बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

हरियाणा में नोकरशाहों का शगल बनती राजनीति



देवीलाल ने किया था नौकरशाहों का राजनीति की ओर रूख


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। अधिकारियों के बूते राजनीतिक पायदान चढ़ने वाले राजनेताओं, अधिकारियों के मुंह में राजनीति का खून लगाने से नहीं चूके हैं। सियासत के दलदल में ब्यूरोक्रेट्स को उतारने में हरियाणा ने बाजी मारी है। इस सूबे में चौधरी देवी लाल द्वारा लगाए गए पौधे ने अब बट वृक्ष का स्वरूप धारण कर लिया है।


ज्ञातव्य है कि 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल ने सबसे पहली बार लंदन में कार्यरत एक शिक्षक को राजनीति के दलदल में उतारा था। यह अलहदा बात है कि उस दौर में राजनीति का स्वरूप इतना घिनौना नहीं हुआ करता था। देवी लाल के सहारे श्यामलाल नामक यह शिक्षक सोनीपत से विधायक चुने जाने के बाद लाल बत्ती प्राप्त कर सके थे।


सूबे में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कृपा राम पुनिया, डॉ.रघुबीर कादियान, रघुवीर सिंह, ए.एस.रंगा, श्री सिसोदिया, बी.डी.ढलैया, आई.डी.स्वामी, आर.एस.चौधरी, आबकारी महकमे के अधिकारी राधेश्याम शर्मा, हरियाणा राज्य सेवा के डॉ.के.वी.सिंह, एम.एल.सारवान, विरेंद्र मराठा, बहादुर सिंह, पुलिस महानिदेशक एच.आर.स्वान, ए.एस.भटोटिया, महेंद्र सिंह मलिक, एडीजी रेशम सिंह, के अलावा डॉ.सुशील इंदौरा और बैक अधिकारी हेतराम आदि ने भी सरकारी नौकरी के बाद राजनीति का पाठ सीखा है।


देश भर में अफसरान के राजनीति में कूदने के उदहारण बहुतायत में हैं, किन्तु हरियाणा में सर्वाधिक सरकारी कर्मचारियों ने अपने कर्तव्यों को तिलांजलि देकर (नौकरी से त्यागपत्र देकर) राजनीति के माध्यम से ``जनसेवा`` का मार्ग चुना है। हरियाणा के राजनैतिक परिदृश्य को देखने से साफ हो जाता है कि यहां अफसरशाह जब भी राजनीति में आए हैं, वे अपने आकाओं के कभी विश्वास पात्र बनकर नहीं रह पाए हैं।


पूनिया को देवीलाल राजनीति में लाए, बाद में अनबन होने पर पूनिया ने देवी लाल का साथ छोड़ दिया। डॉ. कदियान को देवी लाल लाए थे, बाद में वे उनका साथ छोडकर कांग्रेस का दामन थाम अपनी राह में आगे बढ़ गए।


आवश्यक है वरूण गांधी के इन तेवरों को अपनाना

आवश्यक है वरूण गांधी के इन तेवरों को अपनाना



(लिमटी खरे)


चुनावों के दौरान पीलीभीत में आक्रमक तेवर अपनाकर विवादों में फंसने वाले नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के सदस्य अब एवं संसद सदस्य वरूण गांधी अब कुछ परिपक्व राजनैतिक झलक दिखलाने लगे हैं। एक ओर उनके अंदर उग्र हिन्दुत्व की झलक देखने को मिली तो अब उनके अंदर उनके पिता स्व.संजय गांधी के देशहित के तेवर भी देखने को मिल रहे हैं।


हाल ही में उत्तर प्रदेश में विश्व के सात अजूबों में से एक ताज महल को अपने दामन में समेटने वाले शहर आगरा में एक व्यक्तिगत बैठक के दौरान वरूण परिपक्व राजनेता के रूप में नजर आए। उन्होंने कहा कि वे सड़क, पुल जैसी आधारभूत संरचना के निर्माण में विश्वास नहीं रखते, उनकी निजी राय में देश में विस्फोटक आबादी सबसे बड़ी चुनौति है।


वरूण के इस तरह के तेवर ने उनके पिता स्व.संजय गांधी के लगभग पेतीस साल पुराने तेवरों की याद ताजा कर दी है। गौरतलब होगा कि संजय गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान नसबंदी को लेकर आक्रमक अभियान का श्रीगणेश किया था, उस दौरान नसबंदी के खिलाफ देश में मुजफ्फर नगर सहित अनेक स्थानों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।


संजय गांधी कांग्रेस के सदस्य रहे हैं। दरअसल कांग्रेस में भविष्य दृष्टा इंदिरा और संजय गांधी ही थे। मेनका और सोनिया गांधी के देवरानी जेठानी के विवाद ने संजय गांधी को कांग्रेस के इतिहास में पाश्र्व में ढकेल दिया। कांग्रेस में गांधी के मायने इंदिरा, राजीव, सोनिया और राहुल ही बचे हैं।


सत्तर के दशक में ही इंदिरा और संजय गांधी ने देश की बढ़ने वाली जनसंख्या का अंदाजा सहजता से लगा लिया था, यही कारण था कि फेमली प्लानिंग का काम उन्होंने पहली प्राथमिकता पर रखा और इसका कड़ाई से पालन भी सुनिश्चित करवाया था। आज संजय गांधी की उस महिम के कारण जनसंख्या इतनी है, अगर संजय गांधी परिवार नियोजन योजना में सख्ती न बरतते तो देश की बढ़ी हुई जनसंख्या में आज जीना मुश्किल ही हो जाता।


संजय गांधी की यह मुहिम मुस्लिम धर्मावलंबियों को रास नहीं आई थी। इसका पुरजोर विरोध किया गया था। आज पढ़े लिखे मुस्लिम धर्मावलंबी भी दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विहिप के प्रवीण तोगडिया सरीसे नेता सनातन पंथियों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसा रहे हैं। सही मायनों में आज देश में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती आबादी से बड़ा दुश्मन देश के लिए और कोई नहीं है।


समाजशास्त्र में नगरीकरण और औद्योगिकरण एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। जहां उद्योग धंधे लगेगें उसके आसपास उपनगरों, मजरों, टोलों का बनना स्वाभाविक प्रक्रिया है। महानगरों सहित अनेक नगरों के इर्दगिर्द जंगलों को काटकर कांक्रीट जंगलों की स्थापना कमोबेश यही दर्शा रही है कि देश की आबादी किस तेज गति से बढ़ रही है।


वनों की अधांधुंध कटाई के कारण जलवायू परिवर्तन हमारे सामने है। देश में सबसे ज्यादा बारिश के लिए प्रसिद्ध चेरापूंजी में अब उस तरह बारिश नहीं होती है जो पहले हुआ करती थी। अक्टूबर के माह में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कूलर चल रहे हों तो पर्यावरण असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।


हम वरूण गांधी के प्रशंसक नही हैं, किन्तु उन्होंने जिस तरह के तेवर अपनाए हैं, वे निश्चित तौर पर स्वागतयोग्य हैं। वरूण का यह कहना -``मैं वो गांधी नहीं हूं, जिसने अपने आप को उपर उठाने के लिए देश को गिरवी रख दिया हो, मैं देश को बचाने के लिए अपने आप को गिरवी रख सकता हूंं`` हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा बोफोर्स मामला वापस लेने की पहल के चलते सोनिया और राहुल गांधी पर कटाक्ष से कम नहीं है।


यह सच है कि कांग्रेस ने देश में आधी सदी से ज्यादा शासन किया है। आजादी के छ: दशकों के बाद भी देश कहां खड़ा है और देश के ``जनसेवक`` कहां खड़े हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। यह विडम्बना से कम नहीं है कि देश में आज भी करोड़ों लोग एैसे हैं जिन्हें तन पर पूरे कपड़े और दो वक्त की रोटी नसीब नहीं है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के ``जनसेवक`` कथित तौर पर ``अपने खर्चे पर`` महीनों सितारा युक्त आलीशान होटलों में रात बिताते हैं।


कांग्रेस की नजर में देश के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी दलितों के घर रात बिताकर मीडिया की सुर्खियां बटोरने से नहीं चूकते हैं। राहुल राजनीति में नए हैं, अत: वे अपने सलाहकारों के मशविरे के चलते इस तरह का कदम उठा रहे होंगे। हमें यह कहने में संकोच नही है कि राहुल गांधी देश की सवा करोड़ से अधिक जनता की जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं।


राहुल गांधी को चाहिए कि वे वरूण गांधी से सीख लेकर देश की सबसे बड़ी दुश्मन केंसर कोशिकाओं की तरह विस्फोटक होती आबादी पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं। देश में भीख मांगते आधा तन कपड़ा पहनने वाली कमसिनों के हाथों मेें बच्चों को देखकर तरस आ जाता है।


दिल्ली में ही अनेक स्थानों पर नाबालिग युवतियां दो तीन बच्चों को गोद में लेकर भीख मांगती नजर आ जाती हैं। यह सब देश के ``जनसेवकों`` को दिखाई नहीं देता क्योंकि आधे से अधिक जनसेवकों के इर्द गिर्द सुरक्षा तंत्र मौजूद रहता है, जिनके कारण असली भारत की तस्वीर देखने से ये महरूम रह जाते हैं।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

मुंबई में हाशिए पर आ रहे हैं गुजराती

मुंबई में हाशिए पर आ रहे हैं गुजराती
40 लाख में से महज दो को मिला है टिकिट


राज के खौफ से भयभीत हैं राजनैतिक दल


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। कहा जाता रहा है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को गुजराती और पारसियों ने तो राजनैतिक राजधानी दिल्ली को पंजाबियों ने अपने हिसाब से चलाया है, किन्तु महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) सुप्रीमो राज ठाकरे से खौफजदा होकर राजनैतिक दलों ने अब मुंबई में 40 लाख गुजरातियों को हाशिए में ढकेलना आरंभ कर दिया है।


मराठी और उत्तर भारतियों की लड़ाई के सूत्रधार मनसे चीफ राज ठाकरे के घ्रणा फैलाने के अभियान का असर ही कहा जाएगा कि मराठी वोट बैंक के हाथ से फिसलने के डर से राजनैतिक दलों ने भी परोक्ष तोर पर राज ठाकरे के अभियान को समर्थन दे दिया है।


गौरतलब होगा मुंबई में गुजराती परिवारों की तादाद बहुतायत में है। यहां लगभग चालीस लाख गुजराती निवास करते हैं, जो मुंबई की रीढ़ कहलाते हैं। बावजूद इसके भाजपा और कांग्रेस ने एक एक प्रत्याशी को अपना उम्मीदवार बनाया जाना आश्चर्यजनक है। शेष राजनैतिक दल इस मामले में मौन ही साधे हुए हैं।


मराठियों को संरक्षण देने के नाम पर राजनीति करने वाले राज ठाकरे पिछले कुछ दिनों से उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलते आए हैं। यही कारण है कि शेष राजनैतिक दलों की मजबूरी उत्तर भारतीय वोट बैंक को सहेजने की हो गई है। यही कारण है कि भाजपा ने मुंबई में चार उत्तर भारतियों को उम्मीदवार बनाया है।


मराठी और उत्तर भारतीयों की लड़ाई में सबसे ज्यादा घाटे में रहने वाले गुजरातियों ने अब अपने आप को लामबंद करना आरंभ कर दिया है। आने वाले समय में गुज्जियों (गुजरातियों के लिए मुंबई में सर्वाधिक प्रचलित शब्द) के कोप का भाजन कांंग्रेस और भाजपा दोनों ही को होना पड़ सकता है।


राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में गुजराती और मारवाणी संप्रदाय मिलकर कांग्रेस और भाजपा पर दबाव की राजनीति कर सकते हैं। वैसे भी अब तक गुजराती समुदाय ने सदा से ही भारतीय जनता पार्टी का साथ दिया है, किन्तु इस बार महज एक टिकिट मिलने से वे भी बुरी तरह खफा ही नजर आ रहे हैं।


एक वरिष्ठ भाजपाई नेता ने नाम न उजागर न करने की शर्त पर कहा कि मुंबई सहित समूचे सूबे में ठाकरे बंधुओं (राज और बाल ठाकरे) की सुलगाई गई घ्रणा की आग में राजनैतिक दल झुलसने लगे हैं। देशहित की बात करने वाली भाजपा द्वारा भी ठाकरे ब्रदर्स का परोक्ष तौर पर अनुसरण करना आश्चर्यजनक बात है।




रियाया भी हकदार है ठंडी हवा की!



(लिमटी खरे)


राजा और प्रजा के बीच क्या संबंध होते हैं, इनके मायने आज के शासक भूलते जा रहे हैं, इसका कारण यह है कि आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में हम अपना इतिहास को विस्मृत करते जा रहे हैं। अभी बहुत समय नहीं बीता है, जबकि देश में आजादी का जश्न जिस संजीदगी से मनाया जाता था, पर आज उस जोश में कमी साफ दिखाई पड़ रही है। आज महज औपचारिकता रह गई है, गणतंत्र, स्वतंत्रता, शहीद दिवस आदि का आयोजन।


इतिहास साक्षी है कि शासक ने सदा ही अपनी रियाया के दुख दर्द को समझने का प्रयास किया है। अगर राजकोष रीतने लगता तो राजा और उनके सिपाहसलार सभी मिलकर अपने खर्चों पर अंकुश लगाकर प्रजा को हर हाल में सुकून से रखने का प्रयास करते रहे हैं। इस सबसे उलट अय्याश और बिगड़ेल राजाओं का हश्र भी किसी से छिपा नहीं है।


बीसवीं सदी के अंतिम दशकों और इक्कीसवीं सदी में तो मानोे सारे समीकरण और परिकल्पनाएं उल्टी ही होने लगी हैं। देश प्रदेश पर शासन करने वाले मंत्री, सांसद, विधायक अब तो प्रजा के बजाए अपने एशो आराम पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। आज रियाया कमरतोड़ महंगाई, पग पग पर फैले भ्रष्टाचार, अनाचार से आजिज आ चुकी है।


मंदी के दौर में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की चेयर पर्सन एवं कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा सादगी दर्शन के लिए राजनैतिक राजधानी दिल्ली से व्यवसायिक राजधानी मुंबई तक की यात्रा हवाई जहाज में इकानामी क्लास में की जाती है, वह भी दस सीटें बुक करवाकर खाली छोड़कर।


उनके लाड़ले सपूत और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी भला कहां पीछे रहने वाले थे। वे भी शताब्दी की एक पूरी बोगी बुक करवाकर यात्रा पर निकल पड़े। मीडिया ने भी निहित स्वार्थों के चलते पत्रकारिता के उसूलों को तिलांजली देकर मां बेटे के इस ``कथित महान कदम`` को खूब तवज्जो दी। गली चौराहों पर मां बेटे की सादगी के किस्से मशहूर हो गए। मीडिया ने इस मितव्ययता के पीछे की खर्चीली कहानी को बड़ी ही चतुराई के साथ पाश्र्व में धकेल दिया, जो निंदनीय कहा जाएगा।


केंद्र सरकार के दो मंत्री एम.एस.कृष्णा और शशि थुरूर लंबे समय तक सितारा युक्त होटल में रहे। हो हल्ला होने पर बाद में उन्होंने कहा कि उसका भोगमान (बिल) वे स्वयं ही भुगतेंगे। सवाल यह उठता है कि भोगमान चाहे जो भोगे पर देश के दोनों जनसेवकों को कम से कम होटलों का देयक तो सार्वजनिक करना चाहिए था, कि उन्होंने कितनी राशि व्यय की एवं उपर कितना कर लगाया गया।


मितव्ययता का पाठ सीखने वाले सांसद और विधायक सदा ही सुर्खियों में रहे हैं। हाल ही में संसदों के आवास को ठंडा रखने की गरज से लगवाए जाने वाले वातानुकूलित यंत्र (एयर कंडीशनर) के कारण सांसद सुर्खियों में हैं। सांसदों के घरों की साजसज्जा के साथ ही अब नए नवेले जनसेवकों को नए एसी भी चाहिए हैं।


अमूमन एक एयर कंडीशनर की औसत उम्र 10 वर्ष मानी जाती है। अगर ठीक ठाक रखरखाव किया जाए तो यह उम्र बढ़ भी सकती है। सांसदों के आवासों की सेवाटहल और रखरखाव के लिए अलग से सरकारी मुलाजिम तैनात हैं, उस हिसाब से इन एयर कंडीशनर्स को और अधिक दिन तक साथ देना चाहिए।


सांसदों को आवंटित आवास में शहरो से चुनकर आए नवधनाड्य या पढ़े लिखे सांसदों ने ``वास्तुकला`` के अनुरूप अपने आवास में तोड़फोड करवा दी है, ताकि वे लाल बत्ती या प्रभावशाली पद को पा सकें। इतना ही नहीं पुराने पर्दे, गद्दे सोफे के साथ ही साथ एयर कंडीशनर और पंखे भी नए लगवाए जा रहे हैं। गरीब गुरबे और ग्रामीण पृष्ठाभूमि वाले सांसद तो हर व्यवस्था को अंगीकार कर रहे हैं पर सर चढे नेताओं ने सरकारी धन में बुरी तरह सेंध लगा रखी है।


संबंधित विभाग के अफसर अगर उनकी बात न मानें तो जूतम पेजार की नोबत तक आ जाती है। पिछली बार तो एक संसद सदस्य ने एक अधिकारी को तमाचा रसीद कर दिया था। इतना ही नहीं एक गुस्सेल संसद सदस्य ने तो अधिकारी द्वारा उनकी मनमानी न मानने पर उनकी कनपटी पर पिस्तोल तक तान दी थी।


प्रश्न यही है कि आखिर यह सब किसके धन से किया जा रहा है, जाहिर है, जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से। चूंकि यह मामला ज्यादा उछलता नहीं है, अत: जनता को इस बारे में पता नहीं चल पाता है कि उनके द्वारा अलह सुब्बह चाय से लेकर रात को सोते समय तक हर बात पर जो कर दिया जाता है, उसी राजस्व से प्राप्त रूपयों में संसद सदस्य इस तरह आग लगाने पर आमदा हैं।


सांसद हो या विधायक, उन्हें चुनता कौन हैर्षोर्षो देश की जनता। सांसदों के आवासों पर एयर कंडीशनर, हीटर, गीजर लगवाकर उन्हें तो ठंडी और गर्म हवा का लुत्फ उठाने दिया जा रहा है, किन्तु देश के आखिरी आदमी तक बराबरी का संदेश देने वाले ये जनसेवक क्या यह नहीं जानते कि उस आखिरी आदमी या देश के विकास और अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान को भी भीषण गर्मी में ठंडी और हाड गलाने वाली सदीZ में गर्म हवा की जरूरत हो सकती है।


जनता के द्वारा चुने जाने वाले इन जनसेवकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर जनता उन्हें चुनकर जनादेश देकर संसद या विधानसभा में पहुंचाती है तो उन्हें उस जनादेश का सम्मान करना चाहिए वरना यही जनता उन्हें संसद या विधानसभा से उठाकर बाहर फेंकने में गुरेज भी नहीं करनी वाली।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

क्या वाकई साल भर बाद नए स्वरूप में हो सकेगी दिल्ली

क्या वाकई साल भर बाद नए स्वरूप में हो सकेगी दिल्ली



(लिमटी खरे)

राष्ट्रमण्डल खेलों की उलटी गिनती आरंभ हो चुकी है। एक साल बाद दिल्ली को विदेशी मेहमानों के स्वागत के लिए सजधज कर तैयार होना है। 3 अक्टूबर 2010 से दस दिवसीय कामन वेल्थ गेम्स का आयोजन प्रस्तावित है। सूबे की निजाम शीला दीक्षित ने कुछ दिनों पूर्व नर्वसनेस बताकर सभी के हाथ पांव फुला दिए थे।


दिल्ली के बारे में जो सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं, उसमें वर्तमान में दिल्ली में लगभग छ: सैकड़ा फ्लाई ओवर हैं, जिन पर जब तब जाम की स्थिति निर्मित हो जाती है। लोक निर्माण विभाग के प्रस्तावित और निर्माणाधीन 24 तथा एमसीडी के 17 को मिलाकर आने वाले समय में इनकी तादाद सैकड़ा पार कर सकती है।


एक जमाने मे दिल्ली की लाईफ लाईन के नाम से मशहूर यहां की डीटीसी बसें बुरी तरह कराह रहीं हैं। कामन वेल्थ गेम्स को देखकर यहां लो फ्लोर बस सड़कों का सीना रौंद रहीं हैं। वर्तमान में डीटीसी के पास कुल 3650 यात्री बस हैं। 2010 तक इस बेड़े में 2500 और बस जुड़ जाएंगी जिनमें वातानुकूलित बसों की तादाद 1025 होने की उम्मीद जताई जा रही है।


बसों को तो सड़कों पर उतरने की कवायद की जा रही है पर डीटीसी के डिपो का अता पता तक नहीं है। रोहणी के डिपो का काम अभी आरंभ ही नहीं हो सका है तो नरेला, कंझावाल 1 और दो का काम 10 फीसदी, ओखला 3 का 25 फीसदी, द्वारका सेक्टर 8 का 35 तो द्वारका सेक्टर 2 का काम 40 प्रतिशत ही पूरा हो सका है। डीटीसी बसों के रखखाव के लिए चार नए डिपो प्रस्ताति हैं। लालफीताशाही बाबूगिरी और बिगडेल अफसरशाही के बीच इनका काम समय से पूरा होने में संशय ही लगता है।


वर्तमान में लाईफ लाईन बन चुकी मेट्रो रेल में आए दिन कोई न कोई दुघZटना का घटना अशुभ संकेत से कम नहीं है। यलो लाईन, रेड लाईन और ब्लू लाईन के नाम से तीन मार्गों पर वर्तमान में मेट्रो रेल लगभग 75 किलोमीटर में लगभग साढ़े आठ लाख यात्री सफर तय कर रहे है। आने वाले दिनों में इसकी लंबाई बढ़कर 189 किलोमीटर हो सकती है, तब अनुमानित बीस लाख यात्री रोजाना इसमें सफर कर सकेंगे।


जमरूदपुर, लक्ष्मीनगर, नेहरू प्लेस के बाद शनिवार को सेंट्रल सेक्रेटरीएट से गुड़गांव मार्ग पर हुआ हादसा रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। जमरूदपुर हादसे के उपरांत डीएमआरसी प्रमुख श्रीधरन ने अपना त्यागपत्र दे दिया था। यद्यपि कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों को देखकर दिल्ली सरकार ने उनका त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया था, तथापि मेट्रो लाईन के निर्माण में कोताही निरंतर जारी है।


मेट्रो निर्माण कर रही गेमन इंडिया लिमिटेड को काली सूची में डाल दिया है। यह एक कदम हो सकता है, पर इससे समाधान नहीं किया जा सकता है। दरअसल मेट्रो लाईन बिछाने, खंबे खड़े करने तथा उन्हें आपस में जोड़ने के लिए पाबंद की गई एजेंसीज को ही मेट्रो रेल निर्माण का अनुभव ही नहीं है। बड़ी कंपनियों ने ठेका लेकर इसे पेटी पर छोटे ठेकेदारों को दे दिया है, जिसकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है।


दिल्ली में आने वालों की बड़ी तादाद रेल मार्ग से ही होती है। कमोबेश हर ओर से आने वाले विशेषकर मथुरा के रास्ते दिल्ली में प्रवेश करने वाली रेलगाडियां अक्सर ही नियत समय से विलंब से दिल्ली पहुंचती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण दिल्ली को मध्य, दक्षिण, मध्य पूर्व और मध्य पश्चिम से आने वाली रेल गाडियों का गेट वे मथुरा का होना है। यही कारण है कि सीमित प्लेटफार्म और रेल की पांते होने से यातायात का दबाव अधिक रहता है, परिणामस्वरूप रेल गाडियां विलंब से पहुंचती हैं।


वर्तमान में दिल्ली में सराय रोहिला, सब्जी मण्डी, लाजपत नगर, आदि सहित अनेक रेल्वे स्टेशन हैं। इनमें से नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन का उपयोग सर्वाधिक होता है। आने वाले समय में आनन्द विहार रेल्वे स्टेशन के आरंभ होने से यातायात का दबाव कुछ हद तक कम होने की उम्मीद है।


दो टर्मिनल वाले इंदिरा गांधी हवाई अड्डे में वर्तमान में लगभग बीस लाख यात्री प्रति माह आवागमन करते हैं। 31 मार्च 2010 तक इसका तीसरा टर्मिनल भी आरंभ होने की उम्मीद है। सरकारी सूत्रों की मानें तो आने वाले साल में इसकी क्षमता बढ़कर 50 लाख यात्री प्रतिमाह होने का अनुमान है।


राजधानी से सटे नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद आदि को भी आधुनिक बनाने की कवायद चल रही है। राजधानी का हृदयस्थल कनाट प्लेस को सुंदर बनाने का काम भी युद्ध स्तर पर जारी है। रही बात स्टेडियम और खिलाडियों के रहने की जगह की तो उस मामले में काम कच्छप गति से ही संचालित हो रहा है। खेलों के लिए दिल्ली में 11 स्टेडियम प्रस्तावित हैं।


राजधानी के नेहरू सटेडियम का काम 53 फीसदी, इंदिरा गांधी स्टेडियम का 36 फीसदी, एसपी मुखर्जी 42, कणीZ सिंह 42, एमसीडी 75, सिरीफोर्ट 46, बिगबोर 40, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं तालकटोरा का 35 फीसदी, यमुना स्पोर्टस काम्पलेक्स का महज 7 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ है। विभागों के बीच तालमेल और सामंजस्य का अभाव इनके कार्य संपादन में प्रमुख चुनौति के तौर पर सामने आया है।


राजधानी की सबसे बड़ी समस्या यहां के बिगड़ेल आटो और टेक्सी चालक हैं, जिन पर लगाम लगाना शायद प्रशासन के बूते के बाहर की ही बात नजर आ रही है। शहर की सीवर लाईन समस्या के चलते गंदा और बदबूदार पानी सड़कों पर बहता रहता पर इस ओर न तो शीला सरकार का ध्यान है, और न ही नगर पालिका निगम का।


किसी भी दिशा से जैसे ही दिल्ली की सीमा में प्रवेश किया जाता है, वैसे ही गंदे नालों की अजीब सी सडांध मारती दुर्गंध आपको नींद में ही बता देगी कि आपने दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर लिया है। इस बात को एयर कंडीशन्ड गाडियों में चलने वाले नेता और अफसरान शायद ही समझ सकें। इस दुर्गंध के साथ दिल्ली आपका स्वागत करती है -``मुस्कुराईये कि आप दिल्ली में हैं।``


पानी और बिजली के मामले में दिल्ली का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है। मामला चाहे पेयजल का हो या बिजली आपूर्ति का दोनों ही मामलों में दिल्ली सरकार कब दगा दे जाए कहा नहीं जा सकता है। भीषण गर्मी या हाड गलाने वाली ठण्ड में भी दिल्ली में बिजली और पानी दोनों ही नदारत रहते हैं।


सुरक्षा की दृष्टि से भी दिल्ली पुलिस को एहतियाती कदम उठाना आवश्यक होंगे। वैसे भी आतंकवादियों और अपराधियों के लिए दिल्ली साफ्ट टारगेट रही है। दिल्ली में एक के बाद एक होने वाली दुघZटनाएं और हत्याओं के चलते यहां के लोगों का जीना दुश्वार है।


कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों को देखकर यह सुखद एहसास अवश्य ही होता है कि आजाद भारत की राजनैतिक राजधानी आजादी के 62 सालों बाद ही सही कम से कम दुल्हन की तरह सज तो सकेगी, किन्तु अंदर ही अंदर एक डर भी सताता है कि कहीं यह सब एक दिवा स्वप्न ना साबित होकर रह जाए।

मसल और मनी पावर का दबदबा है हरियाणा में

मसल और मनी पावर का दबदबा है हरियाणा में



14 फीसदी उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले


68 के मुकाबले इस बार महज 60 महिला उम्मीदवार हैं मैदान में


आधे से अधिक उम्मीदवार करोड़पति


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। बिहार और उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अब हरियाणा में भी धनबल (मनी पावर) और बाहुबल (मसल पावर) का बोलबाला साफ दिखाई दे रहा है। चुनावी मैदान में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों की कमी से साफ होने लगा है कि अब सभ्रांत लोगों का राजनीति से मोहभंग हो रहा है।


एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) द्वारा किए गए सर्वेक्षण के उपरांत यह तथ्य सामने आया है। एनजीओ के सर्वे में कहा गया है कि कांग्रेस और हरियाणा जनहित कांग्रेस तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 14 - 14 प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले पंजीबद्ध हैं। इंनेलो और बसपा के 12 - 12, भाजपा के 8 उम्मीदवार आपराधिक मामलों के चलते अदालतों की चौखट चूम रहे हैं।


सर्वे में यह भी खुलासा किया गया है कि 251 उम्मीदवारों द्वारा घोषित की गई संपत्ति एक करोड़ रूपए से अधिक की है। इस चुनाव में सर्वाधिक संपत्ति कोसली के हरियाणा जनहित कांग्रेस के उम्मीदवार मोहित की है, जिन्होंने 92 करोड़ 70 लाख रूपयों की संपत्ति की घोषणा सार्वजनिक तौर पर की है। अंबाला सिटी से कांग्रेस के प्रत्याशी विनोद शर्मा की संपत्ति 87 करोड़ 40 लाख रूपए है। एक प्रत्याशी ने अपनी संपत्ति शून्य तो केथल के इनेलो के उम्मीदवार कैलाश भगत ने अपने उपर 55 करोड़ रूपयों का कर्ज बताया है।


गौरतलब होगा कि पिछले विधानसभा चुनावों में हरियाणा में 11.34 फीसदी प्रत्याशियों का आपराधिक रिकार्ड पाया गया था, जो इस बार बढ़कर 14 प्रतिशत हो गया है। पिछले चुनाव में महज 27 राजनैतिक दल मैदान में थे, इस बार उनकी संख्या 81 फीसदी बढ़कर 49 हो गई है। पिछली बार 983 के मुकाबले इस बार 1222 उम्मीदवार चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।






रविवार, 4 अक्टूबर 2009

चंदा मामा से प्यारा मेरा क्वात्रोची मामा . . .

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

चंदा मामा से प्यारा मेरा क्वात्रोची मामा . . .
बोफोर्स, बोफोर्स बोफोर्स। बार बार यह सुनते सुनते कान थक गए और अब सरकार ने बोफोर्स के जिन्न को सदा के लिए बोतल में बंद कर उसे समंदर में गहरे पानी तले दबाने का जतन किया है, ताकि दुबारा यह बाहर न आ सके। बोफोर्स तोप दलाली की चीत्कार के चलते राजीव गांधी की सरकार गिर गई थी। भाजपा नेता अरूण शोरी तब पत्रकार की भूमिका में थे, उन्होंने बोफोर्स को जमकर हवा दी थी। आज उनकी चुप्पी भी रहस्यमय ही है। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पीहर (मायके) के हैं इसमें लिप्त ऑक्टोबिया क्वात्रोची, सो इस लिहाज से वे कांग्रेसियो के मामा ही लगे, भला मामा को क्यों न बचाए कांग्रेस की सरकर! फिर बताते हैं कि राजमाता की सहेली जो ठहरीं क्वात्रोची की पित्न मारिया। अब सब कुछ साफ साफ दिखाई पड़ने लगा है। क्वात्रोची आजाद हैं, लानत मलानत झेल रही है कांग्रेस। वैसे भी माना जाता है कि पब्लिक मेमोरी (लोगों की याददाश्त) ज्यादा नहीं होती है, सो इस बारे में चौक चौराहों पर कुछ माह तक चर्चा होने के बाद फिर मामला ठंडे बस्ते के हवाले हो जाएगा। रही बात मीडिया की तो अखबारों और चेनल्स की सुर्खियां बनी यह खबर एकाध सप्ताह में बीच के किसी पन्ने पर आकर दम तोड़ ही देगी। मजे की बात तो यह है कि क्वात्रोची ने अपने खाते से 21 करोड़ रूपए निकाल भी लिए हैं।


राहुल की युवा होती कांग्रेस!

उमर दराज नेताओं को मार्गदर्शक की भूमिका में ही होना चाहिए। यह मानना कमोबेश हर राजनैतिक दल का है। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के नए पायोयिर (अगुआ) हैं नेहरू गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के सदस्य राहुल गांधी। मंत्रीमण्डल से लेकर सरकार तक में वे युवाओं को आगे लाने के हिमायती रहे हैं। जब से कांग्रेस के महासचिव राहुल ने अपने अघोषित राजनैतिक गुरू एवं दूसरे महासचिव राजा दिगिवजय सिंह के मार्गदर्शन में परोक्ष तौर पर कांग्रेस की कमान संभाली है तब से वे युवाओं को ही तवज्जो दे रहे हैं। महाराष्ट्र में आसन्न चुनावों में राहुल गांधी की युवा होती कांग्रेस का एक अजूबा चेहरा सामने आया है। राहुल की सिफारिश पर कोल्हापुर तालुके की शिरोल विधानसभा सीट से सतगोंडा रेवगोंडा पाटिल को अपना उम्मीदवार बनाया है। पेशे से किसान यह कांग्रेसी उम्मीदवार जरूरत से ज्यादा युवा नजर आ रहे हैं। इन्हें 2004 के विधानसभा चुनावों में टिकिट से महरूम रखा गया था। राहुल चर्चा में इसलिए आ गए हैं, क्योंकि जिस पाटिल से राहुल गांधी बहुत ज्यादा प्रभावित नजर आ रहे हैं, उनकी उमर महज 90 साल जो ठहरी।


12 साल से जगह की तलाश में बापू


दलित नेता स्व. कांशीराम, मायावती सहित 11 दलित नेताओं की प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती ने करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए हैं, किन्तु 12 सालों में गोतम बुद्ध नगर (नोएडा) में बापू की प्रतिमा को स्थापित करने माकूल जगह नहीं मिल सकी है। 12 साल पहले नोएडा अथारिटी के आग्रह पर देश के नामी मूर्तिकार रा.वी.सुतार द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आदमकद प्रतिमा गढ़कर दी थी। बाद में इसके भुगतान को लेकर उपजे विवाद में सुतार ने इसे मुफ्त में ही अथारिटी को सोंप दिया था। इस प्रतिमा को लगाने के लिए गोलचक्कर का चयन किया गया था, किन्तु वह प्रतिमा के हिसाब से उचित प्रतीत नहीं हुआ। इसके बाद अथारिटी ने वह प्रतिमा दिल्ली पब्लिक स्कूल के सेक्टर 30 स्थित परिसर में रखवा दी थी। कितने आश्चर्य की बात है कि आधी लंगोटी पहनकर ब्रितानी शासकों के दांत अहिंसा के बल पर खट्टे कराने वाले बापू की प्रतिमा को लगाने के लिए बारह सालों में कोई जगह नहीं मिल सकी है। एसा नहीं है कि इन बारह सालों में नोएडा में किसी की प्रतिमा की स्थापना न की गई हो। हद तो तब हो गई जब कांग्रेसी मानसिकता वाले डीपीएस के संचालकों सहित कोई भी कांग्रेस 02 अक्टूबर को इस प्रतिमा पर दो फूल अर्पित करने नहीं पहुंचा।


प्रजा अंधकार में जनसेवक का घर रोशन!


बिजली विभाग के घाटे में जाने और बिजली चोरी रोकने की गरज से मध्य प्रदेश सरकार ने एक फरमान निकला था कि जिस भी गांव में बिजली के बिल की अदायगी न की गई वहां की बिजली काट दी जाएगी। विद्युत मण्डल ने इस योजना को अमली जामा भी पहनाया। सूबे के दमोह जिले की हटा तहसील के एक गांव में अद्भुत नजारा दृष्टव्य हुआ। सूबे के कृषि मंत्री डॉ.राम कृष्ण कुसमरिया के गृह गांव सकौर में आठ लाख रूपए के बिजली के बिल की अदायगी न किए जाने पर बिजली विभाग द्वारा अंधेरा कर दिया गया। पर चूंकि यहां सूबे के एक कबीना मंत्री भी रहते हैं, सो बिजली विभाग ने एक ट्रांसफारमर लगाकर मंत्री के घर को रोशन कर दिया है। केंद्रीय विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा एवं विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर के होटल बिलों की भांति ही कुसमरिया का कहना है कि यह उन्होंने अपने निजी खर्च पर लगवाया है। जनाब कुसमरिया भी शायद भूल रहे हैं कि जनसेवक का काम मां की तरह होता है, जो पहले अपने बच्चों का पेट भरती है, फिर खुद अपनी क्षुदा शांत करती है। इस लिहाज से कुसमरिया को पहले प्रजा का ख्याल रखना चाहिए था, वस्तुत: जो उन्होंने नहीं किया।


उड़नखटोले ने डाला मंत्रियों को संकट में


अपना रूतबा और विलासिता दर्शाने के लिए उड़न खटोलों से सैर करना जन सेवकों का पुराना शगल रहा है। अपनी इन आदतों के चलते नेता मंत्री सदा ही चर्चाओं में रहे हैं। हाल ही में उत्तराखण्ड सरकार के मंत्रियों और नेताओं के उड़ने पर महालेखाकार नियंत्रक (एजी) ने गहरी आपत्ति की है। सरकार का कहना है कि उसने इसमें महज 17 करोड़ की राशि ही व्यय की है, किन्तु एजी का कहना है कि इसमें 50 करोड़ से अधिक की राशि का खर्च अनुमानित है। इतना ही नहीं आडीटर जनरल का कहना है कि सरकार द्वारा सौंपी सूची, एयर ट्रेफिक कंट्रोल (एटीसी) को सोंपी सूची एवं आरटीआई के तहत सौंपी गई सूची में बहुत ज्यादा अंतर है। इसमें गंतव्य भी परिवर्तित प्रतीत हो रहे हैं। सरकार भी बेचारी क्या करे। मंत्रिमण्डल में न शामिल किए गए अपने बड़े आकाओं जिनके इशारे पर सरकारें बनती और गिरती हैं, को खुश करने और उनकी हवाई यात्रा के प्रबंधन के लिए किसी भी मंत्री के नाम पर हवाई जहाज को किराए पर लिया जो जाता है। अब यह अलग बात है कि जिस दिन की यात्रा दर्शाई गई हो उस दिन उसी मंत्री ने दर्शाई यात्रा से सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी कार्यक्रम में भाग लिया हो। सच ही है इसे देखने ओर सुनने वाला कोई नहीं है।



एम को एम से दूर करने की कवायद


राजनीति हो या रूपहला पर्दा या कोई और जनहित का कार्य करने वाला शक्स, हर किसी को मीडिया की दरकार होती ही है। मीडिया से संबंध अच्छे रहें तो उसकी छवि भी कमोबेश अच्छी ही बनी रहती है (यह बात आज के परिवेश के मीडिया पर लागू होती है, वरना पहले तो मीडिया सिर्फ सच को ही उजागर किया करता था)। स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव के गुर्गों द्वारा नई रेल मंत्री ममता बनर्जी (एम) को मीडिया (एम) से दूर करने का ताना बाना बुना जा रहा है। मीडिया को खुश करने के लिए ममता ने पत्रकारों और उनके परिजनों को आसान और आरामदायक रेल यात्रा की योजनाएं लागू कर दी हैं। वहीं दूसरी ओर इन योजनाओं में पलीता लगाया जा रहा है। कुछ दिनों पहले रेल विभाग का एक बयान आया था कि 15 अक्टूबर के उपरांत रेल ट्रेवल कूपन (आरटीसी) पर टिकिट नहीं मिलेगी, पत्रकारों के लिए क्रेडिट कार्ड बनवाए जा रहे हैं। कई सूबों में इस योजना का अता पता ही नहीं है। इसके अलावा पत्रकारों के लिए आरक्षण की खास व्यवस्था को भी तहस नहस कर दिया गया है। मीडिया बिरादरी में ममता बनर्जी के प्रति आक्रोश के बीज अंकुरित होने लगे हैं। ममता शायद इससे अनजान हैं, किन्तु लालू के चहेते कारिंदे इसमें खाद पानी देने का काम बदस्तूर कर रहे हैं।

बधाई के साथ ही नसीहत की भी दरकार


भारत की बेटी युगरल श्रीवास्तव ने संयुक्त राष्ट्र में जाकर समूचे विश्व को जलवायू परिवर्तन के बारे में समझाईश दी, जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। ग्लोबल वार्मिंग से अब शायद कोई अछूता और अनजान होगा। बात वही है कि सिगरेट से होने वाले नुकसान के संबंध में लेख अवश्य पढ़ा जाता है, किन्तु अंगुलियों में सिगरेट कबाकर कश लेते हुए। हम जानते हैं कि धरती का तापमान बढ़ रहा है, कार्बन डाई आक्साईड का ज्यादा मात्रा में उत्सर्जन, वृक्षों को काटकर उस पर कांक्रीट जंगलों का निर्माण, प्लास्टिक का उपयोग यह सब किसी ओर के लिए नहीं हमारे लिए ही हानीकारक है। आज विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए कौन सी विरासत छोड़ने जा रहे हैं। देश में कमोबेश हर सूबे में प्लास्टिक के बेग को प्रतिबंधित कर दिया गया है, पर आज केंद्र और राज्य सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही इनका उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। कचरों के ढेरों से प्लास्टिक उड़ उड़कर इधर उधर फैल रही है। छोटे शहरों में तो कचराघरों के आसपास पेड़ों पर झूलती प्लास्टिक देखकर लगता है मानो वह प्लास्टिक का पेड़ हो। केंद्र, राज्य सरकारों सहित समूचे देशवासियों को चाहिए कि युगरल को बधाई अवश्य दें पर उसकी बात से नसीहत लेकर धरती के तापमान को कम करने की दिशा में पहल अवश्य करें।


चर्चा में रहा तीरथ का विज्ञापन

भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग का एक विज्ञापन पिछले दिनों चर्चा का विषय बना रहा। यूपीए चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया गांधी, वजीरेआला डॉ.एम.एम.सिंह महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री कृष्णा तीरथ और बापू के छायाचित्रों से सजे एक पेज के रंगीन इस विज्ञापन में ``महिलाओं के खिलाफ हिंसा निवारण के लिए राष्ट्रीय अभियान का शुभारंभ, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर 2009 एवं हिंसा रहित भारत, अन्याय रहित जिन्दगी`` के अलावा सारी इबारत अंग्ल भाषा में ही थी। तीरथ का विभाग शायद यह भूल गया कि हरिजन कालोनी, हरिजन सेवक कल्याणसंघ, आदि स्थानों पर आयोजित इन कार्यक्रमों में शामिल होने वाले लोगों में अंग्रेजी भाषा के जानकार बहुत ही कम थे। फिर बापू ने ही कहा था कि राष्ट्रभाषा हिन्दी ही भारत को एक सूत्र में पिरो सकती है। हिन्दी भाषी दिल्ली की रहने वाली महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री तीरथ का अंग्रेजी प्रेम लोगों के बीच चर्चा का विषय न बनता तो और क्या बनता।


कांग्रेस ही कांग्रेस की दुश्मन


हरियाण में होने वाले विधानसभा चुनावों में अब कांग्रेस बनाम कांग्रेस की स्थिति निर्मित होती जा रही है। कांग्रेस के अंदरखाते में चल रही इस जंग से भले ही उपरी पायदान के राजनेताओं का राजनेतिक ग्राफ बढ़ रहा हो पर यह सच है कि जमीनी तौर पर कांग्रेस रसातल की ओर बढ़ती दिख रही है। हालात देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि सूबे में कांग्रेस के लिए यह लड़ाई बहुत ही मंहगी साबित हो सकती है। राज्य में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत, केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा, राज्य के वित्त मंत्री वीरेंद्र डूमर खान और वन मंत्री किरण चौधरी आपस में भले ही एकता का प्रदर्शन करें, किन्तु अंदर ही अंदर तलवारें भांज रहे हैं। चूंकि हरियाणा से दिल्ली का रास्ता बहुत लंबा नहीं है, इसलिए सभी क्षत्रप अपने अपने आकाओं को साधने में भी सफल हो पा रहे हैं। जिस भी नेता को जहां भी मौका मिल रहा है वह अपने प्रतिद्वंदी के खिलाफ विषवमन से नहीं चूक रहा है। दिल्ली में सोनिया के निज सचिव विसेंट जार्ज, राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल, राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू राजा दिग्विजय सिंह, राहुल गांधी के सचिव कनिष्का सिंह के दरबार में उमड़ती भीड़ को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूबे की राजनीति का रिमोट कहीं न कहीं दिल्ली में ही है।


इस सादगी को सलाम!


एक ओर केंद्र सरकार के साथ कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी सादगी का प्रहसन कर पाई पाई बचाने की जुगत लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार की बदइंतजमी के चलते लगभग दस लाख टन अनाज सड़ गया। कोलकता के बंदरगाह में गोदामों में विदेशों से आयात किया गया अनाज और अन्य सामग्री या तो सड़ गई या चूहों कीट पतंगों की भेंट चढ़ गई। मजे की बात तो यह है कि यह सब कुछ केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच सामंजस्य न होने से हुआ है। दरअसल स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन कार्यरत सेंट्रल फुड लेबोरेटरी द्वारा विदेशों से आयतित खाद्य सामग्री का परीक्षण कर उसे मानव उपयोग के लिए उचित बताते हुए प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। दोनों ही मंत्रालयों के बीच तालमेल के अभाव के चलते लाखों टन अनाज बंदगाह पर ही पड़ा बरसात में सड़ता रहा। केंद्र सरकार के मितव्ययता कि ढोंग कर पाई पाई बचाने और उनके ही अधीन कार्यरत मंत्रालयों द्वारा करोड़ों रूपयों के अनाज को सड़ा देना आखिर क्या साबित करता है। इस तरह की सादगी को सलाम ही कहा जाए तो बेहतर होगा।


वसुंधरा से डरी हुई है भाजपा


जसवंत सिंह के मामले में अपनी किरकिरी करा चुकी भारतीय जनता पार्टी अब राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे पर कठोर कार्यवाही करने से हिचक रही है। भाजपा को डर है कि अगर उसने सख्ती की और वसुंधरा ने अपना त्यागपत्र नहीं दिया तो उसकी स्थिति दुविधाजनक हो जाएगी। पहले ही जसवंत सिंह द्वारा लोकसभा की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र न दिए जाने से भाजपा बेकफुट में दिखाई दे रही हैं। उधर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर यह दबाव बढ़ता जा रहा है कि एक बार वसुंधरा के त्यागपत्र की घोषणा होने के बाद अगर ज्यादा समय बीता तो पार्टी में असंतुष्ट मुंह खोलने लगेंगे। इस्तीफा प्रकरण न सुलटने के कारण राजस्थान के दो विधायकों राजेंद्र राठोड़ और ज्ञानदेव आहूजा के निलंबन पर भी विचार नहीं हो पा रहा है। राजनथ भी चाह रहे हैं कि चला चली की बेला में विवादित होने के बजाए अब विवादित मामलों में चुप्पी साधकर अपना एक दो माह का समय काट ही लिया जाए।




अब दत्त परिवार के राजनैतिक तौर पर बंटने की खबरें

राजनीति में परिवारों का अलग अलग विचारधाराओं का होना नई बात नहीं है। देश के अनेक घरानों के सदस्य अलग अलग विचारधारा वाले राजनैतिक दलों की नुमाईंदगी करते नजर आते हैं। नेहरू गांधी खानदान में ही सोनिया और राहुल कांग्रेस की अगुआई कर रहे हैं तो मेनका और वरूण भाजपाई विचारधारा के पोषक हैं। ज्योतिरादित्य और वसुंधरा, यशोधरा भी परस्पर विरोधी दलों में हैं। अब फििल्मस्तान का दत्त परिवार भी इसी राह पर चल पड़ा है। मुंबई में बांद्रा पश्चिम की सीट पर बाबा सिद्दकी को जिताने के लिए संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त ने कमर कस ली है तो संजू बाबा समाजवादी उम्मीदवार रिजवान सिद्दकी को जिताने की जद्दोजहद में व्यस्त हैं। चर्चा यह है कि परस्पर विरोधी विचारधारा वाले राजनैतिक दलों में प्रवेश कर ये अपनी निष्ठा और विचारधारा का पोषण कर रहे हैं या फिर अपने निहित स्वार्थों को सिद्ध करने का उपक्रम कर रहे हैं।


कमजोर रही है हरियाणा में महिलाओं की स्थिति

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक हुए 10 विधानसभा चुनावों में महज 60 महिलाएं ही विधायक बन सकीं हैं। यह आंकड़ा सूबे में राजनैतिक तौर पर महिलाअों की कमजोर भागीदारी को दर्शाने के लिए पर्याप्त कहा जा सकता है। इनमें से 56 महिलाएं विधानसभा और 4 ने उपचुनावों में परचम लहयारा है। वर्तमान में सूबे में 90 सीटों में 67 महिलाएं ही मैदान में हैं। वर्तमान में किरण चौधरी और सुमिता सिंह तोशाम और करनाल से दूसरी बार किस्मत आजमा रहीं हैं। आर्थिक तौर पर समृद्ध समझे जाने वाले हरियाणा में महिलाओं की भागीदारी महज छ: फीसदी ही रही है, जबकि लगभग हर दल महिलाओं की तेंतीस फीसदी भागीदारी सुनिश्चित करने का आलाप रागता आया है। राजनैतिक दलों की कथनी और करनी में फर्क इसी बात से साफ हो जाता है।


लोहपुरूष को आड़े हाथों लिया चोटाला ने

इंडियान नेशलन लोकदल के सुप्रीमो और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने भाजपा के कथित लोह पुरूष लाल कृष्ण आड़वाणी पर वार आरंभ कर दिया है। लोकसभा चुनावों में पार्टी की दुगर्ति के लिए उन्होंने सीधे सीधे तौर पर एल.के.आड़वाणी को जवाबदार ठहराया है। चोटाला का कहना है कि सक्रिय राजनीति से सन्यास की बात सोचने वाले आड़वाणी अगर चार साल पहले सन्यास ले लेते तो देश में भाजपा और हरियाणा में इनेलो का सत्यानाश होने से बच जाता। कल तक भाजपा की गलबहिंया करते और आड़वाणी के स्तुतिगान करने वाले इंनेलो के नेताओं की इस तरह की पल्टी से सभी चकित हैं। लगता है चोटाला को समझ में आ गया है कि भाजपा को कोसने से ही सूबे में उन्हें लाभ हो सकता है, सो उन्होंने आड़वाणी के खिलाफ अपनी तलवार पजाना आरंभ कर दिया है। चौटाला को कौन समझाए कि कौओं के कोसे ढोर नहीं मरते।

पुच्छल तारा


स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती और उनकी पुण्य तिथि पर देश भक्ति के भूले बिसरे गीत बजते हैं, वो भी महज अपरान्ह 12 बजे तक। आज की युवा पीढ़ी राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी को शायद भूलती ही जा रही है। तरूणाई की जुबां पर गांधी नेहरू के नाम पर अब महज तीन नाम ही बचे हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और वरूण गांधी। प्रियंका भी युवाओं में लोकप्रिय हैं, पर शादी के बाद वे गांधी से वढ़ेरा हो गईं हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में एक कन्फयूजन पर दिन भर लोग ठहाके लगाते रहे। हुआ दरअसल यूं कि एक धवल खद्दरधारी युवा नेता सुबह सवेरे कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) और 12 तुगलक लेन (राहुल गांधी का सरकारी आवास) पर जाकर वहां के नांदियों (सोनिया और राहुल के गण) को गांधी जयंती की शुभकामनाएं दे आए। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि दरअसल जयंती तो महात्मा गांधी की थी। फिर क्या था ``लगे रहो मुन्ना भाई`` की तर्ज पर उनके मुंह से बेसख्ता निकल गया -``गांधी. . . कौन गांधी . . .सोनिया, . . . राहुल . . . या. . . और वो पुराने वाले . . . भूले बिसरे. . . .।



शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

थुरूर के पर कतरने से कतराती कांग्रेस

थुरूर के पर कतरने से कतराती कांग्रेस

(लिमटी खरे)

किसी भी संगठन के लिए अनुशासन से बढ़कर कोई चीज नहीं होती है। इतिहास गवाह है कि गैर अनुशासित व्यक्तित्व या संगठन के धराशायी होने में समय नहीं लगता है। भाजपा में कुछ सालों से अनुशासनहीनता चरम पर रही है, यही कारण है कि अटल बिहारी बाजपेयी के परोक्ष तौर पर सक्रिय राजनीति को गुडबाय कहने के साथ ही भाजपा का सूर्य अस्ताचल की ओर जाता साफ दिखाई पड़ने लगा है।


सवा सौ साल पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में अनुशासनहीनता के किस्सों की कमी नहीं है। जैसे ही अनुशासन का क्रम टूटता है, वैसे ही इसके प्रभाव भी दिखाई पड़ने लगते हैं। कांग्रेस न जाने कितनी बार विभाजित हो चुकी है। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस ई का गठन किया था, जो अब तक कायम है।


हाल ही में विदेशी राजनयिक से जनसेवक और मंत्री बने विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर ने सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर अपनी टिप्पणियां करके अपने आप को विवादित कर लिया है। कभी कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से व्यवसायिक राजधानी मुंबई तक की गई इकानामी क्लास की यात्रा के उपरांत इसे मवेशी दर्जा की संज्ञा, कभी काम का बोझ, तो कभी कुछ ओर।


हाल ही में उस वेव साईट पर अपने प्रशंसकों के सवालों के जवाब में थुरूर ने यह कहकर नई बहस को जन्म दे दिया है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म दिवस जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है पर अवकाश का क्या ओचित्य हैर्षोर्षो


सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर टिप्पणियां करते हुए थुरूर देश के जिम्मेदार मंत्री कम, अलबत्ता वे वालीवुड के सिने स्टार की भूमिका में ज्यादा नजर आ रहे हैं। या यूं कहा जाए कि थुरूर के सर चढ़े इंटरनेट और सोशल नेटविर्कंग वेव साईट के नशे ने उन्हें हाई स्कूल के छात्र की भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया है।


शशि थुरूर स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं, उन्हें अपनी बात कहने या रखने का पूरा अधिकार है, किन्तु वे शायद यह भूल रहे हैं कि इस वक्त वे भारत गणराज्य के एक जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री हैं। राजनैतिक दलों का इतिहास रहा है कि अगर किसी भी राजनेता को अपनी राय व्यक्त करनी हो तो उसके लिए पार्टी मंच से मुफीद और कोई जगह नहीं रही है।


यह सब होने के बाद थुरूर द्वारा अपने विचारों का सार्वजनिक किया जाना ओचित्य से परे ही नजर आता है। साधारण कार्यकर्ताओं द्वारा गलत सलत अनर्गल बयानबाजी पर अनुशासन का कोडा चलाने वाली कांग्रेस पार्टी अपने ही केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर की जबान पर लगाम लगाने का साहस क्यों नहीं कर पा रही है, यह यक्ष प्रश्न जनता जनार्दन के मानस पटल पर घुमड़ना स्वाभाविक ही है।


थुरूर का कहना है कि हाल ही में वियतनाम के उपराष्ट्राध्यक्ष अंगुएन थि डोन जब भारत आए थे, तब भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने डोन के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था, इसमें डोन ने कहा था कि वियतनाम में हो ची मिन्ह के जन्म दिवस पर अवकाश न होकर विर्कंग डे है, एवं वहां के लोगों से उम्मीद की जाती है कि उस दिन उनके सम्मान में वे ज्यादा मेहनत करें।


थुरूर का उदहारण विचारणीय हो सकता है, किन्तु सोशल नेटविर्कंग वेव साईट को उचित मंच नहीं माना जा सकता है। अगर वाकई थुरूर इस तरह का उपक्रम भारत गणराज्य में करना चाह रहे हों तो बेहतर होता वे अपनी बात को कांग्रेस पार्टी के मंच पर या केबनेट (मंत्रीमण्डल की बैठक) में रखते। इस तरह किसी सोशल नेटविर्कंग का सहारा लेकर बयानबाजी करने से लगने लगा है कि मनमोहन सिंह की पकड़ उनके मंत्रीमण्डल के सहयोगियों पर पहले से कमजोर ही हुई है।


थुरूर को कांग्रेस सुप्रीमो इस तरह के कृत्य न करने के लिए समझाईश भी दे चुकी हैं। बावजूद इसके अगर थुरूर की उच्चश्रंखलता जारी है, तो इससे साफ है कि वे प्रधानमंत्री और कंाग्रेस अध्यक्ष को ठेंगे पर ही रख रहे हैं। थुरूर का मानना है कि बापू का कहा था, ``काम ही पूजा है``। वे शायद भूल रहे हैं कि उनका मूल काम विदेश विभाग की सेवा है, न कि लोगों (कथित प्रशंसकों) के जवाब देना।


लगता तो यह भी है कि इंटरनेट लनेZट, कंप्यूटर फ्रेंडली (नेट और कंप्यूटर के जानकार) थुरूर इस तरह के काम करके अपने सहयोगियों पर धाक जमाने का भी कुित्सत प्रयास कर रहे हैं। और भी मंत्री होंगे जिनसे उनके चाहने वाले पत्राचार करते होंगे, किन्तु उस पत्राचार के मजमून की जानकारी चंद लोगों के बीच तक ही सीमित रहती होगी। इंटरनेट पर सब कुछ दिखता है, थुरूर जी।


कांग्रेस द्वारा अगर अपने इस तरह के उच्चश्रंखल और बड़बोले मंत्री पर लगाम नहीं लगाई तो आने वाले दिनों में कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में खडा होना पड़ सकता है। वैसे भी थुरूर का ज्यादा समय विदेशों में ही बीता है, और वे शायद यह नहीं जानते कि बापू की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश उनके विचारों और सिद्धांतों को समर्पित है।

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पवार और कांग्रेस की गले की फांस बनेगा विदर्भ का सूखा

सरकार बनाने में मुख्य भूमिका निभाएगा विदर्भ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए विदर्भ में खासी मशक्कत का सामना करना पड़ सकता है। इस साल अपेक्षा से कम हुई बारिश से उपजी परिस्थितियों ने मतदाताओं का राकांपा और कांग्रेस से मोहभंग करवा दिया है।


गौरतलब होगा कि वर्तमान में सूबे में राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार सत्ता पर काबिज है। दूसरी ओर केंद्र में भी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन दूसरी बार अस्तित्व में आया है। केंद्रीय कृषि मंत्री का महत्वपूर्ण दायित्व राकांपा सुप्रीमो शरद पंवार के कांधों पर है।


प्राप्त जानकारी के अनुसार विदर्भ में संतरा पट्टी से लेकर कपास पट्टी तक किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। महराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर के इर्दगिर्द अकोला, रामटेक, वर्धा, यवतमाल, भंडारा, गोंदिया आदि एक दर्जन से अधिक तालुकों में किसानों की आर्थिक स्थिति दयनीय होने से वे आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाने पर मजबूर हैं।


गौरतलब होगा कि पिछले साल क्षेत्र में बारह सौ कपास उत्पादक किसान अर्थिक संकट के दौर से गुजरकर आत्महत्या कर चुके हैं। भले ही केंद्र सरकार कर्ज माफी की योजना पर अपनी पीठ थपथपा रही हो पर जमीनी हकीकत कुछ और बयां कर रही है।


वैसे भी विदर्भ में मेहान परियोजना (मल्टी मोडल इंटरनेशनल हब एंड एयरपोर्ट) लगभग पंद्रह हजार एकड़ जमीन को निगल चुकी है। मेहान वेसे भी महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट कंपनी द्वारा पैदा की गई संस्था है। पूंजीपतियों से सांठगांठ के चलते यहां कि किसानों की उपजाउ जमीन जिस पर वे साल भर में तीन फसल लिया करते थे, को भी धनाड्य व्यापारियों को सौंपने की खबरें हैं।


समूचे विदर्भ और उससे सटे मध्य प्रदेश के इलाकों में रियल स्टेट के कारोबारियों की नजरें इनायत होने लगी हैं। इस इलाके में किसानों की उपजाउ जमीन खरीदकर किसानों को उनके मूल व्यवसाय से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। महानगरों के रियल स्टेट व्यवायियों ने यहां की एक एक इंच उपजाउ भूमि को खरीदकर उसे व्यवसायिक उपयोग में लाने की तैयारी की जा रही है।


नागपुर में कार्गो हब और ड्राय पोर्ट प्रस्तावित है, जिससे पूंजिपतियों ने पिछले एक दशक में यहां अपनी आमद दे दी है। जमीनों के बदले मिलने वाले पैसे किसानों द्वारा खर्च किए जा चुके हैं, अब उनके पास खाने के बांदे साफ नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर केंद्र और प्रदेश में कांग्रेसनीत सरकार तथा महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए भी शरद पंवार द्वारा किसानों के लिए कुछ न किया जाना इस बार विधानसभा चुनाव में राकांपा और कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल से कम नहीं होगा।


पाक और भारत के बीच नजीर बना मैच

एडविन युवा एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो खेल से संबधित विषयों पर अपना ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर रहे हैं।


पाक और भारत के बीच नजीर बना मैच



(एडविन)


भारत और पाकिस्तान के इतिहास को अगर खंगाला जाए, तो भी ये नजीर ढूंढने से नहीं मिलेगी कि भारत के एक अरब लोगों ने अपने कट्टर विरोधी के जीतने की दुआ मांगी हो, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हो रही आईसीसी चैंपियंस ट्राफी के दौरान सेंचुरियन मैच में ये अनोखा नजारा देखने को मिला । वैसे हम ये दुआ पड़ोसी होने के नाते नहीं बल्कि आईसीसी चैंपियंस ट्राफी में अपनी टीम के सेमीफाइनल में पहुंचने की बची आखिरी उम्मीद को जिंदा रखने के मकसद से कर रहे थे।


लेकिन अफसोस रहा कि बदकिस्मती से पाकिस्तान टीम ऑस्ट्रेलिया से आखिरी गेंद पर मैच दो विकेट से हार गया और इस तरह भारत को लगातार दूसरी बार आईसीसी टूर्नामेंट में पहले दौर में ही बाहर का रास्ता अिख्तयार करना पड़ा । बहरहाल अगर इस पूरे वाक्ये को गौर से देखा जाए तो कई तरह से न सिर्फ अनोखा था बल्कि दोनों मुल्क के लिए एक मिसाल बनकर भी सामने आया।


मसलन परमाणु बमों से लैस इन दोनों शक्तिशाली मुल्कों के आपसी रिश्ते कभी भी अच्छे नहीं रहे है । बंटवारे के बाद से अब तक ये दोनों मुल्क तीन बार एक दूसरे को जंग में आजमा चुके हैं जिसकी वजह से दोनों के बीच दूरियों की ऐसी खाई बन चुकी है जिसके कम होने की गुंजाईश दूर दूर तक नजर नहीं आती है । ऐसा भी नहीं है कि इन मुद्दों पर बात न की गई हो या बात करने की कोशिश न की गई हो।


कई बार बातचीत के जरीए तमाम गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की गई लेकिन दोनों ओर से कई मसलों पर पिछे न हटने की वजह से हर बार मुलाकातों का नतीजा सिफर ही रहा है । लेकिन 60 गज के मैदान पर होने वाले इस खेल ने इन 60 सालों में न जाने कितनी बार दोनों और अमन कायम करने की पाक साफ कोशिश की है मगर बावजूद इसके सियासी हुक्मरानों ने इसकी आड़ में अपनी सियासी रोटियां सेंककर दोनों मुल्कों की आपसी दुश्मनी को हवा देने का ही काम किया है।


वहीं क्रिकेट जैसे खेल ने बारम्बार हमें करीब आने का मौका दिया है । अगर इतिहास के पन्नों को खोलकर देखें तो हमें ऐसे बहुत सारे किस्से मिलेंगे जो वाकई हमें सुकून का एहसास करा सकें । 1989 में पाकिस्तान दौरे पर गई भारतीय टीम को और पूरी दुनिया की क्रिकेट को सचिन तेंदुलकर की शक्ल में बल्ले का वो नायाब हीरा मिला है जिस पर जितना नाज किया जाए वो कम ही नजर आता है।


दुनिया इस छोटे कद के बड़े खिलाड़ी के जौहर की कायल हो गई है । तो वहीं मेजबान पाकिस्तान को भी इस दौरे से वसीम अकरम और वकार यूनुस जैसे बेहद काबिल गेंदबाज मिले जिन्होने सालों तक बल्लेबाजों पर अपनी गेंदों का खौफ बनाए रखा । इसके बाद दोनों देश ने काफी वक्त तक एक दूसरे के मुल्क में कोई मैच नहीं खेला।


लेकिन इस दौरान गैर मुल्कों में जरूर टीमों ने इक्का दुक्का बार एक दूसरे का सामने किया । एक दशक से भी ज्यादा वक्त के बाद काफी वक्त के बाद सौरव गांगुली की कप्तानी में टीम एक बार फिर पाकिस्तानी सरजमीं पर पहुंची । भारतीय टीम ने बेहद शानदार क्रिकेट खेलते हुए मेजबान पाकस्तिान को वनडे और टेस्ट दोनों सिरीज में हराकर उम्दा क्रिकेट का मुजाहिरा पेश किया तो वहीं पाकिस्तान ने बेहतरीन मेजबानी करके हमारे मुल्क का दिल जीत लिया।


इसके बाद अगले दौरे पर भारतीय टीम के सलामी बल्लेबाज विरेंद्र सहवाग ने भारत की ओर से टेस्ट मैचों के इतिहास में मुल्तान में पहला तीहरा शतक जड़कर मुल्क को एक बड़ी सौगात से नवाजा था । कोटला में कुबले के एक ही पारी सभी दस विकेट लेने के कारनामे को भूल सकता है । इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि हर बार एक दूसरे मुल्क का दौरा करके दोनों ही मुल्कों को और दोनों ही मुल्कों की क्रिकेट को बेहद फायदा हुआ है।


अगर इस खेल पर सियासत होना बन्द हो जाए तो ये दोनों ही मुल्को के लिए और दोनों ही मुल्कों की क्रिकेट के लिए बेहद अच्छा रहेगा । हाल फिलहाल में चल रही चैंपियंस ट्राफी में भारत का पहला मैच पाकिस्तान के साथ था जिसे भारत 54 रनों से हार गया इसके बाद भारत का अगला मैच जो चैंपियन ऑस्ट्रेलिया के साथ बारिश की वजह से रद्द कर दिया इस लिए भारत और कंगारूं टीम को एक एक अंक बांटना पड़ा।


इसके बाद हालात ये बने कि अगर भारत वेस्टइंडीज को बड़े अंतर से हरा दे और उधर पाकिस्तान कंगारूं टीम को शिकस्त दे दे तो भारतीय टीम सेमीफाइनल में जगह बनाने में कामयाब हो सकती लेकिन पाकिस्तानी टीम बेहद रोमांचक मुकाबले में हार गई और यहीं से भारत की बचीखुची उम्मीदें भी खत्म हो गई । इसी मैच से एक दिन पहले पूर्व पाकिस्तानी कप्तान रमीज राजा ने कहा था कि यह बेहद रोमांचक पल है कि करोड़ों भारतीय हाथ पाकिस्तान के जीतने की दुआ मांग रहे है । साथ ही उन्होने कहा कि देखो माहौल कितना बदल गया है।


खुदा ने दोनों मुल्कों को नजदीक आने का नायाब मौका इनायत किया है । वाकई रमीज राजा की ये बात सोलह आने सच है कि ऐसा मौका खुदा की मर्जी से ही आ सकता है जो दोनों मुल्को के दरम्यां इस कड़वाहट को 22 गज की पिच के जरिए खत्म कराना चाहता है । क्रिकेट खेलने और देखने वाले लोग भी यही मशवरा देते हैं कि क्रिकेट के बहाने कई मसलों को आसानी के साथ सुलझाया जा सकता है।


क्रिकेट से बेपनाह मुहब्बत करने वाले दोनों मुल्कों के बीच क्रिकेट जारी रखवाना चाहते है क्योंकि क्रिकेट दोनों मुल्कों की आवाम को एक दूसरे के नजदीक लाने में काफी बड़ा रोल निभाता रहा है । फिलहाल दोनों मुल्कों के दरम्यां क्रिकेट को जारी रखने फैसला दोनों मुल्कों की सरकारों के हाथ में है जो मैदान क इन 11 - 11 अमन के फरिश्तों पर भरोसा करके क्रिकेट को मैदान पर बदस्तूर जारी रहने दे।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

आधी धोती वाले की याद में 11 लाख का पेन!

आधी धोती वाले की याद में 11 लाख का पेन!

(लिमटी खरे)


शरीर पर महज आधी धोती लपेटने वाले मोहन दास करम चंद गांधी जिसकी सादगी, साफगोई, अहिंसा, कंउसूलपरस्ती के आगे वह ब्रितानी सरकार नतमस्तक हुई थी, जिसके बारे में कहा जाता था, कि अंग्रेजों की सल्तनत में कभी सूरज नहीं डूबता। विडम्बना से कम नहीं है कि उसकी सादगी का सरेआम माखौल उड़ाते हुए एक फिरंगी कंपनी ने 11 लाख 39 हजार रूपए के सोने के फाउंटेन पेन (स्याही वाला पेन) बाजार में उतार दिया है।

यह निंदनीय है कि बापू के जन्मदिवस के एक दिन पहले लांच किए गए इस पेन को महात्मा गांधी की डांडी यात्रा से जोड़ दिया गया है। कंपनी ने लगभग साढ़े ग्यारह लाख के 241 पेन को ``महात्मा गांधी लिमिटेड एडीशन - 241`` एवं सस्ती दरों वाले एक लाख 67 हजार के 3000 पेन भी बाजार में उतारे हैं।

देश को आजाद कराने में अपनी महती भूमिका अदा करने वाले साबरमती के संत के नाम का भौंड़ा प्रदर्शन देश में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के गवाह बने ताज होटल में किया गया, जिसमें उनके प्रपोत्र तुषार गांधी को बुलाकर इस आयोजन को प्रासंगिक बनाने का कुित्सत प्रयास किया गया।

तुषार गांधी इस आयोजन में क्यों गए इस बात को वे ही बेहतर जानते होंगे, हमारे मतानुसार सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी के नाम पर इस तरह विलासिता का बाजार लगाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। लग तो यही रहा है कि उक्त कंपनी ने बापू के नाम पर इस पेन को बेचने के लिए उनके वारिसान का इस्तेमाल किया है, जो अनुचित ही है।

यह बात उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात, कि बापू ने आज के राजनेताओं की तरह सादगी का प्रहसन नहीं किया था। बापू ने सादगी दिखावे के लिए नहीं अपनाई थी। बापू जब वायसराय लार्ड इरविन से मिले थे तब उनकी एक लंगोटी को देखकर चर्चिल ने उन्हें ``अधनंगा फकीर`` की उपाधि तक दे डाली थी। इन सब तानों से बापू कभी व्यथित नहीं हुए।

आज बापू किसी परिवार विशेष की संपत्ति नहीं हैं। मोहन दास करमचंद गांधी को समूचा देश राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित करता है। देश की मुद्रा पर भी बापू की ही मुस्कुराती तस्वीर है। आम भारतीय बापू का नाम बड़ी ही श्रृद्धा के साथ लेता है। भारत सरकार को चाहिए कि इस कदम का विरोध कर भारत में बापू के नाम पर लाखों के पेन की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाए।

बापू को ब्रांडनेम के तौर पर इस्तेमाल करना हमारे लिए असहनीय ही है। वैसे तो अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, रानी मुखर्जी, काजोल अपने आप में एक ब्रेंडनेम बन चुके हैं। इन चेहरों का व्यवसायिक इस्तेमाल कर उत्पादक अपने उत्पदों को अधिक से अधिक बेचकर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना चाहता है।

किन्तु जब बात बापू की आती है तो बापू के नाम का व्यवसायिक उपयोग आसानी से पचाने वाली बात नहीं है। बापू के नाम को देश के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की नियत से खादी ग्रामोद्योग भंडार, गांधी आश्रम, हस्तशिल्प आदि में सरकारी तौर पर बापू के नाम का उपयोग किया जाना समझ में आता है, पर जब बात डेढ़ लाख से साढ़े ग्यारह लाख के स्याही वाले पेन की हो तब तो विचार करना अत्यावश्यक ही है।

ग्राम स्वराज का नारा बुलंद करने के साथ ही बापू ने विदेशी वस्तुओं का परित्याग कर स्वदेशी अपनाने की मुहिम चलाई थी। बापू खुद ही सूत कातकर कपड़ा बुनना जानते थे। बापू की सादगी का आलम यह था कि वे अपना संडास भी खुद ही साफ करने में विश्वास रखते थे।

इस मामले में केंद्र सरकार से कुछ उम्मीद करना बेमानी ही होगा क्योंकि जिस बापू ने कहा था राष्ट्रभाषा हिन्दी ही समूचे देश को एक सूत्र में पिरो सकती है, उसी केंद्र सरकार के महिला बाल विकास विभाग द्वारा ``हिंसा रहित भारत अन्याय रहित जिंदगी`` शीर्षक से जारी विज्ञापन में सत्तर फीसदी इबारत अंग्रेजी भाषा में ही लिखी हुई है।

गौरतलब होगा बापू के जन्म दिन पर यह विज्ञापन जारी किया गया है, बापू को समूचा विश्व इतना सम्मान देता है कि उनकी याद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 02 अक्टूबर को अहिंसा दिवस मनाया जाने लगा है।

सादगी और संयम की मिसाल बन चके महात्मा गांधी आज अगर जिंदा होते तो क्या वे इस सोने के पेन से लिखने का उपक्रम करते, जाहिर है नहीं। फिर भारत सरकार किसी विदेशी कंपनी को लाखों की कीमत वाले पेन के व्यवसायिक उपयोग के लिए बापू को ब्रांड एम्बेसेडर बनाने के अधिकार परोक्ष तौर पर जाने अनजाने कैसे दे सकती है



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जमीनी हकीकत ने फुलाए चिदंबरम के हाथ पांव

नक्सलवादियों की वास्तिविकता से गृह मंत्रालय हैरान


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नक्सलवादियों की बढ़ती तादाद ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के होश उड़ा दिए हैं। होम मिनिस्ट्री के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि अकेले छत्तीसगढ़ में ही दस हजार से ज्यादा नक्सलाईट्स मौजूद हैं। छग के नक्सल प्रभावित जिले रोजाना ही नक्सली साहित्य उगल रहे हैं, जिससे गृह मंत्रालय काफी हद तक चिंतित नजर आ रहा है।

होम मिनिस्टर के करीबी सूत्रों का कहना है कि अब तक केंद्रीय गृह मंत्रालय यह मान रहा था कि देश भर में करीब दस हजार नक्सली मौजूद हैं, किन्तु खुफिया तंत्र से प्राप्त जानकारी ने मंत्रालय के अधिकारियों की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। जानकारी में कहा गया है कि सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नक्सलियों की तादाद दस हजार के उपर है।

सूत्रों ने आगे बताया कि छापामार कार्यवाहियों में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, जगदलपुर आदि के जंगलों में बंदूक बनाने के अत्याधुनिक उपरणों की बरामदगी से मामला और संगीन हो गया है। माना जा रहा है कि अब नक्सली एके 47 और एके 56 जैसे हथियारों को भी जंगलों में ही तैयार कर रहे हैं। इससे साफ हो गया है कि नक्सली अब देशी हथियारों पर निर्भर नहीं रह गए हैं।

सूत्रों की बात पर अगर भरोसा किया जाए तो नक्सलवादी हथियारों को जमा करने के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। बंदूक, गोली और गोला बारूद को खरीदने की गरज से नक्सलवादी दुगनी तिगनी कीमतें भी अदा कर रहे हैं। सूत्रों ने स्वीकार किया कि नक्सलविरोधी केंद्रीय आपरेशन की व्यापक पब्लिसिटी का यह परिणाम है कि नक्सली अपने आप को हथियारों के मामले में और अधिक संपन्न बना रहे हैं।

अब तक दक्षिण से रसद पानी प्राप्त करने वाले नक्सलवादियों के बारे में सूत्रों ने कहा कि अब नक्सलियों के संबंध पूर्वोत्तर के अलगाववादी, आतंकवादी संगठनों से काफी गहरे हो रहे हैं। उल्फा और बोडोलेंड के संगठनों से नक्सलियों की सांठगांठ की बात भी सामने आई है। कहा जा रहा है कि इन संगठनो से नक्सलियों ने जमीन से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र, राकेट लांचर जेसी खतरनाक मशीने भी खरीदी हैं।

हाल ही में केंद्रीय सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) की बटालियनों की मध्य प्रदेश से वापसी से नक्सलवादी गतिविधियां मध्य प्रदेश में भी बढ़ने की संभावनाअों से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी मध्य प्रदेश के बालाघाट, मण्डला और डिंडोरी जिलों के जंगल इन नक्सलियों की शरण स्थली के लिए काफी हद तक मुफीद माने जाते रहे हैं। गौरतलब होगा कि पूर्व में सूबे के परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की भी उनके गृह जिले बालाघाट में इन नक्सलियों ने गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी थी।

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

सीख देने के पहले सुविधाएं तो उपलब्ध कराएं गृह मंत्री

(लिमटी खरे)

केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कुछ दिनों पहले देश की व्यवसायिक राजधानी दिल्ली के रहवासियों को सलके से रहने की सीख दी है। चिदम्बरम का कहना है कि दिल्लीवासियों को अब अंतर्राष्ट्रीय शहर के नागरिकों के मानिंद व्यवहार करना चाहिए। इसके पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री सहित अनेक राजनेताओं ने दिल्ली वासियों को अनुशासित सभ्य आचरण करने की नसीहत दी जा चुकी है।
सवाल यह उठता है कि सिर्फ सीख देने भर से क्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर का जीवन यापन सुलभ हो सकता है। निश्चित तौर पर नहीं। जब दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने की बात आती है, राजनेता बड़ी ही गर्मजोशी से इसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शहर बनाने की बात कहते हैं। कालांतर में उनकी गर्मजोशी की हवा निकल जाती है, और फिर बचा रहता है, दिल्ली का वही पुराना ढर्रा।
यह सच है कि दिनोंदिन आबादी के बोझ से दबी रहने वाली दिल्ली में लोगों में सिविक सेंस का अभाव साफ दिखाई पड़ता है। राजनेता इसकी तह में जाने के बजाए सारा का सारा दोषारोपण दिल्ली के रहवासियों पर करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने से नहीं चूकते हैं।
दिल्ली देश की राजनैतिक राजधानी है, अत: यहां रोजाना हजारों लोगों का आना जाना स्वाभाविक है। इसके अलावा बढ़ती बेरोजगारी में दिल्ली में जाकर रोजगार खोजना हर आम भारतीय का पहला सपना होता है। यही कारण है कि संपूर्ण भारत के कोने कोने से लोग यहां आकर रोजी रोजगार की तलाश करते हैं।
कानून अपनी जगह बहुत सख्त और लचीला भी है। मुश्किल तो तब आती है जब इसे अमली जामा पहनाने वाले अपने कर्तव्यों से मुंह फेर लेते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब रेहड़ियों पर खुली खा़द्य सामग्री बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया था, आज भी हालात यह है कि दिल्ली के रहवासी प्रदूषित खुला हुआ खा़द्य पदार्थ खाने पर मजबूर हैं।
इसके अलावा दिल्ली में किराएदारों का रिकार्ड पुलिस के पास होना चाहिए था। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज दिल्ली में सत्तर फीसदी से भी अधिक किराएदारों के बारे में पुलिस को जानकारी ही नहीं है। वैसे भी दिल्ली आतंकवादियों के लिए ``साफ्ट टारगेट`` बनी हुई है।
अगले साल होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों के महज दस माह पूर्व ही केंद्रीय गृह मंत्री चिदम्बरम को यह याद आया कि दुनिया भर से आने वाले खिलाड़ियों और दर्शकों के सामने देश की राजनैतिक राजधानी का कौन सा स्वरूप प्रस्तुत करने जा रही है केंद्र सरकार। अंततोगत्वा उन्होंने इस बारे में एक अपील जारी कर दिल्ली वासियों को चेता ही दिया।
हमारे सामने चीन के ओलंपिक और जर्मनी के विश्व कप फुटबाल के उदहारण मौजूद हैं, जिनके आयोजन के कई साल पहले ही वहां की सरकारों ने इनके आयोजन के शहरों में नागरिकों के व्यवहारों को मानकों के अनुरूप बनाने की कवायद आरंभ कर दी थी।
विडम्बना ही कही जाएगी कि अभी कामन वेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली के स्टेडियम और खिलाड़ियों के रूकने के स्थान ही तैयार नहीं हैं तो फिर नागरिकों के व्यवहारों के बारे में क्या कहा जाएर्षोर्षो खुद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार चुकीं हैं कि कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर वे काफी नर्वस हैं।
समाजशास्त्र में औद्योगिकरण और नगरीकरण को एक दूसरे का पूरक माना जाता है। दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है अत: यहां बाहर से आकर बसने वालों की तादाद अन्य महानगरों की तुलना में काफी अधिक है। दिल्ली के इंफ्रास्टकचर को सुधारने की बजाए अब तक नेताओं ने अपनी सेहत को ही सुधारा है।
चिदम्बरम की इस बात से नागरिकों को सीख लेकर अपने आचरण में आवश्यक सुधार लाना होगा, ताकि देश की छवि विदेशों में अच्छी ही जाए। गृह मंत्री को भी चाहिए कि वे प्रधानमंत्री से बात कर दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने के सालों पुराने सरकारों के वादे को अमली जामा पहनाने के लिए समय सीमा तय करने का आग्रह करें।
बुनियादी सुविधाओं को तरसती दिल्ली में न साफ पानी ही पीने को मुहैया है और न ही सीवर सिस्टम। जरा सी बरसात हो जाने पर सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं। यातायात व्यवस्था का आलम यह है कि यातायात सप्ताह के दौरान ट्रेफिक पुलिस पूरी मुस्तेदी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है, फिर व्यवस्था वहीं वापस लौट जाती है।
सच है कि देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर गृह मंत्री ने कुछ अच्छा करने का फैसला लिया है। सुधार की शुरूआत पुलिस, बस चालकों, परिचालकों, यातायात पुलिस, आटो, टेक्सी चालकों और रिक्शा चालकों से ही की जानी चाहिए। रेल्वे स्टेशन और बस स्टेंड के इर्द गिर्द के दुकानदारों को प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा।
इस सबके लिए जरूरी है सरकार और आम जनता के बीच खुशनुमा वातावरण में संवाद स्थापित करना होगा, जिसका अभाव साफ साफ दिखाई पड़ रहा है। पी.चिदंबरम को सोचना होगा कि उनके हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाकर वे दिल्लीवासियों को सभ्य बना देंगे। इसके लिए यथार्थ के धरातल पर उतरकर कड़ाई से ठोस कार्ययोजना को अमली जामा पहनाना होगा वरना आठ माह बीतने में समय नहीं लगेगा।

रविवार, 27 सितंबर 2009

राजा ने दिया आशीवाद, ``खुश रहें, टुल्ली होकर पड़े रहें``


ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
राजा ने दिया आशीवाद, ``खुश रहें, टुल्ली होकर पड़े रहें``




कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली महासचिव एवं मध्य प्रदेश में लगातार दस साल तक निष्कंटक राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह की फितरत वैसे तो विवादों से दूर रहने की है, किन्तु अनजाने ही में मध्य प्रदेश मे एक पब के उद्घाटन पर आशीZवचन बोलकर बुरी तरह विवादित हो गए। दरअसल राजा दिग्विजय सिंह अपने एक गण के मध्य प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर में शराब खाने का उद्घाटन करने पहुंचे थे। उधर केंद्र सरकार और कांग्रेस अपने संगी साथियों को सादगी ओढ़ने की नसीहत दे रही है, वहीं दूसरी ओर राजा जी पब का उद्घाटन कर रहे हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि दिग्गी राजा ने वहां बेसख्ता एक टिप्पणी कर डाली, ``लोग खुश रहें, पीकर पड़े रहें, आपका भंडार भरा रहे``। इशारों इशारों में बात करने के मशहूर दिग्विजय सिंह की इस बात के निहितार्थ आज भी सभी खोजने में लगे हुए हैं।


सिंगापुर में सत्य की खोज


आदि अनादिकाल से यह मशहूर रहा है कि लोग सत्य की खोज के लिए हिमालय अथवा एकांत जंगलों को चुना जाता रहा है। समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह हाल ही में विलासिता के लिए मशहूर सिंगापुर से अमर ज्ञान लेकर लौटे हैं। अमर सिंह ने लोटते ही कहा कि सिंगापुर में उन्हें सत्य का ज्ञान हो गया है। वैसे भी चकाचौंध भरा सिंगापुर आम भारतियों के लिए रंग रंगेलियों के लिए खासा विख्यात और कुख्यात है। सियासी गलियारों में इस बात के मायने खोजे जा रहे हैं कि आखिर सपा महासचिव अमर सिंह सिंगापुर जैसे विलासिता से परिपूर्ण शहर से कौन सा सत्य खोजकर वापस आए हैं


मनमोहन के निशाने पर हैं ममता, जोशी, थुरूर और आजाद


देश के वजीरे आला अपनी दूसरी पारी में कुछ ज्यादा ही कांफिडेंट नजर आ रहे हैं। इस बार वे अपने मंत्रीमण्डल के सहयोगियों पर नकेल कसने को कुछ ज्यादा ही आतुर दिखाई दे रहे हैं। सूत्रों की मानें तो उनकी नजरें सबसे पहले रेल मंत्री ममता बनर्जी, ग्रामीण विकास मंत्री सी.पी.जोशी, स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद और विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर पर हैं। सौ दिनी कामकाज की रिपोर्ट भले ही सार्वजनिक न की गई हो किन्तु प्रधानमंत्री ने इस पर गहन मनन आरंभ कर दिया है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि पीएम चार मंत्रियों के परफारमेंस से नाखुश दिख रहे हैं। जल्द ही इन चारों मंत्रियों के पर कतरे जा सकते हैं। एक ओर जहां थुरूर को सोनिया का तो जोशी को राहुल का वरद हस्त प्राप्त है। आजाद अल्प संख्यक हैं तो ममता संप्रग की प्रमुख घटक हैं। पीएम पशोपेश में हैं कि वे इनके खिलाफ कार्यवाही के लिए राजमाता सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी को तैयार कैसे करें। सुना है पीएम ने कांग्रेस के इन दोनों ही खलीफों को सिद्ध करने के लिए इनके नांदियों, दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल और विसेंट जार्ज को साधना आरंभ कर दिया है। अब देखना है कि प्रधानमंत्री अपने मकसद में कितना कामयाब हो पाते हैं


काक और वृक्षों की कमी ने श्राद्धालु परेशान


कांक्रीट जंगलों में तब्दील होते हिन्दुस्तान के शहरों में पेड़ों की कमी साफ तौर पर परिलक्षित होने लगी है। दिखावे के लिए सभी पर्यावरण पे्रमी होने का दावा करते हैं किन्तु जहां अमली जामा पहनाने की बात आती है तो सभी पल्ला झाड़कर दूर खड़े दिखाई देते हैं। अभी हाल ही में करए दिन (पितृ पक्ष) का महीना बीता। इस पावन माह में पितरों का तर्पण करने के दौरान कौओं को भोजन कराने से माना जाता है कि पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है। पेड़ों की सेवा का अलग ही महत्व होता है, इसके साथ ही साथ पेड़ों पर ही इन पक्षियों का वास भी होता है। कमोबेश हर शहर में लोग कौओ और पेड़ों की कमी से दो चार हुए हैं। राजधानी दिल्ली में भी एक मर्तबा मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा था कि अब शहर में गोरैया दिखाई नहीं पड़ती। सच ही है उंची उंची इमारतों के बीच बसे शहर में गोरैया, कौए एवं अन्य पक्षियों का कलरव सुनाई नहीं पड़ता है। आधुनिकता की दौड़ में बढ़ती आबाद ही इनकी सबसे बड़ी दुश्मन के तौर पर सामने आ रही है।


शिवराज ने कसी ब्यूरोक्रेसी की लगाम


जब केंद्र सरकार मितव्ययता के ``अनूठे`` उदहारण पेश कर रही हो तो भला मध्य प्रदेश सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान उससे दूर कैसे रह सकते हैं। मध्य प्रदेश में भी फिजूलखर्ची रोकने की गरज से फर्नीचर, बंग्लों की साजसज्जा, वाहनों पर होने वाला बिना काम का व्यय आदि पर अंकुश लगाया जाएगा। सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने राज्य में सरकारी धन के अपव्यय पर रोक लगाने के लिए ``सीएम मानिट सिस्टम`` के नाम से निगरानी तंत्र बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री खुद इसकी समीक्षा करेंगे, सी एम के इस कदम से ब्यूरोक्रेसी सकते में हैं। अधिकारियों की ``मेम साहबों`` के तेवर मुख्यमंत्री की इस कवायद से तीखे ही नजर आ रहे हैं। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री अपनी व्यस्त प्रशासनिक और राजनैतिक दिनचर्या की मजबूरियों से जनता के पैसे के दुरूपयोग रोकने के लिए अलग से समय कैसे निकाल सकेंगे। वैसे भी शिवराज सिंह चौहान के चाहने वालों की कमी नहीं है, संघ और भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों के बीच उनकी स्थिति बत्तीस दांतों के बीच में जीभ की ही है।


मैं तो पी के टुल्ली हो गया रे . . .


अमूमन देश के अस्सी फीसदी लोग इस वक्त नशे की गिरफ्त में हैं, भले ही वह मदिरा का सुरूर हो या किसी अन्य नशे का जलाल हो युवा वर्ग इसकी जद में तेजी से आ रहा है। चूंकि आबकारी विभाग से प्राप्त होने वाला राजस्व राज्यों के खजाने को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अत: गुजरात जैसे राज्यों को छोड़कर कोई भी इसे हाथ लगाने से गुरेज ही करता है। हिमाचल प्रदेश में एक मजेदार वाक्या सामने आया। मंत्रीमण्डल की एक बैठक (केबनेट) में प्रदेश सरकार के एक मंत्री नशे में पूरी तरह टुल्ली होकर पहुंच गए। बैठक में जब मंत्री महोदय असहज नजर आए तो मुख्यमंत्री ने हस्ताक्षेप कर उन्हें बैठक से बाहर भिजवाया। मामला हाई प्रोफाईल मंत्री का था, सो वहीं के वहीं इसका पटाक्षेप कर दिया गया। कहा जाता है इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छिपते, इसी तर्ज पर यह मामला भी उनके राजनैतिक चाहने वाले अन्य मंत्रियों और अधिकारियों के रास्ते से होकर राजनैतिक फिजां में तैरने लगा है।


मंत्री के दौरे से पीआईबी को परहेज


केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल दौरे पर थे। केंद्रीय मंत्रियों के कार्यक्रमों की मीडिया कवरेज आदि की जवाबदेही वैसे तो सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले कार्यालय प्रेस इंर्फमेशन ब्यूरो (पीआईबी) की होती है, किन्तु इस बार एसा देखने को नहीं मिला। मंत्री को मीडिया से रूबरू करवाने का काम वन विभाग के मातहत करते दिखे। पीआईबी भोपाल के कार्यालय में चल रही बयार के अनुसार हम क्यों मगज मारी करें। दिल्ली के प्रेस वालों की गरज होगी तो वे आएंगे। बताते हैं कि इंफरमेशन एण्ड ब्राडकास्टिंग मिनिस्ट्री के अंतर्गत कार्यरत पीआईबी, दूरदर्शन और आकाशवाणी तीनों ही संस्थाओं का प्रभार एक बड़बोले अधिकारी के पास होने से यह हादसा हुआ। कहा जा रहा है कि आई एण्ड बी मिनिस्ट्री में गहरी दखल रखने वाले उक्त अधिकारी के हौसले इतने बुलंद हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र में कंाग्रेसनीत संप्रग सरकार होने के बावजूद भी उन्होंने कांग्रेस को मिनिमम कवरेज ही प्रदान कर भाजपा की शान में कशीदे गढ़े हैं।


जालसाजी में पत्रकार को जेल


न्यूज पोर्टल में कार्यरत एक पत्रकार को जालसाजी के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी। बताया जाता है कि उक्त पत्रकार ने चंडीगढ़ पुलिस को फर्जी फेक्स संदेश भेजकर अपने लिए जेड स्तर की सिक्यूरिटी मांगी थी। मामले की सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस हरकत में आई और उसने फोन के डिटेल निकलवाकर यह साबित करने का प्रयास किया कि जिस फोन का उपयोग फेक्स के लिए किया गया था वह उक्त पत्रकार के नाम पर ही है। दिल्ली पुलिस ने उस पत्रकार के खिलाफ कार्यवाही कर पत्र सूचना कार्यालय से इसकी मान्यता भी रद्द करने का आग्रह किया है। मीडिया से जुड़े लोगों द्वारा तरह तरह के हथकंडो से चर्चित होने का प्रयास किया जाता है, किन्तु इस तरह की धोखाधड़ी से निश्चित तौर पर मीडिया की छवि पर गहरा धक्का लगे बिना नहीं रहेगा।


विधायक ने उगले 12 करोड़ रूपए


झारखण्ड के झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के गिरीडीह के विधायक मुन्ना लाल ने आयकर विभाग के सामने 12 करोड़ रूपयों की अवैध अघोषित संपत्ति स्वीकार कर सभी को चौंका दिया हैं अब सियासी गलियारों के साथ ही साथ देश भर में इस बात पर बहस छिड गई है कि एक विधायक आखिर पांच सालों में कितना धन एकत्र कर सकता है। विधायक के पास से 50 लाख रूपए नकद, 50 लाख रूपयों के जेवरात, 200 एकड़ जमीन, दर्जनों बैंक एकाउंट, लाकर, एवं आवासों के कागजात मिले हैं। पैसे के बल पर राजनीति कर राजनीति के बल पर रूपया जमा करना दबंगों का प्यारा शगल रहा है। आज देश में नब्बे फीसदी से अधिक उद्योगपति राजनीति में उतरकर अपनी साख और धन संपदा को कई गुना बढ़ाने में लगे हुए हैं। लोगों को डर सता रहा है कि कहीं इस तरह के उद्योगपति राजनेता कल देश को गिरवी न रख दें।


पटेल के गढ़ में बिसेन की सेंध


कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। कुछ सालों पूर्व मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के युवा राजनेता प्रहलाद सिंह पटेल ने बरास्ता सिवनी संसदीय क्षेत्र, बालाघाट जाकर वहां अपना वर्चस्व स्थापित किया था। बालाघाट के वरिष्ठ राजनेता गौरी शंकर बिसेन को यह बात नागवार गुजरी कि उनकी मांद में आकर कोई अपना वर्चस्व इस तरह स्थापित करे। इसके बाद पटेल और बिसेन के बीच शीत युद्ध आरंभ हो गया था। भारतीय जनशक्ति पार्टी के आधार स्तंभ रहे प्रहलाद सिंह पटेल के भाजपा में वापसी के मार्ग में भी मध्य प्रदेश सरकार के सहकारित मंत्री बिसेन ने शूल बोए थे। हाल ही में संपन्न हुए तेंदूखेड़ा उपचुनाव में गोरी शंकर बिसेन ने प्रहलाद सिंह पटेल के गढ़ में सेंध लगाकर अपना बदला ले लिया है। नरसिंहपुर जिले के तेंदूखेड़ा में भाजपा ने परचम लहराया, जबकि पूर्व में यह सीट कांग्रेस के वर्चस्व वाली थी। तेंदूखेड़ा उपचुनाव के प्रभारी बिसेन ने यह तक कह दिया था कि अगर तेंदूखेडा से भाजपा हारती है तो वे मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे देंगे।


सादगी बनी मजाक


भले ही कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी सादगी के प्रहसन के लिए हवाई जहाज की इकानामी क्लास में दस सीटें बुक कराकर और उनके पुत्र तथा कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी शताब्दी एक्सप्रेस की बोगी को रिजर्व कराने का जतन कर रहे हों पर उनकी ही पार्टी क आलम्बरदार इसमें सेंध लगाने से नहीं चूक रहे हैं। लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुईं शीला दीक्षित सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ के जलवे ही कुछ अलग हैं। तीरथ चाहतीं हैं कि उनके मंत्रालय में एक सलाहकार की नियुक्ति की जाए वह भी 18 लाख रूपए सालाना की दर से। डेढ लाख रूपए महीना तनख्वाह पाने वाला सलाहकार भला एसा कौन सा काम कर सकेगा जो अस्सी हजार रूपए महीना पाने वाला विभागीय सचिव नहीं कर पाएगा। सच ही है सादगी का दिखावा करना अलग बात है और उसे अपने जीवन में अंगीकार करना एकदम जुदा बात है।


मंदिर मिस्जद बैर कराते, मेल कराते जेल


आज अगर सदी के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के पिता जीवित होते तो वे अपनी अनुपन कृति मधुशाला में एक अंश और जोड़ देते कि मंदिर मिस्जद बैर कराते, मेल कराते कारागार। जी हां दिल्ली में एसा ही कुछ देखने सुनने को मिल रहा है। मुस्लिम समुदाय के पाक रमजान माह में देश के सबसे बड़े तिहाड़ जेल में सौ से भी अधिक सनातन पंथी (हिन्दु धर्मावलंबी) कैदियों ने रोजा रखकर एक मिसाल कायम की। इतना ही नहीं मुस्लिम समुदाय को मानने वाले डेढ सौ से भी अधिक मुसलमान कैदियों ने नवरात्र के पहले दिन उपवास रखकर भाईचारे और सांप्रदायिक सौहाद्र की अनूठी मिसाल पेश की है। सच ही कहा गया है कि मजबह नहीं सिखाता आपस में बैर करना। वो तो सियासी दल हैं जो अपने निहित स्वार्थों के चलते अलग अलग धर्मों को मानने वाले लोगों के बीच दीवारें खड़ी करते जा रहे हैं।


क्या डीजीसीए का खौफ लाईन पर ला सकेगा नेताओं को


तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। दशहरे के उपरांत चुनाव प्रचार जोर पकड़ेगा, और उसके बाद हेलीकाप्टर (चौपर) की मांग तेजी से बढ़ जाएगी। सुरक्षा नियमों को ध्यान में रखकर उड्डयन विभाग के अधिकारियों ने पायलट्स की एक विशेष बैठक बुलाकर ताकीद किया है कि वे चौपर में बैठे यात्रियों (नेताओं) की इच्छा के मुताबिक नहीं वरन सुरक्षा नियमों के हिसाब से उड़ान भरें। संचालक नागर विमानन (डीजीसीए) ने दिशा निर्देश जारी कर नेताओं को सचेत करते हुए कहा है कि अगर उन्हें हेलीकाप्टर में उड़ान भरनी है तो वे पायलट की बातों को दरकिनार न करें। अमूमन नेताओं द्वारा कार्यकर्ताओं को खुश करने की गरज से क्षमता से अधिक लोगों की सवारी गांठने, सूरज ढलने के बाद कम उंचाई पर उड़ान भरवाने ताकि वे अपने गंतव्य को बेहतर तरीके से देख सकें आदि कदम उठाए जाते हैं। चुनाव में साम, दाम दण्ड भेद की नीति अपनाई जाती है, फिर भला ये नेता डीजीसीए या उड्डयन विभाग की परवाह क्यों करने चले।


एक छत के नीचे रह सकेंगे सांसद


बहुत पुरानी कहानी है कि देश से जब मेंढकों को निर्यात किया जाता था तो वे खुले वेगन में ही भेजे जाते थे, और जितनी संख्या में भेजे जाते थे, उतनी ही संख्या में गंतव्य तक पहुंचते थे। जब इसका कारण पता किया गया तो पता चला कि जब कोई मेंढ़क बाहर निकलने के लिए छलांग लगाता था तो दूसरा मेंढक बिना जतन किए ही बाहर जाने की गरज से उसका पैर पकड़ लेता था, फिर तीसरा दूसरे का। यह क्रम अनवरत तब तक चलता जब तक कि पहला मेंढ़क थककर वापस वेगन में न गिर जाए। अब दिल्ली में सांसदों को एक ही छत के नीचे बहुमंजिला फ्लेट में एक साथ निवास करवाने की तैयारियां की जा रही है। लालफीताशाही और सांसदों की अनिच्छा के चलते दिल्ली में विशम्बर दास मार्ग पर प्रस्तावित बहुमंजिला सांसद आवास के निर्माण में देरी के लिए अब प्रधानमंत्री से हस्ताक्षेप की गुहार लगाई जा रही है। यहां 52 आवास प्रस्तावित हैं, मुश्किल यह है कि जहां ये बनने हैं वहां वित्त राज्य मंत्री एस.एस.पालनिमणिकम निवासरत हैं। अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधकर उनसे आवास खाली करवाए।

पुच्छल तारा


केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर एक के बाद एक बयानों से विवादों में फंसते जा रहे हैं। पहले सादगी दर्शन में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की इकानामी क्लास में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से व्यवसायिक राजधानी मुंबई तक की गई इकानामी क्लास में यात्रा के तुरंत बाद हवाई जहाज की इकानामी क्लास को मवेशी क्लास की संज्ञा से वे मीडिया की सुर्खियों में रहे, फिर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के द्वारा नसीहत देने के चलते। अब उन्होंने काम और बैठकों के बोझ के मामले को अपने टि्वटर फ्रेंडस के बीच शेयर किया है। लोग अब कहने ही लगे हैं कि बेहतर होगा कि प्रधानमंत्री डॉ. एम.एम.सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी थुरूर के बोझ को कम करके एक नया मंत्रालय बनाएं जिसका नाम हो सायबर मंत्रालय, और नेट में विशेषकर टि्वटर प्रेमी शशि थुरूर को इस मंत्रालय का कबीना मंत्री बनाकर उपकृत कर दें, इससे थुरूर की इंटरनेट क्षुदा भी शांत होगी और देश को सायबर सेल का एक मंत्री भी मिल जाएगा।