सोमवार, 20 मई 2013

कुशल कुम्हार के अभाव में दम तोड़ती कच्ची मिट्टी!


कुशल कुम्हार के अभाव में दम तोड़ती कच्ची मिट्टी!

(लिमटी खरे)

‘‘माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे! इक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे!! कबीर का यह दोहा बचपन में कोर्स की किताब में ना जाने कितने लोागें ने पढ़ा होगा। कबीर एवं अन्य कवियों के दोहों में कम शब्दों में बहुत ज्यादा सारांश और शिक्षा होती थी। दोहों के माध्मय से ना जाने कितनी शिक्षाएं इन प्राचीन लोगों द्वारा दी गई है। प्राचीन काल से इन हिदायतों शिक्षाओं को लोग अपने जीवन में उतारते आए हैं।
कच्ची मिट्टी को एक कुम्हार बहुत ही बारीकी और जतन के साथ सुराही, घड़ा, मर्तबान, गमला, गुल्लक ना जाने क्या क्या आकार देता है। कुम्हार के द्वारा मिट्टी को गढ़ने की कला वाकई में तारीफे काबिल ही मानी जाती रही है। कहा जाता है कि मिट्टी को गूंथकर, रोंदकर उसे चिकना बनाने के उपरांत कुम्हार उसे चाक‘ (बैलगाड़ी के पहिए के आकार का चका) पर रखकर मन माफिक शक्ल देता है।
कमोबेश सिवनी में शिक्षा के क्षेत्र में कुशल कुम्हारों की कमी साफ दिखाई पड़ती है। नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट नई दिल्ली की प्रवेश परीक्षा में 48वां स्थान पाने वाली सिवनी की बेटी अपर्णा त्रिपाठी ने हिन्द गजट को दिए साक्षात्कार में इस बात को रेखांकित किया है कि सिवनी में बारहवीं तक तो बच्चा जैसे तैसे पढ़ाई कर लेता है, पर इसके उपरांत वह क्या करे कैरियर गाईडेंस के मामले में चहुंओर उसे अंधकार ही दिखाई देता है।
अपर्णा का सोचना शत प्रतिशत सच है। विदेशों में पांचवीं कक्षा से ही बच्चे की रूचि के हिसाब से उसे कैरियर चुनने में शिक्षक प्रशिक्षक मदद करते हैं। सिवनी में ना तो इंजीनियरिंग, ना ही मेडीकल, ना ही चार्टर्ड एकाउंटेंसी जैसे प्रोफेशनल कोर्स के मामलों में कोई गाईड करने वाला है।
सिवनी में पालकों की मजबूरी यह है कि वे प्रोफेशनल कोर्सेस के लिए वरिष्ठ और कार्यरत लोगों के पास जाकर ही सलाह मशविरे के लिए मजबूर हैं। डाक्टर, इंजीनियर, सीए, सीएस, वकील, पत्रकार आदि काफी हद तक व्यस्त होते हैं इन परिस्थितियों में नए विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन हेतु उनके लिए समय निकालना कठिन होता है।
सिवनी में निजी और सरकारी तौर पर ना जाने कितनी शिक्षण संस्थाएं कार्यरत हैं। इन शिक्षण संस्थाओं में भी बच्चों के लिए कैरियर का गाईडेंस नहीं दिया जाता है। शालाओं में पढ़ाई का अभाव साफ दिखाई देता है, यही कारण है कि कोचिंग क्लासेस, ट्यूशन आदि में विद्यार्थियों की भीड़ देखते ही बनती है। इन कोचिंग या ट्यूशन में पालकों की जेब जमकर ढीली होती है।
पालकों की मरण से ना तो प्रशासन को लेना देना है और ना ही शिक्षण संस्थाओं के संचालकों को। जब शाला में चाहे वह सरकारी हो अथवा निजी, में विद्यार्थी से एक बार शिक्षण शुल्क जिसे अंग्रेजी भाषा में ट्यूशन फीस कहा जाता है ले ली जाती है तो फिर क्या कारण है कि बच्चे को ट्यूशन या कोचिंग क्लास में भेजना पड़ता है जहां वह एक बार फिर ट्यूशन फीस देने को मजबूर होता है।
सैकड़ों की तादाद में कोचिंग क्लासेस में बच्चे पढ़ रहे हैं एवं एक एक बच्चे से पांच से पंद्रह हजार रूपए सालाना तक की ट्यूशन फीस ली जा रही है। क्या आयकर विभाग को इन कोचिंग क्लासेस के संचालकों की मोटी कमाई दिखाई नहीं दे रही है। निश्चित तौर पर आयकर विभाग और इन संस्थाओं के संचालकों के बीच सांठगांठ है तभी इन पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
बहरहाल, कैरियर गाईडेंस के लिए कुछ कोचिंग इंस्टीट्यूट्स ने एक दो दिवसीय सेमीनार का आयोजन किया है, वे बधाई की पात्र हैं। बच्चों को किस दिशा में जाना चाहिए, उसकी क्या मंशा है इस बारे में उससे चर्चा कर उसे मार्गदर्शन अगर दिया जाए तो वह काफी हद तक अपना रास्ता चुन सकता है। वस्तुतः सिवनी में ऐसा होता नहीं दिखता।
आज पालक और बच्चे दसवीं के उपरांत अपना कैरियर चुनने के लिए समाचार पत्रों के साप्ताहिक पुल आउट, के साथ ही साथ इंटरनेट पर ही भविष्य खंगालने पर मजबूर हैं। जिनके परिचित इन क्षेत्रों में हैं वे तो अपनी अपनी उत्सुक्ता की शांति इन सीनियर्स से पूछकर कर लेते हैं पर गांव के बेचारे बच्चे क्या करें, जिनके मन में कुछ करने की अभिलाषाएं होती हैं, पर सहयोग के अभाव में वे दम ही तोड़ देती हैं।
कुछ साल पहले तक आरक्षित वर्गों के बच्चों के लिए कैरियर मार्गदर्शन का काम किया जाता था, पर अब वह भी बंद हो चुका है। गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ के मुंह में भी खून लग चुका है। एनजीओ भी अब बिना पैसे का काम करने में हिचकिचाहट ही महसूस करते हैं।
होना यह चाहिए कि सरकारी स्तर पर कुछ इस तरह के प्रयास हों कि आठवीं कक्षा के उपरांत ही बच्चों को कैरियर बनाने के लिए समय समय पर मार्गदर्शन मिले। इसके साथ ही साथ मोटा पैसा काट रहे कोचिंग इंस्टीट्यूट के संचालकों को भी पाबंद किया जाए कि वे हर दो तीन माह में कैरियर गाईडेंस शिविर का आयोजन कर कच्ची मिट्टी को स्वरूप देने की कवायद करें।
समय रहते इस तरह के प्रयास आवश्यक हैं। सिवनी में प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं। जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी प्रज्ञनानंद, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा, भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत अधिकारी शील कांत शर्मा, भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत अधिकारी ऋषभ कुमार दिवाकर आदि ना जाने कितने उदहारण हैं जो सिवनी के भाल पर तिलक के रूप में कहे जा सकते हैं। जरूरत है तो कच्ची मिट्टी को गढ़कर स्वरूप देने की।

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