मंगलवार, 22 जनवरी 2013

स्वास्थ्य सुविधाओं पर राष्ट्रपति चिंतित पर सरकारें मौन


स्वास्थ्य सुविधाओं पर राष्ट्रपति चिंतित पर सरकारें मौन

(लिमटी खरे)

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने देश की स्वास्थ्य सुविधाओं पर पूर्व महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की तरह ही चिंता जताई किन्तु सरकारों के कान में आज भी इस मसले पर जूं नहीं रेंगी है। वर्तमान परिवेश में आम आदमी चिकित्सा की मद में जितना व्यय कर रहा है वह उसकी कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त कहा जा सकता है। दवाओं और चिकित्सकों विहीन सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ दिन ब दिन कम होती जा रही है वहीं दूसरी ओर उन्ही सरकारी चिकित्सकों के आवासों या क्लीनिक्स पर मरीजों की भीड़ संभाले नहीं संभल रही है। आजादी के साढ़े छः दशक बीतने के बाद भी नीम हकीमों या मंहगे चिकित्सकों के भरोसे बैठे हैं आम हिन्दुस्तानी। अगर यह कहा जाए कि चिकित्सकों पर सरकारों का जोर नहीं तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। आम आदमी अब तो अपने स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए ही कमाता दिख रहा है।

भारत गणराज्य के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की जर जर हालत पर चिंता जताई है। यद्यपि प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि सरकार ने इससे निपटने के लिए अगले दस साल में स्वास्थ्य बजट में भारी वृद्धि करने का फैसला लिया है। राष्ट्रपति उद्योग संगठन एसोचौम के स्वास्थ्य सेवाओं पर आयोजित एक सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि हमारे देश की महज 35 प्रतिशत आबादी की ही जरूरी दवाओं और हेल्थकेयर सुविधाओं तक पहुंच है। राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार ने 12वीं योजना में हेल्थ पर होने वाले खर्च को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करने का फैसला किया है। 11वीं योजना में यह 1.2 फीसदी था। 13वीं योजना में इसे तीन प्रतिशत तक ले जाने की योजना है।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का सोचना सही है कि अगर देश का स्वास्थ्य बजट बढ़ जाए तो हालात सुधर सकते हैं। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का लंबा संसदीय जीवन रहा है, सरकारी व्यवस्थाओं को वे भली भांति जानते हैं। वस्तुतः अगर वर्तमान बजट का ही सही उपयोग हो जाए तो देश से बीमारी का सफाया संभव है। एनआरएचएम में दिया जाने जाने वाला अनाप शनाप आवंटन ही सही उपयोग में आ जाए तो काफी हद तक स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता है। एनआरएचएम में एक एक राज्यों में अरबों रूपए के घोटालों की गूंज हो रही है।
देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की उनके कार्यकाल में बारंबार की जाने वाली यह चिंता बेमानी नहीं है कि देश में चिकित्सकों की भारी कमी है। प्रतिभा पाटिल ने अपने कार्यकाल में पश्चिमी दिल्ली में भारतीय चिकित्सा परिषद की प्लैटिनम जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उनकी यह पीड़ा सामने उभरकर सामने आई। इससे पहले अक्टूबर में भी महामहिम ने असम के तेजपुर में आर्युविज्ञान संस्थान की आधारशिला रखते हुए इसी मसले पर अपनी चिंता जाहिर की थी।
बकौल प्रतिभा पाटिल देश के 271 मेडिकल कालेज से प्रतिवर्ष 31 हजार चिकित्सक उपाधि ग्रहण करते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में इस बात को भी रेखांकित किया कि इसके बावजूद भारत में आज भी छह लाख डाक्टरों व 10 लाख नर्सों र्की कमी है। राष्ट्रपति ने कहा कि वैसे तो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में डाक्टरों के अभाव वाले राज्यों में 60 मेडिकल कालेज व 225 नर्रि्सग कालेज खोलने का लक्ष्य है, लेकिन केवल संख्या बढ़ा देने से ही काम नहीं चलेगा।
सरकारी आंकड़े चाहे जो कहें पर ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मजरे, टोले, गांव या छोटे शहरों में रहने वाला आम भारतीय आज भी झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे पर ही है। इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं सरकारें। कितने आश्चर्य की बात है कि आजादी के साठ साल बीत जाने के बाद भी सरकारों द्वारा चिकित्सकों को ग्रामों की ओर भेजने के मार्ग प्रशस्त नहीं किए जा सके हैं। वर्तमान में बतौर महामहिम प्रतिभा पाटिल के द्वारा व्यक्त की गई चिंता को केंद्र सरकार ने कितनी संजीदगी से लिया इस बात का आंदाजा देश में चिकित्सा के वर्तमान ढांचे को देखकर लगाया जा सकता है।
भारत को आजाद हुए बासठ साल से अधिक बीत चुके हैं। मानव जीवन में अगर कोई बासठ बसंत देख ले तो उसे उमरदराज माना जाता है। सरकार भी बासठ साल की आयु में अपने कर्तव्य से सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। राजनीति में यह नहीं होता है। राजनीति में 45 से 65 की उमर तक जवान ही माना जाता है। इन बासठ सालों देश पर हुकूमत करने वाली सरकारें अपनी ही रियाया को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने में नाकाम रहीं हैं, इससे ज्यादा और शर्म की बात हिन्दुस्तान के लिए क्या हो सकती है।
अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर भारत के हितों को अब तक कुर्बान ही किया गया है, यहां के जनसेवकों ने। देश में सरकारी तौर पर आर्युविज्ञान (मेडिकल), आयुर्वेदिक, दंत, और होम्योपैथिक कालेज का संचालन किया जाता रहा है। अब तो निजी क्षेत्र की इसमें भागीदारी हो चुकी है। भारत में न जाने कितने चिकित्सक हर साल इन संस्थाओं से पढकर बाहर निकलते हैं। इन चिकित्सकों को जब दाखिला दिलाया जाता है तो सबसे पहले दिन इन्हें एक सौगंध खिलाई जाती है, जिसमें हर हाल में बीमार की सेवा का कौल दिलाया जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पढाई पूरी करने के साथ ही इन चिकित्सकों की यह कसम हवा में उड जाती है।
अपने अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), उप स्वास्थ्य केंद्र या सिटी डिस्पेंसरी तो स्वीकृत करा लेते हैं किन्तु इन अस्पतालों में कितना अमला वास्तव में कार्यरत है, इस बारे में देखने सुनने की फरसत किसी को भी नहीं है। सत्ता के मद में चूर ये जनप्रतिनिधि चुनावो की घोषणा के साथ ही एक बार फिर सक्रिय हो मतदाताओं को लुभावने वादों से पाट देते हैं।
नेशनल रूलर हेल्थ मिशन के प्रतिवेदन पर अगर नज़र डाली जाए तो देश की साठ फीसदी से अधिक पीएचसी में सर्जन नहीं हैं, इतना ही नहीं पचास फीसदी जगह महिला चिकित्सक गायब हैं, तो 55 फीसदी जगह बाल रोग विशेषज्ञ। क्या ये भयावह आंकड़े सरकार की तंत्रा तोड़ने के लिए नाकाफी नहीं हैं।
दिया तले अंधेरा की कहावत देश की सबसे बड़ी पंचायत में साफ हो जाती है। यूं तो सभी दल आरक्षण का झुनझुना बजाकर वोट बैंक तगड़ा करने की फिराक में रहते हैं किन्तु सांसदों के इलाज के लिए तैनात चिकित्सा कर्मियों में महज 22 फीसदी चिकित्सक ही कोटे के हैं। हाल ही में सूचना के अधिकार में निकाली गई जानकारी से यह कड़वा सच सामने आया है। सांसदों के लिए तैनात 49 चिकित्सकों मेंसे नौ अनुसूचित जाति, एक एक अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं।
बहरहाल प्रश्न यह उठता है कि आखिर चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे के माध्यम से जनसेवा को उतारू युवा गांव की ओर रूख क्यों नहीं करना चाहते? संभवतः विलासिता के आदी हो चुके युवाआंे को गांव की धूल मिट्टी और अभाव का जीवन रास नहीं आता होगा इसी के चलते वे गांव नहीं जाना चाहते। इसके साथ ही साथ शहरों में सरकारी चिकित्सकों के आवासों पर लगने वाली मरीजों की भीड़ भी उन्हें आकर्षित करती होगी। हर जिला मुख्यालय का नामी सरकारी डॉक्टर किसी न किसी अध्यनरत चिकित्सक का पायोनियरभी होता होगा।
वैसे इस मामले में सरकार को दोष देना इसलिए उचित होगा क्योंकि सरकार द्वारा चिकित्सकों को गांव भेजने के लिए उपजाउ माहौल भी तैयार नहीं किया गया है। अस्सी के दशक में सुनील दत्त अभिनीत ‘‘दर्द का रिश्ता‘‘ चलचित्र का जिकर यहां लाजिमी होगा। उस चलचित्र में विदेश में अपनी सेवाएं दे रहे चिकित्सक का किरदार निभा रहे सुनील दत्त ने अपनी ही बेटी के इलाज के दौरान हुई तकलीफों से प्रेरणा लेकर हिन्दुस्तान में गांवों में जाकर सेवा करने का संकल्प लिया था।
वह निश्चित रूप से चलचित्र था, पर उससे प्रेरणा लेकर न जाने कितने नौजवानों ने गांवों की ओर रूख किया था। कहने का तात्पर्य महज इतना है कि सरकार को चाहिए कि फूहड़ और समाज को बरबादी के रास्ते पर ले जाने वाले चलचित्रों के स्थान र प्रेरणास्पद चलचित्रों के निर्माण को प्रोत्साहन देने की आज महती जरूरत है।
देखा जाए तो भारत को भी अन्य देशों की भांति चिकित्सा की डिग्री के उपरांत पंजीयन के पहले यह शर्त रख देना चाहिए कि सुदूर ग्रामीण अंचलों और पहुंच विहीन क्षेत्रों में कम से कम छः माह, विकासखण्ड, तहसील और जिला मुख्यालय से निर्धारित दूरी में एक साल तक सेवाएं देने वाले चिकित्सकों का सशर्त पंजीयन किया जाएगा कि वे अपनी सेवाओं का प्रमाणपत्र जब जमा करेंगे तब उनका स्थाई पंजीयन किया जाएगा।
इसके अलावा अगर केंद्र सरकर विदेशों की तरह स्वास्थ्य कर लगा दे तो सारी समस्या का निदान ही हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि न्यूनतम सालाना शुल्क पर साधारण और कुछ अधिक शुल्क पर असाध्य बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त मुहैया करवाए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले इस कर से मुक्त रखे जाएं। अगर एसा हुआ तो चिकित्सकों की जमी जकडी दुकानों पर ताले लगने में देर नहीं लगेगी। मोटी कमाई करने वाले मेडिकल स्टोर और दवा कंपनियों के मेडिकल रिपरजेंटेटिव भी अपना का समेटने लग जाएंगे। जब अस्पताल में ही इलाज और दवाएं मुफत में मिलेंगी तो भला कोई निजी चिकित्सकों के पास क्यों जाएगा। इससे निजी तौर पर चिकित्सा पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगी। डिग्री धारी चिकित्सक सरकारी तौर पर ही इलाज करने को बाध्य होंगे।
आजाद हिन्दुस्तान में चिकित्सा सुविधाओं का आलम यह है कि देश में 45 करोड से भी अधिक लोगों को अने निवास के इर्द गिर्द सवास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। देश में औसतन 10 हजार लोगों के लिए अस्पतालों में सिर्फ सात बिस्तर मौजूद हैं, जिसका औसत विश्व में 40 है। भारत में हर साल तकरीबन 41 हजार चिकित्सकों की आवश्यक्ता है, जबकि देश में उपलब्धता महज 17 हजार ही है।
सौ टके का सवाल यह है कि अस्सी के दशक के उपरांत चिकित्सकों का ग्रामीण अंचलों से मोह क्यों भंग हुआ है। इसका कारण साफ है कि तेज रफ्तार से भागती जिंदगी में भारत के युवाओं को आधुनिकता की हवा लग गई है। कहने को भारत की आत्मा गांव में बसती है मगर कोई भी स्नातक या स्नातकोत्तर चिकित्सक गांव की ओर रूख इसलिए नहीं करना चाहता है, क्योंकि गांव में साफ सुथरा जीवन, बिजली, पेयजल, शौचालय, शिक्षा, खेलकूद, मनोरंजन आदि के साधानों का जबर्दस्त टोटा है। भारत सरकार के गांव के विकास के दावों की हकीकत देश के किसी भी आम गांव में जाकर बेहतर समझी और देखी जा सकती है।
इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर केंद्र में काबिज हुई कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार द्वारा अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ग्रामीण स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की शुरूआत की थी। 2005 में इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को भी आरंभ किया गया था। अपने अंदर वास्तव में ग्रामीणों को स्वस्थ्य रखने की अनेक योजनाओं को अंगीकार किए इस मिशन की असफलता के पीछे यह कारण है कि इसे बिना पूरी तैयारी किए हुए ही आनन फानन में लागू कर दिया गया।
दरअसल इस मिशन की सफलता चिकित्सकों पर ही टिकी थी, जो ग्रामीण अंचलों में सेवाएं देने को तैयार हों। अमूमन देश के युवा चिकित्सक बडे और नामी अस्पतालों में काम करके अनुभव और शोहरत कमाना चाहते हैं, फिर वे अपना निजी काम आरंभ कर नोट छापने की मशीन लगा लेते हैं। अस्पतालों में मिलने वाले मिक्सचर (अस्सी के दशक तक दवाएं अस्पताल से ही मुफ्त मिला करतीं थीं, जिसमें पीने के लिए मिलने वाली दवा को मिक्सचर के आम नाम से ही पुकारा जाता था) में राजनीति के तडके ने जायका इस कदर बिगाडा कि योग्य चिकित्सकों ने सरकारी अस्पतालों को बाय बाय कहना आरंभ कर दिया।
वर्तमान में देश भर में दवा कंपनियों ने चिकित्सकों के साथ सांठगांठ कर आम जनता की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। लुभावने पैकेज के चलते चिकित्सकों की कलम भी उन्हीं दवाओं की सिफारिश करती नजर आती है, जिसमें उन्हें दवा कंपनी से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लाभ मिल रहा हो। चिकित्सकों को पिन टू प्लेन अर्थात हर जरूरी चीज को मुहैया करवा रहीं हैं, दवा कंपनियां। सरकार की रोक के बाद भी दवा कंपनियों और चिकित्सकों की मिलीभगत के साथ मरीज लुटने को मजबूर है। (साई फीचर्स)

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