दिग्विजय कमल नाथ
में बढ़ीं दूरियां!
(नन्द किशोर)
भोपाल (साई)। एक
समय मध्य प्रदेश में बडे भाई (कमल नाथ) और छोटे भाई (राजा दिग्विजय सिंह) की जुगल
जोड़ी ने दस साल लगातार राज किया। दोनों ही की आपसी समझबूझ इतनी गजब की थी कि उस
वक्त के राजनैतिक चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह भी इनकी जुगल जोड़ी को हिला नहीं पाए
थे। पिछले कुछ समय से राजा दिग्विजय सिंह और कमल नाथ के बीच सामंजस्य का अभाव साफ
देखा जा रहा है।
2003 में मध्य
प्रदेश में कांग्रेस के पांव उखड़़ने के बाद केंद्र की राजनीति में कूच कर गए राजा
दिग्विजय सिंह ने अपना कद प्रदेश स्तर से नेशनल लेबल का कर लिया है। राजनैतिक दांव
पेंच में माहिर राजा दिग्विजय सिंह इस समय भी कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष
केंद्रों 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) और 12, तुगलक लेन (राहुल
गांधी का सरकारी आवास) की आंखों के नूर बने हुए हैं।
बताया जाता है कि
केंद्र में सियासी क्षत्रप बन चुके कमल नाथ के मन में मध्य प्रदेश का निजाम बनने
की तमन्नाएं आज भी हिलोरे मार रही हैं। यहां उल्लेखनीय है कि वर्ष 1993 और 1998
में दिग्विजय सिंह अगर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो कमल नाथ की बदौलत।
कल तक ग्वालियर के
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया को परोक्ष तौर पर पानी पी पी कर कोसने वाले राजा
दिग्विजय सिंह का सुर अब बदला बदला नजर आ रहा है। एमपी में कांग्रेस को जिलाने के
लिए अब राजा को महाराजा से भी कोई परहेज नहीं है। राजा का मानना है कि अगर पार्टी
आलाकमान मध्यप्रदेश के वर्ष 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों में केंद्रीय
मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उतारता
है, तो वह उनका
पूरा समर्थन करेंगे।
राजा के महाराजा के
प्रति इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी से कांग्रेस की सियासत में तेजी से उबाल दिख
रहा है। राजा के इस कथन के बाद कमल नाथ समर्थक असमंजस में हैं कि आखिर छोटे भाई को
हो क्या गया है, जो बड़े भाई
को छोड़कर अब भतीजे की तरफदारी में उतर आए हैं।
नाथ समर्थक एक
वरिष्ठ नेता ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से कहा कि
बड़े भाई और छोटे भाई के बीच अब रिश्तों की मिठास पहले जैसी नहीं रही। इतना ही नहीं
दिग्गी राजा ने तो अब बाकायदा कमल नाथ के प्रभाव वाले महाकौशल में भी दखल आरंभ कर
दी है। वैसे भी एक दशक से महाकौशल में राजा दिग्विजय सिंह और कमल नाथ ने एक साथ
आमद नहीं देकर संकेत अवश्य दे दिया है कि दोनों की विचारधाराओं में अब पटाव नहीं
रहा।


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