शुक्रवार, 3 मई 2013

चंद लान्स पर प्रतिबंध!


चंद लान्स पर प्रतिबंध!

(शरद खरे)

सिवनी शहर की सीमा के अंदर एक के बाद एक कुकुरमुत्ते के मानिंद लान उभरकर आए थे। इनमें से अनेक लान या तो अस्पताल के पास संचालित हो रहे थे, या फिर आबादी वाले क्षेत्रों में। इनमें होने वाले प्रोग्राम्स के दौरान कानफाडू डीजे से मरीज और आसपास के रहवासियों का बुरा हाल था। लंबे समय तक इन लान्स को बंद कराने के लिए समाजसेवी अधिवक्ता बाबा पाण्डे ने पहल की। लंबे समय बाद जिला प्रशासन चेता और इन लान्स में से कुछ लान्स को नेस्तनाबूत कर दिया गया। शहर के अंदर आज भी कुछ लान धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। इन लान्स के पास ना तो पार्किंग है और ना ही अन्य जरूरी अर्हताएं ही ये पूरी कर रहे हैं जो इनके संचालन के लिए आवश्यक हैं।
नगर पालिका परिषद सिवनी द्वारा अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देयवाली कहावत को चरितार्थ करते हुए लान्स संचालकों को पालिका प्रशासन ने नोटिस जारी कर कहा कि वे अर्हताएं पूरी करें। अर्हताएं कहां से किस सक्षम अधिकारी से पूरी करवाई जाएं यह बताना भी नगर पालिका प्रशासन की ही जवाबदेही है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पालिका प्रशासन द्वारा इस संबंध में लान संचालकों को अंधेरे में रखा गया कि वे फायर संबंधी अनुज्ञा या अनुमति किससे प्राप्त करें।
जिला प्रशासन द्वारा लान्स संचालकों को अल्टीमेटम देकर लान को नेस्तनाबूत कर दिया। कुछ संचालकों को समय देकर लान तुड़वा दिए गए। बाकी के लान्स मुंह उठाए धड़ल्ले से संचालित होकर इन्हें मुंह चिढ़ा रहे हैं। आज शहर में लान का किराया लगभग तीन गुना तक बढ़ चुका है। लान का किराया कितना हो यह कौन तय करेगा! लान की संख्या कम होने के कारण संचालकों की मनमानी चरम पर है। संचालक लान को किराए पर देने के साथ ही साथ खाने पीने का प्रबंध उन्हीं को देने की बाध्यता रख रहे हैं जिससे आम आदमी बुरी तरह लुट रहा है।
लान की सीमित संख्या के चलते एक बार फिर शहर के अंदर सड़कों पर शादी ब्याह के पंडाल दिखने आम हो गए हैं। इससे आवागमन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। साथ ही साथ नगर पालिका परिषद द्वारा शहर के अंदर बनाई गई सीमेंट की सड़कों पर गड्ढ़े हो रहे हैं। इन गड्ढ़ों को भरने के लिए नगर पालिका एक बार फिर टेंडर निकालेगी और इसमें भ्रष्टाचार की गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता है। सड़कों पर खड़े शादी ब्याह के पंडाल से मोहल्ले के निवासियों के साथ वहां से होकर गुजरने वाले बुरी तरह हलाकान हो जाते हैं। साथ ही साथ बचा गंदा बासा खाना कर्इ्र दिनों तक नालियों में पड़ा रहता है जिससे नालियां दुर्गन्ध से बजबजाती रहती हैं। पंडाल के पास खड़े पानी के टेंकर भी आसपास कीचड़ करते नजर आते हैं।
बीते कुछ सालों से शहर में लान संस्कृति के आने से कम से कम लोगों को सड़क पर जाम लगने की दुविधा से मुक्ति अवश्य मिली थी, पर कुछ लान्स के पास पार्किंग ना होने से वहां सड़क पर जाम लगने की शिकायतें बहुतायत में आ रही हैं। शादी ब्याह के अवसर पर पंडाल या लान में सजावट के लिए कपड़ों का इस्तेमाल बहुतायत में किया जाता है। इन पंडाल में आग लगने का खतरा बना रहता है। देखा जाए तो पंडाल या लान्स में आग बुझाने के इंतजाम नाकाफी ही कहे जा सकते हैं। नगर पालिका परिषद के पास दो दमकल हैं, जो गर्मी के मौसम में चौबीसों घंटे व्हीव्हीआईपीज के घरों की टंकियों को भरकर अपनी सांसें फुलाती रहती है। यही आलम पानी के टेंकर्स का होता है। कहने को पालिका के पास फायर फायटर्स टेंकर्स हैं पर इन टेंकर्स में लगी मशीन शोभा की सुपारी बनी हुई है। फायर ब्रिगेड के पास पर्याप्त दूरी का लंबा पाईप ना होने से कभी भी समस्या से दो चार होना पड़ सकता है। यह सब कुछ अदूरदर्शिता का ही परिणाम कहा जाएगा। ज्ञातव्य है कि पूर्व में सांसद और विधायक रहते हुए श्रीमति नीता पटेरिया ने नगर पालिका परिषद को टेंकर्स प्रदाय किए थे। वे किस गुणवत्ता के और कितनी कीमत के थे यह बात किसी से छिपी नहीं हैं। श्रीमति पटेरिया भाजपा की विधायक हैं पर कांग्रेस ने इस भ्रष्टाचार पर अपना मुंह सिले रखा।
सिवनी की लान की समस्या पर भी राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर भाजपा को कोसने वाले कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने मौन ही साधे रखा। लगता है कि सियासी दलों के नेताओं और प्रवक्ताओं को जिले से ज्यादा चिंता देश और प्रदेश की है। वे भूल जाते हैं कि प्रदेश और देश में कांग्रेस संगठन ने अपने पदाधिकारी और प्रवक्ताओं को पाबंद किया है जो अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन बखूबी कर रहे हैं। लगता है तू मेरी ढांक मैं तेरी ढांकू की तर्ज पर जानबूझकर या किसी नेता विशेष के इशारे पर सिवनी में कांग्रेस और भाजपा समन्वय बनाकर चल रही है।
देखा जाए तो लान पर प्रतिबंध के मामले में जिला प्रशासन को एक सी नीति को ही अपनाया जाना चाहिए था। क्या कारण है कि बारापत्थर क्षेत्र के आधा दर्जन लान पर प्रशासन का कहर बरपा पर बाकी के लान आज भी बेखौफ ही संचालित हो रहे हैं। लान पर प्रशासनिक कार्यवाही को लंबा समय बीत चुका है, बाकी के लान संचालित हैं इससे लगता है मानो टूटे लान के संचालकों के प्रति प्रशासन का दुराग्रह वाला रवैया था, वरना क्या कारण था कि बाकी के लान्स पर आंच तक नहीं आई। आज आलम यह है कि छोटे मोटे लाज, रेस्तरां भी शादी ब्याह करवाने का दावा करने लगे हैं। इसके लिए बहुत अधिक मात्रा में शुल्क वसूला जा रहा है। सक्षम लोग तो इनका भोगमान भोग सकते हैं पर वे बेचारे गरीब क्या करें जो महज तीस चालीस हजार में ही लान बुक करा लिया करते थे? किसी भी विधायक ने इस मामले को विधानसभा की दहलीज तक ले जाने की जुर्रत नहीं की। जब जिला मुख्यालय की इस तरह की ज्वलंत समस्या में यह स्थिति है तो सुदूर ग्रामीण अंचलों की समस्याओं के बारे में सोचकर ही रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा हो जाती है।

बुधवार, 1 मई 2013

डेढ़ लाख और एक नौकरी में बरी हो जाएंगे गौतम थापर!


. . . और खामोश हो गई सिवनी की लाड़ो

डेढ़ लाख और एक नौकरी में बरी हो जाएंगे गौतम थापर!

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। उसकी मां बस एक बार उसकी तोतली आवाज सुनना चाहती थी, लेकिन अब वह अपनी गुड़िया सी बच्ची की तोतली आवाज कभी नहीं सुन पायेगी। मध्य प्रदेश के सिवनी में दो समझदार लोगों की हैवानियत का शिकार बनी वह चार साल की अबोध बच्ची चिरनिद्रा में समा गई। एक हफ्ते तक उसको बचाने की जितनी कोशिशें हुईं, आखिरकार सब बेकार हो गईं और सोमवार की शाम 7.50 पर उसकी कोमल देह को डॉक्टरों द्वारा लाश घोषित कर दिया गया।
बीते 17 अप्रैल को सिवनी जिला मुख्यालय से सटे एक गांव की वह अबोध बच्ची गायब हुई तो अगले दिन मरघट के पास मरी हुई सी अवस्था में ही मिली थी। जब घर से गायब हुई तो आखिरी बार फिरोज खान के साथ देखी गई थी। घंसौर में गौतम थापर के अथर्वा पॉवर प्लांट में काम करनेवाला फिरोज उसे खाने पीने के नाम पर कुछ देने के बहाने अपने साथ ले गया था।
क्षत विक्षत हालत में मिले उसके पवित्र शरीर पर अपवित्रता के दर्दभरे दाग ने परिवारवालों को मजबूर किया कि अस्पताल से पहले वे पुलिस के पास जाएं। वे पुलिस के पास गये भी। पुलिस ने मामला दर्ज भी किया। जबलपुर में उसका इलाज भी शुरू हुआ लेकिन उस अबोध मन और कोमल शरीर के साथ कुछ ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम दे दिया गया था कि वह बच्ची जो बेहोश हुई तो फिर कभी होश में नहीं आ पाई। सिर्फ उसके साथ जिस्मानी अत्याचार नहीं हुआ था, उसको गला दबाकर मारने की भी कोशिश की गई थी।
मामले में हंगमा खड़ा होता देख मध्य प्रदेश सरकार ने बेहतर इलाज के लिए उसे नागपुर शिफ्ट कर दिया। सिवनी से नागपुर नजदीक पड़ता है इसलिए उसे एयर एम्बुलेंस से तत्काल नागपुर भेज दिया गया। उसे नागपुर के केयर अस्पताल में भर्ती करवाया गया। नागपुर से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो से आशीष कौशल ने बताया कि अस्तपाल में करीब एक सप्ताह तक इलाज चलने के बाद भी वह बच्ची होश में नहीं आ पाई और सोमवार शाम को केयर अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अस्तपाल प्रवक्ता ने कहा है कि हमने इस संबंध में मध्य प्रदेश सरकार को सूचना दे दी है। बच्ची के पार्थिव शरीर को शल्यक्रिया के लिए सरकारी मेडिकल कालेज भेज दिया गया है।
देश, समाज की सड़ती सोच, बोने साबित होते कानून, खोखली पुलिस, सबको सबकुछ छोड़कर सिवनी की लाडो दुनिया को अलविदा कह गयी। 13 दिनों तक दर्द, दवाओं को सहती रही लेकिन वहेशी दरिंदे ने जो जख्म दिये थे। 4 साल की मासूम बच्ची उन्हें सह नहीं सकी।
आज शाम लगभग पांच बजे उसका अंतिम संस्कार घंसौर में संपन्न हुआ जिसमें प्रभारी मंत्री नाना भाउ माहोड़, विधायक शशि ठाकुर सहित प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
0 छावनी में तब्दील हुआ घंसौर
घंसौर क्षेत्र के लोगों को ब पता चला कि उनकी मासूम गुडिय़ा उनसे हमेशा- हमेशा के लिए विदा हो गई तो घंसौर के लोगों की हर आंखों में आंसू छलक पड़े। हीं अपनी प्यारी गुडिय़ा की खबर सुनकर कहीं घंसौरवासी आक्रोशित न हो जाए, इसके लिए घंसौर में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। वहीं, नागपुर केयर अस्पताल में 04 साल की मासूम की मौत हो जाने के बाद अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई थी, ताकि आक्रोशित लोग किसी अप्रिय घटना को अंजाम न दें दे।
0 डॉ. वर्मा व भारद्वाज पर अपराधिक मामला दर्ज कराने की मांग
नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने गत दिवस पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर गुडिया के इलाज में लापरवाही बरतने के मामले में जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. एलपी वर्मा एवं शिशु रोग विभाग के डॉ. वीके भारद्वाज पर अपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाये। पुलिस ने शिकायतकर्ता मंच के अध्यक्ष डॉ. पीजी नाजपाण्डे के बयान दर्ज करने के साथ ही मेडिकल अस्पताल के डीन को एक पत्र लिखकर 24 घंटे के भीतर जवाब पेश करने के लिये कहा है।
शिकायत में बताया गया है कि बालिका 18 अप्रैल की सुबह 11.30 बजे मेडिकल कॉलेज अस्पताल के शिशु रोग विभाग में भर्ती कराई गई थी, उस समय बच्ची को फिट आ रहे थे, तथा उसका ब्रेन डेमेज होने की कगार पर था। परीक्षण के बाद निष्कर्ष निकला कि यह रक्त में ऑक्सीजन की कमी के कारण मस्तिष्क की क्षति का मामला है। बाद में रात 11 बजे बच्ची को जब जबलपुर अस्पताल भर्ती किया तो वहां ब्रेन सिटी स्केन में यह प्रमाणित भी हो गया था। डॉक्टर के ऊपर कार्यवाही किये जाने की मांग उपभोक्ता मंच के राजेंद्र पटेल, रजनी निगम, संजय दुबे, शहजादी अंसारी, रीना सोनकर, मुस्कान यादव ने की है।
ढाई बजे सिवनी से गुजरी गुडिया
नागपुर में पोस्टमार्टम के बाद मासूम गुडिय़ा के शव को लेकर घंसौर की ओर निकला वाहन क्रं. एमएच 31 डीएच 6077 एम्बूलेंस धंतौली लगभग ढाई बजे सिवनी बायपास पहुंचा और वहीं से पलारी की ओर से होते हुए घंसौर की ओर रवाना हुआ।
इस मौके पर प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्यमंत्री श्री देवी सिंह सैय्याम, लखनादौन की विधायिका श्रीमती शशि ठाकुर, बरघाट के विधायक कमल मर्सकोले, घंसौर की जनपद पंचायत अध्यक्ष श्रीमती चित्रलेखा नेताम, कलेक्टर भरत यादव, पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला, अपर कलेक्टर आर.बी.प्रजापति, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मुकेश श्रीवास्तव, जनपद पंचायत सदस्यगण व अन्य क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों सहित बडी संख्या में ग्रामीणजन एवं पत्रकारगण भी उपस्थित थे।
0 बंटने लगी राहत राशि
इस मौके पर श्री सैय्याम ने बालिका के माता-पिता को मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से मंजूर २ लाख रूपये की मदद राशि का चैक भी सौंपा। श्री सैय्याम ने कहा कि परिजनों को शीघ्र ही इंदिरा आवास भी दिलाया जायेगा। कलेक्टर भरत यादव ने बताया कि आगामी १७ मई को मुख्यमंत्री शिवराज ङ्क्षसह चौहान सिवनी जिले में अटल ज्योति अभियान के शुभारंभ कार्यक्रम में शामिल होंगे, इस मौके पर सिवनी जिला मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान वे दिवंगत बालिका के माता-पिता से भी मिलेंगे।
कलेक्टर श्री यादव ने दिवंगत बालिका के पिता को भरोसा दिलाया कि उन्हें झाबुआ पावर प्लांट में स्थायी नौकरी दिलाई जायेगी और प्लांट में स्थायी नौकरी का नियुक्ति पत्र खुद जिला प्रशासन उन्हें उपलब्ध करायेगा। कलेक्टर ने बताया कि बालिका की माता को (जहां कही भी संभव हो), वहां कलेक्टर रेट पर रसोईया की स्थाई नौकरी दिलाई जायेगी। बालिका के माता-पिता का बैंक खाता भी खुलवा दिया जायेगा और उन्हें सभी शासकीय योजनाओं का पात्रतानुसार लाभ दिलाया जायेगा।
उन्होंने बताया कि बालिका के परिवार को कलेक्टर के विशेष कोटे से इंदिरा आवास भी मंजूर कर दिया गया है। नये वित्तीय वर्ष का इंदिरा आवास का आवंटन आते ही सबसे पहले इस परिवार को ही इंदिरा आवास दिया जायेगा। दिवंगत बालिका के अन्य भाई-बहनों की पढाई-लिखाई एवं उनके लालन-पालन का संपूर्ण खर्चा भी राश्य सरकार उठायेगी। उन्होंने कहा कि पीडित परिवार को हर प्रकार की मदद दिलाई जायेगी।
0 डेढ़ लाख के डिपिजिट की रसीद!
सारे फसाद की जड़ देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड ने भी चौदह दिन बाद दरियादिली दिखाते हुए गुड़िया के तीन भाई बहनों के नाम से पचास पचास हजार रूपए की राशि फिक्स डिपाजिट कर दी है। जिसकी रसीद उन्होंने परिजनों को सोंपी। क्षेत्र में चर्चा व्याप्त है कि महज डेढ़ लाख रूपए में गौतम थापर ने अपनी जान इस पूरी प्रकरण से छुड़ा ली है।

एमपी जनसंपर्क को ठेके पर देने की तैयारी


0 लूट लिया लाजपत ने जनसंपर्क

एमपी जनसंपर्क को ठेके पर देने की तैयारी!

(आकाश कुमार)

नई दिल्ली (साई)। भारतीय जनता पार्टी जबसे मध्य प्रदेश पर काबिज हुई है तबसे मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग चर्चाओं में रहा है। कभी यहां के अफसरान भाजपा के संगठन की सेवा में हाथ बांधे खड़े दिखते हैं तो कभी विज्ञापनों में जमकर घालमेल और मनमानी तो कीभी पत्रकारों को दी जाने वाली सुविधाओं और अधिमान्यता आदि के लिए शासन स्तर पर भेजने की बात कहकर प्रताड़ित किया जाता है। हाल ही में दिल्ली में मध्य प्रदेश के सूचना केंद्र में एक अदने से अधिकारी को प्रभारी बनाने का मामला सामने आया है।
ज्ञातव्य है कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के मंहगे और व्यवायिक इलाके कनाट सर्कस के बाराखम्बा रोड़ में एम्पोरिया हाउस में मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग का सूचना केंद्र स्थापित है जो दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले पत्रकारों को ना केवल समय समय पर प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देता है, वरन् प्रदेश के मंत्री संत्री के दिल्ली आने पर उनसे मीडिया को रूबरू भी करवाता है।
इसकी स्थापना से अब तक इस कार्यालय में अतिरिक्त अथवा संयुक्त संचालक स्तर के अधिकारियों की तैनाती रही है। संभवतः इतिहास में पहली बार देश की राजधानी के इतने बड़े और महत्वपूर्ण कार्यालय का भार सहायक संचालक स्तर के अधिकारी के कांधों पर रखा जा रहा है। एमपी की राजधानी भोपाल से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो से राजेश शर्मा ने बताया कि राज्य शासन ने उज्जैन संभागीय कार्यालय में संयुक्त संचालक अर्जुन सिंह सोलंकी के अधीन कार्यरत सहायक संचालक अरूण राठौर को दिल्ली स्थित सूचना केंद्र का प्रमुख बनाकर भेजा है।
अमूमन सहायक संचालक को जिलों में मीडिया और प्रशासन के बीच जुगलबंदी बनाने के लिए पदस्थ किया जाता है को देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बिठाया जाना निश्चित तौर पर जनसंपर्क विभाग में चल रही उन चर्चाओं को ही बल दे रहा है जिनमें कहा जा रहा था कि जनसंपर्क विभाग की सत्ता की धुरी बन चुके अपर सचिव लाजपत आहूजा द्वारा जल्द ही जनसंपर्क विभाग को ठेके पर देने की कार्यवाही करने वाले हैं।
यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर एक सहायक संचालक स्तर का अधिकारी जो दिल्ली की भौगोलिक स्थिति से भी रूबरू ना हो वह दिल्ली में कब एमपी बीट कव्हर करने वाले पत्रकारों की तासीर जान पाएगा? कब वह अधिकारी इन पत्रकारों में से असली और लिखने पढ़ने वाले पत्रकारों को छांट पाएगा? जब तक वह यह सब कुछ कर पाएगा तब तक चुनाव ही सर पर आ जाएगा।
साई न्यूज के भोपाल ब्यूरो राजेश शर्मा ने मध्य प्रदेश जनसंपर्क संचालनालय के सूत्रों के हवाले से कहा कि दिल्ली के सूचना केंद्र में एक भी कर्मचारी मध्य प्रदेश मूल का पदस्थ नहीं है। अगर दिल्ली कार्यालय का पक्का आडिट करवा दिया जाए तो अनेक कर्मचारियों की गरदन नप सकती है। जनता के पैसों की जमकर होली खेली गई है दिल्ली के सूचना केंद्र में।
सूत्रों ने साई न्यूज को आगे बताया कि चुनावी साल में शिवराज सिंह चौहान की मुसीबतें बढ़ाने की गरज से ही लाजपत आहूजा द्वारा फेंके गए पांसे में जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव फंस चुके हैं। दिल्ली जैसे स्थान पर अनुभवी अफसरों के बजाए सहायक संचालक स्तर के अफसर की तैनाती वाकई में चौंकाने वाली है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि कांग्रेस के इशारे पर जनसंपर्क विभाग ने यह तीर चलाया है।
देखा जाए तो देश की दिशा और दशा दिल्ली से ही निर्भर करती है। दिल्ली के बड़े राजनेता सुबह जागते ही दिल्ली के अखबार मांगते हैं। अगर वे दौरे पर हों तो ईपेपर निकालकर उन्हें दिए जाते है। दिल्ली में राज्यों का जनसंपर्क विभाग पत्रकारों को साधे रखता है। अब अरूण राठौर जब दिल्ली पहुंचकर कार्यभार ग्रहण करेंगे तब कम से कम तीन माह में तो वे पत्रकारों को नाम और चेहरे से पहचान पाएंगे।
जनसंपर्क के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को यह भी बताया कि सबसे आश्चर्यजनक पहलू तो यह है कि दिल्ली में पदस्थ संयुक्त संचालक प्रदीप भाटिया को भोपाल वापस बुलाकर उन्हें पुलिस मुख्यालय तो उप संचालक संजय सक्सेना को ग्वालियर पदस्थ कर दिया गया है। इस तरह अब दिल्ली में मीडिया पर्सन्स को पहचानने और मीडिया पर्सन्स की पहचान वाले एक भी अफसर सूचना केंद्र में नहीं बचे हैं।
एैन चुनावी साल में आचार संहिता लगने से महज चार माह पहले इस तरह का परिवर्तन आत्मघाती ही साबित हो सकता है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। सूत्रों ने कहा कि जनसंपर्क विभाग की सत्ता और शक्ति के सूत्रधार आला अधिकारियों ने इस बात का ताना बाना बुनना आरंभ कर दिया है कि जनसंपर्क विभाग के दिल्ली स्थित सूचना केंद्र को आउट सोर्स यानी ठेके पर दे दिया जाए।
सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को यह भी बताया कि एक दो माह में दिल्ली के जनसंपर्क विभाग के सूचना केंद्र के पुअर परफार्मेंस का प्रतिवेदन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष रखकर उन्हें इस बात के लिए राजी कर लिया जाएगा कि इस कार्यालय को ठेके पर दे दिया जाए। फिर निजी पीआर कंपनियों को मनमानी दरों पर इसे ठेके पर देकर चुनावी साल में एक बार फिर मलाई खाने की तैयारी में दिख रहे हैं जनसंपर्क विभाग के कर्णधार!
इस संबंध में जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को जनसंपर्क विभाग की वेब साईट पर उनके निवास के नंबर 07552430988 पर कहा गया कि यह सीपीआर के घर के गार्ड रूम का नंबर है साहब के घर का क्या नंबर है यह उन्हें नहीं पता और सीपीआर का मोबाईल स्विच्ड आफ ही आता रहा।

शिकारी जंगल तो वन्यजीव घर की ओर


शिकारी जंगल तो वन्यजीव घर की ओर

शरद खरे 

मंगलवार को बंडोल के समीप बखारी से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर रामगढ़ में एक तेंदुआ घर के अंदर घुस गया जिससे क्षेत्र में दहशत फैल गई। तेंदुए के घर में घुसने की खबर पुलिस और वन विभाग को लगी। दोनों ही सरकारी महकमों के अफसरों ने त्वरित कार्यवाही की। मौके पर पहुंचे और उसे पकड़ने का असफल प्रयास किया। वाईल्ड लाईफ के कथ्ति एक्सपर्टस माने जाने वाले अफसर भी इस दल में थे। गुस्साया तेंदुआ एक घर से दूसरे घर में जा घुसा। वन विभाग के कारिंदों ने उसे बेहोश करने का भी प्रयास किया पर वे असफल ही रहे। वन विभाग में अफसरशाही के बेलगाम घोड़े दौड़ रहे हैं। मौके पर टीम अपने साथ एक पिंजरा भी ले गई पर वह पिंजरा छोटा निकला। बाद में बड़ा पिंजरा बुलवाया गया, किन्तु तेंदुआ किसी के हाथ ना आया। यह तो भगवान की रहमत थी कि तेंदुए ने किसी को घायल नहीं किया।
बाद में वन मण्डल अधिकारी श्री कोरी कहते हैं कि उस तेंदुए को पकड़ने का प्रयास ही नहीं किया गया। श्री कोरी का बयान गैरजिम्मेदाराना है। अगर उस तेंदुए को पकड़ने वन विभाग के एक्सपर्टस नहीं गए थे तो क्या वे वहां जाकर मीडिया पर्सन्स की मौजूदगी में फोटो खिचवाने का काम कर रहे थे। अगर उसे पकड़ा नहीं जाना था तो फिर मौके पर पहले छोटा और फिर बड़ा पिंजरा ले जाने का क्या ओचित्य था? क्यों वन विभाग के गुलाब नवानी घर की खप्पर वाली छत पर चढ़कर छप्पर हटवा रहे थे, क्यों उन्होंने जाल फेंकने की कोशिश की?
डीएफओ श्री कोरी का बयान अपने मातहतों की असफलता को छुपाने के लिए था। उनके मातहत मौके पर पहुंचे और फौरी तौर पर ही उनकी रणनीति गलत रही। कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर शायद वन विभाग ना दे पाए, मसलन क्या वे अपने साथ तेंदुए को बेहोश करने के लिए विशेषज्ञ और ट्रंकुलाईजर ले गए थे? क्या वे जल्दबाजी में छोटा पिंजरा ले गए थे? क्या उन्हें पहले से आशंका थी कि रामगढ़ या आसपास के गांवों में वन्य प्राणी आबादी के पास आ सकते हैं? क्या सिवनी जिले में जंगले से लगे आबादी वाले गांवों को वन विभाग ने चिन्हित किया है जहां खतरनाक वन्यजीव आ सकते हैं? क्या इस तरह की परिस्थितियों से निपटने वन विभाग के पास पर्याप्त संसाधन, सुविधाएं और दल बल है?
डीएफओ श्री कोरी का यह कहना कि वह तेंदुआ दुबारा उस गांव में नहीं आएगा, हास्यास्पद ही माना जाएगा। लगता है मानो उस तेंदुए को वन विभाग ने पहचान लिया हो और उसे कालर आईडी लगाई गई हो, ताकि यह पता चल सके कि वह कब और कहां रहता है। डीएफओ श्री कोरी का कहना है कि उन्होंने वहां दो वनकर्मी तैनात कर दिए हैं और लोगों को समझाईश दे दी गई है कि वे अपने घरों के पिछले दरवाजे बंद रखें। यह तो कोई समझदारी वाली बात ही नहीं कही जाएगी। अगर एसा हुआ तो आने वाले समय में जंगल की सीमा से लगी बसाहट में सिर्फ सामने के द्वार वाले मकान ही नजर आएंगे।
याद पड़ता है कि नब्बे के दशक के उम्मरार्ध में सिवनी जिले में जब प्रदेश में वन मंत्री के पद पर केवलारी के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर विराजमान थे तब वनों में ग्रीष्म काल के दौरान वन्य जीवों को पानी मुहैया करवाने के लिए बड़े बड़े टांकों का निर्माण करवाया गया था। इन पानी के टांकों को भरने के लिए वन विभाग को बाकायदा टेंकर्स भी प्रदाय किए गए थे। सालों बीत गए ना तो टांकों का पता है और ना ही उन टेंकर्स का।
यही कारण है कि वन्य जीव विशेषकर खतरनाक वन्य जीव गर्मी में जब जंगलों के अंदर पानी के स्त्रोत सूख जाते हैं तब पानी की तलाश में जंगल से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रूख कर लेते हैं। सिवनी जिले में अनेक घटनाएं अब तक घट चुकी हैं जिनमें पशुधन और कई लोगों की जान भी जा चुकी है। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में भी एक बार एक तेंदुआ या गुलबाघ बबरिया तालाब के पास से डालडा फेक्ट्री होते हुए बारापत्थर तक जा पहुंचा था। पिछले साल जिला मुख्यालय की सीमा से लगे छतरपुर गांव के करीब एक व्यक्ति को भी किसी जानवर ने घायल कर दिया था और उसने दम तोड़ दिया था।
वन विभाग का काम वन संपदा और वन्य जीवों की रक्षा के साथ ही साथ वन्य जीवों के हमलों से आम आदमी को बचाना भी है। वन विभाग के पास बड़ी मात्रा में हर साल फंड आता है। पैसों की शायद ही इस विभाग के पास कमी हो, फिर भी सिवनी जिले में वन्य जीवों का शिकार वन संपदा की चोरी आम बात हो गई है।
लगभग पांच हजार किलोमीटर क्षेत्रफल वाला चंदन बगीचा आज कहां है किसी को पता ही नहीं है। इस चंदन बगीचे का चंदन बेशकीमती माना जाता था। इसकी प्रसिद्धि देश और विदेश तक में थी। नब्बे के दशक तक सिवनी में चंदन बगीचे की बात सुनाई देती थी। इसके बाद जंगल के तस्करों ने इस बगीचे को नेस्तनाबूत कर दिया और इसकी रक्षा के लिए सरकारी तनख्वाह पाने वाले वन विभाग के कर्मचारी हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। इसका कारण लंबे समय से एक ही जिले में इनकी तैनाती है। राजनैतिक चापलूसी कर कारिंदे एक ही जिले में अपनी पूरी नौकरी गुजार देते हैं।
सिवनी में दुर्लभ काले हिरण बहुतायत में पाए जाते हैं। इनकी तादाद सिवनी जिले में पांच हजार से ज्यादा होगी। इन काले हिरणों को जिला मुख्यालय से महज तीन चार किलोमीटर के व्यास क्षेत्र के बाहर देखा जा सकता है। काले हिरणों का जमकर शिकार होने की खबरें हैं। कई बार आरोपी पकड़ाए भी हैं, फिर भी इनका शिकार नहीं रूक पा रहा है। शिकार के शौकीन लोग दिन दहाड़े अपने मजे और इसके लज़ीज़ गोश्त के लिए इन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। जिला प्रशासन को चाहिए कि वन्य जीवों की रक्षा के लिए वन विभाग पर सख्त रवैया अपना, साथ ही आम जनता की सुरक्षा के लिए भी वन विभाग को ताकीद करे। इसके अलावा ब्लेक बक यानी काले हिरणों के लिए एक प्रथक सैंचुरी बनाने का प्रस्ताव भी शासन को भेजकर इनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करे।

गुड़िया, क्षमा करना हम शर्मिंदा हैं


गुड़िया, क्षमा करना हम शर्मिंदा हैं


(लिमटी खरे)

तेरह का आंकड़ा बहुत ही अशुभ माना जाता है सनातन पंथियों में। तेरह के अंक को लेकर ना जाने कितनी किंवदंतियां हैं। टेलीफोन में तेरह नंबर लेना कोई पसंद नहीं करता। वाहनों के पंजीयन में भी 13 नंबर दिखाई नहीं देता। मानव की मृत्यु के उपरांत सनातन पंथियों में उसकी अंतिम रस्म तेरहवीं ही होती है। तेरहवें दिन ही सिवनी की गुडिया ने अपनी अंतिम सांस ली। गुडिया के प्राण त्यागने से ना जाने कितने प्रश्न अब अनुत्तरित ही रह जाएंगे। मामला दिल्ली या मुंबई का होता तो निश्चित तौर पर टीवी चेनल्स चीख चीख कर अपना गला बिठा चुकंे होते। जंतर मंतर, इंडिया गेट आदि पर क्रोधित युवाओं की फौज ने पुलिस की नाक में दम कर दिया होता, पर चूंकि मामला देश के हृदय प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील का था तो उसे ज्यादा तवज्जो मिलने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। 17 अप्रेल को घटी इस घटना के बारे में लोग 20 अप्रेल से इसलिए सक्रिय हुए क्योंकि समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के सिवनी ब्यूरो से संजीव प्रताप सिंह की एक खबर दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाईम्स और दैनिक जागरण के न्यूज वेब पोर्टल्स पर सुर्खियां बन गई थी। इसके बाद ही मामले ने उछाल लिया और फिर सक्रिय हुआ शासन प्रशासन।
कितने आश्चर्य की बात है कि चार साल की गुड़िया को जबलपुर इलाज के लिए ले जाया गया। जहां उसके इलाज में लापरवाही बरतने के संगीन आरोप हैं। इसके बाद उसे एयर एंबूलेंस से नागपुर ले जाया गया। नागपुर के केयर अस्पताल का सुझाव आखिर दिया किसने? क्या केयर अस्पताल इस मासूम के इलाज के लिए सक्षम था? जिस अस्पताल में जांच की जरूरी सुविधाएं ही ना हों उस अस्पताल में मासूम को ले जाने का क्या ओचित्य? प्रदेश सरकार ने जाने अनजाने में केयर अस्पताल की ब्रॉडिंग का काम कर दिया है। अब केयर अस्पताल यह दावा आसानी से कर सकता है कि कम से कम मध्य प्रदेश सरकार की नजरों में नागपुर का केयर अस्पताल सर्वेश्रेष्ठ है। मासूम को जांच के लिए दूसरे अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ा। केयर अस्पताल को हाल ही में मध्य प्रदेश शासन के कर्मचारियों के लिए पेनलबद्ध किया गया है। अस्पताल अपने आप को पेनलबद्ध क्यों कराते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है। जाहिर है अपनी अस्पताल रूपी दुकान की दिन दूनी रात चौगनी वृद्धि के मद्देनजर एैसा किया जाता है।
सवाल यह उठता है कि जब उसे एयर एंबूलेंस से जबलपुर से नागपुर ले जाया गया तो क्या मासूम को एयर एंबूलेंस से जबपलुर से नई दिल्ली नहीं ले जाया सकता था? क्या कारण था के मासूम के इलाज में कोताही बरती गई? इसके लिए दोषी कौन है? जब तक मामला नहीं उछला तब तक मासूम को घंसौर जैसी छोटी जगह पर ही इलाज के लिए रखा गया? उसे जिला चिकित्सालय सिवनी तक नहीं ले जाया गया? क्या यही है देश के उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर के नियम कायदों का निर्वहन।
आरोपी फिरोज मेसर्स झाबुआ पावर का कर्मचारी है। 20 अप्रेल को जिला जनसंपर्क अधिकारी द्वारा एसएमएस और सरकारी खबर जारी कर बच्ची के इलाज का खर्च संयंत्र प्रबंधन द्वारा उठाए जाने की बात कही। फिर उमाशंकर गुप्त बच्ची को देखने नागपुर पहुंचे तब दूसरी खबर जारी की गई सरकारी तौर पर कि बच्ची के इलाज का खर्च प्रदेश सरकार उठाएगी। कुछ युवाओं ने गली गली घूमकर सत्रह हजार रूपए चंदा भी किया। सवाल यह उठता है कि क्या मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड का प्रबंधन इतना निष्ठुर और निर्दयी हो गया है कि वह उसके एक कर्मचारी के द्वारा दुष्कर्म वह भी महज चार साल की दुधमुंही के साथ, किए जाने पर बच्ची को दिल्ली के बड़े अस्पताल में भर्ती ना करा सके? जबकि उसका मुख्यालय भी राष्ट्रीय राजधानी ़क्षेत्र में गुड़गांव में हो।
दिल्ली में रेप का शिकार हुई बच्ची के स्वास्थ्य में सुधार है जिसके साथ इस बच्ची से ज्यादा अमानवीय कृत्य हुआ था, क्योंकि उसे समय पर उचित चिकित्सा सुविधा मुहैया हो गई, पर सिवनी की गुड़िया को खैराती अस्पताल के भरोसे छोड़ना क्या मानवीयता है। निश्चित तौर पर वैंटीलेटर पर रखकर नागपुर के कथित प्रतिष्ठित केयर अस्पताल ने मध्य प्रदेश सरकार या संयंत्र प्रबंधन को मोटा बिल थमा दिया होगा, उसकी भरपाई भी जनता के द्वारा दिए गए करों से संचित राशि से ही होगी, पर गुडिया तो चली गई। इस मामले में जिला एवं पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। अब तक प्रशासन द्वारा संयंत्र प्रबंधन के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। क्या बिजली के उत्पादन के लिए वह भी संयंत्र प्रबंधन प्रदेश या अन्य प्रदेशों को बेचेगा और मुनाफा कमाएगा को गुड़िया की कीमत पर छोड़ना उचित है? क्या कारण है कि पुलिस ने अब तक इस मामले में संयंत्र के प्रबंधन को बुलाकर यह मामला दर्ज क्यों नहीं किया कि आखिर फिरोज जो घंसौर में लंबे समय से रह रहा था की मुसाफिरी क्यों प्रबंधन ने पुलिस में दर्ज नहीं करवाई? उत्तर भी आईने की तरह ही साफ है, कि संयंत्र के मालिक गौतम थापर का रसूख और इकबाल दोनों ही सियासी गलियारों में जमकर बुलंद है इसलिए इन पर कार्यवाही नहीं हो सकती है! लगता है कि अगर आपके पास धन दौलत और राजनैतिक संपर्क हैं तो आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है।
इसके साथ ही साथ मंगलवार की रात गुड़िया के परिजनों ने गुड़िया के निधन के बाद नागपुर में जो नाकरीय पीड़ा भोगी उससे प्रदेश सरकार की मदद की कलई खुद ही खुल गई है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जिस आलीशान केयर अस्पताल में गुड़िया को भर्ती करवाया गया था वहां डीप फ्रीजर ही नहीं था कि उसका शव रखा जा सके। गुड़िया को केयर अस्पताल ने पौने आठ बजे मृत घोषित कर दिया। इसकी सूचना बर्ड़ी के पुलिस थाने को दे दी गई। इसके उपरांत गुड़िया के शव को एमपी पुलिस और परिजनों की मौजूदगी में आयुर्विज्ञान कालेज अस्पताल नागपुर भेजा गया जहां कागजी खानापूर्ती में साढ़े दस बज गए। वहां शव को रखने के लिए डीप फ्रीजर मौजूद नहीं था, दो डीप फ्रीजर थे पर वे खराब थे। गुडिया का शव गर्मी में वैसा ही पड़ा रहा। इसके बाद उसके शव को सेंट्रल एवेन्यू रोड़ पर स्थित मेयो अस्पताल रिफर करने की तैयारी की गई। रिफर होने में साढ़े बारह बज गए। रात लगभग एक बजे गुडिया के शव को मेयो अस्पताल के शव गृह में रखा जा सका।
अब शिवराज सिंह चौहान सरकार के कुशासन का अंदाजा लगाया जाए कि एक मां अपनी मृत बेटी की देह को रात भर के लिए सुरक्षित रखवाने के लिए पांच घंटे संघर्ष करती रही। उस मां पर क्या बीती होगी जिसकी फूल सी गुड़िया दुष्कर्म के बाद शांत हो गई हो। जिला प्रशासन या सिवनी की जनता के सेवक सांसद विधायक या और दलों के नेता अगर चाहते तो सिवनी से सिंधी समाज के डीप फ्रीजर को इतनी देर में नागपुर भेजकर गुड़िया के शव को सुरक्षित रखने की माकूल व्यवस्था कर ली जाती। सिवनी से आठ बजे भी अगर इसे रवाना किया जाता तो निश्चित तौपर पर ग्यारह बजे तक वह डीप फ्रीजर गुड़िया के पास पहूंच जाता। वस्तुतः अनुभवहीनता के कारण ही एैसा हुआ माना जा सकता है। सिवनी संसदीय क्षेत्र दो टुकड़े बंट गया है एक का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम कर रहे हैं जिनके संसदीय क्षेत्र में यह घटना घटी है और दूसरे का भाजपा के के.डी.देशमुख। संसद सत्र जारी है क्या दोनों ही सांसदों से उम्मीद की जाए कि वे उन्हें मिले जनादेश का सम्मान करते हुए लोकसभा में इस लापरवाही को उजागर करेंगे। शायद जनता को निराशा ही हाथ लगे क्योंकि गौतम थापर अपनी आन बान और शान को बरकरार रखने के लिए थैलियों का मुंह खोलने से भी गुरेज शायद ही करें। कांग्रेस के सांसद बसोरी सिंह मसराम सहित सिवनी जिले के राजनैतिक दलों के राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की विज्ञप्ति जारी करने वाले प्रवक्ताओं ने भी इस मामले में आश्चर्यजनक चुप्पी साधी हुई है, जो शोध का विषय है।
वैसे गुड़िया के हादसे से अगर प्रशासन कोई सबक ले ले तो ठीक है वरना इसकी पुनरावृत्ति होती रहेगी और मीडिया की सुर्खियां बनकर अंदर के पेज पर जाकर दम तोड़ देंगी। इस मामले में भी चीख पुकार एक दो दिन ही होगी फिर सब कुछ सामान्य और फिर नेता नुमा ठेकेदारों की बपौती बन चुके झाबुआ पावर लिमिटेड का काम आरंभ हो जाएगा, साथ ही बिजली का उत्पादन कर उसे बेचकर गौतम थापर दिन दूनी रात चौगनी उन्नति करेंगे पर उन्हें इस तरह की गुड़ियाओं की चिंता भला क्यों होने लगी, अब तक चौदह दिन बीतने के बाद भी गौतम थापर या संयंत्र प्रबंधन ने अपनी तरफ से एक बार भी संवेदनाएं ना जताकर साफ कर दिया है कि एक मासूम दुधमुंही बच्ची की जान की कीमत उनकी नजरों में दो कौड़ी से ज्यादा नहीं है।

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

सोशल मीडिया में सिवनी विधायक की तलाश आरंभ


सोशल मीडिया में सिवनी विधायक की तलाश आरंभ

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। सोशल मीडिया इन दिनों सर चढ़कर बोल रहा है। सिवनी में भी इसका जादू देखने को मिल रहा है। सोशल नेटवर्किंग वेब साईट फेसबुक पर अब सिवनी के विधायक को खोजना आरंभ कर दिया गया है। अब तक विधायक और सांसदों के कामकाज की भी फेसबुक पर समीक्षा होना आरंभ हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छः कंडिकाओं से युक्त एक जानकारी फेसबुक पर सिवनी के युवा ना केवल जमकर शेयर कर रहे हैं, वरन् इसमें कंमेंट्स की तादाद भी बहुतायत में है। सिवनी के विधायक को लेकर लोगों की प्रतिक्रियाएं और सुझाव भी मांगे जा रहे हैं।
फेसबुक पर पड़े एक स्टेटस में सिवनी विधानसभा कि टिकट भाजपा से किसे दिया जाना चाहिए जो कम से कम निम्न योग्यताएं लिए हुए हो
1.          ईमानदार
2.         दिलेर
3.         अधिकारियों पर नकेल कसने में सक्षम, जरुतर पढ़ने पर अधिकारियों की एैसी तैसी करने मे सक्षम
4.         चमचों से घिरा न रहे
5.         लोगों से आसानी से मिलने जुलने वाला
6.         अन्य योग्यताएं अन्य लोग बताएं एवं नाम भी सुझाएं
इसको देखकर जिले भर में मिली जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। ज्ञातव्य है कि सोशल मीडिया की ताकत को अब नकारा नहीं जा सकता है। मीडिया को भले ही विज्ञापनों के माध्यम से मैनेज करने और पेड न्यूज की खबरें आम हो रही हों पर देश भर में सोशल मीडिया की क्रांति से सभी वाकिफ हैं। यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और मध्य प्रदेश के अनेक जिलों के जनसंपर्क कार्यालय भी जारी होने वाले समाचारों को फेसबुक पर फेसबुक शेयर करते नजर आ रहे हैं।

सराफा बाजार हुआ गुलजार!


सराफा बाजार हुआ गुलजार!

(विपिन सिंह राजपूत)

सिवनी (साई)। कैसा आश्चर्यजनक किंतु सुखदायक समय वर्तमान बाजार में परिलक्षित हो रहा है, परन्तु इस सभी में मध्यम वर्ग की सीमा तक ही उथल-पुथल है। बाजार भीड़ भरे हो चले हैं, खासकर महिला ग्राहकों के घोर उतावलेपन के कारण।
जी हां ग्राहकों की यह रेलमपेल और कहीं नहीं बल्कि सराफा बाजारों में है। जहां एक ओर आलू, प्याज, टमाटर, जैसी रोजमर्रा की सब्जियों के दाम लगातार उछाल पर हैं, वहीं सभी प्रकार की बाजारी वस्तुओं का राजा माने जाना वाला सोना अपनी मॅुंहचढ़ी कीमतों को छोड़ नीचे की ओर जा रहा है।
एक तो लग्नसरा की खरीददारी उपर से सोने का आकर्षण घटी दरों पर सोना खरीदने की सक्षम वर्ग की महिलाओं में होड़ मची है। आलम यह है कि सराफा बाजार और दुकानों में ग्राहकों की भारी संख्या को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने भी अतिरिक्त पुलिस कर्मी यहां सुरक्षा की दृष्टि से तैनात कर दिए हैं।
आइए देखते हैं कि सोने की कीमतों का नाटकीय बदलाव जो कि सिवनी सराफा बाजार के आंकड़ों पर आधारित हैं- एक समय सोने की कीमतें रिकार्ड तोड़ ऊंचाई पर पहंचते हुए 32000 प्रति तोला तक पहंच गई थी जो अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी के चलते इस समय रु.25000 प्रति तोला के स्तर के आस-पास पहुंच गई है।
सोना आदि काल से ही आकर्षण के साथ-साथ शक्ति का प्रतीक भी रहा है। जब मुद्रा का चलन नहीं हुआ करता था उस समय सोना ही वस्तुओें के विनिमय का माध्यम हुआ करता था। सोने के संग्रहण को लेकर विभिन्न राज्यों में खूनी युद्ध हुआ करते थे। कालांतर में मुद्रा का चलन आरंभ हुआ पर बावजूद इसके सोने का आकर्षण कम नहीं हुआ बल्कि बाजारों के चलने वाला स्त्रियों का सर्वाधिक चहेता बन यह तिजारियों में बंद हो गया।
सोने की चमक सभी को सदा से ही आकर्षित करती है। इसी आकर्षण के कारण लोग अधिक से अधिक सोना खरीदना चाहते हैं। यह चाहत तब और बढ़ जाती है जब कभी सोने की कीमत में अचानक थोड़ी भी गिरावट आती है। लोग इसे मौका मान इसका लाभ उठाना चाहते हैं।
आज कल बाजार में यही स्थिति है, सोने की कीमत में कमी आई है। सोने का आकर्षण तो आकर्षण है भले ही उसके बारे में कुछ भी क्यांे न कहा जाए जैसा आम तौर पर लोग बाग कहा करते हैं ‘‘चैन से सोना है तो सोने को कहें नो ‘‘। अधिकतर पौराणिक ग्रंथों में भी इसी बात को कई तरह से कहा गया है कि सोने की खरीददारी से जितनी खुशी नहीं होती उससे अधिक चिंता बढ़ जाती है। हमेशा यह चिंता सताए रहती है कि सोना कहीं चोरी न हो जाए। वहीं महान कवि रहीम ने लिखा है ‘‘कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। वा खाए बौराए नर, वा पाए बौराए ..........
शास्त्र, पुराण, ऋषि-मुनि, चाहे जो कहें पर सोना आज भी सर्वोच्च पायदान पर बैठा हुआ है और स्त्रियों के लिए सौतिया डाह का कारक है। जो भी हो सराफा में आई सोने के मूल्यों में गिरावट ने खरीददारों को इसकी ओर तेजी से बड़ी संख्या में आकर्षित किया है। बाजारों की भीड़-भाड़ सोने की भारी लिवाली का संकेत दे रही है।

पेंच में पकड़ाया हाईटेक सट्टा!


पेंच में पकड़ाया हाईटेक सट्टा!

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। आईपीएल क्रिकेट का हाईटेक सट्टा आज पेंच नेशनल पार्क के टुरिया क्षेत्र में स्थित एक रिसोर्ट में पकड़ाने की खबर है। यद्यपि कुरई पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की है पर सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि पुलिस के सेंट्रल स्कॉड ने तीन आरोपियों केा सात हजार रूपए के साथ धर दबोचा गया है।
पुलिस सूत्रों ने साई न्यूज को बताया कि आज टुरिया क्षेत्र के जंगल होम रिसोर्ट में तीन लोग आईपीएल क्रिकेट मैच पर सट्टा लगा रहे थे। मुखबिर सूचना के मिलने पर पुलिस के सैंट्रल स्कॉड ने वहां दबिश दी और आरोपियों को सट्टा खिलाते हुए पकड़ा। सूत्रों ने आगे बताया कि पुलिस ने इस होटल से दो दर्जन से ज्यादा मोबाईल, लेपटॉप, एलसीडी स्क्रीन एवं सात हजार रूपए नकद बरामद किए हैं।
वहीं दूसरी ओर कुरई पुलिस के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि बरघाट के अनुविभागीय अधिकारी पुलिस मोहन सिंह पटेल के नेतृत्व में सहायक उपनिरीक्षक श्री जाटव के साथ दल बल इस सूचना पर टुरिया की ओर रवाना हो चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुलिस दल वापस नहीं लौटा है।
ज्ञातव्य है कि सिवनी जिले में क्रिकेट विशेषकर आईपीएल के दौरान इस पर करोड़ों के सट्टा खेले और खिलाए जाने की खबरें आम हो चली हैं। शहर के सभ्रांत परिवारो के युवा इसमें फंसकर उधारी के दलदल में फंसते जा रहे हैं।

अपराधियों के लिए शरण स्थली बना सिवनी!


अपराधियों के लिए शरण स्थली बना सिवनी!

(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सीमा पर अवस्थित भगवान शिव के नाम पर बसे सिवनी के निवासी अब अपने आप को महफूज महसूस नहीं कर रहे हैं। पिछले आधे दशक में ही जो घटनाएं यहां घटी हैं उनसे नागरिकों में भय का वातावरण बन गया है। एक के बाद एक घटनाओं ने साबित कर दिया है कि जिन्दा बम के मुहाने पर ही बैठा है सिवनी जिला। नेशनल हाईवे पर होने के कारण वारदात कर यहां से भागना भी बहुत ही आसान होता है। जब तक मामले की सूचना पुलिस को मिलती है तब तक अपराधी कई किलोमीटर की दूरी नाप चुका होता है।
अस्सी के दशक के आगाज के पूर्व धूमा डकैती कांड जिसमें अमर सिंह और सज्जाद को फांसी हुई थी याद प्रोढ़ होती पीढ़ी को अवश्य ही होगी। इसके बाद वारदातें हुईं हैं, पर इन वारदातों को छिटपुट की संज्ञा दी जा सकती है। इसके बाद संध्या जैन मर्डर केस और परवेज भाई मर्डर केस, भोमा टोला रेप काण्ड आदि के बाद एक बार फिर सिवनी में शांति छा गई थी। फिर एकाएक उंट काण्ड का शोर हुआ।
इसके उपरांत अचानक ही बुधवारी बाजार के करीब पुराने दरोगा मोहल्ला में एक व्यक्ति के बम धमाकों में चिथड़े उड़ गए। कहते हैं, बोहरा समुदाय का असगर घर में ही बारूद बना रहा था। वह तो उपर वाले की नियामत थी कि कोई अनहोनी नहीं घटी, वरना उसी वक्त आधी बुधवारी तबाह हो जाती। इसी तरह मुंबई के एक टेक्सी चालक का शव मारकर लखनवाड़ा थाना क्षेत्र में फेंक दिया गया था, जिसके बारे में पता बाद में चला। उस दौरान तत्कालीन एसपी मीना़क्षी शर्मा का कहना था कि चूंकि यह हाईवे पर है अतःि यहां अपराध कर भागना आसान है। सिवनी में दक्षिण भारत से आए भानुकिरण ने सिवनी में ना केवल अपना राशन कार्ड बनवाया वरन वह सिवनी के लोगों से खसा घुल मिल गया था। कहते हैं भानु किरण पर हत्या के मुकदमे हैं।
इस साल फरवरी माह में अचानक ही सिवनी की परिस्थितियों और फिजां में जहर घुला और कर्फयू के साए में लोग घरों में दुुबके रहे। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ जब यह पता चला कि 08 फरवरी को सिवनी में समाचार पत्र नहीं बंटे, और तो और मीडिया को भी शाम चार बजे तक घर से निकलने की इजाजत नहीं दी गई।
पत्रकारों के हितों को साधने के लिए सिवनी में अनेक पत्रकार संगठन कार्यरत हैं। इन संगठनों ने भी शासन प्रशासन के सामने अपना मुंह नहीं खोला। किसी भी संगठन या पत्रकार ने झूठे मुंह ही इस घटना की निंदा करते हुए एक पत्र तक प्रदेश के मुख्यमंत्री या जनसंपर्क मंत्री को लिखने की जहमत नहीं उठाए। किस आधार पर माना जाए कि ये संगठन पत्रकारों का हित साध रहे हैं। क्या ये संगठन बस नाम के लिए पत्रकारों के हित साधने की बात करते हैं।
कर्फयू कांड के बाद सिवनी में एसटीएफ ने छापा मारकर लगभग डेढ़ सौ जिंदा बम और दो माउजर बरामद किए। पुलिस सूत्र तो यहां तक दावा करते हैं कि होलिका दहन के दिन भी पुलिस को लगभग पचास बम मिले। इसमें एक मास्टर माईंड को एकता कालोनी से धर दबोचा गया। कुछ लोग हड्डी गोदाम में पकड़ाए। कहते हैं बम कांड का सरगना एक डेढ़ माह से एसटीएफ के सर्वलेंस में था। उसके तार उपर तक कहां तक जुड़े हैं यह बात तो भगवान ही जाने, पर सिवनी के लिए खतरे की घंटी अवश्य ही बन गई है।
सिवनी में केंद्र और प्रदेश सरकार की अनेक योजनाएं संचालित हो रही हैं। इन योजनाओं का काम मध्य प्रदेश के बाहर से आए ठेकेदारों द्वारा लिया गया है। ये ठेकेदार अपने साथ पूरा लाव लश्कर लेकर आते हैं। इन ठेकेदारों के कर्मचारियों में असमाजिक तत्वों का होना आम बात है क्योंकि परदेस में जब कोई विपदा आती है तो ये असमाजिक तत्व ही इनके तारण हार बनते हैं। स्थानीय स्तर पर नेतागिरी और अन्य दबावों को ये ठेेकदार कुछ प्रपंच तो कुछ धनबल के माध्यम से निपटाते हैं, शेष मामलों में इनके साथ आए चमत्कारी कारिंदे ही खेल दिखाते हैं।
यही देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकासखण्ड में लगाए जा रहे पावर प्लांट के अंदर काम करने वाले कर्मचारी भी किस प्रात के और किस तासीर के हैं यह कहा नहीं जा सकता है। उनमें से कितनों का आपराधिक रिकार्ड है यह भी किसी को नहीं पता। इस संयंत्र में काम करने वाले ठेकेदारों के बारे में भी किसी को पता नहीं है।
यह संयंत्र वर्ष 2008 से आरंभ हुआ है। तबसे अब तक यहां पदस्थ रहे पुलिस कर्मियों ने ना तो संयंत्र प्रबंधन और ना ही ठेकेदारों से अपने यहां काम करने वालों की कोई सूची बुलवाई ना ही कोई पता साजी करने का प्रयास किया है। एसा नही कि घंसौर थाने में संयंत्र प्रबंधन के लोगों का आना जाना ना हो। लगभग दो दर्जन लोग तो अब तक यहां चिमनी के निर्माण का काम करते करते ही चिमनी से गिरकर दम तोड़ चुके हैं। इन मजदूरों का मर्ग घंसौर थाने में अवश्य ही कायम हुआ होगा।
मृतक कहां के निवासी थे यह बात तो पुलिस के रिकार्ड में दर्ज होगी पर यह बात कि वह आया तो उसकी आमद या मुसाफिरी दर्ज क्यों नहीं है इस बारे में पुलिस के आला अधिकारियों ने पूछने की जहमत नहीं उठाई। घंसौर में एक अबोध दुधमुंही के साथ हुई दुष्कर्म की घटना पुलिस को आईना दिखाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह यहां पदस्थ रहे संबंधित पूर्व अधिकारियों के इस कृत्य के लिए पुलिस मुख्यालय को आवगत अवश्य करवाएं। साथ ही भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए भी वक्त रहते माकूल कदम उठाए। लगता नहीं है कि फिरोज द्वारा किए गए दुष्कर्म के उपरांत भी पुलिस प्रशासन ने कोई सबक लेकर संयंत्र प्रबंधन की मश्कें कसीं होंगी। यह काम बहुत मुश्किल प्रतीत होता है क्योंकि इसमें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त लोग अपना हित साध रहे हैं, इसलिए कार्यवाही निष्पक्ष और त्वरित शायद ही हो।