शनिवार, 23 अप्रैल 2011

बर्निंग ट्रेन के यात्रियों को मौके पर मिले पांच पांच हजार

मदाम की खातिर मौके पर पहंुच मुआवजा बांटा अधिकारियों ने

नई दिल्ली (ब्यूरो)। मुंबई से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस में मध्य प्रदेश के पास रतलाम में लगी आग के बाद जिस मुस्तैदी से रेल अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर मुआवजा बांटा वह किसी के गले नहीं उतर पा रहा है। लोग इसे पश्चिम बंगाल के चुनावों में ममता बनर्जी की दरियादिल छवि बनाने से जोड़कर देख रहे हैं।
रेल्वे के इतिहास में शायद यह पहला ही मौका होगा जब रेल हादसे के बाद तत्काल आला अधिकारी मौके पर पहुंचे हों और यात्रियों को आर्थिक इमदाद मुहैया करवाई हो। लोगों का आश्चर्य तब हुआ जब प्लेटफार्म पर ही अधिकारी लाखों रूपए लेकर पहुंचे और यात्रियों को नकद पैसे बांट दिए गए। गौरतलब है कि पिछले माह बरेली में रेल की छत पर बैठे 19 परीक्षार्थियों की मौत के बाद न तो रेल प्रशासन और न ही ममता बनर्जी ने ही इसकी कोई सुध ली थी।
रेल विभाग के एक आला अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि रेल मंत्री ममता बनर्जी को जैसे ही इस बात की सूचना मिली उन्हांेने तत्काल अधिकारियों को पाबंद किया कि वे जाकर मुआवजा बांटें। ममता नही चाहती थीं कि एन चुनाव के वक्त वामपंथियों के हाथ कोई मुद्दा लगे।

इतिहास, संस्कृति और गौरव को सहेजे गिरजाघर

0 गुड फ्राईडे पर विशेष

इतिहास, संस्कृति और गौरव को सहेजे गिरजाघर

(लिमटी खरे)

गंगा जमुनी तहबीज वाले भारत वर्ष में हर वर्ग हर मजहब, हर संप्रदाय को मानने वालों की कमी नहीं है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश में मसीही समाज के इबादत गाह अपने अंदर इतिहास, संस्कृति, प्राचीन नायाब वास्तुशिल्प और निर्माण शैली आदि को सहेजे हुए हैं। मसीही समाज के अलावा अन्य संप्रदाय के लोग भी इन गिरजाघरों में जाकर पूजन अर्चन कर पुण्य लाभ कमाने से नहीं चूकते हैं।
पुर्तगालियों ने देश में गोथिक और बारोक शैली में चर्च निर्मित करवाए। वहीं दूसरी ओर ब्रितानियों ने यूरोपियन और अमरीकी शैली में इनका निर्माण किया। कैथोलिक चर्च के अंदर भव्यता और उन्हें अलंकृत करने का शुमार रहा तो प्रोटेस्टेंट चर्च की बनावट काफी हद तक सादी है। शैली चाहे जो रही हो पर एक बात तो तय है कि आज ये सभी इबादतगाह देश के लिए गौरवशाली धरोहर से कम नहीं हैं।
धर्म निरपेक्ष भारत गणराज्य में आदि अनादि काल से सभी धर्मों का आदर करने की परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है। यही कारण है कि भारत में हर धर्म के तीज त्यौहारों को पूरे उल्लास के साथ मनाने की परंपरा का निर्वहन हो रहा है। देश के अनेक गिरजाघरों की आंतरिक साज सज्जा, नायाब वास्तुकला, इतिहास और एतिहासिकता भारत ही नहीं वरन समूचे विश्व में विख्यात है। आईए देश के कुछ चर्च के बारे में आपको जानकारी से लवरेज करें:-

केरल

माना जाता है कि मसीही समाज या ईसाई धर्म का आगमन भारत में केरल से हुआ था। ईसा के शिष्ष्य थॉमस के आने के बाद यहां गिरजाघरों की स्थापना का काम आरंभ हुआ। केरल के चर्च की छटा अपने आप में अनूठी ही है। केरल में त्रिचूर का अवर लेडी ऑफ लोरडस चर्च की चर्चाएं न केवल हिन्दुस्तान वरन् समूचे विश्व में होती हैं। इस विशालतम चर्च की आंतरिक साज सज्जा और वास्तुशिल्प अकल्पनीय ही कहा जा सकता है। इसी तरह यहां कोच्ची के 52 किलोमीटर दूर मयलातूर हिल्स पर स्थापित कैथोलिक चर्च अपने आप में अद्वितीय माना जाता है। धारणा है कि इस चर्च की स्थापना स्वयं सेंट थॉमस द्वारा करवाई गई थी।

दिल्ली

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मसीही समाज के इबादतघरों की कमी नहीं है। यहां अनेक एतिहासिक चर्च मौजूद हैं जो आज भी दमक रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली में चांदनी चौक स्थित सेंट्रल बेपटिस्ट चर्च प्राचीनतम चर्च है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें यूरोपियन और मुगल कालीन शैली का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। दिल्ली का दूसरे नंबर का प्राचीनतम चर्च कश्मीरी गेट पर अंतर्राट्रीय बस अड्डे के पास बना सेंट जेम्स चर्च है। इसके अलावा दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति के आवास के निकट स्थापित कैथेड्रल चर्च जिसे वाईसराय चर्च भी कहते हैं की खूबसूरती देखते ही बनती है। गोल डाकघर के पास कैथेड्रल ऑफ द सेकेंड हार्ट चर्च भी दर्शनीय है। इन सभी चर्चों की शोभा तब निखर जाती है जब ईसामसीह के जन्म दिन क्रिसमस पर इन्हें दिल से सजाया जाता है।

हिमाचल प्रदेश

भारत की देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में मसीही समाज के पूजाघरों की छटा अपने आप में अनोखी ही मानी जाती है। पर्वतों पर बसे शिमला के माल रोड़ पर स्थित क्राईस्ट चर्च की चर्चा के बिना देवभूमि के चर्च अधूरे ही हैं। गोरे ब्रितानियों के राज में ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी शिमला। बताते हैं कि इस चर्च का निर्माण 1858 मंे कराया गया था। इसके स्टेंड ग्लास विंडोज की भव्यता और सुंदरता आज भी उसी तरह है जैसी कि निर्माण के वक्त हुआ करती थी। शिमला का सेंट माईकल्स चर्च भी लुभावना ही है। लार्ड डलहौजी द्वारा बसाए गए डलहौजी सुभाष चौक में सेंट फ्रांसिस कैथोलिक चर्च, गांधी चौक पर सेंट जॉन चर्च सहित यहां चार चर्च हैं। कहा जाता है कि सैंट जॉन चर्च की बनावट इंग्लैण्ड के कैथोलिक चर्च ऑफ इंग्लैण्ड की भांति ही है।
0 गोवा
पर्याटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण गोवा में अनेक एतिहासिक चर्च मौजूद हैं। इनमें से अनेक चर्च तो आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में पंजीबद्ध हैं। गोवा में ‘से-कैथेड्रल‘ आकार में सबसे बड़ा चर्च है। पुर्तगाली गोथिक शैली में बने इस चर्च की भव्य इमारत गोवा की सबसे बड़ी गिरजाघर घंटी जिसे गोल्डन बेल कहा जाता है स्थापित है। यहां का चर्च ऑफ सैंट फ्रांसिस एसिसी, सैंट फ्रांसिस को पूरी तरह समर्पित है। यहां लकड़ी पर उकेरी गई काष्ठकला और भित्ती चित्र वाकई में दर्शनीय हैं। गोवा का बासिलिका ऑफ बॉम जीसस चर्च तो रोमन कैथोलिक जगत में अपना अहम स्थान रखता है। इसमें सेंट फ्रांसिस स्मारक में उनकी ममी आज भी संरक्षित है। 1605 में निर्मित इस चर्च में उनके जीवन के प्रसंगों को भित्ति चित्रों के माध्यम से जीवंत करने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा गोवा में चर्च ऑफ सेंट मोनिका, चैपल ऑफ सैंट एंथोनी भी नायाब हैं।

तमिलनाडू

तमिलनाडू में ईसाई समाज के इबादतघरों की कमी नहीं है। तमिलनाडू के तंजावुर जिले की वेलांकन्नी चर्च को इसाईयों का प्रसिद्ध तीर्थ माना जाता है। यहां वर्जिन मेरीको आरोग्य माताके रूप में माना जाता है। माना जाता है कि यहां आने वाले भक्तों श्रृद्धालुओं के रोग दूर करने की चमत्कारी शक्तियां मौजूद हैं। यहां प्रार्थना करने पर कष्टों का निवारण अपने आप ही हो जाता है। इसका 92 फीट उंचा शिखर दूर से ही लोगों को लुभाता है। चेन्नई में सैंट थॉमस माउंट चर्च का अपना अलग ही महत्व है। इस चर्च का उल्लेख 13वीं शताब्दी में मार्कोपोलो के संस्मरणों में भी मिलता है। इस स्थान पर ईसा मसीह के शिष्य फिलिस्तीनी सेंट थामस ने देह त्यागी थी। इसके बाद 1893 में इस चर्च का पुर्ननिर्माण निओगोथिक शैली में हुआ था।

उत्तर प्रदेश

देश को सबसे अधिक वजीरेआजम देने वाले उत्तर प्रदेश सूबा अपने दामन में अनेक चर्च समेटे हुए है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को अपने आप में सहेजने वाले मेरठ शहर में बेगम समरू द्वारा बनवाए गए चर्च को देखे बिना उत्तर प्रदेश की यात्रा अधूरी ही समझी जा सकती है। सरघना स्थित कैथोलिक चर्च को बेगम समरू का चर्च भी कहा जाता है। 1822 में निर्मित इस चर्च की विशेषता यह है कि एक मुस्लिम महिला बेगम समरू ने इसका निर्माण करवाया था। उनका विवाह वाल्टर रहेंहार्ट से हुआ तब उन्होंने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया था। इसके अलावा कानपुर और लखनउ का क्राईस्ट चर्च, इलाहाबाद का कैथेड्रल चर्च अपने आप में भव्यता लिए हुए है।

पुड्डुचेरी

पुड्डुचेरी में अनेकानेक चर्च हैं। फ्रेंच इंडो संस्कृति के मिले जुले स्वरूप को देखकर सैलानी आकर्षित हुए बिना नहीं रहते हैं। चर्च ऑफ सेक्रेड हार्ट ऑफ जीसस, चर्च ऑफ अवर लेडी ऑफ इमेक्युलेट कंसेप्शन, चर्च ऑफ द लेडी ऑफ एंजल्स आदि पुमुख चर्च हैं जो यूरोपीय शैली में निर्मित हैं।

गिलानी को दिए भोज का न्योता ही नहीं मिला नेता प्रतिपक्ष को!

सुषमा को कांग्रेस का करारा जवाब!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के विदिशा से लोकसभा सदस्य एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रवैए से कांग्रेसनीत संप्रग सरकार खासी खफा नजर आ रही है। सीवीसी मामले में बखिया उधेड़ने वाली प्रखर वक्ता सुषमा स्वराज को कांग्रेस के प्रबंधकों की सलाह पर सरकार ने नजर अंदाज करना आरंभ कर दिया है। इसी कड़ी में पाकिस्तान के वजीरेआजम को प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए रात्रि भोज के मेन्यू में से स्वराज का नाम ही गायब कर दिया गया था।
पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि पाक प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी के सम्मान में भारत के प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह द्वारा रात्रि भोज का आयोजन किया गया था। इस भोज में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, महासचिव राहुल गांधी, बीसीसीआई के शशांक मनोहर और राजीव शुक्ला यहां तक कि सोनिया के दमाद राबर्ट वढ़ेरा तक आमंत्रित थे। इस भोज का न्योता नहीं भेजा गया तो बस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज को।
वैसे देखा जाए तो प्रोटोकाल के तहत जब भी कोई विदेशी प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आता है और उसके सम्मान में दोपहर या रात्रि का भोज आयोजित होता है तो उसमें लोस के नेता प्रतिपक्ष को बिना भूले बुलावा भेजा जाता है। लोगों को आश्चर्य इस बात पर हो रहा है कि इसमें सुषमा को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा गया?
माना जा रहा है कि सरकार की बखिया उधेड़ने पर आमदा सुषमा स्वराज को कांग्रेस का यह करारा जवाब था। भाजपा के हाथ यह एक अचूक अस्त्र लगा है जिसका उपयोग वह बखूबी कर कांग्रेस से यह पूछ सकती है कि आखिर क्या वजह थी कि इस भोज में कांग्रेस, सरकार और बीसीसीआई ने सुषमा स्वराज को आमंत्रित करना मुनासिब नहीं समझा।

रेडिएशन से मानव शरीर पर पड़ रहे हैं दुष्प्रभाव

बताना होगा - क्या है मोबाईल का रेडिएशन स्तर

सरकार जल्द जारी कर सकती है दिशा निर्देश

नई दिल्ली (ब्यूरो)। सरकार जल्द ही एसे दिशा निर्देश जारी कर सकती है जिसके तहत मोबाईल हेण्ड सेट पर रेडिएशन कितना हो रहा है इस बात का उल्लेख करना आवश्यक हो जाए। गौरतलब है कि मोबाईल हेण्ड सेट से निकलने वाली रेडियो तरंगों से मनुष्य को होने वाले नुकसान पर पिछले कई दिनों से बहस जारी है, सरकार इस बारे में संजीदा होती दिख रही है।
केंद्रीय संचार मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मोबाईल हेण्डसेट रेडिएशन रेट यानी सार का स्तर क्या है इस बारे में मोबाईल उपकरण उत्पादक को बताना अनिवार्य किया जा रहा है। सूत्रों का यह भी कहना है कि 2 वाट प्रति किलोग्राम की निर्धारित दर से अधिक के रेडिएशन वाले उपकरणों को प्रतिबंधित की श्रेणी में लाकर खड़ा किया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार मोबाईल उपकरण निर्माता कंपनी और सरकार के बीच इस मामले में अनेक दौर की बातचीत हो चुकी है।े

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सराहा गया किसान बिकास शिल्प केंद्र


सराहा गया किसान बिकास शिल्प केंद्र

नई दिल्ली (ब्यूरो) सामाजिक संस्था किसान बिकास शिल्प केंद्र गरीबी हटाओ कार्यक्रम के तहत गरीबों के उत्थान के लिए पिछले 32 सालों से काम कर रही है। संस्था अच्छे और जनकल्याणकारी काम के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी ने संस्था का समर्थन किया और अब केंद्र सरकार द्वारा भी संस्था को इमदाद देने का आश्वासन दिया है।

संस्था के प्रबंध निदेशक प्रसन्न जीत बोस एवचं राष्ट्रीय कार्यकारी निदेशक अनंदिता भट्टाचार्य ने बताया कि किसान बिकास शिल्प शिल्प केंद्र की स्थापना 1979 में की गई थी। इसका उद्देश्य गरीब गुरबों की मदद कर देश से गरीबी को समूल नष्ट करना था। उन्होंने कहा कि बीस सूत्रीय कार्यक्रम के तहत उनकी संस्था समय समय पर रक्तदान शिविर, नेत्र स्वास्थ्य परीक्षिण शिविर, बाल कल्याण, ग्रामीण विकास, बस्ती सुधार, शुद्ध जल एवं पिछड़े क्षेत्र का विकास कराने सहित अनेक तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करती आई है।

संस्था की राष्ट्रीय कार्यकारी निदेशक अनंदिता भट्टाचार्य ने बताया कि अब दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में संस्था का कार्यालय खोल दिया गया है। उन्होंने बताया कि संस्था के इस कार्यालय का उद्घाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित सरकार के संसदीय सचिव तरविन्दर सिंह मारवाह के द्वारा किया गया।
उद्यघाटन के मौके पर श्री मारवाह ने संस्था द्वारा समय समय पर किए जाने वाले सामाजिक कामों की सराहना की तथा संस्था को आर्थिक तौर पर मदद करने का आश्वासन भी दिया।

अलका सिरोही हैं कैबनेट सचिव की दावेदार


पहली महिला कैबनेट सचिव बन सकती हैं अलका सिरोही!

दावेदार 20 आईएएस में एमपी काडर की हैं सिरोही

केरल लाबी ने आरंभ की जोड़तोड़

कैबनेट सचिव के लिए इकलौती महिला दावेदार हैं सिरोही

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के सर्वशक्तिमान प्रशासनिक पद कैबनेट सचिव के लिए मध्य प्रदेश काडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी अलका सिरोही का नाम सबसे आगे चल रहा है। यद्यपि आईएएस में हावी केरल लाबी ने अपने किसी अधिकारी को इस पर पर बिठाने के लिए चैसर बिछा दी है किन्तु कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की विशेष कृपा पात्र समझी जाने वाली अलका सिरोही का इस पद पर काबिज होना तय माना जा रहा है।

गौरतबल होगा कि 1970 बैच के केरल काडर के भारतीय प्रशासिनक सेवा के अधिकारी के.एम.चंद्रशेखर वर्तमान में कैबनेट सचिव हैं और वे 14 जून को सेवानिवृत हो रहे हैं। आचार्य के स्थान पर नया कैबनेट सचिव कौन होगा इसके लिए जोड़तोड़ आरंभ हो गई है। परांपरानुसार कैबनेट सचिव का नाम तय करने के बाद उसकी घोषणा के पहले केंद्र सरकार द्वारा उसे कैबनेट सचिवालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी बनाकर पदस्थ किया जाता है।

पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि इस पद के लिए 1970 बैच के आईएएस अफसरान सक्रिय हो गए हैं। इसके लिए बीस नामों की चर्चाएं हैं। इन नामों में मध्य प्रदेश काडर की आईएएस अलका सिरोही का नाम सबसे आगे चल रहा है। अलका सिरोही के पक्ष में अनेक योग्यताएं सामने आ रही हैं।

माना जा रहा है कि महामहिम राष्ट्रपति के पद पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल और लोकसभाध्यक्ष पद पर मीरा कुमार जैसी महिलाओं के आसीन होने के बाद अब कांग्रेस का प्रयास होगा कि देश के सबसे ताकतवर प्रशासनिक पद पर अलका सिरोही की नियुक्ति कर दी जाए। अगर एसा होता है तो आजादी के बाद यह पहला मौका होगा जब कैबनेट सचिव के पद पर किसी महिला को पदस्थ किया जाएगा।

उल्लेखनीय होगा कि दिग्विजय सिंह के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रीत्व वाले कार्यकाल में राघवेंद्र सिंह सिरोही और अलका सिरोही दोनों ही उनकी आंखों के तारे रहे हैं। यही कारण है कि कैबनेट सचिव के लिए अलका सिरोही का समर्थन दिग्विजय सिंह द्वारा पुरजोर तरीके से किया जा सकता है। साथ ही साथ केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूरिया और अरूण यादव भी उनके नाम पर वीटो का इस्तेमाल कर उनके मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

वैसे इस पद के लिए वरिष्ठता सूची में सिरोही के अलावा मध्य प्रदेश काडर से के.एम.आचार्य, सुधीर नाथ, राघवेंद्र सिंह सिरोही, राकेश बंसल, रंजना चैधरी के नाम भी फिजां में तैर रहे हैं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

एमपी में रूकी ईसाईयों की गिनती

संघ के निशाने पर मसीही समाज!

दिल्ली में मसीही समाज में खलबली

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के हृदय प्रदेश में मसीही समाज के लोगों की प्रथक से होने वाली गिनती के आदेश से राजधानी दिल्ली की सियासी फिजां गरमा गई है। एमपी के मण्डला में हुए नर्मदा कुम्भ के बाद एक बार फिर मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के निशाने पर इसाई मिशनरी के आने से हडकम्प मचा हुआ है। यद्यपि राज्य सरकार द्वारा समस्त पुलिस अधीक्षकों को ईसाइयों की गिनती पर रोक लगा दी है किन्तु मसीही समाज के लोगों का रोष यथावत ही बना हुआ है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा सूबे में रहने वाले मसीही समाज के लोगों की जानकारी एकत्र की जाने वाले एक आदेश को प्रदेश के सभी एसपी को भेजा था। इसमें समस्त नए पुराने चर्च, शैक्षणिक संस्थान, राजनैतिक जुड़ाव के साथ ही साथ उनके आर्थिक स्त्रोतों के बारे में जानकारी एकत्र करने को कहा गया था। इस आदेश के परिपालन में अनेक जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा समस्थ थाना प्रभारियों को इसकी जानकारी अविलंब भेजने को कहा गया था।

एमपी छग के कैथलिक विशप कांफ्रेंस के क्षेत्रीय जनसंपर्क अधिकारी आनंद मुटुंगल इस आदेश को गंभीर मानते हैं। उनका मानना है कि इस आदेश के जारी होने के पीछे की मंशा को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सूत्रों का कहना है कि धर्मांतरण मंे लगी ईसाई मिशनरियों की मुखालफत करने वाले संघ के इशारे पर शिवराज सिंह चैहान द्वारा यह कदम उठाया गया है।

उधर केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि वे इस बात की तह में अवश्य जाएंगे कि भाजपा सरकार द्वारा इस तरह के आदेश जारी करने के पीछे क्या मंशा रही। कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु संघवी इस मामले तल्ख टिप्पणी देते हुए बोले कि ईसाईयों की तादाद पता लगाने के लिए जारी आदेश असंवेधानिक है।

हजारे के आंदोलन में आय व्यय पर मौन रहा आयकर महकमा




गैर वाजिब नहीं है दिग्गी की चिंता!


आंदोलन में फुंक गए 31 लाख रूपए!

(लिमटी खरे)

कांग्रेस के बीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे के आंदोलन में जुटे धन पर चिंता जाहिर की है। दिग्विजय सिह की चिंता बेमानी नहीं मानी जा सकती है। जिस भ्रष्टाचार के लिए अन्ना हजारे जैसे गांधीवादी नेता ने बिगुल फूंका है, उसी आंदोलन में इकतीस लाख रूपए खर्च होना आश्चर्यजनक है। इस पर विस्मय इसलिए भी है, क्योंकि सादगी भरे पांच दिन चले आंदोलन में लाखाों रूपए खर्च करने की बात किसी के गले आसानी से नहीं उतर सकती है। इस लिहाज से अन्ना के आंदोलन छः लाख रूपए प्रतिदिन के हिसाब से चला माना जाएगा।

गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के आंदोलन के पाश्र्च में काम कर रही संस्था ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन‘ को कारमल कांवेंट जैसे नामी स्कूल, एचडीएफसी और जम्मू काश्मीर बैंक, कांग्रेस के जनसेवक के स्वामित्व वाले जिंदल एल्यूमिनियम सरीखे उद्योग ने भी बढ़ चढ़कर योगदान दिया है। 5 से 9 अप्रेल तक चले इस आंदोलन में टेंट और साउंड सिस्टम पर मात्र साढ़े नौ लाख रूपए खर्च होना दर्शाया गया है।

राजनैतिक चतुर सुजान राजा दिग्विजय सिंह ने अन्ना पर बयानों से हमले बोले, लोगों को लगा कि कांग्रेस अन्ना के इस आंदोलन से भयाक्रांत है, पर जानकारों का कहना है कि इस तरह के जहर बुझे तीर कांग्रेस की एक रणनीति के तहत ही चलाए गए थे, ताकि किसी को यह न लगे कि इसके पाश्र्व में कहीं कांग्रेस है। इसके बाद कांग्रेस के अन्ना हजारे पर से हमले कम हो गए।

माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार, घपलों घोटालों से अटी पड़ी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार का यह प्रयास है कि किसी भी तरह से आम जनता का ध्यान इन सबसे हटाया जा सके। कांग्रेस को इसके लिए सबसे उपयुक्त लगा कि बेहतर होगा कि लोगों का गुस्सा एक बार फट जाए और मामला एक दो दशक के लिए टाला जा सके ताकि भविष्य में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भ्रष्टाचार से निजात मिल सके।

कांग्रेस अपनी इस अघोषित मुहिम में काफी हद तक कामयाब होती दिख रही है। भ्रष्टाचार का लावा फट गया और अब शांत पड़ चुका है। लोग अब अन्ना को ही कांग्रेस का एजेंट बताने से नही चूक रहे हैं इसका कारण लोकपाल बिल के लिए बनी समीति में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को स्थान दिया जाना है। पिता पुत्र के स्थान पाते ही एक बार फिर वे विवादों में आ गए। इलहाबाद में एक बेशकीमती जमीन के मामले में उन्हें शक के दायरे में ला दिया गया। इसके बाद एक सीडी भी हवा में तैर गई जिसमें ‘जज‘ को सैट करने के आरोप शांति भूषण पर लग रहे हैं। इस तरह विवादित लोगों के इस समिति में आने से ही मामला संदिग्ध होने लगा है। लोगों का भरोसा भी अब टूटने सा लगा है।

उधर अन्ना हजारे के माध्यम से कांग्रेस ने बाबा रामदेव को भी किनारे लगाने का उपक्रम कर ही दिया। भ्रष्टाचार और काले धन पर बाबा रामदेव द्वारा जो बिसात बिछाई जा रही थी, उसे कांग्रेस ने अन्ना हजारे के पाले में डालकर बाबा रामदेव का जोश भी ठंडा ही कर दिया है। यद्यपि बाबा रामदेव आसानी से हार नहीं मानने वाले हैं किन्तु कांग्रेस का पुरजोर प्रयास है कि वह बाबा रामदेव को किनारे ही कर दे।

बहरहाल भविष्य की चालों को ध्यान में रखकर राजनीति करने मंे पारंगत मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह ने पहले तो अन्ना हजारे के आंदोलन को मिले चंदे पर सवालिया निशान लगा दिया। गौरतलब होगा कि जब भी कोई सार्वजनिक हित के काम को आगे बढ़ाया जाता है तब लोग दिल खोलकर चंदा देते हैं। आयोजक उस चंदे का सदुपयोग करते हैं या फिर आंदोलन में अपने विलासित के सपनों को साकार करते हैं यह बात तो वे ही जानते होंगे किन्तु यह तय है कि जिस तरह का व्यय ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन‘ द्वारा दर्शाया गया है वह गैर जरूरी ही था। छः लाख रूपए रोजाना के हिसाब से अगर आंदोलन किया गया तो वह निहायत ही बेवकूफी भरा था।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश द्वारा आंदोलन किया गया तब वह सादगी से परिपूर्ण था, उसमें विलासिता की बू कहीं से भी नहीं आती थी। किन्तु वर्तमान मंे होने वाले आंदोलन में कुंठा अवश्य ही झलकने लगती है। भारतीय पुलिस सेवा की देश की पहली महिला अधिकारी किरण बेदी का कहना है कि इस व्यय में वह खर्च भी जु़ड़ा है जिसमें अन्ना और उनके समर्थकों ने देश का दौरा किया है।

सवाल यह उठता है कि अन्ना के समर्थक अगर हवाई जहाज या हेलीकाप्टर किराए पर लेकर दौरा करें तो उसका भोगमान देश की जनता क्यों भोगे। गांधीवादी अन्ना के समर्थकों को चाहिए था कि वे रेल के साधारण दर्जे में या सरकारी बस में यात्रा करते। अगर उनके लिए वातानुकूलित श्रेणी की बर्थ, हवाई टिकिट या वातानुकूलित मंहगी गाड़ी किराए पर ली गई है तो इससे देश की जनता को क्या लेना देना। और इस तरह की चीजों का उपयोग अगर वे कर रहे हैं तो उनमें और विलासिता प्रिय जनसेवकों में आखिर अंतर क्या बचा।

आज इंडिया अगेंस्ट करप्शन संस्था ने हिसाब दे दिया है, पर वह आधा अधूरा ही है। बेहतर होता कि संस्था आना पाई से हिसाब देती और भ्रष्टाचार या किसी भी प्रकार की लड़ाई जनहित देशहित में लड़ने वाले हर मंच के अंदर इतना माद्दा होना चाहिए कि वह जनता के पैसे का हिसाब देने में पूरी पारदर्शिता बरते। अगर देश की शैक्षणिक संस्था, बैंक, व्यापारी, सेवानिवृत कर्मचारी आदि उसे चंदा दे रहे हैं तो संस्था को चाहिए कि उनके या किसी के बिना मांगे हर रोज का खर्च उसी तरह सार्वजनिक करे जैसा कि वह अपने कदमों के बारे में जनता को मीडिया के माध्यम से विज्ञप्ति जारी कर करती है।

कौन सुनेगा मनमोहनी वाणी को अब!

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)


कौन सुनेगा मनमोहनी वाणी को अब!

देश के वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह पर सादगी के साथ ही साथ भ्रष्टाचार छुपाने के आरोप भी लगने लगे हैं। प्रधानमंत्री पर सबसे बड़ा आरोप तो यह है कि उन्हें लोकसभा में ही मत देने का अधिकार नही है, इसका कारण यह है कि वे पिछले दरवाजे यानी राज्यसभा के रास्ते संसदीय सौंध तक पहुंचे हैं। पीएम डाॅ.सिंह असम से राज्य सभा सांसद हैं। हाल ही में असम में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए। हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री ने असम में जाकर अपने मताधिकार का ही प्रयोग नहीं किया। भाजपा के युवा आईकान नरेंद्र मोदी ने पीएम पर निशाना साधते हुए इस बात पर दुख व्यक्त किया है कि वजीरे आजम ने असम में विधानसभा चुनवों में अपने मताधिकार का प्रयोग न कर निराश किया है। मुद्दे की बात तो यह है कि देश के उच्च पदों पर बैठे लोगों द्वारा मताधिकार का प्रयोग करने की अपील आम जनता से की जाती है, पर जब प्रधानमंत्री खुद ही मताधिकार का प्रयोग न कर पाए हों तो क्या उन्हें मताधिकार करने की अपील करने का नैतिक अधिकार रह जाएगा?



क्यांे हैं कांग्रेस के अन्ना विरोधी सुर!

कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, मनीष तिवारी जैसे नेता आखिर एसी बयानबाजी क्यों कर रहे हैं कि अन्ना हजारे के आंदोलन की हवा निकल सके। कारण साफ है कि पिछले एक साल में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एक के बाद एक विवादस्पद फैसले लिए और अपनी भद्द पिटवाई। कांग्रेस के मंत्री लोकपाल बिल के खिलाफ हैं। उधर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी भी मन ही मन इसका विरोध कर रहे हैं, पर वे जानते हैं कि अगर उन्होने इसका साथ नहीं दिया तो आने वाले समय में युवाओं का राहुल गांधी से मोहभंग हो जाएगा। सोनिया और राहुल दोनों ही भली भांति जानते हैं कि युवा ही कल राहुल को देश का वजीरेआजम बनवाएंगे। यही कारण है कि दिग्गी, मनीष सलमान जैसे नेता मिलकर अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने पर तुले हुए हैं।



शीला का हो रहा शनि भारी

लगभग डेढ़ दशक से अधिक तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज रहने वाली श्रीमति शीला दीक्षित के परेशानी के दिन आरंभ होने के संकेत मिले हैं। कल तक शीला के जेब में रहने वाला दिल्ली का कांग्रेस संगठन अब सर उठाने लगा है। नगर निगम के बटवारे को आधार बनाकर संगठन ने शीला की मुखालफत आरंभ कर दी है। शनिवार को आधा दर्जन से अधिक विधायकों ने शीला के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी से भेंट कर अपनी बात रखी। शीला ने दिल्ली नगर निगम को पांच हिस्सों में बांटने के मामले में मनमानी के आरोप उन पर लगे हैं। शीला पर आरोप है कि उन्होंने इस मसले में न तो विधायकों को ही विश्वास में लिया और न ही पार्षदों से ही रायशुमारी की। संगठन की शह पर अगर पार्षद और विधायक एक जुट हो गए तो शीला की मुसीबतें बढ़ ही सकती हैं।



लो अब खिलाडि़यों को मिला मिलावटी खाना

कामन वेल्थ गेम्स के बाद अब 34वें राष्ट्रीय खेल विवादों में आ गए हैं। एक जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया है कि नेशनल गेम्स में खिलाडि़यों को परोसा गया खाना दूषित और मिलावटी था। धनबाद स्थित प्रयोगशाला में नमूनों की जांच में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि खिलाडि़यों को खिलाया गया खाना मानकों के अनुरूप नही था। खेल के दौरान खेल परिसर में बनाई गई अस्थाई ओपीडी में खेलों के दौरान 11 हजार लोगों का इलाज किया गया था। महालेखाकार ने इस खेल में खाने के लिए टेंडर के माध्यम से पाबंद किए गए ठेकेदार गजल केटरर्स को निर्धारित से अधिक दर पर निविदा देने पर घोर आपत्ति जताई है। कामन वेल्थ गेम्स में एक के बाद एक अनियमितताओं के बाद भी आरोपियों पर कार्यवाही लंबिति होने से अब लोगों के हौसले गलत कामों के लिए बुलंद होना स्वाभाविक ही है।



पुत्रमोह भारी पड़ रहा है गहलोत को

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को केंद्र में वापस लाने की मुहिम उनके विरोधियों ने तेज कर दी है। अशोक गहलोत के स्थान पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर महिला आयोग की निर्वतमान अध्यक्ष गिरिजा व्यास और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी की नजरें गड़ी हुई हैं। सूबे में शासन की स्थिति को देखकर अब कांग्रेस के कार्यकर्ता ही कहने लगे हैं कि अगर अगला चुनाव गहलोत के नेतृत्व में लड़ा गया तो राज्य में भाजपा की वापसी सुनिश्चित ही है। हाल ही में गहलोत विरोधियों के हाथ एक एसा अस्त्र लगा है जो गहलोत की परेशानी का सबब बन सकता है। विपक्ष इसका उपयोग ब्रम्हास्त्र के बतौर कर सकता है। गहलोत के पुत्र जिस कंपनी के लीगल एडवाईजर हैं उस कंपनी को राज्य में दो बड़े ठेके देने का मामला तूल पकड़ने लगा है। अब देखना है कि गहलोत अपनी कुर्सी सलामत रखने के लिए क्या जतन करते हैं।



यह क्या कह गए राजा साहेब!

इक्कीसवीं सदी के कांग्रेस के चाणक्य की अघोषित उपाधि पाने वाले कांग्रेस के महासचिव दिग्जिवय सिंह ने देवभूमि वाराणसी में जाकर जो कहा है उससे देश की राजनैतिक राजधानी में सियासत गर्माने लगी है। दिग्गी राजा ने कांग्रेसियों को हिदायत दी है कि वे ‘होटल और बोतल‘ की संस्कृति से बाहर निकलें। कांग्रेस के आला नेता अब इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि कार्यकर्ता या नेता किस होटल में जाकर बोतल का इस्तेमाल करते हैं। वैसे भी कांग्रेसी संगठन के अंदर तीन स्तर के पंचायती राज को परिभाषित कुछ इस तरह करते हैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी यानी एआईसीसी (ये आई शीशी), प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी पीसीसी (पी शीशी) और जिला कांग्रेस कमेटी यानी डीसीसी (दी घुमा कर शीशी)।



तुम डाल डाल हम पात पात

नक्सलवादी, आतंकवादी, अलगाववादी, क्षेत्रवादी, उग्रवादी, माओवादी जैसे आताताई और सुरक्षा बलों के बीच चूहे बिल्ली का खेल पुराना हो चुका है। एक के बाद एक मोर्चे पर देश विरोधी इन ताकतों के आगे सुरक्षाबलों के परास्त होने की खबरें मिला करती हैं किन्तु देश के शूरवीर जवानों ने कभी हौसला नहीं खोया है। पिछले साल जून में बिहार में एसा कुछ हुआ जो केंद्र सरकार को हिला देने के लिए काफी है। दरअसल धनबाद जिले में रहमान गांव में सीआरपीएफ की एक कंपनी तैनात है। इस कंपनी को जिस तालाब से पीने का पानी सप्लाई होता है, उस तालाब में नक्सलियों द्वारा विस्फोटक मिलाकर पानी को जहरीला कर दिया गया था। सुबह व्यायाम के लिए उठे जवानों ने जब तालाब की मछलियों को सतह पर मरा पाया तो आला अधिकारियों ने इस सूचना पर उसका पानी प्रयोगशाला भेजा जहां इसके जहरीले होने की पुष्टि हुई। सवाल यह उठता है कि जब सीआरपीएफ कंपनी की नाक के नीचे ही नक्सली वारदात करने में सफल रहे तो फिर उनकी मुस्तैदी पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक ही है।



सौंवे साल में एक करोड़ रू.की रोजाना आय!

देश विदेश में अरबों खरबों लोगों की आस्था का केंद्र बन चुके शिरडी के साईं बाबा की महिमा अपरंपार ही है। रामनवमी का पर्व महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिरडी कस्बे के लिए महत्व का होता है। इस साल इसका महत्व और अधिक इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इस साल यह पर्व सौवें साल में प्रवेश कर गया है। रामनवमी पर साई बाबा को जो चढ़ावा आया वह हैरत अंगेज ही रहा। तीन दिनों में साई बाबा संस्थान को तीन करोड़ रूपए की आय हुई इसमें एक करोड़ 77 लाख रूपए दान पात्र में मिले शेष लोगों द्वारा कार्यालय में जमा कराए गए थे। गौरतलब होगा कि देश भर में साई बाबा के भक्तों के लिए जगह जगह मंदिर अवश्य बना दिए गए हैं किन्तु इन मंदिरों का ट्रस्ट बनाकर उसे रजिस्टर्ड न कराने से इसमें होने वाली आय और व्यय को लोग संदेह की नजरों से ही देखते हैं। अनेक मंदिरों में परिवारों या लोगों का एकाधिकार भी बना हुआ है।



कहां जा रही हैं शीला के राज मंे युवतियां!

दिल्ली की गद्दी पर तीसरी बार काबिज होने वाली कांग्रेस की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित के राज में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से युवतियों के गायब होने का सिलसिला थम नहीं पा रहा है। पिछले मार्च माह में 18 से 30 साल की 153 युवतियां गायब हैं। दिल्ली पुलिस का अपना अलग राग है जिसमें प्रेम प्रसंग, घरेलू अनबन, कैरियर तलाशने बाहर जाने को प्राथमिकता दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली महिला आयोग इस मामले में आपराधिक कारणों को प्रमुखता से रेखांकित कर रही है। दिल्ली की निजाम खुद एक महिला हैं, तो वे महिलाओं के गायब होने की बात को समझ सकती होंगी, किन्तु सत्ता के मद में चूर कांग्रेस की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित को इससे कोई सरोकार नहीं दिखाई दे रहा है। अभी हाल ही में एक युवती को मारकर पार्सल किए जाने की खबर से सनसनी फैल गई थी। कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की नाक के नीचे अगर बालाओं पर इस तरह का कहर ढाया जा रहा हो तो सुदूर ग्रामीण अंचलों के हाल सोचकर ही रूह कांप उठती है।



नशा शराब में होता तो नाचती बोतल

अमिताभ बच्चन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने सालों हो गए शराब को तजे हुए। फिर भी उन्होंने ‘शराबी‘ फिल्म में नशे का जीवंत अभिनय कर साबित कर दिया कि वे सदी के महानायक बनने लायक हैं। देश की राजधानी दिल्ली में पीकर टल्ली होने वालों की तादाद देखें तो आपके होश उड़ जाएंगे। कांग्रेस के शासन में दिल्ली में इस साल की पहली तिमाही में 2004 करोड़ रूपयों की शराब बिकी है, जो पिछले साल 1927 करोड़ रूपए थी। इस बार होली पर भी दिल्ली जमकर टल्ली हुई थी। आने वाले समय में हर घर में शराबी पैदा हो जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अब आप ही बताईए कि आजादी के छः दशकों के बाद देश की युवा पीढ़ी को कांग्रेस आखिर किस अंधी राह पर ढकेलती जा रही है।



करोड़पति लोकसेवक!

सरकारी सेवा करने वालों को लोकसेवक कहा जाता था। लोकसेवक का अर्थ होता था जनता की सेवा करने वाला सरकारी नौकर। आज इसके मायने बदलते ही जा रहे हैं। राजस्थान में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने जब अपनी संपत्ति उजागर की तो देश दांतों तले उंगली दबा बैठा। राजस्थान में अब तक 19 आईएएस द्वारा संपत्ति घोषित की है इन 19 में से एक साहेब वाडमेर में पदस्थ गौरव गोयल करोड़पति तो 13 लखपति हैं। जिनमें से अधिकांश की संपत्ति पचास लाख रूपए से ज्यादा है। अब आप ही बताईए कि जो खुद को आर्थिक तौर पर संपन्न बनाने में लगे हों वहां गरीब गुरबों पर नजला गिरना स्वाभाविक ही है। देश में अखिल भारतीय सेवा वाले अधिकारी अगर अपनी संपत्ति जाहिर कर दें तो पता चलेगा कि सरकार द्वारा गरीब गुरबों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली योजनाओं का धन आखिर गया कहां है।



सूखी धरती किन्तु बाढ़ में डूब गए लाखों झाड़!

2008 से अब तक दिल्ली में 1,60,842 वृक्ष तबाह हो चुके हैं, जी हां, दिल्ली सरकार का कहना है यह। दिल्ली में पर्यावरण की फिजां शायद इतनी अधिक तादाद में झाड़ों के कालकलवित होने से ही बिगड़ी है। सवाल यह है कि पर्यावरण की फिजां को बिगड़ने के मार्ग किसने प्रशस्त किए। इसकी तह में जाया जाए तो आपका मुंह भी विस्मय से खुला ही रह जाएगा। मौसम विभाग ने आशंका व्यक्त की थी कि 2009 में बारिश कम होगी। वस्तुतः इस साल दिल्ली में सूखा भी पड़ा था। इस बात से दिल्ली सरकार को अधिक लेना देना नहीं है। दिल्ली सरकार का कहना है कि इस सूखे में ही एक लाख से अधिक झाड़ बाढ़ में बह गए हैं। सवाल यह उठता है कि जब सूखा पड़ा तब बाढ़ कहां से आ गई। आग और पानी दोनों को एक साथ तो नही रखा जा सकता है। यह चमत्कार दिल्ली सरकार ही कर सकती है, सो उन्होने कर दिया।



होगी तुम महारानी हमें तो आईडी दिखाओ

रूपहले पर्दे के अदाकार अपने आप को भगवान से कम नहीं समझते हैं। पिछले दिनों किंग खान यानी शाहरूख को दुनिया के चैधरी अमेरिका में एयर पोर्ट पर रोक लिया गया। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था, हम हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी इंडस्ट्री के अघोषित बादशाह और तुम हमें रोको। कमोबेश यही हादसा चंड़ीगढ़ एयरपोर्ट पर हो गया। किंग्स इलेवन की मालकन और अभिनेत्री प्रीति जिंटा से सुरक्षा कर्मी ने पहचान पत्र मांगने की हिमाकत कर डाली। प्रीति भड़क गईं और मामला तूल पकड़ गया। एयरपोर्ट अर्थारिटी के अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए। बताते हैं कि प्रीति के जलवे को देखकर उनका पहचान पत्र देखे बिना ही उन्हें प्रवेश दिया गया। होना यह था कि अपने कर्तव्य पर मुस्तैदी से डटे रहने वाले जवान की पीठ थपथपनी चाहिए थी, किन्तु एसा कुछ हुआ नहीं इन परिस्थितियों में जवानों का हौसला पस्त होना स्वाभाविक ही है।



पुच्छल तारा

भारत गणराज्य में घपले घोटाले भ्रष्टाचार की गूंज जमकर हो रही है। टूजी ममाले में शरद पवार का नाम आने से और गड़बड़ हो गई। कानपुर से मोनू कुमार अर्गल ने ईमेल भेजा है। मोनू लिखते हैं कि दो उमरदराज नेता आपस में बात कर रहे थे। पहला बोला यार हद ही हो गई। दूसरे ने पूछा क्या हद हुई भाई मेरे। पहला बोला लो शरद पवार का नाम संचार मंत्रालय के टूजी घोटाले में आ गया। दूसरे ने कहा तो इसमें क्या अलग है। सभी घोटाले में लिप्त हैं। पहला बोला यार हद यह हुई कि हमारे जमाने में मंत्री खुद के मंत्रालयों में घोटाला करने तक ही सीमित हुआ करते थे। यह तो सरासर अतिक्रमण है।

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

गिरजा को राजस्थान की दी जा सकती है जवाबदारी



जयंती हो सकती हैं महिला आयोग की नई अध्यक्ष

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राष्ट्रीय महिला आयोग के नए मुखिया की तलाश तेज हो गई है। निर्वतमान अध्यक्ष गिरिजा व्यास का कार्यकाल आठ अप्रेल को ही समाप्त हो चुका है। कांग्रेस कोटे से राज्य सभा सदस्य और प्रवक्ता जयंती नटराजन इस पद के लिए सबसे उपयुक्त प्रत्याशी बनकर उभरीं हैं कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के केंद्र की नजर में।

गौरतलब है कि डॉक्टर गिरजा व्यास राष्ट्रीय महिला आयोग की पांचवीं अध्यक्ष बनीं जो 16 फरवरी 2005 से लगातार दो कार्यकाल पूरा कर आठ अप्रेल को सेवानिवृत हो गईं हैं। वर्तमान में आयोग का प्रभार यास्मीन अबरार के पास है जो कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के प्रबंधकों द्वारा इस पद के लिए उपयुक्त नाम की खोज जारी है।

अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद गिरजा व्यास अब एक बार फिर पुर्नवास की जुगत लगा रहीं हैं। केंद्रीय मंत्री सी.पी.जोशी के स्थान पर उन्हें राजस्थान कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है। एआईसीसी मं चल रही चर्चाओं के अनुसार व्यास का नाम जनार्दन द्विवेदी के स्थान पर मीडिया सेल के प्रमुख के लिए भी चल रहा है। चूंकि गिरिजा व्यास पहले भी मीडिया सेल की प्रमुख रह चुकी हैं इसलिए उससे कम पद पर उन्हें लाना प्रोटोकाल के खिलाफ ही माना जा रहा है।



शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

शूलों भरी राह है अजय कांति की

शूलों भरी राह है अजय कांति की

(लिमटी खरे)

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उहापोह, मशक्कत, मेराथन बैठकों के दौर के उपरांत अंततः मध्य प्रदेश कांग्रेस कमैटी के अध्यक्ष, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के नामों पर हरी झंडी दे ही दी गई है। दोनों ही पद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के खाते में गए हैं। दिग्विजय सिंह का सक्रिय राजनीति से वनवास का समय पूरा होने में अब तीन साल से भी कम समय बचा है। मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर दिग्विजय सिंह धूमकेतू बनकर उभर रहे हैं, जिनके सामने प्रदेश के अन्य क्षत्रप दीप्तमान नजर नहीं आ रहे हैं।

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1993 से 2003 तक मध्य प्रदेश में राजनैतिक बिसात पर वही पांसे चले जो राजा दिग्विजय ने चाहे। इस दौरान प्रदेश के तत्कालीन ताकतवर क्षत्रप स्व.माधवराव सिंधिया को अपना संसदीय क्षेत्र बदलने पर मजबूर होना पड़ा। कुंवर अर्जुन सिंह की भी कमोबेश यही हालत रही वे विन्धय के उपरांत नर्मदांचल में होशंगाबाद से मुंह की खाने के बाद बरास्ता राज्यसभा संसद पहुंचे। श्यामा और विद्याचरण शुक्ल के साथ ही साथ अजीत जोगी के आभामण्डल को नेस्तनाबूत कर दिया गया। यहां तक कि दिग्विजय सिंह के तारण हार और बड़े भाई की भूमिका निभाने वाले कमल नाथ को उपचुनाव में पराजय का मुंह देखना पड़ा। वह भी तब जब ब्लाक स्तर पर मंत्रियों की तैनाती थी। यह सब महज संयोग नहीं माना जा सकता है। इसके पीछे इक्कीसवीं सदी के उभरते कांग्रेस के राजनैतिक चाणक्य का शातिर दिमाग ही काम कर रहा था।

2003 में चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस के निजाम राजा दिग्विजय सिंह ने दस सालों तक सक्रिय राजनीति से तौबा करने का कौल लिया था। दिग्गी राजा ने चुनाव न लड़कर अब तक उसे निभाया है। अब वनवास समाप्त हाने की बेला आ रही है, इसलिए उनकी सक्रियता को समझा जा सकता है। देश के हृदय प्रदेश में अपना वर्चस्व बरकरार रखने के लिए वे अपने प्यादों को यहां करीने से फिट करते जा रहे हैं। कांतिलाल भूरिया को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के बाद अजय सिंह की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर नियुक्ति इसका अभिनव उदहारण माना जा सकता है।

अपनी नियुक्ति के साथ ही अजय सिंह और भूरिया गदगद हुए बिना नहीं होंगे किन्तु उनके सामने की चुनौतियां उनके इस सफर का मजा खराब कर सकती हैं। आपसी कलह में तार तार हो चुकी प्रदेश कांग्रेस में अनेक जिलों में अब कांग्रेस के नामलेवा नहीं बचे हैं। कांग्रेस के आला नेताओं और भजपा के आलंबरदारों की जुगलबंदी से मध्य प्रदेश में कांग्रेस रसातल में ही है। सुरेश पचौरी के हटते ही कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव जैसे धुरंधरों की अति सक्रियता से कार्यकर्ताओं में जोश अवश्य ही आएगा किन्तु वह कितने समय तक टिक पाएगा कहा नहीं जा सकता है।

नवनियुक्त नेताओं के सामने प्रदेश का भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौति बनकर उभरेगा। अफसरशाही, लाल फीताशाही और बाबूराज के बेलगाम दौड़ते घोड़ों की लगाम कसना बहुत ही दुष्कर काम है। जब नेता प्रतिपक्ष का फैसला ही सात माहों के की लंबी मशक्कत के बाद हुआ हो तब मध्य प्रदेश के क्षत्रपों की सहमति की डोर कितनी महीन होगी इस बात को समझा जा सकता है। माना जा रहा है कि अब तक पीसीसी और भाजपा के बीच आपसी ‘‘अंडरस्टेंडिग‘‘ गजब की थी, यही कारण था कि सब कुछ देखने सुनने के बाद भी और अनेक सुनहरे मौकों के बावजूद भी प्रदेश कांग्रेस ने कभी भी भाजपा को व्यापक स्तर पर घेरने का प्रयास नहीं किया। कार्यकर्ताओं में आम धारणा घर कर चुकी है कि भाजपा के आला नेताओं के इशारे पर कांग्रेस और कांग्रेस के चुनिंदा नेताओं के इशारों पर भाजपा चल रही है।

भूरिया के अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार भोपाल आगमन के एन पहले प्रदेश भाजपाध्यक्ष प्रभात झा ने उन्हें अपना एक समझदार मित्र बताकर पांच पन्नों की पाती लिख दी। झा के पत्र से यही संदेश जा रहा है कि आने वाले समय में एक बार फिर प्रदेश में कांगेस बिना दांत के ही चलने वाली है। कांग्रेस की धार बीते सात सालों मंे पूरी तरह से बोथरी हो चुकी है जिसे पजाना आसान नहीं होगा। गुटों में बटी कांग्रेस को एक सूत्र में पिरोना दोनों ही नवागंतुक पदाधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होने वाला है। विधानसभा चुनावों में अभी ढाई बरस का समय है। मध्य प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व को उभारकर आला कमान ने जो भी संदेश देना चाहा हो किन्तु मध्य प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की स्मृति इतनी कमजोर नहीं है कि वे इस बात को भूल जाएं कि भूरिया ने बतौर सांसद और केंद्रीय मंत्री मध्य प्रदेश के कितने जिलों का दौरा किया है। जब खुद कांतिलाल भूरिया ही सालों साल निष्क्रीय या क्षेत्र विशेष में समिटकर रह गए हों तब उनके निजाम बनते ही रातों रात कायापलट संभव प्रतीत नहीं होता है।

अजय सिंह और कांतिलाल भूरिया के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों ही की छवि अब तक प्रदेश स्तरीय नेता की भी नहीं बन पाई है। भूरिया मालवांचल तो अजय सिंह विन्धय प्रदेश तक ही सीमित समझे जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष रहे अजय सिंह ने चुनावों के दौरान भी समूचे प्रदेश में आमद नहीं दी। दोनों ही नेताओं को सभी गुटों को साथ लेकर चलना सबसे बड़ी चुनौति होगा, क्योंकि काग्रेस में शिख से लेकर नख तक इतनी शाखाएं और गुटबाजी है कि इस तरह की खरपतवार को नष्ट करना आसान बात नहीं होगा। भूरिया ओर अजय सिंह के सामने यह चुनौति भी कम नहीं होगी कि उन्हें मनराखनलाल हरवंश सिंह, महंेंद्र सिंह कालूखेड़ा, सज्जन सिंह वर्मा, हुकुम सिंह कराड़ा, चौधरी राकेश सिंह, एन.पी.प्रजापति, गोविंद सिंह, सात बार के विधायक प्रभुदयाल गहलोत, माणक अग्रवाल जैसे धुरंधरों को भी साधना होगा।

एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल जबर्दस्त तरीके से गिरा है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस के सामने अभी मण्डलेश्वर और जबेरा उपचुनाव के साथ ही साथ अर्जुन सिंह के निधन से रिक्त हुई राज्य सभा की सीट को जीतना परीक्षा से कम नहीं है। माना कि दोनों ही नेताओं के मौखटे के पीछे राजा दिग्विजय सिंह का चेहरा हो पर दोनों ही नेताओं को अब एक एक कदम फूंक फूंक कर ही रखना होगा, वरना आने वाले सालों में काग्रेस को जिंदा करना ही अपने आप में बहुत बड़ा मिशन बनकर रह जाएगा।

अर्जुन के बदले राज्य सभा में जा सकती हैं वीणा सिंह

वीणा से निकलेगी भाजपाई धुन

जमे जकड़े परिवारों पर नजर रही है भाजपा की

अर्जुन परिवार का दबदबा रह सकता है कायम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह के अवसान से रिक्त हुई राज्य सभा सीट के लिए भाजपा द्वारा उनकी पुत्री वीणा सिंह को तैयार करने की कवायद की जा रही है। उधर कांग्रेस द्वारा अर्जुन पुत्र अजय को मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया है। सब कुछ अगर ठीक ठाक रहा तो आने वाले समय में ठाकुर परिवार का दबदबा एक बार फिर कायम दिखेगा। कांग्रेस ओर भाजपा दोनों के द्वारा ही अर्जुन सिंह की विरासत को अपने दामन में सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।

कांग्रेस में चल रही बयार के अनुसार देश भर विशेषकर मध्य प्रदेश में कुंवर अर्जुन सिंह के समर्थकों की बड़ी तादाद को देखकर आला नेता उनके परिवार की उपेक्षा करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। उधर कांग्रेस में इक्कीसवीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह द्वारा भविष्य की स्थिति को भांपते हुए अजय सिंह पर दांव लगा ही दिया है। आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के प्रदेशाध्यक्ष बनते ही अजय सिंह को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जवाबदारी सौंप दी गई है।

उधर मध्य प्रदेश में भाजपा के बहुमत में होने से माना जा रहा है कि अर्जुन सिंह के अवसान से रिक्त होने वाली सीट पर भाजपा समर्थित उम्मीदवार ही विजयी होगा। भाजपा भी अर्जुन सिंह की विरासत को अपनाने आतुर दिख रही है यही कारण है कि भाजपा चाह रही है कि अर्जुन सिंह की पुत्री वीणा सिंह को राज्य सभा से मैदान में उतारकर अर्जुन समर्थकों का भाजपाईकरण किया जा सके।

भाजपा द्वारा कांग्रेस के जमे जकड़े परिवारों पर नजरें इनायत की जाती रहीं हैं। गौरतलब होगा कि हाल ही में मध्य प्रदेश की नेता प्रतिपक्ष श्रीमति जमुना देवी के निधन से रिक्त हुई कुक्षी विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा उनके परिजनों पर डोरे डालने का प्रयास भी किया गया था। अब भाजपा के निशाने पर वीणा सिंह हैं।