गौर क्या सिर्फ
नागोर के लिए!
(संजीव प्रताप सिंह)
उत्तर प्रदेश के नागौर गांव के हैं प्रदेश के
स्थानीय शासन विकास मंत्री बाबू लाल गौर। उमा भारती सत्ता से बाहर हुंईं और जब वे
मुख्यमंत्री बने तब उन्हें अपने गांव की याद आई और उत्तर प्रदेश के नागौर गांव
जाकर उन्होंने वहां के विकास के लिए मध्य प्रदेश का खजाना लुटा दिया। उन्हें माटी
का कर्ज याद आया। नब्बे के दशक के आरंभ में सुंदर लाल पटवा के नेतृत्व वाली भाजपा
सरकार में बाबू लाल गौर ने जो चमत्कार किया वह हर किसी के बस की बात नहीं थी। गौर
ने प्रदेश के अनेक जिलों की संकरी गलियों को चौड़ा कर दिया। लोग संकरी गलियों से जब
गुजरते थे तो नारकीय पीड़ा भोगा करते थे, पर 1992 के बाद इन सड़कों पर दुपहिया तो छोड़िए
चौपहिया वाहन फर्राटे भरने लगे।
शिवराज सिंह चौहान
के मुख्यमंत्री बनने के बाद बाबू लाल गौर की यह दूसरी सिवनी यात्रा थी। इसके पहले
वे बरघाट आए थे। बाबू लाल गौर की सिवनी यात्रा से सिवनी को क्या फायदा हुआ यह बात
कोई भी नहीं बता सकता है। उनकी सिवनी यात्रा से बस एक दिन के लिए सिवनी शहर साफ
सुथरा दिखाई दिया है। इसके अलावा और कोई दूसरा लाभ प्रत्यक्षतः तो प्रतीत नहीं
होता है। बाबूलाल गौर ने सिवनी के लोगों को सब्ज बाग दिखाए। उन्होंने ना जाने
कितनी सौगातें देने की बात कही है। सवाल यह उठता है कि उनके द्वारा रेवड़ी की तरह
बांटी गई सौगाते क्या वास्तव में अमली जामा पहन सकेंगी।
इस साल के अंत में
विधानसभा चुनाव हैं। सितम्बर या अक्टूबर में आचार संहिता लग जाएगी। मई का माह
समाप्त होने को है। इन परिस्थितियों में तीन माह ही बचते हैं काम करने के लिए।
इसमें से जून के दूसरे सप्ताह से मानसून की दस्तक सुनाई देने लगेगी। तब बाबू लाल
गौर की घोषणाओं का क्या होगा यह कहना मुश्किल है। लगता है बाबू लाल गौर भाजपा के
हिडन एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं। शहरी आबादी काफी हद तक बढ़ चुकी है और यह कम से
कम एक विधानसभा के लिए निर्णायक की भूमिका अदा करती है।
बाबूलाल गौर जहां
भी जा रहे हैं वहां अगर भाजपा का नगर पालिका या नगर निगम का अध्यक्ष है तो वे उसकी
तारीफों में कसीदे पढ़ने से नहीं चूकते। मतलब साफ है कि नगर पालिका या नगर निगम की
अर्कमण्यता का खामियाजा उस विधानसभा क्षेत्र की जनता भाजपा को ना भोगवाए। सिवनी
में भी कमोबेश यही स्थिति है। सिवनी में भाजपा की नगर पालिका है। सिवनी का
दुर्भाग्य है कि जिला मुख्यालय के निवासी साफ पानी पीने को तरस रहे हैं।
बाबूलाल गौर ने एक
करोड़ तीन लाख रूपए की राशि एक सप्ताह यानी दस मई तक नगर पालिका सिवनी को उपलब्ध
कराने की बात कही है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि जब पीने को ही पानी नहीं मिल पा रहा
है तो आखिर स्वीमिंग पूल में पानी कहां से भरा जाएगा? बाबूलाल गौर सड़क
मार्ग से हरवंश सिंह ठाकुर द्वारा आहूत रामकथा सुनकर लौटे, जाहिर है उन्हें
उनकी गाड़ी में बैठे नेताओं ने बायीं ओर का भीमगढ़ तालाब तो दाईं ओर श्रीवनी फिल्टर
प्लांट अवश्य दिखाया होगा। दोनों को देखने और फिर लंबा रास्ता तय कर सिवनी पहुंचने
के बाद क्या बाबूलाल गौर के मन में यह प्रश्न नहीं कौंधा कि आखिर 22 किलोमीटर दूर तक
फिल्टर्ड पानी कैसे पहुंच रहा होगा?
इसी अवसर पर सिवनी
की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया ने अवैध कालोनियों के विकास का मामला उठाया। शायद
श्रीमति पटेरिया यह भूल गई होंगी कि वह मंच इस मामले को उठाने के लिए माकूल नहीं
था। सिवनी की जनता ने एक बार उन्हें देश की सबसे बड़ी पंचायत में सांसद बनाकर भेजा
और अब वे सिवनी की विधायक हैं, इस नाते इस तरह की बातें उठाने का सही मंच
विधानसभा ही होता है क्योंकि वहां सब कुछ रिकार्डेड रहता है। जरूरी नहीं है कि जिस
मंच से उन्होंने बात उठाई वहां से उनकी बात को बाबूलाल गौर भोपाल पहुंचने के बाद
तवज्जो दें।
मौका सिवनी में
आयोजित प्रोग्राम का और सिवनी तथा बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख
बात करें बालाघाट की तो वाकई आश्चर्य ही होता है। क्या बाबूलाल गौर बालाघाट नहीं
जाते? सांसद
देशमुख की मांग पर बाबूलाल गौर ने बालाघाट जिले के कटंगी नगर परिषद के लिए 37 लाख रूपए मंजूर
किए। वाकई आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि बाबूलाल गौर की इस घोषणा पर वहां उपस्थित
सिवनी जिले के भाजपा के साथ ही साथ कांग्रेस के नेता भी तालियां पीटते रहे। कम से
कम कांग्रेस के पार्षदों को तो उनसे यह प्रश्न करना था कि आखिर 2008 में विधानसभा
चुनावों के बाद सिवनी नगर पालिका को शासन ने क्या दिया? कम से कम सिवनी नगर
पालिका परिषद के पिछले और इस कार्यकाल के कारनामों की शिकायतों पर आखिर प्रदेश
शासन मौन क्यों है इस बात को उठाना था। विडम्बना ही कही जाएगी कि कांग्रेस के
पार्षद भी कठपुतली के मानिंद वहां सम्मोहित होकर तालियां ही बजाते रहे।
हालात देखकर लगता
है कि बाबूलाल गौर जादूगर के मानिंद आए, अपना हिडन मूल एजेंडा निपटाया, नगर पालिका के
कार्यक्रम में शामिल हुए, घोषणाएं की और चलते बने। सिवनी जिले में बाबूलाल गौर ने अपनी
इस यात्रा में सड़क मार्ग से जो दूरी तय की है वह सिवनी से भोपाल की दूरी से ज्यादा
है, इन
परिस्थितियों में क्या उन्हें सरकारी उड़न खटोले की मंहगी सवारी गांठने की दरकार थी? निश्चित तौर पर
नहीं, पर कोई कर
भी क्या सकता है? पक्षाघात
की शिकार विपक्ष में बैठी कांग्रेस को प्रदेश से जिला स्तर तक छद्म विरोध कर ही
जनता को तमाशा जो दिखा रही है।
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