मंगलवार, 12 जुलाई 2011

अभी ‘बहुत कुछ‘ सीखना है युवराज को

अभी ‘बहुत कुछ‘ सीखना है युवराज को

(लिमटी खरे)

कांग्रेस के सुकुमार युवराज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में पदयात्रा पर गए और उन्होंने कहा कि उन्होंने संसद मंे जो नहीं सीखा वह ग्रामीणों के बीच जाकर सीखने को मिला। मतलब साफ है कि राहुल गांधी जमीन से जु़ड़े नेता नहीं हैं। देश का एक आम आदमी जिसे देश की रीढ़ किसान के दुख दर्द के बारे में बखूबी मालुम है उसमें और राजनीति में पैदा नहीं वरन् ‘‘अवतरित‘‘ हुए राहुल गांधी मंे अंतर स्वाभाविक ही है। कांग्रेसी नेताओं की राजनीति नेहरू गांधी परिवार के बलबूते चलती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ हुई रावणलीला और अण्णा हजारे प्रकरण में चुप्पी साधने वाले राहुल गांधी की पदयात्रा के दरम्यान थैलियों के मुंह खोल दिए गए और मीडिया को गजब तरीके से खरीद लिया गया। सारे समाचार चेनल राहुल के स्तुतिगान और महिमा मण्डन में लगे थे, किसी ने भी राहुल से रामदेव या हजारे के मामले में पूछने का साहस नहीं जुटाया। दरअसल निहित स्वार्थों के चलते कुछ मीडिया मुगल इन नेताओं के घरों की चैखट पर मुजरा करते नजर आ रहे हैं।

कांग्रेस के आला नेता चाहते हैं कि देश की राजनीति कें सक्रिय हुए नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के सदस्य राहुल गांधी प्रधानमंत्री का पद संभालें। आज भी सामंती प्रथा लागू नजर आती है। कितने आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सरेआम यह कहते हैं कि राहुल गांधी शादी कर लें और देश की बागडोर संभालें। सामंती व्यवस्थाओं में रियाया को समय समय पर अनेक सूचनाएं दी जाती थीं। इनमें महत्वपूर्ण होती थी कि अब फलां राजकुमार जवान हो गए हैं और अब वे राजकाज संभालने के योग्य हो गए हैं। फिर उनका राज्याभिषेक कर दिया जाता था। कांग्रेस भी उसी तर्ज पर ही चल रही है।

राजा दिग्विजय सिंह अब देश की प्रजा को बता रहे हैं कि नेहरू गांधी परिवार के युवा सदस्य राहुल गांधी अब बड़े हो गए हैं और वे राजकाज संभालने के योग्य हो गए हैं। क्या दिग्विजय सिंह ने कभी यह सोचा है कि उनके इस कथन का तातपर्य क्या निकल सकता है। इसका मतलब साफ है कि वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह आपका समय पूरा अब आप प्रधानमंत्री आवास यानी 7, रेसकोर्स रोड़ से अपना बोरिया बिस्तर समेट लो। भले ही मनमोहन सिंह के राज में सबसे अधिक घपले और घोटाले हुए हों, किन्तु आज भी देश का एक बहुत बड़ा वर्ग उन्हें ईमानदार ही मानता है। अनेक बुद्धिजीवी मनमोहन सिंह को ‘भ्रष्टाचार के ईमानदार संरक्षक‘ भी मानते हैं।

कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों में नरसिंहराव ही इकलौते ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने कांग्रेस को नेहरू गांधी परिवार से दूर रखकर अपने बल पर खड़े होने की सीख दी। मनमोहन सिंह राज्य सभा से हैं उनका जनाधार नहीं है, इसलिए मनमोहन पूरी तरह कांग्रेस के पिट्ठू माने जाते हैं। पिछले कुछ दिनों से उन्होंने जो रवैया अख्तियार किया है उससे साफ होने लगा है कि अब मनमोहन भी नरसिंहराव की तर्ज पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। मनमोहन के प्रयास अगर सफल हुए तो कांग्रेस के कार्यकर्ता सोनिया राहुल के आभा मण्डल से निकलकर धरातल पर आ सकेंगे।

कल तक देश पर एक छत्र राज्य करने वाली कांग्रेस चंद सूबों मंे ही सिमटकर रह गई है। गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तीन एसे बड़े राज्य हैं जहां कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचा है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुजरात से सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल तो मध्य प्रदेश से राहुल गांधी के अघोषित गुरू राजा दिग्विजय सिंह हैं। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश से राहुल और सोनिया खुद हैं।

बड़े नेताओं ने अपने अपने क्षेत्र बांट लिए हैं। हर नेता के क्षेत्र में कांग्रेस का बट्टा बैठा हुआ है। सच है कि अगर किसी नेता के क्षेत्र मंे दूसरा कांग्रेस का दबंग विधायक या संसद सदस्य चुनकर आ गया तो फिर उसकी पूछ परख कम होना लाजिमी है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश का ही उदहारण अगर लिया जाए तो दिग्गी राजा के मालावांचल, ज्योतिरादित्य के चम्बल, कमल नाथ के महाकौशल में कांग्रेस की सांसे जमकर फूल चुकी हैं।

यह था कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी परिदृश्य। इन परिस्थितियों के बाद भी राहुल गांधी पता नहीं किस रंग का चश्मा लगाकर देश और अपने मतदाता को देख रहे हैं। उत्तर प्रदेश में वे पदयात्रा करते हैं। कभी किसी दलित के घर रात बिताते हैं। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के टपरियन गांव जाकर वहां एक बेसहारा की बेटी के विवाह के लिए बीस हजार रूपए देने का वादा करते हैं, फिर भूल जाते हंै। राहुल का वादा सूबे के भाजपाई निजाम शिवराज सिंह चैहान द्वारा पूरा किया जाता है। यह है कांग्रेस के संगठन की जमीनी हकीकत।

अपनी पदयात्रा में राहुल कहते हैं कि संसद से ज्यादा उन्हें यहां सीखने को मिला। राहुल सच कह रहे हैं, वकई उन्हें जमीन से जुड़ने पर काफी कुछ सीखने को मिला होगा, वरना तय शुदा प्रोग्राम और चापलूसों से घिरे रहने के अलावा राहुल करते भी क्या हैं। उनके कार्यालय में अत्याधुनिक संचार साधन हैं, किन्तु सभी जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। लेपटाप और ब्लेक बैरी फोन से सुदूर ग्रामीण अंचलों की वास्तविक स्थिति का भान नहीं हो सकता है।

कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी के इर्द गिर्द जमा भीड़ में पंचानवे फीसदी लोग बिना रीढ़ अर्थात जनाधार वाले हैं। जिनका जनाधार ही नहीं हैं, उन बैसाखियों पर चलकर मां बेटा सोच रहे हैं कि वे कांगे्रस को मजबूत बना लेंगे। जो लोग जनता के सामने जाकर चुनाव लड़कर संसद या विधानसभाओं में पहुंचने का माद्दा नहीं रखते वे कुशल प्रबंधक हो सकते हैं पर देश की किस्मत नहीं बदल सकते। बुंदेलखण्ड की एक कहावत इन पर चरितार्थ होती है कि ‘‘सूपा तो सूपा, अब चलनी बोले, जिसमें 172 छेद‘‘।

ब्रितानी हुकूमत के पहले तक देश में प्रजा का सही हाल जानने के लिए राजाओं द्वारा भेस बदलकर असलियत से रूबरू हुआ जाता था। आज के समय में राहुल गांधी औचक दौरे तो करते हैं किन्तु उनके ये दौरे कितने औचक होते हैं इस बारे में वे खुद भी भली भांति जानते हैं। एसपीजी और कांग्रेस के प्रबंधकों का दल उनके दौरे के पहले उनके अनुकूल माहौल तैयार कर देते हैं। अब इन परिस्थितियों में भला राहुल गांधी जमीनी हकीकत से कैसे दो चार हो सकते हैं।

राहुल गांधी ने इशारों ही इशारों में बयान वीरों को भी समझा दिया है कि वे अभी राजकाज संभालने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाए हैं। जिस तरह गैर राजनैतिक राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो उनके सारे मित्रों ने उन्हें घेर लिया और फिर चल पड़ा था लूट का सिलसिला। अनुभवहीन राजीव गांधी को बोफोर्स मामले में जबरन ही फसा दिया गया था। बोफोर्स तोप मामले में नेहरू गांधी परिवार को जितनी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी उतनी शायद ही कभी किसी ने झेली हो। राहुल गांधी अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं माने जा सकते हैं। उन्हें अपने इर्द गिर्द चाटूकारों के बजाए जनाधार वाले लोगों को स्थान देना होगा, वरना नेहरू गांधी परिवार की साख और मीडिया को खरीद कर उनका महिमा मण्डन आखिर कब तक हो पाएगा?

आज फेंटेंगे मनमोहन अपने पत्ते

आज फेंटेंगे मनमोहन अपने पत्ते

मध्य प्रदेश से कमल नाथ और ज्योतिरादित्य बचे

भूरिया, अरूण यादव मंत्रीमण्डल के बाहर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। रेल हादसों के कारण सोमवार को टला मंत्रीमण्डल विस्तार आज शाम पांच बजे होगा, जिसमें कुछ चेहरों को पदोन्नति, कुछ नए चेहरे तो दिखाई देंगे ही साथ ही कुछ मंत्रियों को बाहर का रास्ता भी दिखाया जाएगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसे मंद सूत्रों का कहना है कि वी.किशोर चंद्र देव, बेनी वर्मा, दिनेश त्रिवेदी, जयराम रमेश को कबीना मंत्री बनाया जाएगा। इसके अलावा श्रीकांत जैना, जयंती नटराजन, पवन सिंह घटवार और गुरूदास कामत को राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया जा रहा है।

सूत्रों ने आगे बताया कि राज्य मंत्रियों की सूची में सुदीप बंदोपाध्याय, चरण दास महंत, जितेंद्र सिंह, मिलिन्द देवड़ा एवं राजीव शुक्ला शामिल किए गए हैं। जिन मंत्रियों के विभाग बदलने की अनुशंसा की गई है उनमें वी.के.सी.देव को आदिवासी मामले और पंचायती राज, बेनी प्रसाद वर्मा को स्टील, दिनेश त्रिवेदी को रेल, जयराम रमेश को ग्रामीण विकास विभाग का केबनेट मंत्री बनाया गया है। राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार में श्रीकांत जैना को सांख्यिकी, केमीकल और फर्टीलाईजर्स, जयंती नटराजन को वन एवं पर्यावरण, पवन सिंह को पूर्वात्तर क्षेत्र विकास, गुरूदास कामथ को पेयजल और सेनीटेशन का राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार, तथा राज्य मंत्रियों में नए मंत्रियों में सुदीप बंदोपाध्याय को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चरण दास महंत को फुड प्रोसेसिंग और एग्रीकल्चर, जितेंद्र सिंह को होम अफेयर्स, मिलिंद देवड़ा को कम्यूनिकेशन और इंफरमेशन टेक्नालाजी, राजीव शुक्ला को पार्लियमेंट्री अफेयर्स मंत्रालय सौंपा गया है।

जिन मंत्रियों के विभाग बदले गए हैं उनमें विलास राव देशमुख को साईंस एण्ड टेक्नालाजी, वीरप्पा मोईली को कार्पोरेट अफेयर्स, आनंद शर्मा को वाणिज्य और उद्योग के साथ ही वस्त्र मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार, पवन बंसल को संसदीय कार्य के साथ ही साथ वाटर रिसोर्स का अतिरिक्त प्रभार, सलमान खुर्शीद को कानून मंत्रालय के साथ ही साथ अल्पसंख्यक कल्याण का अतिरिक्त कार्य सौंपा गया है। राज्य मंत्रियों में ई.अहमद को विदेश मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय, वी.नारायण सामी को कार्मिक और प्रधानमंत्री कार्यालय, हरीश रावत को एग्रीकल्चर फुड प्रोसेसिंग के साथ ही साथ संसदीय कार्य, मुकुल राय को शिपिंग, अश्विनी कुमार को योजना, साईंस और टेक्नालाजी का प्रभार बतौर राज्य मंत्री सौंपा गया है।

सूत्रों ने पुख्ता जानकारी देते हुए कहा कि दयानिधी मारन, मुरली देवड़ा, बी.के.हाण्डिक, अरूण यादव, कांति लाल भूरिया, ए.साई.प्रसाद और एम.एस.गिल की लाल बत्ती छीन ली गई है। गौरतलब होगा कि पहले यह विस्तार सोमवार को प्रस्तावित था किन्तु दो बड़े रेल हादसों की वजह से इसे टाल दिया गया था। सोमवार को दोपहर तक इस बात पर सहमति नहीं बन पाई थी कि विस्तार मंगलवार को किया जाए या बुधवार को। जानकारों के अनुसार महूर्त देखकर शाम को तय किया गया कि टिकाऊ, स्थाई और मजबूत सरकार के लिए मंगलवार का दिन ही सबसे उपयुक्त है।

सबसे मंहगी रसोई गैस है मामा के घर!

सबसे मंहगी रसोई गैस है मामा के घर!

एमपी में रसोई गैस मंहगी, पर कांग्रेस खामोश!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सारे बच्चों के मामा राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के राजकाज में रसाई गैस के दाम देश में सबसे अधिक होने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष और आदिवासी बच्चों के मामा कांतिलाल भूरिया के नेतृत्व में कांग्रेस खामोशी के साथ जनता को लुटते देख रही है। भाजपा के नेतृत्व वाली गुजरात, उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ में रसाई गैस की दरें 410 रूपए से कम हैं किन्तु शिवराज के राज में इनकी 452 रूपए का मिल रहा है एक सिलेंडर!

भाजपा शासित राज्यों में मध्य प्रदेश में 452, झारखण्ड में 425 रूपए पचास पैसे, पंजाब में 420, हिमाचल में 411 रूपए 15 पैसे, कर्नाटक में 411 रूपए दस पैसे, गुजरात में 409 रूपए पच्चीस पैसे, बिहार में 407, छत्तीसगढ़ में 403 रूपए चार आने तो उत्तराखण्ड में 394 रूपए तीस पैसे की दर से सिलेंडर मिल रहे हैं।

वहीं अगर कांग्रेस शासित राज्यों में देखा जाए तो हरियाणा में सर्वाधिक 419 रूपए 48 पैसे तो असम में 403 रूपए, महाराष्ट्र में 398 रूपए 45 पैसे, राजस्थान में 398 रूपए पांच पैसे, दिल्ली में 395 रूपए तीस पैसे, आंध्र प्रदेश में 394 रूपए तीस पैसे प्रति सिलेंडर की दर है। ममता बनर्जी के राज में पश्चिम बंगाल और मायावती के राज में उत्तर प्रदेश में गैस की कीमत 401 रूपए है।

मध्य प्रदेश में रसोई गैस के मंहगे होने का कारण इस पर करों का लदा होना है। यहां रसाई गैस पर 6.47 प्रतिशत की दर से 24 रूपए पचास पैसे प्रवेश कर तो पांच फीसदी की दर से 20 रूपए 16 पैसे वैट लिया जा रहा है। मजे की बात यह है कि उक्त दोनों ही टेक्स मदिरा पर आहूत नहीं हो रहे हैं।

2003 के बाद सत्ता से गायब होने वाली कांग्रेस भी भाजपा की गरीब विरोधी नीतियों पर मौन साधे हुए है। इसके पूर्व सूबे के कांग्रेस संगठन के निजाम सुभाष यादव और सुरेश पचैरी के कार्यकाल में कांग्रेस पूरी तरह निष्क्रीय ही बैठी रही। वर्तमान अध्यक्ष कांति लाल भूरिया ने भी शिवराज सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मन अभी तक नहीं बनाया है। यही कारण है कि प्रदेश के निवासियों को देश में सबसे मंहगी रसाई गैस खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

शादी कर हड़प लेते हैं आदिवासियों की जमीन




शादी कर हड़प लेते हैं आदिवासियों की जमीन


(हिमांशु कौशल)

सिवनी (म.प्र.)। आदिवासियों से उनकी जमीने न छिने इसे लेकर सरकार ने जो कठोर नियम बनाये हैंैं वे उनकी जमीन बचाने के लिये तो पर्याप्त हैं ही नहीं बल्कि इन नियमों के कारण गाँवों में आदिवासी परिवारों की युवतियाँ असुरक्षित हो गयी हैं वहीं दूसरी तरफ शहरों में आदिवासियों की जमीनों को हड़पने के लिये दलाल, पटवारी, उप पंजीयक सी सक्रिय हैं.

गाँव के ग्रामीण हो या शहर के शहरी शोषण तो आदिवासियों का हो ही रहा है पर अंतर इतना है कि पहले गाँव में पुलिस का ऐसे लोगों को संरक्षण होता है तो शहर में प्रशासनिक अंग के अधिकारी ऐसे लोगों से मिले हुए होते हैं जो आदिवासियों का शोषण करते हैं.

0 गाँव में शादी करके हड़प लेते हैं जमीन

सिवनी जिला आदिवासी बहुल है. यहाँ के आदिवासियों के पास पुश्तैनी जमीने बहुत हैं. आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन हड़पने के लिये गाँव के अन्य समुदाय, वर्गों के लोग किसी ऐसे आदिवासी परिवार जिसके पास जमीन होती है, की बेटी को प्रेम का, शादी का प्रलोन दे फँसाते हैं और अपने साथ रख लेते हैं या फिर कई बार तो आदिवासी परिवार की लड़की को गा कर ले जाते हैं और उसकी अस्मत लूट उसे अपने पास रख लेते हैं और बाद में उसपर व उसके परिवार वालों पर दबाव डाल जमीन हड़पने की कोशिश करते हैं और ऐसे मामलों में कई बार तो महिला स्वयं ी अपने माता पिता ाई के विरूद्ध हो जाती है.


0 हिरणदास की हत्या: एक उदाहरण

अी हाल ही में समीपस्थ ग्राम ईंदावाड़ी निवासी हिरणदास गेडाम की हत्या इसका उदाहरण है. हिरणदास की बहन हिरंतीबाई अपने पिता व परिवार की इच्छा के विरूद्ध मुस्लिम समुदाय के ग्राम विजय पानी निवासी गुलजार के साथ चली गयी थी जिसके खफा होकर उसके पिता स्व. देवाजी गेडाम ने अपने पैसे से खरीदी गयी जमीन अपने पुत्र एवं पोतों के नाम लिख दी थी. हिरंतीबाई और गुलजार जमीन पर हिस्सा चाहते थे पर हिरणदास अपने पिता की वसीयत के मुताबिक कोई हिस्सा नहीं देना चाहता था फलस्वरूप हिरंतीबाई एवं उसके पति ने षड़यंत्र कर ग्राम विजयपानी स्थित खेत को जोतना चाहा जिसमें विवाद हुआ है और हिरणदास की हत्या कर दी गयी जबकि उसके दोनों पुत्र जो कि उसके बाद जमीन के मालिक होते पर ी प्राणघातक हमले किये गये. हालाकि हिरंतीबाई की शादी बहुत पहले हुई थी और शादी के समय जमीन शायद कोई मुद्दा नहीं था पर हिरंतीबाई के ाई की हत्या का कारण जमीनी विवाद ही था और यह अी ी बहस का मुद्दा है कि उस जमीन पर हिरंतीबाई का हक बनता है या नहीं जिसका निर्णय अदालत करेगी.

0 कई बार तो शादी ी नहीं करते हैं

अनुसूचित जाति जनजाति के परिवार की जमीन हड़पनव उस परिवार की लड़की को गा ले जाने वाले तो कई बार तो लड़की से विधिवित शादी ी नहीं करते हैं बस उसे यूँ ही अपने पास रख लेते हैं और उसकी अस्मत लूट लूट कर उसे प्रताडि़त करते हैं तथा पिता व ाइयों को मजबूर करते हैं कि वे अपनी जमीन का हिस्सा उनके नाम कर दें.

लड़की के पिता व ाई किसी कीमत में पुनः लड़की को अपने घर वापस नहीं रखते क्योंकि आदिवासी लोग परंपरा रीति रिवाज के मामले में आज ी कट्टर हैं. मजबूर होकर लड़की को पति के सामने समर्पण करना ही पड़ता है.

0 पुलिस ी नहीं देती साथ

जब आदिवासी लड़की को उसके परिवार वाले पुनः अपने पास रखने को तैयार नहीं होते और पति उसे प्रताडि़त करता है तो वो पुलिस की शरण में जाती है. यहाँ पुलिस वाले उसे उलटा परेशान करना शुरू करते हैं उससे पूछते हैं शादी कब करी जब वह बताती है कि इतने साल पहले हुई तो कहते हैं कि कहाँ शादी की थी वहाँ का प्रमाण पत्र ला, फोटो ला, शादी का कार्ड ला इत्यादि इत्यादि. अब जब पुरूष ने उससे विधिवत शादी की ही नहीं होती है तो प्रमाण पत्र और कार्ड होते ही नहीं और जब महिला ये सब प्रस्तुत नहीं कर पाती तो पुलिस वाले स्वयं महिला पर चारित्रिक लांक्षन लगा उसे गा देते हैं.

दूसरी परिस्थिति में कई बार महिला शादी के कुछ सबूत पेश कर ी देती है तो इन सबूतों का इस्तेमाल पुलिस अपना चंदा बढ़वाने में कर लेती है. हालाकि घरेलू हिंसा महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 बहुत मजबूत है पर इसके तहत मामलों की कायमी बहुत कम होती है फिर इसके दुरूपयोग की संावना ी अधिक है.

0 क्या कहता है कानून

ारतीय कानून कहता है जिस प्रकार जन्म और मृत्यु का पंजीयन होना चाहिये उसी प्रकार शादियों का ी पंजीयन होना ही चाहिये. पहले ारत में शादियों का पंजीयन अनिवार्य नहीं था किन्तु 25 अक्टूबर गुरूवार 2005 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरिजित पश्यत और एस.एच. कपाडि़या की युगलपीठ ने अपने एक 14 पृष्ठीय फैसले में केन्द्र सरकार और राज्य सरकार को आदेशित किया है कि वे ारत में शादियों का पंजीयन अनिवार्य करें.

इस आदेश के बाद पहले जिले में अपर कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर लेवल का एक मैरिज रजिस्ट्रर होता था पर अब सरकार ने नगरीय क्षेत्रों के लिये नगर पालिका और ग्रामीण क्षेत्रों के लिये सरपंच सचिवों को शादियों के रजिस्ट्रेशन हेतु अधिकृत कर दिया है पर 10 फीसदी लोग ी अपनी शादियों का रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं और प्रशासन ी इसके लिये पहल नहीं करता है.

0 टूट रही धार्मिक व्यवस्था

ारत में पुरातन काल से हर धर्म में शादी का पंजीयन कराने की व्यवस्था है. हर धर्म में समाज के बीच समाज के रजिस्टर में न केवल विवाह का पंजीयन होता है बल्कि वर पक्ष और वधु पक्ष आपस में जिन उपहारों का आदान प्रदान करते हैं उन्हें ी समाज के सामने प्रदर्शित किया जाता है. धीरे धीरे अंतर्जातीय विवाह होने लगे जिससे समाज में शादी के पंजीयन की प्रक्रिया उतनी ठोंस नहीं रही तो सरकार ने मैरिज रजिस्ट्रेशन वैकल्पिक कर दिया और फिर सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के पंजीयन को अनिवार्य ही कर दिया पर उपहारों का रजिस्ट्रेशन अब ी वैकल्पिक ही है सरकार इसे ी अनिवार्य बनाने की योजना बना रही है.

0 उपहार सूचना के लिये ी प्रोत्साहन

इसके अलावा डी.ए.वी.पी. कई बार यह विज्ञापन ी जारी करता है कि शादी के दौरान वर पक्ष और वधु पक्ष आपस में जो उपहारों का आदान प्रदान करते हैं उसकी सूचना ी मैरिज रजिस्ट्रेशन के साथ दें हालाकि उपहारों की सूचना देना अनिवार्य नहीं है पर शादी का पंजीयन जो अनिवार्य है न लोग उसे कराते हैं ऐसे में उपहारों की जानकारी देने का तो सवाल ही नहीं उठता.


0 शहर

आदिवासियों की जमीनों को हड़पने का एक तरीका शादी है जो मुख्यतः गाँवों में प्रचलित है तो दूसरा तरीका शहरी लोगों में प्रचलित है जो दलाल के माध्यम से होता हुआ जाता है जिसमें पटवारी, उप-पंजीयक और कलेक्टर जो कि जिले का सबसे बड़ा राजस्व अधिकारी होता है सब मिले हुए होते हैं.

इस प्रक्रिया में दलाल अहम ूमिका निाता है. वह खरीददार को किसी आदिवासी को धोखे में रखकर या उसकी किसी मजबूरी का फायदा उठाकर उसकी जमीन किसी अमीर को बिकवा देता है. अब नियमों के हिसाब से आदिवासी की जमीन आदिवासी ही खरीद सकता है. इस नियम को काटने के लिये जो अमीर जमीन खरीदता है वह अपने घर में काम कर रहे किसी नौकर या नौकरानी के नाम पर बिना उसे बताये ही जमीन ले लेता है और उसका अंगूठा या हस्ताक्षर वह स्वयं करता है. इस तरह के और ी कई हथकंडे अपनाये जाते हैं. इस तरीके के मूल में या तो आदिवासी को धोखे में रखना होता है या उसकी मजबूरी का फायदा उठाना.

0 इस तरह जिले में आदिवासियों की जमीनों को हड़पने का सिलसिला जारी है.

धोखाधड़ी किये जाने का अपराध धारा 420 के तहत कायम किया जाकर आगे की कार्यवाही प्रारं कर दी गयी है. प्रार्थी रामजी विश्वकर्मा ने पुलिस को बताया है कि वाहन खरीदने के बाद से वह प्रतिमाह 07 किश्तों का ुगतान कर चुका है जिसमें से केवल कंपनी के पास 03 किस्तों का ुगतान प्राप्त हुआ है, शेष 04 किस्त सुशील पांडे द्वारा पैसा लिये जाने के बाद ी जमा नहीं किया गया है. प्रार्थी ने बताया कि उसके द्वारा जमा की गयी किश्तों में पहली बार 36 हजार, दूसरी बार 70 हजार तथा तीसरी बार 01 लाख रूपये कंपनी के खाते में जमा होने बताये गये हैं जबकि शेष 04 किश्तों की रकम 02 लाख 13 हजार जो जमा नहीं है वह आरोपी सुशील पांडे द्वारा हड़प ली गयी है और इसी आधार पर इस 02 लाख 13 हजार की धोखाधड़ी का मामला सुशील पांडे के विरूद्ध दर्ज किया गया.

सोमवार, 11 जुलाई 2011

मुखिया विहीन रेल विभाग ने दी मंत्रियों को सांसे उधार

मुखिया विहीन रेल विभाग ने दी मंत्रियों को सांसे उधार

रेल हादसों ने टाला मंत्रीमण्डल फेरबदल

बुधवार को हो सकता है विस्तार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कालका मेल और कामरूप जिले में हुए रेल हादसे के कारण संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का प्रस्तावित फेरबदल कुछ दिनों के लिए मुल्तवी कर दिया गया है। इस फेरबदल में अनेक मंत्रियों की लाल बत्ती छिनने और कुछ युवाओं को मौका मिलने की आशा जताई जा रही थी। वहीं यह फेरबदल मंगलवार को होने की सुगबुगाहटें भी चल रही हैं।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी के कार्यकाल में रेल की चाल बेहद बेढंगी हो चुकी थी। उनके पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिना मुखिया के संचालित होने वाला रेल विभाग हादसे दर हादसे को ही जन्म देता जा रहा था। भले ही इस तरह के हादसे राष्ट्र के लिए झटका हों पर जिन मंत्रियों की कुर्सी छिनने की आशंका थी वे इसे ईश्वरीय सौगात ही मान रहे होंगे।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के अनुसार गत दिवस कानपुर के पास कालका मेल और उसके बाद रात में असम के कामरूप जिले के रंगिया में गोहाटी पुरी एक्सप्रेस के चार डब्बों में हुए विस्फोट के बाद इस फेरबदल को कुछ समय के लिए टाल दिया गया है। सूत्रों ने कहा कि यह निर्णय कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री के बीच हुए टेलीफोनिक संवाद के उपरांत लिया गया है। सूत्रों ने कहा कि देर रात तक सोमवार के बजाए बुधवार को फेरबदल किए जाने की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार किया गया। आज प्रातः सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच एक बार फिर इस संबंध में चर्चा हुई है।

सरकारी चवन्नी बंद! कांग्रेसी उफान पर

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

सरकारी चवन्नी बंद! कांग्रेसी उफान पर
चवन्नी का चलना बंद हो गया है। कांग्रेस की चवन्नी यानी अमूल बेबी जमकर उफान पर है। कांग्रेस के नोट अर्थात बड़े नेताओं में करिश्माई ताकत नहीं है। बड़े नेताओं में भीड़ जुटाने की ताकत ही नहीं बची है। अपने अपने गढ़ों में भी ये नेता महज चार पांच सौ की भीड़ ही जुटा पा रहे हैं। राहुल के मीडिया मैनेजरों ने मीडिया को दाना चुगाया। राहुल की पदयात्रा को जमकर कव्हरेज मिलने लगा। पदयात्रा में राहुल के आगे पीछे दौड़ने वाले पत्रकारों ने राहुल गांधी से यह बाबा रामदेव या अन्ना हजारे के बारे में प्रश्न नहीं पूछा। कारण साफ है कि राहुल का दौरा कव्हर करने वाले पत्रकारों को जो गाईड लाईन दी गई है उसमें यह है ही नहीं। अपनी सीमाओं के बाहर जाकर प्रश्न पूछने का तात्पर्य यही है कि नौकरी से हाथ धोना। अब भला जोखम कौन उठाए? लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कुछ मीडिया के नुमाईंदे राहुल गांधी के हाथों अपनी अस्मत ही बेच चुके हैं।

कुप्रबंधन का शिकार हुए शिवराज
एक मीडिया घराने द्वारा आयोजित पुरूस्कार प्रोग्राम में एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। इसके लिए विशेष तौर पर आमंत्रित शिवराज को न तो मंच पर ही आसन नसीब हुआ और न ही आयोजक या प्रधानमंत्री ने ही उनके नाम का उल्लेख करना मुनासिब समझा। मीडिया और सरकार के बीच सेतु के तौर पर काम करने वाले जनसंपर्क विभाग के आला अधिकारियों की मौजूदगी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब कार्यक्रम स्थल पहुंचे तब उन्हें मंच तक ले जाने के लिए कोई मौजूद नहीं था। मजबूरी में शिवराज को दर्शक दीर्घा में ही आसन ग्रहण करना पड़ा। उक्त समारोह में प्रधानमंत्री के अलावा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल.जोशी, सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, गिरिजा व्यास आदि को मंच पर बुलवाकर उनसे भी सम्मान दिलवाए गए, किन्तु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पूछा तक नहीं गया।

ये लो आ गए अघोषित सरकारी प्रवक्ता!
प्रधानमंत्री के सलाहकार ने उन्हें एक बेहद बढ़िया मशविरा दिया। पीएम ने देश के चुनिंदा पांच संपादकों की टोली को चर्चा के लिए बुलाया। देश के बाकी संपादक जल भुंज गए होंगे स्वाभाविक है। पांचों संपादक अपने आप को धन्य पा रहे होंगे कि उन्हें पीएम की चाय नसीब हुई। मजे की बात तो यह है कि इस बैठक के बाद इसमें हुई चर्चा के बारे मंे पीएमओ पूरी तरह खामोश रहा। एक झटके में डॉक्टर मनमोहन सिंह को पांच पांच सरकारी अघोषित प्रवक्ताओं की फौज मिल गई, जो सरकार विशेषकर मनमोहन की छवि के निर्माण में लग गए हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता अगर कुछ कहते तो लोग मानते कि इनकी तो ड्यूटी मंे यह शामिल है, किन्तु जब संपादक उस बात को कहेंगे तो लोग जरूर यकीन करेंगे इस बात पर। सरकार द्वारा इस नीति पर काम करके जता दिया है कि मीडिया सरकार के आंगन की लौंडी बन चुका है।

मैडमवादने बढ़ाया भ्रष्टाचार और मंहगाई
लगता है इटली मूल की सोनिया मानियो और भारत के खालिस साधु संतों के बीच सामंजस्य का जबर्दस्त आभाव है। पिछले दिनों रामदेव बाबा और कांग्रेस के बीच जो भी हुआ वह सोनिया के इशारे पर ही माना जा रहा है। अब संत आशाराम बापू के रडार पर सोनिया गांधी आ गईं हैं। सोनिया का नाम लिए बिना बापू का कहना है कि अगर सोनिया की उंगली में चोट लग जाती है तो मैडमवादी देश को सर पर उठा लेते हैं किन्तु रामलीला मैदान पर जो रावणलीला हुई उसके बाद कांग्रेस चुप है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का नाम लिए बिना ही उन पर निशाना साधते हुए बापू का कहना है कि देश में भ्रष्टाचार और मंहगाई का प्रमुख कारण मैडमवादी ही हैं।

फिर विवादों में फंसे कृष्णा!
सदा ही चर्चाओं में रहने वाले विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा एक बार फिर विवादों में उलझ गए हैं। इस बार उनका हालिया इंग्लेण्ड दौरा विवादों का कारण बना है। बताया जाता है कि इंग्लेण्ड के विदेश मंत्री विलियम हॉज के साथ पांच दिवसीय चर्चा के अपने आधिकारिक दौरे के समाप्त होने के बाद भी विदेश मंत्री कृष्णा सरकारी खर्च पर ही एक होटल में रूके रहे। सरकारी यात्रा समाप्त होने के बाद उनके रूकने का कारण विंबलडन मैच था। एक जुलाई को कृष्णा ने विंबलडन पुरूष एकल टेनिस मैच का आनंद उठाया। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि अपने स्वयं के मनोरंजन के लिए सरकारी कोष से खर्च की गई राशि उनसे वसूली जाती है अथवा नहीं! पहले भी मंहगे होटल में दिन काटने के चलते कृष्णा सहित अनेक केंद्रीय मंत्री विवाद में फंस चुके हैं।

मंत्रियांे ने चेताया, नहीं जागे पीएम!
लगता है कामन वेल्थ गेम्स का जिन्न प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह का पीछा छोड़ना ही नहीं चाह रहा है। जब तब रह रह कर यह जिन्न प्रधानमंत्री को साथ लपेट ही लेता है। हाल ही में हुए नए खुलासे से साफ हुआ है कि 2004 में तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने कलमाड़ी को आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाने के प्रस्ताव पर हैरानी व्यक्त की थी। इसके बाद मणिशंकर अय्यर ने कई बार पीएम को चेताया। एम.एस.गिल ने 26 सितंबर 2009 को पीएम को पाती लिखी और कहा कि उन्हें नहीं लगता कि आर्गनाईजिंग कमेटी की शायद ही कभी बेठक हुई हो। तीन तीन खेल मंत्रियों की आपत्तियों के बाद भी प्रधानमंत्री का आंखों पर पट्टी बांधे रहना साफ दर्शाता है कि कलमाड़ी को प्रधानमंत्री ने ही दोनों हाथों से सरकारी खजाना लूटने की छूट प्रदान की थी।

पहले नो गो, फिर प्लीज गो!
पर्यावरण के पहरूआ के तौर पर केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री जयराम रमेश का नाम आकाश पर एकाएक उभरा है। उनके मीडिया मैनेजरों ने उन्हें पर्यावरण का सख्त दरोगा निरूपित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है। देश की अनेक परियोजनाओं को पर्यावरण की हरी झंडी दिखाने से साफ इंकार किया है जयराम रमेश ने। उड़ीसा मंे जिन कोयला ब्लाक्स की मंजूरी रोकने के पहले रमेश ने उन्हें पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदेह बताया था, वे ही कोयला खदानें अब पर्यावरण फ्रेंडली हो गई हैं। जयराम ने हाल ही में पर्यावरण के लिए खतरनाक मानी गई छः कोयला खदानों को ग्रीन सिग्नल प्रदान कर सभी को चौंका दिया है। जयराम के लचीले रूख से सियासी हल्कों में आश्चर्य की लहर दौड़ गई है। कांग्रेस कार्यालय में कहा जाने लगा है -‘‘भई, लोकसभा चुनाव में कम दिन बचे हैं, पार्टी फंड इकट्ठा करना है, फिर खुद भी तो किस्मत आजमानी है, क्या बिना लक्ष्मी मैया की किरपा से यह हो पाएगा?‘‘

एक सप्ताह बाद याद आई चवन्नी की
केंद्र सरकार द्वारा पच्चीस पैसे का प्रचलन 30 जून से बंद कर दिया है। चवन्नी के समाप्त होने की घोषणा मई माह में ही कर दी गई थी। मीडिया ने चवन्नी के बंद होने पर खूब खबरें दिखाई छपाई। गत दिवस एक सप्ताह बाद भारतीय जनता पार्टी को चवन्नी की याद आ गई है। हृदय प्रदेश के एक भाजपा नेता ने न्यायालय के दरवाजे खटखटाए और भोपाल की श्रीमति वर्षा शर्मा की अदालत ने केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर चवन्नी के बंद होने का कारण पूछा है। देखा जाए तो आज पांच रूपए तक के नोट या सिक्कों का ओचित्य समाप्त हो गया है। अब ये कलदार या सिक्के कोनों में पड़े दिखाई पड़ जाते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि मई में हुई घोषणा पर संज्ञान लेने में भाजपा ने इतना वक्त क्यों लगाया?

काले धन कोर्ट हुआ संजीदा
देश का लाखों करोड़ रूपए विदेशों के बैंक में जमा है, यह काला धन है, जो भारतवासियों के गाढ़े पसीने की कमाई का हिस्सा है। बाबा रामदेव इसे विदेश से वापस लाने के लिए अभियान छेड़े हुए हैं। सरकार इस मामले में गोल मोल जवाब दे रही है। जाहिर है सरकार के नुमाईंदों का हिस्सा इसमें है। सरकार के बदसूरत और कुरूप हो चुके चेहरे पर उच्चतम न्यायालय ने तमाचा जड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायधीश व्ही.पी.जीवनरेड्डी की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल का गठन कर दिया है। सरकार के हीला हवाला के बाद कोर्ट ने यह एतिहासिक कदम उठाया है। इस आदेश के बाद सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम द्वारा फैसला पढ़ने के बाद ही प्रतिक्रिया देने की बात कही जा रही है। अब काले धन को जमा करवाने वाले सरगना इसे बचाने की जुगत में लग गए हैं।

राजा ने बेच दी बेशकीमती जमीन!
कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए दो सौ करोड़ की जमीन को महज पौने दो करोड़ में बेचने के संगीन आरोप लगे हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के काला चौकी में मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व में आठ एकड़ जमीन थी, जिसे पौने दो करोड़ रूपयों में एस्क्यू फिनमार्क को बेच दिया गया। कहा जा रहा है कि उस वक्त ही उस इलाके में महज 1800 स्क्वेयर फिट के फ्लेट की कीमत ही करोड़ों रूपयों में थी। इस तरह 3 लाख 52 हजार स्क्वेयर फिट जमीन को पोने दो करोड़ रूपयों मंे बेचने पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक ही है। आज उस जमीन की कीमत दो सौ करोड़ रूपयों से अधिक बताई जा रही है। अब तो हर सूबे को देखना होगा कि उसके मालिकाना हक में किस राज्य में कितनी कितनी जमीन बची है।

कम नहीं हुई रामदेव की मुश्किलें
इक्कीसवीं सदी में स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे हरियाणा के रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव का कांग्रेसनीत संप्रग सरकार से पंगा लेना मंहगा ही पड़ता जा रहा है। रामलीला मैदान से महिलाओं के सिले वस्त्र पहनकर भागे रामदेव विवादों में छाते गए। महज तीन दिन में ही अस्पताल पहुंचने पर उनकी योग क्रियाओं पर ही सवालिया निशान लगने लगे। कहा जाने लगा कि एक योगी महज तीन दिन ही भूख नहीं सहन कर पाया तो वो कैसा योगी? अब प्रवर्तन निदेशालय ने रामदेव की कपंनियांे पर नजर टेड़ी कर ली है। चर्चा है कि अगर बाबा रामदेव कांग्रेस और काले धन के मधुमख्खी के छत्ते में हाथ नहीं डालते तो कांग्रेस के इशारे पर सरकार उनके पीछे नहीं पड़ती और वे 1100 करोड़ के अपने साम्राज्य को दो चार साल में ही 11 लाख करोड़ में तब्दील कर लेते, पर लुटती तो अंततः जनता ही।

पूरा आराम पा रहे हैं व्हीआईपी तिहाड़ में
आरंभ से ही कारागार को प्राश्चित्त का साधन माना गया है। कारागार में समाज से दूर कैदी सुख सुविधाओं के अभाव में अपने गलत कामों का प्राश्चित्त करता है। इक्कीसवीं सदी के कारागार इस धारणा को पूरी तरह झुटला रहे हैं। बीते दिनों एक न्यायधीश ने तिहाड़ जेल का औचक निरीक्षण किया और पाया कि जेल आधीक्षक एस.सी.भारद्वाज कामन वेल्थ घोटाले के सरगना सुरेश कलमाड़ी के साथ अपने आफिस में चाय पी रहे थे। जज ने पाया कि जेल प्रशासन द्वारा जेल में हाई प्रोफाईल कैदियों को ज्यादा ही छूट दी रखी थी। तिहाड़ में व्हीआईपी ट्रीटमेंट की सुविधा भी अघोषित तौर पर थी, जिसे बंद करने का फरमान जारी हो गया है। जेल में अनेक कैदियों का खाना बाहर से आता है तो कई गर्मी में अधिकारियों के एसी चेम्बर में बैठे रहते हैं। कई अतिविशिष्ट कैदियों को तो नशे की वस्तुएं तक बाहर से मुहैया करवाई जाती हैं।

लाट साहेब से दूर जनसंपर्क विभाग!
मध्य प्रदेश के महामहिम राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर दिल्ली प्रवास पर हों और जनसंपर्क विभाग को खबर न हो, है न आश्चर्य की बात। जी हां! शुक्रवार एक जुलाई को रामेश्वर ठाकुर दिल्ली में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए और मध्य प्रदेश का सूचना केंद्र इससे अनजान रहा! महामहिम के प्रोटोकाल की दृष्टि से इसे गंभीर त्रुटि माना जा रहा है। द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट ऑफ इंडियाके स्थापना समारोह के अवसर पर रामेश्वर ठाकुर के मुख्य आतिथि थे। इस अवसर पर मध्य प्रदेश को कव्हर करने वाले मीडिया पर्सन्स तब हैरत में पड़ गए जब दिल्ली से प्रकाशित अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन तो देखने को मिला किन्तु उन्हें मध्य प्रदेश सूचना केंद्र की ओर से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि महामहिम के भोपाल दिल्ली के बहुतायत में होने वाले दौरों से अधिकारी भी आजिज आ चुके हैं, फिर स्टेट की ओर से उन्हें व्हीव्हीआईपी ट्रीटमेंट देने का कोई विशेष फरमान भी तो नहीं आया है।

पुच्छल तारा
देश में नई बहस चल पड़ी है, यह कि प्रधानमंत्री कमजोर हैं या मजबूत! देश डॉक्टर मनमोहन सिंह को कमजोर तो पीएम खुद को मजबूत जतला रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस के कुछ अति उत्साही नेताओं ने राहुल गांधी के सामने अपने नंबर बढ़वाने के लिए डॉक्टर साहेब को हटाने की खबरें प्लांट करवा दीं। करनाल से सतबीर कौर ने ईमेल भेजा है। सतबीर लिखती हैं कि देश में काला धन, लोकपाल, आतंकवाद, तेलंगाना, अलगाववाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, नक्सलवाद, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, क्षेत्रवाद, एस.बेण्ड घोटाला, भाषावाद, न जाने कितने प्रकार के संकट हैं। आज हालत 2001 में मध्य प्रदेश की तरह ही हैं। एमपी में तत्कालीन निजाम राजा दिग्विजय सिंह ने सियासत में इतना कीचड़ मचा दिया था कि कोई भी यहां मुख्यमंत्री बनने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। आज देश में वही हालत हैं। तभी तो पीएम के करीबी उन्हें आश्वस्त कर सलाह दे रहे हैं कि पीएम बदलने की बातें कोरी अफवाह हैं। अरे भई, इतनी भयानक परेशानियों के चलते कोई नया आदमी जोखम उठाने से रहा न।

रविवार, 10 जुलाई 2011

मंत्रीमण्डल विस्तार सोमवार को!

मंत्रीमण्डल विस्तार सोमवार को!

भूरिया की छुट्टी तय, साधो पा सकती हैं लाल बत्ती

सिंधिया की हो सकती है पदोन्नति

कमल नाथ पर लटक रही तलवार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। बहुप्रतिक्षित केंद्रीय मंत्रीमण्डल विस्तार सोमवार को शाम पांच बजे होने की उम्मीद है। कांग्रेस के प्रबंधकों की सहयोगी दलों से मुलाकात और प्राधानमंत्री एवं सोनिया गांधी की मुलाकात से सियासी फिजा में गर्माहट आ गई है। इस विस्तार में मध्य प्रदेश के प्रभावित होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके अलावा कम ही चेहरों को पदोन्नति मिल सकती है। साथ ही दर्जन भर मंत्रियों पर तलवार भी लटक रही है।

कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष कंेद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी के सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेजा थामने वाले कांति लाल भूरिया को इस बार ड्राप किया जा रहा है। भूरिया मालवांचल से हैं इसी को बैलेंस करने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी द्वारा राज्य सभा सदस्य विजय लक्ष्मी साधो का नाम आगे बढ़ाया जा रहा है। सूत्रों ने संकेत दिए कि राहुल गांधी की युवाओं को आगे लाने की सोच के चलते ज्यातिरादित्य सिंधिया का कद बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं शहरी विकास मंत्री कमल नाथ पर आलाकमान की नजरें तिरछी हो गई हैं।

गौरतलब होगा कि पृथ्वीराज चव्हाण के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने, ममता के पश्चिम बंगाल के निजाम बनने और दयानिधि मारन के त्यागपत्र से रिक्त हुए विभागों का कार्यभार अन्य मंत्रियांे का अतिरिक्त तौर पर सौंपा गया है। जिन मंत्रियों की बिदाई तय मानी जा रही है, उनमें कंपनी मामलों के मंत्री मुरली देवड़ा, खान मंत्री बी.के.हांडिक और आदिवासी मामलों के मंत्री कांति लाल भूरिया प्रमुख हैं। भूरिया की लाल बत्ती बरकरार रखने के लिए महासचिव राजा दिग्विजय सिंह प्रयासरत हैं।

जिन मंत्रियोें का कद बढ़ सकता है उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा, पेट्रोलियम मंत्री जतिन प्रसाद के नाम प्रमुखता से उभर कर आए हैं। उधर छत्तीसगढ़ कोटे से इस बार चरण दास महंत की लाटरी लग सकती है। इसके अलावा जिन मंत्रियों पर तलवार लटक रही है उनमें शहरी विकास मंत्री कमल नाथ, कृषि मंत्री शरद पवार, एचआरडी और संचार मंत्री कपिल सिब्बल, पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, भारी उद्योग प्रफुल्ल पटेल, एस.एम.कृष्णा, पवन बंसल, फारूख अब्दुल्ला और पवन बंसल प्रमुख हैं। सूत्रों ने विस्तार सोमवार को शाम पांच बजे होने के संकेत दिए हैं।

सत्ता में कांग्रेस का नया गठजोड़ बनकर उभरा है मनमोहन और प्रणव मुखर्जी का साथ। कहा जा रहा है कि प्रणव मुखर्जी को उनके पसंदीदा विभाग के साथ ही उप प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। साथ ही गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम से नाराज प्रणव मुखर्जी उन्हें रूखसत करने पर तुले हैं तो इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ, कपिल सिब्बल और कृष्णा को राहुल गांधी की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

भूरिया के बूते नहीं उबरने वाली कांग्रेस

भूरिया के बूते नहीं उबरने वाली कांग्रेस

उखड़ चुके हैं कांग्रेस के मध्य प्रदेश में पैर

ताबूत की आखिरी कील थी 2003 का विधानसभा चुनाव

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। गुटांे में बटी मध्य प्रदेश की कांग्रेस का सदमे से उबरना अब मुश्किल ही प्रतीत हो रहा है। 2003 के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस का जो सूपड़ा साफ हुआ है उस सदमे से आठ सालों के बाद भी कांग्रेस उबर नहीं सकी है। मध्य प्रदेश कोटे से केंद्र में मंत्री कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूरिया और अरूण यादव ने भी प्रदेश में कांग्रेस को जिलाने का प्रयास नहीं किया है।

2003 में राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में लड़े गए विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित होता जा रहा है। कांग्रेस ने इसके बाद जो आत्मविश्वास खोया वह न तो सुभाष यादव के नेतृत्व में और न ही सुरेश पचौरी के नेतृत्व में कांग्रेस को वापस मिल पाया। कांग्रेस के वर्तमान निजाम कांतिलाल भूरिया के कदमों को देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस का रसातल से उबरना मुश्किल ही है।

आलम यह है कि अब तो उपचुनावों में ही कांग्रेस अपनी परंपरागत समझी जाने वाली सीटों को ही खोती जा रही है। जमुना बुआ द्वारा सींची गई धार जिले की सीट कांग्रेस के हाथों से फिसल गई। इसके बाद 15 साल से कांग्रेस के कब्जे वाली सोनकच्छ विधानसभा से उसे हाथ धोना पड़ा। धीरे धीरे भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा का इकबाल बुलंद होता गया और भाजपा ने हेट्रिक लगाते हुए 18 साल से कांग्रेस के कब्जे वाली दमोह जिले की जबेरा सीट हथिया ली।
आंकड़ों की बाजीगरी के पुरोधा समझे जाने वाले मध्य प्रदेश के कांग्रेसी क्षत्रपों द्वारा बार बार कांग्रेस की पराजय के बाद भी आलाकमान के सामने वोट का परसेंटेज बढ़ने की बात कहकर भरमाया जा रहा है। जमीनी हालातों से अनजान कांग्रेस आलाकमान को भी इस बात से कुछ लेना देना नहीं है कि कांग्रेस की सीटों में तेजी से कमी दर्ज की जा रही है।

2004 के बाद केंद्र में सत्ता की मलाई चखने वाले कमल नाथ, सिंधिया, भूरिया और अरूण यादव ने समूचे मध्य प्रदेश के बजाए अपने अपने संसदीय क्षेत्रों का भी भ्रमण ठीक तरीके से नहीं किया है। कांग्रेस के रसातल में जाने की खबर इन नेताओं को भली भांति है। सत्ता के मद में चूर इन नेताओं को इस बात की परवाह भी नहीं रही कि इनके समर्थकों की तादाद में भी तेजी से कमी आई है। जब इन्हें अपने समर्थकों की परवाह नहीं तो फिर भला कांग्रेस के बारे में ये क्यों सोचने लगे?

शीर्ष स्तर पर सब कुछ सामान्य नहीं है कांग्रेस में

शीर्ष स्तर पर सब कुछ सामान्य नहीं है कांग्रेस में

प्रणव सोनिया के बीच अनबन हो रही सार्वजनिक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में वर्तमान में शीर्ष स्तर पर सब कुछ सामान्य सा नहीं दिख रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के ट्रबल शूटर प्रणव मुखर्जी अब सोनिया के बजाए मनमोहन के लिए ज्यादा पाबंद दिखाई दे रहे हैं। प्रणव मुखर्जी के कार्यालय की जासूसी के मामले से प्रणव और सोनिया के बीच की खाई बढ़ती जा रही है।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि मुखर्जी को शक है कि उनके कार्यालय की जासूसी सोनिया के इशारे पर ही संभव हो सकी है। सूत्रों ने कहा कि प्रणव मुखर्जी ने पहले एक गुप्चर एजेंसी के माध्यम से पूरे मामले की तहकीकात करवाई और जब इस मामले की गंभीरता उनके सामने आई तब उन्होंने इसकी शिकायत प्रधान मंत्री से की।

अब भले ही प्रणव मुखर्जी यह कह रहे हों कि वे आईबी की जांच से संतुष्ट हैं किन्तु उनके मन में यह बात घर कर गई है कि उनकी जासूसी करवाने वाली ताकत कांग्रेस की प्रमुख रणनीतिकार दल में ही है। प्रणव को इस बात की चिंता भी सता रही है कि एक अगस्त से आहूत संसद के मानसून सत्र में अन्य मामलों के साथ जासूसी मुद्दा भी गरमाएगा।

प्रणव के बाद सोनिया की कोटरी में उनका स्थान लेने के लिए मची होड़ में अब कांग्रेस के आलंबरदार सोनिया और प्रणव के बीच की दूरी को बढ़़ाने का काम कर रहे हैं। कांग्रेस के अंदर खाते से आ रही खबरों के अनुसार जासूसी सहित अन्य मामलों से नाराज प्रणव मुखर्जी ने अब प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह का पाला थाम लिया है, जिससे अब सत्ता और संगठन आमने सामने आ गए हैं।

मनरेगा में भ्रष्टतम है मध्य प्रदेश

मनरेगा में भ्रष्टतम है मध्य प्रदेश

पांच सालों से नहीं की विजलेंस मानीटरिंग कमेटी की बैठक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) में भ्रष्टाचार की गूंज के बीच देश का हृदय प्रदेश इसका सरताज बनता जा रहा है। मध्य प्रदेश सहित बिहार, पंजाब, गुजरात, झारखण्ड, उत्तराखंड जैसे राज्यों मंे पिछले पांच सालों से मनरेगा के लिए सूबाई और जिला स्तर पर बनी विजलेंस मानीटरिंग सिमितियों की एक भी बैठक न होने से भ्रष्टाचार फलने फूलने के मार्ग प्रशस्त होते जा रहे हैं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय ने मनरेगा के अस्तित्व में आने के साथ ही इसके कार्यों की निगरानी के लिए एक विजलेंस मानीटरिंग कमेटी का गठन किया था। इसके गठन के पीछे यह उद्देश्य था कि जिला कलेक्टर्स द्वारा नियमित तौर पर मनरेगा के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं से सरकार को आवगत करवाया जाए, ताकि इसमें वांछित सुधार किया जा सके। ग्रामीण विकास विभाग के सूत्रों का कहना है कि खराब प्रदर्शन करने वाले कलेक्टर्स को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है।

विभाग ने इस साल अप्रेल तक विजलेंस मानीटरिंग कमेटी की बैठकों के बारे में पांच साल का पूरा ब्योरा प्रस्तुत किया तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। इसके मुताबिक महाराष्ट्र ने महज 9, राजस्थान एवं यूपी ने 3 3, छत्तीसगढ़ ने दो ही बैठकों का आयोजन किया है। विभाग के आला अधिकारियों का कहना है कि पिछले पांच सालों में देश में कम से कम 330 बैठकों का आयोजन किया जाना था, जिनमें से महज 56 बैठकें ही आहूत हो सकी हैं।

गौरतलब होगा कि मनरेगा के नियमों में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य स्तर पर इसकी साल में कम से कम दो और जिला स्तर पर कम से कम चार बैठकें आयोजित करना अनिवार्य है। इसमें सांसदों और विधायकों को शरीक करवाने का दायित्व भी जिला कलेक्टर्स के कांधों पर ही डाला गया है। सूत्रों का कहना है कि विभाग का मानना है कि विजलेंस मानीटरिंग समिति की बैठक न होना ही इसमें भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण है।

विलासराव के घर की शान बनंेगी जेनेलिया

विलासराव के घर की शान बनंेगी जेनेलिया

जल्द हो सकत है रीतेश से डिसूजा का विवाह

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख के घर जल्द ही शहनाई बजने वाली है। वालीवुड में चल रही बयार के अनुसार उनके बेटे और सिने स्टार रीतेश देशमुख और सिने तारिका जेनेलिया डिसूजा परिणय सूत्र में आबद्ध होने वाले हैं। वैसे भी रीतेश और जेनेलिया के बीच रोमांस की खबरें वालीवुड में छाई हुई हैं। जेनेलिया ने अपना फिल्मी केरियर तुझे मेरी कसमसे आरंभ किया था। इसके बाद उन्हें जाने तू या जाने नलाईफ पार्टनर, मेरे बाप पहले आप से काफी शोहरत मिली।

‘हाय हाय‘ नहीं सरकारी दफ्तर मंे चलेगी कलम

हाय हायनहीं सरकारी दफ्तर मंे चलेगी कलम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। खुशी के मौकों पर घरों में ताली बजाकर हाय हायकरने वाले किन्नरों को अब सरकारी कार्यालयों में नौकरी मिल सकती है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायायल ने एक फैसले में किन्नरों के सरकारी नौकर बनने के रास्ते साफ कर दिए हैं। न्यायालय ने केंद्र सरकार को भी निर्देश दिया है कि पंजाब सरकार की तरह वह भी किन्नरों को नौकरी पर रखने पर विचार अवश्य करे।

पंजाब की किन्नर काजल द्वारा दायर परिवार पर फैसला सुनाते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश आदर्श कुमार गोयल और अजय कुमार मित्तल की खण्डपीठ ने कहा कि किन्नर सरकारी नौकरी के योग्य हैं। केंद्र ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए साफ किया था कि नपुंसकता को विकलांगता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वहीं पंजाब सरकार का कहना था कि नौकरियों में पुरूष और महिला के साथ ही साथ ट्रांसजेंडर का कालम भी रखा जाएगा।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार के ‘‘ईमानदार संरक्षक‘‘ मनमोहन

भ्रष्टाचार के ‘‘ईमानदार संरक्षक‘‘ मनमोहन

(लिमटी खरे)

पांच संपादकों की ‘टोली‘ के सामने अपने आप पर अघोषित तौर पर लगे ‘कमजोर‘ के तगमे को खुद ही खारिज करने से प्रधानमंत्री अपने आप को मजबूत साबित नहीं कर पाए हैं। इसके पहले फरवरी में चुनिंदा न्यूज चेनल्स के साथ अपनी बात रखकर पीएम ने कुछ इसी तरह का उपक्रम किया था। हर मोर्चे पर असफल प्रधानमंत्री ने जनता को संदेश देने के लिए सरकारी माध्यम ‘दूरदर्शन‘ और ‘आकाशवाणी‘ के बजाए निजी समाचार चेनल्स और संपादकों की टोली को चुनकर साफ कर दिया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सबसे सशक्त इन दोनों माध्यमों पर से न केवल जनता का भरोसा उठा है, वरन सरकार का भरोसा भी इस पर से उठ चुका है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि खुद सत्ता की मलाई चखते रहने के लिए प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने आदिमत्थू राजा और सुरेश कलमाड़ी को जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से भरे राजकोष को लूटने की खुली छूट दे रखी थी। देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या कहा जाएगा कि एक से बढ़कर एक नगीने होने के बाद भी कांग्रेस के सिपाहसलार सामंती तौर तरीकों से अपनी प्रजा (देश वासियांे) को सूचित कर रहे हैं कि अब फलां (युवराज राहुल गांधी) राज काज संभालने के योग्य हो गए हैं। राजा की सभा के सभासद (मंत्री और संगठन के पदाधिकारी) हाथ बांधे ‘युवराज की जय हा‘े का उद्घोष करने में व्यस्त हैं।
अर्थशास्त्र के प्रकाण्ड विद्व़ान माने जाते हैं वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह। डॉक्टर साहेब के प्रधानमंत्री बनते ही देश वासियों को लगने लगा था कि अब देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आ जाएगा। जनता का यह भ्रम था कि अर्थशास्त्री के हाथ अगर देश की बागडोर सौंप दी जाए तो अर्थ व्यवस्था पटरी पर आ सकती है। जिस तरह किसी चिकित्सक को अगर देश का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया जाए तो माना जाता है कि वहां स्वास्थ्य सुविधाएं कुछ तो सही हो जाएंगी। वस्तुतः लोकतंत्र वह भी इक्कीसवीं सदी के इस घटिया लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में देश को न अर्थ शास्त्री की आवश्यक्ता है और न ही किसी विशेष विधा में पारंगत नेता की। आज जरूरत है तो एक कुशल प्रशासक की, जो अपनी कुर्सी की परवाह न करते हुए देश हित में सहयोगी दलों या अपने ही दल के नुमाईंदों के हितों को न देखते हुए कड़े फैसले ले।

पांच क्षेत्रीय संपादकों के साथ बंद कमरे में प्रधानमंत्री ने क्या गुफ्तगू की किसी को पता नहीं। इसके बाद सरकारी तौर पर इस बैठक के बारे में कुछ नहीं कहा गया। देश के सामने इस बैठक की तस्वीर पेश की पांचों संपादकों ने। समूचे देश में एक ही बात सामने आ रही थी कि प्रधानमंत्री ने इन पांच लोगों को अपने घर बुलाकर चाय पिला, कुछ चर्चा कर सरकार के अघोषित पांच प्रवक्ता तैयार कर लिए हैं। होना यह था कि सरकार की ओर से इस बैठक की ब्रीफिंग मीडिया को दी जानी चाहिए थी, वस्तुतः एसा हुआ नहीं। कुल मिलाकर पीएम ने इन पांच कथित मीडिया मुगलों के साथ बंद कमरे में न जाने क्या बातचीत की जिसे लोग ‘डीलिंग‘ कह रहे हैं कि इन संपादकों के सुर ही बदल गए। सभी एक साथ सरकार की हां में हां मिलाने लगे। पीएम के मीडिया एडवाईजर्स का तीर निशाने पर लगा और कुछ दिनों के लिए ही सही पीएम की छवि मजबूत पेश हो गई वह भी कुछ चुनिंदा मीडिया घरानों में।

आज अगर पीएम और पांच क्षेत्रीय संपादकों की बैठक का विश्लेषण किया जाए तो सामने आने वाले तथ्य निराशाजनक ही हैं। बतौर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन ंिसह ने भ्रष्टाचार और मंहगाई पर अपनी असफलता को छिपाने का सबसे उत्तम प्रयास किया था यह। प्रधानमंत्री ने कभी खुद को कमजोर नहीं कहा तो फिर वे अपने आप को ‘कमजोर नहीं‘ कहने के लिए कैसे उपयुक्त माने जा सकते हैं। जो कल तक उन्हें कमजोर कहते थे वे आज भी उन्हें कमजोर ही जता रहे हैं। कमोबेश हर संवेदनशील मुद्दे पर पीएम की खामोशी उनकी कमजोरी का परिचायक ही मानी जा सकती है।

पिछले तीन सालों से मंहगाई का रूख किसी से छिपा नहीं है। हर मर्तबा पीएम और वित्त मंत्री मंहगाई कम करने के लिए तीन तीन माह की ‘पेशी की तारीख‘ लेते जा रहे हैं। तारीख लेने के तत्काल बाद ही पीएम कहते हैं कि उनके हाथ में जादू की छड़ी नहीं है कि मंहगाई कम कर दें। संपादकों की टोली के साथ बैठक में उन्होंने इस बार सीधे नौ महीने की तारीख लेकर मामला मार्च तक टाल दिया है। बुद्धिजीवि संपादकों ने भी पीएम को पिछले तीन सालों से ‘तारीख पर तारीख‘ के बारे में कोई सवाल जवाब नहीं किया जाना साबित करता है कि वे भी प्रधानमंत्री की ‘चाय‘ से किस कदर ‘उपकृत‘ महसूस कर रहे थे।

दरअसल मंहगाई के मोर्चे पर पीएम पूरी तरह असफल ही साबित हुए हैं। दालों का ही मामला लें तो दालों के सबसे अधिक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता टर्की, मियांमार और आस्ट्रेलिया से दालों की आपूर्ति सही तरीके से नहीं हो पाई। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार पर आरोप है कि उन्होंने देश की गरीब जनता के बजाए अपने मित्रों के व्यवसायिक हित साधे। मंहगाई सुरसा की तरह मुंह फाड़ रही है। अनाज खुले मंे पड़ा सड़ रहा है, न्यायालय इस पर संज्ञान ले रहा है, सरकार को निर्देश दे रहा है कि अगर इसे संभाल नहीं सकते तो गरीबों में बांट दो, पर नतीजा सिफर ही है। अगर यह अनाज गरीबों में बांट दिया जाएगा तो गोदामों में भरा औद्योगिक घरानों का अनाज मंहगी दरों पर कौन खरीदेगा? हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मनमोहन की आर्थिक नीतियां महज कुछ औद्योगिक घरानों के हित साधने के लिए ही बनाई गई थीं। बार बार गठबंधन धर्म की दुहाई देने वाले वजीरे आजम यह भूल जाते हैं कि गठबंधन धर्म से बड़ा राष्ट्रधर्म है जिसके पालन में वे पूरी तरह असफल ही साबित हुए हैं।

इन संपादकों की टोली के साथ वार्ता के दौरान मनमोहन सिंह फरमा रहे थे कि मीडिया से उन्हें शिकायत है। मीडिया खुद ही अपील, दलील और मुंसिफ की भूमिका में आ जाता है। संपादक भी यह कहने का साहस नहीं जुटा पाए कि यह मीडिया ही है जिसने इतने घपले और घोटाले उजागर किए हैं। रही बात मुंसिफ या दलील अथवा अपील की तो जब सरकार का पक्ष सदा ही मौन रहे तो मीडिया को क्या करना चाहिए? क्या सरकार का यह दायित्व नहीं कि वह आरोपों का जवाब दे।

आज मीडिया के माध्यम से ही यह जानकारी भी सार्वजनिक हो रही है कि टूजी मामले में पीएमओ को सारी बातों की जानकारी थी। कामन वेल्थ गेम्स के घोटाले से भी पीएमओ अनजान नहीं था। जब ये परिस्थितियां हैं तो क्या देश की एक सौ इक्कीस करोड़ जनता के प्रति प्रधानमंत्री की यह जवाबदेही नहीं बनती कि वे सामने आएं और अपनी तथा प्रधानमंत्री कार्यालय की स्थिति स्पष्ट करें। दूसरों पर आरोप लगाना ‘परनिंद‘ जैसे सुख की अनुभूति करवाता है।

कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) और प्रधानमंत्री आवास के बीच खाई खुद चुकी है, जो सार्वजनिक तौर पर धुंधली दिखाई पड़ रही है। सोनिया ने भी प्रधानमंत्री को अकेला छोड़ दिया है। यही कारण है कि रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ हुई रावणलीला के तत्काल बाद उन्होनें सरकार का बचाव करने के बजाए अपने पीहर ‘इटली‘ जाना उचित समझा। इतना ही नहीं युवराज राहुल ने भी माता का अनुसरण किया और नानी से मिलने जा पहुंचे।

एक तरफ तो प्रधानमंत्री खुद को मजबूत जताने का प्रयास करते हैं वहीं दूसरी ओर राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मार्ग प्रशस्त करते नजर आते हैं। देश मंे लोकतंत्र की स्थापना के छः दशक बीत चुके हैं। आज राजशाही का कहीं नामोनिशान नहीं है, किन्तु कांग्रेस के राज में देश में स्थापित लोकतंत्र और कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र देखिए। देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या कहा जाएगा कि एक से बढ़कर एक नगीने होने के बाद भी कांग्रेस के सिपाहसलार सामंती तौर तरीकों से अपनी प्रजा (देश वासियांे) को सूचित कर रहे हैं कि अब फलां (युवराज राहुल गांधी) राज काज संभालने के योग्य हो गए हैं। राजा की सभा के सभासद (मंत्री और संगठन के पदाधिकारी) हाथ बांधे ‘युवराज की जय हा‘े का उद्घोष करने में व्यस्त हैं।