दादी मां का खजाना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दादी मां का खजाना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

समयसीमा में बिजली उत्पादन आरंभ नही कर सकते गौतम थापर!


0 रिजर्व फारेस्ट में कैसे बन रहा पावर प्लांट . . . 11

समयसीमा में बिजली उत्पादन आरंभ नही कर सकते गौतम थापर!

(एस.के.खरे)

सिवनी (साई)। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील के बरेला में देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा डाले जा रहे 1260 मेगावाट के पावर प्लांट में नई मुसीबतें आरंभ हो गई हैं। मध्य प्रदेश सरकार के साथ किए करार में इस पावर प्लांट को विद्युत उत्पादन की समय सीमा अब समाप्त होने जा रही है और बिजली उत्पादन तो छोड़िए यहां काम पूरा भी नहीं हो सका है।
मध्य प्रदेश सरकार के उर्जा मंत्रालय के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड और मध्य प्रदेश सरकार के बीच हुए करार के तहत इस इकाई द्वारा मार्च 2013 से बिजली का उत्पादन आरंभ कर दिया जाना चाहिए। मार्च का महीना आरंभ हो चुका है और संयंत्र में अभी निर्माण काम मंथर गति से ही चल रहा है, जिससे उम्मीद जताई जा रही हे कि कम से कम इस माह तो बिजली का उत्पादन आरंभ हो ही नहीं सकता है।
ज्ञातव्य है कि वर्ष 2009 से इसकी स्थापना के पहले दिन से ही यह संयंत्र विवादों के दायरे में रहा है। आरंभ में लोकसुनवाई के पहले और उसके बाद यहां मजदूरों और संयंत्र प्रबंधन के बीच समन्वय का अभाव साफ दिखाई पड़ता रहा है। दिल्ली में बैठे संयंत्र के असली डायरेक्टर्स को जमीनी हकीकत कुछ और ही दर्शाई गई जबकि वास्तव में यहां की स्थितियों उत्तर प्रदेश के भट्टा परसौला से भिन्न कतई नहीं थीं।
संयंत्र के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कहा कि महाकौशल के कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के ठेकेदार नुमा नेता क्षत्रपों ने इस संयंत्र में निर्माण के काम में अपना एकाधिकार जमा लिया है। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर आदिवासियों के विरोध का बुरी तरह सामना कर रहा है यह संयंत्र। इस संयंत्र में मजदूरों द्वारा जब तब हड़ताल की जाकर संयंत्र के निर्माण में अवरोध खड़ा कर दिया जाता है जिससे दिल्ली में बैठा प्रबंधन अनजान ही रहता है।
(क्रमशः जारी)

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

बुखार में कारगर है सप्तपर्णी


हर्बल खजाना ----------------- 32


बुखार में कारगर है सप्तपर्णी

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। सप्तपर्णी एक पेड है जिसकी पत्तियाँ चक्राकार समूह में सात - सात के क्रम में लगी होती है और इसी कारण इसे सप्तपर्णी कहा जाता है। इसके सुंदर फ़ूलों और उनकी मादक गंध की वजह से इसे उद्यानों में भी लगाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम एल्सटोनिया स्कोलारिस है।
पातालकोट के आदिवासियों का मानना है कि प्रसव के बाद माता को यदि छाल का रस पिलाया जाता है तो दुग्ध की मात्रा बढ जाती है। इसकी छाल का काढा पिलाने से बदन दर्द और बुखार में आराम मिलता है। डाँग- गुजरात के आदिवासियों के अनुसार जुकाम और बुखार होने पर सप्तपर्णी की छाल, गिलोय का तना और नीम की आंतरिक छाल की समान मात्रा को कुचलकर काढा बनाया जाए और रोगी को दिया जाए तो अतिशीघ्र आराम मिलता है।
आधुनिक विज्ञान भी इसकी छाल से प्राप्त डीटेइन और डीटेमिन जैसे रसायनों को क्विनाईन से बेहतर मानता है। पेड से प्राप्त होने वाले दूधनुमा द्रव को घावों, अल्सर आदि पर लगाने से आराम मिल जाता है। छाल का काढा पिलाने से दस्त रुक जाते है। दाद, खाज और खुजली में भी आराम देने के लिए सप्तपर्णी की छाल के रस का उपयोग किया जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

शुगर के लिए लाभकारी है मेथी


हर्बल खजाना ----------------- 31

शुगर के लिए लाभकारी है मेथी

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। मेथी बहुत ही कारगर औषधि है। इसकी पत्तियों की तरकारी औषधिय गुणों से भरपूर होती है। इसका वानस्पतिक नाम ट्राईगोनेला फ़ीनम-ग्रीकम है। इसके बीजों में फॉस्फेट, लेसिथिन और न्यूक्लिओ-अलब्यूमिन होने से ये कॉड लिवर ऑयल जैसे पोषक और बल प्रदान करने वाले होते हैं।
इसमें फोलिक एसिड, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर, नियासिन, थियामिन, कैरोटीन आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं। मेथी पाचन शक्ति और भूख बढ़ाने में मदद करती है। आधा चम्मच मेथी दाना को पानी के साथ निगलने से अपचन की समस्या दूर होती है। मेथी के बीज आर्थराइटिस और साईटिका के दर्द से निजात दिलाने में मदद करते हैं।
इसके लिए १ ग्राम मेथी दाना पाउडर और सोंठ पाउडर को थोड़े से गर्म पानी के साथ दिन में दो-तीन बार लेने से लाभ होता है। इस रोग से दूर रहने के लिए प्रतिदिन १ चम्मच मेथी दाना पाउडर पानी के साथ फांकें, इसके अलावा एक चम्मच मेथी दाना को एक कप पानी में भिगो कर रात भर के लिए छोड़ दीजिए, सुबह इसका पानी पिएं।
इससे सीरम लिपिड लेवल कम होता और वजन भी संतुलित रहता है। स्तनपान कराने वाली मांए दूध बढ़ाने के लिए इसका सेवन करें तो निश्चत ही फ़ायदा होता है। बालों में रूसी होने पर मेथी दानों का पेस्ट बालों में लगाएं और आधा घंटे बाद धो लें। पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार डायबिटीज के मरीज जो बढ़ते शुगर लेवल से परेशान रहते हैं, वे २५-५० ग्राम मेथी के दानों का सेवन रोज करें तो लाभ होगा। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

बड़े काम की है अरण्डी


हर्बल खजाना ----------------- 30

बड़े काम की है अरण्डी

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। अरण्डी की खेती भारत के अनेक हिस्सों में की जाती है। आयुर्वेद में अरण्डी के एक विरेचक औषधि के तौर पर उत्तम माना गया है। अरण्डी का वानस्पतिक नाम रिसिनस कम्युनिस है। अरण्डी के तेल को मुख्यतः जुलाब लेने के लिए उपयोग में लिया जाता है।
एक कप दूध में २ चम्मच तेल डालकर सोते समय पीना चाहिए। असर न होने पर इसकी मात्रा दूसरे दिन बढ़ाकर लेना चाहिए। स्तनों की शिथिलता दूर करने के लिए एरण्ड के पत्तों को सिरके या नीबू रस में पीसकर स्तनों पर गाढ़ा लेप करने से कुछ ही दिनों में स्तनों का ढीलापन दूर हो जाता है।
अरण्डी पुराने मल को निकालकर पेट को हल्का करती है। यह वात, साइटिका, पेट में पानी की अधिकता, समस्त वायुरोगों की नाशक है। इसके पत्ते, जड़ और बीज उसका तेल सभी औषधि के रूप में इस्तेमाल किए जाते है। डाँग- गुजरात के आदिवासियों के अनुसार अरण्डी के फूल ठंड से उत्पन्न रोग जैसे खांसी, जुकाम और बलगम तथा पेट दर्द संबधी बीमारी का नाश करते है।
पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकार ऐसे शिशु जिनके सिर पर बाल नहीं उगते हो या बहुत कम हो या ऐसे पुरुष-स्त्री जिनकी पलकों व भौंहों पर बहुत कम बाल हों तो उन्हें एरंड के तेल की मालिश नियमित रूप से सोते समय करने की सलाह देते है। अरण्डी की जड़ का काढ़ा छानकर एक-एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करें, ऐसा करने से मोटापा कम हो जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

सौंफ़: सिर्फ़ एक मसाल नहीं


हर्बल खजाना ----------------- 29

सौंफ़: सिर्फ़ एक मसाल नहीं

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। भोजन संपन्न होने के बाद खाना पचाने के तौर पर ली जाने वाली सौंफ़ गजब के औषधिय गुणों वाली होती है। सौंफ़ को लगभग हर भारतीय घरों में किचन में मसाले की तरह और पानदान मुखवास की तरह देखा जा सकता है। सौंफ़ का वानस्पतिक नाम फ़ीनीकुलम वलगेयर है।
सौंफ में कैल्शियम, सोडियम, फास्फोरस, आयरन और पोटेशियम जैसे कई अहम तत्व पाए जाते हैं। आदिवासियों का मानना है कि सौंफ़ के निरन्तर उपयोग से आखों की रौशनी बढती है और मोतियाबिन्द की शिकायत नहीं होती। प्रतिदिन दिन में तीन से चार बार सौंफ के बीजों की कुछ मात्रा चबाने से खून साफ होता है और त्वचा का रंग भी साफ हो जाता है।
डाँग गुजरात के अनुसार सौंफ़ के नित सेवन से शरीर पर चर्बी नही चढती और कोलेस्ट्राल भी काफ़ी हद तक काबू किया जा सकता है और इस बात की प्रमाणिकता आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है। अपचन और खाँसी होने की दशा में एक कप पानी में एक चम्मच सौंफ को उबालकर दिन में तीन से चार बार पिया जाए तो समस्या समाप्त हो जाती है।
हाथ-पाँव में जलन की शिकायत होने पर सौंफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया के बीजों और मिश्री को कूट कर खाना खाने के पश्चात 5-6 ग्राम मात्रा में लेने से कुछ ही दिनों में आराम हो जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

बडे काम का नारियल


हर्बल खजाना ----------------- 28

बडे काम का नारियल

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। नारियल का प्रयोग लगभग हर भारतीय घर में होता है। नारियल के पत्तों से लेकर तेल तक सब कुछ हमारे लिए बड़ा उपयोगी होता है। नारियल का वनस्पतिक नाम कोकस न्यूसीफेरा है। नारियल का पानी हल्का, प्यास बुझाने वाला, वीर्यवर्धक, अग्निप्रदीपक तथा मूत्र संस्थान के लिए बहुत उपयोगी होता है।
नारियल के पानी में दूध से ज्यादा पोषक तत्व होते हैं। बच्चों को कच्चा नारियल खिलाने से उनके पेट के कृमि निकल जाते हैं। ब्लड़ प्रेशर और दिल के मरीजों के लिए नारियल का पानी बहुत उपयोगी होता है क्योंकि इसमें इलेक्ट्रोलाइट और पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है जो दिल की गतिविधियों को सुचारू रूप से कार्य करने में सहायता करती है।
नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर सिर में मालिश करने से रूसी से छुटकारा मिलता है और बाल स्वस्थ और लंबे होते हैं। दक्षिण भारत में नारियल के तेल का प्रयोग खाना बनाने के लिए किया जाता है। नारियल तेल में पकाया गया भोजन अधिक देर तक ताजा रहता है और पोषक पदार्थों के अवशोषण में मदद करता है।
नारियल का पानी न केवल शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है बल्कि शरीर में मौजूद बहुत से वायरसों से भी लड़ाई करता है।  रात के भोजन पश्चात नियमित रूप से आधा गिलास नारियल पानी पीने से पाचन क्रिया में फायदा होता है और अनिद्रा जैसी बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
सुबह नियमित रूप से ५० ग्राम नारियल की गिरी को चबाने से गर्भवती महिला को स्वास्थ्य में तो लाभ होता ही है। साथ ही गर्भस्थ बालक भी गौरवर्ण का एवं हृष्ट-पुष्ट होता है।  नारियल तेल की मालिश से मस्तिष्क ठंडा रहता है। गर्मी में लगने वाले दस्तों में एक कप नारियल पानी में पिसा जीरा मिलाकर पिलाने से दस्तों में तुरंत आराम मिलता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पौरूषत्व के लिए लाभकारी है गुडहल


हर्बल खजाना ----------------- 25

पौरूषत्व के लिए लाभकारी है गुडहल

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। घरों, उद्यानों और सडकों के किनारे गुडहल को आमतौर पर लगाया जाता है। इसके सुंदर फ़ूल भगवान की भेंट भी चढाए जाते है। गुडहल का वानस्पतिक नाम हिबिस्कुस रोज़ा- सायनेंसिस है। इसके फ़ूलों को जूतों पर रगडने से जूते चमक उठते है।
इसके फ़ूल कामोद्दीपक होते है और अनियमित माहवारी, यौन रोगों, ब्रोन्कियल नज़ला, खांसी जैसे रोगों के निवारण के लिए उपयोग में लाए जाते है। गुडहल के फ़ूल को चबाया जाए तो यह स्फ़ूर्तिदायक होता है और माना जाता है कि यह पौरूषत्व को बढावा देता है।
फ़ूलों के तिल के तेल में गर्म करके लगाने से बालों का झडना बंद हो जाता है और आदिवासी मानते है कि यह बालों का रंग भी काला कर देता है। डाँग- गुजरात में आदिवासी महिलाएं गुडहल की पत्तियों और फ़ूल को पानी में कुचल लेती है और जिससे झागनुमा एक पेस्ट तैयार हो जाता है। इस पेस्ट का उपयोग शैम्पू और कंडीशनर की तरह किया जाता है।
इसी झागनुमा पेस्ट को कैंसर से बनी गाँठों पर भी लेपित किया जाता है। गर्भवती महिलाओं को इसके फ़ूल का सेवन नहीं करना चाहिए, दरअसल इसमें गर्भपात करने का गुण होता है। पत्तियाँ विरेचक गुण की होती अतः अत्यधिक अपचन या पेट की गडबडी हो जाने पर कम मात्रा में इसका सेवन किया जा सकता है। इसके फ़ूलों की चाय बनाकर पी जाए तो यह वजन घटाने में समर्थ होती है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

किडनी की सफाई भी करती है धनिया


हर्बल खजाना ----------------- 24

किडनी की सफाई भी करती है धनिया

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। आमतौर पर सब्जियों में मसाले और सुगंध के लिए इस्तेमाल होने वाले धनिया की खेती भारत के हर हिस्से में होती है। औषधीय गुणों से भरपूर धनिये का वानस्पतिक नाम कोरिएंड्रम सटाईवम है। हरे ताजे धनिया की पत्तियाँ लगभग २० ग्राम और उसमें चुटकी भर कपूर मिला कर पीस लें और रस छान लें।
इस रस की दो बूँदे नाक के छिद्रों में दोनों तरफ टपकाने से तथा रस को माथे पर लगा कर हल्का हल्का मलने से नाक से निकलने वाला खून जिसे नकसीर भी कहा जाता है, तुरंत बंद हो जाता है। थोड़ा सा धनिया कूट कर पानी में उबाल कर ठंडा कर के, मोटे कपड़े से छान कर शीशी में भर लें और इसकी दो बूँदे आँखों में टपकाने से आँखों में जलन, दर्द तथा पानी गिरना जैसी समस्याएँ दूर होती हैं।
धनिया महिलाओं में मसिक धर्म संबंधी समस्याओं को दूर करता है। यदि मासिक धर्म साधारण से ज्यादा हो तो आधा लीटर पानी में लगभग ६ ग्राम धनिए के बीज डालकर खौलाएं और इसमें शक्कर डालकर पीएं, फायदा होगा। धनिए को मधुमेह नाशी भी माना जाता है। इसके सेवन से खून में इंसुलिन की मात्रा नियंत्रित रहती है।
धनिया त्वचा के लिए भी फायदेमंद है। धनिए के जूस में हल्दी का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर लगाएं, इससे मुहाँसों की समस्या दूर होती है और यह ब्लैकहेड्स को भी हटाता है। सौंफ, मिश्री व धनिया की समान मात्रा लेकर चूर्ण बना कर ६-६ ग्राम प्रतिदिन भोजन के बाद खाने से हाथ पैर की जलन, एसिडिटी, आँखों की जलन, पेशाब में जलन व सिरदर्द दूर होता है। धनिया के बारे में नवीन शोध बताते हैं कि धनिया की पत्ती खाने से किडनी स्वस्थ्य रहती है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कोलेस्ट्रॉल को कम करती है हल्दी


हर्बल खजाना ----------------- 23

कोलेस्ट्रॉल को कम करती है हल्दी

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। हम सभी हल्दी के बहुत से गुणों से चिरपरिचित है और रोजमर्रा की जिंदगी में इसका इस्तेमाल न सिर्फ मसाले के तौर पर करते है बल्कि हल्दी आज भी पारंपरिक नुस्खों में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान लिये है। हल्दी का वानस्पतिक नाम करकुमा लोन्गा है।
हल्दी में उड़नशील तेल, प्रोटीन,  खनिज पदार्थ, कारबोहाईड्रेट आदि के कुर्कुमिन नामक एक महत्वपूर्ण रसायन के अलावा विटामिन। भी पाए जाता है। हल्दी मोटापा घटाने में सहायक होती है। हल्दी में मौजूद कुर्कुमिन शरीर में जल्दी घुल जाता है। यह शरीर में वसा वाले ऊतकों के निर्माण को रोकता है।
पारंपरिक हर्बल जानकारों की मानी जाए तो यह शरीर के किसी भी अंग में होने वाले दर्द को आसानी से कम कर देती है। यदि दर्द जोड़ों का हो तो हल्दी चूर्ण का पेस्ट बनाकर लेप करना चाहिए। हड्डी टूट जाने, मोच आ जाने या भीतरी चोट के दर्द से निजात पाने के लिए गर्म दूध में हल्दी मिलाकर पीना फायदेमंद है।
आधुनिक शोध से पता चलता है कि हल्दी एल डी एल कोलेस्ट्रॉल को कम करती है जिससे हृदय संबंधी रोग होने का खतरा कम हो सकता है। हल्दी त्वचा की रंगत बनाने में मदद करती है तथा चेहरे की झांइयां दूर करने के लिए हल्दी पाउडर में खीरे या नीबू का रस मिलाकर 15 मिनट तक चेहरे पर लगाया जाए फिर साफ पानी से धो लिया जाए तो बडी आसानी से फ़र्क महसूस किया जा सकता है।
आदिवासी मानते है कि रोज रात में कच्ची हल्दी का जूस पिया जाए तो यह महिलाओं मे आस्टियोपोरोसिस के खतरों को कम करता है। पातालकोट के हर्बल जानकारों की मानी जाए तो पेट में कीड़े होने पर १ चम्मच हल्दी चूर्ण रोज सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक ताजे पानी के साथ लेने से कीड़े खत्म हो सकते हैं।
यदि मुंह में छाले हो जाएं तो गुनगुने पानी में हल्दी पाउडर मिलाकर कुल्ला करें या हलका गर्म हल्दी पाउडर छालों पर लगाएं, इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। डाँग- गुजरात के आदिवासियों के अनुसार हल्दी को सेंक कर रात में मुँह में दबाकर सोया जाए तो खाँसी में आराम के साथ दंत रोगों मे भी फ़ायदा होता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

बुधवार, 26 सितंबर 2012

श्री कृष्ण स्वयं है पीपल


हर्बल खजाना ----------------- 22

श्री कृष्ण स्वयं है पीपल

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। भगवान श्री कृष्ण गीता उपदेश में इस वृक्ष की महिमा का बखान करते हुए कहा है कि पीपल पेड़ों में उत्तम और दिव्य गुणों से सम्पन्न है और मैं स्वयं पीपल हूँ। पीपल के औषधिय गुणों का बखान आयुर्वेद में भी देखा जा सकता है। पीपल का वानस्पतिक नाम फ़ाइकस रिलिजियोसा है।
इसके सूखे फ़ल मूत्र संबंधित रोगों के निवारण के लिये काफ़ी अच्छे होते है। आदिवासी हल्कों में इसकी कोमल जडों को उस महिला को दिया जाता है जो संतान प्राप्ति चाहती हैं। पीपल के फ़ल, छाल, जडों और नयी कलियों को एकत्र कर दूध में पकाया जाता है और फ़िर इसमें घी, शक्कर और शहद मिलाया जाता है, आदिवासियों के अनुसार यह मिश्रण नपुँसकता दूर करता है।
पातालकोट जैसे आदिवासी बाहुल्य भागों में जिन महिलाओं को संतान प्राप्ति नहीं हो रही हो, उन्हे पीपल वृक्ष पर लगे वान्दा (रसना) पौधे को दूध में उबालकर दिया जाता है। इनका मानना है कि यह दूध गर्भाशय की गरमी को दूर करता है जिससे महिला के गर्भवती होने की संभावना बढ जाती है।
मुँह में छाले हो जाने की दशा में यदि पीपल की छाल और पत्तियों के चूर्ण से कुल्ला किया जाए तो आराम मिलता है। पीपल की एक विशेषता यह है कि यह चर्म-विकारों को जैसे-कुष्ठ, फोड़े-फुन्सी दाद-खाज और खुजली को नष्ट करता है। डाँगी आदिवासी पीपल की छाल घिसकर चर्म रोगों पर लगाने की राय देते हैं। कुष्ठ रोग में पीपल के पत्तों को कुचलकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाया जाता है तथा पत्तों का रस तैयार कर पिलाया जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

भृंगराज: रोके असमय बालों का पकना

हर्बल खजाना ----------------- 21

भृंगराज: रोके असमय बालों का पकना

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। नदी, नालों, मैदानी इलाकों, खेत और उद्यानों मे अक्सर देखा जाने वाला भृंगराज आयुर्वेद के अनुसार बडा ही महत्वपूर्ण औषधिय पौधा है। ग्रामीण अंचलों मे ब्लैक बोर्ड को काला करने के लिये जिस पौधे को घिसा जाता है, वही भृंगराज है। इसका वानस्पतिक नाम एक्लिप्टा प्रोस्ट्रेटा है।
इस पौधे का रस पीलिया में भी दिया जाता है। भृंगराज की पत्तियों का रस शहद के साथ मिलाकर देने से बच्चों को खाँसी में काफ़ी फ़ायदा होता है। पातालकोट के आदिवासियों का मानना है कि यदि इसकी पत्तियों के रस को मसूडों पर लगाया जाए और कुछ मात्रा माथे या ललाट पर लगायी जाए तो सरदर्द में अतिशीघ्र आराम मिलता है।
हाथीपाँव या एलिफ़ेंटेयासिस होने पर तिल के तेल के साथ पत्तियों के रस को मिलाकर पाँव पर लेपित करने से फ़ायदा होता है। एसिडिटी होने पर पौधे को सुखाकर चूर्ण बना लिया जाए और हर्रा के फ़लों के चूर्ण के साथ समान मात्रा में लेकर गुड के साथ सेवन कर लिया जाए तो एसिडिटी की समस्या से निजात मिल सकती है।
माईग्रेन या आधा सीसी दर्द होने पर भृंगराज की पत्तियों को बकरी के दूध में उबाला जाए व इस दूध की कुछ बूँदें नाक में डाली जाए तो आराम मिलता है। डाँग- गुजरात के हर्बल जानकार त्रिफला, नील और भृंगराज तीनों एक एक चम्मच लेकर ५० मिली पानी में मिलाकर रात को लोहे की कड़ाही में रख देते है। प्रातः इसे बालों में लगाकर, इसके सूख जाने के बाद नहा लिया जाता है। आदिवासियों के अनुसार ये बालों को असमय पकने से रोकता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

औषधि से कम नहीं हल्दी


औषधि से कम नहीं हल्दी

(दीपाली सिन्हा)

नई दिल्ली (साई)। हल्दी शरीर या त्वचा पर पड़े पिगमेंटेशन को दूर करने में लाभप्रद है. थोड़ी-सी हल्दी को पीस कर उसमें नींबू की कुछ बूंदे मिलाइए. आप चाहें तो इसे खीरे के साथ भी मिक्सी में पीस कर लगा सकती हैं. चेहरे पर पिंपल आ गये हों तो हल्दी पाउडर और उसमें चंदन तथा पानी मिला कर पेस्ट तैयार करें और चेहरे पर लगाएं. इससे पिंपल जल्दी ही ठीक हो जायेंगे.
यह बॉडी स्क्रब का भी काम करती है. बस नहाने से पहले हल्दी पाउडर, पानी और आटे का पेस्ट बनाइए और इस हल्के हाथों से शरीर पर रगड़िए. ऐसा कई बार लगातार करने से आपका शरीर चमक उठेगा. अगर गर्भावस्था के दौरान आपके पेट पर स्ट्रेच मार्क्स आ गये हैं और अब जा नहीं रहे हैं तो, हल्दी को दही में मिला कर बनाये गये पेस्ट को रोज अपने पेट पर 6 मिनट तक लगाएं. धीरे-धीरे स्ट्रेच मार्क्स चले जायेंगे.
यदि आप मुंह पर अनचाहे बाल से परेशान हैं, तो चेहरे पर हल्दी लगाना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. इसके प्रयोग से बालों की रंगत हल्की हो जाती है. अगर आपने अपने हाथों को किचन में खाना बनाते वक्त जला लिया है तो उस पर हल्दी और एलोवेरा जेल लगा लें. इससे जलन कम होगी और हाथों में दाग भी नहीं पड़ेगा.
हल्दी से दांत संबंधी बीमारी भी ठीक हो जाती है. दांतों में किसी प्रकार का संक्रमण होने पर हल्दी, सेंधा नमक और सरसों के तेल का पेस्ट बनाएं और इसको दिन में तीन बार अपने संक्रमण वाली जगह पर रखें. इसके बाद गुनगुने पानी से अपने मुंह को धो लें.
सुस्ती और थकान होने पर हल्दी और शहद को मिला कर पीने से राहत मिलती है. अगर आपके अंदर खून की कमी है तो भी यह मिश्रण आपके लिए रामबाण से कम नहीं होगा.

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

गंवार नही गंवार फ़ल्ली

हर्बल खजाना ----------------- 20

गंवार नही गंवार फ़ल्ली

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। घर घर में खायी जाने वाली प्रमुख सब्जियों में से गंवार फ़ल्ली एक है जिसकी खेती वृहद स्तर पर की जाती है। गंवार फ़ल्ली का वानस्पतिक नाम स्यामोप्सिस टेट्रागोनोलोबा है। डाँग- गुजरात के आदिवासी इसके फ़ल्लियों को सुखाकर चटनी तैयार करते है और मधुमेह के रोगी को ४० दिनो तक दिन में चार बार प्रतिदिन देते है, इनका मानना है कि ये काफ़ी फ़ायदा करता है।
पातालकोट के आदिवासी का मानना है कि फ़ल्लियों के बीजों को रात भर पानी में डुबोकर रखा जाए और अगले दिन सूजन, जोड दर्द और जलन देने वाले शारीरिक भागों पर लगाने से अतिशीघ्र आराम मिलता है। कच्ची फ़ल्लियों को चबाया जाए तो यह मधुमेह के रोगीयों के लिए हितकर होता है।
कच्ची फ़ल्लियों को पीसकर इसमें टमाटर और धनिया की हरी पत्तियों को डालकर चटनी तैयार की जाए और प्रतिदिन सेवन किया जाए तो आँखो की रौशनी बेहतर होती है और लगातार सेवन से कई बार चश्मा भी उतर जाता है। कच्ची फ़ल्लियों को अच्छी तरह से उबाल लिया जाए और उस पानी में अपने पैरों को कुछ देर तक डुबोया जाए तो फ़टे पैर और तालु ठीक हो जाते है। इसके बीजों को एक उत्तम पशुआहार माना जाता है।
आदिवासी अंचलों में इसकी फ़ल्लियों को सुखाकर इसमें सरसों के तेल को मिलाकर चौपायों को देने से उनके दूध उत्पादन में बढोतरी होती है। गंवार फ़ल्ली को जलाकर राख तैयार कर ली जाए व इसमें सरसों का तेल डालकर लेप तैयार किया जाए और चौपायों के घाव पर लगाया जाए तो उन्हे आराम मिल जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

अमरबेल: गंजेपन का उपाय


हर्बल खजाना ----------------- 19

अमरबेल: गंजेपन का उपाय

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। जंगलों, सडक, खेत खलिहानों के किनारे लगे वृक्षों पर परजीवी अमरबेल का जाल अक्सर देखा जा सकता है, वास्तव में जिस पेड पर यह लग जाती है, वह पेड धीरे धीरे सूखने लगता है। खैर, इसकी पत्तियों मे पर्णहरिम का अभाव होता है जिस वजह से यह पीले रंग की दिखाई देती है। इसके अनेक औषधिय गुण भी है।
अमरबेल का वानस्पतिक नाम कस्कूटा रिफ़्लेक्सा है। पूरे पौधे का काढा घाव धोने के लिए बेहतर है और यह टिंक्चर की तरह काम करता है। डाग गुजरात के आदिवासी हर्बल जानकार इसके बीजों और पूरे पौधे को कुचलकर आर्थराईटिस के रोगी को दर्द वाले हिस्सों पर पट्टी लगाकर बाँध दिया जाए तो काफ़ी फ़ायदा होता है।
गंजेपन को दूर करने के लिए पातालकोट के आदिवासी मानते है कि यदि आम के पेड पर लगी अमरबेल को पानी में उबाल लिया जाए और उस पानी से स्नान किया जाए तो बाल पुनःः उगने लगते है हलाँकि डाँग के आदिवासी अमरबेल को कूटकर उसे तिल के तेल में २० मिनट तक उबालते है और इस तेल को कम बाल या गंजे सर पर लगाने की सलाह देते है।
अमरबेल को कुचलकर इसमें शहद और घी मिलाकर पुराने घावों पर लगाया जाए तो घाव जल्दी भरने लगता है। आधुनिक अध्ययनों से पता चलता है कि इस पौधे का अर्क पेट के कैंसर से लड़ने में मदद कर सकता है। कई ग्रामीण अंचलों मे इसका काढा गर्भपात कराने के लिये दाईयों द्वारा दिया जाता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कच्ची कली कचनार की


हर्बल खजाना ----------------- 18

कच्ची कली कचनार की

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। हल्के गुलाबी लाल और सफ़ेद रंग लिये फ़ूलों वाले इस पेड को अक्सर घरों, उद्यानों और सडकों के किनारे सुंदरता के लिये लगाया जाता है। कचनार का वानस्पतिक नाम बाउहीनिया वेरीगेटा है। मध्यप्रदेश के ग्रामीण अँचलों में दशहरे के दौरान इसकी पत्तियाँ आदान-प्रदान कर एक दूसरे को बधाईयाँ दी जाती है।
इसे सोना-चाँदी की पत्तियाँ भी कहा जाता है। रक्तपित्त की दशा में कचनार के फ़ूलों की सब्जी तैयार कर रोगी को दिया जाता है। डाँग- गुजरात के आदिवासी सर्पदंश में कचनार की जडों को पानी में कुचलकर रस तैयार करते है और इसे हर आधे घंटे में घायल व्यक्ति को दिया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि यह जहर के दुष्प्रभाव को कम करता है। मुँह में छाले, घाव, या जीभ के कट जाने पर कचनार की छाल का काढा बनाकर मुँह में कुल्ला करने से जल्द ही आराम मिलता है। पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकार जोडों के दर्द और सूजन में आराम के लिये इसकी जडों को पानी में कुचलते है और फ़िर इसे उबालते है। इस पानी को दर्द और सूजन वाले भागों पर बाहर से लेपित करने से काफ़ी आराम मिलता है।
मधुमेह की शिकायत होने पर रोगी को प्रतिदिन सुबह खाली पेट इसकी कच्ची कलियों का सेवन करना चाहिए। ये कलियाँ अत्यधिक अम्लता या एसीडिटी होने पर भी काफ़ी फ़ायदा करती है। लगातार दस्त या डायरिया की शिकायत में कचनार की फ़ल्लियों का चूर्ण (लगभग ३-५ ग्राम) रोगी को दिया जाए तो आराम मिलता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

जल-जमनी: जमा दे पानी भी


हर्बल खजाना ----------------- 17

जल-जमनी: जमा दे पानी भी

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। जंगलों, खेतों की बाड, छायादार स्थानों और घरों के इर्द-गिर्द पायी जाने वाली इस अनोखी वनस्पति को न जाने आपने कितनी बार देखा हो लेकिन इसकी औषधिय महत्ता को कम लोग ही जानते है। इस वनस्पति का वैज्ञानिक नाम कोक्युलस हिरसुटस है।
जल को जमा देने के गुण की वजह से इसे जल-जमनी कहा जाता है। यदि इसकी कुछ पत्तियों को लेकर कुचल लिया जाए और इसे पानी में मिला दिया जाए तो कुछ ही देर में पानी जम जाता है अर्थात पानी एक जैली की तरह हो जाता है। आदिवासीयों का मानना है कि इस मिश्रण को यदि मिश्री के साथ प्रतिदिन लिया जाए तो पौरुषत्व प्राप्त होता है।
य़ही फ़ार्मुला गोनोरिया के रोगी के लिये भी बडा कारगर है। पत्तियों के काढे का सेवन दस्त, ल्युकोरिया और पेशाब संबंधित तमाम रोगों के निवारण के लिये किया जाता है। पातालकोट के आदिवासी जल-जमनी की पत्तियों और जडों को अच्छी तरह पीसकर जोडों के दर्द में आराम के लिये उपयोग में लाते है। यदि इसी मिश्रण में अदरख और शक्कर मिलाकर लिया जाए तो यह अपचन और कब्जियत में फ़ायदा देता है।
डाँग- गुजरात के आदिवासी सर्पदंश होने पर दंशित व्यक्ति को जल-जमनी की जडें (१० ग्राम) और काली मिर्च (४ ग्राम) को पानी में पीसकर रोगी को प्रत्येक १५ मिनट के अंतराल से पिलाते है। आदिवासियों का मानना है कि इस मिश्रण को देने से उल्टियाँ होती है और जहर का असर कम होने लगता है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

चिरोटा: फ़ोडे- फ़ुन्सियों मे असरदार



हर्बल खजाना ----------------- 16

चिरोटा: फ़ोडे- फ़ुन्सियों मे असरदार

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। खेत- खलिहानों, मैदानी भागों, सडक के किनारे और जंगलों में प्रचुरता से पाए जाने वाले इस पौधे में अनेक औषधिय गुणों की भरमार है। इसका वानस्पतिक नाम केस्सिया टोरा है। आदिवासी अंचलों में इसकी पत्तियों का उपयोग भाजी के तौर पर भी होता है और ऐसा माना जाता है कि यह भाजी अत्यधिक पौष्टिक होती है।
चिरोटा की पत्तियों और बीजों का उपयोग अनेक रोगों जैसे दाद-खाज, खुजली, कोढ, पेट में मरोड और दर्द आदि के निवारण के लिये किया जाता है। पत्तियों का उपयोग खाँसी और मवाद के साथ बने त्वचा घावों को खत्म करने के लिये भी होता है। पातालकोट के आदिवासी मुर्गी के अंडों से एल्बूमिन (अंडे के अंदर का चिपचिपा तरल पदार्थ) के साथ पत्तियों को अच्छी तरह से फ़ेंट कर टूटी हुयी हड्डियों के ऊपर प्लास्टर की तरह लगाते है, इनका मानना है कि ये हड्डियों को जोडने का कार्य करता है।
पत्तियों के काढे को दाँतों पर लगाने से दाँतों की समस्या जैसे दाँत दर्द आदि में आराम मिलता है। पीलिया होने पर डाँग- गुजरात के हर्बल जानकार चिरोटा की पत्तियों और बीजों का काढा रोगी को देते है। फ़ोडे और फ़ुन्सियाँ होने पर पत्तियों को कुचलकर लेपित किया जाए तो अतिशीघ्र आराम मिलता है। यदि किसी व्यक्ति को दाद-खाज और खुजली की समस्या हो तो चिरोटा के बीजों को पानी में कुचलकर रोग-ग्रस्त अंग पर लगाने से फ़ायदा होता है। आधुनिक विज्ञान भी इसके एंटी-बैक्टिरियल गुणों को साबित कर चुका है। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)

सोमवार, 27 अगस्त 2012

अमलतास विरेचक प्रवत्ति वाली औषधि


हर्बल खजाना ----------------- 15

अमलतास  विरेचक प्रवत्ति वाली औषधि

(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। झूमर की तरह लटकते पीले फ़ूल वाले इस पेड को सुंदरता के लिये अक्सर बाग-बगीचों में लगाया जाता है हलाँकि जंगलों में भी इसे अक्सर उगता हुआ देखा जा सकता है। अमलतास का वानस्पतिक नाम केस्सिया फ़िस्टुला है। अमलतास के पत्तों और फूलों में ग्लाइकोसाइड, तने की छाल टैनिन, जड़ की छाल में टैनिन के अलावा ऐन्थ्राक्विनीन, फ्लोवेफिन तथा फल के गूदे में शर्करा, पेक्टीन, ग्लूटीन जैसे रसायन पाए जाते है।
इस पेड की छाल का काढा पीलिया, सिफ़लिस और हृदय रोगों में दिया जाता है। पघ्ट दर्द में इसके तने की छाल को कच्चा चबाया जाए तो दर्द में काफ़ी राहत मिलती है। इसकी फ़ल्लियों के गूदे का सेवन दस्तकारक होता है और गर्भवती स्त्रियों को विरेचक औषधि के रूप में यह दिया जाता है।
वैसे संतुलित मात्रा में यह मधुमेह में भी हितकर है। फ़ल्लियों के गूदे का काढा आवाज की खरखराहट, गला बैठना जैसी शिकायत आदि में गुणकारी है। पातालकोट के आदिवासी बुखार और कमजोरी से राहत दिलाने के लिए कुटकी के दाने, हर्रा, आँवला और अमलतास के फ़लों की समान मात्रा लेकर कुचलते है और इसे पानी में उबालते है, इसमें लगभग ५ मिली शहद भी डाल दिया जाता है और ठंडा होने पर रोगी को दिया जाता है। डाँग गुजरात के आदिवासी कहते है कि इसके पत्ते मल को ढीला और कफ को दूर करते हैं। फूल भी कफ और पित्त को नष्ट करते हैं। (साई फीचर्स)

(लेखक हर्बल मामलों के जाने माने विशेषज्ञ हैं)