बिना रजिस्ट्री
कैसे कट रही कॉलोनियां!
(शरद खरे)
सिवनी शहर को कुछ
साल पहले तक ‘शटर का शहर‘ कहा जाता था। इसका
कारण था कि हर घर में एक शटर लग चुकी थी। उद्योग धंधों के अभाव में सिवनी में
व्यापार नाम की चीज ही नहीं बची थी। ब्रॉडगेज के अभाव में दम तोड़ता व्यवसायिक
माहौल सिवनी के व्यापारियों सहित यहां के निवासियों को साफ दिखाई पड़ता पर नहीं
दिखता तो सांसद विधायकों को। नब्बे के दशक तक सिवनी में राजाधिराज इंडस्ट्रीज, साबू केमिकल, सिवनी सोप, पुट्ठा मिल, दूध डेयरी, शराब आसवानी आदि न
जाने कितने उद्योग धंधे हुआ करते थे।
सांसद विधायकों की
अनदेखी और निहित स्वार्थ के चलते आज सिवनी में एक नहीं दो दो औद्योगिक केंद्र हैं, पर उद्योग धंधे
नदारत ही हैं। बारा पत्थर में बबरिया ग्राम में जिला उद्योग केंद्र के पास
औद्योगिक प्रयोजनों से, लोगों ने बेशकीमती जमीनों का आवंटन कोड़ियों के भाव अपने नाम
करवा लिया है। सालों साल से यह स्थान निर्जन ही पड़ा हुआ है। विडम्बना तो देखिए
उद्योग कार्यालय इसी के साथ लगा हुआ है पर इस कार्यालय में पदस्थ रहे आला
अधिकारियों को अब तक यह नहीं दिखा कि यहां जिन्हें भूखण्ड आवंटित किए गए थे उन्होंने
दशकों तक अपने अपने भूखण्ड पर निर्माण नहीं करवाया है। जाहिर है उन्हें इस भूखण्ड
की आवश्यक्ता ही नहीं है। लिहाजा उनका आवंटन निरस्त कर दिया जाना चाहिए था।
वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं है, अब तक।
इस तरह सिवनी में
उद्योग धंधे न होने के कारण यहां रोजगार का अभाव होने लगा। पालकों को अपने अपने
बच्चों की चिंता सताने लगी कि आखिर वे अपने बच्चों का भविष्य कैसे संवारेंगे। इसके
उपरांत नब्बे के ही दशक में बुधवारी बाजार के आस पास घरों में शटर लगाकर दुकानें
निकालना आरंभ हुआ। देखा-सीखी एक के बाद एक समूचे शहर में कमोबेश हर घर में दुकानें
निकल गईं। इस तरह जो बाहर से आता तो देखकर चौंक जाता और कहता अरे यह तो शटर का शहर
है।
सिवनी में एक चीज
और जबर्दस्त तरीके से होती दिख रही है। शहर के आसपास लगे ग्रीन बेल्ट को सरकारी
कर्मचारियों से मिलकर बिना अनुमति और औपचारिकताएं पूरी किए ही बेचे जाने का। जिले
में जहां तहां होर्डिंंग्स और विज्ञापनों में पूर्णतः विकसित कॉलोनी में प्लाट के
इश्तेहार लोगों को लुभा रहे हैं। कम ही खरीददार इस बात को जानते होंगे कि जो प्लाट
वे खरीद रहे हैं या बुक करा रहे हैं, उसकी न तो रजिस्ट्री ही हुई है, न ही टाउन एण्ड कंट्री
प्लानिंग से उसका नक्शा पास है और न ही अन्य औपचारिकताएं ही पूरी की गई हैं।
दरअसल, अधिकांश
कॉलोनाईजर्स जनता से ही बयनामा के नाम पर राशि एकत्र कर प्लाट खरीदते हैं। उसके
उपरांत प्लाट के खरीददारों से दूसरी-तीसरी किश्त लेकर वे बाकी की औपचारिकताओं को
पूरा करते हैं। बाकी की किश्तें इन कॉलोनाईजर्स की जेब के हवाले होती हों तो किसी
को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इस तरह बिना अनुमति
और औपचारिकताओं के कॉलोनाईजर्स द्वारा जिला प्रशासन की नाक के नीचे ही अवैध रूप से
प्लाट बेचने का व्यवसाय किया जाता है। आश्चर्य तो उस वक्त होता है जब जमीन के
कागजात के कीड़े समझे जाने वाले पटवारी, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी
राजस्व आदि अपनी आंख बंद कर बैठे रहते हैं। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या ये
सरकारी नुर्माइंंदे घर के बाहर नहीं निकलते हैं जो इन्हें बड़े बड़े होर्डिंंग्स
नहीं दिखते। इतना ही नहीं मीडिया में भी इन कॉलोनियों के बारे में विज्ञापन पटे
पड़े रहते हैं, क्या ये
अखबार भी नहीं पढ़ा करते हैं!
मान लिया कि ये
समाचार पत्र नहीं पढ़ते होंगे पर अखबारों की कतरनों को जिला प्रशासन तक पहुंचाने के
लिए पाबंद जिला जनसंपर्क कार्यालय द्वारा तो इन कॉलोनाईजर्स द्वारा किए जाने वाले
इस तरह के अवैध कामों की क्लिपिंग जिला कलेक्टर या संबंधित तक पहुंचाई जाती होगी, बावजूद इसके, इनके खिलाफ अब तक
कोई कार्यवाही न होना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि दाल में काला नहीं यह
काली वाली ‘दाल मखनी‘ ही है।
रजिस्टार कार्यालय
में भी अंधेरगर्दी पसरी हुई है। कहा तो यहां तक भी जाता है कि हर कॉलोनी में एक
प्लाट पंजीयक, एक स्थानीय
निकाय के नाम से निकालकर अलग रखना होता है, तब जाकर मिल पाती है कॉलोनी काटने की
अनुमति। हाल ही में छपारा शहर में कॉलोनी काटने का ‘गंदा धंधा‘ तेजी से चल रहा है।
इनमें प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता बताई जा रही है। इसी तरह छपारा में गोविंद
धाम नामक कॉलोनी के विज्ञापन में कुछ प्लाट ही शेष के विज्ञापन महीनों से चल रहे
हैं। क्या तहसीलदार छपारा ने कभी इसकी जांच करने की जहमत उठाई है? जाहिर है नहीं, वरना अब तक तो
गोविंद धाम के कॉलोनाईजर्स, प्लाट बेचने के स्थान पर ‘राधे राधे‘ भजन कीर्तन करते
नजर आते।
सिवनी शहर में भी
एसपी बंग्ले के सामने के बड़े भूखण्ड का सौदा करोड़ों में होने की चर्चाएं हैं। इस
भूखण्ड के बारे में कहा जा रहा है कि यह भूखण्ड पूर्व में बगीचे के लिए आरक्षित
किया गया था। अब यह था या नहीं इस बारे में तो बेहतर तरीके से नगर सुधार न्यास, नगर पालिका या
सिवनी के पटवारी ही बता सकते हैं, पर जमीन के इस गंदे धंधे से प्रदेश सरकार के
राजस्व को क्षति पहुंचाई जा रही है वह भी गलत तरीके से। जरूरत है संवेदन शील जिला
कलेक्टर भरत यादव से इस संबंध में उचित और ठोस कार्यवाही की अपेक्षा की जाए।


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