शिक्षा का गिरता
स्तर, जिम्मेदार
कौन?
(लिमटी खरे)
सिवनी जिले में
माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल के तहत संचालित सरकारी और निजी शालाओं का इस साल का
दसवीं और बारहवीं का परीक्षा परिणाम निराशाजनक कहा जा सकता है। दोनों ही कक्षाओं
में प्रदेश की प्रावीण्य सूची में सिवनी जिले का नामोनिशान ही नहीं है। इसके साथ
ही साथ परीक्षा का परिणाम दसवीं में सरकारी स्कूल में 47.41 तो निजी शालाओं
में 15.48 फीसदी रहा
है। बारहवीं की परीक्षाओं में सरकारी स्कूल में यह 83.24 तो निजी शालाओं
में 73.66 फीसदी है।
बाहरवीं का परीक्षा परिणाम कुछ हद तक संतोषप्रद माना जा सकता है।
मध्य प्रदेश के
माध्यमिक शिक्षा मण्डल के हाई स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा (दसवीं) के निराशाजनक
परीक्षा परिणामों को देखकर लगने लगा है कि अब मध्य प्रदेश सरकार और सिवनी के
शिक्षा के क्षेत्र के आलंबरदारों को अपने शिक्षा तंत्र के बारे में सोचना आवश्यक
हो गया है। एचएसएस परीक्षा परिणाम वैसे भी अनेक संकेत दे रहे हैं।
कितने आश्चर्य की
बात है कि इस बार दसवीं में सरकारी स्कूलों में 47 तो निजी स्कूलों
में 15 फीसदी
विद्यार्थियों के हाथ सफलता ही लगी है। परिणामों की घोषणा के साथ ही समूचे जिले
में मायूसी की लहर व्याप्त हो जाना स्वाभाविक ही है। दुनिया भर में पसरी आर्थिक
मंदी से भारत अछूता नहीं है। इस मंहगाई के जमाने में मध्य प्रदेश में निवास करने
वाले मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के सामने अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना काफी
दुष्कर ही प्रतीत हो रहा है। माध्यमिक शिक्षा मण्डल से संबद्ध शालाओं में अध्ययन
करने वाले असफल विद्यार्थियों के परिवारों में उदासी और असंतोष के बीज पनपना जाहिर
है।
मध्य प्रदेश में
शिक्षा व्यवस्था को मानो जंग लग चुकी है। शिक्षक के पद पर भर्ती होकर अन्य विभागों
में संविलियन के साथ ही साथ सरकारी शिक्षकों से पल्स पोलियो, नसबंदी, चुनाव जैसे कार्यों
में बेगार करवाना निश्चित रूप से देश के नौनिहालों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही कहा
जाएगा।
कितने आश्चर्य की
बात है कि प्रतिबंध के बावजूद भी शिक्षकों का अध्यापन से इतर अन्य कार्यों के
निष्पादन के लिए अटेचमेंट आज भी बदस्तूर जारी है। पहुंच संपन्न शिक्षक शहरों की ओर
रूख करते नजर आते हैं, गांव के स्कूल शिक्षक विहीन पड़े हुए हैं। न शासन और न प्रशासन
यहां तक कि राजनेताओं को भी अपने वोट बैंक की खातिर इस ओर देखने की फुर्सत नहीं
है।
ऐसा नहीं कि
विभागीय उच्चाधिकारियों अथवा शासन में बैठे प्रमुख सचिव से लेकर सेक्शन के बाबू को
इस बारे में माहिति न हो। जानते सभी हैं पर मजबूर हैं मौन रहने को। साल भर शालाओं
का निरीक्षण चलता है, किन्तु रीते पद रीते ही रह जाते हैं। निरीक्षक की औपचारिकता
कैसे पूरी होती हैं,
यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं।
यहां आश्चर्यजनक
पहलू यह भी है कि मोटी फीस लेकर अध्यापन को पेशा बनाने वाले अशासकीय स्कूलों में
परीक्षा परिणाम प्रभावित क्यों हुए? इस तरह की शालाओं को तो चुनाव और अन्य बेगार
के कामों से मुक्त रखा गया है। फिर आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि इन शालाओं मेें भी
विद्यार्थियों का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा।
एक समय था जब
शालाओं में शिक्षिकाएं बैठकर स्वेटर बुना करती थीं, पर तब भी उनके
द्वारा कराया जाने वाला अध्यापन का काम वास्तव में उचित और करीने वाला होता था।
कुछ सालों पहले तक शिक्षा का स्तर संतोषजनक कहा जा सकता था, पर अब यह स्तर तेजी
से नीचे गिरा है, जो चिंतनीय
ही कहा जाएगा।
सिवनी में निजी
स्तर पर माध्यमिक शिक्षा मण्डल से मान्यता प्राप्त ना जाने कितने शिक्षण संस्थान
विद्यार्थियों को गढ़ने के काम में लगे हुए हैं, पर उनके हाथ असफलता
ही लगी है। कारण स्पष्ट है कि शिक्षकों ने इस साल मेहनत ना के बराबर ही की है।
शिक्षकों के घरों पर ट्यूशन की भीड़ साफ कर देती है कि अब शिक्षा का पेशा धन कमाने
का साधन बन चुका है।
जिला प्रशासन को
चाहिए कि शिक्षा विभाग के प्रभारी उपजिलाध्यक्ष (ओआईसी) को इसके लिए पाबंद करे कि
इस साल परीक्षा परिणाम सुधारे जा सकें। इसके लिए सरकारी और निजी विद्यालयों का औचक
निरीक्षण डिप्टी कलेक्टर द्वारा समय समय पर किया जाए यह सुनिश्चित किया जाए। साथ
ही साथ शिक्षकों द्वारा घरों पर पढ़ाई जाने वाली ट्यूशन को पूरी तरह प्रतिबंधित
किया जाए ऐसे कुछ मार्ग निकालने होंगे, वरना इस साल की तरह पालक लुटते रहेंगे और
विद्यार्थी पास तो हो जाएंगे पर उनका ज्ञानार्जन का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
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