मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

पूरी तरह समृद्ध है महाकौशल का आंचल


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 3

पूरी तरह समृद्ध है महाकौशल का आंचल

प्राकृतिक और हर तरह के संसाधनों में आत्मनिर्भर होगा महाकौशल


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाकौशल प्रांत का अगर निर्माण किया जाता है तो यह प्रांत हर मामले में आत्मनिर्भर साबित हो सकता है। प्राकृतिक और नैसर्गिक संसाधनों के मामले में महाकौशल क्षेत्र का कोई सानी नहीं है। वनोपज के अथाह भण्डार को अपने दामन में सहेजने वाले महाकौशल के नेताओं को चाहिए कि वे महाकौशल की माटी के उपकार का कर्ज चुकाने इस प्रांत के प्रथक गठन के मार्ग प्रशस्त करें।

महाकौशल क्षेत्र में भगवान की अनुपम कृति के बतौर आदिवासी बाहुल्य छिंदवाड़ा जिले का पतालकोट है। इस क्षेत्र में भारिया नामक जनजाति सालों से गुजर बसर कर ही है। इस जनजाति का रहन सहन अपने आप में अनोखा और शोध का विषय है। इसी तरह प्रदेश की ताम्र परियोजना बालाघाट जिले में बैहर क्षेत्र तो छिंदवाड़ा जिले में सौंसर में है।
महाकौशल प्रांत से ही मध्य प्रदेश की जीवनरेखा पुण्य सलिला नर्मदा नदी का उद्गम डिंडोरी के अमरकंटक में तो पुण्य सलिला बैनगंगा का उद्गम सिवनी जिले के मुण्डारा में है। नर्मदा पर बने विशाल जलसंग्रह वाले रानी अवंती बाई सागर परियोजना के बरगी बांध और बैनगंगा पर बने संजय सरोवर परियोजना के एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध भीमगढ़ का नजारा ही अकल्पनीय है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त साफ्ट संगमरमर की खदानें भेड़ाघाट में हैं। भेड़ाघाट में ही नर्मदा नदी पर बने जल प्रपात के नयनाभिराम दृश्य देखने के लिए देश विदेश से सैलानी यहां आते हैं। पान में लगाने वाला और दीवारों को सफेद करने वाला चूना भी इसी प्रांत के कटनी और मण्डला जिले में बहुतायत में पाया जाता है।

प्राकृतिक संसाधनों के मामले में महाकौशल का कोई सानी नहीं है। सतपुड़ा की वादियों में छिंदवाड़ा, सिवनी, मण्डला, डिंडोरी, बालाघाट जिलों के जंगलों की धरती वनोपज से लदी फदी है। जिसका अगर ठीक तरीके से दोहन कर लिया जाए तो देश विदेश में महाकौशल प्रांत धूम मचा सकता है। आयुर्वेद औषधियों के काम आने वाली जड़ी बूटियां भी इन्हीं जिलों में बहुतायत में पाई जाती है। महाकौशल प्रांत में ही आर्युवेदिक विश्विद्यालय की स्थापना की जाकर आयुष पद्यति को तेजी से बढ़ावा दिया जा सकता है।

(क्रमशः जारी)

नेहरू गांधी के अलावा कोई नहीं रहा सफल प्रधानमंत्री


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 46

नेहरू गांधी के अलावा कोई नहीं रहा सफल प्रधानमंत्री

जनता के पैसे से खेली जा रही है होली


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाले विज्ञापन दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) के द्वारा सौ करोड़ रूपयों से नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) को महिमा मण्डित करने का प्रयास किया जा रहा है। विपक्ष भी इस मामले में अपनी मौन सहमति देकर शांत बैठा हुआ है। भारत निर्माण के तहत दो घंटे की एक सीडी तैयार करवाई जा रही है सौ करोड़ रूपए फूंककर।

डीएवीपी के सूत्रों ने बताया कि गीत एवं नाटक प्रभाग द्वारा बनाई गई इस सीडी में आजादी के उपरांत भारत गणराज्य के समग्र विकास का समूचा श्रेय नेहरू गांधी परिवार के वंशज जवाहर लाल नेहरू, उनकी पुत्री प्रियदर्शनी श्रीमति इंदिरा गांधी और उनके नवासे राजीव गांधी को दिया गया है। सूत्रों का कहना है कि नेहरू गांधी परिवार को महिमा मण्डित करने के लिए इतिहास को जमकर तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है।

सीडी को देखकर लगने लगा है कि देश में 1947 के उपरांत महज तीन ही प्रधानमंत्री हुए हैं। इस सीडी में भाजपा के वजीरे आजम अटल बिहारी बाजपेयी और लाल बहादुर शास्त्री को महज तीन सेकंड दिए गए हैं। वृत्त चित्र में उनके नामों का भी उल्लेख नहीं किया गया है, महज उनके चित्र दिखाए गए हैं।

इस वृत्त चित्र में पूर्व प्रधानमंत्रियों विश्वनाथ प्रताप सिंह, पी.व्ही.नरसिंहराव, मोरारजी देसाई, इंद्र कुमार गुजराल, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी.देवगौड़ा आदि की पूरी तरह अनदेखी की गई है। इस डाक्यूमेंट्री में विकास और परिवर्तन का श्रेय नेहरू गांध्ी के वंशजों को दिया गया है। इसमें इंदिरा गांधी द्वारा रखी गई मजबूत बुनियाद पर राजीव गांधी ने आधुनिक भारत का निर्माण किया जाना दर्शाया गया है।

बताया जाता है कि कांग्रेस की राजमाता के इशारों पर बनी इस सौ करोड़ रूपए की सीडी के माध्यम से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए वजीरे आजम बनने के मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। अटल बिहारी बाजपेयी सहित गैर कांग्रेसी वजीरे आजम के बारे में जिकर न होना आश्चर्यजनक ही है। उससे अधिक आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि इस मामले में विपक्ष पूरी तरह सन्निपात की स्थिति में है।

(क्रमशः जारी)

पहले महीने फर्राटे से दौड़ता है आईडिया का नेट


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  32

पहले महीने फर्राटे से दौड़ता है आईडिया का नेट

दूसरे महीने से पैसेंजर गाड़ी को भी दे देता है मात


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया सेल्यूलर के इंटरनेट की अजब कहानी सामने आ रही है। ग्रामीण इलाकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आईडिया का इंटरनेट पहले महीने तो शताब्दी या सुपर फास्ट रेलगाड़ी के मानिंद चलता है, क्योंकि यह प्रमोशनल स्कीम के तहत निशुल्क होता है, किन्तु जैसे ही महीना पूरा होता है इसकी चाल पैसेंजर रेल गाड़ी से भी धीरे हो जाती है।

ग्र्रामीण इलाकों से आ रही खबरों के अनुसार आईडिया के नेट सेटर लेने पर पहले महीने की प्रमोशनल स्कीम के तहत इंटरनेट सुपर डुपर हिट तरीके से चलता है। जैसे ही उपभोक्ता द्वारा पहला रीचार्ज करवाया जाता है उसके बाद से उसे सर्वर नॉट फाउंड का ही संदेश देखने को मिलता है। दिन भर में सैकड़ों बार कनेक्ट करने पर भी आईडिया का नेट नहीं जुड़ पाता है।

उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए जरूर यह बताया जाता है कि जिलों के ग्रामीण अंचलों में भी आईडिया का नेटवर्क है, किन्तु जब इंटरनेट जोड़ने की बात आती है तो उपभोक्ताओं के पसीने निकल जाते हैं। अनेक जिलों में तो टूजी सेवा होने के बाद भी आईडिया के कारिंदे थ्री जी का प्रलोभन देकर कनेक्शन बेच रहे हैं। पहले महीने तो उपभोक्ताओं को थ्री जी से भी तेज स्पीड मिलती है किन्तु अगले ही महीने से उपभोक्ता अपने आप को ठगा सा ही महसूस करता है।

(क्रमशः जारी)


राष्ट्रभाषा हिन्दी या हिंग्लिश!


राष्ट्रभाषा हिन्दी या हिंग्लिश!

अंग्रेजी हिन्दी के सम्मिश्रण को दी सरकार ने मान्यता


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा के तौर पर मान्यता मिली हुई है। हिन्दी के विकास के लिए अलग से विभाग का गठन भी किया गया है। देश पर पश्चिमी सभ्यता किस कदर हावी हो चुकी है और किस तरह लोग पश्चिमी देशों पर निर्भर होते जा रहे हैं उसका नायब उदहारण है हाल ही में केंद्र सरकार के एक परिपत्र में देखने को मिला। जिस तरह निजी कोरियर कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए पोस्टल विभाग की कार्यप्रणाली में ढील पोल लाई गई। राज्यों में सड़क परिवहन को बंद करने के लिए नेशनल परमिट की अवैध यात्री बसों को सड़कों पर दौड़ने दिया गया उसी तरह अब राष्ट्रभाषा हिन्दी का अस्तित्व भी खतरे में ही दिखाई देने लगा है।

कठिन हिंदी शब्दों से आने वाली समस्याओं से पार पाने के लिए सरकार ने अनुभाग अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे आसानी से समझ में आने और भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए वैसे शब्दों की जगह हिन्दी और अंग्रेजी के सम्मिश्रण ‘हिंग्लिश’ शब्दों का प्रयोग करें। यह आदेश गृह मंत्रालय की राजभाषा इकाई ने जारी किया। इसे हाल में विभिन्न कार्यालयों में फिर से भेजा गया है। इसमें आधिकारिक तौर पर उल्लेख किया गया है कि विशुद्ध हिंदी के इस्तेमाल से आम जनता में अरुचि पैदा होती है।

परिपत्र में अनुशंसा की गई है कि आधिकारिक कामों के लिए कठिन हिंदी शब्दों की जगह देवनागरी लिपि में अंग्रेजी के वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है। गृह मंत्रालय में आधिकारिक भाषा विभाग ने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘मिसिल’ की जगह फाइल का इस्तेमाल किया जा सकता है। ‘प्रत्याभूति’ की जगह ‘गारंटी’, ‘कुंजीपटल’ की जगह की-बोर्ड और ‘संगणक’ की जगह ‘कंप्यूटर’ का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसमें लोकप्रिय हिंदी शब्दों और वैकल्पिक अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करने की भी वकालत की गई है ताकि भाषा को और आकर्षक तथा दफ्तरों और आम जनता के बीच इसे लोकप्रिय बनाया जा सके। परिपत्र में कहा गया है कि जब भी आधिकारिक काम के दौरान अनुवाद की भाषा के तौर पर हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है तो यह कठिन और जटिल बन जाती है। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की प्रक्रिया में बदलाव करने की तत्काल आवश्यकता है। शब्दशरू हिंदी करने की बजाय अनुवाद में मूल पाठ का भावानुवाद होना चाहिए।

आधिकारिक पत्राचार में उर्दू, अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लोकप्रिय शब्दों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। हिंदी के शुद्ध शब्द साहित्यिक उद्देश्यों के लिए होने चाहिए, जबकि काम के लिए व्यावहारिक ‘मिश्रित’ शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि शुद्ध हिंदी में अनुवाद करने की बजाय देवनागरी लिपि में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर है।

बिजली संकट की जद में राजधानी


बिजली संकट की जद में राजधानी

प्लास्टिक कोटेड हो रहे बिजली के तार


(नंद किशोर)

भोपाल। देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में अभी बिजली कटौती का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। कहने को मैनटनेंस के नाम पर होने वाली बिजली कटौती वास्तव में अनशेड्यूल्ड कटौती की श्रेणी में ही आ रही है। बिजली चोरी रोकने की गरज से राजधानी के सप्लाई वाले बिजली के तारों पर प्लास्टिक चढ़ाने का काम किया जा रहा है ताकि खंबों के बीच के तारों से बिजली की चोरी रोकी जा सके।

राजधानीवासियों को अभी एक साल तक बिजली कटौती की मार झेलनी पड़ेगी। यह तकलीफ उन्हें चल रहे 214 करोड़ रुपए की लागत के एक बड़े प्रोजेक्ट (आरएपीडीए) के कारण उठानी पड़ेगी। इस प्रोजेक्ट के तहत सिस्टम को दुरुस्त किया जा रहा है। इसके कारण दिन के वक्त क्षेत्रवार बिजली कटौती की जा रही है। यह प्रोजेक्ट एक साल और चलेगा। इसके तहत पुराने केबल (बिजली के तार) को रबर कोटेड किया जा रहा है। बिजली चोरी के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में हाई वोल्टेज डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम लगाए जा रहे हैं।

बिजली लाइनों और सिस्टम के अन्य जरूरी हिस्से का मेंटेनेंस भी किया जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में एक दिन के अंतराल में ही कटौती की जा रही है, जिससे लोगों में नाराजगी है। इस मामले में बिजली कंपनी के अफसरों का तर्क है कि मेंटेनेंस के लिए की जाने वाली कटौती की सूचना पहले ही दे दी जाती है, जहां निर्धारित दिन को मेंटेनेंस नहीं हो पाता वहां अगले दिन या उसके बाद बिजली सप्लाई नहीं की जाती।

रात तीन बजे बिजली गुल, बिजली कंपनी ने हाल ही में कुछ क्षेत्रों में देर रात तीन बजे ही बिजली गुल कर दी, इसकी वजह भी मेंटेनेंस बताई गई। कंपनी ने एक दिसंबर को बीडीए क्वाटर्स, खजूरी गांव, एसओएस बाल ग्राम, मां सरस्वती कॉलेज, सुरभि विहार समेत कई इलाकों में रात तीन बजे ही बिजली काट दी थी।

इसके पहले 18 और 27 अक्टूबर, 28 और 30 नवंबर को वीआईपी गेस्ट हाउस, वरेला गांव, मदर इंडिया कॉलोनी, हाउसिंग बोर्ड कोटरा, डी सेक्टर नेहरू नगर, बाबा नगर, मिसरोद, अंसल प्रधान, सुरेंद्र विहार, सोनागिरी ए और बी सेक्टर, इंद्रपुरी सी सेक्टर, वाल्मी क्षेत्र में कटौती हुई। इतना ही नहीं 18 अक्टूबर, 22-25 नवंबर को भी मेंटेनेंस के नाम पर टीबी हॉस्पिटल, लवकुश अपार्टमेंट, वाजपेयी नगर, ईदगाह हिल्स, पीएनबी कॉलोनी, महाजन बंगला, डॉक्टर क्वाटर्स, एक्सीलेंस कॉलेज, यशोदा विहार, कृष्णा विहार, तुलसी परिसर, क्रिस्टल कैंपस, अभिनव होम्स, सौम्य विहार, अमृतपुरी, टैगोर नगर, समन्वय नगर, पर्यावरण परिसर, चिनार वुडलैंड, छत्रपति कॉलोनी, अमलतास, तो 26 नवंबर और फिर 1 दिसंबर को हलालपुर, सावन नगर, स्वागत गार्डन, ओम नगर, गुलशन गार्डन, रचना नगर, गौतम नगर, बैंक कॉलोनी में बिजली कटौती की गई थी।

केंद्रीय परियोजनाओं को अब नहीं मिलेगी जमीन


केंद्रीय परियोजनाओं को अब नहीं मिलेगी जमीन

शिवराज की केंद्र से ठनी


(अंशुल गुप्ता)

भोपाल। कहने को तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मध्य प्रदेश को औद्योगिक तौर पर संपन्न बनाने के लिए सूबे में दिल खोलकर जमीनों का आवंटन किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अब वे केंद्र सरकार के किसी भी संस्थान को एक इंच भी जमीन देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। हाल ही में अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान एम्स ने पचास एकड़ अतिरिक्त भूमि की मांग की थी जिसे राज्य सरकार ने ठुकरा दिया है।

शासन ने यह कदम इसलिए उठाया है कि उसने जिन संस्थानों को भी जमीनों का आवंटन किया है, वो उनके यहां फालतू पड़ी जमीन को लौटाना नहीं चाहते। मुख्य सचिव अवनि वैश्य ने एम्स के प्रतिनिधियों को राज्य सरकार के रूख से अवगत भी करा दिया है। मुख्य सचिव ने अपने उच्चाधिकारियों को भी निर्देश दिए हैं कि वे जमीन आवंटन के मामले में सख्ती बरतें।

एम्स के संबंध में उन्होंने कहा कि पहले ही एम्स को 144 एकड़ जमीन का आवंटन किया जा चुका है, जबकि जहां भी एम्स बने हुए हैं, वहां किसी को भी 100 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं दी गई है। इसलिए एम्स को और जमीन देने की जरूरत नहीं है। एम्स परिसर के विस्तार में रोड़ा हाईटेंशन लाइन के निराकरण और फोर लेन सड़क के विस्तार में सहयोग का जरूर मुख्य सचिव ने आश्वासन दिया।

वर्तमान में भोपाल में केंद्र सरकार के अनेक संस्थानों के पास हजारों एकड़ सरकारी जमीन है। राज्य सरकार ने भोपाल में ही सबसे ज्यादा भेल को 2281 एकड़ जमीन उपलब्ध करवाई है। इसके अलावा केंद्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र नवीं बाग पर 50 एकड़ जमीन आवंटित की गई है। अब भले ही इन संस्थानों में जमीन उपयोग में नहीं आ पा रही हो, पर इसकी वापसी केंद्र सरकार की सहमति से ही राज्य को वापस मिल पाएगी।

अब तकनीकि पेंच में फंसा ‘आधार‘


0 दो दो रूपए में बिक रहे आधार के फार्म . . 3

अब तकनीकि पेंच में फंसा ‘आधार‘


(शिवेश नामदेव)

सिवनी।  बुजुर्गाे और बच्चों का आधार कार्ड (यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर) बनाने में एक तकनीकी पेच सामने आ रहा है। आधार बनाने वाली एजेंसियों को फिंगर प्रिंट्स और आंखों की पुतलियों की इमेज लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह यह है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों के फिंगर प्रिंट्स और आंखों की पुतली का विकास नहीं हो पाता, जबकि बुढ़ापे में फिंगर प्रिंट्स घिस जाती हैं और आंखों की पुतली का रंग बदल जाता है।

प्रदेश में आधार का काम संभाल रहे डाक भवन के डीजीएम कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि हर उम्र के लोगों का आधार कार्ड बनाया जा रहा है। इनमें बच्चे और बूढ़े भी शामिल हैं। हालांकि कई बार 70 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गाे का फिंगर प्रिंट और आंखों की पुतली की सही जांच नहीं हो पाती, लेकिन इन तकनीकी दिक्कतों के बाद भी हम सभी का आधार कार्ड बना रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि पहचान के लिए उनका फोटो ले रहे हैं। भोपाल और राज्य के अन्य जिलों के डाकघरों में आधार बनाने का काम कर रही 4जी-आइडेंटिटी सॉल्यूशंस के स्टेट हेड अभिषेक अवस्थी ने बताया कि 1 साल से 100 साल तक की उम्र के लोगों का आधार कार्ड बनाया जा रहा है।

5 साल से कम उम्र के बच्चों और बुजुर्गाे के फिंगर प्रिंट्स और आंखों की पुतली की पहचान लेने में थोड़ी दिक्कत तो आ रही है, लेकिन यह तो एक प्राकृतिक मामला है और इसके लिए कोई कुछ नहीं कर सकता। इसके लिए वैसे तो चार-पांच बार सैंपल लिया जाना चाहिए पर एसा हो नहीं रहा है। उधर भोपाल के डाकघरों में आधार बना रहे एजेंसी के कर्मचारी भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। कर्मचारियों ने बताया कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों के फिंगर प्रिंट्स और पुतली का रिकॉर्ड नहीं रखे जा रहे हैं। बच्चों के मामले में अभिभावकों की पहचान को सहारा लिया जा रहा है।

नेत्र रोग विशेषज्ञ मानते हैं कि कि बचपन या बुढ़ापे में लिया हुआ रिकॉर्ड उसकी पहचान में काम नहीं आता। वह बताती हैं कि आंखों की आइरिस (पुतली) का रंग वक्त के साथ बदलता है। बचपन में यह हल्के भूरे रंग का और बुढ़ापे में धुंधला सा हो जाता है। हालांकि फिंगर प्रिंट्स स्पेशलिस्ट्स का मानना है कि बचपन हो या बुढ़ापा, व्यक्ति की उंगलियों के निशान कभी नहीं बदलते। केवल उम्र के साथ इनका आकार बढ़ और घट सकता है। हालांकि इनका रिकॉर्ड दर्ज करने में फिंगर प्रिंट्स स्कैनर की बहुत बड़ी भूमिका होती है। हो सकता है कि आधार बनाने में इस्तेमाल होने वाले फिंगर प्रिंट स्कैनर उतने अच्छे न हों।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

जनता के पैसे से हो रहा मनमोहन का मेकअप


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

जनता के पैसे से हो रहा मनमोहन का मेकअप‘
कांग्रेस जो ना करवाए कम है। जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से संग्रहित राजस्व पर मौज करने के आदी हो चुके कांग्रेस के जनसेवकों ने अब कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की छवि निर्माण का अभिनव तरीका खोजा है। 2014 में आम चुनाव के एक साल पहले 2013 में सूचना और प्रसारण विभाग ने अपनी एक इकाई गत एवं नाटक प्रभाग के जरिए पचास करोड़ रूपयों से गाजे बाजे के साथ एक नाटक तैयार कराया जा रहा है, जिसका मंचन समूचे देश में होगा। इसके दूसरे चरण में पचास करोड़ खर्च कर इस नाटक को शेष भारतीय भाषाओं में तैयार करवाया जाएगा। इसमें संप्रग सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल की उज्जवल धवल छवि को सामने लाया जाएगा। इसमें नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) को महिमा मण्डित किया जा रहा है। इसमें लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी बाजपेयी को महज तीन सेकंड का समय दिया गया है। चरण सिंह, नरसिंहराव, मोरारजी देसाई, व्ही.पी.सिंह इस नाटक से गायब ही हैं।

नैनों की आंख में खटकेगी नैना!
टाटा की लखटकिया कार नैनो भले ही मार्केट में धूम नहीं मचा सकी हो पर चर्चाओं में जमकर रही। नैनो को टक्कर देने के लिए आम आदमी की कार का सपना लेकर बाजार में उतरी मारूती अब ‘नैना‘ को लांच करने की योजना बना रही है। जापान में अभी इस तरह की दो कारें सड़कों पर है। मारूती की तैयारी है कि इस कार को जनवरी के दिल्ली आटो एक्सपो में प्रदर्शित किया जाए। जनता के लिए कार का सपना साकार करने वाली मारूती ने अब 660 सीसी की कार को बाजार में उतारने का फैसला लिया है। वर्तमान में 800 सीसी वाली आल्टो और नैनो की शुरूआती कीमतों में एक लाख 43 हजार का अंतर है। मारूति 800 के उत्पादन बंद होने से लोग कठिनाई महसूस कर रहे हैं। मारूति के सर्वे के बाद यह बात उभरकर सामने आई है कि छोटी कारों के मामले में आज भी लोग मारूति पर भरोसा जता रहे हैं।

चिंकारा की मौतों पर उदासीन नटराजन!
देश के हृदय प्रदेश के मशहूर कान्हा नेशनल पार्क में सिवनी के जंगलों से स्थानांतरित किए गए पचास काले हिरणों में से नौ की मौत के बाद भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तंद्रा नहीं टूटी है। एमपी के वन मंत्री सरताज सिंह को इससे कोई लेना देना ही प्रतीत नहीं हो रहा है। इतना ही नहीं केंद्र के कानों में भी जूं नही रेंग रही है। मरे हुए इन नौ हिरणों में से पांच के शव तो क्षत विक्षत हालत में मिलने से संदेह के बादल गहरा गए हैं। मध्य प्रदेश से छः हजार काले हिरण आंध्र प्रदेश भी स्थानांतरित किए गए हैं। उल्लेखनीय होगा कि सिवनी जिले में आज भी हजारों की तादाद में काले हिरण किसानों की फसलों को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं। काले हिरणों का शिकार आम बात हो चुकी है इस क्षेत्र में। काले हिरणों के लिए एक सुरक्षित सेंचुरी की मांग सालों से होती आ रही है, किन्तु मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार इस मांग पर कान देना मुनासिब ही नहीं समझती है।

किसने खा लिए साढ़े नौ लाख!
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में इन दिनों एक चर्चा जोर पकड़ रही है कि आखिर शिवराज सिंह चौहान के खाते में नौ लाख पचास हजार रूपए डालकर किसने इसे बिना डकार के हजम कर लिया। दरअसल पिछले दिनों मध्य प्रदेश विधानसभा में सरकारी बंग्लों के रखरखाव का ब्योरा पेश किया गया था। इसमें 74 बंग्ले में शिवराज सिंह को बतौर सांसद आवास जो उनके मुख्यमंत्री बनने के उपरांत रिक्त ही पड़ा हुआ है के रखरखाव में राज्य सरकार ने महज आठ माह में साढ़े नौ लाख रूपए खर्च कर दिए। शिवराज सिंह मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस आवास में रह रहे हैं उस पर इन आठ माहों में 18 लाख 23 हजार 75 रूपए खर्च किए गए। अब लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि मुख्यमंत्री आवास से आधा खर्च आखिर उनके बतौर सांसद आवंटित आवास पर कैसे कर दिया गया!

गड़करी से संतुष्ट है संघ
लो प्रोफाईल में चलने वाले भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने भले ही अपने अप्रिय फैसलों से भाजपा में अपने विरोधी पैदा कर लिए हों पर भाजपा के आला नेता और संघ उन पर पूरा एतबार जता रहा है। गड़करी के अध्यक्ष बनने के वक्त लोगों का आश्चर्य जायज था कि आखिर महाराष्ट्र जैसे सूबे का नेतृत्व भी न करने वाले व्यक्ति को कैसे देश का अध्यक्ष बना दिया गया। दरअसल गड़करी की जडें संघ में काफी गहराई तक गई हुईं हैं। अध्यक्ष बनने के बाद गड़करी ने कोई चुनाव नहीं लड़ा और अपनी व्यक्गित महात्वाकांक्षांओं को अपने उद्देश्य के उपर हावी नहीं होने दिया। गड़करी ने भाजपा में गुटीय राजनीति समाप्त करने के लिए पार्टी से विमुख होकर गए नाराज नेताओं की घर वापसी का अभियान चलाया। गड़करी दरअसल पार्टी में व्याप्त गुटबाजी से बुरी तरह आहत थे। गड़करी के अप्रिय फैसलों के बाद आज पार्टी में सब कुछ सामान्य ही नजर आ रहा है।

मीरा की आंख में भी खटक रहे हैं मनमोहन
प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की असफल आर्थिक नीतियों और भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगा पाने के चलते वे कांग्रेस के कोप का शिकार हो रहे हैं। देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल भी अगले साल जुलाई में समाप्त हो रहा है। कांग्रेस महिला आरक्षण बिल भी संसद में नहीं ला पाई है। ये सारी परिस्थितियां लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के लिए मुफीद बैठ रही हैं। अब वे भी इस जुगत में लग गईं हैं कि अगर सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को हटाएंगी तो प्रधानमंत्री पद के लिए वे सबसे तगड़ी दावेदार होंगीं। कांग्रेस की यह मजबूरी होगी कि देश के शीर्ष पद पर किसी न किसी महिला को बिठाए। इसके लिए अगर कांग्रेस दलित कार्ड खेलने का मन बनाती है तो मीरा कुमार महिला होने के साथ ही साथ इस पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार साबित होंगी। यही कारण है कि अब वे भी अंदर ही अंदर मनमोहन सिंह की बिदाई के मार्ग प्रशस्त करने में जुट गईं हैं।

शिव का विनाश या विकास!
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा उद्योगों के लिए सूबे के द्वार पूरी तरह खोल दिए गए हैं। बिना किसी सावधानी को देखे हुए मध्य प्रदेश में नदियों के मुहाने पर उद्योगों को स्थापित करने का सिलसिला चल पड़ा है। बड़े शहरों में पर्याप्त जल मल निकासी की कार्ययोजना न होना भी नदियों के लिए खतरा बन चुका है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि मध्य प्रदेश में अनेक नदियां प्रदूषण के मानक स्तर से कहीं अधिक प्रदूषित हैं। सूत्रों ने बताया कि राज्य में बहने वाली बैनगंगा नदी को छोड़कर शेष सारी नदियां मध्य प्रदेश में प्रदूषण के मानकों पर रडार पर ही हैं। राज्य की नर्मदा, खान, चंबल, क्षिप्रा, नर्मदा, टोंस, बेतवा, मंदाकनी आदि में प्रदूषण इतना अधिक है कि इसका उपयोग हानिकारक ही है। सब देख रहे हैं, सांसद चुप हैं विधायक मस्त हैं।

एमपी में मनरेगा में मची है जमकर लूट
कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना (मनरेगा) में भ्रष्टाचार की कलई धीरे धीरे खुलने लगी है। एसा नहीं कि केंद्र को इसकी जानकारी नहीं है कि उसके द्वारा दी जाने वाली अरबों खरबों रूपयों की इमदाद को दिल खोलकर लूटा जा रहा हो। विडम्बना है कि कांग्रेस और केंद्र सरकार जनता के गाढ़े पसीने की कमाई में भ्रष्टाचार का इस्तेमाल महज चुनावी लाभ को मद्देनजर रखकर किया जा रहा है। बताया जाता है कि एमपी में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक प्रशिक्षु अधिकारी अभिजीत अग्रवाल द्वारा कांग्रेस के मण्डला सांसद बसोरी सिंह मसराम के संसदीय क्षेत्र में अपनी तैनाती के दौरान एक तहसील में मनरेगा से संबंधित कामों की मानीटरिंग आरंभ की है। उक्त अधिकारी द्वारा मनरेगा योजना के आरंभ होने से वर्तमान तक पूर्ण, अपूर्ण एवं कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी हो चुकी समस्त कार्यों की नस्ती को बुलाया गया है।

शीर्ष पदों में जमकर घमासान
वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम के बीच अब समन्वय नहीं बचा है। वर्चस्व की जंग में दोनों महारथी अब एक दूसरे की जड़ें काटने की जुगत में लग चुके हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि संसद के शीतकालीन सत्र में ही इनके बीच की रार उभरकर सामने आ सकती है। प्रणव मुखर्जी और चिदम्बरम के बीच की जंग अब उनके पुत्रों की जासूसी पर आकर टिक गई है जिससे लोग भयभीत हैं कि इनके बीच का शीत युद्ध भभक न जाए। संसदीय इतिहास में पहली बार एसा हो रहा है कि गृह मंत्री और वित्त मंत्री के बीच संबंध सामान्य न हों। इन दोनों संवैधानिक पदों के बीच पहली बार तलवारें खिचीं नजर आ रही हैं। आलम इस कदर बिगड़ चुका है कि सत्ता के संवैधानिक दोनों केंद्र एक दूसरे की जासूसी में लगे हुए हों।

त्रिवेदी पर अब बनर्जी नहीं दिखाएंगी ममता
देश के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी का शनि कुछ भारी ही चल रहा है। उनके और त्रणमूल की सुप्रीमो ममता बनर्जी के बीच अब रिश्ते सामान्य नहीं बचे हैं। रेल्वे से जुड़े उद्योगपतियों से दिनेश त्रिवेदी का मंत्रालय के बजाए घर पर मिलना ममता को रास नहीं आ रहा है। साथ ही त्रणमूल के सांसदों को त्रिवेदी भाव नहीं दे रहे हैं। रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के करीबी सूत्रों का कहन है कि पूर्व रेल मंत्री और त्रणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी और वर्तमान रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के बीच रिश्तों में खटास आ चुकी है। पिछले दिनों जब रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पश्चिम बंगाल प्रवास पर थे तब उन्होंने कलकत्ता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भेंट में ममता बनर्जी काफी उग्र नजर आईं। ममता ने दो टूक शब्दों में इस बात पर आपत्ति दर्ज कराई कि आखिर क्या वजह है कि दिनेश त्रिवेदी उद्योगपतियों से अपने रेल मंत्रालय के सरकारी कार्यालय में मिलने के बजाए अपने घर पर क्यों मिला करते हैं।

माल्या ने साधा प्रणव को मन से
शराब माफिया या लिकर किंग की अघोषित उपाधि पाने वाले उद्योगपति सांसद विजय माल्या की ताल पर कांग्रेस अब ठुमके लगाती दिख रही है। विजय माल्या के पास अकूल दौलत है, उनकी शराब को पीकर समूचा देश झूमता है। उनके हवाई जहाज में राजनेता सैर करते हैं, तब फिर माल्या को सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस सर माथे पर भला क्यों न बिठाए। माल्या के पुत्र भी इन दिनों मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं। कांग्रेस के अंदरखाने में नागरिक विमानन मंत्री वायलर रवि और वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह के द्वारा विजय माल्या की तरफदारी के मायने खोजे जा रहे हैं। रवि और मनमोहन सिंह दोनों ही किंगफिशर की डूबती नैया को बचाने की पुरजोर कोशिशों में लगे हुए हैं। दरअसल माल्या से कांग्रेस के नेता इसलिए भी खौफ खा रहे हैं क्योंकि कर्नाटक की राजनीति में माल्या की गहरी पकड़ है। सूबे के कम से कम एक दर्जन से अधिक विधायक माल्या के इशारों पर ही कदम ताल करते नजर आते हैं।

सपा में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियां
उत्तर प्रदेश पर राज करने वाले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी अगर सत्ता में आई तो आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश को अपेक्षाकृत युवा मुख्यमंत्री यानी अखिलेश यादव मिल सकते हैं। एक बार फिर राजनैतिक शख्सियतों में सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं। जिस तरह कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा सत्ता की बागडोर अब अपने पुत्र राहुल गांधी के हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है उसी तर्ज पर मुलायम सिंह यादव भी अपने पुत्र अखिलेश यादव को आगे बढ़ाने में लग गए हैं। समाजवादी पार्टी के अतिविश्वस्त सूत्रों का कहना है कि ढलती उम्र के कारण अब मुलायम सिंह यादव ने सूबाई राजनीति से तौबा करने का मन बना लिया है। अगर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर समाजवादी पार्टी काबज होती है तो आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की कमान अखिलेश यादव के हाथों में ही होगी। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता हस्तांतरण का मन पूरी तरह बना लिया है।

पुच्छल तारा
कांग्रेस पर समूचा देश लानत मलानत भेज रहा है, किन्तु मोटी चमड़ी वाले जनसेवकों को कुछ असर नहीं पड़ रहा है। मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला के छंदों की तर्ज पर इंग्लेण्ड के लंदन शहर से अभिलाषा जैन ने एक शानदार ईमेल भेजा है। उन्होंने जूते की अभिलाषा शीर्षक से एक कविता भेजी है:-

जूते की अभिलाषा!

चाह नहीं विश्व सुंदरी के पग में पहना जाऊं!
चाह नहीं मंत्रियों के चरणों को सजाऊं!!

चाह नहीं ‘मॉल‘ में बैठ अपने भाग्य पर इतराऊं!
मुझे पैक कर देशवासियों उनके मुंह पर देना फेंक!!

जा रहे तिहाड़ जेल जो!
बेच बेच कर भारत देश!!

जय हिन्द, जय भारत

कार्पोरेट सोच के धनी हैं दिनेश त्रिवेदी


कार्पोरेट सोच के धनी हैं दिनेश त्रिवेदी

ममता को रास नहीं आ रहा त्रिवेदी का नया खेल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की पटरी अब अपनी ही पार्टी की सर्वे सर्वा सुश्री ममता बनर्जी से मेल नहीं खा पा रही है। ममता और त्रिवेदी के बीच के रिश्तों में आई खटास की वजहों पर से अब परतें उखड़ने लगी हैं। सादगी की प्रतिमूर्ति बनी ममता बनर्जी को रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी का कार्पोरेट आचार विचार गले नहीं उतर पा रहा है। वैसे भी दिनेश त्रिवेदी पर त्रणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप लग चुके हैं।

पश्चिम बंगाल की निजाम सुश्री ममता बनर्जी के करीबी सूत्रों का दावा है कि उनके और केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के बीच खाई कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। सूत्रों ने कहा कि त्रिवेदी विरोधी नेताओं ने ममता के कान उनके खिलाफ भरने आरंभ कर दिए हैं। इतना ही नहीं रेल विभाग की कार्यप्रणाली के बारे में त्रिवेदी विरोधियों के साथ ही साथ रेल विभाग के ममता बनर्जी के करीबी आला अफसरान ही फीड बैक देने से नहीं चूक रहे हैं।

सूत्रों ने बताया कि रेल वैगन का काम बिना किसी निविदा के पब्लिक सेक्टर की कंपनी भारत हेवी इलेक्ट्रीकल लिमिटेड को दे दिया गया है। इसमें ही जबर्दस्त खेल हुआ है। भेल वैसे तो भारी उद्योग विभाग के अधीन आती है पर यह ठेका भेल को इसलिए दिया गया है क्योंकि भेल इस ठेके को सबलेट करेगी। अगर निविदा बुलाई जाती तो कहानी कुछ और बन जाती।

सूत्रों ने कहा कि भेल इस काम को पेटी या सब कांट्रेक्ट पर टीटागढ़ वैगन को दे चुकी है। इस निजी कंपनी के मालिक अक्सर ही केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल और दिनेश त्रिवेदी की चौखट चूमते दिख जाते हैं। सूत्रों ने आश्चर्यजनक खुलासा करते हुए कहा कि इस पूरी की पूरी डील में संचार क्रांति के जनक माने जाने वाले सैम पित्रोदा की महती भूमिका रही है।
दिनेश त्रिवेदी वैसे भी सैम पर मेहरबान हैं, त्रिवेदी ने पित्रोदा को रेल आधुनिकीकरण कमेटी का सर्वेसर्वा भी बनाया हुआ है। सूत्रों की मानें तो जब रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की इस कारस्तानी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और त्रणमूल कांग्रेस की चीफ सुश्री ममता बनर्जी के संज्ञान में लाया गया तो वे हत्थे से ही उखड़ गईं। अब लगने लगा है कि दिनेश त्रिवेदी की रेल जल्द ही पटरी से उतरने वाली है।

क्या माटी का कर्ज चुकाएंगे जनसेवक?


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 2

क्या माटी का कर्ज चुकाएंगे जनसेवक?

कद्दावर नेताओं की कर्मभूमि रहा है महाकौशल

केंद्रीय और सूबाई मंत्रियों की खदान है महाकौशल


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के हृदय प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को अगर केंद्र बना दिया जाए तो इसके इर्दगिर्द के लगभग अस्सी जिलों को इससे जोड़ा जा सकता है। वैसे भी महाकौशल क्षेत्र देश और प्रदेश के कद्दावर नेताओं की कर्मभूमि रहा है। कांग्रेस भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं ने महाकौशल को सदा से ही अपनी कर्मभूमि बनाया हुआ है।

महाकौशल क्षेत्र का इतिहास अगर देखा जाए तो मध्य प्रदेश के छटवें मुख्यमंत्री के रूप में द्वारका प्रसाद मिश्रा को इसी महाकौशल प्रांत ने प्रदेश को दिया जो 30 सितम्बर 1963 से 8 मार्च 1967 एवं 9 मार्च 1967 से 29 जुलाई 1967 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री पंडित गार्गीशंकर मिश्र की कर्मभूमि भी छिंदवाड़ा और सिवनी ही रही है।

कांग्रेस के खेमे में भी अनेक कद्दावर नेताओं की फौज आज भी महाकौशल का प्रतिनिधित्व करती दिखती है। मध्य प्रदेश और केंद्र में अपनी ईमानदारी एवं दबंग प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा मनवाने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा, केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, रामेश्वर नीखरा, सत्येंद्र पाठक, हरवंश सिंह ठाकुर, नर्मदा प्रसाद प्रजापति, बाबू चंद्र मोहन दास आदि न जाने अनगिनत चेहरे हैं। कांग्रेस में श्रीमति उर्मिला सिंह और नंद किशोर शर्मा इसी महाकौशल के वाशिंदे रहे हैं जिनमें से उर्मिला सिंह वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की महामहिम राज्यपाल के पद पर विराजमान हैं।

वहीं दूसरी और भाजपा में भी महाकौशल की गोद में अनेक विभूतियां हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष फग्गन सिंह कुलस्ते, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के असंगठित मजदूर संघ के नेशनल प्रेजीडेंट प्रहलाद सिंह पटेल, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी, मध्य प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष श्रीमति नीता पटेरिया, अजजा के प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश धुर्वे, अनुसुईया उईके, राकेश सिंह आदि बैठे हुए हैं।

वहीं शरद यादव आज जनता दल यूनाईटेड के माध्यम से देश में छाए हुए हैं, उनकी शिक्षा दीक्षा भी जबलपुर में ही हुई और उन्होंने छात्र राजनीति में जबलपुर में ही कदम रखा। अब लाख टके का सवाल यह खड़ा हुआ है कि महाकौशल प्रांत में पैदा हुए या इस प्रांत को कर्मभूमि बनाकर नेम फेम कमाने वाले जनसेवकों द्वारा अपनी इस माटी को प्रथक प्रदेश में तब्दील करने के प्रयास कर इस माटी का कर्ज चुकाने का जतन किया जाएगा अथवा नहीं?

(क्रमशः जारी)

सौ करोड़ का ड्रामा देखेगा हिन्दुस्तान


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 45

सौ करोड़ का ड्रामा देखेगा हिन्दुस्तान

एक नाटक के लिए बहाया पानी की तरह पैसा

नेहरू गांधी परिवार को महिमा मण्डित करने का प्रयास


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अंबिका सोनी के नेतृत्व वाले सूचना और प्रसारण विभाग के द्वारा सौ करोड़ रूपए पानी में बहाकर कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की छवि को चमकाने की कार्ययोजना बनाई गई है। सूचना और प्रसारण विभाग के अधीन कार्यरत विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय की शाखा साउंड एण्ड ड्रामा डिवीजन (गीत एवं नाटक प्रभाग) के द्वारा नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) को महिमा मण्डित करने की गरज से एक नाटक तैयार करवाया जा रहा है।

डीएवीपी के सूत्रों का कहना है कि यह नाटक मूलतः नेहरू गांधी परिवार की महिलाओं पर केंद्रित है। इस नाटक के शुरूआत में लगभग 45 मिनिट तक स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को चित्रित किया गया है। इसके उपरांत लगभग सवा घंटे तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पहले और दूसरे कार्यकाल का बखान किया गया है। इस तरह यह दो घंटे का नाटक तैयार किया गया है।

सूत्रों ने कहा कि दो घंटे की इस श्रृव्य और दृश्य अर्थात आडियो वीडियो सीडी को बनाने के लिए पहले चरण में पचास करोड़ रूपए की राशि आवंटित की गई है। वर्तमान में यह हिन्दी भाषा में तैयार हो रही है। इसके बाद देश की अन्य भाषाओं के लिए इसे बाद में तैयार किया जाएगा, जिसके लिए पचास करोड़ रूपए की राशि प्रथक से जारी की जाएगी।

(क्रमशः जारी)

सारासर लूट मची है आईडिया के नेट कनेक्शन में!


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  31

सारासर लूट मची है आईडिया के नेट कनेक्शन में!

अभिषेक बच्चन को कोस रहे आईडिया सब्सक्राईबर

एक माह के बाद सर पकड़कर बैठ जाते हैं उपभोक्ता


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया सेल्युलर द्वारा एक तरफ तो नित ही सफलताओं के नए कीर्तिमान स्थापित करने का दावा किया जाता है वहीं दूसरी ओर जूनियर बी यानी अभिषेक बच्चन से प्रभावित होकर उपभोक्ताओं द्वारा आईडिया सेल्युलर का मोबाईल कनेक्शन लिया जा रहा है। बाद में जब उपभोक्ता अपने आप को लुटा पिटा सा महसूस करता है तब वह आईडिया के साथ ही साथ अभिषेक बच्चन को कोसता नजर आता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आईडिया का मोबाईल या नेट कनेक्शन लेने पर उपभोक्ताओं को रिटेलर या आईडिया के कारिंदों द्वारा मनमानी स्कीम बता दी जाती हैं। समय गुजरने के साथ ही जब उपभोक्ताओं को बताई गई स्कीम उसे नहीं मिल पाती है तब उपभोक्ता अपने आप को लुटा पिटा ही पाता है। रिटेलर, स्टाकिस्ट या आईडिया के कर्मचारियों द्वारा उसे बाद में भ्रामक जानकारियां देकर भरमाया जाता है।

अनेक उपभोक्ताओं का कहना है कि आईडिया की सेल आफ्टर सर्विस इतनी घटिया है कि बाद में ग्राहक अपने आप को बुरी तरह ठगा सा ही महसूस करता है। आईडिया में कस्टर केयर अधिकारियों से बात करना भी आसान नहीं है। लोगोें ने कहा कि टीवी और अखबारों में अभिषेक बच्चन को आईडिया का विज्ञापन करते देख वे आईडिया का कनेक्शन तो ले लेते हैं पर बाद में सर्विसेस न मिल पाने पर वह आईडिया के बजाए अभिषेक बच्चन को ही कोसता नजर आता है। आईडिया के इस रवैऐ से वह अपनी साख पर तो बट्टा लगा ही रहा है, साथ ही साथ सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साहब जादे जूनियर बच्चन की छवि पर भी जमकर बट्टा लगा रही है।

(क्रमशः जारी)