शनिवार, 12 सितंबर 2009

युवराज के इलाके की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब!

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

युवराज के इलाके की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब!

कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र के बाद उनके पुत्र और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब होने पर हंगामा बरपने लगा है। राहुल के संसदीय क्षेत्र में साढ़े चार सौ करोड़ रूपयों की लागत से बनने वाली आठ सड़कें महज दो सालों में ही अस्तित्व खो चुकी हैं। 2006 में बनकर तैयार हुई इन लापता सड़कोें के मामले में संज्ञान लेते हुए राहुल गांधी ने केंद्रीय सड़क निधि से बनाई गई इन सड़कों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दिल्ली बुला भेजा है। इसके पूर्व कांग्रेस की राजमाता ने 2006 में उनके संसदीय क्षेत्र की रायबरेली से बरास्ता लालगंज, महाराजगंज सड़क में हुई धांधली पर 25 सितम्बर 2006 को मुकदमा दर्ज करवाया था। जांच में छ: दर्जन अफसर दोषी पाए गए थे, जिनमें से 13 को पुलिस ने धर दबोचा और 59 फरारी काट रहे हैं। मामला चूंकि तेज तर्रार भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से जुड़ा हुआ है, अत: इस मामले मेें दागी अफसर जल्द ही निलंबित हो सकेंगे। देखना यह है कि अपनी माताश्री की तर्ज पर राहुल बाबा भी एफआईआर दर्ज कराते हैं या फिर किसी की खाल बचाने के लिए . . . ।

जिन्ना प्रकरण में संघ के निशाने पर जसवंत

भाजपा के लिए सरदर्द बन चुके जिन्ना के जिन्न को उतारने के लिए अब संघ ने भी कमर कस ली है। भाजपा से निष्काशित नेता जसवंत सिंह के खिलाफ अब संघ ने भी जहर बुझे तीर चलाने आरंभ कर दिए हैं। संघ के वरिष्ठ चिंतक देवेन्द्र स्वरूप ने पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाती नुस्ली वाडिया के साथ किताब को लेकर जसवंत की सांठगांठ और इस संपूर्ण प्रकरण को बौद्धिक वेश्याचार का दर्जा दे दिया है। यद्यपि वाडिया ने इस मामले में अपनी सफाई अवश्य दे दी है किन्तु मामला अभी ठण्डा पड़ता नहीं दिखता। जिन्ना को लेकर भाजपा के पूर्व पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी भी मुंह की खा चुके हैं। लगता है भारतीय जनता पार्टी और संघ में अब जिन्ना प्रकरण को लेकर आरपार की ही लड़ाई आरंभ हो गई है। संघ के आला नेताओं को साधने की गरज से भाजपा प्रमुख राजनाथ सिंह ने भी यह कहकर सभी को चौंका दिया कि जिन्ना की प्रशंसा करने वालों की भाजपा में कोई जगह नहीं है। लगता है भाजपा में प्रजातंत्र के स्थान पर संघ द्वारा थोपी जाने वाली हिटलरशाही का स्थान सर्वोपरि हो गया है। हालात देखकर लोग यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि भाजपा में अब कोई भी अपने मन की बात कहने के लिए स्वतंत्र नहीं रह गया है।

एक मंत्री के दो परस्पर विरोधी वाक्ये!

केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के साथ दो परस्पर विरोधी वाक्ये प्रकाश में आए हैं, वह भी अगस्त के माह में ही। हुआ दरअसल यह कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में कमल नाथ से संबंधित दो याचिकाओं में नोटिस सर्व नहीं हो सका है। एक में बिना नोटिस के ही जवाब आ गया। सूबे के पूर्व मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह की चायिका पर उच्च न्यायालय ने एक नोटिस कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा के पते पर भेजा। बताते हैं कि नोटिस बेरंग वापस आ गया कि कमल नाथ वहां नहीं रहते। बाद में कमल नाथ के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर यह नोटिस भेजने जस्टिस के.के.लाहोटी की कोर्ट ने आदेशित किया। वहीं दूसरी ओर 13 अगस्त को लखनादौन के एक वकील द्वारा लगाई गई याचिका 1878 में नोटिस कमल नाथ को सर्व हुआ ही नहीं और 24 अगस्त को उनकी ओर से जवाब भी उच्च न्यायालय में पेश कर दिया गया। इतना ही नहीं 26 अगस्त को इसकी अंतिम सुनवाई कर केस का निपटारा भी हो गया। लोग गलत नहीं कहते - ``जय जय कमल नाथ``।

सिब्बल की तारीफ के मायने

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह के अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी दिल खोलकर केेंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की तारीफों में कसीदे गढ दिए हैं। राजनैतिक बिसात में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में उनसे वरिष्ठ मंत्री इन दिनों इस सबके पीछे छिपे मायने खोजने में लगे हुए हैं। लगभग एक दशक से ही राजनैतिक परिदृश्य में उभरकर आए सिब्बल ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को अचानक एसी कौन सी जड़ी सुंघा दी कि विज्ञान और प्रोद्योगिकी जैसे कम महत्व के मंत्रालय के उपरांत अचानक ही उन्हें हाई प्रोफाईल मंत्रालय की कमान सौंप दी गई। राजनैतिक बिसात पर वषोZं से नजर रखने वाले विद्वानों का मानना है कि गुजरे जमाने के राजनैतिक चाणक्य माने जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह की बिदाई के मार्ग प्रशस्त करने वाले सिब्बल को पारितोषक के तौर पर अर्जुन सिंह का ही मंत्रालय सौंपा गया है, एवं अपने एजेंडे पर सधे कदमों से चलने के कारण चहुं ओर ``सिब्बल जिंदाबाद`` के गगनभेदी नारे लग रहे हैं। दरअसल आलाकमान सिब्बल की तारीफ कर यह संदेश भी देने में सफल रहीं हैं कि अर्जुन सिंह जैसे घुर विरोधी को उन्होंने सिब्बल जैसी छोटी तलवार से ठिकाने लगा दिया है, ताकि भविष्य में कोई कांग्रेस सुप्रीमो से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर पंगा लेने का साहस न जुटा सके।

मन्ने भी दो युवराज का ईमेल और फेक्स

विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के करीबी सूबे हरियाणा में बासी कढी एक बार फिर उफान मारने लगी है। राज्य के टिकिट के दावेदार कांग्रेस के नेताओं की नजरें टिकिट के मसले पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर आकर टिक गई हैं। देश भर में यह प्रचारित हो ही गया है कि राहुल गांधी का कार्यालय अत्याधुनिक सायबर उपकरणों से सदा ही लैस रहता है। इन परिस्थितियों में हरियाणा में टिकिटार्थियों की जुबान पर बस एक ही बात है -``हमें भी चाहिए राहुल का ई - मेल और फेक्स नंबर।`` चुनाव की आपाधापी के चलते दावेदार यह मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली जाकर सत्ता और शक्ति के नए केंद्र 10 जनपथ (राहुल गांधी का सरकारी आवास) में जाकर उनसे रूबरू मुलाकात कर अपना बायोडाटा देने का मौका उन्हें शायद ही मिले। अत: हर उम्मीदवार अब अत्याधुनिक संचार माध्यम इंटर नेट और बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के संचार माध्यम फेक्स के माध्यम से अपनी बात बायोडाटा सहित राहुल बाबा तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

परिक्रमा बनाम पराक्रम में फंसी भाजपा

संघ के दवाब में अपने नीतिगत फैसले न ले सकने वाली भारतीय जनता पार्टी के अंदर अब एक नई बहस छिड़ गई है। पार्टी के अगली पंक्ति के नेता अब ``गणेश परिक्रम और व्यक्तिगत पराक्रम`` के बीच के फासले को ढूंढनें में व्यस्त हैं। भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय के साथ ही साथ प्रदेश और जिला स्तर पर अंदरूनी लड़ाईयां सतह पर आने लगी हैं। एक दूसरे पर प्रत्यक्ष और परोक्ष आरोप प्रत्यारोप के उपरांत अब अपनी अपनी खाल बचाने के लिए पार्टी के छीजते (लुढकते) जनाधार के बारे में यहां वहां मुंह मारने से नहीं चूक रहे हैं नेताओं के समर्थक। भाजपा के वे नेता जो यह जानते हैं कि संघ की शरण में जाने पर उनके हर दुखाों का अंत हो जाएगा, वे इस मसले में संघ के दरवाजे पर अपनी पेशानी रगडकर भाजपा के आला नेताओं के कपड़े उतारने से भी नहीं चूक रहे हैं। अंर्तद्वंद में फंसी भाजपा की मध्यम श्रेणी वाली पंक्ति के पास अब कोई रास्ता प्रतीत नहीं हो रहा है, जिस पर चलकर वह नीतियों, आदशोZं, सिद्धांतों पर चलने वाली अपनी पुरानी भारतीय जनता पार्टी को वापस पा सकें।

अनेक रोल में हैं बिग बी

रूपहले पर्दे पर डबल रोल वाले किरदार न जाने कितने अभिनेताओं ने निभाए होंगे। सदी के सपुरस्टार अमिताभ बच्चन ने महान फिल्म में ट्रिपल रोल निभाया था। अब सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर में बिग बी के नाम से अनेकों एकाउंट न केवल बने हुए हैं वरन उन पर प्रशंसकों की तादाद भी बहुतायत में है। यह समझना बहुत ही दुष्कर है कि बिग बी का कौन सा प्रोफाईल असली है। अलग अलग खातों को देखकर यह लगता है कि बिग बी शायद ही किसी खाते में खुद लिख रहे हों। जानकारों का कहना है कि टि्वटर को लोकप्रिय बनाने की गरज से लोगों ने बिग बी के अनेक खाते बना दिए हैं। एसा नहीं कि सिर्फ बिग बी के ही अनेक खाते हैं। वालीवुड के हीरो हीरोईनों के इसमें कई रोल अर्थात कई खाते बने हुए हैं, इनमें आश्चर्यजनक बात यह है कि सभी में उनके प्रशंसकों की तादाद असामान्य तौर पर अधिक ही है। कहा जा सकता है जय हो नेट देवता जय हो टि्वटर पुजारी की।

जब पकडी गई चोरी

आम चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग को पिछले दिनों शर्मसार होना पड़ा। दरअसल एल.के.आड़वाणी बुरे समय में अपने पुराने मित्रों के साथ पृथ्वीराज रोड़ स्थित अपने पुराने मित्रों के साथ समय गुजार रहे थे पिछले दिनों। बताते हैं कि उस दिन दिल्ली के भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा और एल.के.आड़वाणी एक सुहानी शाम में उस दिन आड़वाणी के घर चाट पकोड़ों का लत्फ उठा रहे थे। तब माहौल को हल्का फुल्का बनाने की गरज से एकाएक आड़वाणी को याद आया और उन्होंने तपाक से मल्होत्रा जी से कहा याद है विजय जी जब 1967 मेें आप मुख्य कार्यकारी पार्षद हुआ करते थे, तब हम दोनों ही शाम को नियम से पंडारा रोड़ जाया करते थे, तब क्या आपको याद है कि मुझे कौन सी लजीज चीज बेहद पसंद हुआ करती थी। विजय मल्होत्रा ने भी आड़वाणी को खुश करने उत्तर दिया हां . . . `` चिकन मलाई टिक्का``। आड़वाणी को शायद इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी। वे धीरे से बोले -``हां आपकी याददाश्त को मानना ही पड़ेगा, मुझे . . . मलाई टिक्का बेहद पसंद था। दोनों के चेहरों की हवाईयां उड़ी हुईं थीं। पता नहीं किसकी चोरी पकड़ी गई थी उस वक्त।

दिग्गी का बोलबाला रहेगा महाराष्ट्र में

इस साल अक्टूबर में महाराष्ट्र में होने वाले चुनावों में कांग्रेस में नेता अगर किसी की परिक्रमा करेंगे तो वे हैं, तेजी से उभरकर सामने आए सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की। वर्तमान में सूबे में कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई है, जिसने पांच साल सफलता के साथ पूरे कर लिए हैं। कांग्रेसी सूत्रों का कहना है कि इस बार सूबे में जिताउ उम्मीदवारों पर ही कांग्रेस दांव लगाने वाली है। इसके लिए बाकायदा विभिन्न सर्वे एजेंसीज को हायर कर तीन स्तरों में सर्वेक्षण का दूसरा चरण पूरा कर लिया गया है। पहले चरण में चुनाव की घोषणा के बाद फिजां में तैरने वाले प्रमुख नाम तो दूसरे चरण में जीत की संभावना वाले नामों की पेनल तैयार करवा ली गई है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा के अनुरूप उनके अघोषित राजनैतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने महाराष्ट्र सूबे में युवा उम्मीदवारों को प्रमुखता देते हुए अपनी सूची को अंतिम रूप दे दिया है। वहीं महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पुत्र राजेंद्र सिंह ने भी अमरावती से टिकिट मांगकर सभी को चौंका दिया है। इतिहास का यह पहला मौका होगा जबकि किसी पदस्थ महामहिम के सगे संबंधी ने टिकिट की मांग की हो। यह अलहदा बात है कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ.शंकर दयाल शर्मा की पित्न विमला शर्मा एमपी से विधायक रहीं हैं, किन्तु 1992 से 1997 तक डॉ. शर्मा के महामहिम रहते उन्होंने कोई भी चुनाव नहीं लड़ा।

. . . तो भगवा धारण कर लेना चाहिए हुड्डा को

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा आम इंसान हैं, या उनके मुख में माता सरस्वती का वास है! यही प्रश्न आजकल हरियाणा के हर बंदे की जुबां पर है। हुड्डा द्वारा पिछले दिनों की गई भविष्यवाणियां आश्चर्यजनक तौर पर सोलह आना सच साबित हुईं हैं। पिछले दिनों भाजपा के साथ इनेलो के गठबंधन पर हुड्डा ने कहा था कि शून्य गुणा शून्य बराबर शून्य। हुआ भी यही लोकसभा चुनावों में दोनों ही औंधे मुंह गिर गए, और सूबे में अपना खाता भी न खोल सके। इसके बाद हुड्डा के श्रीमुख से निकला कि हजकां और बसपा का हनीमून ज्यादा दिन नहीं चलेगा। हुआ भी यही ढाई महीने के भीतर ही दोनों ने अलग अलग राह पकड़ ली। अब सूबे के निजाम ने भविष्यवाणी की है कि सूबे में एक बार फिर कांग्रेस पार्टी भारी बहुमतों के साथ वापस सरकार बनाएगी। हरियाणावासी अब कहने को मजबूर हो गए हैं कि अगर हुड्डा की भविष्यवाणी सच साबित हो गई तो फिर हुड्डा को अबकी बार मुख्यमंत्री निवास छोडकर भगवा वस्त्र धारण कर लेना चाहिए, क्योंकि राजनैतिक तौर पर भविष्यवाणियां तो सैकड़ों की तादाद में की जाती हैं, किन्तु कम ही सच साबित होती हैं, शेष को ठंडे बस्ते के हवाले ही कर दिया जाता है। जनता के सामने वे ही चर्चित की जातीं हैं, जो अक्षरश: सत्य साबित हुई हों।

निशंक की कुर्सी हिलाने की जुगत में खण्डूरी

उत्तराखण्ड में सत्ताच्युत हुए मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूरी द्वारा अब मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को कुर्सी से उतारने के प्रयास तेज कर दिए हैं। खण्डूरी के प्रयास इतनी दु्रत गति से बिना सोचे समझे हो रहे कि निशंक के एक ही पलटवार से उनके होश फाख्ता हो गए हैं। खण्डूरी ने गढ़वाल जाकर अफसरों को इस तरह बुला भेजा मानो बतौर मुख्यमंत्री वे दरबार सजा रहे हों। खण्डूरी सार्वजनिक तौर पर यह कहते घूम रहे थे कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे, और यही भ्रष्टाचार राज्य के विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनकर उभर गया है। निशंक समझ गए कि खण्डूरी का इशारा उन्हीं की तरफ है। निशंक भी आखिर कब तक सहते, उन्होंने भी खण्डूरी से पूछ ही लिया कि खण्डूरी ने कितने भ्रष्टाचारियों को ठिकाने लगाया है बस फिर क्या था, उंची आवाज में चिल्लाने वाले खण्डूरी को सांप सूंघ गया और एक बार फिर बियावन में खामोशी पसर चुकी है।

पुच्छल तारा

देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायायल द्वारा गठित की गई है केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी)। बताते हैं कि सीईसी का काम सुप्रीम कोर्ट में दखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए मौका मुआयना कर वास्तविक प्रतिवेदन सर्वोच्च न्यायालय को सौंपना है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नामक एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर भी सीईसी ने अपना प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। इस मामले में कांग्रेस का एक प्रतिनिधमण्डल केदं्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला, और वापस आकर उसने मीटिंग का ब्योरा दिया। कांग्रेस द्वारा जारी अधिकृत विज्ञप्ति में जयराम रमेश के हवाले से कहा गया है कि सीईसी के विशेष आमंत्रित सदस्य को पुन: स्थल निरीक्षण करने भेजा जाएगा। सवाल यह उठता है कि सीईसी जयराम रमेश के इशारे पर काम करने गठित की गई है, या फिर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन के लिए।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

प्रजातंत्र की ओर अग्रसर कांग्रेस

प्रजातंत्र की ओर अग्रसर कांग्रेस

(लिमटी खरे)
कहने को तो सवा सौ साल पुराना है कांग्रेस का इतिहास। भारत की आजादी में महात्वपूर्ण भूमिका निभाई है कांग्रेस ने। देश में प्रजातंत्र की स्थापना में कांग्रेस के योगदान को शायद ही भुलाया जा सके। कथनी और करनी में वास्तव में बहुत अंतर होता है। इस सबके बावजूद भी कांग्रेस ने प्रजातंत्र को अंगीकार नहीं किया है। कांग्रेस में आज भी राष्ट्रीय, प्रदेश अथवा जिला स्तर पर अध्यक्षों या अन्य पदाधिकारियों का चुनाव होने के बजाए उनका मनोनयन होने की ही परंपरा जारी है। इस तरह से देश में शिख से लेकर नख तक कांग्रेस में नेताओं को थोपने की परंपरा रही है।

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और महासचिव राहुल गांधी ने यह कहकर सभी को चौंका दिया है कि पार्टी अध्यक्षों के मनोनयन के बजाय अब उनका चुनाव किया जाएगा। राहुल का यह बयान दिवा स्पप्न की ही तरह दिखाई पड़ता है, किन्तु कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की बात को दरकिनार करने का साहस भी कांग्रेसियों में नहीं दिखता है।

आजादी के बाद से अब तक इतिहास खंगालने पर यही बात सामने आती है कि पार्टी के सुप्रीमो द्वारा ही विधायक दल का नेता अर्थात मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश के अध्यक्षों के मनोनयन की परिपाटी ही हावी रही है। कहने को तो कांग्रेस पार्टी प्रजातंत्र की हिमायती है किन्तु अपने अंदर ही कांग्रेस में प्रजातंत्र का अभाव साफ तौर पर परिलक्षित होता है।

बोरा बंद कर पार्टी जनों के सामने बोरा खोलकर उसमें से निकलने वाले नेता को सर्वमान्य नेता बनाने की कवायद में पार्टी के सुप्रीमो यह भूल जाते हैं कि इसी तरह के नेता जमीनी स्तर पर अपने पराए का भेद करवाकर गुटबाजी के लिए माकूल माहौल पैदा कर देते हैं।

हिन्दुस्तान का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भी हिन्दुस्तान के राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के बजाए हिटलरशाही ही हावी रही है। राहुल गांधी ने अगर बदलाव के बारे में विचार किया है, तो उनके इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए।

राहुल गांधी की सोच पर कांग्रेस पार्टी ने ईमानदारी से पहल की तो आने वाले दिनों में चापलूसी और मैनेजिंग पावर के बल पर उपरी पायदान पर पहुंचने वाले बिना रीढ के नेताओं के बदले जनता के बीच पैठ रखने और जनाधार वाले नेताओं के आगे आने के मार्ग प्रशस्त होने की उम्मीद है।

इतिहास गवाह है कि हर दफे मुख्यमंत्री के चुनाव के वक्त विधायकों की मंशा को और पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष चुनते समय प्रदेश के कार्यकर्ताअों की भावनाओं को सर्वोपरि बताने वाले सियासी दल अंत में फैसला आलाकमान पर ही छोड दिया करते हैं। इस तरह की विरोधाभासी कार्यप्रणाली से लोगों के मन में संशय ही पैदा होता है।

देश की प्रमुख सियासी पार्टी कांग्रेस हो या भाजपा अथवा कोई अन्य, हर दल में कमोबेश आलाकमान की मर्जी ही सर्वोपरि मानी जाती रही है। अर्जुन सिंह रहे हों या मोती लाल वोरा, अथवा भुवन चंद खण्डूरी, उमाश्री भारती, बाबू लाल गौर या फिर वसुंधरा राजे, सारे उदहारण इसी बात की ओर इशारा करते हैं कि पार्टी में विधायक नहीं वरन आलाकमान ही सर्वोपरि होता है।

सवाल यह उठता है कि जब सियासी दलों में विधायकों को ही अपने नेता चुनने का अधिकार नहीं है, तो फिर आम कार्यकर्ताओं की पूछ परख आखिर क्यों और कैसे हो पार्टी के चंद नेताओं से घिरे सुप्रीमो के नाक कान इसी तरह के नेता होते हैं जो अपने मैनेजिंग पावर के जरिए दरबार के नौ रत्नों में जगह बनाकर पार्टी की जड़ों में अपने निहित स्वार्थों के लिए मट्ठा डालने से भी नहीं चूकते।

कांग्रेस के युवा महासचिव राहुल गांधी की प्रदेशाध्यक्षों के मनोनयन के बजाए चुनाव की सोच को बारंबार सलाम। उम्मीद की जानी चाहिए कि राहुल गांधी की यह मंशा न केवल कांग्रेस पार्टी में फरमान के तौर पर ली जाए वरन् अन्य सियासी दलों में भी इसे नजीर के तौर पर अंगीकार किया जाना चाहिए। अभी समय है, अगर राजनीति के कीचड़ भरे तालाब में नील कमल खिलाने हैं तो इसकी सफाई बहुत जरूरी है, वरना आने वाली पीिढयां विदेशी आक्रांताओं के बजाए देशी चंद नेताओं की गुलामी करने पर गजबूर होगी।
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वैचारिक मंच पर संघ में मची है घमासान
0 समाज और राजनीति के नियंत्रण पर मचा है द्वंद
0 सत्ता के मद को नहीं भूलना चाहता संघ
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में मचे घमासान पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भले ही ``कभी हां कभी न`` की भूमिका में हो पर यह सच है कि संघ के अंदरखाने में असंतोष और खींचतान का सैलाब उमड रहा हो जो कभी भी फटकर बाहर आ सकता है।संघ के विभिन्न धड़ों में चल रही चर्चाओं को अगर सच माना जाए तो इन दिनों संघ के अंदर ही अंदर ``राजनीति नियंत्रित समाज`` या ``समाज नियंत्रित राजनीति`` पर अंर्तद्वंद की स्थिति बनी हुई है। कुछ लोग राजनीति से समाज को नियंत्रित करने के हिमायती हैं तो अनेक धड़े समाज से राजनीति को नियंत्रित करने के पेरोकार हैं।
सूत्रों की मानें तो वर्तमान संघ प्रमुख मोहन राव भागवत द्वारा संगठन को हेडगेवार और गुरू गोलवरकर के सिद्धांतों पर ले जाना चाहा जा रहा है, जिसके मुताबिक समाज को अगर बदल दिया जाए तो राजनीति खुद ब खुद बदल जाएगी। भागवत के इस सिद्धांत के समर्थन में संघ के वरिष्ठ नेता माधव गोविंद वैद्य और इंद्रेश आदि दिखाई पड़ रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर एक अन्य धड़ा चाह रहा है कि अगर समाज को बदलना है तो इसके लिए राजनीति पर नियंत्रण करना अत्यावश्यक होगा। इस धारा के हिमायती गुरूमूर्ति, राम माधव, मदन दास देवी, रज्जू भईया, देवरस प्रतीत हो रहे हैं। इसके अलावा बीच के रास्ते के पेरोकार भी संघ में दिख रहे हैं।
सुरेश सोनी, भैया जी और सुरेश जोशी वैसे तो मोहन भागवत के साथ खड़े दिख रहे हैं, किन्तु इनकी परछाई का अक्स कुछ और बयां कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि ये तीनों चाहते हैं कि इस मसले पर बीच का रास्ता अिख्तयार किया जाए।
उधर सूत्रों ने यह संकेत भी दिए हैं कि पिछले दो दशकों में बरास्ता भाजपा राजनीति और सत्ता में खासी घुसपैठ बना चुके संघ के नेता सत्ता के मद को खोना नहीं चाह रहे हैं। संघ के नेता जनसंघ से पूर्व के राजनीति विहीन बियावान में विचरण करने से अपने आप को बचा ही रहे हैं।
संघ में अंदर ही अंदर मचे इस घमासान के चलते संघ नेतृत्व भाजपा के बारे में कोई ठोस निर्णय लेने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रहा है। संघ का एक गुट चाहता है कि संघ और भाजपा के रिश्ते को वैचारिक मंच पर कुछ अघोषित नाम दे दिया जाए ताकि दोनों के बीच सामंजस्य बना रहे और संघ के नेता सत्ता और राजनीति के समुंदर में पहले की तरह गोते लगा सकें, वहीं कुछ नेता चाहते हैं कि भाजपा के बारे में कड़े निर्णय ले ही लिए जाएं।

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

किसी बड़े हादसे के इंतजार में है सरकारी तंत्र

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक के उपरांत देश में आतंक ने तेजी से पैर पसारने आरंभ कर दिए थे। इसके बाद सरकारें आती रहीं जाती रहीं किन्तु आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, नक्सलवाद जैसे तमाम केंसर देश की रग रग में फैल चुके हैं। आज यह बीमारी लाईलाज ही प्रतीत हो रही है।देश के आंतरिक सुरक्षा तंत्र की पोल तो उस वक्त ही खुल गई थी जब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में ही आतंकवादियों ने तफरी करते हुए फायरिंग कर दी थी। उस समय इस पंचायत के पंचगणों (सांसदों) के चेहरे देखने लायक थे। निजी समाचार चेनल्स में सांसदों के चेहरों से उड़ती हवाईयां साफ जाहिर कर रही थीं कि वे भी इन दहशतगर्दों से खौफजदा हैं। बावजूद इसके एकमत से कोई फैसला न लिया जाना निश्चित ही निराशाजनक और निंदनीय माना जा सकता है।संसद पर हमला, लाल किले पर हमला, देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला, मुंबई बम ब्लास्ट, दिल्ली के सीरियल ब्लास्ट आदि न जाने कितने हादसे हैं, जो सबक सीखने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि सरकार इन सबसे सचेत होने की बजाए अभी और किसी बड़े हादसे की राह तक रही है।अभी पिछले दिनों 11 अगस्त को ही महामहिम राष्ट्रपति के आवास एवं साउथ ब्लाक (प्रधानमंत्री कार्यालय) के उपर से एक निजी कंपनी का यात्री विमान उड़ान भरकर चला गया। वस्तुत: यह क्षेत्र नो फ्लाई जोन कहलाता है। इस क्षेत्र में बिना पूर्वानुमति के किसी को भी उड़ान भरने की इजाजत नहीं है। गलतफहमी के चलते अगर महामहिम आवास के सुरक्षा कर्मी इस विमान को अपनी एंटी एयरक्राफ्ट गन के निशाने पर ले लेते तो सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाता।मुंबई में भी महामहिम राष्ट्रपति के काफिले में शामिल हेलीकाप्टर और एक निजी हवाई कंपनी के यात्री विमान की दुघZटना को टाला गया था। बजट सत्र के दौरान भी संसद की लचर सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर केरल के पुन्नामी के मुस्लिम लीग के संसद सदस्य ई.टी.बशीर की पित्न रूखैया बख्श मजे से वित्त मंत्री का बजट भाषण सुन रहीं थीं। यह हादसा तब हुआ जब सदन में प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह, कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी, नेता प्रतिपक्ष एल.के.आड़वाणी सहित अनेक बड़े नेता मौजूद थे।दरअसल केरल से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस का मुस्लिम लीग से गठजोड़ है, अत: यह मामला वहीं रफा दफा करवा दिया गया, किन्तु चूक तो चूक ही कही जाएगी। 14 अगस्त 2002 को रफीक नामक एक व्यक्ति को संसद परिसर मेें जबरन घुसने की कोशिश में पकड़ा गया था, इसके बाद 22 सितम्बर 2002 को ही ब्रज लाल साहू नाम के एक व्यक्ति को दीफार फांदकर संसद में घुसने की कोशिश में पकड़ा गया।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश भर के चुने हुए जनसेवकों की इस पंचायत की सुरक्षा में अब तक सौ करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। इस साल लोकसभा के लिए सुरक्षा खर्च 384.65 करोड़ रूपए तो राज्य सभा के लिए यह 150.60 करोड़ के लगभग है। जनता के चुने हुए नुमाईंदों की सुरक्षा के लिए इतना व्यापक खर्च और आम जनता जिसके द्वारा दिए गए कर से यह सुरक्षा का ताना बाना बुना जा रहा है, उसकी सुरक्षा के लिए . . . ।वैसे भी कहा जाता है कि महामहिम आवास, पीएम हाउस, सोनिया गांधी के आवास, संसद आदि अतिसंवेदनशील जगहों में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुरक्षा तंत्र के इस दावे में कितनी हकीकत है, यह सब भली भांति जानते हैं। कहने को लोकसभा और राज्य सभा सचिवालय द्वारा जारी रेडियो फ्रीकवेंसी कार्ड के बिना कोई भी संसद में प्रवेश नहीं कर सकता है।इतना ही नहीं मंदी की मार झेलते भारत वर्ष में बेरोजगारी एक अभिषाप बनकर रह गई है। इन हालातों में देश के चंद लोगों की सुरक्षा के लिए साल भर में खर्च किए जाते हैं 226 करोड़ रूपए। जी हां, यह सच है। सूत्रों के अनुसार वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह, कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और सोनिया की पुत्री प्रियंका वढ़ेरा की सुरक्षा में लगा है स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) जिसका सालाना बजट 226 करोड़ रूपए है।गृह मंत्रालय के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2003 - 04 में एसपीजी का बजट 75 करोड़ रू. था। 2007 - 08 में यह बढ़कर 113 करोड़ रूपए, तो 2008 - 09 में यह 170 करोड़ रूपए का आंकड़ा पार कर गया था। प्रधानमंत्री की सुरक्षा के बारे में तो कहा जा सकता है किन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि 56 करोड़ 50 लाख रूपए सालाना की दर से नेहरू गांधी परिवार की चौथी और पांचवीं पीढ़ी के महज तीन सदस्य देश की जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई को उड़ा रहे हैं।बहरहाल इन सारी वारदातों, हजारों करोड़ रूपए फूंकने के बाद भी अब तक किसी भी सरकार द्वारा इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया जाना सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति की ओर ही इशारा करता है। हालात देखकर यही कहा जा सकता है कि ``कहां तो तय था चिरांगा, हरेक घर के लिए! कहां चिराग भी मयस्सर नहीं शहर के लिए!!``

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अंदर ही अंदर तलवार पजा रहे हैं भाजपा के क्षत्रप

0 आड़वाणी, राजनाथ, शेखावत और भागवत के बीच चल रही है अघोषित लड़ाई!

0 करोड़ रूपए का सवाल बन गया है ``कौन बनेगा भाजपाध्यक्षर्षोर्षो``

0 विखण्डन की स्थिति में आ पहुंची है भाजपा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगभग साढ़े तीन दशक पुरानी भारतीय जनता पार्टी के चार क्षत्रपों के बीच अंदर ही अंदर तनी तलवारों से भाजपा विखण्डन की स्थिति में आ पहुंची है। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी, भाजपाध्यक्ष आर.एन.सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति बी.एस.शेखावत और संघ प्रमुख एम.आर.भागवत के खेमे अंदर ही अंदर तलवारें पजा कर पैनी करने में जुटे हुए हैं।भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो आड़वाणी खेमे की नाराजगी पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे समिति को लेकर है। आप्टे, मुरलीधर राव और चंदन मित्रा से युक्त यह समिति आम चुनावों में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए खींच तान कर यह ब्लूप्रिंट तैयार कर चुकी है कि इस शर्मनाक पराजय का इकलौता कारण लाल कृष्ण आड़वाणी ही हैं। पूर्व विदेश मंत्री एंव पार्टी से निष्काशित नेता जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी ने भी पार्टी नेतृत्व पर सीधा निशाना साधकर माहोल को खदबदा दिया था।राजस्थान में वसुंधरा प्रकरण की आग अभी शांत नहीं हुई है। राख के अंदर चिंगारी जलती दिखाई दे रही है। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखवत परोक्ष तौर पर वसुंधरा को निपटाने की जुगत लगाए हुए हैं। उधर बिहार में भी उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के खिलाफ माहौल तैयार हो चुका है।पार्टी के प्रमुख अंदर अंदर खदबदाती इस खिचड़ी से इतर संघ के मोहन राव भागवत, के.एस.सुदर्शन और भाउसाहब जोशी के त्रिफला के कोप से बचने के मार्ग प्रशस्त करने में जुटे हुए हैं। राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से हैं, आम चुनावों में यूपी में महज 10 सीटें मिलना उनके लिए सबसे बड़ा माईनस प्वाईंट गिनाया जा रहा है।मध्य प्रदेश में कमोबेश अंर्तकलह कम कही जा सकती है, किन्तु उत्तराखण्ड में कोशियारी और खण्डूरी प्रकरण, राजस्थान का महारानी प्रकरण अब भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है। शेखावत ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल में 2003 से 2008 के बीच हुए 22000 करोड़ रूपयों के महाघोटाले के बारे में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर सनसनी फैलाई थी।वैसे भी आड़वाणी पोषित विजय कुमार मल्होत्रा, वसुंधरा राजे, भुवन चंद खण्डूरी, गोपी नाथ मुंडे आज भी असंतुष्ट भाजपाईयों के निशाने पर हैं। दिसंबर में होने वाले भाजपाध्यक्ष के चुनाव में प्रमुख रूप से अरूण जेतली, सुषमा स्वराज, बाल आप्टे, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शोरी और यशवंत सिन्हा के नाम सामने आ रहे हैं।कुल मिलाकर पार्टी के शीर्ष स्तर पर नेताओं की आपसी लड़ाई के चलते नीचे स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी हद तक टूटने लगा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कभी न समाप्त होने वाली इस अंर्तकलह के चलते भाजपा अब विखण्डन की स्थिति में पहुंच गई है।
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बुधवार, 9 सितंबर 2009

क्या संदेश देना चाह रहे हें जनसेवक

विलासिता का लबादा ओढ़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी

(लिमटी खरे)

किसी ने सच ही कहा है कि भारत वर्ष में सब कुछ संभव है। यहां जन्मजात अंधे को मोटर चलाने का लाईसेंस मिल सकता है। गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े फर्राटे से दौड़ जाते हैं, और भी न जाने क्या क्या! हमारे देश की भयावह गरीबी के परिदृश्य से भलीभांति परिचित सरकारी नुमाईंदे हवाई जहाज में यात्रा कर, पांच या सात सितारा होटल में रात बिताकर आखिर देश की जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं, यह समझ से परे ही है।कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने गठन के बाद सौ दिनी एजेंडा बनाया। सौ दिन पूरे हो गए पर उस एजेंडे का क्या हुआ किसी को नहीं पता। सरकार ने अपने इस एजेंडे में सांसदों के आवास को प्राथमिकता नहीं दी। आज भी अनेक संसद सदस्य किसी न किसी होटल में ही रात बिता रहे हैं, आश्चर्य तो इस बात पर है कि सौ दिनों के बाद भी संसद सदस्यों के लिए निर्धारित आवास ठीक नहीं हो सके हैं। यह है केंद्र सरकार की नाक के नीचे कच्छप गति से चलते प्रशासन की एक बानगी।वजीरे आज़म डॉ. एम.एम.सिंह ने अनावश्यक खर्चों पर कमी की अपील की है। निश्चित तौर पर यह बात उनकी सरकार के मंत्रियों और समस्त संसद सदस्यों पर भी लागू होगी। केंद्र सरकार में विदेश मंत्री जैसे महात्वपूर्ण ओहदे पर विराजमान एम.एस.कृष्णा और विदेश राज्य मंत्री एवं पूर्व राजनयिक शशि थुरूर ने तो सारी हदें पार ही कर दीं।खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो कृष्णा इन दिनों मोर्या शैराटन नाम के एक सात सितारा होटल के प्रेसिडेंशियल स्यूट को अपना आशियाना बनाए हुए थे, जिसका किराया एक लाख रूपए प्रतिदिन का है। यही हाल थुरूर का है वे तज मानसिंह के एिग्जक्यूटिव स्यूट में चालीस हजार रूपए प्रतिदिन के मान से रह रहे थे।पता नहीं जनता या अपने खुद के गाढ़े पसीने की कमाई हवा में उड़ाने वाले इन जनसेवकों को इस बात का इल्म है कि नहीं कि देश की 80 फीसदी जनता की औसत आय महज 20 रूपए प्रतिदिन ही है। मंत्रियों का यह तर्क कि उन्हें आवंटित बंग्ले अभी रहने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए वे होटलों में रह रहे हैं, भी गले से नहीं उतर पा रहा है।इन मंत्रियों ने यह पूछा जाना अत्यावश्यक होगा कि क्या कर्नाटक और केरल भवन के कक्ष इन मंत्रियों के रहने लायक नहीं हैं, जिन भवनों में सूबों के महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक रह सकते हैं, उन कक्षों में रहने में इन जनसेवकों को आखिर एतराज किस बात का है।वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की हिदायत के बाद दोनों ही मंत्रियों ने अपना आशियाना बदल दिया। कृष्णा विदेश सेवा संस्थान के गेस्ट हाउस में तो थुरूर ने इंडियन नेवी के अतिथिगृह की ओर रूख कर लिया है। जनसेवक कहलाने वाले कृष्णा ने कहा है कि वे अपने निजी खर्च पर होटल में रह रहे हैं। अगर वाकई एसा है तो लानत है एसे विलासिता पसंद जनप्रतिनिधियों पर।देश को आजादी दिलवाने वाले दीवानों ने सड़कों पर उतरकर सारे एशोआराम को सलाम भेजा था, तब कहीं जाकर हमें नसीब हुई आजादी। गांधी नेहरू के नाम को भुनाने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पार्टी क्या इस तरह की बयान बाजी पर किसी किस्म की टिप्पणी करने की जहमत उठाएगीर्षोर्षो क्या ये जनता के सेवक राष्ट्रपिता की उपाधि से नवाजे गए महात्मा गांधी के जीवन से कुछ प्रेरणा ले पाएंगेर्षोर्षोसवाल यह उठता है कि अगर इन मंत्रियों ने अपनी निजी व्यवस्था के तौर पर होटलों में रूकने का उपक्रम किया था, तो क्या वे आयकर रिटर्न में करोड़ों के होटल के भुगतान को दर्शाने का साहस कर पाएंगे। सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पास ``उपकृत`` करने के असीमित अधिकार होते हैं, इन परिस्थितियों में इन मंत्रियों के करोड़ों के होटल के बिल का भुगतान भी किसी ``कृपा प्राप्त शोहदे`` द्वारा कर दिया जाए तो किसी को अश्चर्य नहीं होना चाहिए।बेशक दोनों ही मंत्री अपने ``स्वयं`` के व्यय पर डेढ लाख रूपए प्रतिदिन के होटल में रात गुजार रहे होंगे, किन्तु न तो मंत्रियों ने और न ही होटल प्रबंधन ने यह बताने की जहमत उठाई कि वे कितना किराया दे चुके थे, या कितना किराया देना बाकी है। सादगी का आलाप रागने वाली कांग्रेस पार्टी के मंत्री इस कदर विलासिता का उपभोग करेंगे तो ``कांग्रेस का हाथ, गरीब के साथ`` नारे का क्या होगा।विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर ने तो नेट पर यह भी लिखा है कि अगर वे जनता का पैसा खर्च कर रहे होते तो शर्मिंदा होते, लेकिन वे जनता के बजाए अपना पैसा खर्च कर रहे हैं। मंत्री द्वय शायद बार बार यह भूल जाते हैं कि वे निजाम की भूमिका में हैं, रियाया के सुख दुख का ख्याल रखना उनका परम धर्म है।मंदी की मार से जूझ रहे हिन्दुस्तान में अब जबकि गरीबी महामारी की तरह फैल चुकी है, तब इस तरह की विलासिता का प्रदर्शन कर उसे सही ठहराने हेतु तरह तरह के जवाब देना कहां तक उचित माना जा सकता हैर्षोर्षो बेहतर होता दोनों ही मंत्री सादगी के साथ जहां अब रहने गए हैं, वहीं आरंभ से रहते एवं विलसिता पर किए गए खर्च को बाढ़ या सूखा पीडितों के बीच बटवाकर पुण्य कमाते। मंत्री द्वय अपने खर्च पर जो चाहे करना चाहें करें यह उनका नितांत निजी मामला है, किन्तु उन्हें चाहिए कि पहले वे मंत्री पद त्यागें, संसद की सदस्यता त्यागें, उसके उपरांत जो मर्जी वह करें। वर्तमान में चूंकि वे जनसेवक हैं, अत: उन्हें मर्यादित रहना अत्यंत जरूरी है। बुंदेलखण्ड की एक प्रसिद्ध कहावत का जिकर यहां करना लजिमी होगा, ``घर के लड़का (आम जनता) गोहीं (आम की गुठली) चूसें, और मामा (जनसेवक) खाएं अमावट (आम के गूदे को सुखाकर बनाया गया पदार्थ)।``

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फिर सकते हैं अरूण यादव के दिन

0 यदुवंशियों के त्रिफला की काट बनाने की जुगत में हैं राहुल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव अगर ठीक ठीक चले तो आने वाले दिनों में कांग्रेस उन्हें हाथों हाथ लेने की तैयारी में है। राहुल गांधी नजर इस युवा यदुवंशी पर आकर टिक चुकी है। लालू, मुलायम, शरद और अखिलेश यादव की काट के तौर पर अरूण यादव को तैयार किया जा रहा है।कांग्रेस के नए सत्ता ओर शक्ति के शीर्ष केंद्र 12 तुगलक लेन (कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का सरकरी आवास) के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि सत्ता के गुणदोष में लगभग पारंगत हो चुके राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव को तराशना आरंभ कर दिया है।सूत्रों की मानें तो महज दो साल का ही संसदीय अनुभव रखने वाले खण्डवा के सांसद अरूण को केंद्र मंें खेल और युवा मामलों में राज्यमंत्री बनाया गया था, इसके कुछ दिनों बाद ही उनका विभाग बदलकर उन्हें भारी उद्योग विभाग में राज्य मंत्री बना दिया गया है।अगले साल होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों की आपाधापी की वजह से अरूण यादव को शायद अन्य कामों में समय न मिल पाए, संभवत: इसी लिए उनका विभाग बदला गया है। सूत्रों ने यह भी बताया कि राहुल गांधी की सलाह पर ही अरूण यादव को बिहार की मुजफ्फरपुर और मध्य प्रदेश की गोहद विधानसभा में चुनाव प्रचार के लिए भेजा गया है।सूत्रों ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में अरूण यादव के परफारमेंस को देखने के बाद ही कांग्रेस के युवराज राहल गांधी द्वारा अरूण यादव की अगली भूमिका तय की जाएगी। वैसे कांग्रेस के अंदर युवा यदुवंशी अरूण यादव अगर कांग्रेस में अपनी पेठ जमाने में कामयाब हो गए तो आने वाले दिनों में राहुल गांधी द्वारा अरूण को लालू, शरद और मुलायम सिंह यादव की काट के तौर पर पेश कर दिया जाएगा
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मंगलवार, 8 सितंबर 2009

देश की आन पर फिर लग गई सेंध

देश की आन पर फिर लग गई सेंध

(लिमटी खरे)

देश की आन बान और शान का प्रतीक है, रायसीना हिल्स पर स्थित प्रथम नागरिक का सरकारी आवास यानी महामहिम राष्ट्रपति का निवास। यद्यपि इसका निर्माण देश पर राज करने वाले ब्रितानी शासकों ने करवाया था, अत: इसे दासता का प्रतीक भी माना जा सकता है, किन्तु आजाद भारत में राजनीति करने वाले नुमाईंदों ने इसे देश के पहले नागरिक के सरकारी आवास के तौर पर स्वीकार कर लिया है, तो इसे देश की आन बान और शान का प्रतीक माना जाने लगा है।
पिछले दिनों महामहिम के आवास की जिम से तीन जोड़ी डंबल और कम्पयूटर का चोरी होना आश्चर्यजनक और शर्मनाक ही माना जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आजादी के उपरांत कड़ी सुरक्षा के बीच महामहिम का आवास सदा से ही महफूज रहा है। जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां से कंप्यूटर और डंबल जैसी चीजें चोरी होना अपने आप में एक करिश्मे से कम नहीं है।
हमारे देश की लचर आंतरिक सुरक्षा का नमूना था, लाल किले, संसद और मुंबई में हुआ आतंकी हमला। देश में अंदर ही अंदर घुन की तरह आतंकवादी, अलगाववादी अपना काम कर गुजर रहे हैं, सरकारें आतीं हैं, चली जाती हैं, बयान बाजी होती है, पर नतीजा सदा ही सिफर ही होता है।
महामहिम राष्ट्रपति के आवास से छ: नग डंबल और एक संगणक (कम्पयूटर) की चोरी महज चालीस पचास हजार रूपए के नुकसान के तौर पर नहीं देखी जा सकती है। यह मामला काफी संगीन है। संगीनों के साए में 62 सालों से रहने वाले महामहिम के आवास से सामान की चोरी निश्चित तौर पर आंखों से काजल चुरा लेने की तरह ही माना जा सकता है।
पता नहीं उस कम्पयूटर में क्या गोपनीय तथ्य रहे होंगेर्षोर्षो यह तो तय हो गया है कि यह एक गंभीर मसला है। वैसे भी महामहिम का आवास तीन सुरक्षा घेरों में है। पहले घेरे में अर्धसैनिक बल, दूसरे में आईटीडीपी के कमांडो और दिल्ली पुलिस तथा तीसरे में कमांडो के साथ दिल्ली पुलिस के जवान सुरक्षा में लगे हैं।
चौबीसों घंटे छावनी बने रहने वाले महामहिम राष्ट्रपति के आवास में तीन पालियों में सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। अमूमन एक पाली में 225 जवान सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं। इतना ही नहीं प्रवेश द्वार पर अर्धसैनिक बल के जवान अत्याधुनिक हथियारों के साथ लैस होते हैं। इसके बावजूद इस तरह की घटना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं मानी जा सकती है।
महामहिम राष्ट्रपति के आवास में आम जनता के लिए 17, 31 और 35 नंबर के द्वार का इस्तेमाल किया जाता है। मजे की बात तो यह है कि आम लोगों के प्रवेश के लिए प्रवेश पत्र बनाया जाता है और कड़ी सुरक्षा के उपरांत ही महामहिम राष्ट्रपति के आवास में कोई आमद दे सकता है। यह वारदात गेट नंबर 17 के पास बने जिम में हुई है।
इसके अलावा फिरोजशाह रोड़ स्थित जनता दल यूनाईटेड के राज्य सभा के सांसद ऐजाज अली के सरकारी आवास में भी चोरी की घटना प्रकाश में आई है। इस आवास में मरम्मत का काम चल रहा है, यहां से भी बाथरूम से मंहगे फव्वारे और वाशबेसिन चोरी हो गए हैं। जनता यह जानकर आश्चर्य करेगी कि जनता के नुमाईंदे इस कदर विलासिता के सामान का उपभोग करते है, जिनकी कीमत उनकी पूरी माह की खुराक से भी कई गुना अधिक है।
संसद पर हुए हमले से लेकर मुंबई में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हमारे लिए सबक से कम नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि हम इन गंभीर हादसों से सीख लेने के बजाए नए हादसों को जन्म लेने के लिए उपजाउ माहौल तैयार करते हैं।
महामहिम आवास में हुई चोरी के मामले में यह भी संभव है कि रसूख के चलते साख बचाने की गरज से महामहिम आवास इस चोरी की घटना का खण्डन कर दे या फिर चोरी गए सामान की बरामदगी की बात कह दी जाए। कुल मिलाकर हाई सिक्यूरिटी जोन में घटी इस घटना में लीपापोती की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। मामला रफा दफा करना वैसे तो एक सामान्य बात है, किन्तु यह निंदनीय और शर्मनाक अवश्य है।
खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो महामहिम राष्ट्रपति के आवास में हुई चोरी में किसी कर्मचारी का ही हाथ है। अगर वाकई एसा है तो घर का भेदी ही लंका ढहाता है। महामहिम के आवास मेंं कर्मचारियों की लंबी चोडी फौज के बीच जयचंद को ढूंढना बहुत दुष्कर कार्य होगा।
देश के पहले नागरिक के घर पर हुई चोरी की इस घटना से जनता जनार्दन के मानस पटल पर उभर रहे सवालों के जवाब आज भी निरूत्तरित ही हैं। सरकारी तंत्र को चाहिए कि छोटी छोटी बात पर सामने आकर सफाई देने के अलावा इस मामले में भी वह आगे आए और सच्चाई को बिना लाग लपेट जनता के सामने रखे, क्योंकि मामला किसी एसे गैरे के घर चोरी का नहीं, वरन देश के पहले नागरिक के घर में हुई चोरी का है।

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नए क्लेवर में उभरकर आ रहा है ``सिमी``

0 सिमी ने उतार फेंका पुराना चोला

0 अब राजस्थान से संचालित हो रहा आपरेशन

0 लालच के चलते काश्मीर में अब हिन्दू भी आतंकवादी संगठनों में!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। हिन्दुस्तान में आतंक बरपाने के लिए जिम्मेदार प्रतिबंधात्मक संगठनों ने अब नई रणनीति के तहत अपने नाम और ठिकानों को बदलना आरंभ कर दिया है। ``लश्कर ए तैयबा`` की तर्ज पर अब सटूडेंट इसलामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) ने भी सरकार की आंख में धूल झोंकने की गरज से अपना नाम और ठिकाना बदल लिया है।
गृह मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि खुफिया विभाग ने सरकार को इस संबंध में अपनी एक खुफिया रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें खुलासा किया गया है कि सिमी ने अपना नाम बदलकर ``वहादत ए इस्लामी`` कर लिया है। इतना ही नहीं इस नए संगठन का मुख्यालय राजस्थान में बनाए जाने की खबर भी है।
सूत्रों ने आगे कहा कि प्रतिबंधात्मक संगठनों की मुश्कें कसने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा की जा रही सख्ती के चलते यह कदम उठाया गया है। गौरतलब होगा कि ``लश्कर ए तैयबा`` ने जिस तरह पूर्व में अपना नाम बदलकर ``जमात उद दावा`` कर लिया था, उसी तर्ज पर अब सिमी ने केंचुली उतारकर नया चोला पहना है।
सूत्रों की मानें तो वहादत ए इस्लामी वैसे तो सामाजिक कार्य करने वाला एक गैर सरकरी संगठन है, किन्तु पर्दे के पीछे का इसका स्वरूप काफी भयानक है। कहा जा रहा है कि हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम करने वाला दिल्ली ब्लास्ट का मास्टर माईंड और सिमी का फायनेंसर तौकीर पर्दे के पीछे से इसके लिए संसाधन मुहैया करवा रहा है।
बताया जाता है कि राजस्थान में अपना बेस बनाने के पीछे यह तर्क भी दिया जा रहा है कि वहां से सरहद पार पाकिस्तान में बैठे दहशतगर्द आकाओं से आसानी से संपर्क किया जा सकता है। चर्चा तो यहां तक भी है कि इस संगठन ने पिछले दिनों दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जमकर बैठकें भी की हैं।
सूत्रों ने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश सूबे के आजमगढ़ का रहने वाला जमाइल इस्लाम और बिहार में दरभंगा के अब्दुल कासिम ने काडर को बढाने की जिम्मेदारी अपने कांधों पर ली है। वैसे भी जमात उद दावा के मुखिया हफिज सईद के बारे में चीन की राय के बाद भारत सरकार असमंजस में ही है। बताते हैं कि चीन हाफिज सईद को अतंकवादी मानने को तैयार ही नहीं है।
उधर भरोसेमंद सूत्रों का यह भी कहना है कि जम्मू काश्मीर में लश्कर ए तैयबा, हरकत उल अंसार, अल बद्र, हिजबुल मुजाहिदीन आदि संगठनों में अब भारी तादाद में हिन्दू भी शामिल होने लगे हैं। इनमें से कुछ हिन्दू आतंकवादियों को तो ``ए`` श्रेणी में रखा गया है, जिन पर लाखों के इनाम हैं।पुलिस के आंकडों से उभरकर आई बात से यह तथ्य साफ हो जाता है कि 1996 से 17 हिन्दू आतंकी सक्रिय रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पैसे के लालच के चलते 16 से 25 साल के युवा इन आतंकी संगठनों के लिए काम कर रहे हैं। वैसे सुरक्षा बलों के साथ हुई मुटभेड में अब तक चार हिन्दू आतंकवादी मारे गए हैं। कुलदीप कुमार, उत्तम कुमार, बिपिन कुमार एवं बिट्टू कुमार नाम के ये आतंकी विभिन्न मुटभेड में मार गिराए गए हैं।

महिला आरक्षण में सोनिया पिछड़ीं, युवाओं में राहुल ने मारी बाजी

लिमटी की लालटेन

महिला आरक्षण में सोनिया पिछड़ीं, युवाओं में राहुल ने मारी बाजी

केंद्र सरकार के कार्यकाल के सौ दिन पूरे हो गए, इन सौ दिनी एजेंडे में महिला आरक्षण बिल को भी स्थान दिया गया था। महिला आरक्षण बिल न तो सरकार में न ही सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में परवान चढ़ सका। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी महिला होने के बावजूद भी इसे दोनों ही जगह लागू नहीं करवा सकीं। उधर कांग्रेस के युवराज एवं कांग्रेसियों की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने अपने ``युवाओं`` के एजेंडे को लागू करवाने में अघोषित तौर पर सफलता हासिल करवा ही ली। डॉ.एम.एम.सिंह के मंत्रीमण्डल में युवाओं की संख्या इस बार निश्चित तौर पर बढ़ी है। इतना ही नहीं राहुल ने हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में 20 फीसदी युवाओं को टिकिट देने की मांग कर एक बार फिर ताल ठोंक दी है। कांग्रेस मेें किसी की इतनी मजाल नहीं कि युवराज की बात का विरोध कर सके, सो जाहिर है इन तीनों राज्यों में बीस फीसदी युवा चेहरों को टिकिट मिलना तय ही है।

लेटर बम की जद में भाजपा

अनुशासित पार्टी होने का लबादा ओढने वाली भारतीय जनता पार्टी में अब लेटर बम की धूम मच गई है। एक के बाद एक पत्रों से भाजपा में अंदरूनी सैलाब उमडकर बाहर छलकने लगा है। हाल ही में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूरी ने हाईकमान को एक पत्र लिखकर कुछ एसे प्रश्न पूछ लिए हैं, जिनके चलते पार्टी हाईकमान सकते में है। बताया जाता है कि इस पत्र में कुछ इस तरह के सवाल पूछे गए हैं, जिनके जवाब देने से पार्टी के मुखिया सदा ही बचते आए हैं। देखा जाए तो समूचे देश में हुए आम चुनावों में भाजपा औंधे मुंंह गिरी है, फिर सिर्फ उत्तराखण्ड में ही पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन को अपने एजेंडे में सर्वोपरि क्यों रखार्षोर्षो पार्टी के आला नेताओं ने पहले भी परोक्ष तौर पर पार्टी की हार के बाद जिम्मेदार नेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर नवाजे जाने पर अपनी तल्ख नारजगी व्यक्त की जा चुकी है। लगता है पार्टी सुप्रीामो राजनाथ सिंह के कार्यकाल के अंतिम दिनों में भी वे विवादित होने से नहीं बच पाएंगे।

. . . पर कानून क्या कहता है

दुनिया भर में मशहूर किपलिंग की जंगल बुक के हीरो ``मोगली`` की कर्मस्थली से होकर गुजरने वाला स्विर्णम चतुZभुज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में फंसे पेंच को दूर कराने की गरज से एमपी के पूर्व वन मंत्री एवं विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमण्डल लेकर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला। इस दौरान एक मजेदार वाक्या सामने आया। जयराम रमेश ने इस मामले में सूबे के पूर्व वन मंत्री हरवंश सिंह से पूछा कि आप भी वनमंत्री रहे है, अगर आपके सामने इस तरह की स्थिति आती तो आप क्या करतेर्षोर्षो ठाकुर हरवंश सिंह ने जवाब दिया कि जनता ने हमें चुना है, जनहित में जो हो वही किया जाना चाहिए और वे भी एसा ही करते। इतनी बात को प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य द्वारा विज्ञप्ति के माध्यम से उनके कार्यक्षेत्र वाले जिले में मीडिया में बंटवा दिया गया। इसके बाद की बात गोल कर दी गई। सूत्रों के अनुसार जयराम रमेश ने साफ तौर पर कहा कि जनता के प्रति जवाबदेही सबसे अहम मामला है, किन्तु इस मामले में कानून क्या कहता हैर्षोर्षो केंद्रीय वनमंत्री ने कानून के हिसाब से चलने की बात ही कही। पेशे से अधिवक्ता रहे सूबे के पूर्व वन मंत्री ठाकुर हरवंश सिंह इस मामले में अगर वन विभाग के कानून की धारा दो का उल्लेख कर देते तो शायद जयराम रमेश निरूत्तर हो जाते, वस्तुत: ऐसा हुआ नहीं।

हेलीकाप्टर से भयाक्रांत आंध्र के नेता

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुघZटना में हुई मौत से सूबे के नेताओं में चौपर (हेलीकाप्टर) को लेकर भय व्याप्त हो गया है। दरअसल आज से लगभग साढ़े सात साल पहले भी एक सूबे के एक वरिष्ठ नेता हेलीकाप्टर दुघZटना में असमय ही काल के गाल में समा गए थे। 3 मार्च 2002 को आंध्र के ही एक नेता और देश के पूर्व लोकसभाध्यक्ष जी.एम.बालयोगी भी हेलीकाप्टर दुघZटना में अल्लाह को प्यारे हो गए थे। उस दिन बालयोगी अपने एक अंगरक्षक के साथ सुबह पौने आठ बजे भीमवरम से रवाना हुए, कुछ ही मिनटों में उनके हेलीकाप्टर में तकनीकि खराबी आई और उनका चौपर हाई टेंशन बिजली की लाईन से टकरा गया था। हाल ही में मुख्यमंत्री रेड्डी के साथ भी चौपर दुघZटना हुई। संयोग से दोनों ही हेलीकाप्टर बेल कंपनी के थे। आने वाले समय में अगर आंध्र क्या समूचे देश के राजनेता अमरिका की मशहूर कंपनी बेल के हेलीकाप्टर में बैठने से परहेज करें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

परिसीमन ने उड़ाई भाजपा की नींद

महाराष्ट्र प्रदेश में आसन्न चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के नेताओं की नींद उडी हुई है। इसका कारण परिसीमन का जिन्न है। परिसीमन आयोग की सिफारिशें लागू होने के उपरांत सूबे में अब शहरी मतदाताओं की भूमिका एकाएक महत्वपूर्ण हो गई है। भाजपा शिवसेना गठबंधन के बारे में एनालिसिस करने वालों का कहना है कि लोकसभा के चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि इस गठबंधन का प्रभाव शहरों के बजाए ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही इस गठबंधन की नाक का बाल बने राज ठाकरे के रवैए ने नेताओं की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने बहुत पहले से ही शहरी मतदाताओं के महत्व को पहचान लिया था, और बिजली दरों में बढोत्तरी, रिलायंस इन्फ्रास्टक्चर और बेस्ट बस सर्विस के खिलाफ प्रदर्शन में महात्वपूर्ण भूमिका निभाकर एमएनएस ने एक तरह से शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कवायद भी कर ली है। मनसे, शिवसेना और भाजपा के त्रिकोण में अब मनसे का पडला ही भारी दिखने लगा है। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने दहाड कर कहा है कि सूबे में मुख्यमंत्री वे ही बनाएंगे। ठाकरे की इस दहाड के बाद भाजपा और शिवसेना की धडकने तेज होना स्वाभाविक ही है।

गुटबाजी से परेशान हैं सोनिया

सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की जड़ें अब देश भर में कमजोर हो चुकीं हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। आधी सदी से अधिक समय तक देश में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अब सूबों और केदं्र में गठबंधन की बैसाखी लेकर चलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अध्यक्ष के तौर पर नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू सोनिया गांधी दस साल से अधिक का समय पूरा कर चुकीं हैं, पर उनके अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस में जान नहीं फूंकी जा सकी है। इसका कारण कांग्रेस के अंदर वर्चस्व को लेकर पसरी गुटबाजी ही है। एक दूसरे की जड़ें काटने के चक्कर में सूबों के क्षत्रप चुनावों में कांग्रेस को ही कमजोर करने से नहीं चूक रहे हैं। एक समय था जब नेता कांग्रेस को जिताने के लिए कृत संकल्पित नजर आते थे, किन्तु आज नेता ``खुद`` तक सिमटकर रह गए हैं। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने राजमाता को मशविरा दिया है कि नेता तो गुटबाजी करने से बाज नहीं आने वाले सो अब सीधे कार्यकर्ताओं से ही अपील की जाए। बताते हैं कि दिग्गी राजा की सलाह पर अब कांग्रेस अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को पत्र लिखकर एकजुट हो तीन राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस का परचम फहराने की अपील की है। देखना यह है कि सोनिया की कार्यकर्ताओं से की गई अपील कितनी कारगर साबित होती है।

नजीर बन सकता है फैसला

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 13 अगस्त को एक याचिका दायर की गई थी, इस याचिका पर फैसला महज 13 दिनों के अंदर 26 अगस्त को ही दे दिया गया। उच्च न्यायालय के इतिहास में संभवत: पहला मौका होगा जबकि न्यायालय द्वारा इतनी जल्दी किसी प्रकरण का निष्पादन किया हो। 8218 क्रमांक से दायर इस याचिका को लखनादौन के एक अधिवक्ता मनीष केसरवानी ने दायर किया था। उच्च न्यायलय के त्वरित फैसले से वकील जगत भले ही नाखुश होगा किन्तु पक्षकार तो लड्डू बांट रहे होंगे। पक्षकारों का हित चाहने वाले कुछ वकीलों का मत है कि देश के सबसे बड़े न्यायालय सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में संज्ञान लेतेह हुए देश की हर अदालत को इस तरह से त्वरित न्याय दिलवाने की पहल करनी चाहिए। वैसे भी देश की अदालतों में न्यायधीशों की कमी के चलते मुकदमों की तादाद बहुत अधिक बढ़ चुकी है।

शिवराज को असमंजस में डाला ज्योतिरादित्य ने

चंबल के महाराजा एवं केद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान सेे जिला मुख्यालय विदिशा में स्थित उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित तकनीकि कालेज को साधन संपन्न बनाने की गुहार लगाई है। दरअसल विदिशा के सम्राट अशोक इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना 01 नवंबर 1960 में उनके पूर्वजों सिंधिया राजघराने ने की थी। युवा तुर्क ज्योतिरादित्य ने पोषण आहार अनुदान के अलावा करोड़ 15 लाख रूपयों की पूर्व वषोZं के घाटे को भरने का आग्रह भी किया है। राजनैतिक बियावान में ज्योतिरादित्य के पिता एवं पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री माधव राव सिंधिया के सहयोगी रहे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने भी शिवराज सिंह चौहान को इसी आशय का एक पत्र लिखकर सिंधिया घराने के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार कर दिया है। बताते है कि इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान असमंजस में हैं। दरअसल विदिशा उनका पुराना तो सुषमा स्वराज का वर्तमान में संसदीय क्षेत्र है। इस मामले में सुषमा स्वराज द्वारा अभी तक कोई मांग नहीं की है। एसी स्थिति में अगर शिवराज सिंह द्वारा कांग्रेस के नेताओं के अनुरोध को स्वीकार कर लिया जाता है तो पार्टी मंच पर उनकी किरकिरी हो सकती है।

चुनाव और सड़क निर्माण से चिंतित हैं वासनिक

केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक महाराष्ट्र में अगले माह होने वाले चुनावों के चलते काफी चिंता में हैं। दरअसल अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रस्तावित स्विर्णम चतुभुZज योजना के अंतर्गत बनने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश सीमा के सिवनी जिले के तत्कालीन कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 के एक आदेश के तहत इस मार्ग पर काम रोक दिया गया है। इस मार्ग में आगे उनका संसदीय क्षेत्र भी आता है। 21 अगस्त को सिवनी जिले मेें हुए एतिहासिक बंद के बाद एनएच 07 पर पड़ने वाले महाराष्ट्र के कुछ हिस्से सुलग गए हैं। वहां भी आंदोलन तेजी से फैलने लगा है। इसी बीच खवासा से नागपुर तक के सड़क निर्माण के टेडर कर दिए गए हैं। सूत्रों का कहना है कि वासनिक की चिंता इस बात की है कि लोगों के बीच अब यह मैसेज जाने लगा है कि यह सब कुछ दिखावा 13 अक्टूबर तक के लिए है, चुनाव निपटने के बाद सडक निर्माण का काम आरंभ हो सकेगा या नहीं इस बारे में कहा नहीं जा सकता है।

विदेशी सगा, देशी सौतेला

विदेश से आई बीमारी स्वाईन फ्लू को केंद्र सरकार ने अपना सगा पुत्र मानते हुए उसे हाथों हाथ लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा इससे निपटने करोड़ों रूपए खर्च कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर देशी बीमारी के बारे में सरकार की अनदेखी आश्चर्यजनक है। उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में मेनिंगोकाकल मेनिंजाईटिस (मस्तिष्क ज्वर) का आतंक फैला हुआ है। विशेषकर गोरखपुर जिला इसकी सबसे ज्यादा चपेट में है। गोरखपुर में इस साल अब तक 213 लोग इस बीमारी के चलते काल के गाल में समा चुके हैं। इसके साथ ही साथ उड़ीसा के कालाहांडी में डायरिया का प्रकोप जबर्दस्त है। कालाहांडी में महज एक पखवाड़े में ही 38 जानें गई हैं। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री प्रसन्न आचार्य इस बात को स्वीकार भी कर चुके हैं। सच ही है जब आम आदमी ही मेड इन इंडिया की सील के बजाए मेड इन यूएसए को महत्व देता है तो भला बीमारी के बारे में सरकार इससे कैसे चूक जाए। मेिक्सको से उपजी बीमारी को भारत सरकार हाथों हाथ लेगी ही, देशी बीमारी का क्या उससे तो नीम हकीम ही निपट लेंगे।

खून की दो बूंद ही आतीं हैं काम

मध्य प्रदेश में व्याप्त बिजली के संकट से निपटने के लिए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपनी कर्मभूमि राजगढ़ में बिजली के संकट को लेकर प्रदर्शन किया। दिग्गी राजा के साथ कांग्रेसियों की भीड़ ने जब अपने तेवर दिखाए तो पुलिस ने तबियत से लाठियां भांजी। कहा जाता है कि भीड़ में जब ``सार्वजनिक अभिनंदन`` होता है तब लाठी किसी का चेहरा नहीं देखती। हुआ यही, पुलिस की लाठियों से दिग्विजय सिंह घायल हो गए। राजा के सर पर चोट आई, तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया जाकर सर पर टांके लगवाए गए। उधर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आनन फानन राजगढ़ को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया। इतिहास गवाह है, आंदोलनों में जब भी किसी देशभक्त का खून माटी पर गिरा है, विजय पताका वहीं फहरी है। अब जनता के बीच यह सवाल अवश्य ही उठने लगा है कि अपने अपने क्षेत्रों की समस्याओं के लिए इस तरह के आंदोलन कर पुलिस की लाठियां खाने वाले नेताओं की प्रजाति कहां विलुप्त हो गई हैर्षोर्षो वर्तमान में दिखावे के लिए विपक्ष में बैठे नेता सत्ता पक्ष के साथ ``नूरा कुश्ती`` लड़ते ही नजर आ रहे हैं।

पुच्छल तारा

देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायायल द्वारा गठित की गई है केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी)। बताते हैं कि सीईसी का काम सुप्रीम कोर्ट में दखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए मौका मुआयना कर वास्तविक प्रतिवेदन सर्वोच्च न्यायालय को सौंपना है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नामक एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर भी सीईसी ने अपना प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। इस मामले में कांग्रेस का एक प्रतिनिधमण्डल केदं्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला, और वापस आकर उसने मीटिंग का ब्योरा दिया। कांग्रेस द्वारा जारी अधिकृत विज्ञप्ति में जयराम रमेश के हवाले से कहा गया है कि सीईसी के विशेष आमंत्रित सदस्य को पुन: स्थल निरीक्षण करने भेजा जाएगा। सवाल यह उठता है कि सीईसी जयराम रमेश के इशारे पर काम करने गठित की गई है, या फिर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन के लिए।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

भाजपा की अंदरूनी मारकाट से संघ भी आया आजिज

भारतीय जनता पार्टी और अनुशासन एक सिक्के के दो पहलू हुआ करते थे, किन्तु अब यह इतिहास की बात हो गई है। भाजपा में अनुशासनहीनता के इतने उदहारण सामने आ चुके हैं कि अब लगने लगा है कि देश की सबसे गैर अनुशासित पार्टी में शुमार हो चुका है भाजपा का। कल तक भाजपा का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी अब भाजपा को उसके ही हाल पर छोडने का मानस बनाने लगा है। हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस मसले पर संघ की लाईन साफ कर दी है। बकौल भागवत अब संघ द्वारा भाजपा के मांगने पर ही उसे मशविरा दिया जाएगा। भागवत ने कहा कि भाजपा के अंदर जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी भी तरह से अच्छा नहीं माना जा सकता है। संघ प्रमुख ने कहा कि अब संघ द्वारा भाजपा के मांगने पर ही सलाह दी जाएगी। सच ही है, भाजपा के अंदर मची घमासान में पडकर संघ भला क्यों अपनी मिट्टी खराब करे।

कैसे रहेंगे स्टेटस सिंबाल के बिना

राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स के लिए सुरक्षा कर्मियों का काफिला उनके स्टेटस सिंबाल से कम नहीं है। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने इस तरह के नेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा कम कर दी है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने एक आदेश जारी कर 30 अति विशिष्ट व्यक्तियों की एक्स स्तर की सुरक्षा वापिस ले ली है। साथ ही मायावती, लालू प्रसाद यादव, मुरली मनोहर जोशी, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, शिवराज पाटिल, जगमोहन जैसे जन जन के नेताओं की एनएसजी भी वापस लेने की सिफारिश की गई है। सवाल यह उठता है कि जन जन के नेताओं को अपनी ही जनता से खतरा कैसार्षोर्षो और बिना स्टेटस सिंबाल के ये राजनेता सांस ले सकेंगे इस बात में भी संशय ही है।

मोदी के आपरेशन ``सी एच`` को झटका

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के साथ ही साथ में काफी गहरी पैठ रखते हैं। मोदी नपे तुले कदमों से पार्टी सुप्रीमो के सिंहासन की ओर बढ़ रहे थे। चर्चा है कि मोदी को उम्मीद थी कि उनका अघोषित एवं परोक्ष तौर पर चलने वाला आपरेशन ``सीएच`` (आपरेशन भाजपा के चेयरमेन की कुर्सी पाना) इस साल के दिसंबर तक पूरा हो जाएगा। सूत्रों के अनुसार मोदी मान कर चल रहे थे कि वषाZंत तक वे भाजपा के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हो जाएंगे। उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर पर उभरे बाला साहेब आप्टे और सुषमा स्वराज इन दिनों चर्चाओं के बाहर हैं। मोदी की किस्मत का सितारा उतना बुलंद नहीं दिख रहा है। भाजपा के अंदर मचे घमासान ने उनके इस आपरेशन को झटका दे दिया है। लाल कृष्ण आड़वाणी और अरूण जेतली इस मामले में मोदी के साथ हैं। सीएम से सीएच बनने की मोदी की चाह लगता है इतनी जल्दी पूरी होने वाली नहीं है।

अपने ही जाल में उलझे कमल नाथ

अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की महात्वाकांक्षी परियोजना स्विर्णम चतुभुZज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले फोरलेन मार्ग को लेकर सियासत पूरी तरह गर्मा चुकी है। आरोप प्रत्यारोपों के दौर के बीच 21 अगस्त को सिवनी में एतिहासिक बंद के दरम्यान केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के गली गली मे पुतले जलाए। चूंकि कमल नाथ महाकोशल के सर्वमान्य नेता माने जाते हैं अत: महाकौशल के ही सिवनी जिले में कमल नाथ का इस कदर विरोध होने से उन्हें पीडा होना लाजिमी है। इसके बाद एक के बाद एक घटनाक्रमों को अंजाम दिया गया। 27 अगस्त को दिल्ली में जारी कमल नाथ के बयान ने भ्रम और बढा दिया है। बकौल कमल नाथ सारा भ्रम सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका के निर्णय के चलते पैदा हुआ है। सिवनी वासी अब यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर कौन सी जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल है और इस पर कब और कौन सा निर्णय दिया गया है। वस्तुत: इस मामले में अब तक न तो कोई याचिका ही प्रकाश में आई है और न ही निर्णय

हुड्डा ने प्रशस्त किए अक्टूबर में चुनाव के मार्ग

हरियाणा विधानसभा को भंग करने की मुख्यमंत्री भूपेदं्र सिंह हुड्डा की सिफारिश के बाद अब लगने लगा है कि अक्टूबर के पहले पखवाड़े तक हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव करवा लिए जाएंगे। सितम्बर से अक्टूबर के बीच त्योहारों की सीरिज के चलते माना जा रहा है कि अक्टूबर मध्य तक तीनों राज्यों में चुनाव करवा लिए जाएंगे। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस भी इसी फिराक में दिख रही है कि इन तीनों राज्यों मे ंवह अपना वर्चस्व कायम रख सके। वैसे भी तेजड़ियों (व्यापार एवं मंहगाई में तेजी की संभावना व्यक्त करने वाले) के अनुसार दीपावली के बाद मंहगाई का ग्राफ तेजी से उपर उठने की संभावना है। पहले से ही कमर तोड़ मंहगाई के चलते टूटी जनता की कमर और अधिक टूटने की उम्मीद है। इससे पहले ही कांग्रेस चाहती है कि तीन राज्यों के चुनावों को अंजाम दे दिया जाए।

सकते में हैं चापलूस

झारखण्ड मे ंमुख्यमंत्री परिवर्तन के बाद नए निजाम के तेवर देखकर चापलूस बहुत असमंजस में हैं, कल तक सीएम के दाएं बाएं रहकर उनके कान भरकर अपना उल्लू सीधा करने वालों को अब नए निजाम के दरबार में जगह नहीं मिल पा रही है। झारखण्ड के ब्यूरोक्रेट्स अपने सीएम के सामने पडकर उनसे डायरेक्ट आई कान्टेक्ट बनाने के प्रयास करते नजर आ रहे हैं। नए मुख्यमंत्री ने इन अधिकारियों को जमकर लताड़ना आरंभ कर दिया है। अधिकारियों को सीएम ने ताकीद कर दिया है कि वे उनके अधीनस्थों से मिलकर ही सारे कामों को अंजाम दें। इसके बाद भी अगर को उषा (उत्सुक्ता की शांति) रह जाए, तब ही वे सीएम के दरबार में हाजिरी दें। बार बार चेहरा दिखाने से कुछ भी हासिल नही होने वाला है। सीएम कागजों के बजाए वास्तव में काम को अंजाम देने की मंशा रख रहे हैं। अब बेचारे कामचोर और चापलूस अधिकारी सकते में हैं, कि वे आखिर दरबार में जगह बनाएं तो कैसे।

मिस्टर क्लीन बनने की तैयारी में बसपा

ताज कारीडोर, चंदा और मूर्तियों के विवाद में फंसी बहुजन समाज पार्टी अब अपनी इमेज सुधारने की कवायद करने वाली है। बताते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती को उनके शोहदों ने मशविरा दिया है कि सूबे में बसपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, अत: अब मायावती ने इमेज सुधारने की पहल करने का फैसला लिया है। आने वाले साल में बसपा का चेहरा अगर बदला बदला दिखे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बताते हैं कि बसपा ने एक साल का एजेंडा बना लिया है, जिसमें कानून व्यवस्था के साथ ही साथ विकास की योजनाओं और जनहित को सर्वोपरि रखने का मूल मंत्र बनाया गया है। लोकसभा के नतीजों से बसपा में भूचाल आ गया है, और बसपा के नीति निर्धारकों ने अपना नया एजेंडा बसपा सुप्रीमो के सामने रख दिया है। बसपा सुप्रीमो ने संबंधित महकमों को पाबंद कर दिया है कि निर्माणाधीन स्मारकों का काम शीघ्र ही पूरा कर लिया जाए एवं इस कार्यकाल में और स्मारकों की स्थापना न की जाए। देखना है कि बसपा के नीति निर्धारकों की यह पहल कितना रंग लाती है।

मराठा क्षत्रप ने बढाई दिग्गी राजा की मुसीबत

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पंवार ने कांग्रेस की नींद में खलल डाल दिया है। मराठा क्षत्रप शरद पवार ने साफ तौर पर कह दिया है कि उसे महाराष्ट्र सूबे की 288 में से 122 सीटें चाहिए। इससे पूर्व कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली महासचिव दिग्विजय सिंह ने कह दिया था कि जब विदेशी मूल का मुद्दा ही नहीं रहा तो राकांपा को अब कांग्रेस में मिल जाना चाहिए। सूत्र बताते हैं कि राजा दिग्विजय सिंह का यह मशविरा मराठा क्षत्रप को रास नहीं आया। मराठा क्षत्रप यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं कि उनके सूबे में कोई भी किसी तरह का हस्ताक्षेप करे, वह भी सूबे में उनकी पार्टी के कांग्रेस में विलय की सलाह देकर। मराठा क्षत्रप काफी तेश में दिखाई पड़ रहे हैं। अर्जुन सिंह के बाद कांग्रे्रस की राजनीति के अघोषित चाणक्य माने जाने वाले दिग्विजय िंसंह की चालों को समझकर मराठा क्षत्रप शरद पंवार ने अपना दांव खेल दिया है। गेंद अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पाले में है, देखना है वे इस मसले का क्या निकाल निकालतीं हैं।

पुच्छल तारा

फोरलेन सिवनी से होकर जाएगी अथवा नहीं। इसका जवाब अभी भी एक पेटी में बंद है, यह पेटी कहां है कोई नहीं जानता अगर पेटी मिल भी जाए तो इसकी चाबी कहां है इसे खोजना बहुत मुश्किल है। यह पोराणिक जादुई कथा नहीं वरन 21वीं सदी में सच्ची कथा है। जितने मुंह उतनी बातों की तर्ज पर चल रहा है सारा मामला। ठोस आधार अब तक मिला है तो वह है पूर्व जिला कलेक्टर पी.नरहरि का कूटनीति भरा एक पत्र जिसमें सिवनी से खवासा की ओर के मार्ग पर वृक्षों की कटाई पर रोक लगाई गई थी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि लखनादौन से सिवनी मार्ग की निर्माण एजेंसी के पेटी कांटेक्टर मीनाक्षी ने नरहरि को साध लिया था, किन्तु इसके बाद की निर्माण एजेंसी गुजराती मूल के सद्भाव द्वारा एसा कोई जतन नहीं किया जा सका। जिलाधिकारी के पास असीमित अधिकार होते हैं, सो ये एजेंसी हाथ पर हाथ धरे बैठे है। अगर यही एजेंसी जिलाधिकारी के उक्त आदेश को उच्च न्यायालय या आयुक्त राजस्व जबलपुर के सामने चुनौति दे दे तो मामला कुछ सेटिल होने की उम्मीद है। इस मामले में जिले की जनता उनका साथ देगी ही साथ ही साथ राजनेताओं द्वारा निर्माण एजेंसी का साथ दिया जाना मजबूरी होगी।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कांग्रेस द्वारा भाजपा का सरेआम दोहन

0 केंद्र सरकार का उपक्रम दे रहा राज्य सरकार को अलसेट

0 समूचे प्रदेश में बांट दिए करोड़ों के चेक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के एक उपक्रम द्वारा मध्य प्रदेश में संचालिए केंद्र सरकारक की महात्वाकांक्षी परियोजना प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में जमकर पलीता लगाया जा रहा है। इस कंपनी द्वारा सौ फीसदी काम को ही सबलेट कर पेटी कांटेक्टर्स को प्रदाय कर दिया गया है।प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय संचार मंत्रालय की एक सहयोगी कंपनी टेलीकम्यूनिकेशन कंसलटेंट इं लिमिटेड (टीसीआईएल) द्वारा मध्य प्रदेश में पीएमजीएसवाय के तहत लगभग आधे प्रदेश में अपना साम्राज्य कायम कर लिया है। बताया जाता है कि उक्त कंपनी द्वारा लगभग 5 जिलों में सड़क निर्माण का काम किया जा रहा है।राजधानी दिल्ली स्थित ग्रेटर कैलाश पार्ट वन के टीसीआईएल भवन स्थित इस कंपनी के मुख्यालय में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार इस सरकारी उपक्रम द्वारा मध्य प्रदेश में 2005 के उपरांत करोड़ों रूपयों के सड़क निर्माण के कार्यों के ठेके प्राप्त किए हैं।टीसीआईएल के सूत्रों का कहना है कि अचानक अस्तित्व में आई इस कंपनी को प्री क्वालिफिकेशन सार्टिफिकेट (पीक्यू) कैसे हासिल हो गया। सूत्रों के अनुसार चूंकि यह सरकार एक उपक्रम है अत: इस बारे में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ज्यादा खुर्दबीनी नहीं की गई है।सूत्रों ने यह भी बताया कि उक्त कंपनी द्वारा अर्जित किए गए सड़क निर्माण के ठेकों को सबलेट कर पेटी कांटेक्टर्स को दे दिया गया है। बताया जाता है कि कंपनी को दिया गया सौ फीसदी काम ही सबलेट पर निर्मित हो रहा है। सूत्रों ने बताया कि नियमानुसार 25 फीसदी से अधिक का काम सबलेट नहीं किया जा सकता है।बताया जाता है कि उक्त सरकारी उपक्रम द्वारा पूर्व में सड़क निर्माण जैसा कोई काम नहीं किया गया है, फिर इसे किस आधार पर इतनी व्यापक मात्रा में सड़कों के ठेके आंख मूंदकर प्रदाय कर दिए गए हैं। चर्चाएं तो यहां तक है कि इस कंपनी की पीक्यू भी फर्जी हो सकती है।मध्य प्रदेश में चल रही बयार के अनुसार उक्त कंपनी द्वारा जिन पेटी कांटेक्टर्स के माध्यम से सड़क निर्माण का काम कराया जा रहा है, वह भी घटिया गुवणत्ता का है। कंपनी के पास योग्य कंसलटेंट, अनुभवी तकनीकि जानकारी वाले इंजीनियर्स आदि तंत्र के अभाव में कंपनी द्वारा पेटी कांटेक्टर्स के कार्य की गुणवत्ता का आंकलन नहीं किया जा पा रहा है।इतना ही नहीं मध्य प्रदेश सरकार का संबंधित अमला भी इस घटिया गुणवत्ता वाले काम को आंख मूंदकर संपादित होने दे रहा है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

जसवंत और आड़वाणी की जिन्ना भक्ति में फर्क

जसवंत और आड़वाणी की जिन्ना भक्ति में फर्क

(लिमटी खरे)

एक असे से अनुशासित काडर बेस्ड पार्टी होने का दंभ भरने वाली भाजपा की सांसे अनुशासन के मामले में ही उखड़ने लगी हैं। भाजपा ने कभी अपने हनुमान रहे जसवंत सिंह को रावण बनाकर पार्टी से बाहर का रास्ता अवश्य दिखाकर औरों को अनुशसित रहने का संदेश अवश्य दे दिया हो किन्तु पार्टी में अब एक अंतहीन बहस चल पड़ी है।वैसे जिन्ना का महिमा मण्डन सबसे अधिक संघ को नागवार गुजरता है। इसके साथ ही साथ शिवसेना ने भी उग्र तेवर अिख्तायार कर रखे हैं। इसके पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी ने भी जिन्ना की मजार पर जाकर उनकी तारीफों में कमोबेश इसी तरह के कशीदे गढ़े थे।आज यह समझना बड़ा ही मुश्किल लग रहा है कि पाकिस्तान के जिस कायदे आजम जिन्ना के बारे में लाल कृष्ण आड़वाणी के बयानों को पार्टी ने कुनैन की कड़वी गोली समझकर लील लिया था, आज वह अपने पुराने विश्वस्त जसवंत सिंह को उसी गिल्त के लिए बाहर का रास्ता कैसे दिखा रही है, वह भी जसवंत का पक्ष सुने बिना।वैसे यह बात भी समझ से परे ही है कि कुशाग्र बुद्धि के धनी राजनेता जसवंत सिंह को आखिर एसी कौन सी जरूरत आ पड़ी थी कि वे जिन्ना को इस वक्त महिमा मण्डित करना चाह रहे थे। जसवंत ने जिन्ना को हीरो बनाकर सरदार वल्लभ भाई पटेल को जिस तरह विलेन बनाने का प्रयास किया है, वह संघ सहित भाजपा को नागवार गुजरा है।आम चुनावों में भाजपा के शर्मनाक प्रदर्शन के उपरांत जसवंत सिंह के तेवर काफी तल्ख ही नजर आ रहे थे। उनके निशाने पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के चुनिंदा नेता थे। जसवंत सिंह ने सीधे तोर पर यह आरोप लगाकर सभी को चौंका दिया था कि भाजपा की हार के जिम्मेदार लोगों को पार्टी द्वारा अहम पद देकर उपकृत क्यों किया जा रहा है। जसवंत भी नहीं जानते होंगे कि अनजाने में ही सही वे पार्टी प्रमुख को एक एसा मुद्दा थमा देंगे जो उनके लिए पार्टी में रहना दुश्वार कर देगा।हमारी राय में भारतीय जनता पार्टी देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टी है। इस पार्टी में अनुशासन अवश्य तार तार होने लगा है, किन्तु भाजपा से अगर जसवंत सिंह को सुनवाई का मौका दिए बिना ही बाहर कर दिया जाता है तो यह प्रजातंत्र नहीं बल्कि ``हिटलरशाही`` की श्रेणी में आएगा।इस देश में सभी को अपने विचार व्यक्त करने का है। उसके विचारों से सहमत या असहमत होने का हक औरों को है। मगर जिन्ना का नाम आते ही भाजपा के प्याले में आने वाला इस तरह का तूफान समझ से परे ही है। वैसे भाजपा को चाहिए था कि जसवंत सिंह के विचारों पर पार्टी मंच में बहस कराई जाती, फिर जसवंत सिंह को सुना जाता और तब फैसला लिया जाता।इस तरह आनन फानन बाहर का रास्ता दिखा देने से भाजपा के खिलाफ यह संदेश भी जाएगा कि अगर भाजपा सत्ता में आई और देशवासियों ने पार्टी लाईन से इतर कुछ कदम उठाया तो उनके साथ भी कुछ अहित घट सकता है। भाजपा के अंदर अनुशासन का डंडा चलाना न चलाना पार्टी का अपना अंदरूनी मामला है, किन्तु हमारी समझ में पार्टी के अंदर कम से कम प्रजातंत्र तो होना ही चाहिए।अगर भाजपा ने सरदार पटेल के बारे में अनर्गल लिखने पर जसवंत सिंह का बखाZस्त किया है, तो भाजपा के शीर्ष नेताओं को अपनी गिरेबां में झांककर अवश्य ही देखना चाहिए कि आज कौन सा नेता सरदार पटेल के मार्ग का अनुसरण करता नजर आ रहा है। क्या आज भाजपा के शीर्ष नेता अपने निहित स्वाथोंZ को पार्टी लाईन से पहले प्राथमिकता में स्थान नहीं दे रहे हैंर्षोर्षो यहां राजेश खन्ना अभिनीत रोटी फिल्म के गाने का जिकर करना लाजिमी होगा - ``पहला पत्थर वो मारे जिसने पाप न किया हो, जो पापी न हो।`` क्या भाजपा का नेतृत्व इस बारे में सोचने की जहमत उठाएगार्षोर्षोवैसे भाजपा के नेतृत्व के इस रवैए के कारण भाजपा ने अपने कई धुरंधर साथियों को खोया है। पार्टी के थिंक टेंक माने जाने वाले गोविंदाचार्य ने सितंबर 2000 में पार्टी को अलविदा कह दिया था। भाजपा के शीर्ष नेताओं से वैचारिक तालमेल न बन पाने के कारण गोविंदाचार्य को अलग राह अपनानी पड़ी जो भाजपा को बहुत भारी पड़ा।उत्तर प्रदेश में भाजपा की रीढ़ माने जाने वाले कल्याण सिंह को भी नेतृत्व की खिलाफत के कारण 1999 में पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था, फिर लोकसभा चुनावों की गरज से जनवरी 2004 में कल्याण की घर वापसी अवश्य हुई पर चंद सालों के उपरांत जनवरी 2009 में उन्होंने पार्टी को आखिरी सलाम ठोंकर नई राह तलाशना आरंभ कर दिया।गोविंदाचार्य की करीबी रहीं भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री उमाश्री भारती की बदोलत दिसंबर 2003 में दस सालों के बाद मध्य प्रदेश की सत्ता हासिल हुई थी। पार्टी के नेताओं के रवैए के चलते नवंबर 2004 में उन्हें भी पार्टी ने बाय बाय कह दिया। उमाश्री ने पार्टी से निकलते ही अटल आड़वाणी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था।दिल्ली के धुरंधर नेता मदन लाल खुराना का जाना भाजपा के लिए दिल्ली प्रदेश में सफाए का कारण बना। अगस्त 2005 में पार्टी के नेताओं की मुगलई के चलते वे आक्रमक हुए और उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा। खुराना के जाने के बाद दिल्ली प्रदेश में पार्टी मानो टूट सी गई।अतिमहात्वाकांक्षी उमरदराज भाजपा नेता लाल कृष्ण आड़वाणी और पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की जिन्ना भक्ति में फर्क को ढूंढना होगा। दोनों ही नेताओं ने कमोबेश एक सा कदम उठाया है, फिर जसवंत को इतना बड़ा दण्ड और आड़वाणी को माफी देकर भाजपा ने अपना दोहरा चरित्र उजागर कर ही दिया है।भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा युवाओं को आगे लाकर 21वीं सदी में युवाओं को बागडोर सौंपने की कवायद की जा रही है, और भाजपा को वयोवृद्ध नेता एल.के.आड़वाणी का विकल्प ही नहीं सूझ रहा है, तभी तो भाजपा ने दुबारा आड़वाणी को विपक्ष का नेता पद थमा दिया।भाजपा में मची गलाकाट स्पर्धा के चलते अब शक ही है कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी ``सशक्त भाजपा, सशक्त भारत`` का गगनभेदी नारा लगा सके। विचारधारा में धड़ों में बंटी दिखाई देने वाली भाजपा के लिए आने वाला समय काफी हद तक कष्टकारी माना जा सकता है।

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0 बरेला पावर प्लांट

सामाजिक जिम्मेदारी के लिए महज .034 प्रतिशत

0 कम से कम दो फीसदी प्रतिवर्ष का प्रावधान करना था कंपनी को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश मे जबलपुर के समीप डलने वाले झाबुआ पावर लिमिटेड के लगभग तीन हजार करोड़ रूपयों की लागत वाले पावर प्लांट द्वारा घंसौर क्षेत्र में सामाजिक जिम्मेदारी के लिए चार सालों में महज एक करोड़ रूपयों का प्रवधान किया गया है।उर्जा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि निजी क्षेत्रों द्वारा संचालिए किए जाने वाले पावर प्लांटस को अपनी कुल लागत का कम से कम दो फीसदी प्रतिवर्ष उत्पादन आरंभ होने तक व्यय करना होता है। यह प्रतिशत उत्पादन आरंभ होने के साथ ही बढ़कर तीन से पांच फीसदी तक पहुंच जाता है।गौरतलब होगा कि जबलपुर संभाग के सिवनी जिले की घंसौर तहसील में मशहूर थापर ग्रुप की कंपनी झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा 600 मेगावाट का एक पावर प्लांट डाला जा रहा है, जिसकी लागत 2900 करोड़ आंकी गई है। कंपनी ने पावर प्लांट के लिए घंसौर के ग्राम बरेला में लगभग 600 एकड़ जमीन को 45 करोड़ रूपए की लागत से क्रय कर लिया है।कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि जिन कास्तकारों की जमीन ली गई है, उस क्षेत्र जनसंख्या लगभग 76 हजार 797 है, एवं सभी ग्रामीणों का प्रमुख व्यवसाय कृषि ही है। इस पावर प्लांट के डलने से इसकी लगभग एक हजार फिट उंची चिमनी से उड़ने वाली राख (फ्लाई एश) से आसपास के खेतों में प्रभाव अवश्य ही पड़ेगा।वैसे भी मध्य प्रदेश पर्यावरण निवारण मण्डल के प्रतिवेदन में स्पष्ट कहा गया है कि कोयला जलित बायलर ही वायू प्रदूषण का मुख्य कारक होगा। सूत्रों की माने तो इस संयंत्र से उतपन्न होने वाला ध्वनि प्रदूषण इतना भयावह होगा कि पर्यावरण निवारण मण्डल द्वारा कर्मचारियों को इयर प्लग और इयर मफलर का उपयोग करने की सलाह भी दी गई है।उर्जा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अगर यह संयंत्र 2900 करोड़ की लागत का डाला जा रहा है तो इसमें सोशल एक्टीविटीज के लिए दो फीसदी के हिसाब से राशि का प्रावधान किया जाना था। सूत्रों ने यह भी बताया कि कंपनी द्वारा स्थनीय लोगों की एक कमेटी बनाकर स्थानीय जरूरत के हिसाब से इसे खर्च किया जाता है।सूत्रों की माने तो यह राशि प्रोजेक्ट स्टेज तक के लिए ही है। प्रोडक्शन आरंभ होने पर इसे बढ़ाकर तीन से पांच फीसदी किया जाता है, ताकि पर्यावरण एवं अन्य घटकों के प्रभावों को स्थानीय स्तर पर कम किया जा सके। माना जा रहा है कि शनिवार 22 अगस्त को घंसौर में अतिरिक्त कलेक्टर, सिवनी श्रीमति अलका श्रीवास्तव की उपस्थिति में होने वाली जनसुनवाई में इन तथ्यों पर विचार अवश्य किया जाएगा।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

20 अगस्त 2009

हांफती सुरक्षा व्यवस्था का नतीजा था शाहरूख कांड

(लिमटी खरे)

अमेरिका में एयर पोर्ट पर जांच के नाम पर वालीवुड के किंग खान को रोकने का मामला भारतीय मीडिया ने जबर्दस्त तरीके से उछाला है। आखिर एसा हुआ क्या है, जिसके पीछे इतनी हायतौबा मचाई जा रही है। अमेरिकी अधिकारी वहां के कानून का पालन ही तो सुनिश्चित कर रहे थे।पूर्व महामहिम राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम हों या तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिस सभी के साथ अमेरिकी अधिकारियों ने एक सा सलूक किया। दरअसल अमेरिकी कानून किसी को भी इससे छूट प्रदान नहीं करता है, साथ ही साथ सितम्बर 2001 की घटना के बाद वहां सुरक्षा प्रक्रिया और भी चाक चौबंद हो गई है। इससे पहले हुई घटनाएं बहुत कम ही प्रकाश में आ पाईं हैं, क्योंकि जिनके साथ यह घटा उन्होंने समझ लिया था कि यह अमेरिका की सुरक्षा प्रणाली का एक हिस्सा है।इससे उलट भारत में एक के बाद एक आतंकी हमलों ने भी देश की सरकार की तंद्रा नहीं तोड़ी है। हमारे देश की हांफती सुरक्षा व्यवस्था के बीच चाहे जो बेरोकटोक आवागमन करने को स्वतंत्र है। रही बात नियम कायदों के पालन को सुनिश्चित करने की तो देशप्रेम का जज्बा अब कम ही देखने को मिलता है। चंद सिक्कों की खनक के आगे हमारे देश में कानून तार तार होता भी दिख जाता है।दरअसल होना यह चाहिए कि हिन्दुस्तान में भी आने वाले विदेशियों की जांच उसी कड़ाई के साथ की जानी चाहिए जिस सख्ती के साथ यूरोप के देशों में होती है। सब बातों से उपर हमें हमारी आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर ठोस कार्ययोजना बनाना चाहिए एवं इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए ईमानदार अफसरों को पाबंद करना अत्यावश्यक है।पता नहीं क्यों भारत सरकार सदा से ही दुनिया के चौधरी अमेरिका के सामने अपने आप को हीन भावना से ग्रसित पाती है। अमेरिका का कोई डेलीगेट अगर भारत यात्रा पर होता है, तो उसके लिए सारे नियम कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं। हमें अभी भी याद है कि जब बिल िक्लंटन भारत यात्रा पर आए थे, तब उनके सुरक्षा काफिले में तैनात कुत्तों को पांच सितारा ली मेरीडियन होटल में रूकवाया गया था।इतना ही नहीं सत्ता के शीर्ष केंद्र माने जाने वाले साउथ और नार्थ ब्लाक में भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी के अफसरान बेरोकटोक इस तरह घूमा करते थे, जैसे बाग में सैर कर रहे हों। मजे की बात तो यह है कि जब अंकल सैम (बिल िक्लंटन) ने राजघाट पर जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नमन करना चाहा तब समूचा राजघाट खाली करवाकर अमेरिकी एजेंसी के हवाले कर दिया गया था, जहां उनके खोजी कुत्ते झींगा मस्ती करते नजर आए थे।शाहरूख खान शायद भूल गए कि वे हिन्दुस्तान के रूपहले पर्दे के अदाकार हैं। हिन्दुस्तान की जनता उनकी अदाकारी के चलते उन्हें सर माथे पर बिठाती है, पर दुनिया के चौधरी अमेरिका को इससे क्या लेना देना। वहां का सिस्टम तो वही करेगा जिसके लिए उसे पाबंद किया गया है।एशिया और अरब देश के मुस्लिमों के साथ अमेरिका में इस तरह का सलूक आम बात है। क्या इससे पहले छपने वाली खबरोंं की बिनहा पर शाहरूख खान ने कभी आवाज बुलंद करने की कोशिश की। यहां बुंदेलखण्ड की एक कहावत का जिक्र लाजिमी होगा - ``जोन की नईयां फटी बिमाई, उ का जाने पीर पराई।`` अर्थात जिसके पैर फटे न हों वह दूसरे की पीड़ा क्या खाक समझेगा।आज शाहरूख के खुद के साथ एसा हुआ है, तब उन्हें लगा कि यह सब उनके नाम के साथ ``खान`` सरनेम जुड़े होने के चलते हुए। हो सकता है शाहरूख की नाराजगी का कारण और भी कुछ हो। एक एक सेकंड और मिनिट को रूपयों मेंं तोलने वाले शाहरूख खान को अगर घंटो बिना काम के ही बिठा लिया जाए तो उनकी त्योरियां चढ़ना स्वाभाविक ही है।हमारा मानना है कि भारत में रसूखदार लोगों को आम आदमी के लिए बने नियम कायदों का पालन करने की आदत नहीं होती है, यही कारण है कि वे विदेशों में भी इस सुविधा का उपभोग करना चाहते हैं, जो कि असंभव ही है। यहां ब्रिटेन का एक प्रसंग लाजिमी प्रतीत हो रहा है। ब्रितानी प्रधानमंत्री टानी ब्लेयर के पुत्र को निर्धारित से कम उम्र में शराब पीने के आरोप में पकड़ा गया। वहां के कानून के अनुसार अगर कोई कम उम्र का बच्चा शराब का सेवन करता है तो उसके माता पिता को थाने आकर दरोगा की चेतावनी सुननी होती है। टानी ब्लेयर ने उस कानून का पालन किया और थाने जाकर दरोगा की फटकार सुनी। हमारे यहां आप किसी सांसद विधयक तो क्या पार्षद के बच्चे को बंद करके तो देखें!वैसे इस मामले को तूल देकर मुद्दा बनाने के बजाए अगर इससे सबक लेकर हम अपने देश की सुरक्षा व्यवस्था को फूलप्रूफ बनाने में जुट जाएं तो आने वाले दिनों में हम भी कम से कम सुरक्षा के मामले में अमेरिका की तरह ही नििष्फकर नजर आएंगे, हालात देखकर इसकी संभावनाएं नगण्य ही प्रतीत होती हैं।


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सुषमा मनाएंगी वसुंधरा को

0 राजनाथ के लिए तारणहार बनकर उभरीं सुषमा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की विदिशा संसदीय सीट से परचम फहराने वाली भाजपा की मुखर नेत्री सुषमा स्वराज एक बार फिर ताकतवर होकर उभर रहीं हैं। पार्टी अपने महत्वपूर्ण निर्णयों में सुषमा स्वराज की न केवल राय को ही वजन दे रही है, बल्कि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया से नेता प्रतिपक्ष के पद से त्यागपत्र के लिए उन्हें ही अधिकृत किया गया है।भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपा में जारी अंदरूनी मारकाट के चलते वसुंधरा राजे से त्यागपत्र लेना अब शीर्ष नेतृत्व की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने वसुंधरा राजे को त्यागपत्र देने के लिए मनाने के लिए सुषमा स्वराज को अधिकृत कर दिया है।सूत्रों ने यह भी कहा कि अब वसुंधरा राजे से पार्टी की ओर से इस मामले में सुषमा स्वराज के अलावा और कोई भी नेता बात नहीं करेगा। वैसे वसुंधरा राजे के पक्ष में विधायकों की लंबी फौज को देखकर पार्टी के कुछ नेता उनसे सहानभूति भी रखने लगे हैं। वहीं दूसरी ओर पार्टी द्वारा एक बार उनके त्यागपत्र का फैसला लेने के बाद अब समझौते की बात करके नेतृत्व अपनी किरकिरी भी नहीं करवाना चाहेगा।बताया जाता है कि पार्टी की ओर से वसुंधरा राजे को त्यागपत्र के एवज में पार्टी महासचिव का पद भी आफर कर दिया गया है। भाजपा की एक आधार स्तंभ रहीं विजयाराजे सिंधिया की पुत्री वसुंधरा राजे का रसूख राजस्थान में खासा देखने को भी मिल रहा है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि कहीं दूसरे नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के समय विधायकों के माध्यम से वसुंधरा राजे अपनी कोई और मांग मनवाने पर न अड़ जाएं।सूत्रों का दावा है कि सुषमा स्वराज द्वारा बड़ी ही आसानी से वसुंधरा राजे को त्यागपत्र देने और नए नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के लिए तैयार करवा लिया जाएगा। यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें यह महती जवाबदारी सौंपी है।


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. . . तो जबलपुर की सड़कों का निकल जाएगा कचूमर

- हवाई किले बना रही है झाबुआ पावर लिमिटेड

- कोल परिवहन हेतु ठोस व्यवस्था नहीं

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। जबलपुर से लगभग सौ किलोमीटर दूर सिवनी जिले की घंसोर तहसील के ग्राम बरेला में स्थापित होने वाले पावर प्लांट में लाए जाने वाले कोयले का परिवहन अभी भी अस्पष्ट है। वैसे कंपनी इसे रेल मार्ग से परिवहन करना दर्शा रही है। इसके साथ ही साथ रेल मार्ग के विकल्प के तौर पर सड़क मार्ग से कोयले का परिवहन किया जाएगा तो जबलपुर एवं सिवनी की सड़कों का कचूमर निकल जाएगा।कोयला मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों की माने तो झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा घंसौर तहसील के बरेला में स्थापित किए जाने वाले इस संयंत्र के लिए कोयले की आपूर्ति (लगभग 32 लाख टन प्रतिवर्ष) अनूपपुर की साउथ ईस्टर्न कोलफील्डस की खदान से किया जाना दर्शाया गया है।इसमें सबसे रोचक तथ्य यह है कि कोयले का परिवहन रेल मार्ग द्वारा होना बताया गया है। गौरतलब होगा कि कोयला अनूपपुर से ब्राडगेज से लाकर जबलपुर से नेरोगेज से लाया जाएगा, जो संभव प्रतीत नहीं होता है। आने वाले समय में नैनपुर से जबलपुर के अमान परिवर्तन का काम आरंभ हो जाएगा, तब नेरो गेज की पटरियां उखाड़ दी जाएंगी। इन परिस्थितियों में संयंत्र के संचालकों द्वारा सड़क मार्ग को ही विकल्प के तौर पर उपयोग में लाया जाएगा।वैसे भी अगर कोयले को रेल मार्ग द्वारा ब्राड गेज के माध्यम से अनूपपुर से जबलपुर लाया जाता है, तो कंपनी को फिर जबलपुर नैनपुर मार्ग (नेरोगेज) में इसे लादने के लिए दुबारा लोडिंग अनलोडिंग की समस्या से दो चार होना पड़ेगा। बताया जाता है कि जबलपुर के यार्ड में ब्राडगेज के रेक तो खड़े हो सकते हैं किन्तु नेरोगेज के रेक खड़े करने के लिए वहां अलग से रेल लाईन भी बिछानी पड़ेगी। इस तरह कंपनी द्वारा दिए गए प्रस्ताव में अनेक पेंच नजर आ रहे हैं।यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि घंसोर एवं लखनादौन तहसील की सड़कें इतने भारी भरकम लोड को सहने के लिए तैयार नहीं हैं, और न ही ये इतने वजन के लिए केंद्रीय सड़क रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) के मापदण्डों के हिसाब से निर्मित हैं। इन परिस्थितियों में यही कहा जा सकता है कि अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट में झाबूआ पावर लिमिटेड द्वारा हवाई किले तैयार किए गए हैं।वर्तमान में सिवनी जिले की लखनादौन और घंसौर तहसीलों की सड़कें पहले से ही खस्ताहाल में हैं, फिर अगर इन सड़कों पर से भारी मात्रा में कोयले का परिवहन किया जाएगा तो आने वाले समय में इन सड़कों के चिथड़े उड़ने में समय नहीं लगेगा। बरेला में डलने वाले इस प्लांट में ट्रकों के माध्यम से कोयला या तो लखनादौन अथवा धूमा के रास्ते ही लाया जाएगा। आबादी वाले क्षेत्रों में ट्रकों की धमाचौकड़ी से दुघZटनाओं की संख्या में इजाफा होने से इंंकार नहीं किया जा सकता है।

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आखिर क्या संदेश देना चाहती है दिल्ली सरकार

0 राजीव गांधी के 65 वें जन्मदिवस पर जारी किया दिल्ली सरकार ने अजीबोगरीब विज्ञापन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। इक्कीसवीं सदी के भारत की परिकल्पना कर आधारशिला रखने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के 65वें जन्मदिवस पर दिल्ली की सत्ता पर तीसरी बार काबिज हुई शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा आज जारी किया गया विज्ञापन लोगो के बीच चर्चा का केंद्र बना रहा।दिल्ली सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी डीआईपी/793/09-10 क्रमांक से जारी आधे पृष्ठ के रंगीन विज्ञापन में यूपीए अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मन मोहन सिंह के साथ ही साथ दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित के रंगीन छाया चित्र लगे हुए हैं।प्रिंट मीडिया में छपे इस विज्ञापन में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की फोटो के साथ कुछ परिन्दों को आकाश में उड़ते हुए दिखाया गया है, एवं साथ ही सफेद अक्षरों से बस ``राजीव`` ही लिखा हुआ है। इस विज्ञापन में राजीव गांधी के चित्र के आसपास 62 परिंदे उड़ते दिखाए गए हैं।जनचर्चा के अनुसार अखबारों को विज्ञापन जारी कर दिल्ली की कुर्सी पर लगातार तीसरी बार बैठने वाली श्रीमति शीला दीक्षित आखिर क्या संदेश देना चाह रही हैं। व्याप्त चर्चाओं के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व के भाटचारण के उद्देश्य से जारी किया गया यह विज्ञापन अगर कोई कोटेशन या संदेश युक्त होता तो जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई के खर्च का ओचित्य समझ में भी आता, किन्तु वस्तुत: एसा कुछ भी इस विज्ञापन में नजर नहीं आता है।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

19 augest 2009

आलेख 19 अगस्त 2009

इस तरह किया जा रहा है प्रियदर्शनी के सपनों को साकार

(लिमटी खरे)

लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में जब उनकी अग्रजा प्रियंका वढ़ेरा ने अपनी दादी स्वर्गीय श्रीमति इंदिरा गांधी की साड़ी पहनी तो सारे न्यूज चेनल्स और प्रिंट मीडिया की सुर्खियां बन गईं थीं प्रियंक। मीडिया ने तो प्रियंका में उनकी दादी की छवि तक देख ली थी।श्रीमति इंदिरा गांधी के निधन के उपरांत इस सीट पर उनके वंश का ही कब्जा रहा है। आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि जिस दूरदृष्टा कुशल प्रशासक श्रीमति इंदिरा गांधी के नाम पर कांग्रेस और श्रीमति सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी अपनी राजनैतिक बिसात चला रहे हैं, उनके सपने को ही वे भूल गए हैं।हाल ही में जगदीशपुर के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पर सरेआम आरोप लगाया है कि राज्य सरकार उनके संसदीय क्षेत्र में तीन हजार करोड़ रूपए की पेपर मिल परियोजना को लगने नहीं दे रही है। राहुल का आरोप है कि हिन्दुस्तान पेपर मिल की पूरी योजना तैयार है किन्तु सरकार जमीन मुहैया नहीं करा रही है।राहुल गांधी सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के महासचिव हैं, वे जो भी बात कहेंगे निश्चित रूप से वजनदारी एवं प्रमाण होने पर ही कहेंगे। अमेठी और रायबरेली दोनों ही संसदीय क्षेत्रों में विकास कार्यों में रोड़े अटकाने की बात राहुल गांधी द्वारा कही जाती रहीं हैं, जाहिर है राहुल के पास इसके प्रमाण अवश्य मौजूद होंगे।जब सवाल राहुल गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी की इच्छा का आता है, तो निश्चित तौर पर इस मामले मेंं राहुल गांधी द्वारा सुश्री मायावती को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकेगा। स्व.श्रीमति गांधी की इच्छा थी कि अमेठी में एक आयुर्विज्ञान महाविद्यालय (मेडीकल कालेज) की स्थापना की जाए।आज लगभग ढाई दशकों बाद भी उनके वारिसान सक्षम होने के बावजूद भी श्रीमति इंदिरा गांधी की इच्छा को पूरा करने में अपने आप को अक्षम पा रहे हैं। इस मामले का रोचक पहलू यह है कि सालों पूर्व बतौर मुख्यमंत्री सुश्री मायावती द्वारा इस मेडीकल कालेज के लिए अनापत्ति भी जारी की जा चुकी है।राज्य सरकार की अनापत्ति के उपरांत मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया की टीम द्वारा भवन स्थल आदि का निरीक्षण परीक्षण भी किया जा चुका है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार दूसरी मर्तबा सत्ता पर काबिज हुई है, मगर स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी की इच्छा आज भी अधूरी ही है।1980 में अमेठी से सांसद रहे स्व.संजय गांधी की याद को चिरस्थायी बनाए रखने की गरज से संजय गांधी मेमोरियल ट्रस्ट ने अमेठी में मेडीकल कालेज खोलने का निर्णय लिया था। 1981 में संजय गांधी अस्पताल के शिलान्यास के समय स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी ने कहा था कि इस अस्पताल में सिर्फ रोगियों का इलाज ही नहीं होगा। यहां मेडीकल कालेज खोला जाएगा जहां से चिकित्सक बनने वाले युवा देश में रोगियों का उपचार करेंगे।प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के हाथों लगाया गया यह पौधा 1989 में अस्पताल के रूप में आरंभ हो गया। उस दोरान प्रस्तावित मेडीकल कालेज भी कांग्रेस की श्रीमति सोनिया गांधी और भाजपा की श्रीमति मेनका गांधी की परस्पर विरोधी दलों की धुरी की सियासत की भेंट चढ़ गया। बाद में इसका नाम बदलकर स्व. राजीव गांधी के नाम पर कर दिया गया।मजे की बात तो यह है कि राजीव गांधी मेडीकल कालेज के नाम पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अनापत्ति जारी कर दी गई है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि गांधी परिवार की बपौती बना रहा अमेठी संसदीय क्षेत्र जिसका प्रतिनिधित्व पूर्व प्रधानमंत्री स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी, स्व.संजय गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी, ने किया हो और कांग्र्रेस के महासचिव एवं कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी कर रहे हों, वह स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के एक सपने को हकीकत में बदलने में पच्चीस साल लगा दे, और फिर भी कामयाम न हो पाएं, तब बाकी देश की उन्नति एवं देश के आखिरी आदमी तक विकास की किरण पहुचाने के कांग्रेस के सपने को दिवा स्वप्न से कम क्या समझा जाए

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सुषमा के पक्ष में बहने लगी बयार

0 सुषमा बन सकतीं हैं भाजपाध्यक्ष!

0 अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज पर हो सकता है भाजपा में संविधान संशोधन

0 संघ का वरद हस्त भी सुषमा के साथ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो भारतीय जनता पार्टी को पहली महिला अध्यक्ष के रूप में सुषमा स्वराज मिल सकती हैं। संघ में भी सुषमा को लेकर सकारात्मक बयार बहने लगी है। पार्टी अपने संविधान में संशोधन कर अध्यक्ष का कार्यकाल तीन से घटाकर दो साल और कोई भी नेता अपने जीवनकाल में महज दो बार ही अध्यक्ष रहने की बात ला सकती है।पिछले कुछ सालों में यह बात साफ तौर पर उभरकर सामने आ चुकी है कि देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलावा अगर कोई दूसरा शक्तिशाली राष्ट्रीय दल है, तो वह है, भारतीय जनता पार्टीं। अटल बिहारी बाजपेयी के सक्रिय राजनीति से किनारा करने के उपरांत भाजपा का तेजी से गिरता ग्राफ संघ की पेशानी पर पसीने की बूंदे ला रहा है।संघ के सूत्रों का कहना है कि भाजपा में प्राणवायू फंूकने के लिए संघ ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है। आने वाले दिनों में भाजपा नए क्लेवर में दिखे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सूत्रों ने यह भी बताया कि सुषमा स्वराज को संघ के आला नेताओं ने बुलाकर इस विषय मेंं समझाईश भी दे दी है।सूत्रों का कहना है कि संघ नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में विदिशा से सांसद चुनी गई सुषमा स्वराज को बुलाकर साफ कह दिया है कि वे अपना मन बना लें और पार्टी का नेतृत्व संभालने की तैयारी कर लें, ताकि भाजपा में अमूलचूल परिवर्तन लाया जा सके। वैसे भी सुषमा स्वराज की छवि आम भारतीय नारी की ही मानी जाती है।कुशल वक्ता के तौर पर अपनी छवि बनाने वाली श्रीमति स्वराज के अंदर कुशल प्रशासक के गुण भी हैं। संगठनात्मक क्षमता उनमें कूट कूट कर भरी है, इस बात में कोई संदेह नहीं है। वैसे भी संघ और भाजपा के अंदर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की काट के तौर पर कोई तेज तर्रार नेत्री को खोजा जा रहा था।फायर ब्रांड नेत्री उमश्री भारती के शार्ट टेंपर होने के कारण वे सोनिया गांधी की बराबरी का कद नहीं पा सकीं किन्तु धीर गंभीर और सोच समझकर चलने वाली श्रीमति सुषमा स्वराज को भाजपा में आसानी से स्वीकार्यता मिल जाएगी, और वे श्रीमति सोनिया गांधी के सामने खड़े होने का माद्दा भी रखतीं हैं। पूर्व में वेल्लारी में वे लोकसभा में श्रीमति सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुकीं हैं।उधर भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों का कहना है कि पार्टी अपने संविधान में भी कुछ बदलाव कर सकती है। इसमें अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल से घटाकर दो साल करने पर विचार चल रहा है। इसके साथ ही साथ अमेरिका के राष्ट्रपति की तर्ज पर भाजपाध्यक्ष के लिए भी कुछ पाबंदिया लगाने पर विचार किया जा रहा है।सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में कोई भी नेता अपने जीवनकाल में महज दो बार ही पार्टी अध्यक्ष बन सकता है। इसके साथ ही साथ लगातार दो बार भी कोई अध्यक्ष नहीं बना रह सकेगा इस तरह की व्यवस्था भी की जा रही है। सूत्रों ने बताया कि अभी ये सारे तथ्य वैचारिक स्थिति में ही हैं। पार्टी के अंदर इन विषयों पर चर्चा के उपरांत ही इन्हें लागू कराने की दिशा में पहल की जाएगी।

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. . . तो बरगी बांध का जलभराव क्षेत्र हो जाएगा कम

0 रोजाना 3416 टन फ्लाई एश जाएगी जल भराव क्षेत्र में

0 बढ़ जाएगा प्रदूषित पानी और वायू प्रदूषण का खतरा

0 फोरलेन में अडंगा लगाने वाला एनजीओ क्या आगे आएगा पर्यावरण बचाने!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले की घंसौर तहसील में थापर ग्रुप की कंपनी झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा स्थापित किए जाने वाले 600 मेगावाट के पावर प्रोजेक्ट से सिवनी जिले के पर्यावरण को भारी मात्रा में खतरा हो सकता है। इस संयंत्र से निकलने वाली फ्लाई एश की तादाद प्रतिदिन इतनी अधिक होगी कि बरगी बांध के जल भराव क्षेत्र में खासी कमी आने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।मध्य प्रदेश प्रदूषण निवारण मण्डल की आधिकारिक वेव साईट पर इस परियोजना की जनसुनवाई के बारे में प्रकाशित प्रतिवेदन में कहा गया है कि इस संयंत्र के लिए पानी की आपूर्ति 10 किलोमीटर दूर गढ़ाघाट और पायली से रानी अवंतिबाई सागर परियोजना के जल भराव वाले क्षेत्र से की जाएगी। वहीं इसकी कंडिका 5.3 में इसकी दूरी 100 किलोमीटर दर्शाई गई है।इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके इर्द गिर्द कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं है। बताया जाता है कि पायली डेम के पास वाले मंदिर को पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया है। इस प्रतिवेदन में साफ किया गया है कि हवा का बहाव उत्तर एवं उत्तर पूर्व की ओर होगा।गोरतलब होगा कि प्रस्तावित संयंत्र से उत्तर और उत्तर पूर्व की दिशा में बरगी बांध का सिवनी जिले वाला जल भराव क्षेत्र है। इसमें साफ किया गया है कि प्रतिदिन उत्तसर्जित होने वाली जमीनी राख की मात्रा 853 टन एवं उड़ने वाली राख (फ्लाई एश) की तादाद 3416 टन प्रतिदिन होगी।यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय होगा कि फ्लाई एश थोडी बहुत नहीं वरन 275 मीटर अर्थात लगभग एक हजार फिट उंची चिमनी से उड़ेगी। इस उंचाई से उड़ने वाली राख आसपास के वन, खेती युक्त जमीन और जलाशयों के साथ ही साथ बरगी बांध के भराव वाले क्षेत्र में साल दर साल क्या तबाही मचाएगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल ही है।इस तरह साढ़े तीन हजार टन राख रोजाना उड़कर बरगी बांध के सिवनी जिले की सीमा में आने वाले जल भराव के क्षेत्र में जाएगी जिससे बरगी बांध का पानी न केवल प्रदूषित होगा बल्कि राख तेजी से नीचे बैठकर गाद (सिल्ट) की मोटी परत जमा देगी जिससे जल भराव की तादाद काफी हद तक कम हो जाएगी। एक माह में बरगी बांध में एक लाख पांच हजार 896 टन तथा साल भर में यह मात्रा बढ़कर 12 लाख 46 हजार 840 टन हो जाएगी।इस प्रतिवेदन में कहा गया है कि कुछ समय के लिए जल प्रदूषण नहीं के बराबर होगा किन्तु बाद में जल प्रदूषण के बारे में साधा गया मौन संदिग्ध ही प्रतीत होता है। इसके अलावा 853 टन प्रतिदिन निकलने वाली जमीनी राख जो एक माह में ही 26 हजार 443 टन अथवा साल भर में 3 लाख 11 हजार टन राख को कंपनी कहां रखेगी या इसका परिवहन सड़क मार्ग से करेगी या नहीं इस बारे में भी कंपनी का मौन अनेक संदेहों को जन्म देता है।पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना स्विर्णम चतुभुZज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले के कुछ किलोमीटर के मार्ग में वन्य प्राणियों और पर्यावरण के नाम पर फच्चर फंसाने वाला गैर सरकारी संगठन वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया क्या पर्यावरण के असंतुलन को साधने भी आगे आएगा यह यक्ष प्रश्न आज भी बरकरार है।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

अब घंसौर को झुलसाने की तैयारी

2900 करोड़ का पावर प्रोजेक्ट डल रहा है बरेला में

दस हजार टन कोयला रोज जलाया जाएगा

22 अगस्त की जनसुनवाई रोकने की मांग

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले की आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर को झुलसाने की तैयारी की जा रही है। मशहूर थापर ग्रुप के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा घंसोर के बरेला ग्राम में 600 मेगावाट के पावर प्रोजेक्ट की तैयारी की जा रही है। गुपचुप तरीके से इसकी जनसुनवाई भी 22 अगस्त को आहूत की गई है।उर्जा मंत्रालय के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि झाबुआ पावर लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा मध्य प्रदेश सरकार के साथ मिलकर आदिवासी बाहुल्य घंसौर के बरेला ग्राम में यह प्रोजेक्ट डाला जा रहा है। उधर कोल मंत्रालय के सूत्रोें ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए उपयोग में आने वाले कोयले के लिए कोल लिंकेज अभी प्रदान नहीं किया गया है।मध्य प्रदेश पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की वेव साईट पर इस परियोजना की जन सुनवाई के तथ्य मौजूद हैं। इसके लिए 3.20 एमटीपीए ईंधन की आवश्यक्ता दर्शाई गई है। पानी की आवश्यक्ता की पूर्ति रानी अवंतिबाई सागर परियोजना (बरगी बांध) के सिवनी जिले के गडाघाट और पायली के करीब वाले डूब क्षेत्र से पूरी की जाएगी।परियोजना में दर्शाया गया है कि इसका बायलर पूरी तरह कोयले पर ही आधारित होगा। इसके साथ ही साथ 220 एकड़ सरकरी, 360 एकड़ गैर कृषि एवं मात्र 20 एकड़ कृषि भूमि का क्रय किया गया है। इसके लिए आवश्यक कोयले को साउथ ईसटर्न कोल लिमिटेड के अनूपुर शहडोल स्थित खदान से कोयला आयात किया जाएगा। मजे की बात तो यह है कि यह परियोजना प्रतिघंटा 3262 मीट्रिक टन पानी पी जाएगी।इस परियोजना में क्षेत्र के लोगों की बड़ी मात्रा में जमीने खरीदे जाने की खबर है। बताया जाता है कि कमजोर वर्ग के लोगों को इसका मुआवजा लगभग 70 हजार रूपए प्रतिएकड़ तो प्रभावशाली और राजनैतिक पहुंच संपन्न लोगों की जमीनों को प्रतिएकड़ दो से ढाई लाख रूपए का मुआवजा दिया गया है।इस परियोजना के मुख्य महाप्रबंधक आर.पी. चितले ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान कहा कि नियमानुसार कंपनी जिन परिवारों की जमीन का अधिगृहण कर रही है, उन परिवारों के एक सदस्य को नौकरी पर अवश्य रखेगी। शेष बचे स्थानों के बारे में उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। चितले यह स्पष्ट नहीं कर सके कि स्किल्ड लेबर या अनिस्किल्ड लेबर के तौर पर ग्रामीणों को नौकरी या प्राथमिकता दी जाएगी।साथ ही जमीन क्रय करने की बात पर उन्होने सफाई देते हुए कहा कि आदिवासियों की जमीन कंपनी सीधे सीधे नहीं खरीद सकती है, अत: सरकार ने पहले इस जमीन को खरीदा है फिर कंपनी ने सरकार से यह जमीन ली है। सीजीएम चितले यह स्पष्ट नहीं कर सके कि कुल खरीदी गई जमीन में कितनी जमीन आदिवासियों से खरीदी गई है।व्याप्त चर्चाओं के अनुसार महज कुछ ही आदिवासियों की जमीन को कंपनी ने लिया है, शेष जमीन सामान्य वर्ग के लोगों की ही खरीदी गईं हैं, वह भी कहीं ओने पोने दाम पर तो कहीं अनमोल कीमतें देेकर।सूत्रों का यह भी कहना है कि जनसुनवाई का बजट भी आठ अंको की राशि में रखा गया है, किन्तु सिवनी जिले में शनिवार 22 अगस्त को होने वाली जनसुनवाई के बारे में लोगों को जानकारी का न होना अनेक संदेहों को जन्म दे रहा है। बताया जाता है कि इस बारे में न तो आसपास के गांवों में पर्यावरण एवं अन्य प्रभावों की जानकारी ही दी गई है और न ही मुनादी पीटी गई है कि जनसुनवाई 22 अगस्त को है। मांग की जा रही है कि 22 अगस्त को होने वाली जनसुनवाई को तत्काल निरस्त कर पहले क्षेत्रवासियों को इसके फायदे के साथ ही साथ दुष्प्रभावों की जानकारी दी जाए और फिर दावे आपत्ति पर जनसुनवाई आहूत की जाए।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

आलेख 17 अगस्त 2009

क्या महज ``औपचारिक`` रह गई है गांधी टोपी!

(लिमटी खरे)


कहने को तो कांग्रेस द्वारा गांधी नेहरू परिवारों का गुणगान किया जाता है, किन्तु इसमें राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी का शुमार है या नहीं यह कहा नहीं जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की सत्ता की धुरी घूमती महसूस होती है।
वैसे तो महात्मा गांधी और उनकी अपनाई गई खादी को भी अपनी विरासत मानती आई है कांग्रेस। पर अब लगता है कि वह इन दोनों ही चीजों से दूर होती चली जा रही है। अधिवेशन, चुनाव, मेले ठेलों में तो कांग्रेसी खादी के वस्त्रों का उपयोग जमकर करते हैं, किन्तु उनके सर से गांधी टोपी नदारत ही रहा करती है।
कांग्रेस सेवादल के ड्रेस कोड में शामिल है गांधी टोपी। जब भी किसी बड़े नेता या मंत्री को कांग्रेस सेवादल की सलामी लेनी होती है तो उनके लिए चंद लम्हों के लिए ही सही गांधी टोपी की व्यवस्था की जाती है। सलमी लेने के तुरंत बाद नेता टोपी उतारकर अपने अंगरक्षक की ओर बढ़ा देते हैं, और अपने बाल काढ़ते नजर आते हैं, ताकि फोटोग्राफर अगर उनका फोटो लें तो उनका चेहरा बिगड़े बालों के चलते भद्दा न लगे।
इतिहास गवाह है कि गांधी टोपी कांग्रेस विचारधारा से जुड़े लोगों के पहनावे का हिस्सा रही है। अस्सी के दशक के आरंभ तक नेताओं के सिर की शान हुआ करती थी गांधी टोपी। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हों या मोरारजी देसाई, किसी ने शायद ही इनकी कोई तस्वीर बिना गांधी टोपी के देखी हो।
लगता है कि वक्त बदलने के साथ ही साथ इस विचारधारा के लोगों के पहनावे में भी अंतर आ चुका है। अस्सी के दशक के उपरांत गांधी टोपी धारण किए गए नेताओं के चित्र दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं। करीने से काढे गए बालों और पोज देते नेता मंत्री अवश्य ही दिख जाया करते हैं।
आधुनिकता के इस युग में महात्मा गांधी के नाम से पहचानी जाने वाली गांधी टोपी अब नेताओं के सर का ताज नहीं बन पा रही है। इसका स्थान ले लिया है कांग्रेस के ध्वज के समान ही तिरंगे दुपट्टे (गमछे) ने। जब नेता ही गांधी टोपी का परित्याग कर चुके हों तो उनका अनुसरण करने वाले कार्यकर्ता भला कहां पीछे रहने वाले हैं।
एसा नहीं कि गांधी टोपी आजाद भारत के लोगों के सिरों का ताज न हो। आज भी महाराष्ट्र में अनेक गांव एसे हैं, जहां बिना इस टोपी के कोई भी सिर दिखाई दे जाए। इसके साथ ही साथ कर्नाटक और तमिलनाडू के लोगों ने भी गांधी टोपी को अंगीकार कर रखा है।
अस्सी के दशक के आरंभ तक अनेक प्रदेशों में चतुर्थ श्रेणी के सरकारी नुमाईंदों के ड्रेस कोड में शामिल थी गांधी टोपी पहनकर सरकारी कर्मचारी अपने आप को गोरवांिन्वत महसूस भी किया करते थे। कालांतर में गांधी टोपी ``आउट ऑफ फैशन`` हो गई। यहां तक कि जिस शिख्सयत को पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से बुलाता है, उसी के नाम की टोपी को कम से कम सरकारी कर्मचारियों के सर की शान बनाने में भी देश और प्रदेशों की सरकरों को जिल्लत महसूस होती है। यही कारण है कि इस टोपी को पहनने के लिए सरकारें अपने मातहतों को पाबंद भी नहीं कर पाईं हैं।
यह सच है कि नेताओं की भाव भंगिमओं, उनके आचार विचार, पहनावे को उनके कार्यकर्ता अपनाते हैं। जब नेताओं के सर का ताज ही यह टोपी नहीं बन पाई हो तो औरों की कौन कहे। यहां तक कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की विर्कंग कमेटी में उपसिथत होने वाले नेताओं के सर से भी यह टोपी उस वक्त भी नदारत ही मिलती है।
मर्द के सर पर टोपी और औरत के सर पर पल्लू, अच्छे संस्करों की निशानी मानी जाती है। फिर आधी सदी से अधिक देश पर राज करने वाली लगभग सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के नेताओं को इसे पहनने से गुरेज कैसा। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू रहे हों या महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, किसी ने कभी भी इनकी बिना टोपी वाले छायाचित्र नहीं देखे होंगे। आधुनिकता और पश्चिमी फैशन की चकाचौंध में हम अपने मूल संस्कार ही खोते जा रहे हैं, जो निश्चित तौर पर चिंताजनक कहा जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक सूबे में तो वन्दे मातरम को सरकारी कार्यालयों में अनिवार्य कर दिया है। यह सच है कि भाजपा का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आचार विचारों से ही हुआ है। क्या संघ के पूर्व संस्थापकों ने कभी गांधी टोपी को नहीं अपनायार्षोर्षो अगर अपनाया है तो फिर आज की भाजपा की पीढ़ी इससे गुरेज क्यों कर रही हैर्षोर्षो
युवाओं के पायोनियर (अगुआ) बन चुके कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी किसी कार्यक्रम में अगर जरूरत पड़ती है तो गांधी टोपी को सर पर महज औपचारिकता के लिए पहन लेते हैं, फिर मनमोहक मुस्कान देकर इसे उतारकर अपने पीछे वाली कतार में बैठे किसी नेता को पकड़ा देते हैं।
अगर देश के नेता गांधी टोपी को ही एक वजनयुक्त औपचारिकता समझकर इसे धारण करेंगे तो फिर उनसे गांधी के सिद्धांतें पर चलने की आशा करना बेमानी ही होगा। यही कारण है कि हाल ही के संसद के सत्र में कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाइक ने सवाल पूछा था कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणो, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, विचारों और सादगी के साथ दोबारा पैदा किया जा सकता है। इस समय उनकी बहुत जरूरत है। हम सब अपने उद्देश्य से भटक गए हैं और हमें महात्मा गांधी के मार्गदर्शन की जरूरत है। भले ही यह महात्मा गांधी के क्लोन से ही मिले।

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बदल रहा है कांग्रेस का सत्ता और शक्ति का केंद्र

0 10 जनपथ के बजाए अब ताकतवर होने लगा है 12 तुगलक लेन!

0 जल्द ही सोनिया से राहुल को हस्तांतरित हो सकती है ताकत

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राजनैतिक विश्लेषक चाहे जो भी आंकलन लगाएं किन्तु अब लगने लगा है कि कांग्रेस का सत्ता और शक्ति का केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) से खिसककर 12 तुगलक लेन (महासचिव राहुल गांधी का सरकारी आवास) की ओर बढ़ने लगा है।
राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का दावा है कि भविष्य को देखते हुए कांग्रेस के पदाधिकारी और मंत्री अब 10 जनपथ के बजाए 12 तुगलक लेन की देहरी को सलाम करते नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस में अब सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तेजी से आरंभ हो गई है।
सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार के मंत्रियों में अब यह प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गई है कि कौन राहुल गांधी के ज्यादा करीब है। निकटता पाने के उद्देश्य से मंत्रियों ने नए हथकंडे भी अपनाने आरंभ कर दिए हैं। बताया जाता है कि मंत्रियों ने अपने अपने विभागों की नई योजनाओं के श्रीगणेश के लिए राहुल गांधी को बकायदा पत्र लिखकर अनुरोध भी किया है।
सूत्रों की मानें तो मुकुल वासनिक, कांतिलाल भूरिया, नारायण सामी, विलासराव देशमुख, अंबिका सोनी, एम.एस.गिल, सुबोध कांत सहाय, कुमारी सैलजा, सी.पी.जोशी सहित लगभग एक दर्जन मंत्रियों ने राहुल गांधी को उनके विभाग की नई योजनाओं के उद्घाटन करने का अनुरोध किया है। यह अलहदा बात है कि राहुल गांधी ने अभी तक एक भी न्योता स्वीकार नहीं किया है।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कुशाग्र बुद्धि के धनी कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की चौसर की चालों को समझ पाना कांग्रेस के नेताओं के लिए आसान बात नहीं है। पहले तो दिग्गी राजा राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू बने, फिर उन्होंने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी के लिए भविष्य का रोड़मेप तैयार किया।
एक के बाए एक सफलता मिलने के बाद जब राहुल गांधी कांग्रेस की राजनीति में लगभग स्थापित हो चुके हैं, तब यह दांव खेला गया है, ताकि सत्ता में भी राहुल गाधी की दखल बढ़ाई जा सके और सत्ता तथा शक्ति के नए केंद्र के रूप में युवा तुर्क राहुल गांधी को स्थापित किया जा सके।
सूत्रों के अनुसार अब तक कांग्रेंस की धुरी संभालने वाले दो धु्रवों 23 मदर टेरेसा क्रीसेंट (सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल का आवास) और सत्य मार्ग पर गांधी परिवार के पुराने विश्वस्त विसेन्ट जार्ज के आवास पर भी इसकी आहट साफ सुनी जा सकती है।
अपने पसंद के युवा नेताअों को लाल बत्ती से नवाजकर राहुल गांधी ने वरिष्ठ मंत्रियों को यह संदेश दे दिया है कि युवा मंत्री अपने कामकाज के साथ ही साथ वरिष्ठों के काम पर नजर रखकर राहुल गांधी को रिपोर्टिंग करेंगे। उधर अनेक दिग्गज नेताओं की आंख की किरकिरी बने सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल को भी पैजामे के अंदर रखने की दिग्विजय सिंह की रणनीति काफी कारगर होती दिख रही है।