दुधवा टाईगर के लिए
काल बनी रेल लाईन
(अमित शुक्ला)
लखनऊ (साई)। एक तरफ
पेंच टाईगर रिजर्व और कान्हा टाईगर रिजर्व के बीच के कारीडोर से गुजरने वाले
काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कारीडोर के चलते उत्तर दक्षिण की जीवन रेखा उत्तर दक्षिण
फोरलेन गलियारे के काम को रोक दिया गया है वहीं दूसरी ओर दुधवा टाईगर रिजर्व
परियोजना के जानवरों के लिए रेल विभाग इन दिनों यमराज से कम नहीं साबित हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के
एकमात्र संरक्षित बाघ क्षेत्र दुघवा टाईगर रिजर्व के बीचोंबीच से होकर गुजरने वाली
100 किलोमीटर
लंबी मीटर गेज रेल लाईन पर आए दिन जानवर कट कटकर अपनी जान गंवा रहे हैं। वन विभाग
के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि इस रेल लाईन के आसपास से
जानवरों के आने जाने के लिए ओवर ब्रिज या अंडर पास जब तक नहीं बनाए जाएंगे तब तक
जानवरों को बचाया जाना संभव नहीं है।
दुधवा टाइगर रिजर्व
उत्तर प्रदेश में पर्यटन का मुख्य केंद्र है। साथ ही यह वन क्षेत्र बाघों का आदर्श
अनुकूलित आवास माना जाता है। इस टाइगर रिजर्व के 1,500 वर्ग किमी क्षेत्र
में दुधवा वन के साथ दो सेंचुरी कतरनिया घाट और किशनपुर भी स्थित हैं। इस लंबे वन
क्षेत्र में मृत्युदूत रेलवे लाइन बिछी है, जो नॉर्दर्न-ईस्टर्न रेलवे के गोंडा-मैलानी
रेल प्रखंड का एक भाग है।
पिछले पांच साल में
केवल दुधवा और कतरनिया घाट के ही इलाकों में 29 वन्य जीव, जिसमें बाघ भी
शामिल हैं, ट्रेन की
भेंट चढ़ चुके हैं। ट्रेन से मरने वाले पशुओं की विभागीय सूची में उन्हीं जानवरों
की मौत दर्ज होती है, जिनके टुकड़े रेल पटरियों पर मिल जाते हैं।
हाथी, बाघ, हिरन, जंगली सूअर जैसे
बड़े जानवरों की मौत पर कार्रवाई में ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड पर वन रेंज में केस
दर्ज होता है। लेकिन रोजाना मरने वाले छोटे जानवरों जैसे मगर, कछुआ और बंदर का तो
पता ही नहीं चलता। इनकी मौत रेलवे ट्रैक की सफाई के साथ साफ हो जाती है।
यहां एक खतरा यह भी
है कि यदि ट्रेन हाथी जैसे बड़े जानवर से टकरा जाए तो उसकी मौत के साथ-साथ ट्रेन के
भी दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना रहती है। इस वन क्षेत्र में पिछले कुछ सालों
में 4 हाथी
ट्रेन से टकराकर मर चुके हैं। यदि व्यावसायिक नजरिए से देखा जाए तो रेलवे के इस
रूट पर न तो कोई बड़ा व्यापारिक केंद्र है और न ही कोई बड़ी आबादी है, जिसकी रेलवे पर
निर्भरता हो। बावजूद इसके यह रूट लगातार सक्रिय है और वन्य जीवों के लिए खतरा बनता
जा रहा है। ब्रिटिश काल में वन संपदा के दोहन और शिकार के लिए इस रेलवे ट्रैक को
बिछाया गया था।

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