मंगलवार, 21 सितंबर 2010

विद्युत चुम्बकीय तरंगों का प्राणशक्ति पर प्रभाव

विद्युत चुम्बकीय तरंगों का प्राणशक्ति पर प्रभाव

हमारा सौर मण्डल पूर्णतः विद्युत चुम्बकीय तरंगों से भरा हुआ हैं । सूर्य से निकलने वाली किरणें, ऊर्जा की तरंगे तथा सौर मण्डल में भ्रमण कर रहे ग्रहों की गति आदि विद्युत चुम्बकीय तरंगें पैदा करती हैं । सौर मण्डल का एक उपग्रह हमारी पृथ्वी हैं एवं इसमें चुम्बकीय शक्ति होती हैं, यह पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा भी करती हैं और अपनी धुरी पर घूमती भी रहती हैं । इससे पैदा होने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि इनकों सीधे मापने के साधन बहुत सीमित और महंगे हैं ।

हमारे शरीर में भी विद्युत चुम्बकीय तरंगे होती हैं जिनके कारण हमारा ह्नदय क्रियाशील रहता हैं, मस्तिष्क सक्रिय रहता हैं, इन्द्रियॉ अपना काम करती हैं और हाथ पैर कार्य करते हैं । यह विद्युत ही मनुष्य को जीवनीशक्ति यानी चेतना प्रदान करती हैं ।

आज विज्ञान बहुत उन्नत और विकसित हो गया हैं, वैज्ञानिकों ने अच्छे अविष्कार किये हैं । सन 1882 में विद्युत का आविष्कार हुआ था डी0सी0 करेण्ट के रूप में, इसके बाद इसको विकसित किया गया और ए0सी0 करेण्ट 110 वोल्ट, 220 वोल्ट, 440 वोल्ट के बाद हजारों मेगावाट, माइक्रोवेव आदि सामने आयें । आज तो बिना तारों के, एक जगह से दूसरी जगह तक, वायुमण्डल के माध्यम से तरंगे भेजी जा रही हैं । ये तरंगे अदृश्य होती हैं और हमारे शरीर के चारों तरफ रहती हैं । इन तरंगों का जो प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता हैं उसे जानने के लिये विश्व के उन्नत देशों के वैज्ञानिक दिन रात परिश्रम कर रहे हैं ।

सोवियत शोधकर्ता खोलोडोव द्वारा विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव का अध्ययन चूहों पर किया गया और यह पता चला कि 100 से 200 गॉस की चुम्बकीय तरंगे चूहों पर तनाव पैदा होने का प्रभाव डालती हैं । एक वैज्ञानिक फ्राइडमेन ने चूहों के साथ-साथ बन्दरों पर भी चुम्बकीय तरंगों का प्रभाव देखा हैं और यह पाया हैं कि इसके प्रभाव से बंदरों के शरीर में कार्टीसोन का स्तर बढ़ जाता हैं ।

स्वीडन में जेमिनियस नामक वैज्ञानिक ने 2000 घरों का सर्वे किया और यह पाया कि जिन लोगों के घर हाईटेंशन लाइन के पास हैं उन घरों में रहने वालों के बच्चों में कैंसर रोग की ग्रोथ सामान्य से दुगुनी संख्या में होती हैं । टेक्सास में हुये एक सर्वे में पाया गया कि हाईटेंशन लोइन पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को, सामान्य से 13 गुना ज्यादा ब्रेन कैंसर होने की सम्भावना रहती हैं ।

अब हम जरा अपने बारे में बात कर लें, आज कल हमने अपने मनोरंजन के लिये अपने शयनकक्ष में टी0वी0, म्यूजिक सिस्टम, एयरकण्डीशनर आदि लगा रखे हैं । अपनी सुविधा भोगी या कहिये कि आलसी मनोवृत्ति के कारण इनके स्विच अपने पलंग के पास या बेड स्विच के रूपमें पलंग में लगा रखें हैं ताकि स्विच ऑन या आफ करने के लिये उठ कर दीवार तक न जाना पड़े । क्या आपने कभी सोचा हैं कि इस सुविधा का प्रभाव हमारे शरीर पर क्या पड़ रहा हैं ? हम बच्चों से कहते हैं कि टी0वी0 दूर बैठ कर देखा करों, क्योंकि अनुभव में आया हैं कि ज्यादा पास बैठ कर टी0वी0 देखने से आंखो में तकलीफ होने लगती हैं और सिर भारी हो जाता हैं तो जाहिर हैं कि टी0वी0 से निकलने वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगे आंखों को हानि पहुॅंचाती हैं । इस तथ्य को वैज्ञानिकों ने भी अपने मापन यंत्रों से जांच करके सिद्ध कर दिया हैं कि टी0वी0 से निकलने वाली चुम्बकीय तरंगों का परिणाम तीन फीट के दायरे में 3 मिली गॉस से ज्यादा होता हैं ।

हमारे पलंग पर लगे बिजली के स्विच या साइड लेम्प से विद्युत तरंगे हमारे शरीर तक पहुूच कर एक तरह का खिंचाव करती हैं जिससे कई तरह की बीमारियॉ पैदा होती हैं । यह एक ऐसा रहस्य हैं जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होगी ।

इन बीमारियों से बचने के लिये बेडरूम में मौजूद विद्युत उपकरणों को सोने से पहने न सिर्फ बंद कर देना चाहिये बल्कि उनके प्लग भी साकेट से निकाल देना चाहियें । सोते समय हम 7-8 घण्टे एक ही स्थान पर होते हैं अतः पलंग पर कोई भी इलेक्ट्रिक स्विच या टेबल लेम्पर न लगायें । इनकी दूरी पलंग से सात फिट होनी चाहियें । वैज्ञानिक खोजों से पता चला हैं कि इन विद्युत चुम्बकीय तरंगों से मानसिक तनाव पैदा होता हैं । पीठ, कमर व घुटनों में दर्द होता हैं तथा माइग्रेन और सिर दर्द की शिकायत होती हैं । विविध प्रकार की एलर्जी हो सकती हैं, चर्म रोग हो सकते हैं । अनिद्रा या ज्यादा नींद आना, डिप्रेशन, शरीर में अकडन आदि की शिकायत हो सकती हैं ।

मोबाईल फोन या कॉडलेस का ज्यादा उपयोग करने वालों ने अनुभव किया होगा कि बहुत देर तक मोबाईल फोन पर बात करने पर कान व सिर में दर्द होने लगा लगता हैं । एक वैज्ञानिक खोज से पता चला हैं कि जैसे ही मोबाईल फोन कान के पास लाते हैं मस्तिष्क की विद्युत चुम्बकीय तरंगे लाखों गुना बढ़ जाती हैं । इस विषय में कुछ सावधानियॉं रखना जरूरी हैं जैसे मोबाईल फोन ह्नदय के पास न रखें, कार में इसका उपयोग हेण्ड्स फ्री सेट के माध्यम से करें बाकी समय में इयर फोन एवं माइक्रो फोन का उपयोग करें ।

इसी तरह हमारे आफिस में भी हमें विद्युत उपकरणों के बारे में कुछ सावधानियॉ रखनी होंगी क्योंकि आफिस में भी हम दिन का अधिकांश समय व्यतीत करते हैं और हमारे आस पास कई प्रकार के विद्युत उपकरण होते हैं या हो सकते हैं जैसे फैक्स मशीन, टेबल, लेम्प, बिजली के स्विच, पेपर, डिस्ट्रांइंग मशीन, टी0वी0, कम्प्यूटर आदि । कम्प्यूटर सबसे ज्यादा तरंगे पीछे की तरफ से प्रसारित करता हैं इसलिये कम्प्यूटर की पीठ हमारी तरफ नहीं होनी चाहियें ।

नई जमीन खरीदते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहियें कि वह जमीन हाईटेंशन लाइन से कम से कम 200 फिट दूर हो ताकि विद्युत तरंगों के प्रभाव से बच सकें । विद्युत चुम्बकीय तरंगें ऋणात्मक ऊर्जा उत्पन्न करती हैं जिसे हम जॉंच उपकरणों से प्रत्यक्ष देख सकते हैं । आपने देखा होगा कि बिजली के स्विच बोर्ड और मरकरी ट््यूब लाइट के आस पास छिपकलियॉ दिखाई देती हैं । छिपकली ऋणात्मक ऊर्जा वाली होती हैं इसलिये इनसे ऋणात्मक ऊर्जा प्राप्त कर जीवनयापन करती हैं । मनुष्य, गाय, घोड़ा, बकरी, भेड़, कुत्ता, गधा आदि धनात्मक ऊर्जा पुंज हैं अतः इनके सम्पर्क में रहना और ऋणात्मक ऊर्जा वाले तत्वों से दूर रहना शरीर को स्वस्थ व सबल बनाये रखने के लिये बहुत जरूरी हैं ।

संकलनकर्ता

अनुराग अग्रवाल

ज्योतिष, अंकशास्त्र, वास्तु विशेषज्ञ

सिवनी मो0 09425445623

सड़क मंत्री से सड़क पर ही भिड़ेगी भाजपा

भाजपा और कमल नाथ में जारी है नूरा कुश्ती

(लिमटी खरे)

कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी में नूरा कुश्ती तेज हो गई है। कभी भाजपा की मध्य प्रदेश सरकार के लोक कर्म मंत्री दिल्ली जाकर मध्य प्रदेश को कमल नाथ द्वारा सबसे अधिक राशि देने के चलते कमल नाथ की शान में कसीदे पढ़ते हैं तो कभी सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा दिल्ली में ही पत्रकार वार्ता मध्य प्रदेश को सड़क के मामले में केंद्र द्वारा सबसे अधिक आवंटन दिए जाने की बात कहकर कमल नाथ का पक्ष लिया जाता है। इससे उलट चंद माहीनों के अंदर ही भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश पादाधिकारियों की बैठक में मुख्यमंत्री और लोक कर्म मंत्री की उपस्थिति में यह निर्णय लिया जाता है कि चूंकि कमल नाथ द्वारा सड़कों के मामले में मध्य प्रदेश के साथ पक्षपात किया जा रहा है अतः भाजपा अब सड़कों पर उतरेगी! जनता के साथ भाजपा के कार्यकर्ता भ्रम में है कि वह मंत्रियों की बात को सच माने या फिर प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में लिए निर्णय को!, क्योंकि दोनों ही मामलात में मुख्यमंत्री उपस्थित थे। अब लगता है कि सड़क मंत्री से सड़क पर ही भिड़ेगी भाजपा।

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ जिस भी विभाग के मंत्री रहे हैं, उन्होंने मध्य प्रदेश विशेषकर छिंदवाड़ा को अपने नेतृत्व वाले विभाग के मामले में पूरा समृद्ध किया है। पिछली मर्तबा वाणिज्य और उद्योग का उदहारण अगर छोड़ दिया जाए तब छिंदवाड़ा वासी हमेशा ही गर्व से कह सकते हैं कि उनका नेतृत्व कमल नाथ जैसा सशक्त व्यक्तित्व कर रहा है। वर्तमान में भूतल परिवहन मंत्रालय (इतिहास में पहली बार इस विभाग को कमजोर करने के लिए जहाजरानी मंत्रालय को इससे प्रथक किया गया है) का नेतृत्व करने वाले कमल नाथ ने अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में राष्ट्रीय राजमार्ग का जबर्दस्त जाल बिछाने का मास्टर प्लान तैयार कर लिया है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि कमल नाथ चाहते हैं कि उनके संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में विश्व का सबसे बड़ा चौगड्डा वह भी राष्ट्रीय राजमार्ग का स्थापित हो जाए ताकि लोगों की स्मृतियों में वे सदा ही बने रहें। नरसिंहपुर, नागपुर, ओबेदुल्ला गंज नागपुर, मुलताई सिवनी बालाघाट गोंदिया, आदि मार्गों को एनएच में तब्दील करवाने का काम इसी मंशा के तहत ही किया जा रहा लग रहा है।

इतना ही नहीं अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना स्वर्णिम चतुर्भुज के अंग उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का काम बहुत ही दु्रत गति से जारी है। इस मार्ग में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से गुजरने वाली सड़क को भी शामिल किया गया था। इस काम को एनएचएआई के सुपरवीजन में करवाया जा रहा था। इसके लिए सिवनी में एक प्रोजेक्ट डायरेक्टर का कार्यालय भी स्थापित किया गया था, जिसमें पीडी की हैसियत से विवेक जायस्वाल की पदस्थापना की गई थी। पिछले कुछ दिनों से विवेक जायस्वाल सिवनी से लापता ही लग रहे हैं। उनका अधिक समय मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में ही बीत रहा है। सिवनी का कार्यालय भी मृत प्राय ही पड़ा हुआ है। सड़क निर्माण का काम प्रत्यक्षतः कराने वाली मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी और सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी ने भी अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया है।

पिछले दिनों भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाने की तैयारी कर ली थी। इसके अनुपालन में मध्य प्रदेश सरकार ने भी 1337.15 किलोमीटर लंबे 12 स्टेट हाईवे को नेशनल हाईवे में तब्दील करने का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा था, जिसे केंद्र ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस स्वीकारोक्ति के पीछे जनता का लाभ कम राजनैतिक बाध्यताएं ज्यादा दिखाई पड़ रही थी। मजे की बात तो यह है कि सदा ही एक दूसरे के लिए तलवारें पजाने वाली भाजपा और कांग्रेस के बीच पहली बार ही किसी मामले में एकमत दिखाई पड़ा। अन्यथा हर मामले में एक दूसरे की सरकारों पर लानत मलानत ही भेजी जाती रही हैं।

इसके बाद मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री ने दिल्ली में एक समारोह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तबियत से तारीफ की और यहां तक कहा कि मध्य प्रदेश को सिर्फ और सिर्फ सड़कों के मामले में केंद्र से पर्याप्त सहयोग और समर्थन मिल रहा है। मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री के कथन के बाद मध्य प्रदेश की ओर से दिल्ली में बैठे जनसंपर्क महकमे के अधिकारियों ने भी एमपी के चीफ मिनिस्टर शिवराज सिंह और केंद्रीय राजमार्ग मंत्री कमल नाथ के बीच मुस्कुराकर बातचीत करने वाले छाया चित्र और खबरें जारी कर दीं। मजे की बात तो यह है कि बारंबार शिवराज सिंह चौहान ने भी कमल नाथ को एक उदार मंत्री होने का प्रमाण पत्र जारी किया है।

बुरदलोई मार्ग स्थित मध्य प्रदेश भवन में पत्रकारों से रूबरू मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब केंद्र पर भेदभाव का आरोप मढ़ा तब पत्रकारों से शिवराज से पूछा था कि उनके लोक निर्माण विभाग के मंत्री तो कमल नाथ के पक्ष में कोरस गा रहे हैं, तब चिढकर शिवराज ने कहा था कि लोक निर्माण मंत्री क्या वे (शिवराज सिंह चौहान) भी कमल नाथ से मिलते हैं और कमल नाथ मध्य प्रदेश की मदद कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके लोक निर्माण मंत्री द्वारा कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में कांग्रेस के कोटे के मंत्री कमल नाथ द्वारा उदार भाव से अपने प्रदेश की भाजपा सरकार को मुक्त हस्त से मदद करने की बात जब फिजा में तैरी तो कमल नाथ की छवि दलगत राजनीति से उपर उठकर मदद करने वाले राजनेता की बन गई।

हो सकता है कि शिवराज - कमल नाथ की जुगलबंदी कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को रास न आई हो और दोनों ही दलों के सियासतदारों ने मिलकर इस जुगलबंदी को तोड़ने का प्रयास कर दिया हो। वैसे हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कमल नाथ और शिवराज सिंह चौहान के बीच जो भी प्रसंग चल रहा था, वह धरातल से इतर कुछ और था, क्योंकि मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों के उड़े धुर्रे किसी से छिपे नहीं है। आज दूसरे प्रदेशों से मध्य प्रदेश में माल लाने पर ट्रांसपोटर्स भी आनाकानी ही करते हैं, इसका कारण प्रदेश की सड़कों की बुरी दशा ही माना जाएगा।

यह बात भी उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात कि मध्य प्रदेश में केंद्रीय मदद से बनने वाली समस्त सड़कों में गुणवत्ता विहीन काम ही किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना में ठेकेदारों ने जमकर तबाही मचाई है। अधिकारियों की मिलीभगत से सड़कों की बदहाली किसी से छिपी नही है। मीडिया कितना भी चीख चिल्ला ले, पर इन पर कोई कार्यवाही नहीं होना, शासक प्रशासक और ठेकेदार के बीच की जुगलबंदी को रेखांकित करता है।

मध्य प्रदेश में चल रहे कामां में ठेकेदारों ने कम समय में ज्यादा माल कमाने का तरीका खोज लिया है। इस काम में खतरे की गुंजाईश कम और माल पीटने की संभावनाए जबर्दस्त होती है। बड़े ठेकेदारों द्वारा एक साथ अनेक काम ले लिए जाते हैं फिर उसे छोटे ठेकेदारों के बीच बांट देते हैं। छोटे ठेकेदार अपने हिसाब से कम गुणवत्ता में काम निपटा देते हैं, बड़े ठेकेदारों द्वारा ‘‘मेनेज्ड‘‘ अधिकारियों द्वारा इसकी गुणवत्ता को प्रमाणित कर दिया जाता है। उपर से देखने पर यही प्रतीत होता है कि काम को बड़ा मूल ठेकेदार ही संपादित करवा रहा है।

सरकारी आंकड़े चाहे जो कहंे पर हकीकत यह है कि आज मध्य प्रदेश में एक हजार और पांच सौ से अधिक की आबादी वाली बसाहटों की तादाद 16 हजार 894 है जिनमें से पांच सौ से ज्यादा आबादी वाली 3 हजार बासठ तो एक हजार से ज्यादा आबादी वाली पांच हजार दो सौ पच्चीस इस तरह कुल आठ हजार दो सौ सत्यासी गांव ही जुड सके हैं सड़कों से। देखा जाए तो सेंट्रल एडेड स्कीम के बावजूद भी पचास फीसदी गांव इससे नहीं जुड़ सके हैं, और जो गांव जुड़े भी हैं उनमें सड़कों की गुणवत्ता एकदम घटिया है। जब भी जांच दल निरीक्षण के लिए जाता है, विभाग के कमीशनखोर अधिकारी कर्मचारियों द्वारा ठेकेदार को चेता दिया जाता है और जगह जगह गड्ढों को भर दिया जाता है। इसके उपरांत जब निरीक्षण दल आता है तब उसकी सेवा टहल में ठेकेदार नतमस्तक हो जाता है। निरीक्षण दल द्वारा भी अपनी अंटी में माल भरकर औपचारिकताएं पूरी कर रवानगी डाल दी जाती है।

बहरहाल मध्य प्रदेश में हाल ही में प्रदेश पादाधिकारियों बैठक में एक निर्णय लिया जाकर सभी को चौंका दिया गया है। राज्य के राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव के लिए कंेद्र से मिलने वाली राशि के बंद करने के विरोध में भाजपा ने उन्हीं राजमार्ग मंत्री कमल नाथ जिनकी तारीफ करते मुख्यमंत्री और सूबे के लोक निर्माण मंत्री नहीं थकते हैं, के खिलाफ सड़कों पर उतरने का फैसला कर लिया है। देखा जाए तो इन सड़कों के रखरखाव की जवाबदारी केद्र सरकार की है क्योंकि नेशनल हाईवे के नोटिफिकेशन के उपरांत ये केंद्र सरकार की संपत्ति हो जाती है।

भाजपा का कहना है कि वह 5 से 7 अक्टूबर तक नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले कस्बों और ग्रामों में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी फिर 22 से 24 अक्टूबर तक इन्ही ग्रामों में मानव श्रंखला बनाई जाने के उपरांत 10 नवंबर को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष 10 नवंबर को प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। भाजपा के इस निर्णय से कमल नाथ और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती और तेज हो गई है, इसका कारण यह है कि भाजपाध्यक्ष प्रभात झा इन दिनों प्रदेश के दौरे पर हैं, वे राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे अवस्थित जिला, तहसील, विकासखण्ड मुख्यालयों के अलावा गांवों और कस्बों से भी विचर रहे हैं और उन्होंने कहीं भी अपने कार्यकर्ताओं को प्रदेश पदाधिकारियों के इस महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी देकर इसे सफल बनाने का आव्हान नहीं किया है। आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि प्रभात झा खुद भी सड़क मार्ग से गुजर रहे हैं, और सड़कों पर हिचकोले खाती चलती उनकी आलीशान विलासिता पूर्ण गाड़ी के बाद भी उनकी तंद्रा नहीं टूट पा रही है।

जब मध्य प्रदेश में सत्ताधारी और केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा का आलम यह है तो गरीब गुरबों की कौन कहे, वह भी तब जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की आसनी पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सालों साल सींची गई मध्य प्रदेश की विदिशा संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीती सुषमा स्वराज विराजमान हों, तब भी मध्य प्रदेश की सड़कें इस तरह से बदहाल हो रही हो, केंद्र के मंत्री मध्य प्रदेश के साथ अन्याय कर रहे हों, इस अन्याय के बाद भी पता नहीं किस बात से उपकृत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और सूबे के लोक निर्माण मंत्री दोनों ही केंद्र सरकार को कोसकर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में तराना गा रहे हों, साथ ही साथ भाजपा द्वारा कमल नाथ के द्वारा प्रदेश के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने के आरोप में सड़कों पर उतरने की बात की जाए तो यह तथ्य निश्चित तौर पर शोध का ही विषय माना जाएगा।

भाजपा की दो तरह की नीतियों के कारण अब जनता के साथ भाजपा कार्यकर्ताओं में भी भ्रम का वातावरण बनना लाजिमी है कि वे शिवराज सिंह चौहान के कथनों पर यकीन कर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को ‘‘दानवीर कर्ण‘‘ की संज्ञा दें, या भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के निर्णय से कमल नाथ और शिवराज की जुगलबंदी को ‘‘बाबा भारती और खड़ग सिंह‘‘ की कहानी से जोड़ें, या फिर लंबे समय से हो रही प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा को देखने के बाद उनकी तुलना ‘‘महाराज ध्रतराष्ट्र‘‘ से करने की सोचें?

सोमवार, 20 सितंबर 2010

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

राजा युवराज साथ साथ होंगे सक्रिय
कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के कुलदीपक युवराज जयवर्धन सिंह के मन मस्तिष्क में भी राजनीति के बियावान में हाथ अजमाने की इच्छाएं कुलाचंे मारने लगी हैं। राजा और युवराज दोनों ही सक्रिय राजनीति में एक साथ पदार्पण कर सकते हैं। युवराज जयवर्धन सिंह ने मीडिया को दिए साक्षात्कार में कहा है कि वे 2013 में योजना बद्ध तरीके से कांग्रेस की सदस्यता लेकर सक्रिय राजनीति में पदार्पण करेंगे। जयवर्धन की शिक्षा दीक्षा सुप्रसिद्ध दून स्कूल और फिर श्रीराम कालेज से वे वाणिज्य स्नातक हैं। कम ही लोग जानते होंगे कि मेनेजमेंट की पढ़ाई करने के इच्छुक जयवर्धन योजना आयोग के लिए काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह ने 2003 में विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के उपरांत दस साल तक चुनाव न लड़ने का कौल लिया था, जिस पर वे आज भी कामय हैं। 2013 में उनकी यह कसम पूरी होने जा रही है, तब वे सक्रिय होंगे, पर अपने इकलौते पुत्र जयवर्धन के साथ। राजा दिग्विजय सिंह अभी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को राजनीति का ककहरा सिखा रहे हैं, तो निश्चित तौर पर उन्होंने अपने सपूत जयवर्धन को भी राजनीति के दांव पेंच से वाकिफ करा ही दिया होगा।

जदयू, भाजपा: हनीमून इज ओवर
जैसे जैसे बिहार में चुनावों की तारीखें पास आती जा रही है, वैसे वैसे भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाईटेड की संयुक्त सरकार में दरारें बढ़ती जा रही हैं। पोस्टर विवाद से आरंभ हुए इस झगड़े के उपरांत भाजपा और जदयू के नेताओं के बीच वार थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। बीच बीच में अवश्य ही सीज फायर की स्थिति बन जाती है, किन्तु राख के नीचे शोले जलते दिखाई पड़ ही रहे हैं। दरअसल कुल मिलाकर झगड़ा सत्ता की मलाई दुबारा चखने का है। जदयू को लगने लगा है कि वह अकेले ही बिहार में सरकार बनाने की स्थिति में है, तो उधर भाजपा भी कम मुगालते में नहीं है। लालू पासवान और कांग्रेस भी अपने अपने स्तर पर जोर अजमाईश में लगे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि वे नरेद्र मादी को बिहार में घुसने नहीं देंगे। निंितीश के बयान ने ठहरे हुए पानी में एक बार फिर लहरें पैदा कर दी हैं। इसका कारण यह है कि हाल ही में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा था कि बिहार चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी अवश्य ही शिरकत करेंगे।

किंामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार से आहत हैं असलम
राष्ट्रमण्डल खेलों में तबियत से हो रहे भ्रष्टाचार से 1975 में हाकी विश्व कप के हीरो रहे पूर्व संसद सदस्य असलम शेर खान बुरी तरह आहत हैं। वे कामन वेल्थ गेम्स को भ्रष्टाचार गेम्स की संज्ञा देते हैं। गौरतलब है कि कांग्रेसनीत केंद्र और कांग्रेस की ही दिल्ली सरकार की छत्रछाया में कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर भ्रष्टाचार का नंगा नाच नाचा जा रहा है। असलम शेर खान का कहना है कि लोग आजकल स्पोर्टस से कम अर्थात सेक्स, दाम अर्थात पैसा और नाम यानी प्रसिद्धि से जोड़कर देखते हैं। असलम की इस बात में दम है कि कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर 28 हजार करोड़ फूंककर हमे क्या हासिल होने वाला है, अगर हम एक खेल पर एक हजार करोड़ खर्च करते तो हमारी झोली में 28 स्वर्ण पदक निश्चित तौर पर आ ही जाते। अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए प्रसिद्ध असलम शेर खान के इस कथन के बाद उनके विरोधी यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि असलम भाई अगर आप कलमाड़ी के स्थान पर होते तो क्या तब भी आप भ्रष्टाचार और धन फूंकने की बात इतनी शिद्दत के साथ करते!

दत्त परिवार में अब आल इज वेल
नरगिस और सुनील दत्त के पुत्र पुत्रियों के बीच अब युद्ध समाप्त होता दिख रहा है। कल तक नम्रता, प्रिया दत्त और संजय दत्त के बीच जबर्दस्त अंर्तविरोघ की स्थिति बनी हुई थी। संजय दत्त के निवास पर उनकी पत्नि मान्यता ने एक पार्टी का आयोजन किया था। यह आयोजन ईद, गणेश चतुर्थी के साथ ही साथ एक अन्य कारण से भी काफी महत्वपूर्ण था। कारण था प्रिया दत्त के पति ओवेन रॉकन का जन्म दिन। संजय और मान्यता के घर की खुशियां एक बार फिर लौटती दिख रही हैं। संजय दत्त के घर आयोजित पार्टी मंे न केवल संजय, मान्यता, प्रिया और नम्रता के दोस्तांे ने शिरकत की वरन इसमें उनके लगभग सारे रिश्तेदार भी आए। लोगों का मुंह है, सो कहने से कहां चूके। लोगों का कहना है कि अमर सिंह के साथ संजय दत्त की दूरियों के बाद भाई बहन के बीच लड़ाई की बर्फ पिघलना आरंभ हुआ है। वैसे भी कहते हैं कि जब तक अंबानी बंधुओं के करीब अमर सिंह रहे तब तक उनके बीच तलवारें खिची रहीं। अमिताभ और गांधी परिवार के बीच भी यही स्थिति रही।

ममता के राज में मूषक को लगता है पहले भोग
भगवान गणेश का वाहन चूहा हर घर में सभी प्रकार के अनाज का भोग पहले ही लगा देता है। यही आलम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले रेल विभाग का है। यात्रियों के लिए बनने वाला भोग पहले चूहों द्वारा चखा जाता है फिर उसे रेल में सफर करने वाले मुसाफिरों को परोसा जाता है। पुरानी दिल्ली के प्लेटफार्म नंबर 20 के सेल किचन में आम मुसाफिरों के लिए खाना बनाया जाता है। रेल विभाग के अधिकारियों की अनदेखी से कटी सब्जियों, और अन्य खाद्य सामग्रियों पर चूहे सारे दिन उछल कूद मचाते रहते हैं। चूहों के कारण भोजन दूषित हुए बिना नहीं रह पाता। रेल में पेन्ट्री कार में भी चूहे और काकरोच का जलजला देखते ही बनता है। रेल विभाग के अधिकारियों द्वारा भी इस बारे में कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। चूंकि यात्रियों को इसके बारे में पता नहीं चलता है, वरना आंखों देखी मक्खी भला कौन निगलेगा। हो सकता है कि पश्चिम बंगाल पर कब्जा करने की मंशा मन में रखने वाली ममता बनर्जी द्वारा भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उनके वाहन चूहे को भोग लगाने की बात पर सख्ती नहीं की जा रही हो।

प्रियंका के घर की उखड़ी छत
हिमाचल प्रदेश को देवताओं की भूमि माना जाता है। इस प्रदेश के शिमला के छराबड़ा में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी की सदस्य श्रीमति प्रियंका वढ़ेरा का आशियान तैयार किया जा रहा है। पिछले दिनों हुई ताबड़तोड़ बारिश ने प्रियंका के घर की छत ही उखाड़ दी है। यह छत जगह जगह टपकने लगी है। प्रियंका के निर्माणाधीन घर की छत पर लकड़ी के उपर स्लेट की चादरें लगाई गईं थीं, जो बुरी तरह टपकने लगी हैं। बताते हैं कि इस स्लेट की जगह अब स्टील की चादरें लगाए जाने का प्रावधान किया गया है, जिससे प्रियंका गांधी के इस घर में रहने का मामला अब एक साल और आगे बढ़ गया है। वैसे समय समय पर प्रियंका की मां और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा इस घर को जाकर देखा जाता रहा है। कांग्रेस की राजमाता जब भी शिमला गईं तो उन्होंने अपनी बेटी के इस आशियाने को अवश्य ही देखा है। जानकारों का मानना है कि सोनिया गांधी द्वारा प्रियंका के नए आवास में महज उनकी रसोई में ही खासी दिलचस्पी दिखाई है।

लालू ने तरेरी कांग्रेस पर आंखे
कभी कांग्रेस की आंखों के तारे रहे लालू की नजरों में कांग्रेस बहुत ही अच्छा राजनैतिक दल रहा है। पूर्व रेल मंत्री और स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस, श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बारे में कई मर्तबा कसीदे पढ़े हैं, जो किसी से छिपे नहीं है, हाल ही में लालू प्रसाद यादव के सुर बदले बदले नजर आ रहे हैं। कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए लालू प्रसाद यादव अब पानी पी पी कर कांग्रेस को कोस रहे हैं। बकौल लालू प्रसाद यादव, कांग्रेस उनका आदर्श नहीं है। सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की गरज से उनकी पार्टी ने केंद्र में कांग्रेस को सहयोग दिया था। आजादी के उपरांत देश में जो भी समस्याएं हैं, उनके लिए कांग्रेस ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। नई पीढ़ी द्वारा झेली जाने वाली हर समस्या कांग्रेस की ही देन है। इतना ही नहीं आपात काल के दौरान कांग्रेस की नीतियों के विरोध चलते ही वे एक साल तक मीसा में जेल में बंद रहे। सवाल तो यह है कि जब कांग्रेस इतनी ही बुरी है और देश का बट्टा बिठा रही है तब आप उसके नेतृत्व वाली सरकार में पांच साल तक रेल मंत्री रहे तब आपने कांग्रेस की शान में कसीदे किस आधार पर गढ़े हैं यह बात भी जनता को उन्हें बताना ही चाहिए।

निष्ठुर हो गया जेल प्रशासन
अपराधी या आरोपी को जेल में रखा जाता है ताकि उसे समाज से इतर होने की सजा मिल सके। कैदी जब बीमार पड़ते हैं तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। यह अलहदा बात है कि कैदियों में ताकतवर, पैसे और रसूख वाले तथा पहुंचसम्पन्न लोग जेल में कम अस्पतालों में ज्यादा समय काटते हैं। कैदी को जब भी अस्पताल में रखा जाता है तब उसे हथकड़ी से मुक्त कर दिया जाता है। अस्पताल का विशेष वार्ड भी जेल से कम नहीं होता है, क्योंकि यहां कैदी पहरेदारों के साए में ही रहते हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक नया मामला प्रकाश में आया है। लंबे समय से अस्पताल में भर्ती कैदी संतोष कुमार को हाथ के बजाए पैरों में हथकड़ी बांधकर रखा गया है, जो मनवाधिकारों का सरासर उल्लंघन की श्रेणी में ही आता है। जेल प्रशासन द्वारा अगर किसी कैदी को हथकड़ी वह भी पैरों में लगाकर रखा जा रहा हो तो इसे जेल प्रशासन की निष्ठुरता ही माना जाएगा।

मुख्यमंत्री करें सोजन्य भेंट और पार्टी उतरे सड़कों पर
अगर किसी सूबे का निजाम जाकर केंद्र के किसी मंत्री से सोजन्य भेंट करे और समाचार चेनल्स उसे पूरी प्राथमिकता से दिखाएं, वहीं उसी सूबे की उनकी पार्टी उसी मंत्री के खिलाफ सड़कों पर उतरने की बात करे तो यह नूरा कुश्ती की श्रेणी में नहीं आएगा? जी हां, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और लोक निर्माण मंत्री द्वारा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से सोजन्य भेंट कर उनकी तारीफांे में कशीदे गढ़े जाते हैं, सबसे ज्यादा आवंटन मध्य प्रदेश को मिलने की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश की भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में यह निर्णय लिया जाता है कि भूतल परिवहन मंत्रालय के द्वारा मध्य प्रदेश के साथ पक्षपात करने के विरोध में भाजपा सड़कों पर उतरेगी। लगता है मंत्रियों को लगने लगा है कि जनता निरी बेवकूफ है जो आज कुछ कहा जाए कल कुछ और जनता मान लेगी। भाजपा का कहना है कि वह केंद्र के भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा सूबे को मिलने वाली मदद को बंद करने के विरोध में 5 से 7 अक्टूबर तक एनएच पर पड़ने वाले कस्बों में हस्ताक्षर अभियान और 22 से 24 अक्टूबर तक मानव श्रंखला बनाकर अपना विरोध दर्ज कराएगी। अब पीडब्लूडी मंत्री की बात को सच माना जाए या भाजपा के इस विरोध को।

एक महीने में ही सवा करोड़ ग्राहक
भारत देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की तादाद और उनकी गिनती करने के आधार को भले ही शंका कुशंका की नजर से देखा जाए किन्तु भारत एक मामले में तो सभी को पीछे छोड़ रहा है, और वह है मोबाईल के उपभोक्ताओं के आंकड़े को। अगस्त माह में ही देश में एक करोड़ 35 लाख ग्राहकों को जोड़ा है मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने अपने साथ। अब देश में मोबाईल धारकों की संख्या का आंकड़ा 49 करोड़ को छूने ही वाला है। सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के ताजा तरीन आंकड़े वाकई चौकाने वाले हैं। कहते हैं कि देश में सत्तर फीसदी लोगों की औसत आय बीस रूपए से कम है, पर फिर आधी आबादी के पास मोबाईल फोन होना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं है। अगर किसी के पास खाने को रोटी के लिए पैसे नहीं है तो वह फिर कम से कम एक हजार रूपए का मोबाईल, सौ रूपए की सिम और कम से कम सौ रूपए के रिचार्ज के लिए पैसा कहां से जुगाड़ लेता है, यह आश्चर्य की ही बात है।

सरकार से ज्यादा मजबूत है नक्सली नेटवर्क
देश में अलगाववाद, आतंकवाद, माओवाद, नक्सलवाद और न जाने कितने वाद फिजां में जहर ही घोल रहे हैं। सरकार की इच्छा शक्ति में कमी का घोतक है इस तरह के वादों का पोषण। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या जबर्दस्त तरीके से सर उठा रही है। देश के न जाने सपूत जानों की बाजी लगाकर अपने प्राण तक न्योछावर कर चुके हैं, किन्तु समस्या सुरसा की तरह ही मुंह बाए खड़ी है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकी राम कंवर की यह स्वीकारोक्ति काफी महत्वपूर्ण है कि सरकार से ज्यादा मजबूत है नक्सली नेटवर्क। यही कारण है कि अनेक मोर्चों पर नक्सली सरकार पर भारी ही पड़े हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों की खामियों का लाभ इस तरह की ताकतें जमकर उठाती हैं। एसा नहीं है कि सरकार को यह पता न हो कि इस समस्या के मूल में क्या है? बावजूद इसके समस्या का जस का तस बना रहना निश्चित तौर पर कंेद्र और राज्यों की सरकारों के लिए शर्म की बात है, पर मोटी चमड़ी वाले जनसेवक और विपक्ष में बैठा ‘‘मैनेज विपक्ष‘‘ जनता के साथ अन्याय होते देख कर भी आंखे बंद किए बैठा है।

पुच्छल तारा
भारत में व्यवस्थाओं को लेकर जब तब कुछ न कुछ कहा जाता रहा है। बंग्लुरू से रचना तिवारी इस मामले में एक ईमेल भेजकर इसे बेहद करीने से चित्रित कर रहीं हैं। रचना लिखती हैं कि शिक्षक ने पूछा - इंडिया क्या है?‘‘ छात्र का जवाब था कि इंडिया एक एसा देश है, जहां पिज्जा एंबूलेंस और पुलिस से जल्दी आ जाता है. . ., एक एसा देश है जहां कार का लोन 5 प्रतिशत तो एजूकेशन लोन 12 फीसदी ब्याज दर पर मिलता है. . ., एक ऐसा देश है, जहां चावल 40 रूपए किलो तो सिम कार्ड महज दस रूपए में मिलता है. . ., एक एसा देश है जहां चाय की दुकान पर लोग अखबार पढ़ते हुए फरमाते हैं कि बच्चों से काम करवाने वालों को तो फांसी पर चढ़ा देना चाहिए, और फिर नाबालिग छोटू को पुकारकर दो चाय का आर्डर देते हैं . . .।‘‘ सच है ‘अतुलनीय है भारत‘।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

गरीब गुरबों का माखौल उडाती कांग्रेस

गरीबों से दूर कांग्रेस

स्कूल के मामले में पालक छात्र बैचेन, जनप्रतिनिधि मौन

स्कूल के मामले में पालक छात्र बैचेन, जनप्रतिनिधि मौन
(मनोज मर्दन त्रिवेदी)

सिवनी जिले के बखारी में हायर सेकन्ड्री स्कूल खोलने को लेकर पालक और विद्यार्थियों में रोष और असंतोष की स्थिति निश्चित तौर पर चिन्ता का विषय मानी जा सकती है। शासन प्रशासन को इस मामले को हल्के में कतई नहीं लेना चाहिए। सिवनी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा पहले केवलारी विधानसभा का अभिन्न अंग रहा है। क्षेत्र में पिछले चार दिनों से शालाओं में अध्ययन अध्यापन कार्य ठप्प पड़ा हुआ है। चार दिनों में जिला प्रशासन को इस बात की भनक न लग पाना निश्चित तौर पर जिला प्रशासन के सूचना तंत्र पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। बखारी की जिला मुख्यालय से दूरी महज 25 किलोमीटर ही है। 25 किलोमीटर के औरे में अगर इस तरह की कोई घटना घट रही हो और जिला प्रशासन को उसकी भनक न मिले तो इसे प्रशासन की संवेदनहीनता की श्रेणी मंे रखा जा सकता है।
 
पूर्व में मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह के शासनकाल में हर तीन किलोमीटर पर माध्यमिक शाला खोलने का निर्णय लिया गया था। एक तरफ तो सरकार बच्चों को शिक्षित करने के लिए जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को हवा में उड़ाती है। हवा में उड़ाना इसलिए क्योंकि जमीनी हकीकतें कुछ और बयान करती हैं। वैसे भी प्रायमरी शालाओं के उपरांत माध्यमिक शालाएं, माध्यमिक के उपरांत हाई स्कूल और फिर हायर सेकन्ड्री के उपरांत कालेज की शिक्षा की व्यवस्था करना शासन प्रशासन की महती जवाबदारी है।
 
बंडोल के करीब बखारी में हाई स्कूल का संचालन पिछले 26 सालों से हो रहा है। यहां हायर सेकंन्ड्री स्कूल अगर खोला जाता है तो इस हायर सेकन्ड्री स्कूल के भरोसे 3 हाई स्कूल, 8 माध्यमिक शालाएं हैं। वैसे भी यहां हायर सेकन्ड्री स्कूल खोला जाना तर्क संगत है। क्षेत्र के विद्यार्थियों और पालकांे का गुस्सा नाजायज किसी भी दृष्टिकोण से नहीं माना जा सकता है।
 
रही बात जनप्रतिनिधियों की तो उनकी नपुंसकता किसी से छिपी नहीं है। पूर्व में सिवनी जिले की अंतिम सांसद रहीं श्रीमति नीता पटेरिया वर्तमान में सिवनी विधानसभा क्षेत्र की विधायक हैं। पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ तौर पर यह घोषणा की थी कि बखारी में हायर सेकन्ड्री स्कूल को हर हाल में खोला जाएगा। यद्यपि चुनाव के दरम्यान शिवराज सिंह ने यह कहा था कि आचार संहित के चलते वे आधिकारिक घोषणा नहीं कर सकते हैं अतः वे बाद में इस बारे में प्रयास अवश्य ही करेंगे। सिवनी बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख का कहना था कि ‘‘ भले ही उरिया का पानी बरेंडी में चढ़ाना पडे पर वे बखारी में हायर सेकन्ड्री स्कूल अवश्य ही खुलवाएंगे।‘‘ कालांतर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सांसद के.डी.देशमुख के प्रलाप चुनावी वादे ही साबित हुए हैं।
 
जब स्थिति गंभीर हो चली है तब स्थानीय विधायक श्रीमति नीता पटेरिया की तंद्रा टूटी है। श्रीमति पटेरिया का शिक्षा मंत्री के हवाले से कहना है कि इस सत्र के बजाए अब अगले सत्र से बखारी में हायर सेकन्ड्री स्कूल खोला जा सकता है। कुल मिलाकर पालकों और विद्यार्थियों को एक साल और झुनझुना पकड़वाने का प्रयास किया जा रहा है। बखारी में हायर सेकन्ड्री की मांग नई नहीं है। वैसे भी जनप्रतिनिधि चाहे वह विधायक हो या सांसद उसका यह फर्ज होता है कि वह क्षेत्र में जाकर रियाया के दुख दर्द को देखे, जरूरतों को समझे, एसा करके वह जनता पर कोई एहसान नहीं करता है। इसके लिए सांसद विधायक को बाकायदा भत्ता भी मिलता है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जनप्रतिनिधियों को जनता के दुखदर्द से कोई सरोकार ही नहीं बचा है।
 
पालक और विद्यार्थियों ने अगर स्कूल बंद करवा दिया है तो मान लेना चाहिए कि स्थिति गंभीर है। जिला शिक्षा अधिकारी कहते हैं कि उनके कार्यालय द्वारा बखारी में हायर सेकन्ड्री स्कूल खोलने का प्रस्ताव पूरी ईमानदारी के साथ बनाकर शासन को भेज दिया है। वैसे भी किसी भी शाला के उन्नयन या अन्य मामलों को बजट में शामिल करवाने के लिए जनप्रतिनिधि को एडी चोटी एक करनी होती है। शाला का अगर उन्नयन किया जाता है तो इसमें सिर्फ और सिर्फ जनता का ही भला होगा। इसमें न तो जनप्रतिनिधि को कोई कमीशन खाने का मौका ही मिलेगा और न ही वह अपने किसी लग्गू भग्गू को उपकृत करने की स्थिति में ही होगा। शाला के उन्नयन के स्थान पर अगर शाला भवन निर्माण की बात होती तो सांसद विधायक पूरी दिलचस्पी दिखाते क्योंकि उसमें आवंटन जो प्राप्त होता है।

इस मामले में जिला मुख्यालय की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया की लापरवाही को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे सत्ता और संगठन के बीच की बनी समन्वय समिति में हैं। इस लिहाज से उनकी बात को तवज्जो देना शिवराज सरकार की मजबूरी है। वैसे भी श्रीमति नीता पटेरिया पूर्व सांसद और सिटिंग एमएलए एवं महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष हैं, तो उनके द्वारा कही गई बात को सरकार पूरा पूरा वजन देगी ही। विडम्बना है कि उन्होंने भी इस मामले में कोई ध्यान नहीं दिया है। श्रीमति नीता पटेरिया के विधानसभा क्षेत्र में हायर सेकन्ड्री स्कूल की मांग को लेकर अनेक शैक्षणिक संस्थान अगर बंद हैं तो यह निश्चित तौर पर श्रीमति नीता पटेरिया को मिले जनादेश का अपमान ही माना जाएगा।

आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?

आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?

(हरीष शहरी)

दुनियाँ कहती है कि भारत विकसित राष्ट्र बनने जा रहा है। हर भारतवासी बड़े गर्व से कहता है कि भारत निरन्तर विकास के रास्ते पर अग्रसर है।  स्वतन्त्रता के बाद हमने अभूतपूर्व सफलता पायी है और दुर्लभ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं।  आज हम चाँद पर अपना परचम लहरा चुके हैं और मंगल ग्रह पर जाने के लिए तैयार हैं।  हमारे पास दुर्लभ आयुध भंडार है जिसमें दूर तक मारक क्षमता रखने वाली मिसाइलें, ध्वनि की गति से भी तेज चलने वाले लड़ाकू विमान तथा पानी के भीतर शत्रुओं की खोज कर दूर तक मार करने वाली पन्डुब्बियाँ हैं।  इतना ही नहीं हमने अनेक रोगों के इलाज ढूंढने एवं उनके निरन्तर विकास में भी सफलता पायी है। 

कुल मिलाकर भौतिक उपलब्धियों की खोेज एवं उनके निरन्तर विकास में हम बहुत आगे आ चुके हैं किन्तु इस अन्धी दौड़ में हम अपनी मान्यताओं, अपनी संस्कृति एवं अपने मूल्यों को कितने पीछे छोड़ आये हैं इसका हमें जरा भी एहसास नहीं है। जिस भारतवर्ष में यह कहावत प्रसिद्ध थी कि घर आये दुष्मन का भी स्वागत करना चाहिए और जिसके अनेक उदाहरण हमारे इतिहास में दर्ज हैं जैसे हमने मुसलमानों को, अंग्रेजों को एवं अन्य न जाने कितने विदेषी लोगों को अपने सर आंखों पर बिठाया भले ही उन्होंने हमारे साथ बुरा सुलूक किया उसी भारतवर्ष में आज यदि सगा भाई भी घर आ जाये तो लोग उसके जल्द से जल्द जाने की तरकीबें सोचते हैं। 

यह वही देष है जिसमें परायी स्त्री को उम्र के हिसाब से माँ बहन या बेटी का दर्जा दिया जाता था उसी देष में आज प्रतिदिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एवं बलात्कार जैसी घटनायें सुनने को मिलती हैं।  कुछ हद तक इसके लिए महिलायें भी उत्तरदायी हैं क्योंकि भारतीय परिधानों, जिनसे शरीर के सभी अंग पूरी तरह ढके रहते हैं, को छोड़कर वे पष्चिमी परिधानों, जिनमें शरीर ढकता कम है और दिखता ज्यादा है प्राथमिकता देने लगीं हैं। जिस देष में लोग दूसरों की मदद करने या दूसरों को कुछ देने में खुषी का अनुभव प्राप्त करते थे आज उसी देष में लोग दूसरों से छीनकर खुष होते हैं और इसी का परिणाम है कि भारत जैसे देष जिसमें दधीचि एवं कर्ण जैसे महादानी हुए उसी देष की मिट्टी में आज दाऊद, अबू सलेम, छोटा राजन एवं बबलू श्रीवास्तव जैसे लोग फल-फूल रहे हैं।  आज पश्चमी देषों की नकल में हम इतने आगे निकल आये हैं कि अपनी मान्यताओं, अपनी संस्कृति एवं अपने मूल्यों को तो जैसे भूल ही गये हैं।

मेरा हर भारतवासी से यह विनम्र अनुरोध है कि वह एक बार फिर से सोचे कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं? ये हमारी कैसी उन्नति है जो धीरे-धीरे हमें अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से दूर कर रही है और हमें गर्त के मार्ग पर अग्रसर कर रही है।  क्या हमारे पूर्वजों एवं स्वतन्त्रता सेनानियों ने यही सपना देखा था और इसी दिन के लिए अपने प्राणों की आहूति दी थी?  यदि हम अभी भी नहीं चेते और अपने आचार-व्यवहार में जल्द ही परिवर्तन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब हम केवल विकास के रास्ते में गुम होकर रह जायेंगे।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

खाद्य सुरक्षा विधेयक में हैं अनगिनत पेंच

खाद्य सुरक्षा विधेयक में हैं अनगिनत पेंच

(लिमटी खरे)
 
आम आदमी से जुड़ा हुआ है खद्य पदार्थों का मसला। कांग्रेस नीत संप्रग मनमोहन सिंह सरकार कभी भी मंहगाई के मसले पर एक बयान पर नहीं टिक सकी है। सदा ही सरकार की ओर से बयानबाजी आती रही है। इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब मंहगाई इतने अधिक समय तक कायम रही है। खाद्य पदार्थों के दामों में सरकार ने इजाफा अवश्य ही किया है, पर यह इजाफा बहुत अधिक नहीं कहा जा सकता है। दरअसल कालाबाजारियों को सरकार द्वारा दिए जा रहे अघोषित प्रश्रय ने मंहगाई के ग्राफ को इतने अधिक समय तक बढ़ाए रखा है।

कोई भी राजनैतिक दल सत्ता की मलाई चखने के लिए चुनावों के दौरान आम जनता से लोक लुभावने वादे करता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। पिछली मर्तबा कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन द्वारा भी गरीब गुरबों को लुभाने की गरज से महीने में 25 किलो राशन वह भी महज तीन रूपए प्रति किलो की दर से दिलवाने का वायदा किया था। आज उस बात को एक साल से अधिक का समय बीत चुका है, पर कांग्रेस का वायदा परवान नहीं चढ़ सका है। इसी बीच देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी अनाज के सड़ने पर अपनी चिन्ता को जग जाहिर कर दिया है।

वैसे कांग्रेस द्वारा खाद्य सुरक्षा विधेयक का झुनझुना भारत गणराज्य की जनता को दिखाया है। जनता को लगने लगा कि उसे सस्ता अनाज अवश्य ही मिल सकेगा। शासकों को भी लगने लगा कि उन्होंने जनता के हित में एक बड़ा फैसला ले लिया है। सवाल यह उठता है कि आजादी के उपरांत भारत में योजनाएं तो अनेक बनीं किन्तु उनमें से कितनी योजनाएं परवान चढ़ सकी हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। अब शिक्षा के अधिकार कानून को ही लिया जाए। राज्यों को विश्वास में लिए बिना ही सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार कानून को लागू कर दिया गया। आज उसका हश्र क्या है? यह कानून औंधे मुंह गिर गया है। राज्य सरकारों ने इस मामले में अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।

कमोबेश यही आलम खाद्य सुरक्षा विधेयक का है। देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला (बीपीएल) या गरीब कौन है? इस बारे में आज भी संशय बरकरार ही है। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की सोच तो देखिए उसने गरीब कौन है इस बात की मालुमात के लिए एक साल में तीन कमेटियां बना डाली। कोई खुराक को आधार बना रहा है, कोई रोजना की आमदानी को। योजना आयोग का सुर अलग ही आलाप गा रहा है।

केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की एन.सी.सक्सेना समिति ने गरीबों की गणना में प्रति व्यक्ति खुराक को आधार माना जिसमें केलोरी की मात्रा को प्रमुखता दी गई थी। इस आधार पर सक्सेना कमेटी का मानना है कि देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोग गरीब हैं। इसके अलावा अर्जुन सेन गुप्ता समिति अपना राग अगल ही अलाप रही है। गरीबों की गणना में उसका आधार देश की 77 फीसदी से अधिक वह जनता है जो रोजाना 20 रूपए से कम खर्च करने की क्षमता रखती है। तेंदुलकर समिति देश की 35 फीसदी से अधिक जनता को गरीब मानती है।

उधर योजनाओं को मूर्तरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले योजना आयोग का तराना अलग ही बज रहा है। योजना आयोग के आंकड़े कहते हैं कि सवा करोड़ से अधिक की आबादी वाले भारत में छः करोड़ परिवार अर्थात लगभग आठ फीसदी परिवार ही गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। भारत गणराज्य में राज्यों के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाएं तो यह आंकड़ा दस करोड़ पहुंच जाता है। जब गरीबों के बारे में तहकीकात करने और उनकी संख्या के बारे में सरकारी आंकड़ों में ही इतनी अधिक विसंगतियां हैं, तो भला कैसे मान लिया जाए कि केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा विधेयक का सफलता पूर्वक क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा।

कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का कहना कुछ और है। उनके मुताबिक खाद्यान्न का आशय गेंहू चावल से नहीं वरन् इसमें दाल, चीनी तेल जैसी जिन्सें भी शामिल हैं। बकौल सोनिया गांधी कंेद्र सरकार खाद्य गारंटी उन परिवारों के लिए ही दे जिनके पास पांच एकड़ से कम कृषि भूमि या जिनके पास दो पहिया वाहन न हों। आज देश में सस्ती दर पर मिलने वाले ऋण के कारण कुछ परिवार ही एसे होंगे जिनके पास दो पहिया वाहन न हो। कांग्रेस की अध्यक्ष ने यह बात साफ नहीं की है कि दो पहिया का तात्पर्य सायकल से है या मोटर सायकल से।

भारत गणराज्य के कृषि मंत्री कहते हैं कि खाद्यान्न पदार्थों के उत्पादन में कमी के कारण कीमतें बढ़ना बताते हैं, तो कभी किसानों को अनाज का अधिक मूल्य देने पर कीमतें बढ़ने की बात कही जाती है, फिर बाद में वे यही कहते हैं कि उन्हें गलत आंकडे़ दिए गए। अरे आप भारत गणराज्य के जिम्मेदार मंत्री हैं, आपके मुंह से इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें शोभा नहीं देती शरद पवार साहेब। कभी सरकार कहती है कि देश में अनाज का पर्याप्त भंडार है, सो कीमतें घटेंगी, पर कब यह मामला सनी देओल अभिनीत चलचित्र में अदालत की ‘‘तारीख पर तारीख‘‘ की बात को ही प्रदर्शित करती है।

देश के आंतरिक परिदृश्य पर अगर नजर डाली जाए तो साफ तौर पर एक ही बात उभरकर सामने आ रही है कि अनाज की कीमतें कालाबाजारियों और जमाखोरों द्वारा मचाई गई व्यवसायिक लूट का ही परिणाम है। सच्चाई तो यह है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें ही इन आताताईयों पर नियंत्रण पाने में विफल रही हैं। विडम्बना यह है कि कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में ही कांग्रेस का ‘‘हाथ‘‘ गरीबों के गिरेबान तक पहुंच गया है।

देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार गलकर सड़ांध मार है, जिसकी बदबू चहुंओर फैलकर महामारियां फैला रही है, यह बात सभी को दिखाई पड़ रही है सिवाए कांग्रेस और विपक्षी दलों के। इन्हंे दिखाई और सुनाई पड़े भी कैसे? जब सियासी दल ही आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हों तो फिर उसे दूर करने की जहमत उठाए भी भला कौन? सरकार खुद ही अपने द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि 99 फीसदी उपभोक्ताओं को नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पचास फीसदी अनाज अधिकारियों और ठेकेदारों की मिली भगत से खुले बाजार में बेच दिया जाता है। इन परिस्थितियों में खाद्य सुरक्षा विधेयक परवान चढ़ सकेगा इस बात में संशय का गहरा कुहासा ही दिख रहा है।

देश में खाद्यान्न की कृत्रिम कमी के बाद जिंसों को आयात किया जाता है। आयतित खाद्यान्न बंदरगाहों पर या तो सड़ जाता है या मूषकों का ग्रास बन जाता है। इसी तरह रख रखाव के अभाव में देश में उत्पादित अनाज भी सड़ गल जाता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत इस मामले में संज्ञान लेती है। केंद्र सरकार को अदालत आदेशित करती है कि खाद्यान्न को सड़ने देने के बजाए उसे गरीब में मुफ्त बांटा जाए। सरकार में बैठे मोटी चमड़ी वाले जनसेवकों की हिमाकत तो देखिए, वे अदालत के आदेश को सलाह मानकर उसका अनुपालन करने से इंकार कर देते हैं। तब अदालत को अपना रूख गंभीर कह कहना ही पड़ता है कि अदालत ने मशविरा नहीं दिया वरन् आदेश दिया है। कृषि मंत्री फिर भी कहते हैं कि वे अदालत के आदेश को पाने का प्रयास कर रहे हैं। चुनावों के दौरान दीवारों पर लिखे एक जुमले का उल्लेख यहां प्रासंगिक होगा जिसमें लिखा गया था कि -‘‘वाह री सोनिया तेरा खेल! खा गई शक्कर, पी गई तेल!!‘‘

हमारे विचार से देश की नीतियों में ही खोट है। सरकार को चाहिए कि नीतियों को जमीनी वास्तविक, हकीकत से रूबरू होने वाली बनाई जाया। भारत गणराज्य के जिम्मेदार मंत्रियों को अनर्गल बयानबाजी से रोका जाए। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने बेतूल की एक सभा में कहा कि देश में गरीब दोनों टाईम खाने लगा है इसलिए मंहगाई बढ़ी है। कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि चीनी नहीं खाने से आदमी मर नहीं जाएगा। अरे आप जनता का जनादेश प्राप्त नुमाईंदे हैं, जिन्हें आवाम ए हिन्द ने अपना भविष्य सुरक्षित और संरक्षित करने की जवाबदारी दी है। अगर ये जनसेवक ही इस तरह की अनर्गल और गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी करेंगे तो यह तो जनादेश का सरासर अपमान ही हुआ।

उत्पादन और आपूर्ति में अंतर साफ दिखता है। कभी गेंहूं की पैदावार बहुत अधिक हो जाती है, तो कभी चावल का उत्पादन रिकार्ड तोड़ देता है, तो कभी गन्ना जबर्दस्त पैदा होता है। इस असंतुलन का क्या कारण है? सरकार ने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया है। भारत सरकार ने एक मंत्रालय कृषि के लिए बनाया हुआ है। इसके तहत कृषि विज्ञान केंद्र भी अस्तित्व में हैं। कृषि पर शोध भी जमकर हुए हैं। भारत कृषि प्रधान देश भी कहा जाता है, जहां की आत्मा गांव में बसती है, इस लिहाज से किसान ही देश की आत्मा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि केंद्र और सूबों की सरकारों द्वारा भारत की आत्मा का गला घोंटा जा रहा है।

हजारों, लाखों करोड़ रूपए खर्च कर कृषि को उन्नत करने का ढकोसला किया जाता रहा है, यह क्रम आज भी अनवरत जारी है। कभी इस बात पर जोर नहीं दिया गया और न ही इस तरह का ही कोई कार्यक्रम चलाया गया जिसमें बताया गया हो कि किस जमीन पर किसान को कितने हिस्से में दाल, गेंहू, चावल, गन्ना आदि उगाना चाहिए। इस तरह देश का किसान अपने मन से दूसरों की देखा सीखी ही खेती करने पर मजबूर है। अगर देखा जाए तो देश में खाद्यान्न उत्पादन 330 किलो प्रति व्यक्ति की दर से हो रहा है, जो अनेक देशों की तुलना में बहुत ही संतुष्टीकारक माना जा सकता है, बावजूद इसके देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा है।

महानगरों में अमीरों और जनसेवकांे द्वारा एक ही रात में लाखों रूपयों की दारू मुर्गा पार्टी के बाद खाद्यान्न इस तरह फेंक दिया जाता है, मानो वह किसी के काम का नहीं है। इस बचे खाने को एकत्र करने के लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो पिछले साल दुनिया भर में एक अरब दो लाख लोग भुखमरी का दंश झेल रहे थे, यह आंकड़ा इस साल घटकर बानवे लाख पचास हजार पहुंच गया है। एक तरफ दुनिया में जहां भूखे लोगों की तादाद में कमी आई है, वहीं भारत में इसकी संख्या का बढ़ना निश्चित तौर पर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के लिए शर्म की बात है, पर शासकों को शर्म आए तो क्यों? शासकों का पेट भरा जो है।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

चप्पल फीवर से घिरे हैं युवराज

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

चप्पल फीवर से घिरे हैं युवराज

जब से राजनेताओं के उपर जूते चप्पल फेंकने की घटनाएं घटना आरंभ हो गई हैं, तब से राजनेताओं के मन में जूते चप्पलों का खौफ जबर्दस्त तरीके से छाने लगा है। पिछले दिनों कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी के एक कार्यक्रम में भी चप्पल जूतों के डर की छाया साफ साफ दिखाई पड़ी। महाराष्ट्र के अकोला में पंजाब राव देशमुख कृषि विद्यापीठ में संपन्न हुए राहुल गांधी के कार्यक्रम में सुरक्षा कर्मियों द्वारा किसी भी छात्र को चप्पल पहनकर हाल के अंदर प्रवेश करने नहीं दिया गया। नाराज छात्रों द्वारा कार्यक्रम का अघोषित बहिष्कार कर दिया। राहुल गांधी एक दिन के प्रवास पर अकोला गए थे, जहां उन्हें युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करना था। चप्पल फीवर के चलते राहुल गांधी के सुरक्षा कर्मियों ने विद्यार्थियों के बेल्ट और चप्पल बाहर ही उतरवाना चालू कर दिया। नाराज छात्रों ने नारेबाजी करते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। जब सुरक्षा कर्मियों को अपनी भूल का एहसास हुआ तब तक तो चिडिया खेत चुग चुकी थी। राहुल गांधी भी अपने इस तरह के फीके कार्यक्रम से खासे खफा ही नजर आए।

सरकार कर रही है गरीबों का खाना खराब

देश में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है, यह बात प्रायमरी स्कूल की कक्षाओं से लेकर प्रोढ़ावस्था तक हिन्दुस्तान में जतलाई जाती रही है। सरकारी गोदामों में सड़ते अनाज पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने चिंता जताकर सरकार को आड़े हाथांे लेते हुए फटकार लगाई थी कि अनाज को सड़ने के बजाए गरीबों में मुफत में बांट दिया जाए तो बेहतर होगा। देश के नीति निर्धारकों को इस बात की परवाह नहीं है कि गरीबों को दो वक्त की रोटी मिल रही है कि नहीं, उन्हें तो बस अपने वेतन भत्तों ेस मतलब है। पिछले साल केंद्र अक्टूबर माह से अब तक केंद्र सरकार द्वारा एक करोड़ दस लाख टन अनाज का आवंटन जारी किया था। राज्य सरकारों ने इसमें से महज 33 लाख 80 हजार टन अनाज ही उठाया है। दरसअल अनाज का की कीमत बहुत ज्यादा होती है, जिससे सूबों की सरकारें खरीदनें आनाकानी करती हैं। इसके अलावा ब्रेड और बिस्किट बनाने वाली कंपनियों द्वारा भी गरीबों के अनाज पर नजरें लगाई जाती हैं, जिससे निवाला गरीबों के पास जाने के बजाए इन कंपनियों के खाते में चला जाता है।

राम के भरोसे है भाजपा

भारतीय जनता पार्टी चाहे जो भी कहे पर वह भगवान राम को छोड़ने की स्थिति में कतई नहीं है। जब तब राम के नाम को भुनाकर सत्ता हासिल करने में भी भाजपा को गुरेज नहीं होता है। राम के नाम पर सबसे अधिक राजनैतिक रोटियां किसी ने सेंकी हैं, तो वे हैं राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी। यह अलहदा बात है कि सत्ता की मलाई को चखने के साथ ही भाजपा द्वारा राम के नाम को ‘‘राम भरोसे‘‘ ही छोड़ दिया जाता है। केंद्र में तीन बार सत्ता का स्वाद चखने वाली भाजपा ने जब मौका मिला था, तब उसने राम के नाम का भरपूर उपयोग किया है। बाबरी ढांचे और राम जन्म भूमि के मामले में अभी इलहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आना अभी बाकी है। इसके फैसले के बाद एक बार फिर राम एजेंडे पर भाजपा लौट आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने लखनऊ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के समापन अवसर पर पुनः राम को याद करते हुए कहा है कि भाजपा सब कुछ छोड़ सकती है, राम को नहीं, क्योंकि राम, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति की पहचान है।


कामन वेल्थ गेम्स के चलते पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के भौडसी स्थित फार्म हाउस के दिन फिर सकते हैं। हरियाणा में 588 एकड़ में फैले इस फार्म हाउस में प्लांटेशन और झीलों के सोंदर्यीकरण का जिम्मा वन विभाग का था, साथ ही इसके रखरखाव और पर्यटकों को अकर्षित करने की जवाबदारी पर्यटन विभाग के कांधों पर दी गई थी। पूर्व में बनाई गई कार्ययोजना में पर्यटकों को रात रूकने की सुविधा भी इस फार्म हाउस में उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी। अब जबकि राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन में गिनती के ही दिन बचे हैं, तब किसी का ध्यान पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के फार्म हाउस की ओर नहीं जा रहा है। इस फार्म हाउस की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी प्रशासन को सौंपी गई थी, साथ ही साथ पर्यटकों को भीड़ भाड़ से दूर प्राकृतिक माहौल देने के लिए बीस अतिरिक्त कमरों के निर्माण की बात भी फिजा में थी। आज चंद्रशेखर के फार्म हाउस की हालत क्या है, इस बारे में सोचने समझने की न तो किसी के पास फुर्सत है और न ही इसमें किसी को लाभ ही दिख रहा है।

अवैध खदानों का गढ़ बना एमपी

देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश में शिव का राज चल रहा है। मध्य प्रदेश में इस समय सबसे अधिक कोई काम हो रहा है तो वह है, अवैध उत्खनन का। कांग्रेस का आरोप है कि शिवराज के संरक्षण में उनके नाते रिश्तेदार और भाजपाईयों द्वारा अवैध तौर पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में कहा गया है कि पर्यावरण की स्वीकृति के बिना मध्य प्रदेश में 11 सौ से अधिक अवैध खदाने चल रही हैं। मुख्य न्यायाधिपति जस्टिस एस.आर.आलम और जस्टिस अर.एस.गर्ग की युगल पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर कहा है कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली खदानों के लिए पर्यावरण की अनुमति लेना अनिवार्य है। बताते हैं कि याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार ने इस नियम के बाद भी पूरे प्रदेश में तकरीबन 11 सौ से अधिक रेत या बजरी खदानों के संचालन के लिए छूट प्रदान की है, जो अवैधानिक है।

राजघाट जाने से कतराते अमन के सौदागर

आधी धोती में उन ब्रितानियों को जिनका सूरज कभी नहीं डूबता था, को भारत देश से भगाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में देश विदेश के लोग आकर दिल्ली के राजघाट में जाकर अपना मत्था अवश्य ही टेका करते हैं। पिछले कुछ दिनों से यह बात सामने आ रही है कि अमन के सौदागर जब भी भारत आए हैं, उन्होंने बापू की समाधी जाने से अपने आप को बचाकर ही रखा है। पिछले दिनों अतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के महानिदेशक मोहम्मद अली बरदेई जब इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित हुए तब बापू को श्रृद्धांजली अर्पित करने नहीं गए। इसके पहले विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक पास्कल लेमी ने भी तीन दिन दिल्ली में अपना समय बिताया पर वे भी राजघाट जाने से बचते रहे। और तो और समूची दुनिया में शांति बनाए रखने की बातों की हिमायती अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन द्वारा दिल्ली यात्रा के दौरान राजघाट से दूरी बनाए रखी। कुल मिलाकर भारत सरकार द्वारा बापू के बारे में जाने अनजाने हर परिदृश्य में कम भाव दिए जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर बापू के नाम की ब्रेंडिंग की जरूरत है।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

प्रख्यात साहित्यकार, व्यंग्यकार, कहानीकार रहे शरद जोशी ने एक व्यंग्य कथा लिखी थी, शीर्षक था ‘‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे‘‘। आज के परिदृश्य में भारत में यह बात सौ फीसदी फिट ही बैठ रही है। भारत में आज भ्रष्टों की तादाद बहुत ही ज्यादा हो चुकी है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त रहे प्रत्युश सिन्हा का कहना है कि देश में महज 20 फीसदी लोग ही ईमानदार बचे हैं। हर तीन में से एक भारतीय भ्रष्ट है। सिन्हा का यह कहना वाकई पुराने दिनों या सत्तर के दशक की याद ताजा करता है कि सत्तर के दशक की सामप्ति तक भ्रष्टाचार में रत सरकारी कर्मचारी को लोग हिकारत भरी नजरों से देखा करते थे। इतना ही नहीं इसे सामाजिक तौर पर कलंक माना जाता था। उस समय हर कार्यालय में यही लिखा होता था कि घूस यानी रिश्वत लेना और देना दोनों ही अपराध है और लेने वाला तथा देने वाला दोनों ही पाप के भागी हैं।

नेहवाल ने चलाया तीर

भारत में कामन वेल्थ गेम्स होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार की बातें अब केंद्र सरकार द्वारा मैनेज की जा चुकी हैं। कल तक भ्रष्टाचार के बारे में गला फाडने वाला मीडिया अब शांति से बैठ गया है। सब कुछ ‘‘मैनेज‘‘ है। इसी बीच राजीव गांघी खेल रत्न अवार्ड से नवाजी गई विश्व की तीसरे नंबर की बेडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल ने नया शिगूफा छोड दिया है। सायना का कहना है कि भारत देश कामन वेल्थ गेम्स आयोजित करने में सक्षम है ही नहीं। सबसे ज्यादा मजे की बात तो यह है कि सायना नेहवाल दिल्ली कामन वेल्थ गेम्स की ब्रांड एम्बेसेडर है। सायना की इस तरह की बयान बाजी से आयोजन समिति सकते में है। सायना की नजरें स्टेडियम पर गईं और उन्होने स्टेडियम की खुलकर आलोचना की है। अब जबकि समय कम बचा है तब एक ब्रांड एम्बेसेडर की इस तरह की टिप्पणी वाकई में आयोजकों के हाथ पैर फुलाने के लिए पर्याप्त है।

बदला लेकर रहेगी फिजा

भजनलाल परिवार की बहू रही फिजा मोहम्मद अब भी प्रतिशोध की आग में जल रही है। फिजा मानती है कि भजनलाल परिवार का राजनैतिक तौर पर अवसान हो चुका है। चंद्रमोहन के साथ शादी करने के बाद फिजा बनने वाली का कहना है कि धर्म कोई कपड़ा नहीं है जिसे बार बार बदला जाए। उनका कहना है कि वे फिजा हैं और फिजा ही रहेंगी। फिजा को खतरा है कि भजनलाल और चंद्रमोहन द्वारा पंजाब पुलिस के माध्यम से उन पर दबाव बनवाया जा रहा है कि वे भजनलाल परिवार पर चल रहे प्रकरण वापस ले लें। अकेले रहने का हवाला देते हुए फिजा का कहना है कि उन्होने भूपेंद्र ंिसंह हुड्डा के नेतृत्व वाली सरकार से सुरक्षा मांगी पर उन्हें सुरक्षा नहीं मिल सकी है। हरियाणा में बढ़ते अपराध के लिए शासन प्रशासन को भी आड़े हाथों लेते हुए फिजा का कहना था कि वे एक संगठन को खड़ा करने पर विचार कर रही हैं। अगर फिजा ने दम मारा तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में भजनलाल परिवार पर संकट के बादल छा सकते हैं।

पुच्छल तारा

आज के समय में धूम्रपान और मद्यपान के बढ़ते चलन को देखकर नीचम से समीर सिन्हा ने एक ई मेल भेजा है। शिक्षक ने अपने छात्र से पूछा कि दो एसे किंग के नाम बताओ जो लोगों के मुंुह पर मुस्कुराहट सुकून और शांति लाए हों। एक छात्र खड़ा हुआ और बोला -‘‘सर, स्मो ‘किंग‘ और ड्रिं ‘किंग‘।‘‘
दिन फिर सकते हैं चंद्रशेखर के फार्महाउस के

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

बाऊ-बायोलाजी के अनुसार मानव शरीर पर प्रभाव

बाऊ-बायोलाजी के अनुसार भवन एवं पर्यावरण का मानव शरीर पर प्रभाव
    बाऊ-बायोलाजी का विकास लगभग 30 वर्ष पूर्व जर्मन डॉ0 गुस्ताक प्रेहरर वान फोल के अध्ययन के साथ प्रारंभ हुआ । जहॉं उसने एक गॉव में प्रेक्टिस करते समय पाया कि गॉंव में अधिकतर कैंसर मरीजों की संख्या भू चुम्बकीय विकिरण के कारण हैं तथा जिन कैंसर मरीजों की मौत हुई हैं वे विकृत भूगर्भीय चुम्बकीय क्षेत्र पर सोते थें । इस खोज से पृथ्वी के भू-चुम्बकीय प्रभाव तथा भवन निर्माण सामग्री से होने वाले विकिरण के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ । आज अधिकतर लोग सीमेंट, कांक्रीट एवं कांच के डब्बें में लगभग 90 प्रतिशत से ज्यादा समय व्यतीत करते हैं । उस पर भी मजा यह हैं कि इन सीमेंट के डिब्बों में जिन्हें हम घर या कार्यालय कहते हैं, में उपयोग की जाने वाली सामग्री सिनेटिक या आर्टिफिशियल होती हैं, फलस्वरूप अधिक से अधिक वक्त व्यक्ति रोगी होता चला जा रहा हैं । विभिन्न अप्राकृतिक सामग्री के उपयोग से हमारे वातावरण में वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा हैं ।
    बाऊ-बायोलाजी एक जर्मन वाक्य हैं जिसमें बाऊ का अर्थ होता हैं भवन एवं बायो ग्रीक शब्द हैं जिसका अर्थ हैं जीवन अर्थात् जीवन का विज्ञान । इन दोनों शब्दों को जोड़ते हुये जो शब्द बनता हैं उसका अर्थ हैं भवन एवं जीवन के अंर्तसम्बधों का विज्ञान ।
    बाऊ-बायोलाजी के दो कार्य क्षेत्र हैं पहला भवन निर्माण सामग्री का मानवीय स्वास्थ्य पर प्रभाव का अध्ययन एवं दूसरा इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी को भवन तथा कार्यालयों के निर्माण एवं सुधार करने हेतु उपयोग करना ।
आन्तरिक वायु प्रदूषण
    बाऊ-बायोलाजी सबसे प्रमुख समस्या आन्तरिक वायु प्रदूषण बताती हैं । घर या कार्यालय की आन्तरिक हवा में पेट्रोकेमिकल द्वारा निर्मित रसायन होते हैं और इनमें भी वे अत्यंत खतरनाक हैं जिनमें क्लोरीन उपयोग होती हैं, साथ ही एस्बेस्टोस,फायबर, सिन्थेटिक, माइक्रो ग्लास एवं कई अन्य प्रकार के टेक्सटाईल सामग्री वायु की गुणवत्ता को खराब कर रही हैं, यही नहीं धूल, धुऑं आदि के कारण भी इस स्थिति को और विकृत कर रहे हैं, कीटनाशक दवाऐं एवं रसायन न केवल आन्तरिक अपितु किसानों द्वारा फसलों पर इनके छिड़काव के कारण बाहर ग्रामीण वायु भी प्रदूषित हो रही हैं ।
विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र
    विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र दोनों ए0सी0 करंट हैं । दोनों एक दूसरें के अन्योन्याश्रित हैं, जहॉं तार में विद्युत प्रवाहित होती हैं, वहॉं चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित होता हैं, जहॉं चुम्बकीय धारा प्रवाहित होती हैं, वहॉ विद्युत क्षेत्र निर्मित होता हैं।    सामान्यतः शरीर का वोल्टेज 20 मि0ली0 वोल्ट पाया जाता हैं, परंतु वही व्यक्ति जब ऐसे बिस्तर पर सोता हैं जिसके पास बेड स्वीच आदि लगे हैं, या विद्युत धारा द्वारा बिस्तर को गर्म किया जाता हैं तो उसके शरीर का वोल्टेज 87000 मिली वोल्ट हो जाता हैं । यदि इस प्रकार के अधिक वोल्टेज के साथ लंबे समय तक रहा जायें तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती हैं ।
भवन निर्माण सामग्री द्वारा रेडीयेशन
    यह एक स्थापित तथ्य हैं कि प्रत्येक अणु में ऊर्जा होती हैं एवं प्रत्येक पदार्थ से ऊर्जा का विकिरण होता हैं, यह ऊर्जा विकिरण कहीं धनात्मक होता हैं एवं कहीं ऋणात्मक । हमारे भवन में प्रयुक्त सामग्री के ऊर्जा विकिरण के संयुक्त प्रभाव के फलस्वरूप वहॉं के पर्यावरण में जो ऊर्जा निर्मित होती हैं वह हमारे शरीर पर प्रभाव डालती हैं । इन सभी विकिरण को आज यंत्रों की सहायता से नापा जा सकता हैं और ऋणात्मक प्रभाव डालने वाली ऊर्जा को समाप्त करने के उपाय किये जा सकते हैं ।
बाऊ-बायोलाजी के सिद्धांत
1- भवन निर्माण स्थल चयन की प्रक्रिया में भू बायोलाजी का अध्ययन करें ।
2- आवास, उद्योग केन्द्रों को मुख्य ट्राफिक सड़को से दूर रखें ।
3- भवन के पास हरित क्षेत्र बनायें ।
4- घर की प्लानिंग एवं विकास में परिवार की आवश्यकता एवं मानवीय विषय को ध्यान में रखें ।
5- भवन सामग्री प्राकृतिक मूल की हों ।
6- दिवाल, छत एवं फर्श में उपयोग की जाने वाली सामग्री वायु को प्रवाहित करने में सहायक हों ।
7- भवन के अन्दर की हवा प्रदूषित या आर्द्र नहीं हो ऐसी भवन निर्माण सामग्री का उपयोग करें ।
8- भवन की अन्दर की सतह पर ऐसी सामग्री का उपयोग करें जो हवा के प्रदूषण को सोख लें एवं हवा को फिल्टर कर सकें ।
9- भवन के अन्दर के ताप संग्रहण एवं ताप इन्सुलेशन ने उचित तालमेल बनाये रखें।
10- भवन की सतह एवं वायु के तापमान में संतुलन बनाये रखें ।
11- ताप के लिये सौर ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करें ।
12- यह सुनिश्चित करें कि भवन में प्राकृतिक एवं सुखद अहसास हो, नशीली या विषैली बदबू को दूर रखें ।
13- भवन में प्रकाश एवं रंग मानव प्रकृति को शांत रखें, ऐसी व्यवस्था होनी चाहियें ।
    हमारा शरीर अति सूक्ष्म यंत्र हैं जो किसी भी स्वास्थ्य विरोधी तत्व, गंदा रंग इत्यादि का लंबे समय तक सानिध्य से उसका प्रतिफल भुगतते हैं ।
                          संकलनकर्ता
                        अनुराग अग्रवाल
                    ज्योतिष, अंकशास्त्र एवं वास्तु विशेषज्ञ
            अग्रवाल हाऊस, सुभाष वार्ड सिवनी म0प्र0, मो0 09425445623

यह है सागर में मनरेगा का हाल सखे

यह है सागर में मनरेगा का हाल सखे

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को सागर जिले में क्रियान्वित हुए ढाई साल पूरे हो गये। योजना का क्रियान्वयन कैसा हो रहा है, यह इस बात पर निर्भ्।र है कि उसमें अधिकारियों की रुचि  कैसी है। मगर दुर्भाग्य है कि सागर जिले में मनरेगा प्रशासनिक दुर्गति का श्ंिाकार है। मनरेगा स्कीम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत ग्रामीण परिवारों के वयस्क व्यक्तियों को ,जो अकुशल मानव श्रम करने को तैयार हैं ,एक वित्तीय वर्ष में एक परिवार को कम से कम सौ दिवस का रोजगार उपलब्ध कराकर आजीविका सुनिश्चित करना एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसम्पत्तियॉं सृजित करना  है।
 
मनरेगा स्कीम अन्तर्गत एक वित्तीय वर्ष में सौ दिन का रोजगार प्राप्त करने के लिए एक परिवार पात्र है। सौ दिन के रोजगार की उपलब्धता को परिवार में निवासरत समस्त वयस्क व्यक्तियों के बीच विभाजित करने का प्रावधान स्कीम में है। पता ही है कि सागर जिले में स्कीम लागू होने के शुरुआती दौर में ग्राम पंचायत स्तर पर किए जाने वाले कार्यो के सेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट बनाये गये। और यहीं से भ्रष्टाचार करने की शुरुआत भी हो गई। मसलन, मनरेगा के अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि गॉवों में ऐसे निर्माण कार्य ही कराये जायें, जिनमें ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने पर 60 प्रतिशत राशि खर्च हो और कार्य में लगने वाली निर्माण सामग्री पर 40 प्रतिशत राशि लगे। मगर उक्त प्रावधान की खुलेआम धज्जियॉ उढ़ाकर लगभग प्रत्येक ग्राम पंचायत में सीमेन्ट-कॉंक्रीट रोड शामिल कर लिए गये। चूॅकि ग्राम पंचायत को 5 लाख रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने का अधिकार है, अतः सीमेन्ट- कॉंक्रीट रोड के एस्टीमेट 4लाख 98हजार रुपये के बनाये गये।

यह महज संयोग नहीं कि जिले की लगभग सभी ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत 4.98 लाख रुपये के सीसी रोड मंजूर किये गये। बात साफ है कि 4.98 लाख रुपये का एक एस्टीमेट बनाकर जिले के सभी 11 ब्लाक में उसकी फोटोकापी बॉट दी गई। सीसी रोड में मजदूरी पर कम और सामग्री पर ज्यादा खर्च आता है। सीसी रोड निर्माण में ठेकेदार या सरपंच को कैसी कमाई है, यह जगजाहिर है। आशय यह कि मनरेगा की नेक मंशा में छेद कर भ्रष्टाचार की राह निकालने की शुरुआत सेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट में सीसी रोड जैसे कार्यो को शामिल कर हुई। भ्रष्टाचार का यह प्रशासनिक पक्ष है, जो जिला कलेक्टर और जिला पंचायत के  तत्कालीन सीईओ की संलिप्ता के बगैर संभव नहीं था।
 
गौरतलब है कि मनरेगा स्कीम में एक वित्तीय वर्ष में एक परिवार को सौ दिन का रोजगार पाने की पात्रता है। यानि किसी परिवार में दस वयस्क सदस्य हैं और उनमें से जो रोजगार की मॉंग करते हैं, उनमें प्रत्येक व्यक्ति को नहीं, बल्कि सबको जोडकर सौ दिन का रोजगार दिया जायेगा। यहॉ मनरेगा के बेरोजगारी भत्ते ने गॉव वालों की नीयत खराब कर दी। स्कीम आते ही यह बात जोरों से प्रचारित हो गई थी कि मनरेगा में जिन्हें रोजगार नहीं मिल पायेगा, उन्हें बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। इसे समझें कि अगर दस वयस्क व्यक्तियों का एक संयुक्त परिवार है तो उसे सौ दिन का रोजगार मिलेगा और अगर दो लोगों का परिवार है तो उसे भी सौ दिन का रोजगार मिलेगा, नहीं तो बेरोजगारी भत्ता है ही। इस तरह अधिक रोजगार और अधिक बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए दस वयस्क व्यक्तियों के संयुक्त परिवार ने अलग-अलग पॉच परिवार दर्शते हुए पॅाच जॉबकार्ड बनवा लिए। जबकि वे एक ही घर में रह रहे हैं और एक ही चूल्हे पर उनका संयुक्त भेजन बनता है। उधर तीसरी चालाकी अधिकॉश सरपंच और पंचायत सचिवों ने की कि फर्जी जॉबकार्ड बनवाकर अपने कब्जे में कर लिए। ताकि उनके नाम पर मस्टर भरकर रकम हडपी जा सके। 
 
ष्टाचार और नीयत का खोट भरी उक्त चालाकियों से मीडिया में लगातार जो खबरें सामने आई हैं, उनका सार यह है कि निगरानी की चाक-चौबंद व्यवस्थाओं के बावजूद निर्माण कार्यो  की गुणवत्ता ठाक नहीं है। जो लोग गॉव में है ही नहीं, उनके फर्जी जॉबकार्ड पर मस्टर भरकर शासकीय धन का गवन किया गया है। निर्माण कार्यो में सामग्री पर अधिक और रोजगार देने पर कम  राशि खर्च की गई है। जिन लोगों से मजदूरी कराई गई उसका भुगतान नहीं किया गया या फिर  निर्धारित अवधि से काफी विलम्ब से भुगतान हुआ। रोजगार देने के फर्जी मस्टर बनाये गये और सामग्री खरीद के फर्जी बिल। यहॉ एक और बात सामने आई कि सरपंच व पंचायत सचिव ने अपने परिजनो तथा चहेतों के जॉबकार्ड भरकर रकम निकाली अथवा उन्हें अधिक काम दिया। दूसरी बात यह कि लोगों से कार्य कराये बगैर उन्हें कुछ रुपये देकर उनके जॉगकार्ड व मस्टर में रोजगार दर्ज कर रकम हडपी गई।
          
हैरत की बात यह कि उपरोक्त कारगुजारियॉ मनरेगा के कानून में गुणवत्ता, निगरानी और मूल्यॉंकन की चाकचौबन्द व्यवस्था किये जाने के बाद हो रही है। मसलन, योजना अन्तर्गत राज्य एवं जिला स्त्र पर  क्वालिटी मानिटर्स को यह सुनिश्चित करना है कि कार्यो की गुणवत्ता निर्धरित मापदण्डों क अनुरुप हो।
 
योजना की निगरानी हेतु जिला, जनपद और ग्राम पंचायत स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है। ग्राम सभा को यह दायित्व सौंपा गया है कि ग्राम पंचायत द्वारा कराये जाने वाले कार्यो का सतत निरीक्षण करे। कराये गये कार्यो का सामाजिक अंकेक्षण करे। जनपद पंचायत का यह दायित्व है कि वह जनपद स्तरीय कार्यो का सतत निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण करे। यही जिम्मेदारी जिला पंचायत को दी गई है। 

उल्लेखनीय है कि मनरेगा स्कीम में कलेक्टर को जिला कार्यक्रम समन्वयक तैनात किया गया गया है। जिन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे योजना के क्रियान्वयन की पाक्षिक समीक्षा करेंगे, अधीनस्थ कर्मचारियों को  समुचित निर्देश देंगे। मगर उपरोक्त स्तर पर कोई भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहा। जिस कारण गजरुरतमंद ग्रामीणों को गॉव में ही रोजगार उपलब्ध कराने की एक महत्वपूर्ण योजना भ्रष्टाचार करने का जरिया बनकर रह गई है।    
         

सोमवार, 6 सितंबर 2010

सरकार के मुंह पर रहमान का साढ़े पांच करोड़ का तमाचा

चलाचली की बेला में चिदम्बरम


भारत गणराज्य के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की रूखसती की बेला आ गई है। एक के बाद एक हर मोर्चे पर नाकामी का सेहरा अपने सर बांधने वाले चिदम्बरम के खिलाफ कांग्रेस में भी अंदर ही अंदर रोष और असंतोष के स्वर खदबदाने लगे हैं।



कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि चौथी बार कांग्रेस की कमान संभालने वाली राजमाता श्रीमती सोनिया गांधी को बताया गया है कि चिदम्बरम खुद ही पार्टी लाईन के खिलाफ जाकर अल्पसंख्यकों और कांग्रेस के बीच बनी दूरी को पाटने के बजाए उसे गहरा करने का ही उपक्रम कर रहे हैं। पार्टी के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद आदि ने चिदम्बरम के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है। उधर वन्य जीव और पर्यावरण के नए पहरूआ बनकर उभरे वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने नियमागिरी की पहाडियोंमें वेदांता पर रोक लगाकर चिदम्बरम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मुंबई में हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के उपरांत कुर्सी संभालने वाले गृह मंत्री के कार्यकाल में नक्सलवाद, अलगाववाद, माओवाद, आतंकवाद का नया चेहरा सामने आया है। नक्सलवादियों ने जहां एक ओर बर्बरता का नया इतिहास लिखा है, वहीं सरकार इन सभी पर काबू पाने में असफल ही रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही सोनिया गांधी सरकार में कांग्रेस के मंत्रियों के पत्ते फेंटने वाली हैं, और उसमें चिदम्बरम के स्थान पर कोई दूसरा शख्स गृह मंत्रालय की कमान संभाल सकता है।



सरकार के मुंह पर रहमान का साढ़े पांच करोड़ का तमाचा

कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में भ्रष्टाचार की गूंज चारों ओर जमकर मची हुई है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि इसे राष्टन्न्ीय पर्व के तौर पर देखा जाना चाहिए। कांग्रेस कहती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच गेम्स के उपरांत की जाएगी, तब दोषियों को सजा दिलाई जाएगी। कामन वेल्थ गेम्स के बिगडने से दुनिया भर में भारत की छवि क्या बनेगी इसकी चिंता है सरकार और कांग्रेस को। गेम्स के लिए थीम सांग बनाने हेतु आस्कर विजेता ए.आर.रहमान को साढ़े पांच करोड़ रूपए का पैकेज दिया गया था, कि वे वक्का वक्का से बेहतर सांग तैयार करें। रहमान ने गाना तैयार किया, गाना गया गया, पर सभी के चेहरों पर लटकी मायूसी साफ जाहिर कर रही थी कि ए.आर.रहमान ने सरकार के मुंह पर साढ़े पांच करोड़ रूपए का जबर्दस्त तमाचा जड़ दिया है। कहते हैं कि उद्यघाटन समारोह को गरिमामय और आकर्षक बनाने के लिए अब किंग खान यानी शाहरूख को न्योता देने की तैयारियां की जा रही हैं। शाहरूख खान को बुलाने का मतलब जनता की जेब पर एक बार फिर डाका डालकर करोड़ों रूपए निकालना। अरे भई अगर थीम सांग पसंद नहीं आया तो दूसरा बनवाया जाए या फिर आयोजन समिति से इसकी राशि वसूली जाए!



तेरा तुझको अर्पण, का लागे मोरा

सरकार इस बात पर संतोष जता रही है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास का रथ द्रुत गति से दौड़ रहा है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट ही नजर आ रही है। नक्सलवादी नेताओं का मानना है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की किरण प्रस्फुटित हो जाएगी तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। यही कारण है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की किरण अब तक नहीं पहुंच सकी है। नक्सलवादियों द्वारा सरकार के द्वारा इस क्षेत्र के विकास के लिए भेजी जाने वाली इमदाद को हड़पकर उसका उपयोग सरकार के खिलाफ ही मोर्चा खोलने में किया जा रहा है। अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए नक्सलवादियों को धन की आवश्यक्ता होती है, और कहा जा रहा है कि यह धन नक्सलवादियों द्वारा सरकार की योजनाओं पर सीधे सीधे डाका डालकर ही जुगाड़ा जा रहा है। सच ही है तेरा तुझको अर्पण का लागे मोरा।



मालू की अभिनव पहल

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के इंजीनियरिंग सेल के प्रदेशाध्यक्ष प्रसन्न चंद मालू ने एक अभिनव पहल की है, जिसकी प्रशंसा मुक्त कंठ से होना चाहिए। मूलतः सर गोविंदराम सक्सेरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी एण्ड साईंस इंदौर (जीएसटीआई) से पास आउट प्रसन्न मालू द्वारा सिवनी जिले के निर्धन बच्चों के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए निशुल्क वातावरण बनाया जाना प्रशंसनीय कहा जाएगा। प्रसन्न मालू द्वारा अपने सहपाठी सुनील डांडीर जो कि टन्नबा इंजीनियरिंग कालेज भोपाल के प्रबंध निदेशक हैं, से अनुरोध किया कि सिवनी जिले के गरीब प्रतिभावान बच्चों को उनके इंजीनियरिंग कालेज में निशुल्क अध्ययन की सुविधा प्रदान करे। मालू के अनुरोध को डांडीर ने स्वीकारा और पहले दो फिर बाद में पांच बच्चों को निशुल्क तौर पर अपने कालेज में अध्ययन हेतु निशुल्क व्यवस्था प्रदान कर दी। प्रसन्न मालू की तरह सिवनी में अनेक संपन्न लोग होंगे जिनके संपर्क में न जाने कितने कालेज, स्कूल के संचालक होंगे पर किसी ने भी सिवनी के बच्चों के हित में इस तरह की बात नहीं सोची होगी। सिवनी के संपन्न लोगों को प्रसन्न मालू की सकारात्मक सोच से प्रेरणा लेकर और भी बच्चों के सुनहरे भविष्य के मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।



कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राजमाता का कापीराईट

सवा सौ साल पुरानी और भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पर आजादी के उपरांत नेहरू गांधी परिवार की छाया जबर्दस्त तरीके से पड़ी है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की धुरी घूमती रही है। कांग्रेस में की पोस्ट पर सदा ही गांधी नेहरू परिवार के सदस्य का जलजला रहा है। दरी और झंडे उठाने वाले कांग्रेसी उमर दराज होकर अपनी कमर झुका चले पर उन्हें उनकी निष्ठा का फल कभी भी नहीं मिला। कांग्रेस में गणेश परिक्रमा करने वाले नेताओं को ही सम्मान और पद से नवाजा जाता रहा है। विश्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी 1998 से लगातार कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। देखा जाए तो उन्हें तीसरी बार अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद नैतिकता के नाते ही सही इस पद को त्याग देना चाहिए था। कहा जा रहा है कि अभी वे एक दशक तक और इस पद पर बनी रहेंगी, ताकि कांग्रेस की नकेल नेहरू गांधी परिवार के हाथों में ही रहे।



युवराज ने जाना रियाया का हाल

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी की ओर रूख किया है। कई माह बाद युवराज को अपनी रियाया के बारे में जानने की सूझी है। बताते हैं कि अपने अघोषित राजनैतिक गुरू कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के मशविरे के बाद राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र में दिलचस्पी लेना आरंभ कर दिया है। दरअसल राहुल गांधी और सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र की बदहाली को विपक्ष द्वारा मुद्दे के तौर पर तैयार करवाना आरंभ कर दिया है, जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की राजमाता और युवराज को होने वाली परेशानी के मद्देनजर राजा दिग्विजय सिंह ने अमेठी वासियों के दुखदर्द को अपना दुखदर्द बनाने का मशविरा दे दिया है। हाल ही में एक महिला की फरियाद पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के मुसाफिर खाना कोतवाली जाने के साथ ही साथ पुलिस से कार्यवाही की गुजारिश की। राहुल गांधी द्वारा जिस शालीनता से पुलिस के साथ व्यवहार किया उससे कोतवाली में उपस्थित पुलिस कर्मी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।



विकलांग मंत्रालय बनाने की सिफारिश

मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के.जी.बालकृष्णन ने देश में विकलांगों के लिए प्रथक से एक मंत्रालय बनाने की सिफारिश की है। बालकृष्णन का कहना है कि विकलांगों के लिए नियम कायदे तो बहुतेरे बन चुके हैं किन्तु वे कानून जमीनी स्तर पर लागू हुए हैं या नहीं इस बारे में सुध लेने की फुर्सत किसी को भी नहीं है। देश भर के लगभग सवा दो करोड़ विकलांग लोगों के लिए बने कानूनों में ढिलाई बरतने पर राज्य सरकारों के प्रति अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर करते हुए बालकृष्णन ने कहा कि विकलांगों के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए कानूनों को लागू करने के लिए प्रभावी निगरानी प्रणाली को विकसित किया जाना आवश्यक है। बालकृष्णन का मानना सही है कि अधिकांश विकलांग गरीब और असहाय तबके से हैं, अतः इसके लिए प्रथक से मंत्रालय बनाया जाकर कानून का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। बालकृष्णन का कहना है कि समाज भी इनके प्रति पूर्वाग्रह से ही ग्रसित नजर आ रहा है।



पीलीभीत में नहीं है गांधी प्रतिमा

राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी की उपाधि ऐसे ही नहीं दी गई थी। बापू ने आधी लंगोटी में उघारे बदन ही ब्रितानियों को खदेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नेहरू गांधी परिवार का अभिन्न अंग रहीं मेनका गांधी और वरूण गांधी का पीलीभीत से लगाव किसी से छिपा नहीं है। आपको यह जानकर अश्चर्य होगा कि पीलीभीत जिला मुख्यालय देश का इकलौता ऐसा जिला मुख्यालय है जहां महात्मा गांधी की एक भी प्रतिमा मौजूद नहीं है। पीलीभीत में बापू के नाम पर दो सभागार और एक स्पोर्टस कांपलेक्स अवश्य ही है। पूर्व कलेक्टर और वर्तमान कांग्रेसी नेता इंदु प्रकाश एरन ने यहां गांधी स्टेडियम की स्थापना करवाई किन्तु प्रतिमा का प्रस्ताव था ही नहीं। अब गांधी की प्रतिमा लगना और भी दुष्कर हो गया है क्योंकि यूपी गर्वनर्मेंट ने किसी भी महापुरूष की प्रतिमा या मूर्ति स्थापना के पूर्व अनुमति की बाध्यता को लागू कर दिया है। पीलिभीत देश का संभवतः इकलौता जिला होगा जहां बापू की प्रतिमा ही नहीं लगी हो।



बिग बी का अंग्रेजी डर!

भारत पर राज करने वाले ब्रितानियों का डर उस वक्त के हर भारतवासी के मन में था। आजादी के बाद शनैः शनैः वह डर समाप्त हो गया। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को अंग्रेज नहीं पर उनके द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी भाषा का डर जबर्दस्त तरीके से सताता रहा है। ‘नमक हलाल‘ सिनेमा में अवश्य ही दर्शकों ने अमिताभ बच्चन को ‘‘आई केन टाक इन इंगलिश, आई केन वाक इन इंगलिश, आई केन लाफ इन इंगलिश, बिकाज इंगलिश इज ए वेरी फनी लेंग्वेज‘‘ बोलते हुए सुना होगा, किन्तु बिग बी अंग्रेजी से बहुत ही खौफ खाते थे। अपने ब्लाग पर अमिताभ लिखते हैं कि वे एक जमाने में अंग्रेजी ग्रामर से बहुत ही डरा करते थे। इसी कारण से उन्होंने कालेज में बीए आनर्स ें अंग्रेजी में दाखिला लेने से इंकार कर दिया था। अब भले ही अमिताभ द्वारा फर्राटेदार अंग्रेजी में लोगों से बातचीत की जाती हो पर सच्चाई यह है कि स्कूल कालेज के जमाने में बिग बी को अंग्रेजी से बहुत ही ज्यादा डर लगा करता था।



पीएम लांघने वाले थे खर्च की निर्धारित सीमा

ख्यातिलब्ध पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने 95 साल के जीवन में राजनैतिक तौर पर न जाने कितने उतार चढ़ाव देखे होंगे। राजधानी दिल्ली के वाशिंदे होने के कारण सत्ता को भी उन्होने काफी करीब से देखा। सत्ता को चलाने वालों ने भी खुशवंत सिंह के साथ गलबहियां डाली होंगी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। खुशवंत सिंह की हाल ही में बाजार में आई किताब ‘एब्सेल्यूट खुशवंत: द लो डाउन आन लाईफ, डेथ एंड मोस्ट थिंग्स इन बिटवीन‘, में वे लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने 1999 में उनसे चुनाव के दौरान टेक्सियों के किराए के लिए दो लाख रूपए नकद लिए थे, यह राशि पीएम के दमाद ने खुशवंत सिंह से ली थी। चुनाव हारने के बाद मनमोहन सिंह ने राशि को खुशवंत सिंह को लौटा दिया। सवाल यह उठता है कि 1999 में अगर महज टेक्सियों के लिए ही दो लाख रूपए खर्च करने की योजना हो तो चुनाव पर कुल कितना व्यय किया होगा मनमोहन सिंह ने उस वक्त। क्या इस तरह के खर्च चुनाव में खर्च की निर्धारित सीमा को पार नहीं किया होगा?