गुरुवार, 14 जून 2012

एमपी अजब है, सबसे गजब है!


एमपी अजब है, सबसे गजब है!
(स्नेहा चौहान)
भोपाल (साई)। एमपी अजब है, सबसे गजब है। मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के इस नारे की असलियत देखनी हो तो जबलपुर आएं। यहां से 40 किलोमीटर दूर बरगी बांध को बने 23 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके कारण विस्थापित हुए 11 गांवों के लोग वजूद में तो अभी भी मौजूद हैं लेकिन सरकारी रिकार्ड में उनकी कहीं कोई मौजूदगी नहीं बची है। विस्थापन के बाद आज तक सरकारी रिकार्ड में उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी है। हालांकि इन गांवों में सड़क है, बिजली है और लोग भी रहते हैं पर सरकार इन्हें ‘भूत’ मानकर इनके वजूद को ही नकार रही है।
इस लापरवाही के कारण विस्थापित हुए 1049 परिवारों का जीना मुहाल है। काम-धंधा न होने के कारण लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जब इन गांवों का नामो-निशान ही नहीं है तो फिर विकास परियोजनाओं की मंजूरी मुमकिन नहीं। राज्यह सरकार के अतिरिक्तम क्षेत्रीय आयुक्तो बीके मिंज ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि सरकार ने इन गांवों के लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया है।
बीते दो दशक में चार बार सरकारें बदलीं, लेकिन विस्थातपितों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आयुक्तों के मध्य प्रदेश में राज्य सलाहकार की ओर से जबलपुर के जिला कलेक्टकर गुलशन बामरा को भेजे पत्र में इन 11 गांव के लोगों को रोजगार देने का आग्रह किया गया था। इसके फौरन बाद विस्थापित परिवारों के लिए नरेगा के तहत काम के अवसर तो मुहैया कराए गए, लेकिन राजस्व के नक्शे में न होने से लोगों को उनके गांव में ही काम नहीं मिल सका। ऐसे में प्रशासन ने लोगों को सात किलोमीटर दूर सालीवाड़ा में नरेगा के तहत काम दिया। रोजाना 14 किलोमीटर का पैदल सफर और ऊपर से दिनभर हाड़तोड़ मेहनत। लिहाजा इक्का-दुक्का लोगों से कुछ दिनों तक काम किया और फिर सूरत और तमिलनाडु से लेकर मेघालय और सिक्किडम जाकर काम करना ज्यांदा मुनासिब समझा। हालत यह है कि परिवार के सभी लोग एक साथ पलायन करते हैं, क्योंकि सरकार के रिकार्ड में वीरान हो चुके गांवों में किसी सदस्य को छोड़ना जोखिमभरा है। विस्थापित हुए परिवारों में 40 फीसदी से ज्यारदा आदिवासी हैं। चूंकि इनके गांव नक्शे में नहीं हैं, इसलिए इन्हें अस्पएताल, राशन, पानी और बच्चों की शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं हैं।
0 कहां और किससे हुई गलती
नर्मदा नदी पर बरगी बांध 1974 में बना। जैसे-जैसे इसमें पानी भरता गया और गांव डूबते गए। उस समय विस्थापन की कोई नीति न होने पर न तो प्रशासन ने लोगों को न तो बसाने की कोई योजना बनाई और न ही उसके पास पुनर्वास के लिए कोई सरकारी जमीन थी। लोगों से सिर्फ इतना कहा गया कि पानी आएगा, आप सब डूब जाओगे। लिहाजा मुआवजा राशि लो और चलते बनो। जान बचाने के लिए लोगों ने अपनी डूबती जमीनों का नाममात्र का मुआवजा लिया और पहाड़ी पर चले गए। इधर गांव खाली हुए और सरकार ने अपने रिकार्ड से उनका नाम गायब कर दिया। दूसरी ओर लोगों ने उसी नाम से गांव बसा लिए, जहां वे पहले रहते थे। जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों के 162 गांव बरगी के पानी में डूबे। इन्हीं 162 गांवों में से 11 गांव सरकारी रिकार्ड से गायब हैं। अब भले ही सरकारी रिकार्ड से ये गांव गायब हो चुके हैं लेकिन हकीकत में ये गांव अपने पूर्ववर्ती नामों के साथ मौजूद हैं।
0 लापरवाही की इंतिहां
बरगी बांध विस्थापित संघ 1989 से इन 11 गांवों के मामले को सरकार और जिला प्रशासन के सामने उठा रहा है, लेकिन अफसर टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और राज्यस्तरीय समितियों ने प्रशासन से कहा कि वह विस्थापित 11 गांवों को राजस्व के रिकार्ड में शामिल करें, ताकि वहां रहने वाले परिवारों की बेहतरी के लिए योजनाएं चलाई जा सकें। पिछले साल तत्कालीन जिला कलेक्टर हरिरंजन राव कठौतिया ने प्रभावित इलाके का दौरा कर 11 गांवों को आबाद घोषित कर उन्हें राजस्व के रिकार्ड में शामिल करने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है।

0 प्रशासन ने किसी की नहीं मानी
- प्रकरण क्र. 5120/96-97/छभ्त्ब् के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विजिट 12-15 सितंबर 1996 से उभरी अनुशंसाओं में से एक ।
  
- 20 जनवरी 95 को बरगी बांध के पुनर्वास के संबंध में बनाई गई राज्य स्तरीय समिति द्वारा स्पष्ट रुप से आदेशित किया कि वनभूमि या अन्य जमीनों पर जहां पर भी विस्थापित जाकर बसे हैं, उन्हें वहीं पर सैटल कर उनकी उस भूमि को आबादी घोषित करना।
   
- 2/11/93 को डॉ. बी.डी.शर्मा की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय समिति की बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार यह प्रक्रिया 30 अप्रैल 1994 तक पूरी हो जानी थी।
   
- 17/03/94 को डॉ. बी.डी.शर्मा की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय समिति की बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार यह प्रक्रिया 30 अप्रैल 1994 तक पूरी हो जानी थी।
   
- 20/1/95 को भी तत्कालीन नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण आयुक्त अध्यक्ष डॉ. रणजीत सिंह जी ने सभी जिला कलक्टरों के इस संबंध में आदेशित किया था।

ममता मुलायम का मनमोहनी प्रहार


ममता मुलायम का मनमोहनी प्रहार

(संजय तिवारी)

इघर दिल्ली में बुधवार की शाम जब ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव अपने पसंदीदा तीन उम्मीदवारों का नाम ले रहे थे तो उधर इन पसंदीदा तीन उम्मीदवारों में से एक को पता भी नहीं था कि दूर दिल्ली में उनका नाम देश के सर्वाेच्च प्रशासक और भारत के प्रथम नागरिक के लिए लिया जा रहा है। वे हैं सोमनाथ चटर्जी। कुछ टीवी चौनलवाले उनसे जानने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि उनसे तो किसी ने संपर्क ही नहीं किया। फिर उनका नाम कैसे आया? पता नहीं। शायद मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी ने मीटिंग्स के बाद तेरी पसंद मेरी पसंद वाला जो राजनीतिक खेल शुरू किया उसमें जो तीन नाम सामने रखे गये वे तीन कोणों को ध्यान में रखकर सामने लाये गये। चलिए इन नामों की गणित और उससे निकलने वाले परिणाम की तरफ सोचते हैं।
सोमनाथ चटर्जी का नाम सिर्फ भ्रम पैदा करने के लिए लिया गया है। मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी की भले ही सोमनाथ चटर्जी से पूरी सहानुभूति हो लेकिन वे मुलायम सिंह यादव कभी भी वामपंथियों को नाराज करके सोमनाथ चटर्जी का नाम सर्वाेच्च नागरिक के लिए आगे नहीं करेंगे। लेकिन क्योंकि उनका ममता बनर्जी से नया नया याराना है इसिलए इस नाम पर वे आपत्ति करने से बच गये होंगे। अगर ममता बनर्जी वामपंथियों को एक नाम लेकर पीड़ित करना चाहती हैं तो मुलायम सिंह को मौन सहमति देने में भला ऐतराज क्यों होगा? इसी तरह दूसरा नाम एपीजे अब्दुल कलाम का है। कलाम के बारे में कहा जाता है कि वे मुलायम सिंह यादव की पसंद हैं। इसमें अगर कोई सच्चाई है तो सिर्फ इतनी कि कलाम मुस्लिम तबके से आते हैं और समूचे देश में उनकी स्वच्छ छवि है। लेकिन शायद ही मुलायम सिंह कभी चाहेंगे कि कलाम राष्ट्रपति बनें। कलाम का नाम इसलिए आगे किया गया है अगर राज्यों के लिए पैकेज को लेकर कांग्रेस से राजनीतिक सौदेबाजी पूरी नहीं होती है तो वे एक ऐसा नाम अपने पास रखना चाहेंगे जिसे एनडीए का समर्थन मिल जाए। कलाम को कल भी एनडीए ने राष्ट्रपति बनवाया था और आज भी उसे कलाम के नाम पर कोई ऐतराज नहीं होगा। कलाम का नाम सामने आया तो टीडीपी जैसे दल भी समर्थऩ कर देंगे और संगमा को समर्थन देने का ऐलान कर चुकीं जयललिता भी कलाम के नाम पर अपनी सहमति दे सकती हैं। लेकिन शायद ऐसा दिन आयेगा नहीं।
फिर मुलायम ममता की प्रस्तावना में आखिरी नाम बचता है मनमोहन सिंह का। मनमोहन सिंह का नाम ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद लिया है। ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच करीब घण्टे भर की मुलाकात के पहले ममता बनर्जी मुलायम सिंह यादव से मिली थीं और मुलाकात के बाद भी वे सीधे नेताजी के घर पहुंची। इसी के बाद दोनों ने संयुक्त रूप से प्रेस कांफ्रेस की और तीन नाम सामने कर दिये। सोनिया गांधी के घर से बाहर आते हुए ममता बनर्जी ने मीडिया से एक संक्षिप्त बात की। अगर वे चाहतीं तो ऐसा न करतीं लेकिन उन्होंने ऐसा किया। और कहा कि वे सोनिया गांधी या फिर कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव मुखर्जी पहली पसंद हैं। ऐसा कहने के पीछे जो राजनीतिक संदेश था वह यह कि प्रणव मुखर्जी कांग्रेस की पसंद हैं, उनकी नहीं। याद करिए पिछले दो तीन दिनों में खुद प्रणव मुखर्जी और उनके बेटे मीडिया में यह बयान दे चुके हैं कि केवल चाहने से वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं हो जाएंगे। उनके बेटे ने तो तृणमूल कांग्रेस पर शक भी जाहिर किया था कि कौन जाने ममता बनर्जी दादा के नाम पर अपनी सहमति देने से इंकार कर दें। इसका मतलब कम से कम प्रणव बाबू और उनका परिवार जानता था कि ममता बनर्जी प्रणव दादा के नाम पर सीधे तौर पर अपनी सहमति नहीं देंगी। बात सिर्फ इतनी है या फिर कहानी कुछ और भी है?
देश के अगले राष्ट्रपति के लिए निश्चित रूप से वही नाम स्वीकार किया जाएगा जिससे कम से कम यूपीए के सभी दलों की राजनीति सधती हो। कांग्रेस, सपा, तृणमूल, डीएमके सभी के लिए जो मुफीद सौदा होगा, राष्ट्रपति पद के लिए वही साझा उम्मीदवार बन जाएगा। कांग्रेस के लिए जब अपने ष्संकटष् और ष्संकटमोचकष् के बीच चुनने के वक्त आयेगा तो निश्चित तौर पर वह संकटमोचक से निजात पाने की बजाय संकट से छुटकारा पाना चाहेगी। संभवतरू ममता और मुलायम के जरिए उसने इस दिशा में पहल भी शुरू कर दी है।
इस और वाली कहानी का अहम सवाल उन संकेतों से शुरू होता है जो प्रणव मुखर्जी ने देना शुरू किया था। वे राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते, फिर वे रोज सुबह टहलते हैं और इस चहलकदमी के लिए उन्हें अपने घर के छोटे से लान के चालीस चक्कर लगाने पड़ते हैं जैसे संकेत क्यों दिये जा रहे थे कि प्रणव मुखर्जी का नाम राष्ट्रपति के लिए सामने आ जाए? कम से कम प्रणव मुखर्जी इतने राजनीतिक तो हैं ही कि इन संकेतों का मतलब खुद तो समझते ही थे। लेकिन इन संकेतों के साथ ही एक सवाल हमेशा बना रहा कि आखिर अपने राजनीतिक संकटमोचक को कांग्रेस राष्ट्रपति भवन में लेजाकर क्यों बिठा देगी? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। राजनीतिक सूचनाओं का आदान प्रदान करनेवाले दिल्ली के सूत्रधार भी यही संदेश ले दे रहे थे कि आखिरकार दादा के नाम पर ही सहमति बनेगी और वे ही देश के अगले राष्ट्रपति होंगे। लेकिन इन सूचनाओं और संदेशों के बीच एक छोटी सी राजनीतिक सूचना और लीक हुई थी कि मनमोहन सिंह भी सम्मानजनक विदाई का रास्ता खोज रहे हैं। संभवतरू वे राजनीतिक रूप से अपनी इच्छा व्यक्त कर चुके थे कि प्रधानमंत्री पद से वे तभी मुक्त होना चाहेंगे जब उन्हें रायसीना हिल्स पर पक्के तौर पर पांच साल के लिए पदोन्नत कर दिया जाए। कांग्रेस के लिए यह घाटे का सौदा नहीं था लेकिन उस वक्त यह भी कहा गया कि कांग्रेस मनमोहन सिंह की इतनी भी सम्मानजक विदाई के पक्ष में नहीं हैं।
तो क्या ममता मुलायम के तीन नामों में मनमोहन सिंह का नाम किसी योजना के तहत रखा गया है? मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं इसे कम से कम ममता और मुलायम तो जानते ही होंगे। और किसी भी प्रधानमंत्री का नाम राष्ट्रपति वाली सूची में सहयोगी दलों द्वारा सुझाया जाए तो यह इतना भी अचानक और अप्रत्याशित तो नहीं होगा। मुलायम सिंह सोनिया गांधी के ऋणी हों या न हों लेकिन मनमोहन सिंह के प्रति अक्सर कृतज्ञ नजर आते हैं। कारण कई हैं। राज बहुतेरे हैं। यह मनमोहन सिंह ही थे जो वाया अमर सिंह मुलायम को अमेरिकी हित साधनेवाले परमाणु विधेयक पर समर्थन देने के लिए राजी कर लिया था। कहने के लिए तो मुलायम सिंह कांग्रेस का साथ देते नजर आ रहे थे लेकिन असल में उन्होंने मनमोहन सिंह का साथ दिया था क्योंकि सीबीआई के शिकंजे से फिलहाल पीएमओ ही उनकी रक्षा कर सकता था। कहते तो यह भी हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुलायम सिंह की फतेह और कांग्रेस की फजीहत में भी मनमोहन सिंह की मंद मंद मुस्कान शामिल थी। रही बात ममता की तो मनमोहन सिंह का नाम सामने लाकर ममता बनर्जी न सिर्फ कांग्रेस का संकट काट रही हैं बल्कि मनमोहन सिंह को वह पद दिलाने में मदद भी कर रही हैं जो उनकी अब शायद आखिरी महत्वाकांक्षा है। कौन जाने पीएमओ में लंबे समय तक राष्ट्रीय सुलाहकार रहे एम के नारायणन ने भी अपनी कोई भूमिका निभाई हो जो इन दिनों पश्चिम बंगाल में बतौर गवर्नर तैनात हैं।
मंगलवार शाम से बुधवार शाम के बीच जितना राजनीतिक मंथन हुआ है उसमें ममता और मुलायम महत्वपूर्ण खिलाड़ी नजर आ रहे हैं। अभी ममता बनर्जी एक दिन और रहेंगे और इस एक दिन में वे मनमोहन सिंह से भी मुलाकात करेंगी। तो क्या कांग्रेस ममता बनर्जी को एक राजनीतिक विदूषक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए वह हासिल करना चाहती है जो कई असफल कोशिशों के बाद भी हासिल नहीं कर पाई है? क्या मनमोहन सिंह की सम्मानजक विदाई का रास्ता अब ममता और मनमोहन के जरिए निकाला जा रहा है? अगर ऐसा है तो राष्ट्रपति उम्मीदवार से बड़ा सवाल यह है कि मनमोहन पीएमओ से चले गये तो अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? देश राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहा तो क्या इस चुनाव के बीच कांग्रेस प्रधानमंत्री का पद भी अपनी अगली पसंद के लिए खाली कर लेना चाहती थी? राजनीतिक और गैर राजनीतिक की इस बहस में क्या कांग्रेस अपनी राजनीति ठीक कर रही है? फिर प्रणव बाबू के संकेतों का क्या? क्या वे जानबूझकर ऐसे संकेत दे रहे थे कि वे राष्ट्रपति बनना चाहते हैं लेकिन समहति मनमोहन सिंह के नाम पर है इसलिए वे पीछे जा रहे हैं? तो क्या जो इच्छा मनमोहन सिंह कांग्रेस के रास्ते पूरा नहीं कर पाये उसे अब ममता मुलायम के जरिए पूरा कर रहे हैं? पहले ही सवालों के ढेर लगे थे, अब उसमें कुछ और सवाल जुड़ गये हैं। चौनलों के वरिष्ठ विश्लेषक भी संभावनाओं में गोते लगा रहे हैं, आप भी लगाइये, हम भी लगाते हैं। देश के लिए राष्ट्रपति चुना जाना है, इतनी राजनीति तो नाजायज नहीं है।
(लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक हैं)

बुधवार, 13 जून 2012

महामहिम के लिए मनमोहन के नाम पर जोर

महामहिम के लिए मनमोहन के नाम पर जोर

(प्रियंका श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से मिलने पहुंची। करीब 45 मिनट चली मुलाकात के बाद ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने एक साझा बयान जारी करके राष्ट्रपति पद के लिए तीन नाम सुझाए।
मुलायम सिंह यादव ने कहा, कि तीन नामों पर उन्होंने विचार किया, पहला नाम है एपीजे अब्दुल कलाम, दूसरा नाम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, तीसरा नाम पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी।
ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी द्वारा सुझाए प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी के नाम को नकार दिया। प्रणब मुखर्जी का पत्ता काटते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति ऐसा व्यक्ति हो जिसे देश सम्मान से देखता हो। ममता ने कहा, श्हम सभी सहयोगी दलों से अपील करते हैं कि वो इन तीन नामों में से किसी एक पर सर्वसहमति करे।श्
मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी द्वारा सोनिया गांधी द्वारा सुझाए गए दोनों नामों को नकारने के बाद कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अलवी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, श्हमें समाजवादी पार्टी और ममता बनर्जी से पूरी उम्मीद है कि हम सब मिलकर ऐसे नाम पर सहमत हो जाएंगे कि जिस पर सभी राजी हो जाएंगे।श्
इससे पहले राष्घ्ट्रपति चुनाव पर चर्चा के लिए ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मुलाकात किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। करीब 40 मिनट की मुलाकात के बाद ममता ने कहा था, कि सोनिया गांधी के साथ उनकी बहुत विस्तार से बात हुई। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस पार्टी की पहली पसंद प्रणब मुखर्जी और दूसरी पसंद हामिद अंसारी है।
ममता ने कहा कि इस पर उन्होंने कहा कि वे अभी इसके बारे में कुछ नहीं कह सकतीं। अभी उन्हें मुलायम सिंह यादव के घर जाकर उनसे चर्चा करनी है। वहीं कांग्रेस की ओर से प्रणब मुखर्जी का नाम सामने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों ने भी प्रणब के नाम पर सहमति के संकेत दिए हैं।

25 आईएएस के तबादले

25 आईएएस के तबादले
 
(नन्द किशोर)

भोपाल (साई)। राज्य शासन द्वारा 25 आई.ए.एस. अधिकारियों को स्थानांतरित कर पदस्थापना के आदेश जारी किये गये हैं। श्री सुदेश कुमार प्रमुख सचिव सार्वजनिक उपक्रम तथा आयुष को प्रमुख सचिव संसदीय कार्य एवं जन-शिकायत निवारण, श्री विनोद चन्द्र सेमवाल प्रमुख सचिव पर्यटन, संस्कृति, संसदीय कार्य विभाग को प्रमुख सचिव राज्यपाल, श्री के.पी. सिंह वि.क.अ.-सह-पंजीयन महानिरीक्षक एवं अधीक्षक मुद्रांक को प्रमुख सचिव सार्वजनिक उपक्रम विभाग, श्रीमती सलीना सिंह प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश अनुसूचित-जाति वित्त एवं विकास निगम को प्रमुख सचिव मछली-पालन तथा प्रबंध संचालक मत्स्य महासंघ का अतिरिक्त प्रभार, श्री अजय तिर्की प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ को प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा एवं श्रम, डॉ. एम. मोहनराव वि.क.अ.-सह-आयुक्त अनुसूचित-जाति कल्याण को प्रमुख सचिव अनुसूचित-जाति कल्याण एवं प्रबंध संचालक अनुसूचित-जाति वित्त विकास निगम का अतिरिक्त प्रभार, श्री आशीष उपाध्याय आयुक्त-सह-संचालक आदिम-जाति क्षेत्रीय विकास योजनाएँ तथा आयुक्त आदिवासी विकास को आयुक्त अनुसूचित जनजाति कल्याण तथा आयुक्त-सह-संचालक आदिम-जाति क्षेत्रीय विकास योजनाएँ का अतिरिक्त प्रभार, श्री शिवनारायण मिश्रा सचिव वित्त को प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश खनिज विकास निगम तथा पदेन सचिव खनिज साधन, श्री अशोक वर्णवाल आयुक्त-सह-संचालक राज्य शिक्षा केन्द्र तथा पदेन सचिव स्कूल शिक्षा को प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ, श्री पंकज अग्रवाल आयुक्त कोष एवं लेखा तथा पदेन सचिव वित्त को सचिव वित्त नियुक्त किया गया है।
इसी प्रकार श्री टी. धर्माराव कमिश्नर रीवा को आयुक्त कोष एवं लेखा तथा पदेन सचिव वित्त, श्री रघुवीर श्रीवास्तव आयुक्त पिछड़ा वर्ग कल्याण को कमिश्नर शहडोल संभाग, श्री प्रदीप खरे कमिश्नर शहडोल संभाग को कमिश्नर रीवा संभाग, श्रीमती रश्मि अरुण शमी संचालक उद्यानिकी एवं मिशन संचालक उद्यानिकी को आयुक्त-सह-संचालक राज्य शिक्षा केन्द्र तथा पदेन सचिव स्कूल शिक्षा, श्री जगदीश मालपानी सचिव राज्यपाल सचिवालय को आयुक्त अनुसूचित-जाति कल्याण एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण, श्रीमती पुष्पलता सिंह संचालक ग्रामीण रोजगार को अपर सचिव मध्यप्रदेश शासन, श्री जी.पी. कबीरपंथी अपर सचिव श्रम को कलेक्टर दतिया, श्री अशोक देशवाल कलेक्टर दतिया को अपर आयुक्त आबकारी ग्वालियर, श्रीमती सोनाली एम. वायंगणकर कलेक्टर शाजापुर को अपर आयुक्त वाणिज्यिक कर इंदौर, श्री राजेश बहुगुणा संचालक जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान तथा प्रबंध संचालक लघु सिंचाई एवं कृषि को कलेक्टर छतरपुर, श्री निशांत बरबड़े कलेक्टर होशंगाबाद को उप सचिव मुख्यमंत्री, श्री आर.के. जैन अपर आयुक्त आबकारी ग्वालियर को कलेक्टर शिवपुरी, श्री प्रमोद कुमार गुप्ता अतिरिक्त संचालक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण इंदौर को कलेक्टर शाजापुर, श्री जॉन किंग्सली ए.आर. कलेक्टर शिवपुरी को संचालक ग्रामीण रोजगार एवं राज्य कार्यक्रम अधिकारी समग्र स्वच्छता अभियान और श्री राहुल जैन कलेक्टर छतरपुर को कलेक्टर होशंगाबाद के पद पर पदस्थ किया गया है।
शिवराज सरकार ने अनेक अफसरों को पदोन्नति भी दी है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के तीन अधिकारियों को प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नत करते हुए पदस्थापना आदेश जारी किये गये हैं। श्री प्रवीण गर्ग कमिश्नर भोपाल संभाग को वि.क.अ.-सह-कमिश्नर भोपाल संभाग, श्री शैलेन्द्र सिंह प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश खनिज विकास निगम तथा पदेन सचिव खनिज साधन को प्रमुख सचिव अनुसूचित-जनजाति कल्याण, विमुक्त घुमक्कड़ एवं अर्द्ध-घुमक्कड़ जाति कल्याण बनाया गया है। श्रीमती वीरा राणा आयुक्त-सह-संचालक हाथकरघा तथा प्रबंध संचालक हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम को प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश शासन के समकक्ष घोषित किया गया है।
श्री के.के. सिंह प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग को अपने वर्तमान कर्त्तव्यों के साथ-साथ संस्कृति विभाग एवं ट्रस्टी सचिव भारत भवन का अतिरिक्त प्रभार, श्री एस.पी.एस. परिहार प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन एवं विकास को वर्तमान कर्त्तव्यों के साथ पर्यटन विभाग तथा आयुक्त पर्यटन का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। श्री प्रवीर कृष्ण प्रमुख सचिव लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा भोपाल गैस त्रासदी विभाग को वर्तमान कर्त्तव्यों के साथ प्रमुख सचिव आयुष का अतिरिक्त प्रभार और श्री मनीष रस्तोगी आयुक्त बजट तथा पदेन सचिव वित्त को वर्तमान कर्त्तव्यों के साथ पंजीयन महानिरीक्षक एवं अधीक्षक मुद्रांक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
श्रीमती सलीना सिंह द्वारा प्रमुख सचिव मछली-पालन तथा प्रबंध संचालक मत्स्य महासंघ का कार्यभार ग्रहण करने पर श्री प्रभांशु कमल प्रमुख सचिव मछली-पालन एवं प्रबंध संचालक मत्स्य महासंघ के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त होंगे। श्री सुदेश कुमार द्वारा प्रमुख सचिव जन-शिकायत निवारण विभाग का कार्यभार ग्रहण करने पर डॉ. जे.टी. एक्का प्रमुख सचिव जन-शिकायत निवारण विभाग के प्रभार से मुक्त होंगे।

तबादलों की तिथि 15 तक खिसकी

तबादलों की तिथि 15 तक खिसकी

(संतोष पारदसानी)

भोपाल (साई)। प्रदेश के कई जिलों में नगरपालिका/नगर पंचायत निर्वाचन की घोषणा के फलस्वरुप आचार संहिता प्रभावशील है। राज्य शासन ने इस पर विचारोपरांत पूरे राज्य में स्थानांतरण पर प्रतिबंध से छूट की अवधि को 15 जुलाई 2012 तक बढ़ाये जाने का निर्णय लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने आज इस संबंध में आदेश जारी करते हुए सभी विभागों, विभागाध्यक्षों, कलेक्टरों, संभागायुक्तों और जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों आदि को अवगत करा दिया है।
पूर्व में राज्य एवं जिला स्तर पर अधिकारियों/कर्मचारियों के 1 मई 2012 से 15 जून 2012 तक की अवधि के लिए स्थानांतरण करने पर प्रतिबंध शिथिल किया गया था।

ठन सकती है लालू और युवराज में!


ठन सकती है लालू और युवराज में!

आईपीएल फूटी आंख नहीं सुहा रहा बिहारी क्षत्रप को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव के बीच रार बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। इन दोनों के बीच विवाद का कारण इंडियन प्रीमियर क्रिकेट लीग है। एक ओर राहुल जहां आईपीएल की माला जप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव पानी पी पी कर आईपीएल को तबियत से कोस रहे हैं।
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (बतौर सांसद सोनिया गांधी को आवंटित सरकारी आवास) के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि लालू यादव ने पिछले दिनों जब कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी से मुलाकात की तब उन्होंने आईपीएल के बारे में दिल खोलकर जहर उगला।
सूत्रों की मानें तो लालू यादव ने सोनिया को यहां तक कह डाला कि अगर जल्द ही आईपीएल पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में इसके विवादों का सीधा असर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की छवि पर पड़ सकता है। लालू की बातें सुनकर सोनिया गांधी भी सोच में पड़ गईं और उन्होंने मूलतः पत्रकार और लाल बत्ती धारी क्रिकेट के कथित ज्ञाता राजीव शुक्ला को बुला भेजा। राजीव शुक्ला के साथ चर्चा के बाद सोनिया कुछ संतुष्ट नजर आईं, वरना वे तो लालू की बातों में आकर आईपीएल पर ताला लगवाने का मन बना चुकी थीं।
सूत्रों ने कहा कि राजीव शुक्ला ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को बताया कि लालू प्रसाद यादव को वैसे तो फटाफट क्रिकेट से अधिक लेना देना नहीं है, मगर लालू का पुत्र प्रेम उन्हें आईपीएल में दखल देने पर मजबूर कर रहा है। लालू के पुत्र तेजस्वी का नाम दिल्ली डेयर डेविल्स की टीम के संभावित 33 खिलाड़ियों की फेहरिस्त में शामिल था।
पूरा का पूरा आईपीएल का तमाश हो गया, पर लालू पुत्र तेजस्वी को एक बार भी मैदान में उतरने का मौका नहीं मिला। और तो और दिल्ली डेयर डेविल्स का प्रबंधन अब लालू पुत्र को बाहर कर अन्य खिलाड़ी को इसमें स्थान देना चाह रहा है। फिर क्या था लालू का जैसे ही इस बात का इल्म हुआ उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, आखिर किसने इतनी हिमाकत कर डाली कि लालू पुत्र तेजस्वी को मैदान में ना उतारकर बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा हो। अर्थात तेजस्वी की क्रिकेट की दुनिया में कहानी आरंभ होने के पहले ही समाप्त हो गई।
यहां उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के सर पर इन दिनों क्रिकेट का भूत सवार है। राहुल गांधी उठते बैठते क्रिकेट की ही बातें सोचते रहते हैं। आलम यह है कि लोगों से बातचीत के दरम्यान भी वे क्रिकेट विशेषकर आईपीएल यानी फटाफट क्रिकेट को जरूर बीच में लाते हैं।
इन परिस्थितियों में लालू प्रसाद यादव का राहुल से नाराज होना स्वाभाविक ही है। कहते हैं कि अहम् के चलते लालू प्रसाद यादव इस असली मामले के बारे में ना तो सोनिया से ही चर्चा कर रहे हैं और ना ही राहुल के ही संज्ञान में इस बात को ला रहे हैं। हाल ही में क्रिकेट के कथित भगवान, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की राज्य सभा से एंट्री की खबर ने भी लालू के मुंह में कुनैन की कड़वी गोली फोड़कर उनके मुंह का स्वाद कसैला कर दिया था।

इस तरह झुकाया मोदी ने गड़करी को!


इस तरह झुकाया मोदी ने गड़करी को!

(शरद खरे)

नई दिल्ली (साई)। चाल, चरित्र और चेहरे के लिए विख्यात भारतीय जनता पार्टी में मोदी, जोशी प्रकरण की तहें आज भी खोजी जा रही हैं। सियासी जानकार इस पूरे मामले की पृष्टिभूमि और संजय जोशी की अगली रणनीति खोजने में लगे हैं। गड़करी के रणनीतिकारों ने भले ही मीडिया को मैनेज कर ‘‘हार कर भी जीत गए गड़करी‘‘ वाले एंगल से खबरें प्लांट करवा दीं हों, पर वास्तव में नरेंद्र मोदी के सामने बौने ही साबित हुए हैं भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी।
मुंबई कार्यकारिणी के साथ ही संजय जोशी के नाटकीय त्यागपत्र और भाजपा से उनकी बिदाई की परतें अब उघड़ना आरंभ हो गई हैं। दिल्ली में झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय ‘केशव कुंज‘ के सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने पूरी दादागिरी के साथ भाजपा को झुकाकर संजय जोशी को बाहर करवाया है।
सूत्रों की मानें तो भाजपाध्यक्ष की पहली बार कमान संभालने के वक्त नरेंद्र मोदी ने नितिन गड़करी की काफी मदद की थी। उस समय मोदी और गड़करी के बीच हुए समझौते के तहत नितिन गड़करी ने मोदी से वायदा किया था कि वे समय आने पर संजय जोशी को साईज में ला देंगे। गड़करी अपने पहले कार्यकाल में मोदी से किया वायदा नहीं निभा सके।
सूत्रों ने आगे बताया कि कार्यकारिणी के एक दिन पूर्व ही नरेंद्र मोदी ने नितिन गड़करी को फोन कर उनको उनके वायदे की याद सख्ती के साथ दिलवाई। वार्तालाप के दरम्यान, गड़करी ने मोदी से घुमा फिराकर वायदा पूरा करने की बात कही गई। जिस पर मोदी हत्थे से ही उखड़ गए।
सूत्रों ने आगे कहा कि इस मसले में नरेंद्र मोदी ने भाजपा के निजाम नितिन गड़करी को दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे (गड़करी) अब मोदी या संजय जोशी में से किसी एक को चुन लें। मोदी उस दिन काफी गुस्से में थे और उन्होंने गड़करी से साफ कह दिया कि अगर गड़करी कहें तो मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने को भी तैयार हैं। गड़करी चुपचाप सारी बातें सुनते रहे और उन्होंने कहा कि ठीक है वे फैसला लेकर मोदी को आवगत कर देंगे।
सूत्रों ने बताया कि मोदी के फोन रखते ही गड़करी ने संघ के आला नेताओं को इस बारे में सविस्तार जानकारी दी। चूंकि संजय जोशी संघ के खासुलखास हैं अतः संघ उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था, वहीं दूसरी ओर मोदी को भाजपा का मौखटा बनाकर वेतरणी पार करने का सपना देख रहा संघ उन्हें भी छोड़ना नहीं चाह रहा था। संघ के साथ रायशुमारी के बाद गड़करी ने अहम, अप्रिय और कड़ा फैसला ले ही लिया। यह नतीजा अगले दिन मीडिया के माध्यम से गड़करी तक पहुंचा कि संजय जोशी ने त्यागपत्र दे दिया है।
मोदी जोशी प्रकरण में मुंह की खाने के बाद भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी खुद को काफी असहज ही महसूस कर रहे हैं। मोदी के हाथों पस्त गड़करी को उनके सलाहकारों ने संभलने का मशविरा भी दे डाला है। बताते हैं कि गड़करी को कहा गया है कि अगर मोदी ने इस बार भी गुजरात में परचम लहरा दिया तो 2014 के आम चुनावों में भाजपा मोदीमय ही होने वाली है।
उस परिदृश्य में भाजपा के चुनावी पोस्टर्स में मोदी का फोटो सबसे बड़ा होगा, और भाजपा के व्यवसायिक पृष्ठभूमि के अध्यक्ष गड़कारी का बेहद छोटा सा। चर्चा तो यह भी है कि आम चुनावों के पोस्टर्स में बीच में मोदी का बड़ा सा फोटो, और दाएं बाएं सुषमा स्वराज, अरूण जेतली, राजनाथ सिंह और गड़करी की तस्वीरें हों। गड़करी इस बात से भयजदा अवश्य हो रहे होंगे कि उनके अध्यक्ष रहते उनका फोटो मोदी के फोटो के मुकाबले कम तवज्जो पाएगा!
अब लोगों की निगाहें संजय जोशी पर लगी हैं जो भाजपा से मुक्त होकर संघ के पूर्णकालिक सदस्य बन गए हैं। केशव कुंज के सूत्रों का कहना है कि जोशी का पुनर्वसा संघ नेतृत्व जल्द ही स्वदेशी जागरण मंच अथवा वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से कर सकता है।