ब्रितानियों से गए गुजरे हैं वर्तमान निज़ाम!
(दीपाली सिन्हा)
लखनऊ (साई)। ब्रितानी गोरों ने भारत देश पर डेढ़ सदी से ज्यादा राज किया देश को लूटा खसोटा, जुल्म ढाए, अपनी हुकूमत में काले गोरे का भेद किया, पर जहां तक पुण्य सलिला मां गंगा की बात आती है तो उन्होंने हिन्दुओं की आस्था की प्रतीक गंगा को मैला होने से सदा बचाए रखा। ब्रितानी भी गंगा मैया को होली गंगा यानी पवित्र गंगा कहा करते थे।
बताया जाता है कि करीब 186 वर्ष पहले बनारस में ब्रिटिश सरकार के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने गंगा प्रेम की मिसाल पेश की थी। उसने पहली बार इस प्राचीन नगरी में सीवर सिस्टम जमीन के नीचे सुरंग वाले नाले के रूप में बिछाया लेकिन इसमें बहने वाले घरों के मल-जल को गंगा में नहीं गिरने दिया बल्कि उसे मुख्य रूप में मच्छोदरी तालाब में गिराया, जहां से शहर से सटे खेतों में सिंचाई के रूप उस तालाब जल का प्रयोग हुआ करता था।
बनारस के अतीत की पड़ताल शीर्षक से अध्ययन में बीएचयू के सहायक प्रोफेसर डा. राजीव श्रीवास्तव के नेतृत्व वाली टीम ने पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त डा. ओपी केजरीवाल द्वारा जेम्स प्रिंसेप पर लिखी गई पुस्तक के हवाले से यह जानकारी जुटाई है। प्रिंसेप यहां 26 नवंबर 1820 को पहुंचा। वह इस धार्मिक-सांस्कृतिक नगरी के साथ ही गंगा की पावनता से भावनात्मक रूप से जुड़ा।
उसने पहली बार अधिकृत तौर पर शहर की जनगणना करवाई। तब यहां 369 मुहल्लों में 30205 मकान थे और कुल आबादी 1,81,482 थी। तब वर्ष 1823 तक शहर का सीवर वरुणा नदी में बहता था और त्रिलोचन नाला मैदागिन झील में गिरता था। उसी वर्ष अंग्रेज सरकार ने इस शहर की बुनियादी नागरिक सुविधाओं के ढांचागत विकास के लिए एक कमेटी गठित की।
इसमें प्रिंसेप सचिव थे। उसने तंग गलियों और घनी आबादी वाले इलाकों के घरों को छेड़छाड़ किए बिना ही भूमिगत नाली का जाल बिछवाया। यह पहली जनवरी 1826 से 21 जुलाई 1827 तक तैयार हो गया। तब पहली बारिश के मौसम में सड़कों पर न कीचड़ की किच-किच हुई और ना ही शहर में कहीं जलजमाव हुआ।

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