रविवार, 12 मई 2013

वैध कालोनी अवैध कालोनी


वैध कालोनी अवैध कालोनी

(लिमटी खरे)

पूरे भारतवर्ष में बढ़ती आबादी के साथ ही शहरीकरण जोर से होने लगा। नागरिक शास्त्र का सिद्धांत है कि औद्योगीकरण के साथ ही नगरीकरण तेज हो जाता है। शहरों के आसपास खाली जगहों पर कालोनी बसना आरंभ हो जाती हैं। लोग इन कालोनाईजर्स के लुभावने विज्ञापन में फंसकर प्लाट खरीद लेते हैं फिर किसी तरह वहां मकान बनाकर रहना भी आरंभ कर देते हैं। असली मरण तब होती है जब ये बेचारे लोग बारिश में कीचड़ से सनी कच्ची सड़क पर चलते हैं, पानी के लिए तरसते हैं और तो और इन्हें बिजली का कनेक्शन भी अस्थाई ही प्रदाय किया जाता है।
प्रदेश की राजधानी भोपाल में नए भोपाल की अवधारणा बहुत ही अच्छे आधार पर बनाई गई थी, फिर भी नए भोपाल में झुग्गियों की तादाद बेहद है। इसका कारण क्या है इस बारे में सोचने की शायद ही किसी को चिंता हो। दरअसल, कालोनी या सरकारी रिहाईश तो बना दी जाती है पर यह कभी नहीं सोचा जाता है कि घरों में बर्तन खटका आदि करने का काम करने वाली बाईयां कहां से आएंगी? क्या वे दूर से आएंगी?
निश्चित तौर पर इसका जवाब नहीं ही होगा। घरों का काम करने वाले लोग इन्हीं कालोनी के इर्द गिर्द ही झोपड़ पट्टी बनाकर रहना आरंभ कर देते हैं। जब ये शुरूआत में बसाहट करते हैं तब स्थानीय निकाय का ध्यान इस ओर नहीं जाता है। इसके साथ ही साथ जब दस बीस घर बन जाते हैं तब भूमाफिया भी यहां झोपड़ी बनाकर उसमें रहना आरंभ कर बाद में उन्हें किराए से उठा देता है।
सिवनी शहर में भी उपनगरीय क्षेत्रों में आज भी इस तरह की बसाहट देखी जा सकती है। महाकालेश्वर मंदिर की टेकड़ी, भैरोगंज, बरघाट नाका, पालीटेक्निक के पीछे, बबरिया के पास, ज्यारत नाका, छिंदवाड़ा नाका, झिरिया, आदि क्षेत्रों में यह बसाहट साफ देखी जा सकती है। इन बस्तियों में ना तो पानी निकासी का उचित साधन है ना ही पानी लाने का। इतना ही नहीं इन क्षेत्रों में साफ सफाई का अभाव भी साफ देखा जा सकता है जो अनेक तरह की बीमारियों का कारक भी होता है।
इसके अलावा शहर में अनेक कालोनियां विकसित हो रही हैं, और हो चुकी हैं। इन कालोनी का जब आरंभ होता है तब कालोनाईजर्स आकर्षक विज्ञापनों के माध्यम से लोगों को लुभाते हैं। बाद में जब सारे प्लाट बिक जाते हैं तब वहां विकास का काम नगर पालिका के जिम्मे बताकर कालोनाईजर्स हाथ खड़े कर लेते हैं। देखा जाए तो इस तरह के कालोनाईजर्स दूध की मलाई तो चट कर जाते हैं बाद का छाछ नगर पालिका के मत्थे छोड़ दिया जाता है।
वस्तुतः किसी भी कालोनी के बनने के समय उस समय के वहां के पार्षद की यह जवाबदेही बनती है कि वह कालोनाईजर्स की मश्कें कसे और प्लाट की बिकावली तभी आरंभ होने दे जब वहां नाली, प्रकाश, सड़क, खेल का मैदान, देवालय, पार्क आदि की वह व्यवस्था जो कालोनाईजर्स द्वारा टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग को अपने प्रस्ताव के साथ जमा करता है को पूरा कर लिया जाए। होता यह है कि पार्षद भी इस दिशा में अनदेखी ही कर जाते हैं।
दूर की कौन कहे जब सरकारी महकमों में ही कालोनी के निर्माण में बुरे हाल हों तो फिर वह कहावत कैसे चरितार्थ नहीं होगी कि सारा आसमान ही फटा है कहां कहां पैबंद लगाओगे! शहर के मंहगे रिहाईशी इलाके में मध्य प्रदेश गृह निर्माण मण्डल ने पुरानी हाउसिंग बोर्ड कालोनी को बसाया था। उसके बाद यहां समता नगर बसा। इन दोनों ही बसाहटों में हाउसिंग बोर्ड का उदासीन रवैया किसी से छिपा नहीं है।
समता नगर में पानी निकासी के लिए एचआईजी के सामने या पीछे कोई नाली नहीं है। इसके अलावा टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग को जमा कराए नक्शे में बोर्ड ने इस कालोनी में तीन पार्क प्रस्तावित किए थे। आज अगर इस कालोनी का निरीक्षण किया जाए तो यहां एक भी पार्क अस्तित्व में नहीं है। मजे की बात तो यह है कि शेल्टरलेस लोगों के लिए छोड़ी गई प्रंदह फीसदी जमीन पर भी मकान बनाकर हाउसिंग बोर्ड ने बेच दिए हैं।
हाल ही में बारापत्थर से लगी राम नगर कालोनी के लोग नगर पालिक गए और इस कालोनी को वैध कर सारी सुविधाएं देने की मांग की। उनकी मांग जायज है, आखिर उनका दोष क्या है? जब कालोनाईजर ने उन्हें सब्जबाग दिखाकर प्लाट बेच दिए तब अब कालोनाईजर भला अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकता है? नगर पालिका प्रशासन को चाहिए कि वह संबंधित कालोनाईजर पर तगड़ा अर्थदण्ड लगाए और इसे नजीर बनाकर पेश करे ताकि बाकी की विकसित और विकसित होने जा रही कालोनी के मालिक सचेत हो जाएं।
पालिका प्रशासन को कठोर कदम उठाने ही होंगे। जिला प्रशासन से भी अपेक्षा है कि इस दिशा में ठोस पहल कर शहर के लोगों को कालोनी के अवैध व्यवसाय से लुटने से बचाए। पर इसके लिए प्रशासन और पालिका दोनों ही को अपने निहित स्वार्थ से उपर उठना आवश्यक होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो शहर के लोग इन पैसों के लोभी कालोनाईजर्स के झांसे में फंसकर लुटते रहेंगे और साथ ही साथ बाद में अवैध कालोनी को वैघ करने के चक्कर में सरकारी धन का दुरूपयोग होगा सो अलग!

शुक्रवार, 10 मई 2013

इसलिए अभिनंदन विलंब से करवाया हुकुम ने!


अपराधियों को प्रश्रय - - -3

इसलिए अभिनंदन विलंब से करवाया हुकुम ने!

(शरद खरे)

सिवनी (साई)। देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के एक वेल्डर फिरोज द्वारा गत दिवस चार साल की दुधमुंही बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसके निधन का असर भी हुकुम के मौन वृत पर पड़ता दिख रहा है।
बताया जाता है कि कुंवर शक्ति सिंह जिन्हें लोग हुकुम के नाम से भी जानते हैं का घंसौर विशेषकर मेसर्स झाबुआ पावर प्लांट में इकबाल जमकर बुलंद है। हुकुम अपना मौन वृत समाप्त कर 19 अप्रेल को रामनवमी के दिन सिवनी वापस आ गए थे। उस वक्त घंसौर की गुड़िया का मामला मीडिया की सुर्खियां बन चुका था।
हुकुम के करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि छपास का खासा प्रभाव है हुकुम पर। उस समय संभवतः हुकुम ने मीडिया में अपने मौन वृत को जमकर प्रचारित करवाने का मन बनाया था। बताया जाता है कि हुकुम के सलाहकारों ने उन्हें मशविरा दिया कि वह माकूल वक्त नहीं था जबकि वे अपने आप को महिमा मण्डित करते।
संभवतः यही कारण है कि 19 अप्रेल को अपना मौन वृत समाप्त कर सिवनी वापस लौटे हुकुम ने गुड़िया के अंतिम संस्कार के उपरांत मई के पहले सप्ताह में अपना कथित तौर पर अभिनंदन मीडिया के माध्यम से करवाया। इसमें धारा 324 के एक आरोपी जो कि फरारी काट रहा है का नाम उसमें आने से हुकुम की किरकरी हो गई।
कहा जा रहा है कि अगर 19 अप्रेल को मौन वृत समाप्त कर वापस लौटे शक्ति सिंह अगर उसी समय इसे प्रचारित करवाते तो मीडिया उनसे यह अवश्य पूछती कि गुड़िया के लिए वे क्या कर रहे हैं? उनके करीबी सूत्रों का दावा है कि उन परिस्थितियों में शक्ति सिंह के पास कोई जवाब नहीं होता क्योंकि वे सदा से ही मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के बरेला प्लांट के बारे में अपना मुंह खोलने से बचते आए हैं।
चर्चा है कि बरेला प्लांट प्रबंधन द्वारा बार बार आदिवासियों को छला है, ना तो क्षेत्र के लोगों को पर्याप्त मात्रा में रोजगार मिला है, ना ही आदिवासियों और स्थानीय किसानों को उनकी जमीन की वाजिब कीमत मिली है, ना ही क्षेत्र में झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में कोई ठोस पहल की है। इतना सब होते हुए भी कुंवर शक्ति सिंह का झाबुआ पावर लिमिटेड के खिलाफ मुंह ना खोलना अनेक मिली भगत की ओर इशारा कर रहा है।

स्टार कापीराईट की धमक से बाजार में सन्नाटा


स्टार कापीराईट की धमक से बाजार में सन्नाटा

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। स्टार कापीराईट प्रोटेक्शन नामक संस्था के द्वारा गत दिवस सिवनी में की गई छापेमारी से बाजार में सन्नाटा पसरा हुआ है। शहर के मोबाईल से संबंधित कारोबारियों में स्टार कापीराईट की दहशत मची हुई है। स्टार कापी राईट की ओर से शहर के व्यापारियों को एक पर्चा भी थमाया गया है जिसमें कुछ मोबाईल नंबर्स के साथ समझाईश भी दी गई है।
बताया जाता है कि इस पर्चे में स्टार कापीराईट का मुख्यालय भोपाल के बैरसिया रोड़ पर नारियल खेड़ा स्थित तक्षशिला कालेज के पास की दो नंबर दुकान को दर्शाया गया है। इसका ब्रांच आफिस जबलपुर में होना दर्शाया गया है। इस पर्चे में एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर व्यापार करने का मशविरा दिया गया हैं
इसमें उल्लेख किया गया है कि बिना एनओसी के डाउनलोड़िंग या डाउन लोडेड कार्ड बेचना अपराध है जिसमें संविधान 1957 की कापीराईट एक्ट की धारा 51, 52ए, 63, 68ए का उल्लंघन होना बताया गया है। इसके लिए छः माह से तीन साल तक की सजा या फिर पचास हजार से तीन लाख रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है।
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को जब यह पर्चा मिला तो उस पर उल्लेखित मोबाईल नंबर 9425466972 पर संपर्क किया गया तो वहां स्टार कापीराईट प्रोटेक्शन के कथित कर्मचारी ने बताया कि मुंबई के संगीत समूह द्वारा उन्हें यह अधिकार दिया गया है कि वे कापीराईट एक्ट के तहत उनके उत्पादों की रक्षा सुनिश्चित करें।
जब उनसे यह पूछा गया कि वह कौन सा समूह है और उस समूह में कौन कौन से संगीतकार, म्यूजिक स्टूडियो, फिल्म स्टूडियो आदि शामिल हैं जिन्होंने यह जवाबदारी इस प्रोटक्शन कंपनी को सौंपी है, इस पर उक्त बंदा खामोश ही रहा। जब उनसे यह पूछा गया कि आपसे अगर एनओसी ले ली जाए तो आप एनओसी की राशि का क्या करते हैं? के जवाब में भी उन्होंने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया।
जब उनसे यह पूछा गया कि आपसे एनओसी कितने लोगों ने ली है और आप कितने लोगों की सूची अगर भेजते हैं तो उपर भेजेंगे? इस प्रश्न पर भी स्टार कापीराईट प्रोटेक्शन का कारिंदा ना केवल मौन साधे रहा वरन उसने एक अन्य नंबर 9200007545 पर बात करके सारी जानकारी लेने की बात कह दी।
ज्ञातव्य है कि मुंबई में संगीत कंपनियों द्वारा मोबाईल पर गाने, वाल पेपर आदि डाउनलोड करने के लिए कापी राईट एक्ट को अवश्य ही प्रभावी बनाने की पहल की होगी, किन्तु प्रश्न यह उठता है कि आखिर एक जिले में कितने छोटे बड़े दुकानदार इस काम को अंजाम दे रहे हैं और कितने एनओसी लेकर काम कर रहे हैं इसकी कोई सूची ना तो इंटरनेट पर ही उपलब्ध है और ना ही किसी के पास।
इन परिस्थितियों में यह भी संभव है कि इस तरह की संस्थाएं जिलों में जाकर दुकानदारों को धमकाकर उनसे अवैध वसूली भी करना चालू कर दें। दुकानदारों के अनुसार इस कंपनी के कारिंदों ने यह चेतावनी भी दी है कि मोबाईल या अन्य काम करने वाले व्यवसाई अपने कंप्यूटर में गाने बिना एनओसी के ना रखें वरना उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।
सवाल यह उठता है जब इंटरनेट पर निशुल्क गाने या वाल पेपर्स डाउनलोड की सुविधा उलब्ध है तब भला कोई कैसे अपने आपको रोक सकता है। बेहतर होगा कि इस तरह की संस्थाएं पहले इंटरनेट पर मुफ्त डाउनलोडिंग वाली वेब साईट्स को या तो सशुल्क बनाए या बंद करवाए।

अबोध लाड़ो के साथ नाबालिग द्वारा दुष्कर्म का प्रयास


अबोध लाड़ो के साथ नाबालिग द्वारा दुष्कर्म का प्रयास

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। बरघाट नाका क्षेत्र में आज दोपहर घटी एक घटना ने शहर में दिन भर रोष और असंतोष का वातावरण बनाकर रखा। दिन भर अफवाहों के दौर चलते रहे, पुलिस की ओर से भी इस संबंध में किसी तरह की आधिकारिक जानकारी नहीं प्रदाय की गई।
रात लगभग साढ़े नौ बजे जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला ने दूरभाष पर बताया कि एक पांच वर्षीय बालिका एवं उसकी माता की शिकायत पर कोतवाली पुलिस ने धारा 375, 376 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना आरंभ कर दी है। उन्होंने बताया कि उक्त बालिका एवं माता ने बताया कि किसी 9 वर्ष के राज नामक बच्चे ने उस बच्ची की गुदा में एक लकड़ी घुसेड़ दी थी।
श्री शुक्ला ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को आगे बताया कि बच्ची का मुलाहजा जिला चिकित्सालय में करा दिया गया है। उसकी आवश्यक जांच भी लगभग पूरी हो गई हैं। पीड़ित बच्ची के बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष करवा लिए गए हैं, तथा आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
आज अपरान्ह ही जब उक्त बच्ची के मुलाहजा के लिए कोतवाली पुलिस जिला चिकित्साल पहुंची तब वहां देखते ही देखते नागरिकों और मीडिया से जुड़े लोगों की भीड़ जुड़ती चली गई। इसी बीच कुछ लोग कोतवाली और जिला कलेक्टर के कार्यालय पहुंच गए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जब मोहल्ले की आक्रोषित महिलाएं जिला कलेक्टर भरत यादव के पास पहुंची तो जिला कलेक्टर ने बच्ची के प्रति संवेदना प्रकट करते हुए इस मामले की जांच गंभीरता से करवाने की बात महिलाओं से कही। जिला कलेक्टर ने यह भी कहा कि जिस तरह घंसौर की गुड़िया के आरोपी को पकड़ा गया है इसी तरह इस मामले में भी कार्यवाही की जाएगी।
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया ने जब इस संबंध में कोतवाली दूरभाष पर संपर्क किया गया तो वहां उपस्थित सहायक उपनिरीक्षक श्री त्रिपाठी ने बताया कि इस मामले में राज नामक युवक के खिलाफ धारा 375 एवं 376 के तहत मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले को उप निरीक्षक सुश्री चौहान देख रही हैं अतः विस्तार से जानकारी वे ही दे पाएंगी। सुश्री चौहान का मोबाईल नंबर भी उनके पास नहीं था।
सुश्री चौहान के मोबाईल नंबर के लिए जब पुलिस कंट्रोल रूम फोन लगाया गया तो कंट्रोल रूम से जवाब मिला कि उनकी जानकारी में नहीं है कि कोई चौहान मेडम कोतवाली में पदस्थ हुईं हैं। आज शाम आक्रोशित महिलाओं ने केवटी वार्ड, बारापत्थर क्षेत्र, जिला अस्पताल और कलेक्ट्रेट तक रैली निकालकर अपना विरोध दर्ज किया।

भूमिहीनों के लिए जमीन का पट्टा


भूमिहीनों के लिए जमीन का पट्टा

(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश सरकार की योजना के तहत प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों में भूमिहीन व्यक्तियों का जमीन का पट्टा देने की योजना है। इसके तहत जिनके पास सर छिपाने की जगह नहीं है उन्हें जमीन का टुकड़ा दिया जाता है। 1984 में बने इस कानून के तहत हर जगह जरूरतमंद लोगों को चिन्हित कर उन्हें जमीन का पट्टा दिया जाता है। शहर के अंदर या उपनगरीय क्षेत्रों में नजूल की भूमि को अमूमन इस काम के लिए उपयोग में लाया जाता है।
भूमिहीन चिन्हित करने के काम में सरकारी सेवकों की मदद में जनसेवा करने वाले सदा से ही आगे आते रहे हैं। नेताओं की इस मामले में विशेष दिलचस्पी इसलिए होती है कि सरकार की योजना को अपने प्रयास से किया जाना बताकर वे इन भूमिहीनों की हमदर्दी जीत लेते हैं। यही लोग बाद में पार्टी विशेष के वोट बैंक बनकर सामने आते हैं। इसमें अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय की कहावत भी चरितार्थ होती आई है।
प्रदेश में अनेक उदहारण ऐसे भी हैं जिनमें भूमिहीनों ने सरकार से पट्टा लेकर उसे बेच दिया और फिर दुबारा भूमिहीन बनकर पात्रों की फेहरिस्त में अपना नाम जुड़वा लिया। कहते हैं शातिर लोगों के लिए तो यह व्यवसाय और आजीवीकोपार्जन का अच्छा साधन बनकर उभरा है। नेताओं की चरण वंदना कर अनेक लोगों यहां तक कि छुटभैया नेताओं ने भी बिना लागत के इस धंधे को अपना लिया है। अपने, अपने मित्रों परिचितों आदि को भी भूमिहीन बताकर पट्टे ले लिए गए हैं और फिर उन्हें बेच दिया गया है।
चूंकि यह मामला शहरी सीमा के अंदर का होता है अतः भूमाफिया भी इस मामले में पूरी तरह सक्रिय रहता है। भूमाफिया अपने गुर्गों के माध्यम से जमीन पर कब्जा करवाकर उसे बेच देता है। इस काम में स्थानीय जनप्रतिनिधि भी जाने अनजाने उनका साथ देते ही नजर आते हैं। नेताओं की करीबी का एहसास कराकर इस तरह के छुटभैया नेता अफसरों पर दबाव बना लेते हैं और अपना उल्लू सीधा करने से नहीं चूकते हैं।
सिवनी के वर्तमान जिलाधिकारी भरत यादव की पहल स्वागतयोग्य है कि उन्होंने भूमि के पट्टों के वितरण के पहले ना केवल बैठक बुलवाई वरन उसमें विधायकों से रायशुमारी भी की। इस बैठक में विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ.ढाल सिंह बिसेन, जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन सिंह चंदेल, नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी, उपाध्यक्ष राजिक अकील सहित वार्ड के पार्षद उपस्थित थे।
जहां तक सिवनी शहर की बात है तो इस बैठक में उपस्थित प्रतिनिधि अपने अपने क्षेत्र के पात्र लोगों से भली भांति परिचित होंगे। अब यह उनके उपर ही निर्भर करता है कि वे पात्रों के चयन में दिलचस्पी दिखाएंगे या अपात्रों को इस योजना का लाभ दिलवाएंगे। जिला कलेक्टर ने इनसे अपील की है कि पात्र लोगों को पट्टे मिलें, पिछली बार जिन्हें मिल चुके हैं, उन्हें दुबारा ना मिल पाएं यह अवश्य सुनिश्चित किया जाए।
देखा जाए तो एक विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र, पार्षद अपने निर्वाचन क्षेत्र के एक एक व्यक्ति को भली भांति जानता है। जब कोई जानकारी देता है तो वह जानकारी सत्य है अथवा असत्य इस बारे में पार्षद ही बेहतर बता सकते हैं। चूंकि पार्षदों के सर पर बड़ी जिम्मेदारी होती है और पालिका में उन्हें पूरी तवज्जो नहीं मिल पाती है अतः उनके अंदर रोष होना स्वाभाविक ही है। पार्षदों की इस काम में जवाबदेही सबसे अधिक है अतः पार्षदों को इस काम को दलगत भावना से उठकर करना होगा।
जिला कलेक्टर भरत यादव वाकई बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस काम को अंजाम देने के पूर्व पात्र अपात्र के चयन की बात फिजां में उठा दी है। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि इस बार पट्टे का लाभ उन लोगों को कतई ना मिल पाए जो पहले पट्टा लेकर इसे बेच चुके हैं। इस तरह भरत यादव ने सरकारी पट्टे की लूट पर अंकुश लगाने का मन बनाया है। उनकी इस पहल का आम जनता में तो तहे दिल से स्वागत होगा किन्तु सियासी दलों के नेता मन मसोसकर रह जाएंगे, क्योंकि उनके गुर्गों की रोजी रोटी पर इससे ग्रहण लग सकता है। हो सकता है सिवनी में भाजपा के कुछ नेता कलेक्टर की इस अभिनव और अच्छी पहल के पारितोषक के बतौर आला नेताओं से उनकी शिकायत भी कर दें।
देखा जाए तो जिला कलेक्टर भरत यादव की इस अभिनव पहल का नेताओं द्वारा तहे दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। तब जबकि सरकारी सिस्टम में खुली लूट मची हो, जनसेवक सामने से सरकारी खजाना लुटते देख रहे हों, उस वक्त एक नौजवान उर्जावान अधिकारी द्वारा इस तरह की पहल की जाती है तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। वस्तुतः भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुके सरकारी सिस्टम और भारत के लोकतंत्र में अब ईमानदारी का स्थान शायद नहीं बचा है।
फिर भी अगर इस तरह की पहल हुई है और वह परवान चढ़ती है तो निश्चित तौर पर यह नजीर साबित होगी, जिसका अनुपालन अन्य अफसरान द्वारा भी आगे की जाने की उम्मीद की जा सकती है। भरत यादव का यह छोटा सा कदम भ्रष्टाचार की अंधेरी काल कोठरी में सूरज की एक रोशनी से कम नहीं दिखाई दे रहा है।

गुरुवार, 9 मई 2013

जिला चिकित्सालय बना चिकित्सकों की जागीर


जिला चिकित्सालय बना चिकित्सकों की जागीर

(श्रीकांत बर्वे)

सिवनी (साई)। अच्छी खासी, प्रतिमाह मोटी तनख्वाह सहित अन्य सुविधाओं के बावजूद जिला चिकित्सालय में पदस्थ डॉक्टर सरे-आम शासन और मुख्यमंत्री के दिशा निदेंशों की धज्जियॉं उड़ाने में कोई कोर कसर न छोड़, अपने-अपने निजि चिकित्सकीय व्यवसाय में डूबे हुए हैं।
 इंदिरा गॉंधी जिला चिकित्सालय में पदस्थ सभी सरकारी डॉक्टर अपनी-अपनी निजि क्लिनिक खोल-कर बैठे हैं। बताया जाता है कि ये डॉक्टर सरकारी अस्पताल में अपनी नौकरी की मात्र खानापूर्ति कर रहे हैं। सरकारी डॉक्टर अस्पताल के निर्धारित समय पर (विलंब से आकर), चंद मरीजों को आनन-फानन में देख, समय से पूर्व ही अपने गंतव्य निजि चिकित्सालयों में जा बैठते हैं। मरीजों की लंबी कतार बगैर जॉंच के खड़ी की खड़ी रह जाती है। दर्द और मर्ज से परेशान ये मरीज मजबूरन सरकारी डॉक्टरों की निजि क्लिनिकों का रूख करते है। निजि क्लिीनिकों में सरकारी डॉक्टरों द्वारा मनमानी फीस ली जाती है, जो प्रत्येक मरीज- ‘‘हाथ पकड़ आला लगाने‘‘ की 100 रूपये से लेकर 150 रूपये तक होती है। यह रकम आम मजदूर की शासन द्वारा प्रतिदिन हाड़-तोड़ मेहनत के लिए निर्धारित राशि के बराबर है। कहॉं पूरे दिन की मजदूरी और कहॉं एक मरीज के हाथ को छूने मात्र की फीस!!?
जिला चिकित्सालय के वर्षों से यहॉं पदस्थ चिकित्सक एक समानांतर चिकित्सा व्यवस्था बना चुके हैं। बताया जाता है कि अपने रसूख के बल पर वरिष्ठ डॉक्टर जिनकी ड्यूटी वार्डाें में होती है, वे वार्डों को जूनियर डॉक्टरों के हवाले छोड़ चले जाते हैं।
निजि चिकित्सा व्यवसाय में आकंठ डूबे सरकारी डॉक्टरों ने अपने क्लिनिकों के साथ निजि तौर पर अपनी पैथॉलाजी भी खोल रखी है, जहॉं मंहगी दरों पर खून, थूक, पेशाब आदि की जांच की जाती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस तरह से ऐसे हर डॉक्टर की प्रतिदिन की अघोषित आय 15 से 20 हजार प्रतिदिन आंकी जा रही है।
प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह लाख घोषणाऐं करें, स्वास्थ्य सुविधा पूरी तरह से निःशुल्क घोषित करंे, पर वह सब उक्त माहौल के चलते चरमराती देखी जा रही है।

नशैलों के लिए जुहू बीच बना दलसागर!


नशैलों के लिए जुहू बीच बना दलसागर!

(शरद खरे)

सिवनी (साई)। दलसागर का सौंदर्यीकरण नगर पालिका द्वारा अवश्य कराया जा रहा है, पर नगर के सुबह-शाम से देर रात के नशेलचियों को क्या कहा जा सकता है, जो अपने शौक के मद्देनजर इसे मुंबई का जुहू बीच बनाने पर आमदा हैं। मुंबई, गोआ न जा सकें तो क्या दलसागर के सुरम्य तटों में इसका अनुभव तो किया ही जा सकता है। इसी सोच को ये अंजाम देने पर उतारू हैं।
नगर के हृदय स्थल पर मौजूद, गौड़ राजा दलपत शाह के ऐतिहासिक राजकाल में निर्मित यह तालाब दलसागर न केवल अपने आकार-प्रकार के चलते बल्कि जैव विविधताओं की मौजूदगी के कारण सिवनी नगर की पहचान माना जाता है। समय पर जिले में पदस्थ रहे जिला कलेक्टरों ने इसके सौंदर्य को संचित करने का प्रयास भी किया है। तालाब के सौंदर्यीकरण, गहरीकरण बीच में मौजूद टापू के विकास, नौकाविहार आदि की सुविधाऐं भी शासन स्तर और जनसहयोग से मुहैय्या कराई गई। इन सभी कार्यों के प्रयासों पर अमल भी हुआ, परन्तु रख-रखाव व निगरानी की मुकम्मल व्यवस्था न होने के कारण, नतीजा वही ‘‘ढाक के तीन पात‘‘। व्यवस्था परिवर्तन होते ही फिर से अव्यवस्था अपने ढर्रे पर आ जाती है। दलसागर- गाड़ियां धोने, धोबी घाट और शौचालय में बदल कर रह जाता है।
एक बार फिर नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और जिला प्रशासन के तालमेल से दलसागर के सौंदर्यीकरण का बीड़ा उठाया गया है। पूर्व से प्रस्तावित चारों ओर वाकर्स-वे, फव्वारे, लाईटिंग, और बाउण्ड्री दीवार का निर्माण प्रगति पर है। इन सब सुविधाओं का लाभ भले ही शहर के नागरिक नहीं उठा रहे हैं, पर इसका फायदा मयकश यानि शराब के शौकीन खुले आम बेखौफ होकर उठाते देखे जा सकते हैं। अल-सुबह या सांझ ढले से देर रात्रि, दलसागर के विभिन्न घाटों पर इनका जमावड़ा देखा जा सकता है। इस झील के किनारों पर देशी और विदेशी शराब की दुकानें हैं। हालांकि इस शराब सेवन के लिए अहाते बने हैं, पर शराब खोर अपनी फितरत को प्राकृतिक आनंद देने के चलते और उमस भरी गर्मी से निजात पाने खुली और ठण्डी हवा के झोंको का आनंद लेने दलसागर के तीरे, खुले में बैठ, शराबखोरी करते देखे जा सकते हैं।
दल सागर के खुले हुए और लहरों के थपेड़े वाले खुली ठण्डी हवा के किनारे मुंबई के जुहूबीच या गोवा के समुद्री तटों का नजारा दे स्वास्थ्य के लिए सुबह-शाम सैर करने वालों से अधिक इन जुनूनी मयकशों को अपनी ओर अधिक आकर्षित कर रहे हैं। वैसे समझा जा सकता है कि ऐसे माहौल में कौन सभ्य शहरी इसका उपयोग करना चाहेगा।
सौंदर्यीकरण और नगर विकास के लिए संकल्पित पालिका अध्यक्ष, प्रशासन और पुलिस से यह अपेक्षा व्यक्त की जाती है कि वह ‘‘दलसागर ओपन बार‘‘ की ओर संज्ञान ले अन्यथा इनकी सारी कवायद व्यर्थ ही साबित होगी.....

गुड़िया के मामले में हुकुम का मौन आश्चर्यजनक!


अपराधियों को प्रश्रय . . . 2

गुड़िया के मामले में हुकुम का मौन आश्चर्यजनक!

कहीं झाबुआ पावर प्रबंधन को बचाने में तो नहीं लगे हैं कुंवर शक्ति सिंह!

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य विकासखण्ड घंसौर से निकलकर जिला पंचायत के उपाध्यक्ष का सफर तय करने वाले कुंवर शक्ति सिंह का घंसौर में हुए गुड़िया रेप कांड में चुप रहना अनेक आश्चर्य को जन्म दे रहा है। क्षेत्र में हुकुम के नाम से मशहूर कुंवर शक्ति सिंह का दबदबा मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड में अच्छा खासा बना हुआ है।
ज्ञातव्य है कि गत 17 अप्रेल को घंसौर की एक दुधमुंही चार साल की बच्ची के साथ मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के वेल्डर फिरोज ने दुष्कर्म किया था। मामला दबा रहा पर जब समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के जरिए मामला देश की राजधानी दिल्ली के प्रमुख समाचार पत्रों की वेब साईट्स पर उछला तब जाकर प्रशासन ने इस पर संज्ञान लिया।
आनन फानन उसे जबलपुर फिर एयर एंबूलेंस से नागपुर ले जाया गया। गुडिया के मामले में मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड ने काफी लापरवाही बरती, उसके इलाज की बात भी जिला प्रशासन द्वारा इन्हीं के द्वारा उठाने की बात हुई, अंततः गुड़िया को बचाया नहीं जा सका।
संयंत्र प्रबंधन के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि हुकुम की बात संयंत्र प्रबंधन ने अब तक कभी नहीं काटी है। इसका कारण हुकुम का क्षेत्र और सिवनी जिले के मीडिया पर खासा प्रभाव ही माना जा सकता है। सूत्रों की मानें तो अगर कुंवर शक्ति सिंह चाहते तो वे संयंत्र प्रबंधन पर दबाव बनवाकर गुड़िया को संयंत्र के खर्च ही जबलपुर से एयर एंबूलेंस के माध्यम से सीधे दिल्ली ले जा सकते थे, जहां उसका बेहतर इलाज हो सकता था।
सूत्रों का कहना हैै कि वस्तुतः हुकुम के द्वारा एसा कोई प्रयास नहीं किया गया कि गुड़िया को किसी तरह की मदद मिल सके। वहीं नागपुर से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया ब्यूरो से आशीष कौशल ने अवश्य बताया कि नागपुर के केयर अस्पताल में भर्ती गुड़िया को देखने कुंवर शक्ति सिंह अवश्य गए थे।
सूत्रों का यह भी कहना है कि चूंकि संयंत्र प्रबंधन को यह भरोसा है कि क्षेत्र में आदिवासियों के साथ संयंत्र प्रबंधन ने जो दोयम दर्जे का व्यवहार किया है उसे दबाने में हुकुम सक्षम हैं और सिवनी के मीडिया पर उनकी पकड़ के चलते कहीं भी इन बातों को तवज्जो नहीं मिलेगी अतः संयंत्र का अधिकांश काम हुकुम के इशारों पर ही होता है।
गुड़िया के मसले में कुंवर शक्ति सिंह का ना तो कोई आधिकारिक बयान आया और ना ही उनके प्रयासों को मीडिया में भी स्थान ही मिला। शक्ति सिंह के करीबी सूत्रों ने साई न्यूज को बताया कि अपना मौन वृत तोड़कर शक्ति सिंह 6 मई नहीं 19 अप्रेल को ही घंसौर वापस लौट आए थे।

लाईन बदलने के नाम पर करोड़ों के वारे न्यारे!


लाईन बदलने के नाम पर करोड़ों के वारे न्यारे!

पुरानी सर्विस लाईन साथ ले जा रहे हैं कारिंदे: अर्थिंग भी नहीं डल रही करीने से

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। सिवनी शहर में बिजली के मीटर बाहर करने और नई सर्विस लाईन डालने के नाम पर करोड़ों की चपत सीधे सीधे मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल को लगाई जा रही है। विद्युत मण्डल ने इस काम के लिए महज एक नोडल अधिकारी तैनात किया है, जिसके पास ना लाईन स्टाफ है और ना ही कोई अन्य सहायक। इन परिस्थितियों में वह अकेला घरों घर जाकर यह सुनिश्चित करने से रहा कि काम विद्युत मण्डल के मापदण्डों के हिसाब से हुआ अथवा नहीं।
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की टीम को शहरवासियों ने बताया कि घरों में मीटर बाहर करवाने और सर्विस लाईन का काम चल रहा है। लोगों की शिकायत है कि इस काम को अंजाम देने वाले कारीगरों द्वारा अनेक घरों में नई सर्विस लाईन को इस तरह डाला गया है कि वह घरों में दीवाली दशहरे की झालरों के मानिंद दिख रही है।
लोगों की यह शिकायत आम हो गई है कि सर्विस लाईन बदलने पर पुरानी सर्विस लाईन को इस काम को अंजाम देने वाले अपने ही साथ ले जा रहे हैं। ज्ञातव्य है कि जब बिजली का कनेक्शन लिया जाता है तब सर्विस लाईन खरीदकर लाने की जवाबदेही उपभोक्ता पर ही आहूत होती है। इस सर्विस लाईन का क्या उपयोग किया जा रहा है इस बारे में कहा नहीं जा सकता है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि पुरानी सर्विस लाईन को इस काम को अंजाम देने वाले ठेकेदरों द्वारा बेच दिया जा रहा है।
वहीं, दूसरी ओर नई सर्विस लाईन के डालने पर अर्थिंग का काम भी मानक आधार पर नहीं किया जा रहा है। अनेक उपभोक्ताओं की शिकायत है कि अर्थिंग में डलने वाली तांबे की तार, कोयला, नमक आदि भी उसमें नहीं डलवाया जा रहा है। अर्थिंग के नाम पर महज खाना पूरी के लिए एक तार जमीन में एकाध फिट ही गाड़ा जा रहा है।
मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल के संभागीय यंत्री कार्यालय के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि इस काम को अंजाम देने के लिए डीई कार्यालय में एक नोडल अधिकारी बनाया गया है। श्री मण्डलोई को इसका प्रभार दिया गया है। सूत्रों की मानें तो उनके पास ना तो कोई लाईनमेन है और ना ही अन्य कोई स्टाफ।
सूत्रों ने साई न्यूज को आगे बताया कि सिवनी शहर के लगभग इक्कीस हजार उपभोक्ताओं में से सोलह हजार उपभोक्ताओं को आरएपी डीआरपी योजना के तहत सर्विस लाईन बदलने और मीटर बाहर करने के लिए चिन्हित किया गया है। इस काम का ठेका गुजरात के अहमदाबाद की मेसर्स मांटे कार्लो को प्रदाय किया गया है।
सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को यह भी बताया कि इस काम को अंजाम देने के लिए सर्विस लाईन की मद में 1200 रूपए तथा मीटर बाहर करवाने की मद में आठ सौ रूपए प्रतिमीटर का व्यय रखा गया है। लगभग दो हजार रूपए हर मीटर के लिए विद्युत मण्डल द्वारा मेसर्स मांटे कार्लो को प्रदाय किए जा रहे हैं।
सोलह हजार मीटर के लिए विद्युत मण्डल द्वारा दो हजार रूपए प्रति मीटर की दर से लगभग तीन करोड़ बीस लाख रूपए की राशि खर्च की जा रही है। कंगाल विद्युत मण्डल यह राशि निश्चित तौर पर उपभोक्ता की जेब से ही निकालेगा, पर इस खेल में मालामाल हो सकते हैं, गुजरात के मेसर्स मांटे कार्लो और विभाग के अफसर!

सूर्यनारायण के कहर में तड़पते प्यासे पशु पक्षी!


सूर्यनारायण के कहर में तड़पते प्यासे पशु पक्षी!

(लिमटी खरे)

गर्मी इस साल भी अब पूरे शबाब पर है। गर्मी के मौसम में वैसे भी पेयजल की मांग बढ़ जाती है। गर्मी के इस मौसम में आदमी से लेकर जीव जंतु, पशु पक्षी भी छांव और पानी की तलाश में ही फिरते देखे जा सकते हैं। वन्यजीव भी पानी की तलाश में ही जंगल से निकलकर बाहर आ जाते हैं। हाल ही में बखारी के पास रामगढ़ में तेंदुआ घर में घुस गया था, वह भी शायद पानी की ही तलाश में जंगल से निकलकर बाहर आया था। गांव देहात में इस तरह की घटनाएं घटना आम बात है।
सिवनी जिले विशेषकर जिला मुख्यालय मेें मूक बधिर पशु पक्षी गर्मी में पानी के लिए तरसते देखे जा सकते हैं। आदि अनादि काल की कथाओं में इस बात का उल्लेख मिलता है कि लोग अपने अपने घरों में या आसपास पानी भण्डारण के लिए गड्ढ़े खोदा करते थे ताकि निस्तार का पानी वहां एकत्र हो जो पशु पक्षियों के काम आए। कालांतर में यह गड्ढ़े मच्छरों के लिए उपजाऊ माहौल तैयार करने लगे तब इन्हें बनाना बंद कर दिया गया।
सिवनी शहर में पशु पक्षियों के लिए पानी मुहैया करवाना वैसे तो नगर पालिका परिषद के जिम्मे है पर वह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में पूरी तरह असफल ही नजर आ रहा है। जीव जंतुओं, पशु पक्षियों की रक्षा के लिए कृत संकल्पित समाज सेवा का दावा करने वाली संस्थाएं भी मौन ही हैं। कुछ जगहों पर दयालु प्रवृत्ति के लोगों ने पक्षियों के लिए अवश्य ही पानी की व्यवस्था की है। शहर में कमोबेश हर पानी के स्त्रोत चाहे वह हेण्ड पंप हो या सार्वजनिक नल, उसके पास पशुओं की भीड़ देखी जा सकती है।
हर नागरिक के जेहन में यह बात अवश्य ही कौंधती होगी कि सिवनी शहर में आवारा पशुओं को पकड़कर रखने के लिए बरघाट नाके के पास एक कांजी हाउस बनाया गया था। वह स्थान आज किसके कब्जे में है, वहां कितने जानवरों को रखा गया है, इस बारे में शायद ही दावे के साथ कोई बता सके। यह भी संभव है कि जिस वार्ड में यह है उस वार्ड के पार्षद को भी इसकी जानकारी ना हो।
एक दशक पहले तक नगर पालिका परिषद द्वारा भले ही रस्मअदायगी के लिए ही सही पर अपनी हाका गेंग को इस बात के लिए पाबंद किया जाता था कि वह शहर में घूम रहे आवारा मवेशियों को पकड़कर उन्हें कांजी हाउस मंें बंद करे। बाद में पशु के मालिक को जब वह उसे छुड़ाने आता था, तब समझाईश देकर और जुर्माना करके पशु उसे सौंप दिया जाता था। अब यह सब कुछ समाप्त हो गया है। शहर भर में आवारा मवेशी या तो सड़कों पर बैठे आवागमन बाधित करते नजर आते हैं या फिर किसी के घर की दहलान में घुसकर प्लास्टिक की बाल्टियां तोड़ते नजर आते हैं।
शहर में इस समय गाय, बैल, गधे के अलावा भारी तादाद में स्वाईन फ्लू के संवाहक सूअर घूमते दिख जाते हैं, जो नालियों में सनकर लोगों के घरों के आंगन को गंदा करते नजर आते हैं। नगर पालिका परिषद के सफाई कर्मी कभी कभी नालियों पर मेहरबान होकर कचरा निकलकर नालियों के किनारे रख दिया करते हैं। यह कचरा दो चार दिन तक टेक्टर और ट्रली की रास्ता देखता रहता है। जब तक टेक्टर ट्राली आती है तब तक सुअरों की फौज इस कचरे को दुबारा नाली में ही ढकेल देती है।
अभी प्रोढ़ होती पीढ़ी को याद होगा कि शहर के अंदर ना जाने कितने स्थानों पर मवेशियों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था हेतु पक्के सीमेंटेड टांके बनवाए गए थे। इन टांकों में पालिका प्रशासन द्वारा हर रोज पानी भरा जाता था ताकि मूक पशु पक्षी गर्मी में पानी के लिए भटकते ना रह जाएं। लगता है कि आज के जनसेवक वाकई निष्ठुर हो चले हैं।
सिवनी की विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया, केवलारी के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर ने नगर पालिका के साथ ही साथ ग्राम पंचायतों को पेयजल के लिए टेंकर्स दिए। इन टेंकर्स की कीमतों में भारी अंतर है। क्या श्रीमति नीता पटेरिया, शशि ठाकुर, कमल मस्कोले और हरवंश सिंह ठाकुर ने अब तक पशु पक्षियों के पानी के लिए कोई प्रयास किए हैं। आखिर ये जनसेवक पशु पक्षियों की तरफ देखें भी क्यों? आखिर पशु पक्षी इन विधायकों के वोटर्स नहीं हैं।
जिला प्रशासन चाहे तो लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को निर्देश दे कि शासन की योजना के तहत खुदने वाले नलकूपों के लिए प्लेटफार्म बनाते समय पानी की निकासी के मध्य एक टांका अवश्य ही बनाए जिसमें हेण्ड पंप से पानी भरने के दौरान व्यर्थ बहा पानी एकत्र हो सके। अगर सरकारी तौर पर खुदवाए गए हेण्ड पंप के पास इस तरह के कुछ बड़े टांके बन जाएं तो निश्चित तौर पर मूक मवेशियों को पानी का अच्छा साधन मुहैया हो सकता है। चूंकि इन हेण्ड पंप का उपयोग रोजाना ही होता है, अतः व्यर्थ पानी रोजना ही टंकी से होकर बह जाएगा। इस तरह बहते पानी में मच्छरों के पनपने की आशंका कम ही होती है।
पालिका प्रशासन द्वारा नगर के एतिहासिक दलसागर तालाब में फव्वारा चलाया जा रहा है। इससे किसी की आंखों को सुख और सुकून मिल रहा है या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता है, पर कचहरी चौक पर स्थित उद्यान में फव्वारा कभी कभार चलता ही दिखता है। पालिका प्रशासन अगर चाहे तो सीमेंट की कम उंचाई वाली टंकियां अथवा कुछ पक्के टांके तत्काल बनवाकर उनको दलसागर, बुधवारी तालाब से भर सकता है। यह काम एक छोटी मोटर लगाकर भी किया जा सकता है। इस काम में दिन भर में महज एक ही टेंकर इन टांकों को भर सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सकारात्मक सोच के अभाव में पशु पक्षियों की ओर देखने वाला कोई भी नहीं है। अभी गर्मी का आगाज हुआ है। लगभग दो माह तक गर्मी पूरे शबाब पर होगी। इस दर्मयान पशु पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करना भी मनुष्य का ही काम है। वैसे इंसानों को सिवनी में पीने का पानी नसीब नहीं है तो फिर भला जानवरों की कौन सोचे!