शनिवार, 11 दिसंबर 2010

स्वास्थ्य मंत्रालय की अनदेखी पर नजरें तरेरीं सीएजी ने

एमपी के पांच मेडीकल कालेज में अनियमितताएं पाईं सीएजी ने

 एमसीआई ने मंत्रालय से की थी मान्यता समाप्ति की अनुशंसा

 आजाद को आड़े हाथों लिया कैग ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत के नियंत्रक लेखा महापरीक्षक ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की लाल फीताशाही पर तल्खनाराजगी जाहिर की है। आज सीएजी भवन के नरहरि राव कांफ्रेंस हाल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुएसीएजी के अधिकारियों ने हेल्थ मिनिस्ट्री की जमकर खिचाई की। सीएजी द्वारा वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 कीवीं आडिट रिपोर्ट आज जारी की, जिसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, ग्रामीण विकास विभाग, वस्त्र एवंरेशम विभाग तथा ब्रम्हपुत्र परियोजना के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई गई। 22

सीएजी के प्रतिवेदन में मध्य प्रदेश के स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पांच पांच आर्युविज्ञान महाविद्यालयोंमें अनियमितताओं का अंबार पाया गया है। मध्य प्रदेश के रीवा के श्याम शाह आर्युविज्ञान महाविद्यालय, जबलपुर के श्याम शाह आर्युविज्ञान महाविधालय, ग्वालियर के गिरजा राजा आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, इंदौरके एमजीएम मेडीकल कालेज और राजधानी भोपाल के गांधी मेडिकल कालेज के स्नातक और स्नातकोत्तरस्तर पर कैग ने अनियमितताएं पाईं। मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने मध्य प्रदेश के पांच सरकारी मेडीकलकालेज की संबद्धता समाप्त करने की अनुशंसा अनेकों मर्तबा किए जाने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आधेअधूरे कालेज से ही नीम हकीमों को उत्पादित किया जा रहा है।

केग के प्रतिवेदन में स्पष्ट है कि स्नातक स्तर तक इन महाविद्यालयों में रेजीडेंट और टीचिंग फेकल्टीज कीकमी, अस्पताल का घटिया प्रबंधन और खराब स्वास्थ्य सुविधाएं, अपर्याप्त नर्सिंग और पेरामेडीकल स्टाफ केसाथ ही साथ बिस्तरों की संख्या भी निर्धारित से कम पाई गईं हैं। (स्नातकोत्तर स्तर के लिए बाक्स देखें।) इसकेअलावा मध्य प्रदेश के इन सभी सरकारी कालेज में आईएमसी द्वारा स्नातकोत्तर स्तर पर साठ कोर्स आरंभकरवाने हेतु आग्रह किया था, जो अब तक लंबित ही है।

संवाददाताओं से रूबरू सीएजी ने कहा कि कैग के अधिकारियों के बार बार पत्र व्यवहार के बावजूद भी स्वास्थ्यमंत्रालय द्वारा उसके जवाब न दे पाने से सीएजी का प्रतिवेदन विलंब से आया है, अगर हेल्थ मिनिस्ट्री ने समयपर जवाब दे दिया होता तो यह प्रतिवेदन संसद के शीतकालीन सत्र के बजाए मानसून सत्र में ही सदन के पटलपर रख दिया गया होता।

उन्होंने कहा कि सीएजी ने मिनिस्ट्री से इस साल जनवरी में ही कह दिया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफइंडिया (एमसीआई) का गठन कर लें ताकि व्यवस्था को सुचारू तौर पर चलाया जा सके, किन्तु मंत्रालय ने कैगकी एक न सुनी। कैग का कहना था कि मिनिस्ट्री ने एमसीआई को बनाया है, और एमसीआई मंत्रालय से बड़ीनहीं है।

कैग के अधिकारियों का कहना था कि सामान्यतः कैग द्वारा अपने प्रतिवेदन में किसी प्रकार की टिप्पणी नहींकी जाती है, किन्तु यह पहला मौका होगा जब कैग को स्वास्थ्य मंत्रालय के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करनीपड़ रही हो। बार बार पत्र व्यवहार पर मिनिस्ट्री द्वारा कोई रिस्पांस न दिया जाना आश्चर्यजनक ही है।

 63 फीसदी मेडीकल कालेज में अनियमितताएं

कैग द्वारा निरीक्षण किए गए 299 में से 188 मेडिकल कालेज में अनियमितताएं पाई गईं। ये अनियमितताएंआधारभूत संरचनाओं की नहीं थीं, क्योंकि निरीक्षण इस आधार पर नहीं किया गया था। इसके पीछे सबसे बड़ाकारण यह था कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने सीएजी को जरूरी प्रपत्र उपलब्ध ही नहीं कराए गए।

बाक्स
कालेज                                         निरीक्षण की तिथि                अध्यापकों की कमी   रेजीडेंटस कीकमी
एनएससीबएमसी, जबलपुर     नवंबर 2006                                    31.70                      30.10
एसएसएमसी,रीवा                   नवंबर 2006                                    63                           31
जीआरएमसी, ग्वालियर       नवंबर 2006                                    28.80                        25.80
एमजीएमएमसी, इंदौर          नवंबर 2006                                    27.85                       29.56
जीएमसी, भोपाल                नवंबर 2006                                       40                           25.80

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कांग्रेस के चाणक्‍य चला सकते हैं जहर बुझे तीर

अमेरिका के पेटर्न पर क्यों नहीं चलती भारत सरकार

वाराणसी हादसा: आस्था और विश्वास पर हमला
(लिमटी खरे)

आस्था के केंद्र वाराणसी में मंगलवार को हुए बम हादसे ने कुछ दिनों की खामोशी को तोड़ दिया है। बनारस में जो कुछ भी हुआ वह इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है कि रियाया की सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारें कितनी संजीदा हैं। 24 सितम्बर को जब अयोध्या का फैसला आया तब समूचे देश में रेड अलर्ट था और सुरक्षा एजेंसियों की चाक चोबंद कवायद के चलते सब कुछ शांति के साथ ही बीत गया। इसके उपरांत 06 दिसंबर को भी पुलिस ने पूरी मुस्तैदी दिखाई। लगता है कि इस तरह सब कुछ शांति पूर्वक होने के कारण हमारी सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह बेफिक्र हो गई थीं।
 
पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां, खुफिया एजेंसियां सोती रहीं और इंडियन मुजाहिदीन नाम के एक आतंकवादी संगठन ने वाराणसी के शीतला घाट पर अपने कुकृत्य को अंजाम दे दिया गया। पिछले पांच सालों में आस्था की नगरी वाराणसी में यह चौथा हमला है। पांच बरस में तीन बार अगर कोई नराधम आकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे जाए तो समझ लेना चाहिए कि खामी हमारे तंत्र में ही है। सरकार इस बात को लेकर संतोष जता सकती है कि इस बार के हादसे में मरने वालों की तादाद ज्यादा नहीं है, पर सरकार में बैठे जनता के चुने हुए नुमाईंदो को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस परिवार का एक भी सदस्य जाता है, उसकी दुनिया तो तहस नहस ही हो जाती है।
 
यह तो बनारस की गंगा जमुनी तहबीज का असर रहा कि इस सबके बाद भी आपसी वेमनस्यता नहीं फैल सकी, वरना आतंकवादियों का तो यही प्रयास रहा है कि हिन्दु मुस्लिम आपस में रक्त रंजित क्रांति का आगाज कर दें। इस बार भी मंगलवार का दिन चुना गया। सतातनपंथियों में मंगलवार का विशेष महत्व होता है। इसके पहले बनारस में मंगलवार 07 मार्च 2006 और जयपुर में मंगलवार 13 मई 2008 को हनुमान मंदिर में धमाके हुए थे। वैसे भी इस तरह के नापाका कामों को जब भी अंजाम दिया गया है, इतिहास साक्षी है कि मंगलवार को मंदिर, जुम्मे के दिन मस्जिद और शनिवार को बाजारों को अपना निशाना बनाया गया है। इसके पीछे आपसी वेमनस्य को ही बढ़ाना प्रमुख कारण हो सकता है। हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर की दरगाह, दिल्ली की जामा मस्जिद, मालेगांव की नूरानी मस्जिद में आतंकवादियों ने हमले के लिए शुक्रवार का दिन चुना था। इसी प्रकार पुणे की जर्मन बेकरी, दिल्ली के पहाड़गंज, महरोली, सरोजनी नगर मार्केट आदि में हुए धमाकों का दिन शनिवार रहा।
 
इस तरह के हमलों से रियाया और शासकों के बीच के विश्वास की पतली डोर टूटने लगती है। आम जनता को लगने लगता है कि शासक उसके अमन चैन के प्रति बहुत ज्यादा फिकरमंद नहीं हैं। गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम खुद भी घटनास्थल पर गए, जिससे इस मामले में केंद्र की गंभीरता उजागर होती है, किन्तु वहां उनके द्वारा दिए गए बयान गैरजरूरी थे। चिदम्बरम के बयानों से सभी का ध्यान आतंकवाद के बजाए केंद्र और राज्य के बीच चल रही रस्साकशी की ओर चला गया। इस तरह की हरकत करके चिदम्बरम ने बनारस जाने के अपने मूल मंसूबे पर पानी ही फेर दिया।
 
इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र के बीच जिस तरह का जबानी जमाखर्च आरंभ हुआ है, वह निंदनीय ही कहा जाएगा। खुफिया जानकारी को लेकर दोनों ही सरकारें एक दूसरे को कटघरे में खडा करने से नहीं चूक रही हैं। राज्य और केंद्र के बीच समन्वय का अभाव जिस तरह से मीडिया के द्वारा परोसा जा रहा है, उससे तो आतंकवादियों के हौसले और अधिक बुलंदियों पर पहुंच सकते हैं। एक दूसरे पर दोषारोपण से हिन्दुस्तान की जगहसाई ही हो रही है।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि आतंक के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का आव्हान करने वाले जनसेवक जब सत्ता की मलाई चखते हैं तब वे आतंक के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन करने के बजाए एक दूसरे पर ही कीचड़ उछालने में व्यस्त रहते हैं। देश के आखिरी आदमी को सुरक्षा मुहैया कराना, ताकि वह निर्भय होकर आजादी के साथ सांसे ले सके, भारत गणराज्य और सूबों की सरकारों की पहली प्राथमिकता है। वस्तुतः सत्ता या विपक्ष में बैठे जनसेवक अपने और अपने परिजनों के लिए तो चाक चौबंद सुरक्षा तंत्र का आवरण ओढ़ लेते हैं, किन्तु जब आम जनता की बारी आती है तो इन जनसेवकों की प्राथमिकता बदल जाती है।
 
देखा जाए तो भारत गणराज्य में केंद्र हो या राज्य, हर मामले में पुलिस पूरी तरह से अप्रशिक्षित और अपर्याप्त मात्रा में है। पुलिस हो या अर्धसैनिक बल, इन सभी के लिए अलग अलग पैमाने गढ़े गए हैं। यही कारण है चाहे सीमा पर जवान लड़ते हों या फिर देश के अंदर आतंकवादी अलगाववादी आदि से, हर मोर्चे पर इनको विजय पताका फहराने में संदेह ही रहता है। गुप्तचर सेवाओं में भी अहं की लड़ाई साफ परिलक्षित होती है, यही कारण है कि गुप्तचर सेवाओं में तालमेल का अभाव बना रहता है।
 
भारत की न्यायिक व्यवस्था में आतंकवादियों को सजा दिलवाने में भी काफी लंबा अरसा लग ही जाता है। हर मसले मंे आंख बंद करके दुनिया के चौधरी अमेरिका का अनुसरण करने को अपना गौरव समझने वाले देश के जनसेवक आतंकवाद के मामले में अमेरिका का तरीका अपनाने से क्यों बचते हैं, यह बात समझ से परे ही है। हमें सोचना ही होगा कि आखिर क्या कारण है कि 09/11 के उपरांत अमेरिका में किसी ने आतंक बरपाने का दुस्साहस नहीं किया? क्या कारण है कि अमेरिका जाने वाले पर्याटक या अन्य लोगों को कड़ी जांच से गुजरना होता है? वहीं देश में एक के बाद एक आतंकवादी हमलों को इस तरह की नापाक ताकतें अंजाम देती जा रही हैं और देश में अमन चैन बरकरार रखने का वादा करने वाली सरकारें आंख बंद कर चुपचाप एक के बाद एक हादसों के लिए उपजाउ माहौल तैयार ही करवाती जा रहीं हैं।

बिहार के नतीजों ने उड़ाई आलाकमान की नींद

फिसल रहा है कांग्रेस के हाथों से अल्पसंख्यक वोट बैंक 
मोदी कार्ड खेलकर भाजपा ने अपनी झोली में डाले मुस्लिम वोट
 
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। बिहार के नतीजों पर मनन के बाद कांग्रेस के आला नेताओं की नींद बुरी तरह उड़ी हुई है। नेताओं का मानना है कि एक समय से कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा ‘‘अल्पसंख्यक‘‘ अब उससे विमुख होता जा रहा है। अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय के फैसले से भी मुस्लिम कांग्रेस से खासे नाराज ही बताए जा रहे हैं। कांग्रेस को यह बात भली भांति समझ में आ गई है कि बिहार में कांग्रेस के औंधे मुंह गिरने का एक बड़ा कारण मुसलमानों द्वारा कांग्रेस को वोट न देना ही है।
गौरतलब होगा कि बिहार में कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को लुभाने की गरज से 47 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, बिहार में जीते चार में से तीन विधायक मुस्लिम हैं। कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेता भी दबे स्वर से कांग्रेस आलाकमान की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाने लगे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि अयोध्या मामले में फैसला आने पर कांग्रेस का रूख और रवैया अल्पसंख्यकों को कतई नहीं भाया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के रणनीतिकारों को इस बारे में सोचना आवश्यक है कि आखिर क्या वजह है कि मुसलमान कांग्रेस से दूर होकर अन्य क्षेत्रीय दलों की ओर बढ रहे हैं। उन्होने आगे कहा कि आत्म मुग्ध कांग्रेस अध्यक्ष को चाहिए कि इस बारे में चिंतन अवश्य ही करें कि अल्पसंख्यक वर्ग के मेहबूब अली केसर को बिहार का अध्यक्ष बनाने और सबसे अधिक मुसलमानों को टिकिट देने के बावजूद भी कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक क्यों रहा?
 
राहुल को लेकर चिंता

कांग्रेस के राजनैतिक प्रबंधक इस बात को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं कि अगर यही आलम रहा तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में होने वाले चुनावों में कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है। राहुल गांधी को महिमा मण्डित कर यूथ आईकान के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कांग्रेस की योजना पर मध्य प्रदेश और बिहार के नतीजों के बाद पानी फिरता लग रहा है। ज्ञातव्य है कि राहुल गांधी इन दोनों ही सूबों में जहां जहां चुनाव प्रचार को गए अधिकांश स्थानों पर कांग्रेस को पराजय का ही सामना करना पड़ा।
 
अहमद पटेल की पूछ परख बढेगी
 
कांग्रेस की मुट्ठी से मुस्लिम वोट बैंक रेत के मानिंद फिसलने से कांग्रेस के प्रबंधक सकते में हैं। कांग्रेस को भय सता रहा है कि अगर जल्द ही कोई ठोस कार्ययोजना को अंजाम नहीं दिया गया तो आने वाले समय में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचेगा। एसी परिस्थिति में अब कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की पूछ परख बढ़ने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं।

 मोदी कार्ड खेला राजग ने
 
बिहार चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने नरेंद्र मोदी के नाम का बखूबी इस्तेमाल किया है। कट्टर हिन्दूवादी छवि बना चुके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और जनता दल यूनाईटेड ने न केवल बिहार में घुसने से रोका वरन् इसका प्रोपोगंडा भी तबियत से किया। मुख्यमंत्री नितिश कुमार द्वारा नरेंद्र मोदी का घोर विरोध जताकर मीडिया के माध्यम से मोदी को बिहार की घरती में न घुसने की बात सार्वजनिक तौर पर कही गई थी। कांग्रेस का मानना है कि राजग के इस कदम से जदयू को खासा फायदा हुआ और बिहार में पिछली बार से अधिक संख्या में उसके विधायक चुनकर आए हैं।

अर्जुन सिंह कर सकते हैं धमाका

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

पहली बार घुमाया सीबीएसई ने जबर्दस्त डंडा

व्यवसाय बन चुकी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद
 
सीबीएसई की सख्ती से शाला संचालक सक्ते में
 
(लिमटी खरे)

पालकों और विद्यार्थियों को आकर्षित करने की गरज से निजी शालाओं के संचालकों की यही तमन्ना होती है कि वे किसी भी तरह से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की संबद्धता (एफीलेशन) प्राप्त कर लें। ‘साम, दाम, दण्ड और भेद‘ की नीति अपनाकर निजी शालाओं के संचालक अपनी जुगत में कामयाब भी हो जाते हैं किन्तु उसके बाद विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने की दिशा में शाला संचालक कोताही बरतते आए हैं। सीबीएसई का रवैया भी बेहद ढुलमुल ही रहा है। शालाओं के निरीक्षण की औपचारिकताएं कागजों पर ही निभा दी जाती रही हैं।
 
हाल ही में सीबीएसई के अध्यक्ष और भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी विनीत जैन ने सीबीएसई से संबद्ध शालाओं की मश्कें कसना आरंभ किया है। निजी शालाओं में विद्यार्थियों से मनमानी फीस लेने पर सीबीएसई को आपत्ति है, सीबीएसई ने नया सर्कुलर जारी कर कहा है कि फीस के मामले में अब शालाएं मनमाना रवैया नहीं अपना सकती हैं। कोई भी शाला किसी भी तरह की केपीटेशन फीस या पालकों से एच्छिक डोनेशन भी नहीं ले सकती हैं। सीबीएसई का कहना है कि अगर कोई विद्यार्थी बीच सत्र में शाला छोड़कर जाता है तो शाला प्रबंधन को उसकी बाकी फीस को हर हाल में वापस करना ही होगा।
 
राईट टू एजूकेशन में एक कक्षा में बच्चों की संख्या 35 निर्धारित की गई है, फिर भी सीबीएसई ने इस संख्या को चालीस से अधिक होने पर एतराज जताया है। बोर्ड ने शिक्षा के स्तर में सुधार की गरज से कंटिन्यूअस एण्ड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन स्कीम (सीसीई) लागू की गई है। इसमें पढ़ाई में किताबों के अलावा एक्सट्रा केरिकुलर एक्टीविटीज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, किन्तु एक कक्षा में छात्रों की संख्या अधिक होने पर इस योजना को शायद ही अमली जामा पहनाया जा सके। इन गतिविधियों के तहत  आर्ट, डांस, म्यूजिक आदि के मामले में भी शाला को ध्यान देना होगा। इसके लिए प्रथक से क्लास रूम की व्यवस्था भी शाला को ही सुनिश्चित करनी होगी। हर शाला को एक खेल का कालखण्ड रखना भी अनिवार्य होगा, इसके लिए शाला के पास खेल का मैदान होना भी अनिवार्य किया गया है।
 
सीबीएसई का कहना है कि दाखिला प्रक्रिया भी पूरी तरह से पारदर्शी होना चाहिए। फीस बढ़ाने के मामले में सीबीएसई का तर्क है कि कोई भी शाला अगर शैक्षणिक शुल्क में बढ़ोत्तरी करती है, तो वह पालकों को विश्वास में लेकर ही किया जाए, अन्यथा शिकायत होने पर शाला प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही हो सकती है।
 
इसके साथ ही साथ केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा भी निर्देश जारी किए गए हैं कि शालाओं में पूरी पारदर्शिता अपनाई जाए। इसके लिए आयोग का कहना है कि हर शाला की अपनी एक वेव साईट होना आवश्यक है। इस वेव साईट में शाला का सीबीएसई एफीलेशन स्टेटस, आधारभूत अधोसंरचना (इंफ्रास्टक्चर), शिक्षकों के नाम, पद, उनकी शैक्षणिक योग्यताएं, प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, शाला का ईमेल आईडी, शाला प्रबंधन समिति के सदस्यों का विवरण, शाला का दूरभाष नंबर वेव साईट पर होना आवश्यक है। इसके साथ शाला को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह वेव साईट लगातार अद्यतन (अपडेट) की जाए, ताकि अभिभावकों को सारी जानकारियां मिल सकें।
 
सीबीएसई के दिशा निर्देशों में साफ किया गया है कि प्रत्येक शाला को अपना वार्षिक प्रतिवेदन भी वेव साईट पर डालना अनिवार्य होगा। इस प्रतिवेदन के साथ शाला को अपने इंफ्रास्टक्चर के अलावा वार्षिक गतिविधियां, रिजल्ट आदि को भी अद्यतन किया जाना अनिवार्य किया गया है। सीबीएसई के मान्यता प्राप्त स्कूलों के पास प्राणी विज्ञान, रसायन शास्त्र, भौतिकी विज्ञान, गणित एवं कम्पयूटर की प्रयोगशाला को अनिवार्य किया गया है।
 
सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इन नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। इसके लिए सीबीएसई बोर्ड के निरीक्षण दल समय समय पर जाकर शालाओं का निरीक्षण करेंगे और बच्चों की संख्या निर्धारित से अधिक पाए जाने पर या पारदर्शिता का अभाव मिलने पर कठोर कार्यवाही भी करने का प्रावधान किया जा रहा है।
 
सीबीएसई के अध्यक्ष विनीत जैन के कदमों का स्वागत किया जाना चाहिए, कि उन्होंने व्यवसाय का रूप अख्तिायर कर चुकी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद आरंभ की है। वैसे देखा जाए तो यह जिम्मेदारी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की है। कहने को शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया गया है, किन्तु इसे अमली जामा पहनाने की जब बारी आती है तो मानव संसाधन और विकास मंत्रालय अपने हाथ खड़े कर देता है।
 
केंद्रीय विद्यालय संगठन के बोर्ड ऑफ गवर्नर की अनुशंसा के आधार पर 1988 में तत्कालीन सांसद चंदू लाल चंद्राकर की अध्यक्षता में बनी समिति जिसने दाखिला के तौर तरीकों को बदलने के लिए अपनी सिफारिशें दी थीं। विडम्बना देखिए कि चंद्राकर समिति का वह प्रतिवेदन ही गायब हो चुका है। 21 साल बाद रिपोर्ट खोजने की मुहिम में लगा है मानव संसाधन विकास मंत्रालय! यह बात भी तब प्रकाश में आई जब संसद की आश्वासन समिति ने जनवरी 2009 में इसे लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को फटकार लगाई थी। गौरतलब होगा कि 1992 में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह ने सदन में इस समिति की रिपोर्ट को लागू करने का आश्वासन भी दिया था। अर्जुन सिंह ने उस वक्त कहा था कि चंद्राकर कमेटी अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप चुकी है।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि शिक्षकों की व्यवस्था के लिए राज्य सरकारें अतिरिक्त धन की मांग करती हैं। मतलब साफ है कि सूबों की सरकारों को पता है कि उनके राज्यों में अशिक्षा का अंधेरा इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के समाप्त होने के बाद भी पसरा हुआ है। उस अंधेरे को दूर करने की दिशा में राज्य सरकारों द्वारा कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाना भी आश्चर्य का ही विषय माना जाएगा।
 
शिक्षा के अधिकार कानून में गरीब गुरबों के बच्चों को शिक्षा मुहैया करवाने की शर्त अवश्य ही रखी गई है, किन्तु किसी में इतना साहस नहीं है कि वह फाईव स्टार से लेकर विलासिता वाली संस्कृति वाली शालाओं के संचालकों की कालर पकड़कर उन्हें गरीब बच्चों को शाला में दाखिला दिलाने की घुड़की दे सकें। नर्सरी में दाखिले के लिए भी सरकार ने साफ किया है कि निजी स्कूलों को यह बाध्यता है कि वे गरीब बच्चों को 25 फीसदी स्थान अवश्य ही दें। विडम्बना ही कही जाएगी कि कानून बनने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों के सामने शालाओं को दुकान और प्रतिष्ठान की तरह बनाने वाले शाला संचालक इसकी सरेआम धज्जियां ही उड़ा रहे हैं।
 
इस बात की आशंका भी जताई जा रही थी कि अगर दबाव में आकर शाला संचालक इस 25 फीसदी कोटा सिस्टम को लागू भी कर देते हैं तो वे मनमानी फीस बढ़ोत्तरी के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे। सीबीएसई के अध्यक्ष विनीत जैन की कड़ाई से इन दुकानदार शिक्षण संस्थाओं के संचालकों का मुगालता अवश्य ही टूटा होगा।
 
 इस साल के आरंभ में केंद्रीय विद्यालय संगठन ने बच्चों के बस्तों का बोझ कम करने का फैसला लिया था। संगठन ने अपने समस्त केंद्रीय विद्यालयों को ताकीद किया था कि बच्चों के बस्ते के बोझ को किसी भी कीमत पर कम करना होगा। इसके लिए टाईम टेबल इस तरह का तैयार करने पर बल दिया गया था जिससे बच्चे कम किताबें लेकर शाला जाएं। केवीएस का यह फैसला भी पहले के उन फैसलों की तरह ही ढेर हो गया जिनमें कहा गया था कि बच्चों को होमवर्क और बस्ते के बोझ से मुक्त कराया जाएगा। आज भी केंद्रीय विद्यालय में प्राथमिक कक्षा के बच्चे दस से पंद्रह किलो का बस्ता लादे शाला के मुख्य द्वार से आधे किलोमीटर की कसरत करते मिल जाते हैं।
 
यह सच है कि बच्चा अपने पाठ्यक्रम (सिलेबस) को कड़वी कुनैन की गोली की तरह ही निगलता है। वस्तुतः बच्चों को कम उम्र में किताबी ज्ञान देकर हम उन्हें मशीनी बना रहे हैं। इससे बच्चों का स्वाभाविक विकास अवरूद्ध हुए बिना नहीं है। यह पद्यति दरअसल बच्चों के आंतरिक गुणों के विकास करने के स्वाभाविक माहौल को तैयार करने के बजाए उनके उपर सूचनाओं का बड़ा सा पहाड़ लाद देती हैं। पढ़ाई बच्चों के लिए स्वाभाविक और मनोरंजक बनने के बजाए एक लाईबिलटी और मुश्किल कवायद में तब्दील हो जाती है। आज की युवा पीढ़ी देश के स्वतंत्रता संग्राम और अन्य इतिहास को विस्मिृत ही कर चुकी है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि बच्चों के सिलेबस के अध्याय कम करके उन्हें व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा प्रदाय की जाए।

बढ़ने लगी है अर्जुन सिंह के घर की चहल पहल

जल्द ही कोई धमाका कर सकते हैं कुंवर साहेब
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह की चालों को समझ पाना किसी के बस की बात नहीं है। डॉ.मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में दूध में से मख्खी की तरह निकाल बाहर किए जाने के उपरांत पूर्व केंद्रीय मंत्री कंुवर अर्जुन सिंह लंबे अरसे से खामोश हैं। अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि उनकी यह खामोशी जल्द ही टूटने वाली है।
 
गौरतलब होगा कि इशारों ही इशारों में जहर बुझे तीर चलाकर अर्जुन सिंह को अपने विरोधियों का शमन करने में महारथ हासिल है। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्री मण्डल से बाहर कर दिया गया था। उस वक्त उम्मीद जताई जा रही थी कि वे कोई न कोई धमाका अवश्य ही करेंगे।
 
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अर्जुन सिंह को किनारे करने के लिए सारे जतन कर लिए। उनकी पुत्री वीणा सिंह को कांग्रेस की टिकिट नहीं दी गई। यहां तक कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में सीधी संसदीय क्षेत्र के चुनाव प्रचार में जाने के लिए उनके लिए निर्धारित विमान को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के एक करीबी गुजरात की यात्रा पर निकल गए, मजबूरी में अर्जुन सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से सतना पहुंचना पड़ा।
 
इसके उपरांत अर्जुन सिंह की पत्नि ने परोक्ष तौर पर कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी पर परोक्ष तौर पर आरोप लगाकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया था। इसी बीच उनके राज्यपाल बनने की खबरें राजनैतिक फिजां में तैर गईं थीं। अर्जुन सिंह से सोनिया गांधी की नाराजगी का आलम यह था कि सोनिया गांधी ने उन्हें अपने पारिवार अर्थात जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इस सबके बावजूद भी अर्जुन सिंह ने अपनी खामोशी नहीं तोड़ी।
 
अर्जुन सिंह के राजनैतिक तौर पर किनारे होने की आशंका को भांपकर उनके अनुयाईयों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढकर अपने आका बदल लिए। इसके बाद पिछले लगभग डेढ़ साल से अर्जुन सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में सन्नाटा ही पसरा हुआ है। पिछले दिनों वे जब मध्य प्रदेश की यात्रा पर गए तब पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था कि वे राजनैतिक जीवन के अर्जित अवकाश (अर्न लीव) का आनंद उठा रहे हैं।
 
अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद अब ‘दाउ साहेब‘ एक बार फिर सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि जल्द ही अर्जुन सिंह मीडिया से रूबरू होने वाले हैं, जिसमें वे घोटालों के कारण धूमिल होती कांग्रेस की छवि को ध्यान में रखकर समस्त मंत्रियों को यह भी मशविरा देने वाले हैं कि सभी अपने अपने त्यागपत्र सौंप दें, फिर नए सिरे से मंत्रीमण्डल का गठन किया जाए। इन खबरों में सच्चाई कितनी है यह बात तो कुंवर अर्जुन सिंह ही जानें किन्तु उनके आवास की बढ़ती चहल पहल से लगने लगा है कि जल्द ही कांग्रेस के गुजरे जमाने के चाणक्य की खामोशी टूटने वाली है।

ज्ञातव्य है कि डॉ.मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में एक के बाद एक घोटाले जिस तरह से सामने आ रहे हैं, वैसा अब तक किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में नहीं हुआ है। अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि 7, रेसकोर्स रोड़ (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की तमन्ना मन में रखने वाले दूसरी पंक्ति के नेताओं द्वारा एक के बाद एक स्केम को मीडिया के माध्यम से उजागर किया जा रहा है, ताकि मनमोहन सिंह की रूखसती के मार्ग प्रशस्त हो सकें।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इक्कीसवीं सदी का ‘लोकतंत्र‘ मतलब ‘हिटलरशाही‘

हिटलरशाही हो गए हैं भारत गणराज्य में लोकतंत्र के मायने

(लिमटी खरे)

आजादी के लगभग सवा छः दशकों बाद अब चुनिंदा लोग ही बचे होंगे जिन्हें वास्तव में पता होगा कि ब्रितानियों के जुल्मों को सहकर कितनी मशक्कत के उपरांत भारत ने आजादी हासिल की थी। कितने अरमान के साथ भारत गणराज्य की स्थापना की गई थी। क्या क्या सपने देखे थे, उस वक्त जवान होती पीढ़ी ने। उनकी कल्पनाओं को साकार करने के लिए सरकारों ने पूरे जतन से कोशिश की। आज तक की सरकारों की कोशिशें कितनी ईमानदार थीं, इस बारे में हालात देखकर ज्यादा कुछ कहना अतिश्योक्ति ही होगी। इक्कीसवीं सदी की कल्पना कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी ने कुछ और की थी, किन्तु उनके परिजनों की अगुआई में आगे बढ़ने वाली कांग्रेस ने इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी है। वर्तमान में ‘‘लोकतंत्र‘‘ के मायने ‘‘हिटलरशाही‘‘ हो गए हैं।

सवा सौ साल पुरानी और आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की छवि साफ, स्पष्ट, सच्चे और ईमानदार इंसान की है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु पिछले कुछ सालों मंे उनकी आखों के सामने जो भी घटा है, उसे देखकर उनकी छवि धूल धुसारित ही हुई है। घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद भी वे मूकदर्शक बने बैठे हैं। जब भी समाचार चेनल्स पर वजीरे आजम दिखाई देते हैं, आम आदमी के मानस पटल पर उनके निरीह और बेबस होने का भाव आ ही जाता है।

हाल ही में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के संवैधानिक पद पर पी.जे.थामस की नियुक्ति के उपरांत जो बवाल मचा है, वह थमता नहीं दिख रहा है। संसद लगातार ठप्प ही पड़ी हुई है। विपक्ष भी अपनी मांग पर अडिग ही है। 2004 के उपरांत पहला मौका होगा जब विपक्ष ने सशक्त भूमिका निभाई हो, हो भी क्यों न, आखिर किसी दागी के हाथ में खजाने की चाबी जो सौंपी जा रही है।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने मुख्य सतर्कता आयुक्त थामस को उनका पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी कर साफ कर दिया है कि सितम्बर महीने में डॉ.मन मोहन सिंह ने उनक नियुक्ति जिस तरह की थी, उसमें कहीं न कहीं कुछ तो असंवैधानिक हुआ है। वैसे भी सीवीसी का पद कोई राजनैतिक लालीपाप नहीं है, कि कांग्रेस इसमें सारे नियम कायदों को धता बताते हुए मनमानी कर ले।

वस्तुतः सीवीसी का पद संवैधानिक है, जिसकी पहली अहर्ता ही ईमानदारी और विश्वसनीयता है। इस पद के लिए नियुक्ति हेतु तीन सदस्यीय टीम का गठन किया गया है, जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का समावेश किया गया है। इस मामले में वजीरे आजम मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की एक राय तो मानी जा सकती है, कि वे टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले को दबाना चाह रहे हों, किन्तु जब इस मसले में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने आपत्ति दर्ज की तो उनकी आपत्ति को प्रधानमंत्री ने दरकिनार कैसे कर दिया।

यक्ष प्रश्न तो आज भी यही सामने आ रहा है कि क्या भारत गणराज्य का कलश ईमानदार अफसरान से रीत गया है, जो पामोलिन आयात घोटाले के अभियुक्त पी.जे.थामस को इस पद पर बिठाया गया है। वस्तुतः इस पद के लिए एक एसे नौकरशाह की दरकार थी जिसकी कालर स्वच्छ हो। थामस के भ्रष्ट होने के बारे में सुषमा स्वराज की चीख पुकार बेकार ही साबित हुई। भाजपा ने इस मसले मंे महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपा, मगर हमारे निरीह, ईमानदार, सच्चे, अर्थशास्त्री, साफ, स्पष्ट, मौन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मामला बिगड़ता देख आनन फानन ही महामहिम से थामस को पद की शपथ दिलवा दी।

स्पेक्ट्रम मामले में संसद की कार्यवाही बाधित है, यही कारण है कि संसद में थामस की नियुक्ति पर शोर शराबा नहीं हो पा रहा है। इतना सब बवाल होने के बाद भी मोटी चमड़ी वाले कांग्रेस के नेताओं ने इतना साहस भी नहीं जुटाया कि वे थामस की नियुक्ति के बारे में कहीं भी स्पष्टीकरण दे सकें। चहुंओर एक ही बयार बह रही है कि सारे नियम कायदों को धता बताकर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने पी.जे.थामस को केंद्रीय सतकर्ता आयुक्त बना दिया, इससे यही मैसेज जा रहा है कि कांग्रेस और उसकी सरकार को लोकतंत्र की परवाह ही नहीं रही। विपक्ष के विरोध पर भी कांग्रेस का नेतृत्व शर्म हया को त्यागकर अड़ा हुआ है।

बेशर्मी का लबादा ओढने वाली कांग्रेस को इस बात की परवाह तक नहीं है कि देश की सबसे बड़ी अदालत की बार बार फटकार के बाद भी वह मुंह खोलकर यह नहीं कह पा रही है कि आखिर थामस के बारे में सरकार की कार्ययोजना क्या है? देखा जाए तो कांग्रेस द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर ही थामस का बचाव किया जा रहा है, अगर एसा नहीं है तो इन आरोपों को जवाब क्यों नहीं दे पा रही है कांग्रेस? साथ ही अगर कांग्रेस एसा नहीं कर रही है तो कांग्रेस को तत्काल ही थामस को पदच्युत कर देना चाहिए था। हो सकता है कांग्रेस के तेज दिमाग रणनीतिकार चाणक्य इस बात की खोज में लगे हों कि पामोलिन आयात घोटाले के अभियुक्त पी.जे.थामस को इस तरह के जिम्मेदार संवैधानिक पद पर बिठाने की तोड़ क्या हो सकती है! इस विलंब के पीछे इससे ज्यादा तर्कसंगत कारण और हमारी समझ में नहीं है।

गौरतलब होगा कि सीवीसी का गठन देश में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के दरम्यान राजनैतिक दबाव और हस्ताक्षेप को दूर रखने के उद्देश्य को केंद्रित कर किया गया था। इतना ही नहीं भारत गणराज्य की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख का चयन सीवीसी की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा ही किया जाता है। यह समिति देश के योग्य पुलिस अधिकारियों में से एक का चयन सीबीआई चीफ के तौर पर करती है। क्या इस तरह के दागी के हाथों में कमान सौंपे जाने पर ईमानदारी की परंपरा का निर्वहन किया जा सकेगा?

यहां गुजरे जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना, मुमताज अभिनीत चलचित्र ‘‘रोटी‘‘ के एक गाने का जिकर लाजिमी होगा -‘‘यार हमारी बात सुनो, एसा इक इंसान चुनो, जिसने पाप न किया हो, जो पापी न हो . . . .।‘‘ अर्थात कल थामस अगर किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करते हैं तो वह भ्रष्टाचारी यह नहीं कह सकेगा कि थामस जिनका अपना दामन दागदार है, उन्हें क्या नैतिक अधिकार है किसी की जांच करने का। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा थामस को अपना पक्ष रखने का नोटिस मिलने पर वे गदगद हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि थामस की नैतिकता भी कांग्रेस के मानिंद पूरी तरह से मर चुक है। उनके उपर पामोलिन आयात घोटाला करने का आरोप है। यह आरोप आजकल का नहीं बरसों पुराना है। अगर वे इस मामले में बेदाग थे, तो अब तक उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए मामले में क्लीन चिट क्यों नहीं ले ली। आज वे अभियुक्त हैं, और उन्हें सीवीसी जैसे संवैधानिक पद पर बैठने का कोई अधिकार नहीं बचा है।

हंसी तो इस बात पर आती है कि भारत गणराज्य के गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदंबर खुद पेशे से वकील हैं। कोई भी लॉ ग्रेजुएट कानून की बारीकियों से बहुत अच्छे से वाकिफ होता है। इस लिहाज से चिदम्बरम की सोच समझ, ईमानदारी, सच्चाई पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लाजिमी हैं। सीवीसी के पद पर नियुक्ति के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते समय आखिर किस आधार पर चिदम्बरम ने मान लिया कि थामस निर्दोष हैं? क्या प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ.मनमोहन सिंह और गृहमंत्री के तौर पर चिदम्बरम द्वारा ली गई शपथ बेमानी थी? क्या यह राष्ट्र के साथ सरेआम धोखाधड़ी की श्रेणी में नही आएगा?

जब भारत गणराज्य की स्थापना की गई थी, तब लोकतंत्र की परिभाषा थी, जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन। इस व्यवस्था में विपक्ष को अपनी बात कहने का, गलत बात का विरोध करने का पूरा पूरा अधिकार दिया गया था। पर सवा सौ साल पुरानी और आधी सदी से ज्यादा इस देश पर शासन करने वाली कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इक्कसवीं सदी में लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी है, जिसे एक शब्द में अगर कहा जाए तो वर्तमान में ‘‘लोकतंत्र‘‘ का समानार्थी शब्द कांग्रेस की नजर में ‘‘हिटलरशाही‘‘ है। विपक्ष चाहे जो कहते, चीखे चिल्लाए, पर सरकार वही करेगी जो उसके मन को भा रहा हो। अगर यही लोकतंत्र है तो इससे बेहतर तो ब्रितानियों की गुलामी ही थी।

कक्षाओं में 40 से अधिक बच्चे होने पर होगी कार्यवाही

सीबीएसई बोर्ड कसेगा शालाओं की लगाम

सूचना आयोग के निर्देशों का होगा कड़ाई से पालन

सरकारी शालाओं पर भी गिर सकती है गाज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अभिभावकों और विद्यार्थियों को आकर्षित करने की गरज से निजी तौर पर संचालित होने वाले शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से संबद्धता लिए जाने के बाद बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध न कराने के मामले में सीबीएसई बोर्ड का रवैया सख्त होने वाला है। राईट टू एजूकेशन कानून के प्रावधानों के तहत एक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 35 होना चाहिए किन्तु सीबीएसई ने इस नियम को शिथिल करते हुए विद्यार्थियों की संख्या 40 करने की बात कही गई है।

सीबीएसई बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि बोर्ड ने एक परिपत्र जारी कर अपने समस्त स्कूलों को ताकीद किया है कि शाला में एक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 40 से अधिक नहीं होना चाहिए। गौरतलब होगा कि बोर्ड ने शिक्षा के स्तर में सुधार की गरज से कंटिन्यूअस एण्ड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन स्कीम (सीसीई) लागू की गई है। इसमें पढ़ाई में किताबों के अलावा एक्सट्रा केरिकुलर एक्टीविटीज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, किन्तु एक कक्षा में छात्रों की संख्या अधिक होने पर इस योजना के सफल होने पर संदेह ही व्यक्त किया जा रहा है। इसके तहत आर्ट, डांस, म्यूजिक आदि के मामले में भी शाला को ध्यान देना होगा। इसके लिए प्रथक से क्लास रूम की व्यवस्था भी शाला को ही सुनिश्चित करनी होगी। हर शाला को एक खेल का कालखण्ड रखना भी अनिवार्य होगा, इसके लिए शाला के पास खेल का मैदान होना भी अनिवार्य किया गया है।

इसके साथ ही साथ केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा भी निर्देश जारी किए गए हैं कि शालाओं में पूरी पारदर्शिता अपनाई जाए। इसके लिए आयोग का कहना है कि हर शाला की अपनी एक वेव साईट होना आवश्यक है। इस वेव साईट में शाला का सीबीएसई एफीलेशन स्टेटस, आधारभूत अधोसंरचना (इंफ्रास्टक्चर), शिक्षकों के नाम, पद, उनकी शैक्षणिक योग्यताएं, प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, शाला का ईमेल आईडी, शाला प्रबंधन समिति के सदस्यों का विवरण, शाला का दूरभाष नंबर वेव साईट पर होना आवश्यक है। इसके साथ शाला को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह वेव साईट लगातार अद्यतन (अपडेट) की जाए, ताकि अभिभावकों को सारी जानकारियां मिल सकें।

सीबीएसई के दिशा निर्देशों में साफ किया गया है कि प्रत्येक शाला को अपना वार्षिक प्रतिवेदन भी वेव साईट पर डालना अनिवार्य होगा। इस प्रतिवेदन के साथ शाला को अपने इंफ्रास्टक्चर के अलावा वार्षिक गतिविधियां, रिजल्ट आदि को भी अद्यतन किया जाना अनिवार्य किया गया है। सीबीएसई के मान्यता प्राप्त स्कूलों के पास प्राणी विज्ञान, रसायन शास्त्र, भौतिकी विज्ञान, गणित एवं कम्पयूटर की प्रयोगशाला को अनिवार्य किया गया है।

सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इन नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। इसके लिए सीबीएसई बोर्ड के निरीक्षण दल समय समय पर जाकर शालाओं का निरीक्षण करेंगे और बच्चों की संख्या निर्धारित से अधिक पाए जाने पर या पारदर्शिता का अभाव मिलने पर कठोर कार्यवाही भी करने का प्रावधान किया जा रहा है।

उधर दूसरी ओर सीबीएसई से मान्यता प्राप्त शासकीय शालाओं के हाल बेहाल ही हैं। अनेक शासकीय शालाओं में एक कक्षा में विद्यार्थियों की तादाद सैकड़ा पार कर चुकी है। इन शालाओं में राईट टू एजूकेशन के नियम का पालन सुनिश्चित करवाना टेडी खीर ही साबित होने वाला है। वहीं निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं में जहां एक एक कक्षा में चालीस से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, वहां अतिरिक्त बच्चों के लिए दूसरा सेक्शन बनाना शाला की बाध्यता होगी, किन्तु इसके साथ ही साथ उन शालाओं को सीबीएसई के नार्मस के हिसाब से योग्य शिक्षकों की तैनाती सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर सकती है।

अखिल भारतीय अभिभावक संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का कहना है कि निजी शालाओं में एक कक्षा में 60 से अधिक बच्चे मिलना आम बात है। अनेक निजी शिक्षण संस्थाओं में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। अनेक शालाएं शहरी आबादी से बहुत दूर स्थापित की गई हैं, जिससे बच्चों को आवागमन में तो अभिभावकों को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्री अग्रवाल का कहना है कि सरकार और सीबीएसई दोनों को चाहिए कि शालाओं के इन्फ्रास्टक्चर पर विशेष ध्यान दिया जाए।

दलितों में क्रिकेट का जुनून जगाएगी भाजपा

खेल के माध्यम से दलितों पास जाएगी भाजपा

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली। 2014 में होने वाले आम चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपनी फील्डिंग आरंभ कर दी है। पहले असंगठित मजदूरों को लुभाने और भाजपा से जोड़ने के लिए एक मंच बनाकर भाजपा ने दिल्ली फतह का आगाज कर दिया है। अब दिल्ली भाजपा ने खेल के माध्यम से दलितों को जोड़ने की अभिनव योजना को अंजाम दिया है। अम्बेडकर जयंती तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरूआत गत दिवस दिल्ली के जनकपुरी से हुई

दिल्ली में भाजपा ने इस काम के लिए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर और सांसद नवजोत सिंह सिद्दू को आगे किया है, ताकि युवाओं को क्रिकेट के माध्यम से आकर्षित कर भाजपा से जोड़ा जा सके। वैसे भी राष्ट्रमण्डल खेलों में दलित फंड के उपयोग को लेकर भाजपा द्वारा पहले ही कांग्रेस को आड़े हाथों लिया जा चुका है।

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के अनुसार दिल्ली के 279 मण्डलों में यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। इस प्रतियोगिता को डॉ.अम्बेडकर क्रिकेट प्रतियोगिता का नाम दिया गया है। इसके तहत दलित बस्तियों के इर्द गिर्द वाले मैदानों में ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। 14 अप्रेल तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में विजेता टीम को 51 हजार रूपए का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।
राष्ट्रपति से मिले राज्यपाल

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने आज यहां राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को अपनी प्रकाशित पुस्तक ’’कर्मयोगी की डायरी’’ के तीन खण्ड भेंट किये। इन डायरियों के साथ राज्यपाल की ’रामेश्वर ठाकुर इन पार्लियामेंट, सेलेक्टेड स्पीचिज’ और अन्य भाषण संग्रह की प्रतियां भी राष्ट्रपति को दी गई।

डायरियों में न केवल एक राष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति की जीवनी का सचित्र वर्णन है, बल्कि पिछले छह दशकों के राष्ट्रीय राजनैतिक व सामाजिक क्षेत्रों की अंतर्गाथा का बहुत संयत तथा सटीक लेखा-जोखा है। इस अवसर पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा ने ’कर्मयोगी की डायरी’ की विशेषताओं के विषय में विस्तार से अपने विचार रखे। राष्ट्रपति ने रामेश्वर ठाकुर को शाल ओढ़ाकर अभिनन्दन करते हुए उन्हें देश का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पुरुष के रूप में सम्मानित किया।

बुधवार, 24 नवंबर 2010

750 th post

असंगठित मजदूरों को इकट्ठा करना पहली प्राथमिकता : प्रहलाद पटेल

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल का राजनैतिक पुर्नवास हो गया है। राजधानी दिल्ली में आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने श्री पटेल को भारतीय जनता असंगठित मजदूर महासंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया। फिक्की के सभागार में आयोजित गरिमामय कार्यक्रम में उनके नाम की घोषणा की गई।

इस अवसर पर कार्यकर्ताओं से खचाखच भरे सभागार में अपने उद्बोधन में नितिन गडकरी ने कहा कि उन्होनंे पदभार ग्रहण करने के साथ ही यह तय कर लिया था कि वे शोषितों को न्याय अवश्य ही दिलाएंगे। इस तरह के एक महासंघ के गठन की अवधारणा उनके मानस पटल पर सालों से घुमूड रही थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र मेंु इस तरह का संघ बनाकर कुछ प्रयास अवश्य ही किए हैं। गडकरी ने चिंघाड लगाई कि हमारी सज्जनता को दुर्बलता न समझा जाए और हमारी आक्रमकता के मायने गुण्डागर्दी कतई नहीं है।

श्री गडकरी ने कहा कि वे लगभग पचास हजार कामगार यूनियन के अध्यक्ष भी हैं। मुंबई में कामगारों की बदहाली बयान करते हुए उन्होंने कहा कि वहां के कामगारों के बच्चे भीख मांग्रने पर मजबूर हैं और उनके घरों की महिलाएं बार में नाच रही हैं या शराब परोस रही हैं। कांग्रेस पर परोक्ष वार करते हुए गडकरी ने कहा कि भाजपा वैसी पार्टी नहीं है जिसमें देा मालिक और बाकी सब मजदूर मालिक बोलता है और कुत्ते दुम हिलाते आगे पीछे दौड़ते रहेते हैं।

नाम की घोषणा के उपरांत अपने संबोधन में प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि लोगों को संगठित करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी, साथ ही मध्य प्रदेश सरकार की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि शिवराज सरकार ने किसानों के पंजीकरण का बेहतरीन काम आरंभ किया है।ै उन्होनें कहा कि उनका प्रयास होगा कि लोगों को चिन्हित कर उनका पंजीकरण कराया जाए।

इस अवसर पर राष्ट्रीय मंत्री रामलाल, दिल्ली प्रदेश भाजपाध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, प्रभारी महासचिव विजय गोयल, मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष प्रभात झा, सांसद अनिल माधव दुबे आदि भी उपस्थित थे। सिवनी जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए पूर्व मंत्री डाॅ.ढाल सिंह बिसेन, नरेंद्र टांक, महेंद्र सिंह ठाकुर, प्रकाश शर्मा, कलीचरण सनोडिया, संजीव मिश्रा, अरविंद बघेल, मनोज मर्दन त्रिवेदी, तिलक देशमुख, सुदामा गुप्ता आदि ने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करवाई।

कुशल प्रबंधकों की कमी से जूझती कांग्रेस

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

कुशल प्रबंधकों की कमी से जूझती कांग्रेस

भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतफा घिरने के बाद अब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को कुशल प्रबंधकों की कमी खासी खलने लगी है। एक समय था जब कांग्रेस में संकटमोचक के तौर पर बेहतरीन प्रबंधक कुंवर अर्जुन सिंह, गुलाम नवी आजाद, हंसराज भारद्वाज आदि कांग्रेस की लाज बचाने का काम करते थे, आज सिर्फ आजाद ही मंत्रीमण्डल का हिस्सा हैं, शेष दो नेता तो सक्रिय राजनीति से लगभग किनारा कर ही चुके हैं। बीते दिनों पत्रकारों से रूबरू वाम नेता सीताराम येचुरी ने साफ तौर पर कह दिया था कि मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में मंत्रियों की चाल मदमस्त हाथी के मानिंद है, बिगडेल और घमंडी मंत्रियों को विपक्ष से कोई लेना देना नहीं बचा है। कांग्रेस में प्रबंधन की कमान इन दिनांे सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल और महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के पास परोक्ष तौर पर ही है। दोनों ही नेता अपने निहित स्वार्थों के चलते कांग्र्रेस का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं रख छोड रहे हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को महिमा मण्डित करने के चलते अभी तक तो कांग्रेस की छवि पर कुछ खास असर नहीं पड़ा है, किन्तु अब भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कांग्रेस का सांसे लेना मुश्किल होने लगा है। कांग्रेस की राजमाता को अब कांग्रेस के अंदर वाले कुशल प्रबंधकों की कमी खलने लगी है।



चोरी और सीना जोरी

कामन वेल्थ गेम्स का घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला न जाने कितने घोटाले हैं जिनमें देश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को चंद नेताओं ने तबियत से उड़ाया और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार चुप्पी साधे बैठी रही। दूरसंचार मंत्री ए.राजा के मामले में तो प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी ने सारी हदें ही पार कर दी हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत की फटकार के बाद अब कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई पड़ रही है। युवराज पीएम के साथ खड़े होने का स्वांग रच रहे हैं। देश देख रहा है कि किस तरह उसके गाढे़ पसीने की कमाई को आग लगाई गई, और फिर कांग्रेस के कर्णधार लीपा पोती में जुटे हुए हैं। गजब की दिलेरी और अंधेरगर्दी है। देश की जनता जानना चाह रही है कि आखिर एक मंत्री का इतना साहस कैसे हो गया कि वह मंत्रीमण्डल के फैसले को बलाएताक पर रख दे? कानून मंत्रालय को अपने घर की लौंडी बना डाले? वजीरे आजम की आज्ञा को भी दरकिनार कर दे? यह सब संभव है तो सिर्फ और सिर्फ इक्कसवीं सदी की कांग्रेस में जिसकी बागडोर, श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों से राहुल गांधी के हाथों में हस्तांतरित होने को आतुर है।



भ्रष्टाचार पर अब मुंह खोला बाबा रामदेव ने भी

देश में भ्रष्टाचार मिटाने और स्विस बैंक सहित विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने के संकल्प को जगजाहिर करके सियासत की पायदान चढ़ने का सपना देखने वाले स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी अब मशहूर उद्योगपति रतन टाटा और राहुल बजाज के बाद अब भ्रष्ट सियासतदारों के खिलाफ मुुंह खोल दिया है। बाबा रामदेव का कहना है कि एक मंत्री ने उनसे रिश्वत के बतौर दो करोड़ रूपयों की मांग की थी। बाबा रामदेव के बाद सिहांसन संभाले पतांजली योग केंद्र के महामंत्री आचार्य बाल कृष्ण ने यह कहकर सभी को चौंका दिया है कि रिश्वत मांगने वाला आज भी उत्तराखण्ड सरकार में मंत्री है। लोग यह सोच सोच कर हैरान हैं कि आखिर कम समय में बाबा रामदेव परिपक्व राजनेता कैसे हो गए, कि उनसे रिश्वत मांगने वाले का नाम उन्होंने लंबे समय तक गुप्त रखा, फिर अब जाकर उसे मंझे हुए राजनेता के मानिंद उजागर कर दिया। लोगों का कहना है कि भले ही बाबा रामदेव भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेने की बात कह रहे हों, किन्तु जब उनसे रिश्वत मांगी गई तो वे मौन साधे बैठे रहे! बाबा रामदेव के इस मंझे हुए कदम से लोग कहने से नहीं चूक रहे हैं कि जय हो बाबा रामदेव की।



गडकरी की आगवानी ने खोली यूपी भाजपा की पोल

उत्तर पद्रेश में हासिए पर आ चुकी भारतीय जनता पार्टी का संगठनात्मक ढांचा उत्तर प्रदेश में किस कदर चरमरा चुका है इस बात की एक बानगी है भाजपा के निजाम नितिन गडकरी की पिछले दिनों हुई लखनऊ यात्रा। नितिन गडकरी जब चार्टर्ड प्लेन से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंचे तब अमौसी हवाई अड्डे पर उनकी आगवानी के लिए महज दो दर्जन लोग ही उपस्थित थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गड़करी जब उतरे तो मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं को देखकर उनकी भवें तन गई। भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में चल रही बयार के अनुसार नितिन गड़करी का कद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के अनुरूप नहीं होना इसका सबसे बड़ा कारण है। गडकरी के उतरते वक्त आलम यह था कि वहां लखनऊ के संसद सदस्य लालजी टण्डन, लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा सहित अनेक बड़े नेताओं ने भी गडकरी की आगवानी करना मुनासिब नहीं समझा। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब गडकरी के साथ आए कालराज मिश्र और रामलाल के स्वागत में भी नेताओं ने हवाई अड्डे पर आमद नहीं दी।



रूक नहीं रही कमल नाथ और रमेश की रार

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बीच चल रही रस्साकशी थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जयराम रमेश के मंत्रालय के अडियल रवैऐ के चलते कमल नाथ की उनके गृह प्रदेश मध्य प्रदेश, उनके प्रभाव क्षेत्र महाकौशल में बुरी तरह भद्द पिट रही है। रमेश हैं कि खुद को पर्यावरण और वन्य जीवों का हिमायती दिखाने का उपक्रम कर रहे हैं, उधर सड़क परियोजनाओं में मंत्रालय की हरी झंडी न मिल पाने के चलते लोग हलाकान हुए बिना नहीं हैं। इसमें सबसे अधिक प्रभाव चार सौ साल पुरानी नागपुर जबलपुर सड़क पर पड़ रहा है। इस सड़क पर पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के काल्पनिक वन्य जीव कारीडोर का होना बताया जा रहा है, जिससे सिवनी जिले में इसका निर्माण रोक दिया गया है। दूसरी तरफ कमल नाथ पर आरोप है कि इस सड़क को वे अपनी संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा से होकर ले जाने पर आमदा हैं। मजे की बात तो यह है कि जहां से वे इसे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, वहां सतपुड़ा कारीडोर एक साल से भी अधिक समय से अस्तित्व में आ चुका है। सियासतदारों की सियासत जारी है, राहगीर परेशां हैं. . .।



राज का भय दिखा चव्हाण पर

महाराष्ट्र प्रदेश में अशोक चव्हाण के बाद सत्तारूढ हुए पृथ्वीराज चव्हाण पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे का भय साफ साफ दिखाई पड़ रहा है। मनसे के सुप्रीमो का मराठी प्रेम (वस्तुतः आतंक) सर चढ़कर बोल रहा है। ठाकरे के मराठी मानुष का प्रभाव पृथ्वीराज चव्हाण के शपथ ग्रहण में भी देखने को मिला। मंत्रीमण्डल की पहली बैठक के बाद पत्रकारों से रूबरू चव्हाण ने अंग्रेजी या हिन्दी में बोलने से स्पष्ट तौर पर इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वे भविष्य में भी सिर्फ मराठी में ही बात करेंगे। पृथ्वीराज चव्हाण को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस सूबे के वे निजाम बने हैं, वह अखण्ड भारत का ही हिस्सा है, और भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी है। कल तक वे केंद्र में मंत्री थे, तब तो उन्हें हिन्दी बोलने से परहेज नहीं था, आज अचानक हिन्दी से परहेज और मराठी से प्रेम के पीछे राज ठाकरे का भय ही है। मजे की बात तो यह है कि देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस भी राज ठाकरे के इस तरह के आंदोलन से बढ़ने वाले भाषावाद, क्षेत्रवाद के बावजूद भी अपना मुंह सिले हुए है।



कांग्रेस का ‘‘राजा‘‘ प्रेम

लगता है कांग्रेस आज भी राजशाही के प्रेम से उबर नहीं सकी है। राजा शब्द कांग्रेस को बेहद ही भाता है। चाहे कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह हों या फिर पूर्व संचार मंत्री ए.राजा। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच में रूखसत हुए राजा को संसद भवन में आवंटित कमरे पर आज भी उन्ही की पट्टिका चस्पा की गई है। संसद भवन में पहले माले पर उन्हें आवंटित कक्ष के आजू बाजू कानून मंत्री वीरप्पा मोईली और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के कक्ष हैं। गौरतलब है कि कानून मंत्री वीरप्पा मोईली पर राजा को बचाने की जवाबदारी आहूत मानी जा रही है। वहीं दूसरी ओर राजा के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार एचआरडी मिनिस्टर सिब्बल को सौंपा गया है। इस तरह दोनों ही राजा को बचाने की जुगत में लगाए गए लगते हैं। संसद में राजा के कक्ष पर उनके नाम की पट्टिका देखकर लगता है कि राजा चाहे कितने भी भ्रष्ट रहे हों, पर कांग्रेस उनका मोह नहीं छोड़ पा रही है।



अहमद पटेल से खफा हैं मनमोहन

कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल की क्या औकात बकत होगी, यह समझा जा सकता है। कांग्रेस के कद्दावर नेता भी पद पाने के लिए अहदम पटेल की चौखट पर नाक रगड़ते रहते हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने रात्रिभोज का आयोजन किया। इस रात्रिभोज में मेहमानों की सूची प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने पीएम से चर्चा के बाद फायनल की। इस सूची में ममता, लालू, मुलायम, पासवान के नाम गायब थे। सबसे अधिक हैरानी तो इस बात पर हुई कि कांग्रेस में सोनिया, मनमोहन के बाद तीसरी पायदान पर विराजे अहमद पटेल का नाम इस फेहरिस्त में शामिल नहीं किया गया था। कहते हैं कि पीएम के करीबी कुट्टी नायर की अहमद पटेल से ‘‘कुट्टी‘‘ चल रही है, सो उनके पर कुतर दिए गए। राजनैतिक वीथिकाओं में पीएम के डिनर की सूची से पटेल के नाम के कटने को हैरानी के साथ देखा जा रहा है, साथ ही यह भी माना जा रहा है कि अब पटेल का राजनैतिक ग्राफ भी शनैः शनैः नीचे आ सकता है।



200रूपए वाले सरदारजी हुए अंदर

राजधानी दिल्ली में पुलिस कर्मियों के बीच ‘‘200 रूपए वाले सरदारजी‘‘ के नाम से विख्यात अमृतपाल अब पुलिस हिरासत में हैं। ललिता पार्क हादसे के बाद पुलिस ने उन्हें पकड़ कर अंदर कर दिया है। कहते हैं कि सरदार जी के सारे नाजायज कामों पर पर्दा डालने के लिए वे किसी भी पुलिस वाले के आने पर उसे दो सौ रूपए पकड़ा दिया करते थे। सरदार जी के दर पर जब भी कोई वर्दी वाला गया बस वह दो सौ रूपए की चढ़ोत्री लेकर वापस लौट गया। पुलिस वालों के बीच सरदार अमृत पाल ‘200 रूपए वाले सरदार जी‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। कमजोर भवनों के जरिए लाखों करोड़ों कमाने वाले 200 रूपए वाले सरदार जी ने चंद रूपयों की खनक में न जाने कितनी जिन्दगियां बर्बाद कर डाली हैं। सरदार के 200 रूपए इतने ज्यादा असरदार होते थे कि पुलिस की भी हिम्मत इतनी नहीं होती थी कि वे सरदार पर अकोड़ा कस सके।



लालीपाप ही दिखाकर चले गए ओबामा

दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के लोगों की दीपावली खराब की, भारतीय व्यवस्थाओं को ढेंगा दिखाया, जलेबी लटकाई और विदा ले ली। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह अगर समूचे घटनाक्रम का विश्लेषण कर रहे होंगे तो वे पा रहे होंगे कि वाकई ओबामा की यात्रा से भारत को आखिर मिला क्या? भारत के खुफिया तंत्र के अधिकारी भी इस यात्रा में अपने आप को बौना महसूस ही करते रहे। देश की आन बान शान का प्रतीक संसद भवन में सारे नियम कायदों को बलाए ताक पर रखकर ओबामा के सुरक्षा अधिकारियों ने खुफिया कैमरे लगा दिए थे। यह भारत के लिए बेहद अपमान और आपत्तिजनक ही माना जाएगा। सुरक्षा परिषद में स्थाई आसनी के मामले में भी ओबामा ने खुलकर कुछ भी नहीं कहा। लोकसभा में ओबामा की यात्रा के दौरान लोकसभा टीवी के कैमरामैन भी ओबामा के इर्दगिर्द नहीं आ पाए। अमरिका अगर भारत को इतनी ही हीन भावना से देखता है, तो बेहतर होता कि ओबामा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संसद को संबोधित कर देते।



पटेल के खिलाफ जांच में नाथ की स्वीकारोक्ति

महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर और मध्य प्रदेश के बैतूल के बीच सड़क निर्माण में हुए कथित भ्रष्टाचार की आग शांत नहीं हो पाई है। लगभग छः माह पहले इस सड़क के निर्माण का ठेका दिल्ली की ओरिएंटल स्ट्रक्चर इंजीनियर्स प्राईवेट लिमिटेड को दिया गया था। इस मामले में सीबीआई ने एनएचएआई के दो अफसरों को पकड़कर उनके पास से एक करोड़ 86 लाख रूपए बरामद भी किए थे। इन अफसरों के फोन, ईमेल आदि के आधार पर सीबीआई ने एनएचएआई के सदस्य एस.आई.पटेल से पूछताछ की इजाजत भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से मांगी थी। सीबीआई के सूत्रों का दावा है कि 10 हजार आठ सौ करोड़ रूपए के ठेके में गफलत हुई है। कमल नाथ ने अनुमति देने से इंकार कर दिया है। दरअसल सीबीआई पटेल को गिरफ्तार कर पूछताछ करना चाह रही थी।



पापुलरटी बढ़ा रहे शिवराज

देश के हृदय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि आम आदमी की बनती जा रही है। सूबे में उनके बढ़ते रसूख से दिल्ली के अनेक नेताओं के पैरांे के नीचे की जमीन खिसकने लगी है। शिवराज ने जब से सत्ता संभाली है, तब से उनके द्वारा आरंभ की गई योजनाएं जनता को लुभाने लगी हैं। पहले वे पांव पांव वाले भईया के नाम से मशहूर थे। अब उन्होंने अपने निवास पर सरकारी खर्चे से न जाने कितनी पंचायतें आहूत कर लोगों को लुभा दिया है। फिलहाल वे हर सप्ताह वनवासी यात्रा से सूबे का नाप रहे हैं। भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में इन दिनों शिवराज की बेतकल्लुफी की चर्चाएं जमकर हो रही हैं। शिवराज कही भी चाय के ठेले पर जाकर चाय पीने से भी नहीं हिचकते हैं। इस सबसे पीछे शिवराज का उद्देश्य वे ही जाने पर सूबे में उनकी बढ़ती पकड़ ने अनेक नेताओं की नींद उडा दी है।



पुच्छल तारा

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बाघ प्रेम एक बार फिर चर्चाओं में है। पिछले दिनों एक बाघिन की मौत पर उन्होंने पता लगाने की कोशिश की है कि आखिर उसकी मौत कैसे हुई? इसके लिए बाकायदा जांच बिठा दी गई है। बाघों के संरक्षण के लिए कथित तौर पर कटिबद्ध जयराम रमेश की कार्यप्रणाली पर मध्य प्रदेश के जबलपुर से रवि प्रकाश ने ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि बाघिन की मौत पर जांच बिठा दी गई है, किन्तु दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक सेमीनार में स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव के बयान से कोई सरोकार नहीं, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक बाघिन के मरने पर इतना हंगामा बरपा दिया, किन्तु देश में अनगिनत गर्भवती महिलाओं की मौत पर किसी को कोई चिंता नहीं है। आखिर यही है नेहरू गांधी के सपनों का भारत, ‘‘जय हो‘‘।

सोमवार, 22 नवंबर 2010

कांग्रेस में सबसे बड़ा कद है राहुल का

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

कांग्रेस में सबसे बड़ा कद है राहुल का
सियासी दल चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, कांग्रेस की नजर मंे भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का कद सबसे बड़ा हो गया है। इस तरह की चर्चाएं कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के सियासतदारों के बीच चल पड़ी हैं। संसदीय सौंध में इन दिनों ओबामा की भारत यात्रा के दौरान हुए मजेदार वाक्ये को चटखारे लेकर परोसा जा रहा है। हुआ दरअसल यह कि दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के दरम्यान उन्हें संसद के सेंट्रल हाल में उन्हें भाषण देना था। इस समय डॉ.मुरली मनोहर जोशी, जयंती नटराजन और टी.सुब्बीरामी रेड्डी एक कतार में ही विराजमान थे। इसी बीच रेड्डी को संभवतः लगा कि वे वहां बैठकर ओबामा से हाथ नहीं मिला पाएंगे, सो अपनी इस सीट को ताकने की गुजारिश उन्होंने जोशी और नटराजन से की और अन्यत्र सीट की तलाश में निकल पड़े। इसी बीच कुछ नेताओं ने खाली सीट को कब्जाना चाहा, किन्तु मुरली मनोहर जोशी और जयंती नटराजन ने उन्हें बता दिया कि वह रेड्डी के लिए रखी हुई है। अचानक ही राहुल गांधी वहां आए और सीट खाली देखकर उस पर बैठ गए। राहुल को मना करने की हिम्मत नटराजन तो नहीं जुटा सकीं पर जोशी की खामोशी भी काफी कुछ कह गई। बात यहीं समाप्त नहीं हो रही है, लोग यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि अगर पीएम की कुर्सी पर राहुल धोखे से बैठ गए तो सरदार जी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति तय है।

तुरूप कार्ड छूने पर नाराज हुई कांग्रेस
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के उपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख के.एस.सुदर्शन के अमेरिकन गुप्तचर एजेंसी सीआईए के एजंेट होने के हमले के उपरांत कांग्रेस की बासी कढी में उबाल सा आ गया है। कांग्रेस इस बात का मातम मना रही है कि संघ के पूर्व सुप्रीमो ने आखिर ऐसा संगीन आरोप क्यों लगाया? उधर सोनिया गांधी के करीबी कांग्रेसियों से खार खाए कांग्रेस के कुछ सरमायादारों ने इस तरह के आरोपों को हवा देना आरंभ कर दिया है। हालात देखकर यह लगने लगा है कि संघ अब बैकफुट पर आ गया है। संघ ने सोनिया गांधी पर आरोप देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल मंे जड़े हैं। आरोपों के उपरांत कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपना विरोध दर्ज कराया। कहते हैं कि दिग्गी राजा के समर्थकों ने भोपाल के मीडिया पर्सन को बाकायदा फोन कर उन्होंने खबरों को प्रमुखता से छापने का अनुरोध किया। बाद में जब यह बात कांग्रेस के मध्य प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी को पता चली उन्होंने भी अपना विरोध दर्ज कराया। चर्चा है कि इस सबसे बाद भी पीसीसी में खामोशी ही पसरी रही।


शिव को चुभने लगा है अब कमल!
वैसे तो भगवान शिव को बेलपत्री, धतूरा आदि भाता है, पर अगर कोई कमल उन पर चढ़ा दे तो वे नाराज नहीं होते। मध्य प्रदेश के दो क्षत्रप कमल नाथ और शिवराज सिंह चौहान के बीच लगने लगा है कि अब हनीमून पूरी तरह से समाप्त हो गया है। बार बार लुभावने वादों से केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को तबियत से ‘‘मामा‘‘ बनाया। बाद मे जब मामला शिवराज की समझ में आया तब तक काफी देर हो चुकी थी। सूत्रों के अनुसार कमल नाथ ने मध्य प्रदेश को सबसे ज्यादा रकम देने का लाईलप्पा टिकाया, बाद में असलियत सामने आई तो प्रदेश भाजपा ने कमल नाथ को घेरने का प्रयास किया। इसी बीच खजुराहो की इंवेस्टर्स मीट का न्योता देने दिल्ली गए शिवराज को एक बार फिर लोक लुभावने सपने दिखाकर कमल नाथ ने शिवराज को चारों खाने चित्त कर दिया। इस मीट में अरूण यादव को छोड़कर और कोई नहीं पहुंचा। फिर क्या था शिव का तीसरा नेत्र तो खुलना ही था। कहा जा रहा है कि इस तीसरे नेत्र पर दिल्ली में बैठे भाजपा के आला नेता ही पट्टी बांधने की तैयारी में हैं।

अरूण डाउन, सुषमा अप
दुनिया के चौधरी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारतीय जनता पार्टी में भी अंदरूनी सियासत जबर्दस्त गर्मा गई है। ओबामा के जाने के बाद अब भाजपा के आला नेताओं की रंेकिंग भी अघोषित तौर पर की जाने लगी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्य सभा के अरूण जेतली के बीच भी नंबर वन की होड़ में दोनों ही के समर्थकों का मन उपर नीचे हुए बिना नहीं है। ओबामा की यात्रा में सुषमा स्वराज की टीआरपी में जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया है, किन्तु अरूण जेतली का ग्राफ नीचे आ गया है। ओबामा के दौरे में समयाभाव में यह तय कर पाना मुश्किल था कि सुषमा स्वराज को ओबामा से मिलवाया जाए या फिर अरूण जेतली को। अंततः मामला स्वराज के पक्ष में फैसला हुआ। सुषमा के मिलने के बाद जेतली खेमा अपने आप को बहुत बेईज्जत महसूस करता रहा। जेतली खेमे ने सारा जोर लगा दिया। बाद में प्रधानमंत्री के भोज में जेतली को ओबामा से मिलने का अवसर मिल ही गया। अब जेतली खेमा आहत है कि उनके सरमायादार अरूण जेतली की रेंकिग सुषमा स्वराज के बाद नंबर दो पर आ गई है।

‘‘गरीब कोटे‘‘ के कारण नए चव्हाण भी हैं संकट में
महाराष्ट्र के नए निजाम पृथ्वीराज चव्हाण पर भी अंधेरगर्दी, घोटाले की आंच आने लगी है। चव्हाण पर आरोप है कि उन्होनें बतौर सांसद अपने पद का दुरूपयोग कर आधा करोड़ मूल्य का एक फ्लेट महज चार लाख रूपए में खरीदा था। सूचना के अधिकार कार्यकर्ता ने इस बात का खुलासा करके ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया है। मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गाल्गली का दावा है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के वडाला क्षेत्र के भक्ति पार्क की बिल्डिंग नंबर 12 में पृथ्वीराज चव्हाण के नाम पर एक मकान है। सांसद चव्हाण को यह आवास ‘‘गरीब कोटे‘‘ में आवंटित किया गया है। 20 मई 2003 को चव्हाण केा यह फ्लेट आवंटित हुआ तब वे सांसद थे। चव्हाण द्वारा इस आवास के लिए जो दस्तावेज संलग्न किए गए थे, उसमें उनकी खुद की मासिक आय 76 हजार रूपए अर्थात नौ लाख बारह हजार रूपए सालाना और एक राशन कार्ड जो उनकी स्वर्गीय माता परमिलबाई दाजीसाहेब चव्हाण के नाम पर था, में पारिवारिक आय आठ हजार रूपए माहवार यानी लगभग एक लाख रूपए सालाना दर्शाई गई थी। कथित तौर पर बेदाग छवि के धनी समझे जाने वाले पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने नामांकन के दौरान दायर हलफनामे में भी इस फ्लेट का जिकर करना मुनासिब नहीं समझा था। कहा जा रहा है कि खुद दागदार मुख्यमंत्री क्या निर्वतमान दागदार नेता के काले कारनामों की जांच ईमानदारी से कर पाएगा।

‘‘राजा‘‘ को लेकर उबलने लगी है सियासत
टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में केंद्रीय संचार मंत्री ए.राजा के लिप्त होने के आरोपों के बाद विपक्ष ने अपनी बोथरी धार को पजाना आरंभ कर दिया है। विपक्ष चाहता है कि इस मामले में अव्वल तो राजा को हटाया जाए, फिर संयुक्त संसदीय समिति के जरिए इस पूरे घोटाले की जांच की जाए। पौने दो लाख करोड़ रूपयों के टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के सुर्खियों में बने रहने के बावजूद भी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के चेहरे पर शिकन भी नहीं दिख रही है। कांग्रेस अपने अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर चर्चा न कर यही साबित कर रही है कि उसे भ्रष्टाचार और घोटालों से बहुत अधिक लेना देना नहीं है। उधर द्रमुक राजा के बचाव में आगे आ रहा है। द्रमुख ने साफ कहा है कि सीबीआई जांच के नतीजे आने तक विपक्ष को धैर्य रखना चाहिए, साथ ही यह धमकी भी दी है कि अगर राजा को हटाया तो सात मंत्री त्यागपत्र दे देंगे। अन्नाद्रमुक की जयललिता ने कांग्रेस के सामने जलेबी लटकाई है कि अगर राजा को हटाया जाता है तो वे 18 सांसदों का समर्थन जुटाकर सरकार को गिरने से बचा लेंगी। कांग्रेस के रणनीतिकार पशोपेश में हैं क्योंकि राजा को हटाकर अगर जयललिता को साधा तो जयललिता की बारगेनिंग कांग्रेस को बहुत अधिक मंहगी पड़ने वाली है।

भाजपा की ओर बढ़ रहा है एनडी का रूझान
एक समय कांग्रेस की नाक का बाल रहे नारायण दत्त तिवारी अब कांग्रेस में ही बेगाना महसूस कर रहे हैं। उमर दराज हो चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तिवारी कांग्रेस के रवैए से अपने आप को आहत महसूस कर रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस के खेमे में यह बात गूंजने लगी है कि सालों साल कांग्रेस का झंडा मजबूत करने में जीवन गंवाने वाले कांग्रेसियों को उमर के आखिरी पड़ाव में राजनैतिक तौर पर असहाय होना पड़ रहा है। इस मामले में लोग पूर्व प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंहराव, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह, सुश्री विमला वर्मा, विद्याचरण शुक्ल आदि का उदहारण दे रहे हैं। इनके मौका परस्त अनुयायी और चाहने वालों ने भी दूसरे गुटों को साधने में देरी नहीं की है। बहरहाल हाल ही में उत्तराखण्ड के स्थापना दिवस पर आंध्र के पूर्व राज्यपाल एन.डी.तिवारी की मोजूदगी से इन कयासों पर बल मिला कि वे भाजपा की बांह थाम सकते हैं, किन्तु नारायण दत्त तिवारी को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे दलों से भाजपा में जाने वालों की सीनियारिटी भाजपा में जीरो से ही आंकी जाती है।

राजा और पटेल में समानता!
कांग्रेस के आला नेता इन दिनों कांग्रेस के दो ताकतवर महासचिवों, राजा दिग्विजय सिंह और अहमद पटेल के बीच समानताएं खोज रहे हैं। समानता नंबर एक दोनों ही नेता कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के सबसे करीब हैं। दो - दोनों ही नेताओं से कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी मशविरा लिया करते हैं। तीन - कांग्रेस के आला क्षत्रप भी दोनों ही नेताओं की देहरी पर सर रगडकर अपने आप को धन्य समझते हैं। चार - दोनों ही नेताओं ने अपने अपने गुर्गों को ताकतवर बनाकर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। पांच - दोनों ही नेताओं की नजरें तिरछी होने पर कांग्रेस के आला कमान की नजरें तिरछी होने में समय नहीं लगता। छः - दोनों ही नेताओं का सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का है। सात - दोनों ही नेताओं ने प्रदेश से निकलकर केंद्रीय राजनीति में कम समय में ही अपने आप को स्थापित कर प्रभावशाली जगह बनाई है। कांग्रेस मुख्यालय में एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि एक समानता आप भूले जा रहे हैं, जिस तरह अहमद पटेल ने गुजरात में कांग्रेस का बट्टा बिठाकर नरेंद्र मोदी को मजबूत किया है, उसी राह पर चलते हुए राजा दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश मंे कांग्रेस का बट्टा बिठाकर भाजपा की उन्नति के मार्ग प्रशस्त किए हैं।

चर्चा में है भूतल परिवहन मंत्रालय!
यह बात तो सच है कि मूलतः उद्योगपति राजनेता कमल नाथ जिस किसी भी विभाग में मंत्री रहे हैं, वह विभाग चर्चाओं में आ ही जाता है। वन एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए पृथ्वी सम्मेलन में भारत की जोरदार उपस्थिति से उन्होंने तालियां बटोरी थीं। इसके बाद पदावनत होते हुए वस्त्र मंत्रालय संभाला, तब भी उनका मंत्रालय चर्चाओं में रहा। पिछली मर्तबा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का प्रभार संभालते हुए उन्होंने विदेश यात्राओं का खासा रिकार्ड कायम कर दिया, किन्तु अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा और मध्य प्रदेश की झोली सूनी ही रखी। अब भूतल परिवहन मंत्रालय जमकर चर्चा में है। सड़क परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय संबंधी संसदीय स्थाई समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों की सुस्त कार्यप्रणाली पर जमकर फटकार लगाई है। दरअसल मोटर वाहन अधिनियम के संशोधन को लेकर समिति ने विभाग को विरोध, शिकायतें और सुझाव भेजे थे। अधिकारियों ने इसका माकूल जवाब देना उचित नहीं समझा। समिति ने इसे अपनी तौहीन बताया है। समिति ने परिवहन सचिव को कहा है कि अब तक की गई तमाम कार्यवाही को लिखित तौर पर समिति के समक्ष पेश किया जाए।

यह है शिव के हाल में प्रजा का हाल सखे!
देश का हृदय प्रदेश कहलाता है मध्य प्रदेश। 2003 से इस प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का कथित सुशासन और राम राज्य चल रहा है। सबसे पहले उमा भारती फिर बाबूलाल गौर और अब पिछले लगभग पांच सालों से शिवराज सिंह चौहान इस सूबे के निजाम हैं। मध्य प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति अत्यंत जर्जर है। लूट, हत्या, मारपीट, बलवा न जाने कितने तरह के अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा है। छतरपुर में एक कैदी को पेशी पर ले जाने के दौरान सिपाही शराब पीते हैं, नशे में धुत्त सिपाहियों को चकमा देकर कैदी फरार हो जाता है। भोपाल की जिला अदालत की दीवार तोड़कर ग्यारह कैदी दिन दहाड़े भाग जाते हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार होते हैं, प्रताडित होती रहतीं हैं, पर सुशासन होने का दावा बदस्तूर जारी है। आश्चर्य तो तब होता है, जब कांग्रेस इस मामले में मौन साधे हुए मिलती है। चर्चा है कि एम पी में कांग्रेस और भाजपा के बीच अंडर टेबिल समझौते हुए हैं। हद तो तब हो गई जब संघ के धरने के दरम्यान चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था के बीच राजधानी भोपाल में आठ स्थानों पर महिलाओं की चेन लूट ली गई। पुलिस के अफसर भी क्या करें, उनके मातहत सिपाही सारा दिन कबाडियों के पास जाकर चोरी के माल की चौथ वसूली जो करते रहते हैं।

धक्का किसने दिया तलाश रहे हैं राजूखेड़ी
पुरानी कहानी है कि एक अखाड़े में पहलवान ताल ठोंककर लोगों को लड़ने के लिए बुला रहा था, ईनाम था एक हजार रूपए। इतने में एक जवां मर्द अखाड़े में कूद गया और उस नामी पहलवान को हराकर एक हजार रूपए ले आया। सबसे पहले उसने यह मालूमात करने की कोशिश की कि आखिर अखाड़े में उसे धक्का किसने दिया था, यह तो गनीमत थी कि वह बच गया वरना उसका राम नाम सत्य तय था। इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के पद के लिए मीडिया में नाम उछलने के बाद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी यह ढूंढ रहे हैं कि आखिर मीडिया में उनका नाम किसने उछाल दिया। अमूमन होता यही है कि जिसे भी कतार से हटाना होता है उसके नाम को हवा में उछाल दिया जाता है। दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले मीडिया पर्सन्स के फोन बार बार राजूखेड़ी को बधाई दे रहे हैं। वे असमंजस में हैं कि अभी तक उन्हें कोई सूचना नहीं पर नाम चल पड़ा है, आखिर गोदे (अखाड़े) में उन्हें धक्का किसने दिया। उधर कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह और बी.के. हरिप्रसाद ने अलग से उनका स्पष्टीकरण मांग कर उन्हें हलाकान कर रखा है।

पुच्छल तारा
देश के हृदय प्रदेश में चेन स्नेचिंग अर्थात सरे राह महिलाओं की चेन लूटने की घटनाओं से आहत हैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की महिलाएं। भोपाल से मुस्कान मलिक ने इस बारे में एक ई मेल भेजा है। मुस्कान लिखती हैं कि आधुनिक बहू के कम कपड़े और अश्लीलता के दिखावे को देखकर पुराने ख्यालों वाली उसकी सास ने कहा -‘‘बहू, क्या जमाना आ गया है, हम जब आए थे तब . . . .। वैसे लज्जा नारी का ‘आभूषण‘ होता है।‘‘ बहू तपाक से बोली -‘‘लेकिन मां जी, आजकल चेन स्नेचिंग इतनी ज्यादा हो रही है, गुण्डागर्दी चरम पर है, महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं पता है आपको? अब आप ही बताईए कि इन हालातो में भला कोई महिला ‘आभूषण‘ पहनने का साहस कर पाएगी?‘‘