शनिवार, 22 दिसंबर 2012

महानता के बरगद तले भारतीय रंगमंच


महानता के बरगद तले भारतीय रंगमंच

(अश्विनी कुमार पंकज)

सामंती और औपनिवेशिक गुलामी से भारतीय समाज अभी भी उबरा नहीं है। बल्कि ग्लोबलाइजेशन के बाद उसमें और गहरे धंस जाने की होड़ लगी है। भारत के स्त्री, किसान-मजदूर और दलित-वंचित उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के सृजन संघर्ष को साहित्य, कला, रंगमंच में अंकन का ऐतिहासिक सवाल हो या फिर आर्थिक-सामाजिक क्षेत्रों में उनकी दावेदारी की बात हो, चाहे शिक्षा, संस्कृति, इतिहास, राजनीति, आजीविका का मंच हो, सामंती और औपनिवेशिक जकड़न ढीली होने की बजाय और मजबूत होती ही दिख रही है। अंधश्रद्धा व आस्था का बाजार इस कदर हावी है कि आप किसी महानपर उंगली नहीं उठा सकते, मिथकों और इतिहास का पुनर्पाठ नहीं कर सकते। लिंगगत, नस्लीय, जातीय अमानवीय धार्मिक परंपराओं पर सवाल नहीं कर सकते। गिरीश कारनाड जैसे संजीदा नाटककार द्वारा टैगोर पर दिए गए बयान कि वे एक महान कवि तो हैं पर दोयम दर्जे के नाटककार हैपर जिस तरह से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसका एक बड़ा संकेत यही है कि हम सामंती-औपनिवेशिक गुलाम मानसिकता से निकलने को तैयार नहीं हैं। टैगोर पर इसलिए सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि वे महानहैं।
साहित्यिक क्षेत्र में इस तरह के वक्तव्यों, विचारों का विवाद नया नहीं है, पर यह पहली बार हुआ है कि किसी एक ही बयान ने अभिव्यक्ति की दो बड़ी विधाओं के व्यापक परिधि को एक साथ अतिक्रमित किया है। टैगोर साहित्य भी रचते हैं, नाटककार भी हैं, गायक और संगीतज्ञ भी हैं। कुल मिलाकर एक व्यापक सांस्कृतिक दायरा हैं टैगोर। वह भी भारतीय नवजागरण के अग्रदूतबंगाल के नागरिक। जाहिर है, कारनाड के बयान की चोटिलता भी बड़े स्तर पर महसूस करेंगे लोग। लेकिन कारनाड का बयान जिस विमर्श की मांग कर रहा है, प्रतिक्रियाएं और जोर उस पर कम, महानता व कारनाड की नीयत पर ज्यादा केन्द्रित हैं। यह महानतावाद सामंती व औपनिवेशिक मानसिकता है और इसी आलोक में कारनाड के बयान पर विमर्श जरूरी है।
औपनिवेशिक गुलामी का प्रमुख लक्षण है सत्ता द्वारा स्थापित प्रतीकों को आंख मंदकर भक्तिभाव से स्वीकार कर लेना। अगर हम गोर्की जैसे विदेशी शख्सीयत की बजाय भारतेंदु, फुले, भिखारी ठाकुर, स्वामी अछूतानंद, प्रेमचंद, निराला, धूमिल, रघुनाथ मुर्मू जैसों की ही बात करें तो क्या इनकी लोकप्रियता नोबल या ज्ञानपीठ जैसे पुरस्कारों की देन है? जाहिर है कि नहीं। आप जानते हैं कि शेक्सपीयर जैसे साहित्यकारों की विश्वव्यापी लोकप्रियता ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने गढ़ी है। वे अपनी अंग्रेजी भाषा के साथ शेक्सपीयर को अपने कॉलोनी देशों में नहीं ले जाते तो इन्हें कोई भी वैसे ही नहीं जानता जैसे कि हम 19वीं सदी के या इसके पूर्व के अन्य लेखकों को नहीं जानते। शायद वे शेक्सपीयर से महान भी हों।
इसी तरह यह मानते हुए भी कि टैगोर निःसंदेह महान रचनाकार हैं उनकी व्यापक स्वीकार्यता में नोबल की प्रभावी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रेमचंद और टैगोर के सांस्कृतिक विस्तार के दो विपरीत छोर हैं। एक औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ शासकवर्ग के तमाम अवरोधों बंदिशों के बीच व्यापकता ग्रहण करता है तो दूसरा उसके पुरस्कार के जरिए। लोकप्रियता के इस आयाम में प्रभुसत्ता के स्वीकृति की औपनिवेशिक मानसिकता रही है, तब और आज के अनुभवों से तो ऐसा ही मालूम होता है। व्यापक स्तर पर गोष्ठियां, विमर्श, स्मृतियां, सम्मान, श्रद्धांजलियां उन्हीं लोगों को समर्पित होती हैं जो बड़े सरकारी या ज्ञानपीठ-नोबल जैसे लखटकिया गैर-सरकारी पुरस्कारों-सम्मानों से अलंकृत हुए रहते हैं, महानगरों में रहते हैं, या फिर अपनी रचनाओं से महानगरों में उपस्थित हुए रहते हैं। भाषा नहीं जानने के कारण हम गैरहिंदी राज्यों के लोगों को नहीं जानते हैं, यह एक अलग मुद्दा है। परंतु हिंदी क्षेत्र के ही लोगों के साथ जब यह लगातार हो रहा हो, मामला बहुत संजीदा हो जाता है। जबकि साहित्य, कला, रंगमंच के सभी क्षेत्रों में हम और आप सभी शायद ऐसे बहुत लोगों को शायद जानते हों जो रचना के स्तर पर किसी भी महानरचनाकार से कमतर नहीं हैं। पर पुरस्कार-सम्मान व महानगरों में वे नहीं हैं इसलिए उनके रचने-जीने-मरने से हमारा कोई सरोकार नहीं है।
भाषाई विभिन्नता भी इसमें एक कारक है। पर इसके बरक्स जब हम यह देखते हैं कि अंग्रेजी के चश्मे से दुनिया को देखने-समझने में हमारी जितनी दिलचस्पी है, उतना लगाव हम अपने आसपास, अगल-बगल के अन्य भारतीय भाषिक समाज के प्रति बिल्कुल नहीं रखते है। उत्तर-मध्य भारत के विशाल हिंदी पट्टी में हिंदी किसी की मातृभाषा नहीं है। स्पष्ट है कि हिंदी क्षेत्र अनेको देशज बोलियों व भाषाओं का समुच्चय है। फिर यह सांस्कृतिक समुच्चय हिंदी के सृजनात्मक संसार में क्यों नहीं दिखता? उनको रोजाना देखते हुए भी हिंदी विश्व के आंख-कान क्यों बंद हैं? आसपड़ोस के स्वयं से इतर भाषाई समाज का घर-गांव हम नहीं देख रहे परंतु फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि न जाकर भी दिन-रात उसी ओर नजर गड़ाए हुए हैं। यह और कुछ नहीं प्रभुसत्ता के मापदंडों व उनके मूल्यों पर खरे उतरने, उनकी स्वीकृतियां पाने और वैश्विक (सामंाज्य विस्तार) आकांक्षाओं की ही औपनिवेशिक मानसिकता है।
साहित्य और रंगमंच से हमारा रिश्ता रहा है और इस परिचय के आधार पर कह सकता हूं कि महानताके मापदंड औपनिवेशिक हैं। जैसे आजादी (सत्ता हस्तांतरण) के बाद शासन, प्रशासन, विधि व्यवस्था, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में औपनिवेशिक नीतियों को जस का तस लागू कर दिया गया और जब-जब इनमें से किसी केे खिलाफ व्यापक जनाक्रोश सामने आया, कुछ लीपा-पोती कर दी गई। इसी तरह सृजनशील विधाओं में भी सामंती और पूंजीवादी मूल्यों को ही कुछ भारतीयकिस्म का रंगरोगन कर औपनिवेशिक गुलामी को स्वीकार कर लिया गया। सांस्कृतिक स्तर पर यह सब बहुत ही सुनियोजित ढंग से हुआ और शासक वर्ग ने इसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भरपूर सहयोग दिया। सत्ता हस्तांतरण के बाद नये भारत के निर्माण व एकीकरण की बुनियाद हिंदी हिंदू हिंदुस्तानही रहा। भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता को संविधान में स्वायत्तता और अधिकार प्रदत्त करने की संकल्पना के बावजूद संस्कृतिकरणकी नीति जबरन थोप दी गई। परिणाम हमारे सामने हैं। सत्ता हस्तांतरण के छह दशकों बाद भी भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता के समर्थन, संरक्षण व विस्तार का मसला महज तात्कालिक राजनीतिक फायदे-नुकसान का मुद्दा है। भारत की चारों भौगोलिक व राजनीतिक दिशाएं - उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम - एकदूसरे से अनजान हैं और राष्ट्रीयता व आत्मनिर्णय के अधिकार के सवाल पर राज्यसत्ता से मुठभेड़ कर रही हैं।
महान लोगों और उनकी महानता पर वही उंगली उठा सकता है जो सामंती व औपनिवेशिक सोच की दासता से मुक्त है। गिरीश कारनाड का वक्तव्य कम से ऐसी हिम्मत करता है। वे कहां बोल रहे थे, कैसे बोल रहे थे, कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे आदि सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने क्या सवाल रखा। कारनाड ने स्पष्ट कहा कि टैगोर जितने महान कवि हैं उतने ही महान नाटककार नहीं हैं। उनके नाटक दोयम दर्जें के हैं। उनके लिखे नाटकों में से कुछ ही नाटक पर काम हुआ है। बीते 50 साल में भारत ने बादल सरकार, मोहन राकेश और विजय तेंदुलकर जैसे तमाम नाटककार पैदा किए हैं। वे टैगोर से कहीं बेहतर थे। चूंकि टैगोर अभिजात और कुलीन वर्ग से संबंधित थे इसलिए वो गरीबों के चरित्र को समझ नहीं पाते थे। टैगोर के नाटकों में गरीब आदमी सिर्फ कार्ड-बोर्ड कैरेक्टर की तरह था जिसमें भावना और वेदना की कमी थी। उनके नाटक असरदार नहीं थे और बंगाली थियेटर पर भी टैगोर के नाटकों का ज्यादा प्रभाव नहीं दिखाई देता। सिर्फ नोबल पुरस्कार मिल जाने से ये नहीं मान लेना चाहिए की वो शख्स हर मायने में अद्भुत होगा।ध्यान रहे कि कारनाड इसे पांच वर्ष पूर्व अपनी पुस्तक में भी लिख चुके हैं। जाहिर है कारनाड उनकी महानता से अभिभूत या आक्रांत हुए बिना उनके नाट्य साहित्य पर विमर्श की मांग कर रहे हैं। टैगोर के नाटकों में गरीबों के चित्रण का सवाल उठाते हुए यह बात कह रहे हैं। पर उनके वक्तव्य को वर्गीय दृष्टि की बजाय नोबल प्राप्त महानताके सामंती व औपनिवेशिक दृष्टि से ही देखा जा रहा है।
कारनाड के बयान पर आई कुछ प्रतिक्रियाओं से इसे और अच्छी तरह से समझा जा सकता है। दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित रंगमंच और फिल्म के वरिष्ठ अभिनेता सौमित्रो चटर्जी कहते हैं - एक नोबल प्राप्त साहित्यकार को दोयम दर्जें का कहना शर्मनाक है।बंगाल के जानेमाने रंगकर्मी देवाशीष राय चौधरी जिन्होंने टैगोर के कई नाटकों का निर्देशन किया है, की प्रतिक्रिया है - कारनाड बंगाली नहीं हैं और बांग्ला नहीं जानते हैं इसलिए शायद उन्होंने टैगोर के सारे नाटक नहीं पढ़े हैं। उनके वक्तव्य को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।प्रमुख बांगला रंगकर्मी विभाष चक्रवर्ती ने कहा - यह उनके निजी विचार हैं और मैं उनसे सहमत नहीं हंू। उनकी राय को समूचे रंगजगत की राय नहीं माननी चाहिए।सीपीआई के  नेता गुरुदास दासगुप्ता के अनुसार - यह हमारे लिए बेहद दुखद है कि एक आदमी जिसे हम उसके ज्ञान, संस्कृति और नाटक के लिए पसंद करते हैं, उसने बदकिस्मती से इस तरह का बयान दिया है। यह जनता की अभिव्यक्ति को नहीं समझ पाने के कारण है। सौ साल से भी ज्यादा समय से जो लोकप्रिय है उसके लेखन को स्तरहीन कहना सचमुच दुखद है।’ (पीटीआई न्यूज, टाईम्स ऑफ इंडिया, 9 नवंबर 2012) दिल्ली बेस्ड टैगोर विशेषज्ञ प्रो। आनंद लाल की राय है - गिरीश कारनाड जिस स्तर पर हैं, उस स्तर से ऐसी बात कहना ठीक नहीं है। हालांकि वे पिछले 20 वर्षों से ऐसा कह रहे हैं पर एक खास मुकाम पर पहुंचकर उन्हें इस तरह का गैरऐतिहासिक बयान देकर लोगों को गुमराह नहीं करना चाहिए।’ (सीएनएन-आईबीएन लाइव वेबसाइट, 10 नवंबर 2012)
ये प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि कारनाड के बयान को महज क्षेत्रीय और नोबल महानता के चश्मे से देख रहे हैं लोग। जाति आधारित सामाजिक संरचना और वर्ग विभाजित समाज में स्त्री व गैर-स्त्री, दलित व गैर-दलित और आदिवासी व गैर-आदिवासी घटकों के दुख, क्षोभ एवं संघर्ष के नितांत विशिष्ट अनुभव और अभिव्यक्तियां हैं। सामान्य कमजोर, दुखी, गरीब चरित्रों के रूप में स्त्री, दलित और आदिवासी समाजों के विशिष्ट सवालों को नहीं संबोधित किया जा सकता। लिहाजा रंगमंच की दुनिया को ऐसे विमर्शों का स्वागत करना चाहिए। क्योंकि कारनाड वर्ग विभाजित समाज में नाटक और रंगकर्म की प्रवृति पर बोल रहे हैं। टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर महानता के गुणगान से अगर हमें ऐतराज नहीं है फिर हम उनपर और उनके बहाने भारतीय नाट्य पर विमर्श से क्यों कतरा रहे हैं? क्या नाटक और रंगमंच हमारी सदी के सबसे प्रमुख विमर्श सामाजिक न्यायसे बाहर रहना चाहिए? इस सवाल और विमर्श को आगे बढ़ाना चाहिए। विशेषकर हिंदी रंगजगत को। क्योंकि उसका प्रभाव अन्य भारतीय भाषाओं की अपेक्षा व्यापक है। लेकिन हिंदी रंगजगत की चुप्पी बता रही है कि महानबनने की लालसा ज्यादा है, सामंती व औपनिवेशिक दासता से मुक्ति की छटपटाहट कम। (साई फीचर्स)

भद्दी भाषा वाले कसाई संजय भाई


भद्दी भाषा वाले कसाई संजय भाई

(संजय तिवारी)

नई दिल्ली (साई)। आमतौर पर देश दुनिया में यह कहा जाता है कि सामना की भाषा आपत्तिजनक होती है। सामना की भाषा को लेकर अक्सर बौद्धिक वर्ग में शिकायतें होती रहती हैं लेकिन भाई संजय निरुपम की भाषा ऐसी कि मुंबई का बौद्धिक समाज ही शर्मसार नहीं होता था, सामनावाले बाल ठाकरे भी थर्रा जाते थे। अति तो तब हो गई जब सामना के संपादकीय में भाई संजय निरुपम ने बेनजीर का घाघरा उठाकर उनसे सवाल पूछने की मांग कर डाली थी। कहते हैं तब खुद शिवसेना प्रमुख ने भाई संजय निरुपम को फोन करके कहा था कि अब ऐसी भाषा जिस अखबार में छपती हो उसका संपादक रहने का अधिकारी मैं नहीं रह जाता। तू ऐसा कर मेरा नाम निकालकर अब अपने ही नाम से अखबार चला।
दो दशक पहले बाल ठाकरे की इस आपत्ति के बाद संजय निरुपम की भाषा कितनी सुधरी इसका गवाह एक बार फिर देश बना है। भाजपा की नेता स्मृति ईरानी पर भाई संजय निरुपम ने एक टीवी डिबेट में जोर देकर बोल दिया कि आप तो टीवी पर  ठुमके लगाती थीं, अब आप राजनीति पर भी बहस करेंगी? शायद एक बार में स्मृति ईरानी ने नहीं सुना होगा इसलिए संजय भाई तब तक बोलते रहे जब तक कि टीवी एन्कर ने उन्हें ताकीद नहीं कर दिया कि संजय जी अपनी भाषा पर ध्यान दें। लेकिन ध्यान देना संजय जी के स्वभाव का हिस्सा ही कब रहा है जो उस टीवी बहस में ध्यान दे देते? अगर उन्हें ध्यान देना आता ही तो इतना तो ध्यान रहना ही चाहिए था कि स्मृति ईरानी पर जो फिल्मी होने का आरोप वे लगाकर नाचनेवाली बता रहे थे, उस फिल्मी दुनिया से खुद संजय निरुपम का कभी कितना गहरा याराना रहा है।
बिहार के रोहतास वाले इन संजय निरुपम ने तब मुंबई का दर नहीं देखा था जब वे पटना के पाटलीपुत्र टाइम्स में बतौर संवाददाता काम किया करते थे। यह अखबार जगन्नाथ मिश्रा का अखबार था तो जाहिर है कि इस अखबार की दशा और दिशा कांग्रेसी ही रही होगी। आज उनके सार्वजनिक जीवन को खंगालने निकले तो यही पता चलता है कि महान पत्रकार भाई संजय निरुपम ने अपने पत्रकारीय कैरियर की शुरूआत इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता से की थी लेकिन सच्चाई इसके बहुत पीछे से शुरू होती है। पटना में पढ़ाई के दौरान उन्होंने पत्रकारिता भी की लेकिन बहुत दिनों तक वे न तो पाटलीपुत्र में रह पाये और न अखबार में काम कर पाये। भाई संजय निरुपम पत्रकारिता का भविष्य तलाशते हुए दिल्ली आ गये। दिल्ली में आनंद भारती के संपर्कों की वजह से संघ के मुखपत्र पांचजन्य तक पहुंचने का मौका मिल गया। कायदे से कहा जाए तो संजय निरुपम ने अपने पत्रकारिता की शुरूआत पांचजन्य से ही की। उस वक्त तरुण विजय को नहीं लगा होगा कि राजनीति शास्त्र का यह स्नातक राजनीतिक रिपोर्टिंग में कुछ खास कर सकता है इसलिए उसे फिल्मों और मनोरंजन का पेज भरने की जिम्मेदारी दे दी गई।
संजय निरुपम राजनीतिक रिपोर्टिंग करने में भले ही फिसड्डी रहे हों लेकिन राजनीतिक संपर्क बनाने में माहिर आदमी थे। उस वक्त पांचजन्य के संपादक पद से मुक्त हो चुके भानुप्रताप शुक्ला बंगाली मार्केट के अपने आवास पर दरबार लगाया करते थे। जल्द ही इस दरबार में संजय निरुपम भी नजर आने लगे इस प्रार्थनापत्र के साथ कि शुक्ला जी अगर चाहें तो संजय को मुंबई भेज सकते हैं। वह ऐसे कि प्रभाष जोशी उस वक्त जनसत्ता के मुंबई संस्करण के लिए अच्युतानंद मिश्र को बतौर संपादक बनाकर भेज रहे थे और अच्युता बाबू की भानू बाबू से गहरी छनती थी। दोनों ब्राह्मण। दोनों आरएसएस के कैडर। भानू जी संजय की सिफारिश कर भी दी। इस तरह भानू जी की सिफारिश पर अच्युता जी, संजय जी को लेकर 1988 में मुंबई आ गये और यहां अपने ही गेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था भी कर दी। आखिर अच्युता बाबू को पत्रकारों के साथ ही इतने बड़े शहर में समर्पित शागिर्द भी चाहिए था जो उनकी देखभाल कर सके। विभूति शर्मा के साथ मिलकर संजय भाई दोनों काम करते थे। संजय भाई की सेवा से पंडित अच्युतानंद मिश्र इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें मुंबई जनसत्ता के एक स्थानीय पेज का इंचार्ज बना दिया।
बस यहीं से संजय भाई की लॉटरी लग गई। मुंबई की हिन्दी पत्रकारिता में नवभारत टाइम्स के बाद जनसत्ता ही वह अखबार था जो अंग्रेजी, मराठी और गुजराती भाषियों के इस शहर में अखबार होने का अहसास कराता था। बहुत सारे छुटभैये नेता, व्यापारी और फिल्मी कैरेक्टर एक कॉलम और दो कॉलम की खबर के लिए अपनी क्षमता अनुसार सेवा भी करते थे और आदर भी देते थे। फिर भी, ऐसा नहीं है कि संजय निरुपम जनसत्ता में रहते हुए कोई बहुत लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार हो चले थे। अखबार की दुनिया में लोकल पेज का इन्चार्ज पेज पर कितना भी ताकतवर हो पत्रकारिता में बस ऐसे ही होता है। संजय भाई के लिए यहां भी मुश्किल तब बढ़नी शुरू हो गई जब अच्युता बाबू मुंबई से कूच कर गये और राहुल देव के हाथ में कमान आ गई। राहुल देव को यह निरूपम कत्तई पसंद नहीं था। जाहिर है जब संपादक को अपने अधीनस्थ कोई कर्मचारी नहीं होता तो उसके साथ क्या क्या गुजरती है। वही सब कुछ अब संजय निरुपम के साथ भी होने लगा था। उन्हें स्थानीय पेज से उठाकर जनसत्ता की सबरंग पत्रिका में समाहित कर दिया जिसे धीरेन्द्र अस्थाना संभाल रहे थे।
इस बीच संजय भाई के जीवन में एक बड़ा मोड़ आ चुका था। उनकी मुलाकात गीता वैद्य से हो चुकी थी। गीता वैद्य अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की कार्यकर्ता थी और इस समय प्रदेश भाजपा में नेता विपक्ष विनोद तावड़े के साथ मिलकर काम करती थीं जो कि खुद विद्यार्थी परिषद का काम काज संभालते थे। गीता अक्सर प्रेस रिलीज लेकर जनसत्ता दफ्तर भी आती थीं जहां उनकी मुलाकात संजय निरूपम से हुई। गीता वैद्य से संजय की यह मुलाकात धीरे धीरे प्यार और फिर शादी में तब्दील हो गई। अब तक संजय निरूपम अकेले थे और मुंबई के दूरगामी उपनगर भायंदर में रहते थे। हालांकि आज वे उसी उत्तर मुंबई से सांसद हैं जहां भायंदर एक विधानसभा है लेकिन तब और अब में बहुत फर्क है। जनसत्ता में नेतृत्व बदला तो इसका सीधा असर संजय भाई की सेहत पर पड़ा। संजय भाई की संभावित पत्नी गीता वैद्य उन दिनों अन्य दफ्तरों की तरह लोकप्रभा के दफ्तर वह अपनी प्रेस विज्ञप्तियां पहुंचाने जाती थीं। यहां उनकी मुलाकात संजय राउत से होती थी जो उस वक्त लोकप्रभा में बतौर उपसंपादक काम कर रहे थे। संजय राउत से मुलाकातों में मराठी मूल की गीता वैद्य ने अपना दुख साझा किया कि जनसत्ता से बाहर आने का कोई रास्ता बताइये। खुद संजय राउत क्या रास्ता बताते अगर वे 92 में सामना के कार्यकारी संपादक न बन गये होते।
राउत के कार्यकारी संपादक बनते ही गीता वैद्य और संजय निरूपम दोनों ही इस बात पर लगभग अड़ गये थे कि किसी भी तरह संजय निरूपम के लिए सामना में कोई जगह तैयार की जाए। उस वक्त हिन्दी सामना अखबार प्रकाशित नहीं होता था इसलिए संजय राउत के सुझाव पर एक पत्रिका का पंजीकरण करवाया गया जिसका नाम था अग्निपथ। उन दिनों अमिताभ की फिल्म अग्निपथ से खुद बालासाहेब बहुत प्रभावित थे इसलिए हिन्दी में पत्रिका छापने के लिए तैयार हो गये। और संजय राउत थे जो ये मानते थे कि संजय निरूपम अभी सबरंग में काम कर रहे हैं इसलिए पत्रिका का काम संभाल लेंगे। लेकिन वह पत्रिका न कभी छप पाई और न ही संजय निरूपम को वह मौका मिल पाया जिसके लिए वे उठक बैठक कर रहे थे। मौका दिया मुंबई के दंगों ने। मुंबई दंगों के बाद बाल ठाकरे ने तय किया कि मुंबई में हिन्दीभाषी हिन्दुओं के लिए हिन्दी अखबार प्रकाशित किया जाएगा और उस वक्त शिवसेना की टोली में हिन्दी पत्रकारिता का जो मानव संसाधन उपलब्ध था उसमें संजय निरुपम ही एकमात्र उपलब्ध थे। संजय राउत की सलाह पर संजय निरूपम को कार्यकारी संपादक की जिम्मेदारी दे दी गई। इस वक्त तक संजय निरूपम की बाल ठाकरे से भेंट नहीं कराई गई थी क्योंकि इस बात की पूरी आशंका थी कि बालासाहेब इनकी प्रतिभा पर शक जाहिर कर सकते हैं इसलिए संजय निरूपम की पहली मुलाकात बाल ठाकरे से तब हुई जब प्रेम शुक्ल को सामना में शामिल करवा लिया गया, क्योंकि तय यह हुआ कि बालासाहेब के सवालों का जवाब संजय निरुपम नहीं बल्कि प्रेम शुक्ल देंगे।
लेकिन कार्यकारी संपादक बनते ही उस वक्त भी संजय निरुपम की वह भाषा सामने आ गई जिसे लेकर आज हम चिंतित हो रहे हैं। कहते हैं अखबार निकलने के थोड़े ही दिनों के भीतर राहुल देव सहित मुंबई के 108 प्रतिष्ठित लोगों ने बाल ठाकरे को एक पत्र लिखा था और कहा था कि संजय निरूपम की भाषा इतनी अश्लील और अपमानजनक है कि उसे पत्रकारिता तो क्या गुप्त बातचीत में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। फिर भला उनको संपादक बनाये रखने का क्या तुक है? लेकिन तुक सिर्फ इतना था कि संजय निरूपम का कोई विकल्प सामने नहीं था, और अगर था तो संजय निरूपम उसे विकल्प बनने नहीं देना चाहते थे।
लेकिन सामना के कार्यकारी संपादक रहते हुए भी संजय निरूपम ने फिल्मों में अपनी जोर आजमाइश नहीं छोड़ी थी। जनसत्ता में रहते हुए जुड़वा भाई अंजय के साथ मिलकर मॉडलिंग का धंधा वे चला ही चुके थे और अब सामना में रहते हुए उन्होंने फिल्मों की स्क्रिप्टिंग, पीआर आदि में हाथ आजमाने लगे थे। फिल्मी दुनिया में उत्तर भारतीय कलाकारों के साथ अपने संबंधों के कारण उन्होंने अच्छी खासी पैठ बना ली थी और शत्रुघ्न सिन्हा या फिर देवानंद जैसे कलाकारों के आस पास आते जाते रहते थे। उन दिनों देवानंद की एक फिल्म आई थी रिटर्न आफ ज्वेलथीप। उस फिल्म की स्क्रिप्ट भी संजय निरूपम ने ही लिखी थी। इसके अलावा एटीएन चौनल पर वे एक फिल्मी अदालत भी चलाते थे जिसका नाम था फिल्मी पंचायत। संजय निरूपम इस फिल्मी पंचायत के सरपंच होते थे। लेकिन कहीं भी बहुत सफल नहीं हो पा रहे थे इसलिए मित्रों की सलाह पर राजनीति की ओर कदम आगे बढ़ा दिया और शिवसेना से पहली बार खेरवाड़ी से विधानसभा का टिकट मांग लिया जो नहीं मिला।
लेकिन राजनीति में दावा भी बहुत कुछ दे जाता है। संजय निरूपम के साथ यही हुआ। विधानसभा का टिकट मांगनेवाले संजय निरूपम को उत्तर प्रदेश शिवसेना का संपर्क प्रमुख नियुक्त कर दिया गया और भाग्य से राज्यसभा की सीट भी मिल गई। देखते ही देखते एक दशक के भीतर ही संजय निरूपम एक कद्दावर पर्सनालटी के रूप में उभरकर सामने आ गये। 1988 में कहां वे एक अदद नौकरी की तलाश में मुंबई गये थे और 1996 में वे शिवसेना के सांसद बन गये थे। दोपहर का सामना के संपादक तो खैर वे थे ही। लेकिन इतना सब होते हुए भी उनकी दो बातों पर लगाम नहीं लग पाई। एक तो उनकी जुबान और दूसरा उनका धंधा। फिल्मों का धंधा तो अब संजय निरूपम नहीं करते थे लेकिन अब उगाही के धंधे में उतर गये थे। कहते हैं 2005 में उनकी एक सीडी बालासाहेब के सामने पेश कर दी गई थी जिसमें धन उगाही के सबूत थे। इसका खामियाजा यह हुआ कि संजय निरूपम की सांसदी भी गई और अखबार के संपादकीय प्रभार भी।
खैर शिवसेना का साथ छूटने के बाद संजय निरूपम ने कांग्रेस का साथ पकड़ लिया और आज वे उत्तर मुंबई से सांसद हैं। कहते हैं संजय भाई ने भद्दी भाषा से भले ही हमेशा सबको परेशान किया हो लेकिन अपनी राजनीति चमकाने के साथ ही उन्होंने अपना विस्तृत आर्थिक साम्राज्य भी विकसित किया है। इस काम में उनका जुड़वा भाई अंजय निरूपम हमेशा उनके साथ होता है। मुंबई की झोपड़पट्टी के पुनर्वास स्कीम जिसे वहां की भाषा में एसआरए डेवलपमेन्ट कहा जाता है उसमें संजय भाई का अच्छा खासा दखल है। इधर दिल्ली की संसद में जब तब उनके बोल सुनाई दे ही जाते हैं जिसके सुर के तार इतने बेसुरे होते हैं कि जिन्हें सुनकर कोई भी कह उठता है कि अरे यह संजय निरूपम बोल रहा है क्या? फिर अगर उन्होंने अपनी इसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए स्मृति ईरानी की इज्जत उतार ली तो क्या गुनाह किया? (लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक हैं)

दंबग-2


फिल्म समीक्षा

दंबग-2

(चंद्र मोहन शर्मा)

कलाकार: सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, विनोद खन्ना, अरबाज खान, माही गिल, दीपक डोबरियाल, प्रकाश राज,
निर्माता निर्देशक: अरबाज खान
गीत: कुमार, साजिद-वाजिद
दो साल पहले दबंग ने कामयाबी और कमाई का नया इतिहास रचा। इसने सलमान को ऐसा ब्रैंड बनाया, जिनका नाम ही कामयाबी की गारंटी था। दबंग के बाद रेडी, बॉडीगार्ड, एक था टाइगर सभी सुपरहिट रहीं। ऐसे में सलमान के भाई अरबाज खान इस नाम को दोबारा कैश करने का मोह भला कैसे छोड़ते? अरबाज को लगा कि बॉक्स ऑफिस पर सलमान का नाम ही काफी है, इसलिए फिल्म के निर्देशन की कमान भी संभाली जाए। यहीं उनसे ऐसा मिसफायर हुआ, जिससे अंत तक वह नहीं संभल पाए।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी चुलबुल पांडे के सामने दूसरे किसी किरदार को उभरने का मौका न मिलना है। पिछली फिल्म में चुलबुल पांडे की बीवी बन चुकी रज्जो इस बार आदर्श पत्नी बन चुकी है। मक्खी इस बार भी घर में पलंग पर लेटा नजर आता है। हां, सलमान ने अपने उन फैंस की हर पसंद का ध्यान रखा है जो थिएटर में कुछ और नहीं बस सलमान को देखने आते हैं। तभी तो पर्दे पर चुलबुल कुछ भी, कैसा भी करते हैं, पूरा हॉल सीटियों और तालियों से गूंज उठता।
यूपी की लालगंज चौकी से चुलबुल पांडे (सलमान खान) का तबादला अब कानपुर हो चुका है। पिछली फिल्म में सौतेले पिता और भाई से दूरियां बनाए रखने वाले चुलबुल अब पिता प्रजापति पांडे( विनोद खन्ना) और भाई मक्खी ( अरबाज खान) के साथ एक ही छत के नीचे अच्छे माहौल में रहते है। चुलबुल की वाइफ रज्जो ( सोनाक्षी सिन्हा) शादी के बाद अब पति , ससुर और देवर की सेवा में बिजी रहती है। छेदी लाल को अंजाम तक पहुंचाने वाले चुलबुल ने अब कानपुर में आतंक की पहचान बन चुके बच्चा सिंह (प्रकाश राज) और उसके दोनों भाइयों के आतंक को खत्म करने की मुहिम संभाली है। चुलबुल के काम करने का अंदाज वहीं पुराना और इमेज रॉबिन हुड वाली है। शहर के एक स्कूल से किडनैपर्स बच्चे को अपने दमखम से छुड़ाने के एवज में चुलबुल को दस लाख रुपये के नोटों से भरे उस बैग को लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती जो बच्चे के पिता को फिरौती के तौर पर कैडनैपर्स को देने थे। चुलबुल अभी भी अपनी ऊपर की कमाई में से पुलिस फंड में हिस्सा देना नहीं भूला है। इंटरवल तक चुलबुल का ज्यादा वक्त पिता, भाई और वाइफ से हंसी मजाक के माहौल में गुजरता है। इंटरवल के बाद चुलबुल का बच्ची सिंह से सीधा टकराव होता है और यहीं से सुस्त रफ्तार से आगे खिसकती फिल्म रफ्तार पकड़ती है।
चुलबुल पांडे का किरदार फिल्म के दूसरे किरदारों पर इस कदर भारी पड़ा कि दूसरे किरदार बौने बनकर रह गए। फिल्म के मुख्य विलन बच्ची सिंह के किरदार में प्रकाश राज जैसे मंजे हुए ऐक्टर के लिए चंद डायलॉग और पिटने कि सीन्स रखे गए। सोनाक्षी बस शोपीस बनकर रह गईं। हां, चुलबुल पर टिकी इस फिल्म में विनोद खन्ना और दीपक डोबरियाल दो ऐसे किरदार हैं, जिन्होंने अपनी भी मौजूदगी दर्ज कराई।
बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म में अरबाज भाई सलमान के स्टारडम के हैंगओवर के ऐसे शिकार हुए कि उन्हें सिर्फ भाई ही नजर आए। बेशक, अरबाज ने सलमान और विनोद खन्ना पर कई अच्छे इमोशनल सीन्स शूट किए। हां, सलमान के उन फैंस के लिए जो सिर्फ सलमान को देखने आते हैं, उनकी कसौटी पर खरा उतरने वाला हर मसाला अरबाज ने फिल्म में खूबसूरती से पेश किया।
साजिद-वाजिद का संगीत रिलीज से पहले हिट है। बेशक, करीना पर फिल्माए आइटम नंबर फेविकोल में मुन्नी बदनाम जैसा जलवा दिखाई नहीं देता। वहीं भोजपुरी लोकगीत फलैरी बिना चटनी कैसे बनी का फिल्मांकन अच्छा है। (साई फीचर्स)

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

कोऊ हो नृप हमें का हानी . . .


0 मोदी बनेंगे पीएम

कोऊ हो नृप हमें का हानी . . .

(लिमटी खरे)

यह भाजपा है जो अपने एक सूबाई कार्यकर्ता को अपना देश का अध्यक्ष बना देती है। एक प्रदेश के निजाम को तीसरी फतह हासिल करने पर देश का प्रधानमंत्री बनाने की बात कह देती है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में वंशवाद और सामंतीराज का यह आलम है कि दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित जो तीन बार दिल्ली पर फतह हासिल कर चुकी हैं, को प्रधानमंत्री तो दूर देश का गृह मंत्री बनाने की बात भी नहीं करती! नरेंद्र मोदी की जीत ने वाकई अनेक नेताओं को हिलाकर रख दिया है। मोदी से भयाक्रांत दिखने वाले नेताओं में कांग्रेस और अन्य दलों से ज्यादा भाजपा के नेताओं का शुमार है क्योंकि नरेंद्र मोदी की तेजी से बढती लोकप्रियता ने अनेक नेताओं को आईना दिखा दिया है। अब नरेंद्र मोदी के कद काठ का एक ही नेता है भाजपा के पास जो उन्हें टक्कर दे सकता है, सिर्फ और सिर्फ शिवराज सिंह चौहान! या तो शिवराज को भाजपा अभी ही केंद्र में ले जाएगी या फिर 2013 की पारी जीतने पर उन्हें 2014 के आम चुनावों में मोदी के समकक्ष खड़ा कर दिया जाएगा।

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में वैचारिक ही नहीं अनेक असमानताएं विद्यमान हैं। कांग्रेस का गठन जब किया गया था तब उसका उद्देश्य पवित्र और पावन हो सकता था, किन्तु आजादी के उपरांत कांग्रेस ने देश पर आधी सदी से ज्यादा राज किया फिर भी देश के बजाए कांग्रेस के नेताओं का आत्मनिर्भर होना इस बात का घोतक है कि आजादी के उपरांत कांग्रेस के नेताओं ने देश के बजाए स्वहित को ही प्राथमिकता के लिए आधार बनाया।
कांग्रेस को छोड़कर कमोबेश हरेक राजनैतिक दल में किसी परिवार विशेष का स्वामित्व नहीं रहा है। आजादी के उपरांत कांग्रेस को नेहरू गांधी परिवार का प्राईवेट लिमिटेड अघोषित तौर पर स्वीकार कर लिया गया है। अमूमन यही माना जाता है कि कांग्रेस में कार्यकर्ता, यानी पार्टी का झंडा डंडा उठाने वाले, बोरा फट्टी बटोरने वालों का काम वही था और रहेगा। कांग्रेस में वही उच्च स्थान या दूसरी पंक्ति के उपरांत तीसरी चौथी पंक्ति (पहली यानी अग्रिम पंक्ति तो नेहरू गांधी परिवार के लिए आरक्षित है) उसी को मिलती है जिस पर राजपरिवार (नेहरू गांधी परिवार) का वरद हस्त होता है।
कांग्रेस में दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित का उदहारण सबसे अच्छा है कि वे तीन बार लगातार दिल्ली में अपना ताज बचाने में कामयाब रही हैं। श्रीमति शीला दीक्षित महिला हैं, कुशल प्रशासक हैं, राजनैतिक समझ बूझ अच्छी है, फिर भी कांग्रेस के अंदर केंद्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता नहीं है। हो भी कैसे सकती है? कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू श्रीमति सोनिया गांधी जो सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। अगर श्रीमति शीला दीक्षित को तवज्जो देना आरंभ कर दिया गया तो फिर लोग सोनिया से शीला की तुलना करने लगेंगे और निस्संदेह शीला दीक्षित कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के समक्ष बीस ही साबित होंगीं।
वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी में महाराष्ट्र सूबे के अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे नितिन गड़करी के हाथों भाजपा की देश की कमान सौंप दी जाती है। वहीं दूसरी ओर गुजरात में तीसरी मर्तबा परचम फहराने वाले नरेंद्र मोदी को भाजपा का अगला प्रधानमंत्री के बतौर दमकता चेहरा भी मीडिया में निरूपित करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती है।
मीडिया की इतनी जुर्रत नहीं कि वह इस बात को रेखांकित कर दे कि नरेंद्र मोदी तो तीसरी पारी आरंभ ही कर रहे हैं उधर, श्रीमति शीला दीक्षित की तो तीसरी पारी समाप्ति की ओर है। शीला दीक्षित 1998 से लगातार मुख्यमंत्री हैं। मीडिया भी कांग्रेस के आलंबरदारों के घरों की लौंडी बन चुका है। सोनिया गांधी या राहुल गांधी की मुखालफत करने वाले अखबारों पर अनेक तरह की बंदिशें लगना स्वाभाविक ही है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन आने वाले डीएवीपी के द्वारा जारी होने वाले अरबों खरबों रूपए के विज्ञापनों में कटौती के डर से मीडिया भी 10, जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का आवास) से पंगा लेने से घबराता ही नजर आता है।
वैसे नरेंद्र मोदी की धमाकेदार जीत के बाद उनका 7, रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) पर कब्जे की बातों का फिजां में तैरना भारत गणराज्य के इतिहास में अहम ही माना जाएगा। प्रधानमंत्री बनने के पहले मुख्यमंत्री रहने वाले दो उदहारण हमारे सामने हैं एक थे विश्वनाथ प्रताप सिंह और दूसरे एच.डी.देवगौड़ा, किन्तु दोनों का सीएम से पीएम तक के सफर में मुख्यमंत्री रहने का सीधा सीधा कोई ताल्लुक नहीं रहा है।
उधर, नरेंद्र मोदी ने खुद कभी यह दावा नहीं किया है कि वे प्रधानमंत्री बनना चाह रहे हैं। यह तो स्थितियां परिस्थितियां हैं जो नरेंद्र मोदी को पीएम पद के लिए उनकी दावेदारी के मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। दरअसल, अटल बिहारी बाजपेयी के उपरांत सत्ता में आए मनमोहन सिंह से देश की जनता का भरोसा टूट गया है। मन मोहन सिंह को देश की जनता वास्तव में प्रधानमंत्री कम सोनिया गांधी का पिट्ठू ज्यादा मानती है।
मनमोहन सिंह के सामने देश को कांग्रेस और उनके सहयोगी लूट रहे हैं। सोनिया गांधी के दमाद भ्रष्टाचार के मामले में आकंठ फंसे हैं। यह सब देखकर भी नैतिकता के आधार पर ही कोई कार्यवाही करने के बजाए मनमोहन सरकार उन्हें बचाने में अपनी सारी शक्ति झोंक रही है। मीडिया भले ही कांग्रेस का गुणगान कर रहा हो पर सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स द्वारा सच्चाई जनता के सामने लगातार लाई जा रही है जिससे जनता को अब कांग्रेस और उसकी केंद्र सरकार की हकीकत का पता चलने लगा है।
उधर, नरेंद्र मोदी के इस तरह के अभ्युदय से भाजपा के नेताओं की नींद में खलल पड़ना आरंभ हो गया है। भाजपा के आला नेता इस बात से चिंतित हो उठे हैं कि अगर मोदी का ग्राफ इसी तरह से बढता गया तो आने वाले समय में भाजपा में भी मोदी राज कायम हो जाएगा जो कम से कम दो तीन दशक तक तो हावी रहेगा ही। इसका कारण यह है कि गुजरात में पिछले दस सालों में विकास हुआ हो या ना हुआ हो पर मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लग पाए हैं। छुटपुट आरोपों की तो हर जगह गुंजाईश होती है पर मोदी भ्रष्ट हैं एसा कहने वालों की तादाद उंगलियांें में ही गिनी जा सकती है।
गुजरात चुनाव के आगाज के साथ ही साथ भाजपा के अंदर ही अंदर मोदी की काट की खोज भी आरंभ हो चुकी थी। आला नेता इस बात पर शोध कर रहे थे कि अगर मोदी धमाकेदार जीत दर्ज करते हैं तो केंद्र में उन्हें भाजपा संगठन में ही अंदर से टक्कर देने वाला कौन हो सकता है। इसके जवाब में दो ही चेहरे नेताओं के सामने उभरे, पहला था मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का तो दूसरा चेहरा था छत्तीसगढ़ के निजाम रमन सिंह का।
रमन सिंह और शिवराज सिंह दोनों में अनेक समानताएं हैं। दोनों ही जमीन से जुड़े नेता होने के साथ ही साथ सहज सुलभ उपलब्ध हैं। रमन सिह और शिवराज सिंह दोनों ही लो प्रोफाईल और बहुत ज्यादा महात्वाकांक्षी नहीं हैं। दोनों ही की प्रशासनिक पकड़ का कोई सानी नहीं है। दोनों ही दो बार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
रमन सिंह और शिवराज सिंह में देखा जाए तो नरेंद्र मोदी को टक्कर देने में शिवराज सिंह चौहान का चेहरा आला नेताओं को काफी हद तक मुफीद दिख रहा है। संभवतः यही कारण है कि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले एमपी भाजपाध्यक्ष प्रभात झा को वहां से रूखसत कर उनके स्थान पर नरेंद्र तोमर की ताजपोशी कर दी गई है।
अब भाजपा के समक्ष नरेद्र मोदी को रोकने के दो ही विकल्प दिख रहे हैं, पहला तो यह कि शिवराज सिंह चौहान या रमन सिंह को तत्काल ही केंद्रीय राजनीति में ले जाया जाए और उनकी छवि नरेंद्र मोदी की छवि से तगड़ी बना दी जाए, या फिर इंतजार किया जाए 2013 का। अगले विधानसभा चुनाव में अगर रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान में से किसी ने भी चमत्कार कर दिखाया तो ये दोनों भी मोदी के कद के होकर खड़े हो जाएंगे। किन्तु उस समय तक मोदी जीत का जश्न मनाते हुए इन दोनों से कोसों दूर जा सकते हैं।
इधर, जनता जनार्दन के नजरिए से अगर देखा जाए तो गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुशासन है या कुशासन यह तो वहां की विपक्ष में मौन बैठी कांग्रेस बताए। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में जनता सुखी है या दुखी यह तो वहां विपक्ष में मौन बैठी कांग्रेस बताए, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व में अमन चैन कायम है या नहीं यह तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस बताए। यही नहीं देश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की सरपरस्ती में प्रजातंत्र है या हिटलरशाही यह बात तो विपक्ष में मौन बैठी भारतीय जनता पार्टी बताए। जनता जनार्दन तो महज इतना ही कह रही है कि कोऊ हो नृप (राजा) हमें का हानी . . .(साई फीचर्स)

आहूजा के आने से अखाड़ा बन गया मध्य प्रदेश जनसंपर्क


लाजपत ने लूट लिया जनसंपर्क ------------------ 30

आहूजा के आने से अखाड़ा बन गया मध्य प्रदेश जनसंपर्क

(विस्फोट डॉट काम)

भोपाल (साई)। बाणगंगा की बैतरणी में लाजपत आहूजा क्या उतरे ऐसा समुद्र मंथन शुरू हो गया है कि कभी कुछ निकलकर बाहर आ रहा है तो कभी कुछ। बाणगंगा की बैतरणी का मतलब मध्य प्रदेश शासन का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का मुख्यालय। हर राज्य में एक ऐसा विभाग होता है, इस राज्य में भी है। लेकिन इस राज्य के विभाग की कहानी न्यारी है। प्रदेश के पत्रकारों तारने मारने का काम इस जनसंपर्क संचालनालय से ही किया जाता है इसलिए यहां बाबूगीरी कम नेतागीरी ज्यादा होती है। इसी नेतागीरी की महिमा है कि लाजपत आहूजा को इलेक्शन इयर में बाणगंगा की बैतरणी में उतार दिया गया लेकिन पहले कथित तौर पर कांग्रेस ने विरोध किया अब भाजपा नामधारी एक व्यक्ति ने सीधे गणकरी को चिट्ठी लिखकर लाजपत को लजाने पर मजूबर कर दिया है।
नितिन गडकरी को किसी एलएन वर्मा ने पत्र लिखा है और दावा किया है कि वे राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों की कोई मदद नहीं कर रहे हैं उलटे अपनी गैंग बनाकर आपरेट करने की कोशिश कर रहे हैं। जरा पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। राष्ट्रवादी विचारधारा के कट्टर समर्थक कहनेवाले कथित वर्मा चिट्ठी में लिखते हैं-ष् राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े पत्रकारों, संपादकों, साहित्यकारों, लेखकों को इन्हीं आहूजा साहब के चलते विभाग में अपमानित होने के चलते आपको सीधे पत्र लिख रहा हूं।ष् एल।एन।वर्मा के नाम से की गई उक्त शिकायत की स्केन की गई प्रति मीडिया के चुनिंदा लोगों को भी ईमेल के माध्मय से भेजी गई है।
इस शिकायत में सच्चाई कितनी है यह बात या तो आहूजा जानते होंगे या फिर शिकायतकर्ता वर्मा, पर अतिरिक्त संचालक लाजपत आहूजा को सर्वशक्तिमान बनाने से अनेक मीडिया कर्मियों ने जनसंपर्क संचालनालय की ओर रूख करना छोड़ दिया है। माना जा रहा है कि अब संचालनालय में जी हजूरी करने वालों की पौ बारह हो चुकी है। आहूजा के बारे में लिखा गया है कि वे जनसंपर्क को रंडियों का कोठा बना देंगे। इस संबंध में आहूजा का पक्ष जानने का प्रयास किया गया किन्तु वे फोन पर उपलब्ध नहीं हो सके।
पत्र में उल्लेख किया गया है कि शराब और शबाब की शौक के लिए चर्चित राजेश बैन, समरजीत चौहान, संदीप कपूर आदि को फिर से विज्ञापन शाखा में पदस्थ किया गया है। इसमें उल्लेख किया गया है कि विश्व संवाद केंद्र से जुड़े होने के नाते इस संबंध में जब वर्मा द्वारा सारी हकीकत के बारे में भाजपाध्यक्ष प्रभात झा को आवगत कराया गया तो वे भी हतप्रभ रह गए थे। वैसे खबर तो यह भी चलाई जा रही है कि प्रभात झा के इशारे पर ही आहूजा की नियुक्ति यहां की गई है। अगर यह खबर सही है तो वे हतप्रभ क्यों रह गये यह अपने आप में हतप्रभ करनेवाली बात है।
इस संबंध में जब जनसंपर्क में पदस्थ अतिरिक्त संचालक लाजपत आहूजा का पक्ष जानने उनसे उनके कार्यालयीन दूरभाष 0755 - 4096502 पर सोमवार 11 जून को दोपहर साढ़े ग्यारह बजे संपर्क करने का प्रयत्न किया गया तो वहां उपस्थित भृत्य ने बताया कि अभी आहूजा साहब के कार्यालय में ना तो उनके कोई बाबू ही आए हैं और ना ही साहब!
कारण कुछ भी हों लेकिन आहूजा के आने से इतना तो हो गया है कि मध्य प्रदेश जनसंपर्क जंग का पूरा अखाड़ा बन चुका है। जीतेगा कौन यह बाद में देखेंगे अभी लड़ाई में नये नये दांव पेंच इस्तेमाल किये जा रहे हैं और बाजी मारने की पुरजोर कोशिश हो रही है। पहले कांग्रेस के लोगों ने नाराजगी जताई अब भाजपाई भी उनसे खुश नजर नहीं आ रहे हैं।

जीतू और नीता का शनि होने लगा भारी!


जीतू और नीता का शनि होने लगा भारी!

(राजेश शर्मा)

भोपाल (साई)। मध्य प्रदेश में भाजपा की सूबाई राजनीति में तेजी से बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच अब अपनी कुर्सी बचाने और कुर्सी हथियाने की जुगत आरंभ हो चुकी है। दरअसल, प्रभात झा की बिदाई के साथ ही साथ अनेक सियासी नेताओं के साथ ही साथ सरकारी मुलाजिमों की गर्दन नपना तय माना जा रहा है जो संगठन के बजाए प्रभात झा की ही गणेश परिक्रमा को अपना मूल मंत्र मानकर चल रहे थे।
इसके साथ ही साथ प्रभात झा पर आरोपों की झडी लगने लगी थी कि प्रभात झा के साए में संगठन ही सरकार पर होता जा रहा है। इतना ही नहीं प्रभात झा के संरक्षण में सरकारी नुमाईंदों के हौसले इतने बुलंद हो चले थे कि वे मंत्रियों की बात को भी अनसुना ही कर देते थे।
कहा जा रहा है कि प्रभात झा के संरक्षण में अफसरशाही के बेलगाम घोड़े इस कदर कोहराम मचा रहे थे कि मीडिया और सरकार में अनेकों मर्तबा टकराहट की नौबत तक आ चुकी है। विधानसभा के शीत कालीन सत्र में पत्रकारों को जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मी कांत शर्मा की प्रतीकात्मक शवयात्रा तक निकालने पर मजबूर होना पड़ा था। यद्यपि बाद में प्रतीकात्मक शवयात्रा के स्थान पर रैली ही निकाली गई पर यह मध्य प्रदेश के इतिहास में काला धब्बा ही मानी जा रही है।
भाजपा के नवनियुक्त अध्यक्ष नरेंद्र तोमर इस बात को भली भांति जानते हैं कि प्रभात झा को बलात हटाया गया है। उनकी बिदाई की भनक शिवराज सिंह चौहान ने किसी को भी नहीं लगने दी थी। प्रभात झा ने नरेंद्र सिंह तोमर की ताजपोशी के वक्त अपनी बिदाई के बारे में दर्द को जाहिर करते हुए कह ही दिया था कि जिस तरह पोखरण विस्फोट की खबर अटल जी ने किसी को लगने नहीं दी उसी तरह उनकी बिदाई की खबर शिवराज सिंह चौहान ने किसी को लगने नहीं दी।
अब तोमर के सामने अपनी टीम बनाने के साथ ही साथ प्रभात झा के जहर बुझे तीरों की संभावनाओं से निपटना भी एक प्रमुख चुनौति है। भाजपा के आला दर्जे के सूत्रों ने समाचार एजेसी ऑफ इंडिया को बताया कि संगठन का एक तबका इस बात से खासा नाराज है कि इस तरह प्रभात झा की बिदाई नहीं होनी थी। वहीं संघ के सूत्रों ने साई न्यूज से चर्चा के दरम्यान कहा कि संघ का एक धड़ा भी तोमर की ताजपोशी को पचा नहीं पा रहा है।
उधर, शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र तोमर की दिल्ली यात्रा भी इस संबंध में काफी अहम मानी जा रही है। भाजपा से जुड़े सूत्रों ने समचार एजेंसी ऑफ इंडिया के दिल्ली ब्यूरो को बताया कि तोमर और सीएम ने दिल्ली में नितिन गड़करी, एल.के.आड़वाणी, सुषमा स्वराज, अरूण जेतली जैसे आला नेताओं से मिलकर मिशन 2013 के लिए फ्री हेण्ड मांगा है।
कहा जा रहा है कि टीम प्रभात के अहम सदस्य भाजयुमो के प्रदेशाध्यक्ष जीतू जिराती और भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष श्रीमति नीता पटेरिया की उल्टी गिनती आरंभ हो चुकी है। माना जा रहा है कि नीता पटेरिया को हटाने के पीछे प्रभात झा द्वारा उन्हें सीएम मेटेरियल बताने के साथ ही साथ श्रीमति पटेरिया के खिलाफ बिजली चोरी, पुरोहित की थाली से दो सौ रूपए चुराने के आरोपों के साथ ही साथ आमानाला काण्ड में उनके खिलाफ खड़े कांग्रेस के विधायक और मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हरवंश सिंह द्वारा स्वयं ही माननीय न्यायालय से चालन पेश करवाने की गुहार लगाने की बातों को प्रमुख माना जा रहा है।