सोमवार, 23 नवंबर 2009

बालाघाटी ठाकरे किस हक से मुंबई पर अधिकार जताते हैं!

बालाघाटी ठाकरे किस हक से मुंबई पर अधिकार जताते हैं!

(लिमटी खरे)


कांग्रेस के शक्तिशाली महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह ने महाराष्ट्र पर जातिवाद और क्षेत्रवाद का कहर बरपाने वाले बाला साहेब ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे के मुंबईया होने पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एक धमाका कर दिया है।


बकौल राजा दिग्विजय सिंह, बाला साहेब ठाकरे मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले के मूल निवासी हैं। इस लिहाज से वे मुंबईकर नहीं हैं। दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश पर दस साल लगातार राज किया है, इस लिहाज से उनकी जानकारी गलत नहीं मानी जा सकती है।


यह बात सच है कि मुंबई के बाहर वालों पर आतंक बरपाने वाले ठाकरे ब्रदर्स ही अगर मुंबई के मूल निवासी नहीं हैं, तो वे किस अधिकार से मुंबई को आपली मुंबई कहकर मराठा मानुष को भडका रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो ठाकरे ब्रदर्स मुंबई के लिए उसी तरह के प्रवासी हैं, जिस तरह अन्य लोग बाहर से जाकर मुंबई में बसे हैं।


मराठी मूल के ठाकरे ब्रदर्स अगर वाकई अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने कृत संकल्पित हैं, तो उन्हें सबसे पहले मध्य प्रदेश और बालाघाट जिले के लिए कुछ करना चाहिए। वस्तुत: ठाकरे ब्रदर्स एसा करेंगे नहीं क्योंकि एसा करने से उन्हें राजनैतिक तौर पर कुछ लाभ होने वाला नहीं है।


मध्य प्रदेश के इंदौर में आयोजित मछुआरों के सम्मेलन में दिग्विजय सिंह ने यह रहस्योद्घाटन किया। वैसे देखा जाए तो मुंबई मूलत: कोलियों और मछली पकडकर जीवन यापन करने वाले मछुआरों का शहर है, जिस पर बाद में पारसी और गुजरातियों ने अपना वर्चस्व बना लिया था।


नब्बे के दशक में शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने मराठा कार्ड चलकर आतंक बरपाया और मुंबई पर कब्जा कर लिया। कांग्रेस ने अपने नफा नुकसान को देखते हुए बाला साहेब को आतंक बरपाने की पूरी छूट दी थी, जिसका नतीजा है ठाकरे ब्रदर्स का जातीवाद और क्षेत्रवाद के नाम पर होने वाला तांडव।


राज ठाकरे जब बाला साहेब ठाकरे के मातोश्री की मांद से बाहर निकले तब बाला साहेब को कमजोर करने के लिए सियासतदारों ने एक बार फिर वही पुरानी चाल चली और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जनक राज ठाकरे को आतंक बरपाने की पूरी छूट दे दी।


ठाकरे ब्रदर्स ने मुंबई में उत्तर भारतीयों का जीना मुहाल कर रखा है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कल तक सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को कोसने वाले ठाकरे ब्रदर्स की तोप का मुंह अब मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर पर आकर टिक गई है।


यह सच है कि धन दौलत और शोहरत उगलने वाले क्रिकेट पर मुंबई का कब्जा रहा है, पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि शेष भारत के खिलाडियों को इस खेल को खेलने का कोई हक नहीं है। बाला साहेब ठाकरे एण्ड कंपनी सचिन को मराठों को आगे नहीं बढाने पर लानत मलानत भेज रहे हैं, जिसकी चहुंओर तीखी प्रतिक्रिया है। ठाकरे का अगर बस चले तो वे क्रिकेट जेसे लोकप्रिय खेल को मुंबई की बपौती बना डालें।


इस सब विवाद के चलते पहली बार कांग्रेस की ओर से कोई बयान आया है, वह भी कांग्रेस की आधुनिक राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले दिग्विजय सिंह का। दिग्गी राजा ने ``बात निकली है तो दूर तलक जाएगी`` की तर्ज पर बाला साहेब ठाकरे के खिलाफ मोर्चा खोला है, वरना इस मामले में प्रदेश और केंद्र में बैठी कांग्रेस बेकफुट पर ही नजर आ रही है।


समूचे महाराष्ट्र में वेमनस्य फैलाने का काम करने वाले ठाकरे ब्रदर्स का ``सामना`` का प्रकाशन प्रतिबंधित कर देना चाहिए। शिवसेना और मनसे का आतंक इतना अधिक है कि सामना में छपे आलेखों को महाराष्ट्र में किसी निजाम के फरमान से कम नहीं माना जाता है।


मुंबई के हालात देखकर लगता है मानो 1947 में भारत देश आजाद हुआ है पर इस अखण्ड भारत के नक्शे में मुंबई नहंी है। भारत गणराज्य का कानून देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में लागू नहीं होता है। मुंबई में चलता है ठाकरे ब्रदर्स का अपना कानून। यह है पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा और राजीव गांधी के सपनों का इक्कीसवीं सदी का भारत, जिस पर नेहरू गांधी खानदान की चौथी और पांचवीं पीढी राज कर रही है।


बहरहाल अगर दिग्विजय सिंह सच कह रहे हैं कि बाला साहेब ठाकरे का परिवार मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का मूल निवासी है तो निश्चित तौर पर बालाघाट के निवासी फक्र के बजाए अपने आप को शर्मसार पा रहे होंगे कि महाराष्ट्र प्रदेश को अलगाववाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद की आग में झोंकने वाले ठाकरे ब्रदर्स बालाघाट की भूमि पर पैदा हुए हैं।

आडवाणी की गत से घबराए युवराज

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)





आडवाणी की गत से घबराए युवराज


अंतत: कांग्रेस की नजर में भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी  ने यह कह ही दिया है कि उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री न मानें। कांग्रेसियों के अतिउत्साह के चलते कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री प्रचारित किया जा रहा है। राहुल गांधी को दूसरी बार अपनी छवि बचाने के लिए सामने आना पडा है। इसके पहले राहुल ने खुद को युवराज कहने पर आपत्ति जताई थी। राहुल गांधी के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि राहुल को यह कदम इसलिए उठाना पडा है क्योंकि वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के ``पीएम इन वेटिंग`` लाल कृष्ण आडवाणी की गत देख चुके हैं, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया है। गौरतलब होगा कि अतिउत्साह और महात्वाकांक्षा के चलते पिछले लोकसभा चुनावों में एल.के.आडवाणी को राजग ने प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया था। वे 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को अपना आशियाना तो नहीं बना पाए पर अपनी छवि पर खासा बट्टा अवश्य ही लगवा लिया। आडवाणी की इस तरह हुई दुर्गत से राहुल गांधी के कान खडे हो गए और उन्होंने अपने आप को पीएम इन वेटिंग की लाईन से प्रथक करने की मंशा जता ही दी।


मयखाना दिखता है मध्य प्रदेश के अक्स में
मध्य प्रदेश के सूबेदार शिवराज सिंह चौहान दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में आए और कहा कि अगले साल मध्य प्रदेश के मण्डप में मध्य प्रदेश का अक्स दिखने की बात कही। मध्य प्रदेश के मण्डप का उन्होंने अवलोकन किया। इतिहास में संभवत: यह पहला मौका होगा जब एमपी के पेवेलियन में शराब के स्टाल को भी स्थान दिया गया हो। एम पी पवेलियन में केंद्रीय आदिवासी विकास मंत्री कांतिलाल भूरिया के संसदीय क्षेत्र रतलाम के ग्राम टिटारी में पटेल वाईन और फ्रूट प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज द्वारा बनाई जाने वाली वाईन की बाटल्स को भी प्रदर्शित किया गया है। 12 फीसदी से अधिक एल्कोहल वाली एम्बी वाईनयार्डस के नाम से बाजार में उपलब्ध इस वाईन को इसमें स्थान दिया जाना आश्चर्यजनक ही है। एक ओर शराब को सामाजिक बुराई माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा देश की राजनैतिक राजधानी में लगने वाले इस महत्वपूर्ण मेले में शराब को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यही है श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय के आदशोZं पर चलने वाली भाजपा का एक चेहरा!



नाश्ते में देरी से बिफरीं सैलजा!
देश के जनसेवक भले ही सादगी और मितव्ययता का राग अलापते रहें किन्तु असल जिंदगी में वे कितने निष्ठुर और गुस्सैल होते हैं, इसका उदहारण केंद्रीय गरीबी उन्नमूलन मंत्री सैलजा ने दे दिया है। बीते दिनों वे हरियाणा में हांसी के एक रेस्ट हाउस पहंची। उनके स्टाफ ने पहले ही वहां तैनात नायब तहसीलदार हनुमान सिंह को संदेशा भिजवा दिया था कि मदाम और उनका लाव लश्कर वहां ब्रेक फास्ट लेगा। सैलजा प्रात: 9 बजे विश्राम गृह पहुंची तो नाश्ते में विलंब को देखकर भडक गईं और गुस्से में बिना नाश्ता किए ही वहां से रफत डाल दी। दरअसल सैलजा शायद भूल गईं कि वह विश्राम गृह था आईटीडीसी का कोई होटल नहीं जहां हर समय गर्मा गरम नाश्ता तैयार मिलता है। बाद में सैलजा ने एसडीएम को तलब किया। एसडीएम ने लाख समझाने की कोशिश की कि वे भी नाश्ता छोडकर ही आए हैं, पर उन्होंने एक न मानी और बिना नाश्ता किए ही वहां से रवानगी डाल दी।



कब फेंटेंगी राजमाता अपने पत्ते
कांग्रेस में संगठन स्तर पर फेरबदल की चर्चाएं गाहे बगाहे चल ही पडती हैं। एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत पर चलने वाली कांग्रेस में अनेक एसे नेता मौजूद है, जो संगठन में भी महत्वपूर्ण पद पर हैं, और सरकार में मलाईदार पद पर। कांग्रेस में फेरबदल की सुगबुगाहट एक बार फिर आरंभ हो गई है। पूर्व मे जब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने मंत्री पद को ठोकर मार दी थी, तब माना जा रहा था कि सरकार में शामिल अनेक मंत्रियों को सत्ता या संगठन में से किसी एक को चुनना पडेगा, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। मजे की बात तो यह है कि राहुल गांधी के इस फैसले को सभी से मुक्त कंठ से सराहा पर अमली जामा पहनाने की जब बात आई तो सभी ने चुप्पी साध ली। अगले माह 9 तारीख को कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अपना जन्मदिन मनाने जा रहीं हैं। कांग्रेस की मितव्ययता की नौटंकी में मीडिया की निगाहें उनके जन्म दिन पर भी हैं। हाल ही में कांग्रेस के एक शक्तिशाली मंत्री ने अपना जन्म दिन धूमधाम से मनाकर मितव्ययता का माखौल उडाया है। माना जा रहा है कि सोनिया गांधी अपने ताश के पत्ते जन्म दिन के उपरांत ही फेंट पाएंगी।



प्रचार से दूर रहेंगी महारानी
भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को नाकों चने चबवाने वाली राजस्थान की महारानी वसुंधरा राजे की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई है। बयानबाजी से खफा वसुंधरा ने अब सूबे के स्थानीय निकायों के चुनावों से खुद को अलग थलग रखने का फैसला कर लिया है। राजे के इन तेवरों से भाजपा नेतृत्व सकते में है। गौरतलब होगा कि पूर्व में टोडाभीम उपचुनावों में राजे ने नादौती क्षेत्र का दौरा किया था जहां से भाजपा को खासी बढत मिली थी। राजस्थान की सत्ता से राजे अवश्य उतर गईं हों पर सूबे में उनकी पूछ परख में कमी नहीं आई है। टोडाभीम चुनावों में भाजपा की जीत का सेहरा बांधने को लेकर प्रदेश भाजपा और राजे खेमे में ठन गई है। प्रदेशाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी संकेत दिए थे, कि यहां की भाजपा की जीत किसी बडे नेता के कारण नहीं हुई है। राजे के करीबी सूत्रों का कहना है कि अनर्गल बयानबाजी और जीत के श्रेय को लेकर मची जंग से बुरी तरह आहत हैं, राजस्थान की महारानी।



बढ रहा है युवा तुर्क का ग्राफ
कांग्रेस में युवा तुर्क के नाम से पहचान बनाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता का ग्राफ दिनों दिन बढता ही जा रहा है। अस्सी के दशक में मध्य प्रदेश में कुंवर अर्जुन सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी तो नब्बे के दशक में कमल नाथ ने अपना सिक्का चलाया। अब दोनों ही नेता उमर दराज होने जा रहे हैं, तब मध्य प्रदेश में कांग्रेसियों की निगाहें केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को ताक रहीं हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की तर्ज पर अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गांव में रात बिताना आरंभ कर दिया है। राहुल गांधी से एक कदम आगे बढकर महलों में बडे ही लाड प्यार से पले बढे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने न केवल झोपडी में रात बिताई वरन् रोटी भी पकाई और बच्चों को पढाया भी। इतना ही नहीं किसानों को बिठाकर खुद ही ट्रेक्टर चला गांव वालों के दिलों में जगह बना ली सो अलग। सिंधिया का पीआर सिस्टम भी जबर्दस्त है, तभी तो उनके इस कदम को नेशनल लेबल पर मीडिया ने हाथों हाथ लिया।



शिवराज, रमन की राह पर मुंडा
छत्तीसगढ में सुसाशन आया हो या नहीं पर ढाई रूपए किलो चावल की घोषणा ने रमन सिंह को दुबारा मुख्यमंत्री बना दिया। अब झारखण्ड में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मण्डा भी रमन सिंह की राह पर चल दिए हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाडली लक्ष्मी की तर्ज पर झारखण्ड में भी लाडली लक्ष्मी को लागू करने का एलान किया है। मुंडा ने दावा किया है कि अगर राज्य में भाजपा सत्ता में आई तो लोगों को एक रूपए किलो चावल और चार आने किलो में नमक मिलेगा। अपना घोषणा पत्र जारी करते समय राज्य की भाजपा ने छत्तीसगढ के निजाम रमन सिंह को तो आमंत्रित कर लिया किन्तु मध्य प्रदेश की लाडली लक्ष्मी योजना के जनक शिवराज सिंह चौहान से पर्याप्त दूरी बनाकर रखी है, जिसे लेकर सियासी गलियारों में अब तरह तरह की चर्चाएं आम हो गईं हैं।



फिर बोले थुरूर साहेब
केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर और विवादों का अच्छा खासा नाता है। पांच सितारा होटल में रूककर चर्चाओं में आए थुरूर ने होटल का लाखों का बिल अब तक सार्वजनिक नहीं किया है। फिर सोशल नेटवकिंग वेवसाईट पर सेलीब्रिटीज की तरह लोगों से सवाल जवाब के चलते उनकी किरकिरी हुई। अब वन्दे मातरम विवाद पर उन्होंने अपनी राय भी व्यक्त कर दी है। तिरूवनंतपुरम में सीएसआई चर्च में लोगों से रूबरू थुरूर का मानना था कि वन्देमातरम को वेकल्पिक बना देना चाहिए। पिछले दिनों जमात ए उलेमा हिन्द में वन्दे मातरम को लेकर एक फतवे के बाद उपजे विवाद में थुरूर की मंशा निश्चित तौर पर आग में घी का ही काम करेगी। बार बार नसीहतों के बाद भी विवाद थुरूर का पीछा नहीं छोड रहा है। वैसे भी थुरूर कह ही चुके हैं कि उनके उपर काम का खासा बोझ है। प्रधानमंत्री एम.एम.सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी हैं, कि उनका बोझ कम करने को तैयार ही नहीं।



साजन संग जाएंगी प्रतिभा
देश की पहली महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल 25 नवंबर को सुखोई 30 की सवारी करने वालीं हैं। प्रतिभा पाटिल को लेकर उडने वाले पायलट का नाम है साजन सिंह। साजन के साथ प्रतिभा ताई आसमान का सीना चीरकर भारतीय सेना की पहली महिला सर्वोच्च कमांडर बन जाएंगी। प्रतिभा ताई की इस यात्रा के चलते 24 नवंबर से 16 नवंबर तक पूना का लेहगांव स्थित हवाई अड्डा सामान्य उडानों के लिए बंद कर दिया जाएगा। गौरतलब होगा कि पूना में रोजाना 38 विमान आते जाते हैं। इस दौरान हवाई यात्रा करने वालों को अब रेल या सडक मार्ग से ही पूना जाना होगा।



सोशल नेटविर्कंग बनी अनैतिक व्यापार का साधन
इंटरनेट की सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट्स इन दिनों अनैतिक व्यापार का अड्डा बनती जा रहीं हैं। इन वेव साईट्स पर गर्म गोश्त (देह व्यापार) की कम्यूनिटीज की न जाने कितनी शिकायतें हैं। अब दिल्ली के आबकारी महकमे ने ``विस्की ऑन व्हील्स`` नामक कम्यूनिटी से शराब के अवैध कारोबार का पर्दाफाश किया है। इस कम्यूनिटी में लिखा था कि वे लोग निजी या पार्टी में उपयोग के लिए किसी भी समय कहीं भी शराब मुहैया करवाते हैं। इसके जरिए तस्करों द्वारा महंगी अवैध शराब घरों घर तक पहुंचाने का काम किया जाता था। मजे की बात तो यह है कि यह सब कुछ ``फेसबुक`` और ``आरकुट`` जैसी वेव साईट पर हो रहा था, फेसबुक में कथित प्रशंसकों से सवाल जवाब के चलते विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर विवादों में घिरे थे।



ठाकरे के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा
महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार और केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार मनसे चीफ राज ठाकरे के भडकाउ रवैए को लेकर उनके खिलाफ मुकदमा कायम करने से हिचक रही हो पर उत्तर प्रदेश के हरदोई की एक अदालत में राज ठाकरे और मनसे के चार विधायकों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हो गया है। इस अदालत में सपा विधायक अबू आजमी के द्वारा हिन्दी में शपथ लेने पर हुई मारपीट के चलते मनसे चीफ राज ठाकरे, विधायक रमेश बांजले, राम कदम, बसंत गीते एवं शिशिर शिंदे पर हरदोई के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा कायम किया गया है। माना जा रहा है कि इसमें साक्ष्य के दौरान राज सहित चारों विधायकों को हरदोई में उपस्थिति देनी पड सकती है।



भोपाल गैस हादसे को विस्मृत किया मनमोहन ने
लगता है कि अमेरिका के दबाव में आकर केंद्र की मनमोहन सिंह सराकर ने भोपाल गैस त्रासदी जैसे अविस्मरणीय हादसे को भूल गई है। हाल ही में केबनेट (मंत्रीमण्डल की बैठक) में वजीरे आजम एम.एम.सिंह ने सिविल न्यूिक्लयर लाईबिलटी विधेयक को मंजूरी दे दी है। इसे अगर संसद ने पास कर दिया तो किसी भी परमाणु दुघZटना की स्थिति में मुजावजा 25 सौ करोड से अधिक नहीं होगा। इसके बाद अमेरिकी कंपनियों को भारत में रिएक्टर निर्माण और स्थिापित करने के मार्ग भारत में प्रशस्त हो जाएंगे। इसमें होने वाली दुघZटना की क्षतिपूर्ति में उन कंपनियों को बडी रियायत हो जाएगी। 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में डाव कंपनी को जो मुआवजा देना पड रहा है वह 25 सौ करोड से कहीं अधिक है। माना जा रहा है कि मनमोहन की अमेरिका यात्रा के पहले अमेरिकी रिएक्टर सप्लाई लाबी के लिए मनमोहन सिंह ने यह तोहफा दिया है। गौरतलब बात तो यह है कि परमाणु हादसे के दुष्प्रभाव दूरगामी होते हैं।



आशाराम बापू फिर सुर्खियों में
केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की कर्मस्थली मध्य प्रदेश के छिंदवाडा जिले में आशाराम बापू एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं। स्वयंभू आध्याित्मक गुरू आशाराम बापू के छिंदवाडा स्थिति आश्रम के गुरूकुल में एक शिक्षिका की रहस्यमय हालत में मौत हो गई है। पुलिस के अनुसार उक्त शिक्षिका संध्या चौरसिया के शव पर कोई चोट के निशान नहीं थे, वहीं पीएम रिपोर्ट बयां कर रही है कि उसकी मौत आंतरिक चोटों के कारण हुई। उसके कपडे भी जगह जगह से फटे हुए थे। गौरतलब होगा कि इसके पूर्व इसी गुयकुल में पढने वाले दो बच्चों की पिछले साल संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। एक के बाद एक रहस्यमय मौत से चर्चाओं में आए आशाराम बापू के आश्रम में इस घटना को लेकर तरह तरह की चर्चाएं व्याप्त हो गईं हैं।



थपडयाए आजमी अब सीख रहे मराठी!
मराठी में शपथ न लेने के कारण मनसे विधायकों की गुण्डा गदीZ का शिकार हुए समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आजमी अब मराठी सीखने का जतन कर रहे हैं। पूर्व सांसद आजमी यह पहली बार मराठी सीखने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसके पूर्व उन्होंने पांच साल पहले भी एक मराठी शिक्षक रखकर मराठी जुबान सीखने की नाकाम कोशिश की थी। आजमी भले ही अगले साल टीवी पर राज ठाकरे से मराठी जुबान में परिचर्चा के कारण मराठी सीखने की बात कह रहे हों पर सियासी गलियारों में चर्चा है कि राज ठाकरे के आतंक से अबू आजमी भयाक्रांत हैं, और मराठी सीखकर वे राज ठाकरे को प्रसन्न करने का प्रयास कर रहे हैं।



गन्ना विवाद ने उडाई सोनिया की नींद
गन्ना के मूल्य विवाद का मुद्दा विपक्ष के हाथों में जाने से कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ में अफरा तफरी का आलम है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी इसके लिए प्रधानमंत्री एम.एम.सिंह से खासी नाराज बताई जा रहीं हैं। दिल्ली को हिला देने वाले विशाल प्रदर्शन से सोनिया गांधी खुद भी हिल गईं हैं। बताया जाता है कि इसके लिए उन्होंने पीएम को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, गृह मंत्री पी.चिदम्बरम और कानून मंत्री वीरप्पा माईली के साथ बैठकर बात करने को कहा। सूत्रों के अनुसार पीएम के साथ जब ये नेता सर जोडकर बैठे तब पीएम ने कहा कि जब हम किसानों का 70 हजार करोड माफ कर सकते हैं, तो गन्ना अधिक मूल्य पर क्यों नहीं खरीद सकते। इस पर वित्त मंत्री ने शुगर लाबी के कथित संरक्षक केंद्रीय कृषि मंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि इस मसले में शरद पवार के मंत्रालय को एहतियात बरतते हुए कदम उठाने चाहिए। कुल मिलाकर शरद पवार की कूटनीतिक चाल के चलते इस मुद्दे पर बिखरे विपक्ष को एक होने का मौका मिला जो सोनिया गांधी को गवारा नहीं गुजर रहा है।



पुच्छल तारा
दिल्ली में अतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले के चलते चहुं ओर जाम ही जाम है। सडकों पर फर्राटे भरने वाली गाडियां चीटियों के मानिंद रेंग रहीं हैं। किसी ने सच ही कहा है कि मयखाने के ``जाम`` से मदहोशी छाती है, और दिल्ली के ट्रेफिक ``जाम`` से बेहोशी।

रविवार, 22 नवंबर 2009

कुछ तो शर्म करते चव्हाण साहेब


कुछ तो शर्म करते चव्हाण साहेब




(लिमटी खरे)





शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के बाद उनके भतीजे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चीफ राज ठाकरे ने भाषावाद और प्रांत वाद की बलिवेदी पर अपनी राजनैतिक बिसात तैयार की है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। दिल्ली में तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने वाली शीला दीक्षित, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ भी क्षेत्रवाद के हिमायती ही दिख रहे हैं, जिन्होंने अपने अपने सूबों के लोगों को ज्यादा रोजगार देने की वकालत की है।




क्षेत्रीयता के इस जहर को आगे बढाते हुए अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने भी राज ठाकरे के सुर में सुर मिला दिया है। राज्य में जनाधार बढाने के लिए चव्हाण ने अब रेल मंत्री ममता बनर्जी से अपील की है कि रेल्वे में ``मराठी मानुष`` का विशेष ख्याल रखा जाए, उन्हें वरीयता के हिसाब से नौकरी प्रदान की जाए।




इसके पहले चव्हाण ने रेल्वे की परीक्षाओं में महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हुए हमले के मद्देनजर ममता बनर्जी से आग्रह किया था कि रेल्वे की परीक्षाएं स्थानीय भाषाओं में कराई जाएं। रेल मंत्री ने ममता दिखाते हुए चव्हाण की अपील मान ली थी।




भाषावाद का जहर उगलने वाले राज ठाकरे पर किसी ने भी शिकंजा कसने का उपक्रम नहीं किया है। आजाद भारत का इससे बडा दुर्भाग्य और कुछ नहीं कहा जा सकता जहां देश की मातृभाषा, और राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हिन्दी की सरेआम चिंदी उडाई जा रही हो। जहां हिन्दी में विधानसभा में शपथ लेने पर एक जनसेवक द्वारा जनता के चुने नुमाईंदे को थप्पड मारे जाएं।




आपला मानुष के नाम पर सियासत कहां तक उचित है। अगर राज और बाल ठाकरे के इन अश्वमेघ यज्ञ के घोडों को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में समूचा हिन्दुस्तान इसकी आग में बुरी तरह झुलसा ही नजर आएगा, इस बात में कोई शक नहीं है।




बाला साहेब ठाकरे और राज ठाकरे के बुलंद होसलों के चलते इनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका है। अब इन्हीं से प्रेरणा लेकर अन्य राजनेता भी क्षेत्रवाद की राजनीति पर उतर आए हैं। पहले उत्तर प्रदेश मूल की निवासी और दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित ने यूपी और बिहार को कोसा। फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सतना में मध्य प्रदेश के लोगों को नौकरी ज्यादा देने की बात पर विवाद खडा कर दिया।




तेरी साडी मेरी साडी से सफेद कैसे की तर्ज पर केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने भी मध्य प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर में मध्य प्रदेश मूल के लोगों को राज्य में अधिक रोजगार मुहैया कराने का शिगूफा छोड दिया। सवाल तो यह है कि इन राजनेताओं की जबान पर लगाम लगाए तो आखिर कौन!




राज ठाकरे की गुण्डागदीZ तो देखिए, मनसे ने धमकाया की कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी), बांबे स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) की वेव साईट पर सूचनाएं मराठी में उपलब्ध कराई जाएं। ठाकरे ब्रदर्स के आक्रमक रवैऐ के आगे सेबी और बीएसई दोनों ही झुक गए और आ गईं सूचनाएं मराठी भाषा में।




भारत गणराज्य में कर किसी को अपना धर्म, भाषा आदि मानने की स्वतंत्रता है, पर किसी को आप मार मार कर मुसलमान तो नहीं बना सकते। भारत के संविधान को अक्षुण रखने की सौगंध उठाने वाले जनता का जनादेश प्राप्त और पिछले रास्तों से संसद या विधानसभा की दहलीज पर पहुंचने वाले ``जनसेवक`` आखिर इन आताताईयों के आगे झुकने पर मजबूर क्यों हैं।




जनवरी और फरवरी 2008 में राज ठाकरे के गुंडों ने महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को तबियत से धुना। 04 फरवरी 2008 को फिर ये गुंडे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के घर तोडफोड करने पहुंच गए। 19 अक्टूबर 08 को मंबई के रेल्वे स्टेशनों पर मनसे के गुंडों ने रेल्वे की परीक्षा देने आए उत्तर भारतीयों को बुरी तरह पीटा। इस साल 9 नवंबर को विधानसभा में अबू आजमी को मनसे विधायकों ने पीटा। मनसे ओर शिवसेना के गुर्गों की गुण्डई फिर भी नहीं रूकी। गत 20 नवंबर को मुंबई में आईबीएन 7 समाचार चेनल के कार्यालय में शिवसेना के गुण्डों ने तांडव मचाया।




यह सब कुछ उसी सूबे में हो रहा है जिसके निजाम कोई ओर नहीं अशोक चव्हाण खुद हैं। हमारे मतानुसार आशोक चव्हाण को कुछ तो शर्म करना चाहिए। शिवसेना चीफ एक बार फिर हुंकार भर रहे हैं कि मीडिया भगवान नहीं है। वह हिटलर हो गया है। उन्होंने कहा कि अगर दुबारा उनकी आलोचना हुई तो फिर हमले हो सकते हैं।




बाला साहेब ठाकरे के इस कथन से हम आंशिक तौर पर सहमत हैं कि मीडिया कुछ जगहों पर हिटलर की भूमिका में आ गया है, इसका कारण मीडिया का कार्पोरेट हाथों में जाना है। अपने निहित स्वार्थों के लिए अब उद्योगपतियों में मीडिया मुगल बनने का भूत सवार हो गया है।




किन्तु अगर ठाकरे यह कह रहे हैं कि उनकी दोबारा आलोचना होगी तो हमले फिर से हो सकते हैं। तो इस बात से हम इत्तेफाक नहीं रखते। यह तो सरेआम धमकी है प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के लिए। हमारी अपनी राय में तो इस बीमारी को समूल नष्ट करने के लिए मीडिया को एक जुट हो जाना चाहिए और राज ठाकरे और बाला साहेब ठाकरे जैसे जहर फैलाने वाले तत्वों का सोशल बायकाट कर देना चाहिए।




शनिवार, 21 नवंबर 2009

ठाकरे बंधुओं की लौंडी बन गई है कानून व्यवस्था!


ठाकरे बंधुओं की लौंडी बन गई है कानून व्यवस्था!



(लिमटी खरे)





देश के संपन्न सूबे में शामिल महाराष्ट्र प्रदेश में शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे और उनसे टूटकर अलग हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख एवं आतंक का पर्याय बन चुके राज ठाकरे एक के बाद एक ज्यादती पर उतारू हैं, किन्तु सूबे पर काबिज कांग्रेस और केंद्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार मूक दर्शक बन सब कुछ देख सुन रही है।


कभी गैर मराठियों पर आतंक की लाठी ठोंकते तो कभी मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को ही सरेआम धमकी दे डालते। यहां तक कि राज ठाकरे ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर तक के सामने सरेआम ताल ठोंक दी। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को तक नहीं बख्शा कथित मराठियों के हितों को साधने वाले इन ठेकेदारों ने।


हद तो तब हो गई जब महाराष्ट्र की विधानसभा में समाजवादी पार्टी के चुने हुए विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने पर सरेआम थप्पड मारे गए। समूचे देश ने इसे मीडिया के माध्यम से देखा। नहीं देखा तो देश के चुने हुए ``जनसेवकों`` ने। अगर देखा होता तो निश्चित तौर पर इन आतंक के पर्याय बन चुके समाज के दुश्मनों पर कार्यवाही करने का माद्दा रखते।


गत दिवस एक निजी समाचार चेनल के मुंबई और पुणे स्थित कार्यालय में शिवसेनिकों द्वारा कथित तौर पर की गई तोड़फोड के बाद लोगों के जेहन में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर शासन और प्रशासन इस तरह की सरेआम गुण्डागदीZ करने वाले तत्वों को खुला कैसे छोड देता है।


आजादी के बाद अस्तित्व में आए भारत गणराज्य के विभिन्न प्रदेशों में सरकरोें द्वारा अलग अलग नजरों से कानून को देखा जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि उत्तर प्रदेश में भडकाउ भाषण देने पर नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढी के भाजपाई वरूण गांधी को रासुका में नजर बंद कर उनके खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता के तहत कार्यवाही की जाती है, वहीं दूसरी ओर भाषा के आधार पर देश को बांटने वाले ठाकरे बंधुओं के खिलाफ महाराष्ट्र सरकर कार्यवाही करने से न जाने क्यों हिचकती रही है।


भाषा और प्रांतवाद की आग में समूचा महाराष्ट्र प्रदेश सुलग रहा है। उत्तर भारतीय इस सूबे से एक एक कर छिपकर भागने पर मजबूर हैं। उत्तर भारतीय नेता शिवसेना और मनसे के नेताओं के साथ नूरा कुश्ती खेलकर अपनी सियासत चमका रहे हैं। कुल मिलाकर हालात देखकर बुंदल खण्ड की एक कहावत चरितार्थ होती दिख रही है ``नउआ सीखे नाउ को, मूड कटे गंवार की`` अर्थात नाई तो अपने उस्तरे चलना सीख रहा है, पर सिर तो गांव के गंवार का ही कट रहा है।


ठीक उसी तरह से महाराष्ट्र में बाला साहेब ठाकरे और राज ठाकरे के साथ ही साथ मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान अपनी अपनी चालेंं चल रहे हैं, किन्तु अंततोगत्वा मरण तो सूबे में नौकरी करने वाले उत्तर भारतियों की ही हो रही है।


महाराष्ट्र के इस तरह के हालात को बनाने में मीडिया की भूमिका भी कम नहीं मानी जा सकती है। मीडिया ने ही नब्बे के दशक में बाल ठाकरे को तो पिछले लगभग पांच सालों से राज ठाकरे को जो तवज्जो दी है, उसी का नतीजा है कि आज इन दोनों ही का अतंक सूबे में सर चढकर बोल रहा है।


यह पहला मौका नहीं है जब ठाकरे बंधुओं या उनके अखबरा ने वेमनस्यता फैलाने का काम किया हो। पता नहीं क्यों महाराष्ट्र सरकार बाला साहेब ठाकरे और उनके समाचार पत्र ``सामना`` के खिलाफ भारतीय दण्ड संहित की धारा 153 क, 295 क, 503, 504 और 505 के तहत प्रकरण पंजीबद्ध करने किस महूर्त की तलाश कर रही है। लोगों की स्मृति से शायद अब तक विस्मृत नहीं हुआ होगा कि बाला साहेब ठाकरे को इसी तरह के कृत्य के लिए लगभग 14 साल पहले छ: साल के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया गया था।


आज यह देखकर बहुत ही आश्चर्य होता है कि पीलिभीत में भाजपा के युवा गांधी, वरूण के उत्तेजक भाषण के लिए उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी, पर वहीं भारत गणराज्य के महाराष्ट्र सूबे मेें बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना लोगों को सरेआम उकसाने का काम कर रही है। भारत देश में दो सूबों में इस तरह की संवैधानिक विभिन्नताएं अपने आप में अनोखी मानी जा सकती हैं। भारत विविधता में एकता का प्रतीक माना जाता है, किन्तु इस तरह की विविधताओं का नहीं।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

अहमद पटेल की उलटी गिनती शुरू



अहमद पटेल की उलटी गिनती शुरू




राजा दिग्विजय सिंह ने आरंभ किया शह और मात का खेल




(लिमटी खरे)



नई दिल्ली। लगता है कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नौ रत्नों में से सबसे ताकतवर अहमद पटेल के दुदिन शुरू होने वाले हैं। अब तक सोनिया गांधी के नाक कान आंख माने जाने वाले अहमद पटेल को कमजोर करने में उनके विरोधियों को काफी हद तक कामयाबी मिल चुकी है।

पूर्व प्रधानमंत्री एवं 21 सदी के भविष्य दृष्टा राजीव गांधी के सचिव रहे विसेंट जार्ज पिछले कुछ सालों से वनवास भोग रहे थे। बताया जाता है कि जार्ज का राजनैतिक वनवास भी समाप्त हो गया है। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ में एक बार फिर उनकी तूती बोलने लगी है।

कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी सूत्रों का कहना है कि अहमद पटेल को कमजोर करने के लिए दिग्विजय सिंह ने जार्ज को ज्यादा तवज्जो दिलवाना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू अब अपनी सधी हुई चालों के जरिए अहमद पटेल को 10 जनपथ से बाहर करने की जुगत लगा रहे हैं।

पिछले दिनों विसेंट जार्ज के इशारे पर हुई नियुक्तियों से कांग्रेसियों की भीड जार्ज के चाणक्यपुरी स्थित आवास पर लगने लगी है। एक अनजान भूमिहार अनिल शर्मा को जार्ज के इशारे पर ही बिहार प्रदेश का कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। सूत्रों की मानें तो विसेंट जार्ज एक बार फिर 10 जनपथ में ताकतवर होकर उभर चुके हैं।

देश की राजनैतिक राजधानी में चल रही बयार के अनुसार कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह बहुत ही फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं। बताया जाता है कि दिग्विजय सिंह काफी समय से सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

जैसे ही राजनैतिक फिजां में यह बात तैरी वैसे ही राजा दिग्विजय सिंह ने अपना स्टेंड बदल दिया। बताते हैं कि पिछले दिनों राजधानी के कुछ मीडिया पर्सन्स को अपने घर बुलाकर चाय की चुस्कियों के दरम्यान दिग्विजय सिंह ने अहमद पटेल की तारीफ में कसीदे गढकर उन्हें हीरो बना दिया।

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुंवर अर्जुन सिंह के बाद कांग्रेस की राजनीति में चाणक्य की भूमिका में आए राजा दिग्विजय सिंह ने यह कृत्य इसलिए किया ताकि अहमद पटेल को बदलने के बारे में उनके नाम से जो अफवाहें फैल रहीं हैं, उन्हें रोका जा सके।

सियासी हल्कों में अब इस बात को खोजा जा रहा है कि कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को पूरी तरह अपने बाहूपाश में ले चुके मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह 10 जनपथ में श्रीमति सोनिया गांधी के पास अहमद पटेल के स्थान पर किसे फिट करने वाले हैं।

क्या हिन्दुस्तान में महज 11 शहरों में ही जनता रहती है!



क्या हिन्दुस्तान में महज 11 शहरों में ही जनता रहती है!




(लिमटी खरे)




चलो देर से ही सही सरकार ने वायू प्रदूषण रोकने के नए मानक जारी कर इन पर कडाई से पालन सुनिश्चित करने का मानस बनाया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने डेढ दशक के बाद वायू प्रदूषण को रोकने के लिए गुणवत्ता के नए मानक बनाकर उन्हें काफी हद तक सख्त कर दिया है।


सरकार के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए जिसमें सरकार ने इन मानकों को रिहाईशी और औद्योगिक दोनों ही जगहों पर समान रूप से लागू करने की बात कही है। नए मानकों में घातक धातुओं और हानीकारक गैस को भी इसी श्रेणी में रखा गया है।


केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की यह बात समझी जा सकती है कि मानकों को लागू करना इतर बात है पर इन पर अमल कराना दुष्कर कार्य है। दरअसल देश की व्यवस्था को पूरी तरह जंग लग चुकी है। यही कारण है कि नियम कायदों को बलाए ताक पर रखने में सरकारी नुमाईंदे पल भर भी नहीं झिझकते।


केंद्र सरकार ने तय किया है कि अप्रेल 2010 से चुनिंदा 11 शहरों मेें यूरो तीन और चार मानकों पर अमल जरूरी हो जाएगा। इसका कडाई से अगर पालन किया गया तो इन शहरों में डीजल से चलने वाले वाहन नजर ही नहीं आएंगे, क्योंकि डीजल से चलने वाले वाहन सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं।


सवाल तो यह उठता है कि क्या देश में महज 11 शहरों में ही जनता निवास कर रही है। समूचे देश में यूरो मानकों का सरेआम माखौल उडाया जा रहा है। प्रदूषण के अनेक प्रकारों से देशवासियों को तरह तरह की बीमारियों से दो चार होना पड रहा है।


वर्तमान में केंद्र के अलावा राज्यों में भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अस्तित्व में है। क्या ये बोर्ड साफ मन से प्रदूषण रोकने की कार्यवाही कर रहा है। जाहिर है जवाब नकारात्मक ही मिलेगा। प्रदूषण नियंत्रण महकमे का काम प्रदूषण को नियंत्रित करने के बजाए धन उगाही ज्यादा हो गया है। देश भर में बिछ रहे सडकों के जाल के लिए पत्थर तोडकर गिट्टी बनाने वाले क्रेशर गांव गांव शहर शहर धूल उडा रहे हैं, पर इस ओर देखने वाला कोई नहीं है।


देश में शहरों के साथ ही साथ अब गांव में भी स्वास जनित बीमारियों के मरीजों की खासी तादाद हो गई है। इसका कारण वायू प्रदूषण ही है। इसके अलावा शादी ब्याह, मेले ठेले में कान फोडू आवाज में बजने वाले डीजे साउंड सिस्टम ने लोगों को बहरा बनाना भी आरंभ कर दिया है।


पश्चिमी देशों में पूरी तरह बैन हो चुकी पालीथिन ने भारत को अपना घर बना लिया है। आज शहरों के इर्द गिर्द पेड पौधों पर लटकी पालीथिन की थैलियों को देखकर लगता है मानो हरे भरे झाडों नहीं वरन पालीथिन के जंगल लगे हों। सरकार कई मर्तबा चेतावनी भी जारी कर चुकी है कि पालीथिन का उपयोग मानव के लिए घातक है, पर किसी के कानों में जूं नहीं रेंगती।


अभी ज्यादा समय नहीं बीत जबकि लोग कपड़े के थैले लेकर बाजार जाया करते थे, आज लोग खाली हाथ जाते हैं, और बाजार से इस विनाशकारी पालीथिन में सामान लेकर हाथ झुलाते लौट आते हैं। उपयोग के उपरांत पालीथिन को फेंक दिया जाता है, जिसे मवेशी खा जाते हैं, जिससे उनकी सेहत पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है।


देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में सरकार ने पालीथिन के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है, बावजूद इसके दिल्ली मेें पालीथिन का उपयोग धडल्ले से किया जा रहा है। यहां तक कि लोगों को चाय तक पालीथिन में ही पार्सल होकर मिल रही है।


पश्चिमी देशों की चकाचौंध ने हमें आकषिZत कर रखा है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। वस्तुत: हम इस चकाचौंध की जद में आकर पश्चिमी देशों के कचरे को अपना रहे हैं। अमेरिका और यूके से आने वाले उपयोग किए हुए इलेक्ट्रानिक समान, चीन के सस्ते उपकरण आदि हमारे यहां कुछ दिन तो बेहतर काम करते है, फिर ये कचरे के ढेर में तब्दील हो जाते हैं, इन कचरों को ठिकाने लगाने की उचित व्यवस्था हमारे पास नहीं है। ये इलेक्ट्रानिक कचरे देश में पर्यावरण असंतुलन बनाने के मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में आरंभ की गई स्विर्णम चतुभुZज और उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम कारीडोर सकड परियोजना के चलते न जाने कितने झाड काट दिए गए। इसके बदले ठेकेदारों ने कितने झाड लगाए हैं, इसका हिसाब किताब किसी के पास नहंी है। देश में पर्यावरण असंतुलन का एक बडा कारण यह भी है।


हम जयराम रमेश की इस बात का समर्थन करते हैं कि कानून या मानक बनाना आसान है, पर उसका पालन कराना दुष्कर। हमारा कहना महज इतना ही है कि सरकर ही जब इस तरह से काम आरंभ करने के पहले हाथियार डालने की मुद्रा में आ जाएगी तो हो चुका कानूनों का पालन।

महज दिखावे या आत्म संतोष के लिए कानून बनाने का क्या फायदा। सरकार को चाहिए कि इस तरह की कार्ययोजना बनाए जिसमें कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। और इसके लिए सरकार को सबसे पहले अपने घर से ही शुरूआत करनी होगी।

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

नए रोजगार की तलाश में राजनाथ!



नए रोजगार की तलाश में राजनाथ!




(लिमटी खरे)



नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी जल्द ही नए निजाम के निर्देशन में चलना आरंभ करने वाली है। भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह की बिदाई की बेला करीब ही है। भाजपा और संघ के आला नेताओं को अब चिंता सताने लगी है कि निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह को किस भूमिका में रखा जाए।


इस तरह का संकट पूर्व में उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के साथ भी आ चुका है। उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद पार्टी में उनके हिसाब का पद संघ और भाजपा दोनों ही सृजित नहीं कर पाई। साल दर साल भाजपा को मजबूती प्रदान करने वाले शेखावत अब हाशिए पर ही चल रहे हैं।


संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार राजनाथ सिंह को लाल कृष्ण आडवाणी के स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बनाने की चर्चाएं भी चल रहीं हैं, किन्तु इस ताजपोशी में भाजपा की गृहणी की छवि वाली जनाधारयुक्त नेत्री सुषमा स्वराज अडंगे के तौर पर सामने आ रहीं हैं। वैसे भी सुषमा स्वराज का संसदीय अनुभव उनके लिए सबसे बडा प्लस प्वाईंट बनकर उभर रहा है। वर्तमान में स्वराज उपनेता हैं, किन्तु महिलाओं की उपेक्षा के आरोप से बचने के लिए सुषमा को नेता प्रतिपक्ष बनाना भाजपा की मजबूरी है।


सूत्रों के अनुसार लोकसभा में उपनेता सुषमा स्वराज को अगर नेता प्रतिपक्ष बना दिया जाता है तो राजनाथ को उपनेता का पद आफर किया जा सकता है। वैसे संघ के नेता परोक्ष तौर पर यह भी कह रहे हैं कि जब राज्य सभा में अरूण जेतली के नीचे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू काम कर सकते हैं तो सुषमा के अधीन राजनाथ को काम करने में दिक्कत नहीं होना चाहिए।


राजनाथ सिंह की हालिया संघ के आला नेताओं के साथ बैठकों के बाद अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि राजनाथ सिंह पद से हटने के बाद माकूल जिम्मेदारी लेने की फिराक में हैं, ताकि केंद्र की राजनीति में उनका दखल बरकरार रहे। इसके लिए वे संघ प्रमुख मोहन भागवत और सह सरकार्यवाहक सुरेश सोनी से अलग अलग गुफ्तगू कर चुके हैं।



असहनीय और अक्षम्य लापरवाही


असहनीय और अक्षम्य लापरवाही


(लिमटी खरे)



देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में बीते साल हुए देश के सबसे बडे आतंकी हमले की बरसी मनाने जा रहा है हिन्दुस्तान। ऐसे में आतंकियों की गोली के शिकार हुए शहीदों को भी नमन किया जाएगा। 26/11 के हमले में शहीद हुए थे, एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे। साल भर बाद भी करकरे की पित्न अपने पति के साथ क्या हुआ यह जानने के लिए दर दर भटक रही है, यह है भारत गणराज्य के नपुंसक ``जन सेवकों`` की सहृदयता।


हेमंत करकरे की बेवा कविता ने हमले के दौरान पुलिस के द्वारा उठाए गए कदमों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं। कविता का आरोप है कि हमले के दौरान उनके पति द्वारा जो बुलट प्रूफ जेकेट पहन रखी थी, वह अब कहां है। कविता के इस प्रश्न से पुलिस द्वारा संरक्षित किए गए साक्ष्य और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।


लचर कानून व्यवस्था का यह आलम है कि जब करकरे का शव बरामद किया गया था, तब उनके तन पर बुलट प्रूफ जेकेट नहीं थी, न ही वह बाद में अस्पताल में ही मिली। सूचना के अधिकार में जब इस बारे में पूछा गया तो जवाब मिला कि वह बुलट प्रूफ जेकेट गायब है!


आश्चर्य तो तब होता है जब यह पता चलता है कि जब मुंबई के कामा अस्पताल के करीब घात लगाए बैठे आतंकियों ने हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर पर गोलियां चलाईं तब वे बुलट प्रूफ जेकेट पहने हुए थे। बावजूद इसके उनके सीने पर गोलियों के तीन गंभीर घाव थे। यह वाक्या ही बुलट प्रूफ जेकेट की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी माने जा सकते हैं। हो सकता है गुणवत्ता विहीन जेकेट को पोल खुलने के डर से अधिकारियों द्वारा ही गायब करवा दिया गया हो!


कविता का कहना है कि उन्हें अपने पति की मौत किस तरह हुई की जानकारी मीडिया से ही मिली है। समाचार चेनल्स में साफ दिखाया गया है कि जब करकरे सीएसटी पहुंचे तब वे जेकेट पहने हुए थे। वैसे भी 1982 के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी करकरे सुरक्षा के प्रति काफी सजग थे। जब एटीएस चीफ के साथ ही एसा हादसा हो सकता है, तब देश की सवा करोड से भी अधिक जनता की हिफाजत की बात किस मंह से कर रही है केंद्र सरकार!


सुरक्षा तंत्र पर भी कविता ने सवालिया निशान लगाए हैं। बकौल कविता जब उनके पति ने मदद की गुहार लगाई थी, तब भी चालीस मिनिट के बाद भी मदद के लिए पुलिस वहां नहीं पहुंची। ठाणे, वाशी, पनवेल में हुए सीरियल बम ब्लास्ट को सुलझाने और विस्फोट में कट्टरपंथी भगवा संगठनों का हाथ होने की बात प्रमाणित करने वाले करकरे चाहते तो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपने मातहतों को निर्देश दे सकते थे, किन्तु देशप्रेम का जज्वा अपने दिल में संजोने वाले जांबाज करकरे ने एसा किया नहीं, वे घटना स्थल पर जाकर आतंकियों से जूझे थे।


कविता की पीडा समझी जा सकती है। संवेदनहीन ``जनसेवक`` और प्रशासनिक तंत्र किस कदर निकम्मा हो चुका है कि किसी भी वरिष्ठ अधिकारी ने आज साल भर बाद भी कविता करकरे को यह बताने की जहमत नही उठाई कि आखिर उनके पति के साथ क्या हुआ था।


राजकीय सम्मान के साथ करकरे की अंत्येष्ठी कर सरकारी तंत्र ने रस्म अदायगी कर डाली है। इस तरह की लापरवाही को असहनीय और क्षमा योग्य नहीं माना जा सकता है। देश की सबसे बडी पंचायत ``संसद`` में भी इस आतंकी हमले को लेकर गर्मा गरम बहस हुई, पर करकरे के साथ हुए हादसे पर चर्चा करना किसी भी जनसेवक ने उचित नहीं समझा।


हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के ``जन सेवक`` संसद या विधानसभा में महज उन्हीं प्रश्नों को उठाते है, जो उनके निहित स्वार्थों से जुडे होते हैं। आम जनता से जुडे प्रश्नों को उठाने की परंपरा तो मानो समाप्त ही हो गई है। गौरतलब होगा कि आतंकवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद की आग में झुलस रहे हिन्दुस्तान को आतंक के खौफ से बचाने के लिए एटीएस का गठन किया गया है।


विडम्बना ही कही जाएगी कि एटीएस का प्रमुख ही जब इससे सुरक्षित नहीं था तो आम भारतीय की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। ``जनसेवक`` अवश्य ही सुरक्षा गार्ड्स के घेरे में आपने आप को महफूज पाते होंगे, किन्तु आम हिन्दुस्तानी हर कदम पर डर और दशहत की सांस ले रहा है।


बहुत ही शर्म की बात है कि देश में आतंक निरोधी दस्ते के प्रमुख की बेवा एक साल से अपने पति के साथ हुए हादसे को लेकर उसके जेहन में उपजे सवालों के जवाब के लिए दर दर भटक रही है, और देश के जनसेवक ``नीरो`` के मानिंद चेन की बंसी बजा रहे हैं।



बुधवार, 18 नवंबर 2009




क्या महामहिम भारत की नागरिक नहीं हैं




(लिमटी खरे)



भारतीय वायूसेना में अगर किसी महिला को फायटर पायलट बनना हो तो उसे एक तय उम्र तक मातृत्व सुख से वंचित होना पडेगा, वहीं दूसरी ओर 25 नवंबर को देश की सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर की हैसियत से भारत की प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल सुखोई 30 में बैठकर आसमान का सीना चीरेंगी।


भारतीय वायूसेना की इस अजीबो गरीब शर्त से वायू सेना में सेवारत महिला पायलट का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक ही है। इसमें वैवाहिक बंधनों में बंधने की तो छूट दी गई है, किन्तु सेना में 14 साल की सेवा पूरी करने पर ही बच्चे को जन्म देने वाली महिलाएं ही फायटर पायलट बनने की योग्यता रखेंगी।


कितने आश्चर्य की बात है कि एक ओर भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महकमा और चिकित्सकीय शोध बताते हैं कि अधेडावस्था में मां बनने के अनेक नुकसान हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय वायूसेना महिलाओं को फायटर पायलट बनने के लिए एसी शर्त रख रही है।


अचरज की बात तो यह है कि भारत की तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर एवं भारत गणराज्य की प्रथम महिला महामहिम राष्ट्रपति की सुखोई की आधे घंटे की बहूप्रतीक्षित उडान में महज एक सप्ताह पहले भारतीय वायूसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल पी.के.बारबोरा ने महिलाओं को लेकर इस तरह का बयान दिया है।


अमूमन 23 साल की उम्र में युवतियां भारतीय वायूसेना की फ्लाईंग में नौकरी ज्वाईन कर लेती हैं। भारतीय वायू सेना के इस तुगलकी फरमान के बाद अब महिलाओं को 37 साल की उम्र के उपरांत ही मातृत्व सुख प्राप्त हो सकेगा। भारतीय वायूसेना के उप प्रमुख का कहना सच है कि महिलाएं अगर प्रिगनेंसी लीव लेती हैं तो वे लगभग दस माह के लिए अपने कर्तव्य से हट जाएंगी। वैसे भी एक फायटर पायलट के प्रशिक्षण में लगभग सवा करोड रूपए खर्च हो जाते हैं।


बहरहाल महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल 74 साल की उम्र में लगभग उन्नीस हजार फिट पर आधे घंटे तक सुखोई का लुत्फ उठाएंगी। इस विमान की गति साधारण व्यवसायिक विमान की तरह 1075 किलोमीटर प्रतिघंटा ही होगी, जबकि सुपर सोनिक की गति 1195 किलोमीटर प्रतिघंटा होना चाहिए, इस लिहाज से महामहिम सुपरसोनिक राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगी।


आधुनिकतम विमानों की चौथी पीढी के इस विमान की गति आवाज से तीन गुना तेज है। यह विमान 56 हजार 875 फिट की उंचाई तक उडान भर सकता है। यह विमान एक बार ईंधन भरने के उपरांत लगभग 5500 किलोमीटर तक लगातार उडान भर सकता है।


भारतीय वायूसेना का यह कहना कि सर्वोच्च कमांडर की आयु को देखकर इस उडान को आरामदेह बनाने की गरज से इसे महज 19 हजार फिट पर ही उडाया जाएगा, स्वागत योग्य है। उन्होंने सर्वोच्च कमांडर की उम्र और सेहत को देखकर यह फैसला लिया होगा।


गौरतलब होगा कि जब श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 2007 में भारत की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति का पदभार संभाला था, तब यह कहा जा रहा था, कि भारत की महामहिम राष्ट्रपति सब कुछ कर सकतीं है, सिर्फ फायटर प्लेन की यात्रा के। इसका कारण यह था कि इसके लिए उन्हें अपनी परंपरागत वेशभूषा साडी को छोडकर फायटर पायलट की वेशभूषा पहनना होगा।


आज के आधुनिक युग में महिलाओं ने साडी तो छोड सलवार कमीज को भी तज दिया है। आज की युवतियां शार्टस में मटकतीं नजर आतीं हैं। यहां तक कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, यूपी की निजाम मायावती भी सलवार कमीज को ही ज्यादा पसंद करतीं हैं। भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज, लोकसभा की पहली महिला स्पीकर मीरा कुमार आदि महिलाओं ने साडी के अलावा कोई भी वस्त्र पहनना उचित नहीं समझा, और भारत की प्राचीन परंपरा को सम्मान दिया है।


भारतीय वायूसेना की दो तरह की नीति समझ से परे है। एक तरफ वे फायटर प्लेन उडाने के लिए महिलाओं को मां बनने से रोक रहीं है, वहीं दूसरी ओर प्रतिभा ताई को उसी विमान की यात्रा करवा रहीं हैं। क्या प्रतिभा ताई मां नहीं हैं।


यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या वे भारत की नागरिक नहीं हैं, अगर हैं तो निश्चित तौर पर जो नियम अन्य महिलाओं के लिए वायूसेना द्वारा बनाए जा रहे है, उनका पालन उन्हें भी करना होगा। उनके लिए नियम कायदों में छूट क्यों। अगर एसा नहीं है तो वायू सेना को स्पष्ट करना होगा कि वह सर्वोच्च कमांडर के लिए इन नियमों को शिथिल कर रही है।



मंगलवार, 17 नवंबर 2009

सब कुछ संभव है राजनीति में


सब कुछ संभव है राजनीति में



 (लिमटी खरे)



कल तक भाजपा की रीतियों नीतियों में रचे बसे कल्याण सिंह ने मुलायम सिंह यादव का दामन थामने के बाद भाजपा को किस कदर कोसा था, यह बात किसी से छिपी नहीं है, वही कल्याण सिंह अब भाजपा के पक्ष में राग अलापते नजर आ रहे हैं। यही आलम उमश्री भारती का है, वे भी आड़वाणी और अटल को पिता तुल्य मानतीं रहीं और फिर उन्हें भी गरयाने से नहीं चूकीं। आज दोनों ही नेता भाजपा में वापसी के लिए लालयित नजर आ रहे हैं।




सच है संगठन बिना किसी का कोई अस्तित्व नहीं है। संगठन के बिना सभी बौने नजर आते हैं। संगठन में रहकर चाटुकारों से घिरने के उपरांत राजनेता सोचने लगते हैं कि संगठन उनसे है वे संगठन से नहीं। इसी गफलत के चलते वे अपने आप का संगठन से बडा मान लेते हैं और नए मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं।




उमाश्री भारती ने भी यही किया। उन्होंने भाजपा का दमान छोड भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई। मध्य प्रदेश में जिस उमा भरती के बलबूते पर भाजपा ने दिग्विजय सिंह के तिलिस्म को तोडकर थंपिंग मेजारटी में सरकार बनाई थी, वह बात किसी से छिपी नहीं है। भाजश की सुप्रीमो का अब आलम यह है कि वे टीकमगढ से चुनाव ही हार गईं।




कमोबेश यही हाल कल्याण सिंह के थे। समाजवादी पार्टी के आगरा सम्मेलन में मुलायम सिंह ने कल्याण को हाथों हाथ लिया था। मंच से अनेकों बार कल्याण सिंह ने भाजपा को समूल नष्ट करने का अपना संकल्प दोहराया था। आज वही कल्याण सिंह भाजपा को मजबूत करने की बात कह रहे हैं। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या राजनेताओं को कोई दीन ईमान बाकी रह गया है।




आजादी के बाद जब भी कांग्रेस केंद्र में सत्ता में बैठी है, उसने जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी बाजपेयी जैसे दिग्गजों के संसद में जाने के मार्ग प्रशस्त किए हैं। एसा इसलिए नहीं कि शासक इनसे घबराते थे वस्तुत: दमदार विपक्ष की उपस्थिति शासकों को निरंकुश होने से बचाती थी। पूर्व में नेता चारित्रिक तौर पर बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अब वैसे नैतिकता से परिपूर्ण नेताओं से रीत गई है देश की राजनीति।




यह सच है कि पब्लिक मेमोरी (लोगों की याददाश्त) बहुत अधिक नहीं होती है। आज घटी घटना को महीने भर बाद भुला दिया जाता है। 1992 में जब बाबरी ढांचा ढहाया गया था, तब यूके के निजाम कल्याण सिंह हुआ करते थे। उस वक्त मुस्लिम वोट बैंक को हथियाने के चक्कर में मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को जी भर कर कोसा था। इसके बाद जब लोगों ने मुलायम और कल्याण को गलबहिंया डाले देखा तो आश्चर्यचकित रह गए। मीडिया ने भी अपना दायित्व न निभाते हुए 1992 के प्रकरण के बाद के कल्याण और मुलायम के संबंधों की याद ताजा करना उचित नहीं समझा।




बहरहाल कल्याण भले ही समाजवादी पार्टी के औपचारिक सदस्य न रहे हों किन्तु उनके पुत्र राजवीर ने तो सपा की टिकिट पर चुनाव लडा है, और सपा के पदाधिकारी भी रहे हैं। अब जब उनके मन में एक बार फिर हिन्दुत्व की भावनाएं जोर मार ही रहीं थीं, तो वे मुलायम सिंह यादव के कथित ``विश्वासघात`` की राह क्यों ताक रहे थे। जाहिर है सपा से दूरी बनाने के लिए कुछ न कुछ आधार तो गढना ही था।




राजनेताओं में परिवारवाद कूट कूट कर भरा हुआ है, कल्याण सिंह उससे अलग नहीं माने जा सकते हैं। वे अपना और अपने पुत्र राजवीर का राजनैतिक पुर्नवास चाह रहे हैं, यही कारण है कि उन्होंने अब भाजपा के पितृ संगठन संघ को सिद्ध करना आरंभ कर दिया है।




संघ के नेता भी यह जानते हैं कि भाजपा को सत्तारूढ किए बिना उनका वजूद मुश्किल में पड जाएगा। भाजपा को पुन: मुख्यधारा में लाने के लिए जरूरी है, पिछडा वर्ग का वोट बैंक। इसके बिना पिछले पांच सालों में भाजपा की जो गत हुई है, वह किसी से छिपी नहीं है।




आने वाले समय में भाजपा अगर उमाश्री भारती, कल्याण सिंह और राजवीर को गले लगा ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीति को देखकर तो यही कहा जा सकता है, कि सब कुछ संभव है राजनीति में। आखिर राजनीति की एक लाईन की परिभाषा : ``जिस नीति से राज हासिल हो, वही राजनीति है`` जो ठहरी।
उमा का ``कल्याण`` करेंगे नए भाजपाध्यक्ष


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी की अनेक राज्यों में हुई फजीहत के बाद अब भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भाजपा को नुकसान पहुंचाने वाले फेक्टर्स पर मनन आरंभ कर दिया है। भाजपा से उडकर गए पंक्षियों की घर वापसी का अभियान अब आरंभ होने की उम्मीद है।


भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपा छोडकर एक कल्याण सिंह और उमाश्री भारती भले ही भाजपा से इतर अपना आधार तैयार न कर सके हों किन्तु उन्होंने भाजपा को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं रख छोडी है। अब इन भूले बिसरे गीतों के बजने का समय आ गया है।


सूत्रों का कहना है कि राजनाथ िंसंह और एल.के.आडवाणी के परस्पर विरोधी विचारधाओं के चलते इन नेताओं की घर वापसी के मार्ग प्रशस्त नहीं हो सके हैं। वैसे भी उमाश्री भारती और कल्याण सिंह ने पार्टी छोडने के उपरांत भाजपा के नेतृत्व और नीतियों को पानी पी पी कर कोसा था, इसी कारण उनकी घर वापसी के मार्ग में भाजपाईयों ने ही शूल बो दिए हैं।


पार्टी के सुविज्ञ सूत्रों का कहना है कि भाजपा की भद्द पिटने के उपरांत अब पिछडा वर्ग के इन दोनों ही नेताओं को वापस लेने के लिए भाजपा नेतृत्व बेकरार है, किन्तु जेतली, सुषमा स्वराज, बाल आप्टे, नितिन गडकरी आदि ने परोक्ष तौर पर जो फच्चर फसाए हैं, उससे इनकी घर वापसी का शुभ महूर्त नहीं निकल पा रहा है।


गौरतलब होगा कि पिछले दो दशकों में भाजपा की लोकप्रियता के आसमान छूते ग्राफ में पिछडा वर्ग की अहम भूमिका रही है। इसके बाद जैसे ही इन दो नेताओं ने भाजपा से नाता तोडा था उसके बाद भाजपा शनै: शनै: रसातल की ओर अग्रसर हो गई थी। रही सही कसर 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमंत्री के अधिकृत आवास) को आशियाना बनाने की चाहत में ``पीएम इन वेटिंग`` बनकर लाल कृष्ण आड़वाणी ने पूरी कर दी थी।


वर्तमान में भाजपा इन दोनों को वापस लेने पर पूरी तरह बटी नजर आ रही है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने तो यहां तक कह दिया, कि भाजपा कोई धर्मशाला नहीं है, कि जब मन चाहा नाम दर्ज कराकर चले आए और जब मन चाहा बोरिया बिस्तर समेट कर बाहर चल दिए।


पार्टी में इन दोनों ही पिछडे नेताओं की घरवापसी के मामले पर मचे बवाल के बाद अब पार्टी नेतृत्व ने मौन साध लिया है। सूत्रों का कहना है कि इन दोनों ही नेताओं को वापस लेने के मामले के उलझने के चलते वर्तमान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अब यह स्टेंड लिया है कि इस मामले में जो भी निर्णय लिया जाए वह नए निजाम (अगले माह चुना जाने वाला पार्टी अध्यक्ष) ही ले ताकि वे विवादों से अपने आप को परे रख सकें।



सोमवार, 16 नवंबर 2009

घर ही नहीं संभाल पा रहे हैं, युवराज


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)




घर ही नहीं संभाल पा रहे हैं, युवराज


कांग्रेस की नजर में देश के युवराज राहुल गांधी के नाम का डंका भले ही देश भर में बज रहा हो पर उनके अपने संसदीय क्षेत्र में ही उनकी हालत बेहद पतली नजर आ रही है। हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली आशातीत सफलता से कांग्रेस के दिग्गज पदाधिकारी बहुत ज्यादा उत्साहित नजर आ रहे हैं। सभी इस जीत का सेहरा राहुल गांधी के सर बांधने से नहीं चूक रहे हैं। राहुल गांधी के महिमा मण्डन के साथ ही कांग्रेसी नेता यह भूल गए हैं कि राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र के इसौली विधानसभा में कांग्रेस अपनी अस्मत नहीं बचा पाई है। इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने धमाकेदार जीत अर्जित की है। सपा से जुडे विधायक चंद्रभान सिंह के त्यागपत्र के कारण हुए इस उपचुनाव में इस बार वे बसपा के उम्मीदवार थे, जिन्होंने यहां जीत की हेट्रिक बनाई है। राहुल के संसदीय क्षेत्र के इस विधानसभा में हुए चुनावों में बसपा उम्मीदवार को 82,053 तो कांग्रेस के खाते में महज 32,686 मत ही आए हैं। एसा नहीं है कि इस हकीकत से कांग्रेस के युवराज अनजान हों, पर जब देश भर में उनके नाम के जयकारे लग रहे हों तब यह मामूली सी हार किसी कोने में दब ही जाएगी, मगर बडी बात तो यह है कि राहुल अपने घर को ही नहीं सहेज कर रख पा रहे हैं।






हिंसा और अहिंसा का संगम हैं राज ठाकरे


महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के सुप्रीमो और सूबे में कानून और व्यवस्था को हाथ में लेकर घूमने वाले राज ठाकरे मूलत: हिंसा (हिटलर) और अहिंसा (महात्मा गांधी) के विचारों का संगम हैं। यह बात कोई और नहीं वरन मनसे की आधिकारिक वेव साईट कह रही है। मनसे की इस साईट को पढने के बाद लोगों के जेहन में यह बात कौंधना स्वाभाविक ही होगा कि एक शिख्सयत हिंसा और अहिंसा दोनों का संगम कैसे हो सकता है। जानकारों का कहना है कि मनसे चीफ और आतंक फैलाने, हिंसा बरपाने का पर्याय बन चुके राज ठाकरे के अब तक के क्रिया कलापों को देखकर लगता है कि वे महात्मा गांधी के बजाए हिटलर के रास्ते पर ही चल रहे हैं। अब तक राज ने एसा कोई काम करके नहीं दिखाया है, जिससे उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाए। जातीयता, धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की सरेआम राजनीति करने वाले राज ठाकरे को नियंत्रित करने में कांग्रेस की सरकारों का दम फूल रहा है।






पैरोल के लिए मर्ज क्या था!


जेसिका लाल हत्याकांड में उमर केद की सजा भुगत रहे मनु शर्मा की पैरोल अब गले की फांस बनती जा रही है। मां की बीमारी के लिए मनु शर्मा को पैरोल पर छोडा गया था। मनु की जो मां बीमार थी, वह वास्तव में बीमार नहीं थी, वह चंडीगढ के पिकाडली होटल में बैठकर मीडिया के साथ क्रिकेट पर चर्चा कर रही थी। यह बात क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को दिखाई नहीं दी। मां की तीमारदारी के लिए जेल से एक माह को छोडा गया था मनु को। इसके बाद यह अवधि 22 नवंबर तक के लिए बढा दी गई थी। मां की तीमारदारी में जेल प्रशासन ने सूबे की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की कथित तौर पर की गई अनुशंसा के उपर यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि आखिर मनु की माता जी को क्या मर्ज है कि उनका श्रवण कुमार उनकी देखरेख के लिए जेल से बाहर आना चाह रहा है। नाईट क्लबों में रात रंगीन करते पकडे जाने पर प्रशासन सक्रिय हुआ और पेरोल की अवधि पूरी होने के पहले ही दुबारा मनु को अंदर भेज दिया गया। यक्ष प्रश्न तो यह है कि मनु की मां और हरियाणा के कांग्रेसी विधायक विनोद शर्मा की पित्न का मर्ज क्या है, यह कोई बताने को राजी नहीं, क्या उस चिकित्सक पर कार्यवाही होगी जिसने मनु की मां का कथित तौर पर फर्जी प्रमाण पत्र जारी किया होगा।






अब तो कर दिया जाए बिल सार्वजनिक


मंदी के दौर में पांच सितारा होटल में लगभग दो माह विलासिता पूर्ण गुजारने वाले विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा और शशि थुरूर ने यह जरूर कह दिया था कि उसका बिल उन्होंने अपने जेब से दिया है। सवाल यह उठता है कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी इन दोनों के लाखों रूपयों के होटल के बिल को सार्वजनिक करने से डर क्यों रहीं हैं, ताकि जनता को कम से कम पता तो चल सके कि चुनाव के वक्त दोनों हाथ जोडकर एक एक वोट के लिए दर दर भटकने वाले उनके ``जनसेवक`` वास्तव में कितनी आकूत संपत्ति के मालिक हैं। मीडिया में मामला उछला, सोनिया गांधी ने हवाई जहाज की इकानामी क्लास में बीस सीटें बुक कराकर खाली रखकर तो युवराज राहुल गांधी ने शताब्दी की एक पूरी की पूरी बोगी ही बुक कराकर यात्रा कर मितव्ययता का अच्छा संदेश दिया है। देश की जनता अब यह जानना चाह रही है कि इन दोनों ही मंत्रियों ने होटल का कितना बिल अपनी जेब से दिया और वह किस खाते से निकाला गया था।






नए स्वरूप में नजर आएंगी ताई


देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल इस माह के अंत में एक नए लुक में नजर आएंगी। अब तक बार्डर वाली सादी किन्तु गरिमापूर्ण साडी पहनने वाली प्रतिभा ताई सुखोई की सवारी करने वालीं हैं, जिसके लिए उन्हें साडी के बजाए पायलट्स द्वारा पहना जाने वाला जी सूट पहनना होगा। महामहिम लगभग बीस मिनिट तक हवा में रहेंगीं। गौरतलब होगा कि भारतीय वायूसेना में वर्तमान में लगभग 780 महिलाएं कार्यरत हैं। इन महिलाओं को अभी तक युद्धक विमान उडाने की अनुमति प्रदान नहीं की गई है। महिला पायलट सिर्फ हेलीकाप्टर और परिवहन के लिए प्रयुक्त होने वाले विमान ही उडा सकतीं हैं। भारत के महामहिम राष्ट्रपति एवं सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर की हैसियत से वे काफी दौरे कर चुकी हैं, यहां तक कि उन्होंने विशाखापट्टनम में नौसैनिक पोत और पनडुिब्बयों का निरीक्षण भी किया है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम की तरह वे पनडुब्बी में गहरे पानी की सैर नहीं कर सकीं हैं।






फिर विवादों में आशाराम


स्वयंभू आध्याित्मक संत आशाराम एक बार फिर विवादों में उलझ गए हैं। पिछले साल जुलाई में उनके अहमदाबाद स्थित गुरूकुल में दो चचेरे भाईयों दीपेश और अभिषेक की रहस्यमय मौत के बाद चर्चाओं में आया उनका गुरूकुल फिर सुर्खियों में आ गया है। इस गुरूकुल के सात साधकों के खिलाफ पुलिस ने मामला पंजीबद्ध कर लिया है। हो हल्ला होने पर इस मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी गई थी। पिछले दिनों जैसे ही पुलिस इन साधकों को गिरफ्तार करने गुरूकुल पहुंची ये सातों साधक वहां से फरार हो गए। चर्चा अब यह है कि लगभग डेढ साल पहले घटी इस घटना की जांच सीआईडी कर रही है, वह भी मंथर गति से, दूसरे जब आशाराम बापू अपने आप को एवं गुरूकुल को निर्दोष बता रहे हैं, तो फिर साधकों के फरार होने का क्या ओचित्य! मतलब साफ है कि दाल में कुछ न कुछ काला अवश्य है।






शाबाश केप्टन अनंत सेठी . . . .


मध्य प्रदेश शासन के विमानन विभाग में कार्यरत सीनियर पायलट केप्टन अनंत सेठी की जितनी तारीफ की जाए कम होगी, जिन्होंने सूबे के लाट साहेब (राज्यपाल) ठाकुर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सुरक्षित हवाई पट्टी पर उतार दिया। दरअसल ये दोनों महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के एक कार्यक्रम में शिरकत करने ग्वालियर गए थे। हवाई पट्टी पर लेंडिंग का क्लीयरेंस मिलने के बाद जैसे ही विमान रनवे पर उतरा वैसे ही पायलट अनंत सेठी ने रनवे पर दो वाहन देख वापस टेक ऑफ कर दिया। अतिविशिष्ठ व्यक्तियों के इस विमान को दुबारा आकाश में पहुंचने पर पायलट ने एयर ट्रेफिक कंट्रोल को वास्तविकता बताई और रनवे साफ होने के बाद विमान को उतारा। इसी तरह का एक हादसा पूर्व में महामहिम के महाराष्ट्र दौरे के दौरान हुआ था। सवाल यह उठता है कि अतिविशिष्ट व्यक्तियों के साथ जब एटीसी इस तरह की लापरवाही कर देता है, तब आम जनता की सुरक्षा आखिर किसके हवाले है।






कहां गई गल्र्स हाकी टीम!


केंद्रीय विद्यालय संगठन में पिछले दिनों एक मजेदार वाक्या सामने आया। मध्य प्रदेश के जबलपुर अंचल में खेले जाने वाली प्रतियोगिता में रीजन के अनेक केंद्रीय विद्यालयों की टीम ने हिस्सा लिया। इसमें विजेता टीमों को नेशनल के लिए आगे भेज दिया गया, किन्तु इसमें से बालिकाओं की हाकी टीम गायब थी। खुर्दबीनी करने पर पता चला कि पिछले दो सालो से बालिकाओं की हाकी टीम को भेजा ही नहीं जा रहा है। जबलपुर में पदस्थ सहायक आयुक्त सुश्री बिसारिया का कहना है कि चूंकि बालिका वर्ग की हाकी टीम ने स्तरहीन प्रदर्शन किया था, अत: उसे आगे नहीं भेजा जा सका है। वास्तविकता यह है कि बालिकाओं की हाकी टीम में सिर्फ और सिर्फ सिवनी केंद्रीय विद्यालय की टीम ही भाग लेने पहुंची। पालक आश्चर्यचकित हैं कि जब उसके सामने कोई टीम ही नहीं थी, मैच ही नहीं खेले गए तो प्रदर्शन स्तरहीन कैसे हुआ। चर्चा है कि कुंवर अर्जुन सिंह से सीधी ट्यूनिंग की बात पर गुरूर करने वाली सहायक आयुक्त ने एक अघोषित तुगलकी फरमान जारी कर बालिका वर्ग की हाकी टीम को दो सालों से नेशनल के लिए नहीं भेजने के निर्देश दिए हैं। इसके पीछे के कारण खोजे जा रहे हैं।






संसद सत्र के पहले ही लोकसभाध्यक्ष की टीका टिप्पणी


संसद सत्र अभी आरंभ नहीं हुआ है। अमूमन विधानसभा या लोकसभा के सत्र के पहले विपक्ष द्वारा यह कहा जाता है कि इस बार का सत्र हंगामेदार होगा। इस परंपरा से हटकर पहली महिला लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार ने ही यह कहकर सभी को चौंका दिया कि इस बार का सत्र हंगामेदार होगा। गुरूवार 19 नवंबर से आरंभ हाने वाले लोकसभा सत्र के पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के उपरांत मीरा कुमार ने इस तरह की टिप्पणी की है। सियासी गलियारों में अब लोकसभाध्यक्ष के इस हंगामेदार सत्र के मायने खोजे जा रहे हैं।






क्रिकेट को लेकर आमने सामने हैं जोशी और गहलोत


राजस्थान के दो कांग्रेसी दिग्गज मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सी.पी.जोशी चाहे राजनैतिक बिसात पर वर्चस्व की लडाई लडते रहे हों पर वे अब आमने सामने हैं। इसका कारण राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव हैं। इन चुनावों में अध्यक्ष पद को लेकर दोनों ही नेता काबिज होना चाह रहे हैं। सात दिसंबर को होने वाले इसके चुनाव में दोनों ही नेता पूरा दमखम लगाए हुए हैं। आरसीए में जबर्दस्त उफान मचा हुआ है। शरद पंवार के बाद सियासत करने वाले लोगों ने अब इस खेल के मैदान में भी जोहर दिखाने का मन बनाया है। यह जरूर कहा जा रहा है कि जोशी और गहलोत मिलकर इस समस्या का हल निकाल लेंगे, किन्तु वर्चस्व की इस लडाई में कौन शतकीय पारी खेल पाएगा इस पर सभी की नजरें टिकी हुईं हैं।






जसवंत का डिमोशन


भले ही भाजपा से निष्काशन के उपरांत पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह लोकसभा की लोक सेवा समिति में अध्यक्ष का पद बरकरार रखने में सफलता पा चुके हों पर अब सदन में उनका डिमोशन तय है। आने वाले सत्र में सदन में विपक्ष की पहली पंक्ति में उनका स्थान सुरक्षित रखने में वे कामयाब नहीं हो सके हैं। लोकसभा में अब जसवंत सिंह को 371 नंबर की सीट अलाट की गई है। सदन में अध्यक्ष के बाईं ओर विपक्ष को आसन दिया जाता है। इस बार लोकसभा में पहली पंक्ति में एल.के.आडवाणी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी आदि बैठेंगे, जबकि जसवंत सिंह अब पहली बार प्रथम के स्थान पर तीसरी पंक्ति में बैठे नजर आएंगे।






ममता मिली हैं नक्सलियों से!


पश्चिम बंगाल में एक के बाद एक कामयाबी की पायदान चढने वाली केंद्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी के नक्सलियों से संबंध हैं! जी हां यह बात मनगढंत नहीं वरन सोलह आने सच है। मीडिया से रूबरू ममता ने कहा कि नक्सलवाद का रास्ता छोड चुके बहुत सारे पुराने नक्सलियों ने अब तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया है। यह पूछे जाने पर कि कब से नक्सली उनके साथ हैं, उन्होंने बडी ही बेबाकी से जवाब दिया कि सिंगूर आंदोलन के साथ ही नक्सलियों ने उनका दामन थाम लिया था। ममता के लिए आने वाले 2011 के पश्चिम बंगाल के चुनाव बहुत ज्यादा अहमियत रखते हैं, उनका मानना है कि इन चुनावों में सरकार पर तृणमूल ही काबिज होगी। ममता की इस बात पर नक्सलियों के खिलाफ जोरदार अभियान छेडने का मन बनाने वाली केंद्र सरकार की चुप्पी आश्चर्य को ही जन्म दे रही है।






पुच्छल तारा


करोडों के घपलों के सरगना मधु कोडा को अस्वस्थ होने पर अस्पताल में दाखिल कराया गया। जहां उन्हें सघन चिकित्सा इकाई अर्थात आई सी यू में भर्ती कराया गया था। दिल्ली में सियासी गलियारों में तभी एक बात तैर गई थी कि अस्पतालों को भृष्ट नौकरशाह और राजनेताओं को आई सी यू के बजाए एक नया वार्ड सी यू यानी करप्शन यूनिट बनाकर उसमें रखा जाना चाहिए!

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

दिल्ली में गूजेगी सिवनी के मोगली की आवाजें

दिल्ली में गूजेगी सिवनी के मोगली की आवाजें


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर तहलका मचाने वाले मोगली की आवाजें अब दिल्ली में अतर्राट्रीय व्यापार मेले में गूंजने जा रही हैं। मध्य प्रदेश का पेवेलियन इस बार सिवनी जिले के मोगली के नाम होगा। इसमें मोगली, बघीरा, शेरखान, का, चमेली आदि प्रमुखता के साथ दिखाई देने वाले हैं।


रूडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध कथा ``जंगल बुक`` की कहानी मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के जंगलों से ही उपजी है। इस कहानी का मुख्य पात्र मोगली वास्तविकता में एक बालक था, जिसका लालन पालन भेडियों ने किया था। किपलिंग की इस किताब पर मोगली पर केंद्रित सीरियल भी बनाया गया था, जो काफी लोकप्रिय हुआ था। हर वर्ग के शख्स की जुबान पर आज भी ``जंगल जंगल पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है`` गाना चढा हुआ है।


जंगल बुक की कहानी मोगली के ही इर्द गिर्द घूमती है। मागली की कर्मस्थली सिवनी जिला थी, जो कि मध्य प्रदेश का एक हिस्सा है, अत: मध्य प्रदेश के पेवेलियन में इसे विशेष महत्व दिया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में एक ओर जहां कमोबेश हर तरफ फ्लेक्स से बने होर्डिंग नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश में हाथों से की गई चित्रकारी को स्थान दिया जा रहा है।


प्रगति मैदान में 14 नवंबर से आयोजित इस मेले में मध्य प्रदेश का मण्डप ही मोगली की तर्ज पर बनाया गया है, जो लोगों को आकषिZत किए बिना नहीं रहेगा। मेले में आने वाले लोगों विशेषकर बच्चों के लिए मोगली की झांकी निश्चित तौर पर आकर्षण का केंद्र रहेगी।


इससे पहले भी गणतंत्र दिवस की परेड में एक मर्तबा मोगली की लाखों रूपए लागत की झांकी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। यह अलहदा बात है कि उक्त झांकी कुछ समय तक सिवनी शहर के मुख्य मार्ग का अवरोध बनने के बाद अब बबरिया के करीब शंक्राचार्य पार्क में पडी सड रही है।