत भी किया है अमेरिका ने। दादागिरी के साथ किसी भी देश में घुसकर वहां अपनी सेना को खड़ा करना कोई अमेरिका से सीखे। वहीं दूसरी ओर सहिष्णू होने का दंभ भरने वाले भारत गणराज्य की सरकारें वास्तव में सहिष्णु के बजाए अब नामर्द ज्यादा नजर आ रहीं हैं। एक के बाद एक आतंकी हमलों और बम विस्फोटों से निरीह निर्दोष आम जनता और उसके गाढ़े पसीने की कमाई से बनी सरकारी संपत्ति नष्ट होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेसनीत केद्र सरकार नीरो के मानिंद बांसुरी बजा रही है। 2008 में देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए आतंकी हमले के उपरांत तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को भारी विरोध के बाद हटाया गया था। इसके बाद हुए बम धमाकों को देखने के बाद भी पलनिअप्पम चिदंबरम का नैतिक साहस तारीफे काबिल है कि वे आज भी अपनी कुर्सी से चिपके ही बैठे हैं। वे दिन हवा हुए जब इस तरह की किसी भी घटना की नैतिक जवाबदारी लेते हुए नेता अपने पद से त्यागपत्र दे दिया करते थे।


बुधवार को सुबह देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बम धमका हुआ। इलेक्ट्रानिक मीडिया के मार्फत जैसे ही देश को इसकी जानकारी मिली देश स्तब्ध रह गया। एक ईमेल के जरिए इसकी जवाबदारी हूजी ने ली है। प्रधानमंत्री इन दिनों बंग्लादेश की यात्रा पर हैं। हूजी को खाद पानी भी इसी मुल्क से मिलता है इस बात में शक की गुंजाईश कम ही है। इस समीकरण पर अगर गौर फरमाया जाए तो इसका क्या संदेश है?


आतंकवाद या इस तरह की घटनाएं निश्चित तौर पर सत्तारूढ़ लोगों के लिए एक चुनौति से कम नहीं है। देखा जाए तो देश में सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त है राजधानी दिल्ली। बावजूद इसके दिल्ली में अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ते ही जा रहा है। दिल्ली में न तो महिलाएं ही सुरक्षित हैं और न ही बच्चे और बुजुर्ग। केंद्र सरकार का मुख्यालय भी दिल्ली ही है। दिल्ली की कुर्सी पर तीन मर्तबा से शीला दीक्षित विराजमान हैं। वे खुद भी महिला हैं। इन परिस्थितियों में दिल्ली को दहलाने का साहस करना वाकई दुस्साहसिक कदम ही माना जाएगा। वह भी न्याय के मंदिर में। जहां सुरक्षा सबसे तगड़ी होती है। अगर दिल्ली का उच्च न्यायालय ही सुरक्षित नहीं है तो फिर भला सुदूर ग्रामीण अंचलों में कोई सुरक्षित हो सकता है?


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को शायद जमीनी हकीकत समझ में आ गई हो। वे जब राम मनोहर लोहिया अस्पताल में घायलों से मिलने पहुंचे तब उन्हें भी काले झंडों और सरकार तथा उनके खुद के खिलाफ लगने वाले नारों का सामना करना पड़ा। अगर राहुल गांधी अपने विवेक से राजनीति कर रहे होंगे तो निश्चित तौर पर यह घटना उनकी आत्मा को कचोटने के लिए काफी कही जा सकती है। वे खुद भी लोकसभा में सांसद हैं। सत्ता में उनके दल की ही सरकार है। राहुल गांधी नेहरू गांधी परिवार (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नहीं) की पांचवीं पीढ़ी के लीडर हैं। इसलिए उनकी बात में अपने आप ही वजन पैदा हो जाता है।


यक्ष प्रश्न यह है कि 1. क्या राहुल गांधी संसद में इस मामले को लेकर गृह मंत्री की भूमिका पर सवाल उठाने का दुस्साहस कर पाएंगे? 2. क्या राहुल गांधी अपने साथ आरएमएल अस्पताल में हुए इस तरह के व्यवहार पर आत्मावलोकन करने का साहस जुटा पाएंगे? 3. क्या राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम का त्यागपत्र मांगने का दुस्साहस कर पाएंगे? 4. क्या राहुल गांधी दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित से बतौर सांसद और जनता के नुमाईंदे कोई प्रश्न करने का दुस्साहस कर पाएंगे? 5. क्या कांग्रेस महासचिव की हैसियत से राहुल गांधी अपनी माता और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी से इस मामले में कड़े कदम उठाने की मांग कर पाएंगे? इसके साथ ही देश की जनता के दिलो दिमाग में उठने वाले सारे प्रश्नों का उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगा। इसका कारण यह है कि देश के सारे जनसेवकों की नैतिकता कभी की मर चुकी है।


दिल्ली पुलिस ने इसके पहले 25 मई को गेट नंबर सात के पास हुए धमाके से सबक नहीं लिया। दिल्ली में धमाके का स्थल संसद भवन से महज दो किलोमीटर तथा सुप्रीम कोर्ट से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर था। अति संवेदनशील और व्हीव्हीआईपी इलाके में हुए इस बम धमाके ने आतंकवाद से निपटने की सरकार की नीति और दावों की कलई खोलकर रख दी है। सरकार अब तरह तरह की बातें कहकर देश की जनता को तो बहला सकती है, पर दिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से खुद का सामना शायद ही सरकार का कोई नुमाईंदा करने का साहस जुटा पाए।


जनता के चुने हुए नुमाईंदे अपने साथ कारबाईन युक्त सुरक्षा गार्ड रखा करते हैं। कुछ को सरकारी गार्ड पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे निजी या किराए के पीएसओ पर यकीन रखते हैं और इनसे घिरे होते हैं। यह बात समझ से परे ही है कि जनता के द्वारा चुने हुए नुमाईंदे क्या अपनी रियाया से इतने भयाक्रांत हैं कि वे उनके बीच जाते वक्त भी तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था चाहते हैं। जिस जनता ने उन्हें अपने लिए चुना है उससे इन नुमाईंदों को भय कैसा?


सर्वाधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब संसद की कार्यवाही के चलते इस घटना को नापाक इरादों के लोगों ने अंजाम दे दिया। गौरतलब है कि इसके पहले लगभग दस साल पहले 13 दिसंबर 2001 को देश की सबसे बड़ी पंचायत पर आतंकी हमला हुआ था। वह हमला आज तक समूचे देश का सर शर्म से झुकाने के लिए काफी माना जाता है। इसके बाद भी देश के शासक नहीं चेते। इसके बाद भी एक के बाद एक हमले होते रहे और शासक मौज करते रहे। हद तो तब हो गई थी जब 2008 में 26/11 को देश की आर्थिक राजधानी पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ। देश की हांफती सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि अतिसंवेदनशील उच्च न्यायायल के क्षेत्र में न तो सीसीटीवी ही काम कर रहे थे और न ही मेटल डिटेक्टर ही।


देखा जाए तो बीते दो दशकों से आतंकवाद पर सियासी पार्टियों का ध्यान कुछ ज्यादा ही केंद्रित हो गया है। हर एक राजनैतिक दल आतंकवाद के दर्द को उभारकर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। आतंकवाद के सफाए की ओर इन दलों का ध्यान जरा सा भी नहीं जा रहा है। मुंबई में 2008 में हुए आतंकवादी हमले के बाद देश के सबसे कमजोर समझे जाने वाले गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने त्यागपत्र देकर अपने आप को नैतिक रूप से काफी हद तक मजबूत पेश किया था। आज देश के गृह मंत्री जैसे पद पर पलनिअप्पम चिदंबरम विराजे हैं। जिन पर अनेकानेक आरोप हैं। कांग्रेस शायद भूल गई कि देश के गृह मंत्री के पद पर लौह पुरूष माने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी हस्ती को भी कांग्रेस ने ही बिठाया था, जिनकी नैतिकता, कार्यप्रणाली और देशप्रेम के ज़ज़्बे को आज भी लोग सलाम करते हैं।


इस मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया में जिरह के दौरान भाजपा बड़ी बड़ी बातें करती है, पर भाजपा शायद यह भूल जाती है कि इसके पहले अटल इरादों वाले अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के गृहमंत्री रहे लाल कृष्ण आड़वाणी के कार्यकाल में खौफ का पर्याय बन चुके आतंकवादियों को सरकार ने अपने ही जहाजांे में ले जाकर कंधार में छोड़ा था। तब कहां गई थी इन नेताओं की नैतिकता?


इतना ही नहीं राजग के पीएम इन वेटिंग के गृह मंत्री के कार्यकाल में ही देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद पर आतंकवादी हमला हुआ, अक्षरधाम के रास्ते रघुनाथ मंदिर और अमरनाथ यात्रा के दौरान न जाने कितने निरीह लोगों को भूना गया। क्या देश के नेताओं की याददाश्त इतनी कमजोर हो गई है कि चंद साल पहले घटी घटनाओं को भी याद रखने में उन्हें परेशानी होने लगी है।


उधर मुंबई पर अगर आतंकी हमला न हुआ होता तो हिन्दुस्तान के नीति निर्धारकों की तंद्रा शायद ही टूट पाती। लोगों के आक्रोश, उद्वेलना और उन्मादी तेवर के आगे केंद्र सरकार को आम चुनावों का खौफ सताने लगा और आनन फानन ही सही पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन विधेयक 2008 (यूएपीए) लाया गया। दोनों ही सदनों से इस विधेयक को बिना किसी ना नुकुर के पारित कर दिया। यूएपीए में एक नई धारा जोड़कर इसे और अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया गया है, जिसके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति विस्फोटक, आग्नेय शस्त्र, घातक हथियार, खतरनाक विशाक्त रसायन, जैविक या रेडियोधर्मी हथियारों का उपयोग अथवा आतंकवादी, देश विरोधी गतिविधियों के लिए करना या सहयोग देता है, तो उसे सजा मिलेगी और इसे दस वर्षों तक बढ़ाया भी जा सकता है। इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति देश अथवा विदेश में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन का संग्रह करता है, तो उसे कम से कम 5 साल की कैद दी जा सकती है, जरूरत पड़ने पर कैद को आजीवन कारावास में भी तब्दील किया जा सकता है। यह कानून आज के समय में निष्प्रभावी ही प्रतीत हो रहा है।


एक अन्य पहलू पर अगर गौर किया जाए तो देश में आज आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, महंगाई और बेरोजगारी के समकक्ष अगर कोई मुद्दा खड़ा हुआ है तो वह है, बंग्लादेशी घुसपैठियों का। हमारी सरकारें ना मालूम क्यों इस ज्वलंत और बेहद संवेदनशील मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं कर रही है।


वैसे इसे कमोबेश निराशाजनक ही कहा जा सकता है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल ने अब तक विधानसभा या लोकसभा चुनावों मंे बंग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को छुआ तक नहीं है। मध्य प्रदेश में अलबत्ता सूबे के निजाम ने ज़रूर एक मर्तबा बंग्लादेशी घुसपैठियों को सूबे से बाहर निकालने की बात कही थी। कितने आश्चर्य की बात है कि देश में सभी राजनैतिक दल लोकसभा के चुनाव को भी स्थानीय निकायों के चुनाव की तरह ही स्थानीय मुद्दों पर लड़ रहे हैं। देश में फैली अराजकता, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि के मसले पर सभी राजनैतिक दल कमोबेश एक जैसा ही राग अलाप रहे हैं। अलापें भी क्यों न अखिर सियासत में तो सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।


देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की ही अगर बात की जाए तो यहां लगभग दस लाख से अधिक की तादाद में बंग्लादेशी निवास कर रहे हैं। बंग्लादेश से लुके छिपे सीमा पर कर भारत आए इन बंग्लादेशियों से जहां एक ओर आंतरिक सुरक्षा को खतरा है, वहीं दूसरी ओर ये स्थानीय संसाधनों और रोजगार पर भी कब्जा जमाते जा रहे हैं। खबरें तो यहां तक हैं कि इनके द्वारा बड़ी ही आसानी से राशन कार्ड, ड्रायविंग लाईसेंस, मतदाता पहचान पत्र आदि बनवाकर हिन्दुस्तानियों के हितों पर सीधे सीधे डाका डाला जा रहा है।


2009 अगस्त में उच्च न्यायालय ने सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर बंग्लादेशी मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था, साथ ही साथ मतदाता सूचियों में से बंग्लादेशियों के नाम विलोपित करने को भी कहा था। मजे की बात तो यह है कि देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के लिए सीधे सीधे जिम्मेदार गृह मंत्रालय भी यह स्वीकार करता है कि दिल्ली में अवैध तरीके से रह रहे बंग्लादेशियों की तादाद दस लाख के करीब है। कुछ साल पहले तक तो मध्य प्रदेश के खुफिया विभाग के पास उपलब्ध आकड़ांे में बंग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या महज ग्यारह ही दर्ज थी, जबकि उस वक्त वड़ी तादाद में ये मध्य प्रदेश में निवास कर रहे थे। आज देश में इनकी तादाद बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली सदा से ही आतंकवादियों के निशाने पर रही है, यही कारण है कि तमाम तरह की सावधानी बरतने के बावजूद भी आताताई अपने इरादों में कामयाब होकर वारदात कर निकल जाते हैं। इन परिस्थितियों में घुसपैठियों के पास राशन कार्ड और मतदाता परिचय पत्र होना संगीन बात मानी जा सकती है, क्योंकि देश में हुई अनेक गंभीर वारदातों में बंग्लादेशी आतंकी संगठन हूजी के हाथ होने के पुख्ता प्रमाण भी मिले हैं। राजधानी दिल्ली की लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी में दस लाख बंग्लादेशियों का होना देश के सुरक्षा और खुफिया तंत्र में अनगिनत छेदांे को रेखांकित करने के लिए काफी है।

अंततः सज्जन की मेहनत रंग लाई

अंततः सज्जन की मेहनत रंग लाई


ग्वालियर देवास फोरलेन हाईवे को मंजूरी


साढ़े चार सौ किलोमीटर लंबा होगा फोरलेन राजमार्ग


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व कबीना मंत्री और संसद सदस्य सज्जन सिंह वर्मा ने अंततः अत्याधिक यातायात दबाव वाले देवास से ग्वालियर तक के राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर तीन को फोरलेन करवाने के संबंध में सफलता हासिल कर ही ली। हाल ही में भूतल परिवहन मंत्रालय ने इसे हरी झंडी दिखा ही दी। 445 किलोमीटर लंबे इस मार्ग में गुना, रायगढ़, शाजापुर, उज्जैन, सातनवरा, सुभाषपुरा आदि के लोगों को आवागमन में लाभ मिलेगा।


सांसद सज्जन सिंह वर्मा ने इस संवाददाता से चर्चा में कहा कि आगरा से मुंबई जाने वाले नेशनल हाईवे नंबर तीन पर यातायात का अत्याधिक दबाव है। इसे देखते हुए उन्होंने तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से इसे फोरलेन में तब्दील करने की मांग की थी। कमल नाथ का आभार जताते हुए श्री वर्मा ने कहा कि भूतल परिवहन रहते हुए कमल नाथ ने मध्य प्रदेश विशेषकर मालवा की जनता की मांग को स्वीकार किया और इस मार्ग को चतुष्गामी करने के लिए अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी थी।


उन्होंने बताया कि इस मार्ग में ग्वालियर से शिवपुरी तक के मार्ग निर्माण में एक हजार 102 करोड़ और तेंतीस लाख रूपए खर्च होंगे तथा देवास से शिवपुरी के खण्ड के निर्माण में दो हजार 9 सौ 35 करोड़ रूपए व्यय होने का अनुमान है। इस तरह इस परियोजना में लगभग चार हजार करोड़ से अधिक की राशि व्यय होने की उम्मीद है।


गौरतलब है कि सज्जन सिंह वर्मा मध्य प्रदेश के इकलौते सांसद हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार से अधिक से अधिक मात्रा में योजनाएं स्वीकृत करवाई और उसकी प्रशासकीय एवं तकनीकि स्वीकृति प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार में कांग्रेस के अन्य संसद सदस्य अपने अपने क्षेत्रों के प्रति उदासीन ही नजर आ रहे हैं।

सौर उर्जा के प्रति उदासीन शिवराज

सौर उर्जा के प्रति उदासीन शिवराज


खटाई में दिख रहा हैं सौर उर्जा संयंत्रों की स्थापना का काम


केंद्र के पत्र का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा शिव सरकार ने


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार और देश के हृदय प्रदेश की शिवराज सरकार के बीच अब टकराहट की प्रतिध्वनि तेज होती जा रही है। एक के बाद एक कर केंद्र सरकार द्वारा राज्य के साथ अनेक मामलों में सख्ती बरती जा रही है। हाल ही में मध्य प्रदेश में उर्जा की बचत के लिए सौर उर्जा इकाईयों की स्थापना का काम ठण्डे बस्ते के हवाले होता दिख रहा है। सौर उर्जा संयंत्रों की स्थापना पर केंद्र सरकार द्वारा सब्सीडी दी जाती है, किन्तु अहर्ताएं पूरी न हो पाने से मध्य प्रदेश के खाते की सब्सीडी अभी खटाई में ही है।


केंद्रीय नवीनीकृत उर्जा मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सौर उर्जा संयंत्रों की स्थापना में केंद्र सरकार द्वारा सब्सीडी प्रदान की जाती है। सूत्रों ने आगे बताया कि मंत्रालय की गाईड लाईन के अनुसार सौर उर्जा संयंत्र में प्रयुक्त होने वाली बेटरी के रख रखाव को लेकर उलझन अभी भी बनी हुई है। मंत्रालय चाहता है कि मध्य प्रदेश सरकार इन बेटरियों के रखरखाव की जवाबदारी अपने सर ले। इस आशय का पत्र भी मंत्रालय द्वारा मध्य प्रदेश सरकार को भेजा जा चुका है।


सूत्रों ने कहा कि दो माह पूर्व लिखे इस पत्र का जवाब देना मध्य प्रदेश सरकार के उर्जा विभाग या उर्जा विकास निगम ने मुनासिब नहीं समझा है। इसके साथ ही साथ मध्य प्रदेश से आए लाखों आवेदनों में अधिकांश होम लाईट के हैं जिन पर सब्सीडी देने से केंद्रीय मंत्रालय ने पूर्व में ही साफ तौर पर इंकार कर दिया था।



यह होता है लाभ

केंद्रीय नवीनीकृत उर्जा मंत्रालय सौर उर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सब्सीडी देता है। इसके साथ ही साथ राज्य सरकार द्वारा भी इसमें कुछ अंशदान दिया जाता है। एक अनुमान के अनुसार 22 हजार रूपए मूल्य की स्ट्रीट लाईट सब्सीडाईज्ड होने के बाद महज छः हजार रूपए की और होमलाईट जिसकी बाजारू कीमत साढ़े बारह हजार है वह चार हजार चार सौ रूपए हो जाती है।

भ्रष्टाचार 09


भ्रष्टाचार 08