कैसे भरती गई
कांग्रेस की गुल्लक
(शमशेर सिंह)
नई दिल्ली (साई)।
महंगाई से भले ही जनता कंगाल हो रही है लेकिन देश पर राज करने वाली पार्टी
कांग्रेस मालामाल हो रही है। कमाई का ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है वो भी
चंदे की रकम से। आखिर कहां से उगाही जा रही है आम जनता के नाम पर करोड़ों की ये रकम, जिसके लिए किसी
खाता-बही की जरूरत न किसी को हिसाब किताब देने की।
लेकिन आप हैरान
होंगे कि इसी मंहगाई के दौर में कांग्रेस पार्टी की झोली भरती चली गई और जब ये
झोली खुली तो सामने आया हजारों करोड़ रुपये के चंदे का आकंड़ा। आरटीआई से मिली
जानकारी के मुताबिक पिछले सात सालों में यानी 2004 से 2011 तक कांग्रेस को
चंदे के तौर पर 2008 करोड़
रुपये मिले। सीधे तौर पर ये समझिये कि 300 करोड़ रुपये हर साल। यानी 90 लाख रुपये हर रोज
कांग्रेस के दरवाजे पहुंचता रहा बिना किसी मेहनत के। रकम सुनकर ऐसा लगता है कि खुद
कुबेर ने अपना खजाना सीधे कांग्रेस के दफ्तर भेज दिया हो क्योंकि मंहगाई से जूझ
रही आम जनता अपने हिस्से की रोटी तो कांग्रेस के नाम नहीं ही कर सकती। कांग्रेस का
रटा-रटाया जवाब यही है कि जनता श्रद्धा से खुद ही दान दे रही हो। लेकिन ये बात
मुझे तो हजम नहीं हो रही और शायद आपको भी आसानी से हजम नहीं होगी।
यहां मैं कांग्रेस
के कामकाज की, सरकार की
उपलब्धियों की भी चर्चा करना चाहूंगा। सरकार के काम हो या फिर पार्टी का जनता के
लिये बहाया गया पसीना, इससे तो सब वाकिफ हैं। इसमें कही से ऐसा नहीं लगता कि जनता
झूम-झूम कर कांग्रेस पर नोटों की बरसात करे। और ये बरसात तब मूसलाधार हो जाएं जब
चुनावी साल हो यानी कांग्रेस पार्टी को पैसे की बेहद जरूरत हो। आपने बचपन में एक
एड जरूर देखा होगा कि फरिश्ता की बीन बजी और मैले कपड़े चल दिये साफ होने को कुछ
ऐसा ही माहौल होता है चुनावी साल में कांग्रेस को मिलने वाली रकम का। जिसको देखे
वो कांग्रेस की झोली में नोट ही नोट उड़ेलता दिखाई देता है। 2004 के चुनावी साल में
कांग्रेस को 222 करो़ड़
रुपये का चंदा मिला और चुनाव खत्म हुआ तो अगले साल चंदा मिला 124 करोड़ रुपये यानी
पहले साल का आधा। दो सालों तक तो पैसे आने की यही रफ्तार रही लेकिन जैसे ही चुनावी
साल ने दस्तक दी तो चंदे की रकम का आंकड़ा बढ़ कर पहुंच गया 500 करोड़ तक।
अब आप ये भी जान ले
कि इतनी बड़ी रकम को देने वालों का पता ठिकाना तो पार्टी के पास होगा ही। जी नहीं, यही आपको हैरान कर
देने के लिए काफी है कि पार्टी के पास आने वाली हजारों करोड़ की इस रकम में से
सिर्फ 11 फीसदी
हिस्से देने वालों का नाम पता है। बाकि सब में देने वाला राम। सवाल ये उठ सकता है
कि हजारों करोड़ की रकम बिना किसी नाम या पते के कैसे इकट्ठा हो गयी तो इसके लिए एक
नियम है अगर किसी राजनीतिक दल को 20 हजार से कम का चंदा कोई व्यक्ति या संगठन
देता है तो उसका नाम पता लिखने की कोई जरूरत नहीं और ना ही किसी को हिसाब देने की।
और शायद देश के उन अनाम लोगों ने पुरानी कहावत पर अमल किया कि नेकी कर दरिया में
डाल और इस तरह उन अनाम लोगों ने एक दो दस नहीं बल्कि दो हजार करोड़ रुपये डाल दिये
कांग्रेस की झोली में।

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