ग्वालियर के बाद सिवनी से
मार्च की तैयारी!
(संजीव प्रताप सिंह)
सिवनी (साई)। शेरशाह सूरी के
शासनकाल में बनाई गई उत्तर दक्षिण की जीवनरेखा के उड़ते धुर्रों के कारण सिवनी के
निवासी और यहां से होकर गुजरने वाले लोग बुरी तरह नारकीया जीवन जीने पर मजबूर हैं।
वर्ष 2008 के दिसंबर महीने में विधानसभा चुनावों के एन बाद कथित षणयंत्र के तहत
फोरलेन का काम रूकवा दिया गया था, जो आज तक आरंभ नहीं हो सका
है।
सिवनी में 2008 से एनएचएआई
को लेकर लोग बुरी तरह आहत हैं। इसमें भ्रम की स्थिति आज भी बनी हुई है। सिवनी के
गौरव वास्तु इंजीनियर दीपक अग्रवाल ने एक सुझाव दिया है कि जब ग्वालियर से पच्चीस
हजार लोग पैदल मार्च कर केंद्र सरकार को झुकाकर आगरा में समझौते के लिए बुला सकते
हैं तो हम क्यों नहीं।
दीपक अग्रवाल का सुझाव है कि
सिवनी के साथी ना हवाई जहाज, ना रेल गाडी में वातानुकूलित
दर्जे में ना बस या टेक्सी से दिल्ली कूच करें वरन पैदल या साईकिल से मार्च करें।
उन्होंने कहा कि इस संबंध में सिवनी के निवासियों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं।
साथ ही साथ अब देखना यह है
कि अगले साल होने वाले विधानसभा और फिर लोकसभा नगर पालिका आदि चुनानों के चलते कौन
कौन इस मुहिम में सिवनी की जनता का साथ देता है। यह पैदल या साईकिल मार्च किसी
संगठन की अगुआई में नहीं होगा। इसमें सिवनी के हित साधने के लिए कौन आगे आता है यह
बात महत्वपूर्ण है।
दीपक अग्रवाल के इस सुझाव से अनेक लोगों ने अपनी
सहमति जताई है। सोशल नेटवर्किंग वेब साईट फेसबुक के माध्यम से उठाई गई इस बात में
अनेक सुझाव आए हैं। लोगों का सुझाव है कि संसद के शीतकालीन सत्र में संसद, मंत्रियों के आवास और मध्य प्रदेश के सांसदों के आवासों के
घेरावा के बाद जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया जाएगा।
श्री अग्रवाल ने सुझाव दिया
है कि सिवनी के हित में किए जाने वाले इस आंदोलन के लिए किसी से चंदा नहीं लिया
जाएगा, क्योंकि चंदे के धंधे में
हैं अनेक फंदे। उन्होंने कहा कि इसमें शामिल होने वाले अपनी अपनी सुविधा और
सहूलियत का ध्यान खुद रखकर ही शामिल हों। इसके लिए अगर आवश्यक्ता पड़ी तो अण्णा
हजारे और अरविंद केजरीवाल से भी संपर्क करने की बातसामने आई है।
एक सुझाव यह भी सामने आया है
कि इसमें सभी दल के कार्यकर्ता शामिल हों पर वे दलीय कार्यकर्ता के स्थान पर सिवनी
के नागरिक की हैसियत से शामिल हों, क्योंकि यह किसी पार्टी, स्वयंसेवी संगठन नहीं सिवनी के हित का मामला है। साथ ही इस
आंदोलन को किसी राजनैतिक अथवा गैर राजनैतिक बेनर के तले ना करने का सुझाव भी आया
है। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान श्री अग्रवाल ने कहा कि अक्सर इस
तरह के आंदोलनों के मंच बाद में राजनैतिक शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। सिवनी से
दिल्ली तक मार्ग में पड़ने वाले शहरों में नारे लगाकर पोस्टर्स बेनर्स के माध्यम से
सिवनी वासी अपनी पीड़ा का इजहार करेंगे।
वैसे देखा जाए तो ग्वालियर
के लोगों ने आगरा तक पहुंचकर ही सरकार को घुटनों पर खड़ा कर दिया है। सिवनी में
फोरलेन के लिए अलग अलग संगठनों द्वारा अपने अपने स्तर पर व्यापक प्रयास किए गए
किन्तु सफलता किसी के हाथ नहीं लगी है। मजबूरी में आज चार साल बीतने के बाद भी
2008 के उपरांत उत्तर भारत से दक्षिण भारत को जोड़ने वाली सिवनी से गुजरने वाली इस जीवनरेखा
के धुर्रे पूरी तरह उड़ चुके हैं।
ज्ञातव्य है कि सड़क मण्डला
सिवनी के संसद सदस्य बसोरी सिंह मसराम,
बालाघाट
सिवनी के सांसद केशव दयाल देशमुख के संसदीय क्षेत्र से एवं मध्य प्रदेश विधानसभा
उपाध्यक्ष हरवंश सिंह, सिवनी विधायक श्रीमति नीता
पटेरिया, बरघाट विधायक कमल मस्कोले
एवं लखनादौन की विधायक श्रीमति शशि ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इन सांसद विधायकों को जनादेश की कितनी परवाह है यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि किसी
ने भी संसद या विधानसभा में इस मामले को 2008 के उपरांत उठाने की जहमत ही नहीं
उठाई है।
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